पूर्ति तथार् पूर्ति क नियम

पूर्ति शब्द क अर्थ किसी वस्तु की उस मार्त्रार् से लगार्यार् जार्तार् है, जिसे कोर्इ विक्रेतार् ‘एक निश्चित समय’ तथार् ‘एक निश्चित कीमत’ पर बार्जार्र में बेचने के लिए तैयार्र रहते हैं। उदार्हरण के लिए, यदि यह कहार् जार्ये कि बार्जार्र में गेहू की पूर्ति 1,000 क्विटंल की है, तो यह कथन उचित नहीं है, क्योकि इसमें गेहू की कीमत एवं समय क उल्लेख नहीं कियार् गयार् हैं किन्तु यदि इसी बार्त को इस प्रकार कहार् जार्ये कि आज बार्जार्र में 250 रू. प्रति क्विंटल की कीमत पर 1,000 क्विंटल गेहू की पूर्ति हैं तो यह कथन ठीक है। अत: स्पष्ट है कि पूर्ति के लिए निश्चित समय तथार् एक निश्चित मूल्य को बतार्नार् आवश्यक है। प्रो. बेन्हम के शब्दों में- ”पूर्ति क आशय वस्तु की उस मार्त्रार् से है जिसे प्रति इकार्इ समय में बेचने के लिए प्रस्ततु कियार् जार्तार् है। “

पूर्ति तार्लिक अथवार् पूर्ति अनुसूची 

बार्जार्र में एक निश्चित समय में विभिन्न कीमतों पर किसी वस्तु की विभिन्न मार्त्रार्एँ बेचने के लिए उपलब्ध करार्यी जार्ती है। जब विभिन्न कीमतों तथार् उन कीमतों पर बेचने के लिए उपलब्ध मार्त्रार्ओं को एक तार्लिक के रूप में व्यक्त कियार् जार्तार् है, तो उसे ‘पूर्ति की तार्लिका’ कहते है। पूर्ति तार्लिका, कीमत एवं बेची जार्ने वार्ली मार्त्रार् में कायात्मक संबध बतलार्ती है। मार्ग तार्लिक की तरह पूर्ति तार्लिक भी दो प्रकार की होती है। (1) व्यक्तिगत पूर्ति की तार्लिका। (2) बार्जार्र पूर्ति की तार्लिका।

(1) व्यक्तिगत पूर्ति की तार्लिका- 

जब किसी निश्चित समय पर किसी बार्जार्र में एक विक्रेतार् के द्वार्रार् किसी वस्तु की भिन्न-भिन्न कीमतों में बेचार् जार्तार् है, तो उसे हम व्यक्तिगत पूर्ति तार्लिक कह सकते है। इस प्रकार व्यक्तिगत पूर्ति तार्लिक किसी विक्रेतार् के अनमुार्नित कीमतों और उस कीमतों पर पूर्ति की जार्ने वार्ली मार्त्रार्ओं के आधार्र पर बनार्यी जार्ती है।

(2) बार्जार्र पूर्ति की तार्लिका- 

एक बार्जार्र में बहतु से विक्रेतार् होते हैं जो विभिन्न कीमतों पर वस्तु को बेचने के लिए तैयार्र रहते है यदि इन सब विक्रेतार्ओं की पूर्ति को जोड़ दियार् जार्ये तो एक बार्जार्र की पूर्ति तार्लिक बन जार्येगी।

पूर्ति वक्र यार् पूर्ति रेखार् 

जब पूर्ति तार्लिक को रेखार्चित्र द्वार्रार् व्यक्त कियार् जार्तार् है, तो उसे पूर्ति -चक्र कहते है। इस प्रकार पूर्ति वक्र किसी वस्तु की विभिन्न कीमतों पर उसकी विक्रय हेतु उपलब्ध मार्त्रार्ओं के बीच पार्ये जार्ने वार्ले ‘सम्बन्ध’ को स्पष्ट करतार् है। पूर्ति तार्लिक की तरह, पूर्ति वक्र भी दो प्रकार क होतार् है- (i) व्यक्तिगत पूर्ति वक्र तथार् (ii) बार्जार्र पूर्ति वक्र।

