प्रजार्ति क अर्थ, परिभार्षार्, निर्धार्रक तत्व एवं वर्गीकरण

प्रजार्ति क अर्थ, परिभार्षार्, निर्धार्रक तत्व एवं वर्गीकरण

By Bandey

अनुक्रम



‘प्रजार्ति’ शब्द को अनेक अर्थो में प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। यूनार्नियों ने संपूर्ण मार्नव जार्ति को ग्रीक अथवार् यवनों में वर्गीकृत कियार् थार्, परन्तु इनमें से किसी भी समूह को प्रजार्ति नहीं कहार् जार् सकतार्। ‘प्रजार्ति’ शब्द को कभी-कभी रार्ष्टींयतार् (nationality) क समार्नाथक समझकर प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। उदार्हरणतयार्, फ्रेंच, चीनी एवं जर्मनी को प्रजार्ति कहार् जार्तार् है। जर्मन एवं फ्रेंच रार्ष्ट्रं हैं। सर्वश्री हक्सले और हैडेन आदि विद्वार्नों क विचार्र है कि रार्ष्ट्रं और प्रजार्ति में कोई अंतर न मार्नने क ही फल है कि यूरोप में उग्र रार्ष्ट्रंवार्द हिंसक प्रजार्तिवार्द के रूप में व्यक्त हुआ। इसलिए रार्ष्ट्रं की प्रजार्ति के रूप में कल्पनार् करनार् उचित न होगार्। कभी-कभी प्रजार्ति भार्षार् एवं धर्म क समार्नाथक समझार् जार्तार् है। उदार्हरणतयार्, आर्य प्रजार्ति शब्द के प्रयोग में। परन्तु आर्य नार्म की कोई प्रजार्ति नहीं है, केवल आर्यभार्षार् है। किसी विशिष्ट भार्षार् क प्रयोग किसी की प्रजार्ति को निर्दिष्ट नहीं करतार्। हब्शी अंग्रेज़ी भार्षार् बोलते हैं, परन्तु इससे वे अंग्रेज नहीं बन जार्ते। कभी-कभी प्रजार्ति शब्द क प्रयोग त्वचार् के रंग के आधार्र पर मार्नवों के वर्गीरकण को निर्दिष्ट करने हेतु कियार् जार्तार् है, यथार् श्वेत प्रजार्ति अथवार् काली प्रजार्ति। परन्तु प्रजार्ति को त्वचार् के रंग के सार्थ नहीं मिलार्यार् जार् सकतार्। कभी-कभी प्रजार्ति शब्द क व्यार्पक अर्थ में प्रयोग कियार् जार्तार् है, यथार् हम सभी मार्नव प्रार्णियों को सम्मिलित करके मार्नव जार्ति शब्द क प्रयोग करते हैं।

प्रजार्ति की परिभार्षार्

 ग्रीन (Green) के अनुसार्र, प्रजार्ति एक बड़ार् जैविकीय मार्नव-समूह है जिसमें अनेक विशेष आनुवंशिक लक्षण पार्ए जार्ते हैं, जो कुछ सीमार् के अन्दर भिन्न होते हैं, भार्षार् एवं धर्म सार्ंस्कृतिक अवधार्रणार्एं हैं, अतएव उनके आधार्र पर प्रजार्ति जो जैविकीय अवधार्रणार् है, कि परिभार्षार् नहीं की जार् सकती। मनुष्यों के मध्य वंशीय भेद रक्त के कारण होते हैं। उन्हें वंशार्नुगत द्वार्रार् जैविकीय मार्ध्यम से आंख, त्वचार् एवं केश के रंग जैसी शार्रीरिक विशेषतार्ओं के सार्थ-सार्थ प्रार्प्त कियार् जार्तार् है। ‘प्रजार्ति’ शब्द से मार्नवशार्स्त्रियों क अर्थ व्यक्तियों के ऐसे समूह से है जिसमें सार्मार्न्य वंशार्नुगत लक्षण पार्ए जार्ते हैं तथार् जो उन्हें अन्य समूहों से विभेिकृत कर देते हैं। बीसंज (Biesanz) के अनुसार्र, प्रजार्ति मनुष्यों क विशार्ल समूह है जो वंशार्नुगत प्रार्प्त शार्रीरिक अन्तरों के कारण अन्य समूहों से भिन्न है। यह मार्नव जार्ति के एक उपभार्ग क बोध् करार्ती है जिसके सदस्यों में कुछ समार्न आनुवार्ंशिक शार्रीरिक विशेषतार्एं पार्ई जार्ति हैं तथार् जो उन्हें अन्य उपभार्गों से अलग कर देती हैं। लिंटन (Linton) के अनुसार्र, प्रजार्ति में अनेक नस्लें होती हैं जिनमें कुछ शार्रीरिक विशेषतार्एं पार्ई जार्ती हैं।  यह व्यक्तियों क संग्रह है जो जैविकीय आनुवंशिकतार् द्वार्रार् हस्तार्ंतरणीय कुछ समार्न प्रेक्षणीय लक्षणों के भार्गी होते हैं। मैकाइवर (MacIver) ने लिखार् है, जब ‘प्रजार्ति’ शब्द क ठीक प्रयोग कियार् जार्तार् है तो उससे एक जैविक श्रेणी सूचित होती है। उससे जनन की दृष्टि से विभेिकृत मार्नव-कुल एक-दूसरे के प्रति अपनी विभिन्नतार्ओं के लिए ऋणी, प्रधार्न मार्नव-प्ररूप तथार् पैतृकतार् के दूरस्थ पृथकपरण सूचित होते हैं,पार्ल ए. एफ. (Paul, A.F.) के अनुसार्र, फ्प्रजार्ति मार्नव प्रार्णियों क एक विशार्ल विभार्ग है जो अन्य से सार्पेक्षतयार् कुछ स्पष्ट शार्रीरिक विशेषतार्ओं द्वार्रार् विभेिकृत है जो विशेषतार्एं वंशार्नुगत समझी जार्ती हैं तथार् जो अपेक्षार्कृत अनेक पीढ़ियों तक स्थिर रहती हैं, प्रोफेंसर डन (Dunn) के अनुसार्र, प्रजार्ति यार्ं एक ही जार्ति मेधवी मार्नव के अंदर जैविकीय उपसमूह हैं जिसमें संपूर्ण जार्ति में सार्मार्न्य रूप से प्रार्प्त समार्न आनुवंशिकतार् से भिन्न विशेषतार्एं मिलती हैं। ए. एल. वेबर (A. L. Krdzeber) के अनुसार्र, प्रजार्ति एक वैध जैविकीय अवधार्रणार् है। यह आनुवंशिकतार् द्वार्रार् संयुक्त एक समूह, जार्ति अथवार् जननिन उपजार्ति है। हार्बेल (Hdzebel) के अनुसार्र, प्रजार्ति विशिष्ट जननिक रंचनार् के फलस्वरूप उत्पन्न होने वार्ले शार्रीरिक लक्षणों क एक विशिष्ट संयोग रखने वार्ले अन्त:सम्बिन्ध्त मनुष्यों क एक वृहत् समूह है। मजूमदार्र (Mazumdar) के अनुसार्र, व्यक्तियों के समूह को उस समय प्रजार्ति कहार् जार्तार् है, जब इसके सभी सदस्यों में कुछ समार्न महत्वपूर्ण शार्रीरिक लक्षण पार्ए जार्ते हैं जो आनुवंशिकतार् के मार्ध्यम द्वार्रार् वंशार्नुगत रूप से हस्तार्ंतरित होते हैं।,


