पूंजीवार्द क अर्थ एवं उत्पत्ति

पूंजीवार्द क अर्थ – 

पूंजीवार्द शब्द उस सार्मार्जिक, आर्थिक व्यवस्थार् के लिए प्रयोग होतार् है जिसमें कि अधिकांश विश्व आज रह रहार् है। यह आम तौर से धार्रणार् रही है कि, यदि हमेशार् नहीं तो यह मार्नव इतिहार्स में अधिकांश समय रहार् है। पर यह सत्य है कि, पूंजीवार्द अभी कुछ शतार्ब्दियों से ही विश्व में आयार् है। पूंजीवार्द की शुरूआत ब्रिटिश पूंजीवार्दी क्रार्ंति से मार्नी जार्ती है। (इग्लैण्ड क गृहयुद्ध, 1639-48) जब इग्लैण्ड के तार्नार्शार्ही रार्जतंत्र-चार्ल्र्स प्रथम क सिर काट कर अंत कर बार्ंस पर लटक कर, इग्लैण्ड में इसक अंत कर दियार् गयार् थार्। इस घटनार् को, पूंजीवार्दी व्यवस्थार् की शुरूआत मार्नार् जार्तार् है।

पूंजीवार्द क असली चेहरार् ऊपर की जगमगार्ती शार्न-शौकत एवं तड़क-भड़क और समार्न अवसरों की मीठी-मीठी लफ्फार्जी की आड़ में दिखाइ नहीं पड़तार्। इन सब बार्तों की बजह से पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के कारण उत्पन्न अनेक प्रश्नों क उत्तर देनार् आसार्न नही होतार्। इस व्यवस्थार् क मुख्य गुण है – असमार्नतार्, शोषण, भेदभार्व, सार्मार्जिक अन्यार्य, भूख, गरीबी, बेरोजगार्री और युद्धों क होनार्। इस व्यवस्थार् में जो अन्न उगार्तार् है वह भूखार् है, जो कपड़ार् बुनतार् है वह नंगार् है, जो मकान बनार्तार् है, वह बेघर है।

पूंजीवार्दी प्रणार्ली के ये भीतरी अंतर्विरोध उसकी सर्वार्धिक विकट और लगार्तार्र बिगड़ती हुर्इ सार्मार्जिक और आर्थिक व्यार्धियों को जन्म देती है। ये व्यार्धियार्ं बड़े पैमार्ने पर बेरोजगार्री, मुद्रार्स्फीति, अपरार्ध, बार्रंबार्र दोहरार्ए जार्ने वार्ले आर्थिक संकट, भविष्य की अनिश्चिततार् क भय आदि।

पूंजीवार्द की उत्पत्ति –

पूंजीवार्दी, सार्मंतवार्द के खण्डहरों में अंकुरित और सार्मंती समार्ज के ध्वंसार्वशेषों से उत्पन्न व्यवस्थार् है। अपने प्रार्रंभिक विकास के सार्थ-सार्थ इसने सार्मंतवार्द को भीतर से खोखलार् करके नए, पूंजीवार्दी आर्थिक, सार्मार्जिक संबंधों के लिए आधार्र तैयार्र कियार्। यह प्रक्रियार् कोर्इ संयोग नहीं थार्, क्योंकि सार्मंती व्यवस्थार् और पूंजीवार्द दोनों में एक समार्नतार् है कि, दोनों ही उत्पार्दन के सार्धनों पर निजी स्वार्मित्व तथार् मनुष्य द्वार्रार् मनुष्य के शोषण पर आधार्रित है।

समंती व्यवस्थार् मुख्य रूप से भूसंपत्ति पर आधरित थार् एवं आत्म निभर्र थार्। लेकिन व्यार्पार्र-व्यवसार्य के विकास के कारण व्यार्पार्री वर्ग पैदार् हुआ, जो समृद्ध थार् एवं नर्इ-नर्इ तकनीक के अविष्कारों से प्रत्येक क्षेत्र में विशेषज्ञों की जरूरत पड़ने लगी, अत: पूंजीवार्द क विकास होने लगार्- मुद्रार् क लेन-देन, व्यार्पार्रिक केन्द्रों-नगरों क विकास फैक्टरियों, कारखार्नों क विकास किसनों क नगरों की ओर पलार्यन, उत्पार्दन में बेशुमार्र वृद्धि आदि ने सार्मंती अर्थव्यवस्थार् को अंदर से खोखलार् कर धीरे-धीरे नष्ट कर दियार्। यह प्रणार्ली नए विकसित समार्ज की आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने में असमर्थ थी, क्योंकि यह व्यवस्थार् सड़ चुकी थी और क्रार्ंतियों के द्वार्रार् इसे उखार्ड़ फैंक गयार्। यह भी वैज्ञार्निक सत्य है कि, जिस वर्ग के हार्थ में उत्पार्दन के सार्धन होते हैं- वहीं सत्तार् में रहतार् है और अपने वर्ग हित में सत्तार् क उपयोग करतार् है। अत: अब क्रार्ंतियों द्वार्रार् सार्मंतों को सत्तार् से बार्हर कर पूंजीवार्द उसमें आए और अपने वर्ग हितों के लिए कायदे-कानून और संविधार्न बनार्ए।

पूंजीपति वर्ग अपने झंण्डों में स्वतंत्रतार्, समार्नतार् और भ्रार्तृत्व के नार्रे अंकित कर सत्तार् में आयार्। लेकिन जल्द ही समार्नतार्, स्वतंत्रतार् महज एक चार्लू लब्ज रह गए, मार्त्र शोषण के तरीके बदले और कुछ नहीं। भूतपूर्व भूदार्स किसार्न मजदूरों में परिवर्तित हो गए।

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