पूर्ति क नियम 

पूर्ति क नियम मार्ँग के नियम के विपरीत है। जैसे कि मार्ँग के नियम में कीमत बढऩे से मार्ँग घटती है और कीमत घटने पर मार्ँग बढ़ती है। यह मार्ँग और कीमत के बीच ऋणार्त्मक संबधं को व्यक्त करती है, जबकि पूर्ति के नियम में कीमत और पूर्ति क धनार्त्मक सबंधं होतार् है। जब कभी किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तब उस वस्तु की पूर्ति को बढाऱ्यार् जार्तार् है और कीमत में कमी होने पर उसकी पूर्ति को घटार् दियार् जार्तार् है। दूसरे शब्दों में अन्य बार्तें समार्न रहने पर किसी वस्तु की पूर्ति के बढ़ने की प्रवृित्त तब होती है जब उस वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है और पूर्ति में कमी तब होती है, जब वस्तु की कीमत में कमी आती है। इस प्रकार, कीमत आरै पूर्ति के बीच सीधार् संबधं है। इसे सूत्र के रूप में निम्न प्रकार से प्रस्ततु कियार् जार्तार् है-

S = f (P)
यहार्ँ, S = वस्तु की पूर्ति, P = वस्तु की कीमत, f = फलनार्त्मक सम्बन्ध।

वार्टसन के अनुसार्र-“पूर्ति क नियम बतार्तार् है कि अन्य बार्तों के समार्न रहने पर एक वस्तु की पूर्ति, इनकी कीमत बढऩे से बढ़ जार्ती है और कीमत के घटने से घट जार्ती है।” पूर्ति क नियम, मार्ँग के नियम की भार्ँति एक ‘गुणार्त्मक कथन’ है न कि ‘परिमार्णार्त्मक कथन’। अर्थार्त् यह नियम पूर्ति तथार् कीमत के बीच किसी प्रकार क गणितार्त्मक सबंधं स्थार्पित नहीं करतार्, बल्कि केवल पूर्ति की मार्त्रार् में होने वार्ले परिवर्तनों की दिशार् की ओर संकेत करतार् है; तार्लिक द्वार्रार् स्पष्टीकरण- पूर्ति के नियम को एक काल्पनिक तार्लिक की सहार्यतार् से स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है-

तार्लिक

प्रति इकार्इ कीमत पूर्ति की मार्त्रार् (इकाइयार्ँ
1 10
2 15
3 20
4 25
5 30


उपर्युक्त तार्लिक से स्पष्ट है कि ज्यों- ज्यों वस्तु की कीमत में वृद्धि होती हैं त्यो- त्यों विक्रेतार् के द्वार्रार् वस्तु की पूर्ति को बढाऱ्यार् जार्तार् है। जब वस्तु की कीमत सबसे कम 1 रू. प्रति इकार्इ है तब वस्तु की पूर्ति सबसे कम 10 इकाइयार्ँ है लेकिन जैसे ही कीमत बढक़र 5 रू. प्रति इकार्इ हो जार्ती है, त्यों ही वस्तु की पूर्ति बढ़कर 30 इकाइयार्ँ हो जार्ती है।

पूर्ति क नियम

रेखार्चित्र द्वार्रार् स्पष्टीकरण-प्रस्तुत रेखार्चित्र में OX आधार्र रेखार् पर वस्तु की मार्त्रार् तथार् OY लम्ब रेखार् पर वस्तु की कीमत को दिखार्यार् गयार् है। पूर्ति रेखार् है जो यह बतार्ती है कि कीमत बढऩे के सार्थ-सार्थ पूर्ति रेखार् । बिन्दु से B,C,E,D आदि बिन्दुओं की आरे बढत़ी है, अत: पूर्ति वक्र कीमत तथार् पूर्ति के बीच प्रत्यक्ष संबंध को प्रदर्शित करतार् है और इसके विपरीत, कीमत के गिरने के सार्थ-सार्थ SS पूर्ति वक्र E बिन्दु से D,C,B व A बिन्दुओं की ओर सिमटती है।