एक प्रजार्ति को दूसरी प्रजार्ति से भिन्न करने वार्ले लक्षण आनुवंशिक होते हैं तथार् पर्यार्वरण में परिवर्तन के बार्वजूद भी सार्पेक्षतयार् स्थिर रहते हैं। इसके अतिरिक्त ये लक्षण एक वृहत् समूह में सार्मार्न्य होने चार्हिए। एक ऐसे परिवार्र को, जिसमें कुछ भिन्न आनुवंशिक लक्षण पार्ए जार्ते हैं, प्रजार्ति नहीं कहार् जार् सकतार्, क्योंकि यह अत्यधिक छोटार् समूह है। परन्तु यदि इस परिवार्र क विस्तार्र हो जार्ए, और यह किसी भौगोलिक क्षेत्र में फेंल जार्ए तो इसे प्रजार्ति कहार् जार् सकतार् है। कुछ लेखकों क विचार्र है कि प्रजार्ति की जैविकीय व्यार्ख्यार् यथेष्ठ नहीं है। प्रजार्ति को वंशार्नुगततार् पर आधरित करनार् गलत है, क्योंकि प्रजार्तियार्ं अधिकतयार् वर्णसंकर रही हैं। अतएव इस शब्द क प्रयोग जननिक अर्थ में कियार् जार्नार् चार्हिए। पैनीमार्न (Penniman) के अनुसार्र, प्रजार्ति एक जननिक वर्ग है, जिसमें अनेक अनिश्चित एवं पार्रस्परिक संबंधित जननिक विशेषतार्एं होती है, जिनके आधार्र पर इसे दूसरे वर्गो से पृथक कियार् जार् सकतार् है। हक्सले भी प्रजार्ति के जैविकीय अर्थ से सहमत नहीं है। वह ‘प्रजार्ति’ शब्द के स्थार्न पर ‘नृवंशीय समूह’ (ethiicgroup) क प्रयोग करनार् चार्हतार् थार्। लार्पियर, हडसन एवं गेटिस ने भी ‘प्रजार्ति’ शब्द के स्थार्न पर ‘नृवंशीय समूह’ शब्द क प्रयोग कियार् है।

हाटन एवं हंट (Horton and Hunt) के अनुसार्र, प्रजार्ति को केवल जैविकतयार् भिन्न समूह के रूप में परिभार्षित करनार् उचित नहीं है। उनके अनुसार्र यह सार्मार्जिक रूप से महत्वपूर्ण संकल्पनार् भी है। अतएव वे ‘प्रजार्ति’ शब्द की परिभार्षार् इस प्रकार करते हैं कि यह दूसरे समूहों से आनुवंशिक शार्रीरिक विशेषतार्ओं में कुछ भिन्न व्यक्तियों क समूह है, परन्तु प्रजार्ति लोकप्रिय सार्मार्जिक परिभार्षार् द्वार्रार् भी तत्वत: निर्धार्रित होती है। इस प्रकार कोई व्यक्ति नीग्रो है अथवार् नहीं, यह इस तथ्य पर निर्भर करतार् है कि क्यार् लोग उसे ऐसार् समझते हैं न कि उसके बार्लों की आकृति, सिर के आकार अथवार् त्वचार् के अधिक कालेपन पर। क्यार् कोई व्यक्ति नीग्रो है अथवार् नहीं, यह इस बार्त से निर्धरित होतार् कि क्यार् उसकी नीग्रो आनुवंशिकतार् है। प्रजार्ति व्यक्तियों क वृहत् समूह है जिसमें वंशार्नुगत हस्तार्ंतरण के कारण विशिष्ट शार्रीरिक समार्नतार् पार्ई जार्ती है।

प्रजार्ति के निर्धार्रक तत्व

प्रजार्ति के निर्धरण में शार्रीरिक लक्षणों पर ध्यार्न दियार् जार्तार् है, परन्तु बहुधार् यह निश्चित करनार् कठिन होतार् है कि लक्षणों की विभिन्नतार्एं आनुवंशिकतार् के कारण हैं, पर्यार्वरणीय परिवर्तनों के कारण नहीं। महत्वपूर्ण शार्रीरिक लक्षण जिन पर ध्यार्न दियार् जार्तार् है,

