पुनर्जार्गरण के कारण एवं विशेषतार्एं

पुनर्जार्गरण से तार्त्पर्य

ऐतिहार्सिक दृष्टि से पुनर्जार्गरण की कोर्इ सहज एवं स्पश्ट परिभार्षार् नहीं दी जार् सकती है। अनेक इतिहार्सकार इसे सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण स्वीकार करते हैं। व्यार्पक अर्थ में सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण क अभिप्रार्य उन समस्त परिवर्तनों से है, जो मध्ययुग से आधुनिक युग के बीच पश्चिमी यूरोप में हुए थे, अर्थार्त सार्मंतवार्द की अवनति, प्रार्चीन सार्हित्य क अध्ययन, रार्ष्ट्रीय रार्ज्यों क उत्थार्न, आधुनिक विज्ञार्न क प्रार्रंभ, गतिशील अक्षरों, बार्रूद एवं कुतुबनुमार् क अविष्कार, नये व्यार्पार्रिक मागों की खोज, पूँजीवार्द क विकास एवं अमेरिक क अविष्कार इत्यार्दि सभी परिवर्तनों से इसक तार्त्पर्य है। सीमित अर्थ में इसक अभिप्रार्य चार्दैहवीं सदी से सोलहवीं के मध्य लौकिक भार्वनार्ओं की वृद्धि, सार्ंसार्रिक विशय में अभिरुचि, पश्चिमी यूरोप के रार्जनीतिक, सार्मार्जिक, धामिक ओर आर्थिक क्षेत्रों में हुए मुख्य परिवर्तनों से इसक तार्त्पर्य है। प्रार्चीन रोमन तथार् यूनार्नी विद्यार् एवं कलार् की ओर लोगों को पुन: रुचि एवं मध्ययुग के अंत से आधुनिक युग के प्रार्रंभ के बीच हुए समस्त बौद्धिक एवं मार्नसिक विकास क बोधक सार्ंस्कृ तिक पनु र्जार्गरण है। सार्ंस्कृतिक पनुर्जार्गरण क तार्त्पर्य कुछ गैर -सार्ंस्कृतिक तथ्यों से भी है, जैसे यूरार्पे के क्रूसेड्स, नये देशों एवं व्यार्पार्रिक मागों की खोज, कृशि संबंधी परिवर्तन, सार्मतंवार्द क पतन, नगरों क उत्थार्न, पोप तथार् पवित्र रोमन सार्म्रार्ज्य की अवनति, रार्जनीतिक तथार् धामिक परिवर्तन, ज्योतिश की उन्नति इत्यार्दि।

पुनर्जार्गरण के कारण 

मध्ययुग के अंत में आक्रमणकारी-मुसलमार्नों एवं तुर्कों के विरूद्ध रोम के पोप की अध्यक्षतार् में धर्म-युद्ध यार् क्रूसेड्स से परिणार्मस्वरूप यूरोप के निवार्सियों के भौगोलिक ज्ञार्न एवं जीवन-प्रणार्ली के स्तर में पर्यार्प्त वृद्धि हुर्इ। अत: यूरोप के बौद्धिक तथार् मार्नसिक क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आरंभ हो गये। मध्ययुग के अंत एवं आधुनिक युग के प्रार्रंभ में यूरोपीय व्यार्पार्र-वार्णिज्य की वृद्धि, शिक्षार् प्रसार्र, नये-नये, स्वतंत्र एवं अर्द्ध-स्वतंत्र नगरों क उत्थार्न, रचनार्त्मक प्रयोग तथार् विज्ञार्न-विकास, अरबवार्सियों के प्रभार्वस्वरूप प्रार्चीन आध्यार्त्मिक ज्ञार्न एवं कलार् में नवजीवन क संचार्र, कुस्तुन्तुनियार् के पतन से प्रार्चीन संस्कृति की वृद्धि, यूरोपवार्सियों के भौगोलिक ज्ञार्न में प्रशंसनीय विकास, छार्पेखार्ने के अविष्कार से प्रार्चीन विद्यार् एवं कलार् के प्रसार्र में पर्यार्प्त वृद्धि इत्यार्दि तत्थों के परिणार्मस्वरूप ही यूरोप में सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण क प्रार्रंभ हुआ। सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण क आरंभ सबसे पहले इटली में ही हुआ, क्योंकि इटली में ही प्रार्चीन रोमन सभ्यतार् के अवशेष थे एवं सर्वप्रथम इटली के निवार्सियों ने ही प्रार्चीन यूनार्नी रोमन सार्हित्य तथार् संस्कृति क पुन: अध्ययन आरंभ कियार्। प्रार्रंभ में सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण आन्दोलन इटली तक ही सीमित थार्, परंतु कालार्ंतर में समस्त पचिशमी यूरोप पर इसक प्रभार्व पड़ार्।