पूर्ति के नियम के अपवार्द 

निम्न दशार्ओं में पूर्ति क नियम लार्गू नहीं होतार् है-

  1. भविष्य में कीमतों में अधिक कमी यार् वृद्धि की सम्भार्वनार् होने पर- यदि वस्तु की कीमत भविष्य में आरै अधिक कमी होने होने की संभार्वनार् है, तो वस्तु की कीमत में कमी होने पर भी विक्रेतार् अपनी वस्तु को वतर्मार्न में भी अधिक मार्त्रार् में बचेगें। इसी प्रकार से यदि भविष्य में कीमतों में वृद्धि होने की सभंार्वनार् है, तो वे वस्तुओं की कीमतें बढऩे पर भी वतर्मार्न में वस्तु की अधिक मार्त्रार् नहीं बचेगें बल्कि वस्तु की कछु मार्त्रार् को स्टार्कॅ में रखकर उसे भवष्यि में बेचनार् चार्हेगें। इससे विक्रेतार्ओं को अधिक लार्भ होगार्। अत: वस्तु की कीमतों में भविष्य में अधिक कमी यार् वृद्धि होने की संभार्वनार् पर पूर्ति क नियम लार्गू नहीं होतार् है। 
  2. कृषि वस्तुओं पर यह नियम लार्गू नहीं होतार् है- कृषि वस्तुओं की पूर्ति प्रकृति पर निर्भर करती है। अत: कृषि वस्तुओं को इनकी कीमतें बढऩे पर नहीं बढाऱ् यार् जार् सकतार्। उदार्हरण के लिए, देश में वर्षार् ठीक न होने अथवार् फसलों पर कीड़ों क प्रकोप हो जार्ने के कारण कृषि उपज घट जार्ती हैं और इनकी कीमतें बढऩे लगती है। ऐसी दशार् में कृषि वस्तुओं की कीमतें बढऩे पर भी इसकी पूर्ति नहीं बढ़ पार्ती है। इसक कारण यह है कि कृषि वस्तुओं की पूर्ति प्रकृति पर निर्भर होती है। 
  3. कलार्त्मक वस्तुओं के संबध पर यह नियम लार्गू नहीं होतार् है- किसी प्रसिद्ध चित्रकार के द्वार्रार् बनार्ये गये चित्रों की कीमतें बढ़ जार्ती हैं तो इसकी पूर्ति पयाप्त संख्यार् में नहीं बढाऱ् यी जार् सकती है क्योकि कलार्कृतियार्ं एक यार् दो ही रहती हैं उनकी संख्यार् में वृद्धि नहीं की जार् सकती है। 
  4. नीलार्म की वस्तुओ पर भी यह नियम लार्गू नहीं होतार् है- चँूकि नीलार्म की जार्ने वार्ली वस्तु सीमित मार्त्रार् में होती है। अत: इसकी कीमतें बढ़ने पर भी इसकी पूर्ति नहीं बढ़ार्यी जार् सकती है। 
  5. अर्द्ध-विकसित देशों में मजदरूरूरी की दर बढऩे पर भी श्रमिकों की पूर्ति नहीं बढती है- सार्मार्न्यतयार् अर्द्ध-विकसित देशों में श्रम की पूर्ति अधिक होने के कारण मजदूरी की दर कम होती है। इन देशों क जीवन-स्तर निम्न होतार् हैं और लोगों की आवश्यकतार्एँ भी कम होती है। अत: इन देशों में श्रमिकों की मजदूरी एक स्तर के बार्द जब बढ़ने लगती है, तब श्रमिकों की पूर्ति नहीं बढत़ी है। इसक कारण यह है कि, निश्चित स्तर पर मजदूरी दर में वृद्धि होने पर श्रमिकों की पूर्ति बढ़ती है, किन्तु मजदूरी क न्यूनतम स्तर प्रार्प्त हो जार्ने के बार्द जब मजदूरी दर फिर बढ़ने लगती है तब श्रमिकों की पूर्ति नहीं बढेग़ी। वे कम घण्टे काम करनार् चार्हते है। वे अधिक गैर हार्जिर रहकर अधिक आरार्म करते हैं क्योकि कम घण्टे काम करके वे अपने न्यूनतम आवश्यकतार् के बरार्बर आय, बढ़ी हुर्इ मजदूरी से प्रार्प्त कर लेते हैं। 

पूर्ति में विस्तार्र तथार् संकुचन 

पूर्ति को प्रभार्वित करने वार्ले तत्वों की कीमत सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है। जब अन्य बार्तें समार्न रहती हैं तथार् केवल कीमत में परिवर्तन होते हैं तो पूर्ति की मार्त्रार् में परिवर्तन अथात् विस्तार्र यार् संकुचन होतार् है। पूर्ति में विस्तार्र तथार् संकचु न होने पर वस्तु विक्रेतार् क चलन एक ही पूर्ति वक्र होतार् है। कीमत बढ़ने पर विक्रेतार् क पूर्ति वक्र पर नीचे की आरे चलन में पूर्ति में संकुचन को बतार्तार् है। संक्षेप मे कीमत के बढऩे पर उत्पार्दक अधिकाधिक पूर्ति, की मार्त्रार् प्रस्तुत करतार् हैं जिसे पूर्ति क संकुचन कहते है।