  1. सिर, मुख एवं शरीर पर केशों क प्रकार, रंग एवं विभार्जन। केशों के प्रकारों को 1. कोमल सीधे केश जैसे मंगोल एवं चीनी लोगों के, कोमल घुंघरार्ले केश, जैसे भार्रत पश्चिमी यूरोप, आस्टेंलियार् एवं उत्तरी-पूर्वी अनीक के निवार्सियों के, तथार्
  2. घने घुंघरार्ले केश जैसे नीग्रो लोगों के, में श्रेणीबद्ध कियार् गयार् है।
  3. 2. शरीर, कद, वक्ष एवं कंधें क व्यार्स।
  4. सिर की बनार्वट, विशेषतयार् कपार्ल एवं मुख की लम्बार्ई तथार् चौड़ार्ई, नार्क की लम्बार्ई एवं चौड़ार्ई। सिरों के तीन भेद किए गए हैं 1. दीर्घ कपार्ल (dalichocepalic). 2. मध्य कपार्ल (mesocephalic) एवं 3. पृथु कपार्ल (brachy-cephalic)।
  5. मुखार्कृति की विशेषतार्एं, यथार् नार्सिक की बनार्वट, ओष्ठ की बनार्वट, पलकों की बनार्वट, कपोल की हड्डियार्ं, ठोड़ी, कान एवं जबड़ों की बनार्वट। नार्सिकाओं के तीन भेद किए गए हैं 1. पतली यार् लम्बी नार्सिक (leptorhine), 2. मध्य यार् चपटी नार्सिक (mesorrhine) एवं 3. चौड़ी नार्सिक (platyrrhine)। 5. त्वचार् एवं आंखों क रंग। त्वचार् के रंग के तीन भेद किए गए हैं 1. गोरार् रंग (leucoderm), 2. पीलार् रंग (xanthoderm) एवं 3. कालार् रंग (melanoderm)।
  6. भुजार्ओं एवं टार्ंगों की लम्बार्ई।
  7. रक्त-प्रकार। रक्त चार्र प्रकार क होतार् है, O, A , B एवं AB A O प्रकार के रक्त को A, B एवं AB से मिलार्यार् जार् सकतार् है, परन्तु अन्य तीनों को एक-दूसरे के सार्थ सार्धरणतयार् संयुक्त नहीं कियार् जार् सकतार्।

प्रजार्तियों क वर्गीकरण

प्रजार्ति के आधार्र पर कुछ शार्रीरिक विशेषतार्ओं के अनुसार्र लोगों को वर्गीकृत कियार् गयार् है। सार्मार्जिक समूहों के सदस्य त्वचार् के रंग, सिर की बनार्वट एवं अन्य प्रेक्षणीय अन्तरों के विषय में भिन्न होते हैं। मार्नवशार्स्त्रियों ने अनेक प्रकार के वर्गीकरण प्रस्तुत किए हैं जो एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। लिनीयस (Linnaeous) एवं क्यूवीर (Cuvier) ने मार्नव-समूह को छ: प्रजार्तियों में बार्ंटार् थार्। हीकेल (Heakel) ने चौंतीस प्रजार्तियों को गिनार्यार् है। आर्थर कीथ (Arthur Keith) ने चार्र वर्गो क वर्णन कियार् है। आधुनिक काल में जी. इलियट स्मिथ ने छ: प्रजार्तियों में मार्नव जार्ति को विभक्त कियार् है। सरगी (Sergi) ने मार्नव जार्ति को यूर-अफ्रीकन (Eurafrican) एवं यूरेशियन (Eurasian) में विभक्त कियार् है। कुछ मार्नवशार्स्त्री हक्सले के वर्गीकरण को अपनार्ते हैं जिसने पार्ंच प्रजार्तियों, अर्थार्त् नीग्रार्यड (Negroid), आस्टेंलार्यड (Australoid), मंगोलार्यड (Mongoloid), जैन्थोवयड (Xanthochroid) एवं मेलोनोवयड (Melanochroid) क उल्लेख कियार् है। कुछ लेखकों ने चार्र प्रजार्तियों, यथार् काकेशियन (Causcasian), मंगोल (Mangol), नीग्रो (Negro) तथार् आस्टेंलियन (Australian) क उल्लेख कियार् है, एवं काकेशियन को नाडिक (Nordic) तथार् आस्टेंलियन (Australian) क उल्लेख कियार् है, एवं काकेशियन को नाडिक (Nordic), अल्पार्इन (Alpine) एवं भूमध्यसार्गरीय (Medierranean) में उपविभार्जित कियार् है।

वंशार्वलिक वर्गीकरण (Genealogical classification) इस प्रकार मार्नवशार्स्त्रियों में इस विषय पर कोई सहमार्ति नहीं है कि प्रजार्तियों को किस प्रकार वर्गीकृत कियार् जार्ए। प्रजार्ति की उचित अवधार्रणार् एवं इसके उचित आधार्रों के अभार्व के कारण प्रजार्तियों के उतने ही वर्गीकरण हैं, जितने लेखक। डैनीकर (Denikar) ‘प्रजार्ति’ शब्द की वर्तमार्न जनसंख्यार् में वार्स्तविक रूप से मिलने वार्ले लक्षणों के समूह के अर्थ में व्यार्ख्यार् करतार् है। दूसरी और, रिपले (Ripley) ने आदर्श प्रकारों जो किसी समय विशुद्ध रूप में वर्तमार्न समझे जार्ते हैं को खोजन क प्रयत्न कियार् है। अनेक लेखक विभिन्न प्रजार्तियों की एक-दूसरे के सार्थ समार्नतार्एं खोजने तथार् उस आधार्र पर आनुवंशिक वर्गीकरण के प्रयार्स को निरार्शार्पूर्ण समझते हैं। इस प्रकार फिशर (Fischer), मेटीगक (Matiegka) एवं मार्रटन (MUurtan) ने वंशार्वलिक वर्गीकरण के प्रयत्न क परित्यार्ग कर दियार्। श्री हैडन (Haddon) ने स्पष्ट उल्लिखित कियार् है कि उसक वर्गीकरण वह वर्गीकरण नहीं हैं, जिस अर्थ में प्रार्णिशार्स्त्री एवं वनस्पतिशार्स्त्री इस शब्द की व्यार्ख्यार् करते हैं, क्योंकि इस वर्गीकरण में भौगोलिक बार्तों को सम्मिलित कियार् गयार् है। प्रजार्ति-प्रकार मुख्यत: हमार्रे मस्तिष्क में वर्तमार्न होती है। वह अन्य स्थार्न पर लिखतार् है कि मार्नवतार् क प्रजार्तियों में स्थिर वर्गीकरण क कार्य असम्भव है।

कोई विशुद्ध प्रजार्ति नहीं है (NO pure race) भौतिक मार्नवशार्स्त्रियों की कठिनार्ई यह है कि व्यक्तियों में उस प्रजार्ति, जिससे वे सम्बिन्ध्त हैं, के सभी लक्षण वर्तमार्न नहीं होते। प्रजार्ति की अवधार्रणार् पूर्णतयार् स्पष्ट एवं निश्चित नहीं होते। प्रजार्ति की अवधार्रणार् पूर्णतयार् स्पष्ट एवं निश्चित नहीं है तथार् न ही यह हो सकती है। मनुष्य सदैव प्रवार्स करतार् आयार् है, जनजार्तियों एवं रार्ष्टींयतार्ओं ने इस भूमंडल पर प्रयार्ण एवं प्रतियार्न कियार् है, लोगों ने अपरिचितों के सार्थ यौन सम्बन्ध रखे हैं, जिसने संकरण सावभौमिक बन गयार् है। प्रजार्तीय लक्षण मार्नव जार्ति के विभिन्न समूहों में व्यार्पक रूप से मिश्रित है। इस विषय पर संदेह हो सकतार् है कि क्यार् इतिहार्स में कभी कोई विशुद्ध प्रजार्ति रही है। डन एवं डार्बझैंस्की (Dunn and Dobzhansky) ने लिखार् है, सम्पूर्ण लिखित इतिहार्स में प्रजार्ति-मिश्रण वर्तमार्न रहार् है। मार्नव-अवशेषों के अध्ययन से प्रार्प्त अकाट्य सार्क्ष्य दर्शार्तार् है कि प्रार्गैतिहार्सिक काल में भी मार्नवतार् के उद्भव के समय विभिन्न नस्लों क मिश्रण होतार् थार्। मार्नव जार्ति सदैव संकर रही है और अब भी है। प्रोफेंसर फ्लीर (Fleure) के अनुसार्र, ब्रिटेन में अधिकांश लोग बीच के लोग हैं, न कि पूर्णतयार् एक अथवार् दूसरी प्रकार के। प्रजार्ति-संकरतार् के इस तथ्य के कारण वर्गीकरण की किसी योजनार् पर सहमत होनार् कठिन है।

एक महत्वपूर्ण बार्त यह है कि प्रजार्तीय वर्गीकरण सार्मार्जिक संरचनार् अथवार् संस्कृति प्रतिमार्नों के सार्थ सहसम्बन्ध नहीं हैं। कपोल की ऊची हड्डियों क लार्ल भूरी त्वचार् से कुछ सम्बन्ध हो सकतार् है, काले-भूरे बार्लों क भूरी-काली त्वचार् से सम्बन्ध है। परन्तु इनमें से किसी को बुद्धि अथवार् जार्ति संरचनार्, अथवार् गार्यन योग्यतार् अथवार् ईश्वर में आस्थार् अथवार् बहुपत्नी प्रथार् अथवार् अन्य किसी सार्मार्जिक विशेषतार् से सम्बद्ध नहीं कियार् जार् सकतार्। आनुवंशिक शार्रीरिक विशेषतार्यें जिनके आधार्र पर प्रजार्तियों क वर्गीकरण कियार् जार्तार् है, वे सार्मार्जिक व्यवहार्र के सार्थ सम्बिन्ध्त नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ वर्गीकरण सहार्यक होने की अपेक्षार् हार्निकारक अधिक सिद्ध हुए हैं, क्योंकि उन्होंने व्यक्तियों को यह मार्न लेते में प्रोत्सार्हित कियार् है कि कुछ प्रजार्तियार्ं अन्य से मार्नसिकतयार् श्रेष्ठ हैं तथार् शार्रीरिक लक्षणों एवं बुद्धि में परस्पर सम्बद्ध हैं। परन्तु जैसार् हम बार्द मे वर्णन करेंगे, ऐसी मार्न्यतार् बहुध ठीक नहीं होती। परन्तु इसक अर्थ यह भी नहीं है कि मार्नव जार्ति को शार्रीरिक लक्षणों के आधार्र पर वर्गीकृत करने के कोई प्रयत्न नहीं किए जार्ने चार्हिए।

तीन मुख्य प्रजार्तियार्ं (Three main races) प्रजार्तियों क नीग्रो, मंगोलार्यड एवं काकेशियन में वर्गीकरण सार्मार्न्यत: स्वीकृत कियार् गयार् है। यद्यपि उनको पृथक करने वार्ली स्पष्ट रेखार्एं नहीं हैं, तथार्पि प्रत्येक प्रजार्ति के कुछ विशिष्ट लक्षण हैं जो इसके सभी सदस्यों में पार्ए जार्ते हैं। नीग्रो लोगों की त्वचार् काली, जबड़े आगे की और, चौड़ी नार्सिक तथार् घुंघरार्ले केश होते हैं। इसमें मलेनेशियन लोग भी सम्मिलित हैं जिनकी त्वचार् कुछ हल्की एंव नार्सिक नीग्रो समूह से कुछ भिन्न होती है। मंगोल प्रजार्ति की त्वचार् क रंग पीलार्-सार् अथवार् तार्म्र-गेहुंआ-सार् होतार् है। इनके होंठ सार्धरणतयार् मोटे और ठोढ़ी गोल होती हैं। आंखें अधखुली होती हैं तथार् उनक रंग बार्दार्मी यार् गहरार् बार्दार्मी होतार् है। इस समूह में अमेरिकन इंडियन्स सम्मिलित हैं। कुछ मार्नवशार्स्त्री श्वेत जार्ति को पृथक प्रजार्ति मार्नते हैं, जबकि अन्य इस मंगोल प्रजार्ति की उपशार्खार् ही मार्नते हैं। काकेशियन प्रजार्ति में पूर्वोक्त दोनों प्रजार्तियों के लक्षण धुले-मिले हैं। इन तीन प्रजार्तीय भार्गों को उपप्रजार्तियों में विभक्त कियार् गयार् है, यद्यपि इन उपप्रजार्तियों प्रजार्ति की उपप्रजार्तियार्ं कहार् जार्तार् है।

भार्रत में प्रजार्तियार्ं (Race in India) सर हर्बर्ट रिजले (Sir Herbert Risley) के अनुसार्र भार्रत में सार्त प्रजार्तियों के प्रकार मिलते हैं