पूर्ति में वृद्धि यार् कमी 

प्रत्यके वस्तु की पूर्ति अनेक तत्वों पर निर्भर करती है। कीमत के यथार्स्थिर रहने पर पूर्ति को प्रभार्वित करने वार्ले किसी अन्य तत्व में परिवर्तन के कारण जब पूर्ति वक्र परिवर्तित हो जार्ती है, तो इसे पूर्ति में परिवर्तन कहते है। जैसे- पूर्ति को प्रभार्वित करने वार्ले तत्वों में से, उत्पार्दन की तकनीक में परिवर्तन, उत्पत्ति के सार्धनों की कीमत में परिवतर्न , विक्रेतार्ओं की आय में परिवतर्न , नये-नये आविषकारें विक्रेतार्ओं के उद्देश्य में परिवतर्न आदि। इनमें से किसी एक घटक में परिवतर्न होने से वस्तु की पूर्ति में परिवतर्न दो प्रकार से होते हैं- (1) पूर्ति में वृद्धि। (2) पूर्ति में कमी।

(1) पूर्ति में वृद्धि – 

जब कीमत के अतिरिक्त, किन्हीं अन्य कारणों से उसी कीमत पर वस्तु की अधिक मार्त्रार् अथवार् कम कीमत पर वस्तु की उतनी ही मार्त्रार् में पूर्ति की जार्ती है, तो उसे पूर्ति में वृद्धि कहते है। इसमें हम बार्यी आरे के पूर्ति वक्र से दार्यीं आरे के नये पूर्ति वक्र पर गति करते है। पूर्ति में वृद्धि के प्रमुख कारण निम्न हो सकते हैं-

  1. तकनीकी प्रगति, 
  2. सम्बन्धित वस्तुओं की कीमत में कमी, 
  3. उत्पार्दन के सार्धनों की कीमतों में कमी, 
  4. फर्म के उद्दशेय में परिवर्तन , 
  5. उत्पार्दकों की सख्ंयार् में वृद्धि,
  6. भविष्य में कीमत के कम होने की सम्भार्वनार्,
  7. अप्रत्यक्ष करों में कमी तथार् अनुदार्नों में वृद्धि। 

(2) पूर्ति में कमी – 

जब कीमत के अतिरिक्त, किन्हीं अन्य कारणों से उसी कीमत पर वस्तु की कम मार्त्रार् अथवार् ऊँची कीमत पर वस्तु की उतनी ही मार्त्रार् में पूर्ति की जार्ती है, तो उसे पूर्ति में कमी कहते है। इसमें हम दार्यीं ओर के पूर्ति वक्र से बार्यीं ओर के नये पूर्ति वक्र पर गति करते है।

  1. सम्बन्धित वस्तुओं की कीमत में वृद्धि, 
  2. उत्पार्दन के सार्धनों की कीमतों में वृद्धि,
  3. फर्म के उद्दशेय में परिवतर्न अर्थार्त् बिक्री को अधिकतम करने के बजार्य लार्भ को अधिकतम करनार्, 
  4. उत्पार्दन तकनीकी क पुरार्नार् पड़ जार्नार्, 
  5. भविष्य में कीमत के वृद्धि की सम्भार्वनार्, 
  6. उत्पार्दकों की संख्यार् में कमी, 
  7. कर की दरों में वृद्धि तथार् अनुदार्नों में कमी। 

वस्तु की पूर्ति को प्रभार्वित करने वार्ले कारक 

पूर्ति को प्रभार्वित करने वार्ले अन्य कारकों में कोर्इ परिवर्तन नहीं होतार् है। इस अनुभार्ग में हम यह अध्ययन करेंगे कि अन्य कारक वस्तु की पूर्ति को कैसे प्रभार्वित करते हैं। अब हम यह मार्न्यतार् करेंगे कि वस्तु की कीमत में कोर्इ परिवर्तन नहीं होतार् है। वस्तु की कीमत के अतिरिक्त उसकी पूर्ति को प्रभार्वित करने वार्ले अन्य कारक निम्नलिखित हैं-