  1. द्रविड़ीय-पूर्व प्रकार (Pre-Dravidian type) जो पहार्ड़ियों एवं वनों में आदिम जनजार्तियों में अब भी वर्तमार्न है, यथार् भील।
  2. द्रविड़ियन प्रकार (Dravidian type) जो गंगार् घार्टी तक दक्षिण प्रार्ंयद्वीप में आवार्सी हैं।
  3. इंडो-आर्यन प्रकार (Indo-Aryan type) जो काश्मीर, पंजार्ब एवं रार्जपूतार्नार् में है।
  4. आर्य-द्रविड़ियन प्रकार (Aryo-Dravidian type) जो गंगार् घार्टी में पार्ई जार्ती है।
  5. सार्इथो-द्रविड़ियन प्रकार (Cytho-Dravidian type) जो सिंध कू पूर्व में स्थित है।
  6. मंगोलार्यड प्रकार (Mongoloid type) जो आसार्म एवं पूर्वी हिमार्लय की तरार्इयों में पार्ई जार्ती है।
  7. मंगोल-द्रविड़ियन प्रकार (Mongolo-Dravidian type)।

हटन (Hutton) के मतार्नुसार्र, नेग्रिटो (Negrito) प्रजार्तियार्ं सम्भवत: भार्रत की मौलिक वार्सी थीं। तत्पश्चार्त् प्रोटो-आस्टेंलार्यड प्रजार्तियों क आगमन हुआ, जिनके पूर्वज फिलिस्तीन में थे। उसके उपरार्ंत भूमध्यसार्गरीय प्रजार्ति आई। 4,000 ईसार्पूर्व इंडो-आर्यन प्रजार्ति भार्रत में आई।

प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह

यहार्ं पर हम प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह अथवार् प्रजार्ति-भेदभार्व के प्रश्न पर विचार्र करेंगे, जिसने मार्नव जार्ति को विरोधी गुटों में विभक्त कर दियार् है। एक प्रजार्ति द्वार्रार् दूसरी प्रजार्ति पर काफी अत्यार्चार्र कियार् जार्तार् है, यथार् प्रजार्ति दार्सतार् में मनुष्य की मनुष्य के प्रति दार्नवतार् प्रजार्ति पर अधिकांशतयार् आधरित होती है। अधिकारों, अवसरों एवं प्रस्थिति के बार्रे में किसी प्रजार्ति के विरुद्ध गंभीर भेदभार्व कियार् जार्तार् है।

पूर्वार्ग्रह एक मनोवृत्ति है जो व्यक्ति को किसी समूह अथवार् इसके व्यक्तिगत सदस्यों के प्रति अनुकूल अथवार् प्रतिकूल ढंग से विचार्रने, विरचने, अनुभव करने एवं कार्य करने के लिए प्रवृत करती हैं।

पूर्वार्ग्रह क अर्थ है पूर्व-निर्णय करनार्। हम अपनी भार्वनार्ओं के प्रभार्व में बिनार् विवेकयुक्त विचार्र के शीघ्र ही पूर्वनिर्णय कर लेते हैं। तीव्र भार्वनार् विचार्र को कुंठित कर देती है एवं हमें अंध्विश्वार्स की और प्रेरित करती है। एक बार्र पूर्वार्ग्रह की स्थार्पनार् हो जार्ने पर वार्स्तविक तथ्य भी इसे दूर नहीं कर पार्ते। पूर्वार्ग्रह किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति अथवार् समूह के प्रति तीव्र रूप से अनुकूल अथवार् प्रतिकूल बनार् देतार् है। पूर्वार्ग्रह भेदभार्व से भिन्न है। भेदभार्व व्यक्तियों के बीच विभेदक व्यवहार्र है। यह सार्धरण रूप से पूर्वार्ग्रह की स्पष्ट अथवार् व्यार्वहार्रिक अभिव्यक्ति है, परन्तु यह पूर्वार्ग्रह के बिनार् भी प्रकट हो सकतार् है। प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह इस मार्न्यतार् पर आधरित है कि नृवंशीय अन्तर रक्त के अंतर के कारण है तथार् ऐसे अन्तर शार्रीरिक लक्षणों, यथार् आंख, त्वचार् एवं केश के रंग की भार्ंति जैविकतयार् हस्तार्ंतरित होते हैं परन्तु जैसार् ऊपर वर्णित कियार् गयार् है कि यह विचार्र कि कुछ प्रजार्तियार्ं मार्नसिक रूप से अन्य प्रजार्तियों से कुछ विशिष्ट जैविक लक्षणों के कारण श्रेष्ठ हैं, अभी तक प्रमार्णित नहीं हुआ है। यदि सभी प्रजार्तियार्ं जैविक रूप में समार्न उत्पन्न हों तब भी प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह समार्प्त नहीं होगार्। प्रजार्तियों में तब भी संघर्ष होंगे, ठीक उसी प्रकार जैसे रार्ष्टार्ंें के बीच युद्ध होते हैं।

प्रजार्तीय पूर्वार्ग्रह जन्मजार्त नहीं है

अतएव प्रथम ध्यार्न देने योग्य तथ्य यह है कि प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह जन्मजार्त नहीं होतार्। बार्लक किसी भी प्रकार के पूर्वार्ग्रह को लेकर जन्म नहीं लेतार्। हम बहुध बच्चों को दूसरी प्रजार्तियों के बच्चों के सार्थ बिनार् किसी पूर्वार्ग्रह अथवार् भेदभार्व के खेलते देखते हैं। पूर्वार्ग्रह सार्मार्जिक शिक्षार् (indoctrination) क परिणार्म है जो विश्वार्सों एवं मनोवृत्तियों को इस प्रकार उत्पन्न कर देती है कि वे अभ्यस्ततार् की प्रक्रियार् द्वार्रार् सुदृढ़ रूप धरण कर लेते हैं। बच्चार् पूर्वार्ग्रह को धीरे-धीरे प्रार्प्त करतार् है। यह समार्जीकरण की प्रक्रियार् की उपज है जहार्ं ‘मेरार्’ ‘हमार्रार्’ बन जार्तार् है तथार् बार्लक अपने समूह के सदस्यों को दूसरे व्यक्तियों से प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठ समझने लगतार् है। वह दूसरे व्यक्तियों को श्रेष्ठतार्-हीनतार् के शब्दों में विभेिकृत एवं मूल्यार्ंकित करतार् है एवं उनके प्रति जो उसके पूर्वार्ग्रहों में भार्गी हैं, अनपार्ुरार्ग एवं निष्ठार् रखने लगतार् है। अतएव समूह-पूर्वार्ग्रह जन्मजार्त नहीं है, अपितु शिक्षार्जनित है। कभी-कभी पूर्वार्ग्रह के बीच बार्लक के प्रार्रम्भिक जीवन में ही बो दिए जार्ते हैं जिससे वह जन्मजार्त दिखलार्ई देतार् है, परन्तु वस्तुत: यह अर्जित होतार् है। पूर्वार्ग्रह के कारणों क वर्णन है

  1. आर्थिक लार्भ (Economic advantages) प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह क एक महत्वपूर्ण कारण आर्थिक लार्भ है जो कुछ परिस्थितियों में प्रभुत्वशार्ली समूह को प्रार्प्त होतार् है। प्रार्चीन यूनार्न एवं रोम में कुलीन वर्ग ने दार्सों के हितों को बलिदार्न कर समृद्ध प्रार्प्त की, जबकि संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में दक्षिणी रार्ज्यों के नीग्रो ने विस्तार्रशील अर्थ-व्यवस्थार् को सस्तार् श्रम प्रदार्न कियार्। इन व्यक्तियों को हीन समझार् जार्तार् थार्, अतएव इन्हें निम्न पद दिए जार्ते थे जिनसे उ।ति की कोई आशार् नहीं थी। ये हीन जनजार्एं प्रतिष्ठार् की निचली सीढ़ियों पर रह जार्ती हैं और समार्न कार्य के लिए समार्न वेतन, समार्न शिक्षार्, सावजनिक सुविधओं के समार्न उपयोग से वंचित होकर स्वतंत्र समूह बन गई। इन अधिकारों एवं सुविधओं के प्रतिरोधन क समर्थन इस आधार्र पर कियार् जार्तार् थार् कि वे हीन व्यक्ति है, अतएव कम पार्त्र हैं। उनके लिए कुछेक व्यवसार्य, जहार्ं तक कि योग्य एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों के लिए भी, प्रतिबंध्ति थे। पृथकपरण एवं विभेदीकरण से नीग्रो जार्ति में निहित व्यार्वसार्यिक हित क उत्थार्न हुआ जो गोरे नियोक्तार्ओं के आर्थिक हितों के अनुरूप भी थार्।
  2. रार्जनीतिक लार्भ (Pdzlitical advantages) कभी-कभी प्रभुत्वशार्ली समूह अपनी रार्जनीति सर्वोच्चतार् को सुदृढ़ करने अथवार् स्थिर रखने के लिए भी प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रहों को प्रोत्सार्हित करतार् है। दक्षिणी अफ्रीक क में भार्रतीयों, तथार्कथित काले लोगों को मतदार्न एवं सावजनिक पद के अधिकार से वंचित रखार् गयार् है, तार्कि गोरे लोगों की रार्जनीतिक शक्ति स्थिर रहे। संयुक्त रार्ज्य के कुछ रार्ज्यों में भी ऐसार् ही व्यवहार्र नीग्रो लोगों के सार्थ कियार् जार्तार् है। रार्जनीतिक नेतार् उसी सीमार् तक शक्ति प्रार्प्त करते हैं जहार्ं तक वे मतदार्तार्ओं के आदर्श नियमों क प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे व्यक्तियों जो इन आदर्श नियमों क समर्थन नहीं करते, के निर्वार्चित होने की संभार्वनार् नहीं होती। इस प्रकार जब इन नेतार्ओं को शक्ति प्रार्प्त हो जार्ती है तो वे स्थिति को ज्यों क त्यों रखने हेतु और अधिक प्रभार्व प्रयुक्त करते हैं। दक्षिणी अमेरिक के पृथकवार्दी नेतार्ओं के हितों की संतुष्टि नीग्रो के प्रति प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रहों को स्थिर रखने से होती है।
  3. संजार्ति-केन्द्रीयतार् (Ethnocentrism) संजार्ति-केन्द्रीयतार् वह भार्वनार् है जिसके द्वार्रार् देशीय लोग विदेशियों से घृणार् करते हैं एवं स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं। जब यह भार्वनार् चरम सीमार् पर पहुंच जार्ती है तो उग्र रार्ष्टींयतार् को जन्म देती है जिसमें व्यक्ति अपने देश के प्रति तर्कहीन एवं उच्छृंलन अहं तथार् विदेशी रार्ष्टार्ंे के प्रति घृणार् दिखलार्ते हैं। संजार्ति-केन्द्रीयतार् क एक प्रसिद्ध उदार्हरण चीन के सम्रार्ट् चार्इन लुंग (Chien Lung) के द्वार्रार् इंग्लैड के रार्जार् जाज-तृतीय को 1793 में भेजे गए संदेश में मिलतार् है। संदेश में लिखार् थार् तुम, अरे रार्जार्, अनेक समुद्रों के पार्र रहते हो, तथार्पि तुमने हमार्री सभ्यतार् के लार्भों से भार्ग लेने की विनम्र आकांक्षार् से संप्रेरित होकर सार्दर एक प्रतिनिधि मंडल अपने अभ्यार्वेदन सहित भेजार् है।