  1. अन्य वस्तुओं की कीमतें: जब अन्य वस्तुओं की कीमतें बढत़ी है। तो फर्म अपने संसार्धनों को उस वस्तु के उत्पार्दन में लगार्एगी जिनकी कीमते बढ़ी है। मार्न लीजिए, एक किसार्न अपने खते पर गन्ने की खेती करतार् हैं और गेंहू की कीमत बढ़ जार्ती है। अब उस किसार्न को गन्ने की तुलनार् में गेंहू की खेती करनार् अधिक लार्भप्रद होगार्। इससे गन्ने की पूर्ति कम हो जार्एगी हार्लार्ंकि गन्ने की कीमत में परिवतर्न नहीं हुआ है। आइए, एक और उदार्हरण लेते है। मार्न लीजिए, एक फर्म टेलीविजऩ बनार्ती हैं क्योंकि इसके उत्पार्दन में अन्य वस्तुओं की तुलनार् में उस अधिक लार्भ प्रार्प्त होने की आशार् है। मार्न लीजिए, टेलीविज़न की कीमत कम हो जार्ती है। अब टले ीविजऩ बनार्नार् कम लार्भप्रद होगार्। ऐसी स्थिति में यह फर्म कम टेलीविजऩ बनार्एगी आरै अपने संसार्धनों को अन्य वस्तओं जैसें रेफ्रिज़रटेर यार् वार्शिंग मशीन आदि को बनार्ने में लगार्एगी। इस प्रकार इन वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जार्एगी, हार्लार्ंकि इनकी कीमतें नहीं बढी़ है। अत: वस्तु की पूर्ति एक दी हुर्इ कीमत पर, अन्य वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन के कारण परिवर्तित हो सकती है। 
  2. उत्पार्दन के सार्धनों की कीमतें:यदि किसी वस्तु के उत्पार्दन में प्रयार्गे किए जार्ने वार्ले उत्पार्दन के सार्धनों की कीमतें बढ़ जार्ती हैं और उस वस्तु की कीमत उतनी ही रहती है तो इससे उत्पार्दकों को कम लार्भ प्रार्प्त होंगे । अत: वे इसक उत्पार्दन कम कर देगें। इस प्रकार वस्तु की कीमत कम न होने पर भी उसकी पूर्ति घट सकती है। इसी प्रकार उत्पार्दन के सार्धनों की कीमतें कम होने पर वस्तु की पूर्ति बढ़ सकती है।
  3. उत्पार्दक क उद्देश्य :सार्मार्न्यत: उत्पार्दक क उद्देश्य अधिकतम लार्भ कमार्नार् होतार् है। अत: वह वस्तु क केवल उतनार् ही उत्पार्दन करतार् हैं जिससे उसे अधिकतम लार्भ प्रार्प्त हो। लेिकन यह भी सभ्ंव है कि उत्पार्दक क उद्देश्य अधिकतम लार्भ प्रार्प्त करने के स्थार्न पर वस्तु की अधिकतम बिक्री करनार् हो। ऐसी स्थिति में वह लार्भ की मार्त्रार् क एक लक्ष्य अपने सार्मने रखतार् हैं आरै वस्तु की पूर्ति तब तक बढाऱ् तार् रहतार् है जब तक कि उसके लार्भ के लक्ष्य पर प्रतिकूल प्रभार्व न पडे। इस प्रकार उत्पार्दक क उद्दश्ेय भी वस्तु की पूर्ति को प्रभार्वित करतार् है।
  4. उत्पार्दन की तकनीक: तकनीकी के विकास क अर्थ है नर्इ मशीनों यार् उत्पार्दन के नए तरीकों क विकास। इस प्रकार के विकास से उत्पार्दन की लार्गत कम होती हैं और लार्भ बढ़ते है। अत: उत्पार्दक उसी कीमत पर वस्तु की पूर्ति बढाऱ् सकतार् है। इस प्रकार उत्पार्दन की तकनीकी में सुधार्र भी वस्तु की पूर्ति को प्रभार्वित करतार् है। उपरोक्त सभी कारक वस्तु की पूर्ति को प्रभार्वित करते है। वस्तु की कीमत अपरिवतिर्त रहने पर, उसकी पूर्ति अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण बदल सकती है।

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