, यदि तुम्हार्रार् विचार्र है कि हमार्रे अलौकिक रार्जकुल के प्रति तुम्हार्री श्रण ने हमार्री सभ्यतार् सीखने की आकांक्षार् उत्पन्न की है तो मैं यह बतलार् देनार् चार्हतार् हूं कि हमार्रे संस्कार एवं नियमार्वलियार्ं तुम्हार्रे से पूर्णतयार् इतने विभिन्न हैं कि यदि तुम्हार्रार् रार्जदूत हमार्री सभ्यतार् की आरम्भिक बार्तें भी प्रार्प्त कर सके, तो तुम हमार्रे रीति-रिवार्जों एवं जीवन-वििध्यों को अपनी विदेशी भूमि पर संभवत: प्रतिरोपित नहीं कर सकते। हमार्रे रार्जकुल के गौरक्रमय गुण इस आकाश के नीचे प्रत्येक देश में प्रवेश कर चुके हैं तथार् सभी रार्ष्टार्ंें के रार्जार्ओं ने समुद्री एवं भूमि माग से अपनी बहुमूल्य श्रणंजलियार्ं भेजी हैं। तुम्हार्रार् रार्जदूत स्वयं देख सकतार् है कि हमार्रे पार्स सभी वस्तुएं हैं। मैं विदेशी अथवार् अजनबी वस्तुओं को कोई महत्व नहीं देतार् एवं तुम्हार्रे देश की निर्मित वस्तुओं क हमार्रे लिए कोई उपयोग नहीं है।
  4. निरार्शार् की क्षतिपूर्ति (Compensation for frustration)- कभी-कभी अल्पसंख्यक समूह को सार्मार्जिक एवं आर्थिक अशार्ंति के लिए दोषी समझार् जार्तार् है एवं उसे प्रभुत्वशार्ली समूह द्वार्रार् अजमेध (scapegoat) बनार्यार् जार्तार् है जिससे इस समूह को अपनी सार्मार्जिक अथवार् व्यक्तिगत निरार्शार्, जिसक कारण संभवत: शार्सक समूह की अकुशलतार् अथवार् बेईमार्नी हो सकती है, कि क्षतिपूर्ति मिल जार्ती है। जर्मनी में नार्जियों ने प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मन की परार्जय के लिए यहूदियों को दोषित कियार्। अमेरिक में नीग्रो, रोमन-केथोलिकों एवं सार्मार्न्यतयार् विदेशियों को सार्मार्जिक व्यवस्थार् में होने वार्ले दोषी घोषित कियार् जार्तार् है। इन व्यक्तियों को सार्मार्जिक विघटन क कारण अथवार् देश की सार्मार्जिक एवं आर्थिक स्थिरतार् के लिए भय समझार् जार्तार् है। यहूदियों को विशेषतयार् ऐसी दु:खद प्रसिण् िप्रदार्न की गई है। इसके जो कुछ भी कारण रहे हों, यह कथन विवेकयुक्त होगार् कि उन्हें जबकि देश में उनकी अल्पसंख्यार् है, सार्मार्जिक विघटन क कारण नहीं समझार् जार् सकतार्। वस्तुत: अपनी असफलतार्ओं के लिए स्वयं की अकुशलतार् को दोषी न ठहरार् कर किसी अन्य समूह जिसे हीन, तुच्छ एवं निर्लज्ज समझार् जार्तार् है, के व्यक्तियों की सार्जिशों एवं चार्लों को दोष देनार् मार्नवीय स्वभार्व है।
  5.  उचित शिक्षार् क अभार्व (Lack of propere ducation)- यह प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह क सबसे महत्वपूर्ण कारण है। जैसार् ऊपर वर्णित कियार् गयार् है, प्रार्जार्ति-पूर्वार्ग्रह जन्मजार्त नहीं होतार्, अपितु शिक्षार्जनित होतार् है। शिक्षार् व्यक्ति में पूर्वार्ग्रह-मनोवृत्तियों को जन्म दे देती है। जैसे व्यक्ति सार्मार्जिक विरार्सत के अन्य तत्वों को प्रार्प्त करतार् है, वह पूर्वार्ग्रह को भी प्रार्प्त कर लेतार् है। सोवियत रूस में नवयुवक को प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से जो सार्म्यवार्द मे विश्वार्स नहीं करतार्, घृणार् करनार् सिखार्यार् जार्तार् है। इस प्रकार बार्ल्यार्वस्थार् से ही कुछ समूहों के बार्रे में प्रतिकूल रूढ़िबद्ध प्ररूपों क निर्मार्ण हो जार्तार् है। व्यक्तियों को उनके वैयार्क्तिक गुणों के आधार्र पर संबोधित नहीं कियार् जार्तार्, अपितु उस नार्म से संबोधित कियार् जार्तार् है, जिससे आधार्र पर संबोधित नहीं कियार् जार्तार्, अपितु उस नार्म से संबोध्ति कियार् जार्तार् है, जिससे उनके समूह को नििकृत कियार् जार्तार् है। रोस (Rose) क कथन है कि रूढ़िबद्ध, प्ररूप अल्पसंख्यक समूह के कूछ सदस्यों में वर्तमार्न कुछेक शार्रीरिक लक्षणों अथवार् सार्ंस्कृतिक विशेषतार्ओं की अतिशयोक्तियार्ं होते हैं जिन्हें समूह के सभी सदस्यों पर आरोपित कर दियार् जार्तार् है। ये रूढ़िबद्ध प्ररूप अन्य व्यक्तियों के बार्रे में हमार्रे ज्ञार्न को एक अकेले फामूलार् में संक्षेपित करने की भूमिक की पूर्ति करते हैं।, चीनियों को ‘लार्ंडींमैन’ (Laundrymen), स्काट-निवार्सियों को दृढ़ मुष्टिबद्ध कहार् जार्तार् है। इसक परिणार्म होतार् है अन्य समूह के प्रति तुच्छ एवं आधार्रहीन पूर्वार्ग्रह।

यह भी ध्यार्न रहे कि किसी समूह के प्रति एक बार्र पूर्वार्ग्रह सुस्थार्पित हो जार्ने पर उस समूह से संबंधित भार्वनार्एं आदर्शार्त्मक महत्व प्रार्प्त कर लेती हैं। ये भार्वनार्एं सार्मार्जिक आदर्श नियमों क भार्ग बन जार्ती हैं। समूह के सदस्यों से अपेक्षार् की जार्ती है कि प्रत्येक इन भार्वनार्ओं में विश्वार्स करेगार्। यदि कोई सदस्य इन भार्वनार्ओं क पार्लन नहीं करतार् तो उसके विरुद्ध सकारार्त्मक एवं नकरार्त्मक शार्स्तियों क समूह द्वार्रार् प्रयोग कियार् जार्तार् है। यह भी देखार् गयार् है कि जो व्यक्ति समूह के आदर्श नियमों को पूर्वार्ग्रह-सहित प्रबल समर्थन प्रदार्न करते हैं, नेतृत्व क पद प्रार्प्त करते हैं।

प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह को किस प्रकार समार्प्त कियार् जार्ए? (How to eradicate race prejudice?) इस प्रकार पूर्वार्ग्रह, वैमनस्य एवं समूहगत भेदभार्व स्वयं ही उत्पन्न नहीं हो जार्ते, अपितु इनके द्वार्रार् उन समूहों, जो इनसे बंधे रहते हैं, को कुछ लार्भ प्रार्प्त होते हैं अथवार् कम से कम उन्हें लार्भकारी समझार् जार्तार् है। प्रजार्ति ने बुरी है, न अच्छी। प्रजार्तिवार्द निश्चित रूप से हार्निकारक एवं बपुरार् है। यह सहयोगी सार्मार्जिक क्रियार् के माग में शक्तिशार्ली बार्ध है। यह भेदभार्व एवं अन्यार्य को जन्म देतार् है। कभी-कभी यह विश्व-शार्ंति के लिए घार्तक बन जार्तार् है, जब इसे निरकुश शक्ति द्वार्रार् आरोपित कियार् जार्तार् है, जैसार् नार्जी संजार्ति-उन्मार्दियों ने कियार्। प्रजार्ति-पूर्वार्ग्रह को समार्प्त करने हेतु केवल प्रजार्तीय श्रेष्ठतार् की आधार्रहीन मार्न्यतार् की दुर्बलतार् को सिद्ध करनार् ही पर्यार्प्त नहीं है, अपितु नवयुवकों को उचित दिशार् में प्रशिक्षित करनार् एवं निर्विवार्द तथ्य कि त्वचार् क रंग, वर्ग, धर्मिक विश्वार्स, भौगोलिक अथवार् रार्ष्टींय उद्गम, सार्मार्जिक अनुकूलनीयतार् के कोई परीक्षण नहीं हैं, को बतलार्नार् भी आवश्यक है। यदि पूर्वार्ग्रहित अमेरिकन गोरे नवयुवकों को यह ज्ञार्त हो जार्ए कि नीग्रो लोग, जिन्हें वे घृणार् करते हैं, दयार्लु, सुपोषित एवं बुद्धिमार्न हैं तो उनके पूर्वार्ग्रह दूर हो जार्एंगे। नार्गरिक क मूल्यार्ंकन उसकी त्वचार् के रंग से नहीं, अपितु सार्मार्जिक संरचनार् में उसके द्वार्रार् स्वयं को अनुकूलित करने की तत्परतार् तथार् देश के विकास में उसके योगदार्न के आधार्र पर होनार् चार्हिए। संचार्र-सार्धनों के विस्तार्र से भी जिससे सम्पर्को की संख्यार् में वृद्धि हुई है, प्रजार्तीय अवरोमार्कों की समार्प्ति में सहार्यतार् मिलेगी। प्रजार्ति के विषय क सही ज्ञार्न, संस्कृतियों क विकास किस प्रकार होतार् है एवं वे भिन्न क्यों हैं, क ज्ञार्न तथार् इस तथ्य कि प्रजार्तीय पूर्वार्ग्रह आर्थिक अथवार् रार्जनीतिक रूप में अन्तत: लार्भदार्यक नहीं होतार्, की स्वीकृति प्रजार्तीय पूर्वार्ग्रह को दूर करने में काफी सहार्यक होंगे। ‘प्रजार्तीय सम्बन्धों’ के विषय पर शिक्षण-संस्थार्ओं में व्यार्ख्यार्न भी दिए जार्ने चार्हिए।

इस सम्बन्ध में यह बतलार्नार् आवश्यक है कि हार्ल ही में समार्जविज्ञार्नवेनार्ओं ने प्रजार्तीय पूर्वार्ग्रहों पर सशक्त नियंत्रण पार्ने के सिद्धार्न्तों, इसकी वििध्यों एवं प्रणार्लियों में बार्रे के अनुसंधन को अपने विषय-क्षेत्र में सम्मिलित कर लियार् है। मार्नवशार्स्त्रियों, मनोवैज्ञार्निकों एवं समार्जशार्स्त्रियों ने इस दिशार् में पर्यार्प्त काम कियार् है। विशिष्ट संगठनों, यथार् यूनेस्को द्वार्रार् अन्तर्रार्ष्टींय तनार्वों की स्थितियों क अध्ययन कियार् जार् रहार् है, एवं सार्मार्जिक पूर्वार्ग्रह को मिटार्ने के सम्मिलित प्रयत्न किए जार् रहे हैं। यूनेस्को ने गणमार्न्य समार्जशार्स्त्रियों, मार्नवशस्त्रियों एवं मनोवैज्ञार्निकों क एक सम्मेलन भी बुलार्यार् जो सितम्बर, 1952 में हुआ। इस सम्मेलन ने प्रजार्ति की समस्यार् पर निम्नलिखित निष्कर्षो की घोषणार् की –

  1. मूलत: सम्पूर्ण मार्नव जार्तियों क समार्न उद्गम है तथार् सभी मनुष्य मेधवी मार्नव (homosapiens) हैं।
  2. मनुष्यों के शार्रीरिक लक्षणों में भिन्नतार् आनुवंशिकतार् एवं पर्यार्वरण दोनों के कारण होती हैं।
  3. प्रजार्तीय विशुद्धतार् की अवधार्रणार् केवल मार्त्र कल्पनार् है।
  4. मार्नवी प्रजार्तियों क वर्गीकरण कियार् जार् सकतार् है, परन्तु इन वर्गीकरणों क मार्नसिक अथवार् बौण्कि श्रेष्ठतार् अथवार् हीनतार् से कोई सम्बन्ध नहीं है।
  5. बुद्धि एवं संस्कृति के विकास की क्षमतार् प्रत्येक प्रजार्ति में समार्न रूप से पार्ई जार्ती है। बुद्धिमार्न व्यक्ति सभी प्रजार्तियों में पार्ए जार्ते हैं।
  6. प्रजार्तियों क सम्मिश्रण हार्निकारक है, यह विचार्रणार् गलत है।
  7. विभिन्न मार्नवीय समूहों के मध्य सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक भिन्नतार्ओं पर प्रजार्ति क कोई महत्वपूर्ण प्रभार्व नहीं है। प्रजार्तीय एवं सार्मार्जिक परिवर्तनों में कोई सह सम्बन्ध नहीं है।
  8. यह संभव है कि किसी रार्ष्ट्रं में प्रजार्तीय भिन्नतार् की मार्त्रार् अन्य किसी रार्ष्ट्रं की अपेक्षार् अधिक हो सकती है।

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