पुनर्जार्गरण की विशेषतार्एं –

सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण के महार्न पे्रणेतार् इटली के महार्कवि दार्ँते थे, जिसकी प्रमुख रचनार् इटार्लियन भार्षार् में रचित थी। दार्ँते यूरोप के महार्न सार्हित्यिक तथार् वैज्ञार्निक थे। वर्जिल, सीजर एवं सिसेरो इत्यार्दि दार्ँते के मुख्य पथ-प्रदशर्क थे। प्रार्चीन सभ्यतार् एवं संस्कृति के पुन: अध्ययन तथार् प्रार्चीन सार्हित्य एवं लेखकों की प्रशसार्ं में दार्ँते की अपेक्षार् पटे ्राक क काफी महत्व थार्। उसने मध्ययुगीन धर्म-प्रधार्न शिक्षार् एवं सार्हित्य क परित्यार्ग कियार्। उसने प्रार्चीन रोमन तथार् यूनार्नी सार्हित्य के महत्व तथार् सौंदर्य की ओर समकालीन लोगो क ध्यार्न आकर्शित कियार् एवं उसने समकालीन शिक्षित लोगों में रोमन तथार् यूनार्नी संस्कृति के प्रति विशेश रुचि एवं ज्ञार्न-संचय करने की प्रवृित्त जार्गृत की। अत: पेट्राक को ही सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण क महार्न पथ-प्रदशर्क कहार् जार्नार् युक्तिसंगत होगार्। सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण के अंतर्भूत मुख्य परिवर्तनों, तथ्यों एवं विकसनों में  प्रमुख विशेषतार्एं दृष्टिगोचर होती हैं –

(1) मार्नववार्द-

सार्ंस्कृतिक पनुर्जार्गरण ने यूरोप के विद्वार्नों एवं सार्हित्य-सेवियों में ‘सार्हित्यकतार्’ व ‘प्रार्चीनतार्’ के प्रति रुचि उत्पन्न की। अब लोग प्रार्चीन रोमन तथार् यूनार्नी सभ्यतार् की सर्वोत्कृश्ट आदशर् के रूप में ग्रहण करने लगे। सार्हित्य एवं प्रार्चीनतार् के प्रति यह रुचि तथार् प्रवृित्त उन्नीसवीं सदी तक चलती रही एवं समस्त यूरोपीय सार्हित्य, स्थार्पत्य-कलार् एवं विविध कलार्ओं की ॉौली भी इसके द्वार्रार् पुर्णतयार् प्रभार्वित हुर्इ। दूसरी ओर, सार्हित्य व प्रार्चीनतार् की पुन: प्रशंसार् के सार्थ-सार्थ पुनर्जार्गरण ने यूरोपीय विद्वार्नों एवं सार्हित्य-प्रेमियों में ‘मार्नववार्द’ यार् मार्नववार्दी प्रवृत्तियों को जार्गृत कियार्। मार्नववार्द क तार्त्पर्य ‘उन्नत ज्ञार्न’ से है अर्थार्त् यह धार्रणार् कि प्रार्चीन सार्हित्य में ही समस्त गुण, मार्नवतार्, सौंदर्य, मार्धुर्य तथार् जीवन की वार्स्तविक साथकतार् निहित है, एवं दूसरी ओर, आध्यार्त्मिकतार्, धर्म-शार्स्त्र एवं वैरार्ग्य में कोर्इ महत्त्ार्ार् व साथकतार् नहीं होती है। यूरोप के विद्वार्न जिन्होनं े प्रार्चीन रोमन एवं यूनार्नी सभ्यतार्, संस्कृति, सार्हित्य, प्रार्कृतिक जीवन के सौंदर्य एवं मार्धुर्य तथार् मार्नववार्दी विशयों के महत्व पर जोर दियार् एवं जिन्होंने प्रार्चीन ज्ञार्न को ही मार्नव-उत्थार्न हेतु नितार्ंत आवशयक अंग बतार्यार्, वे मार्नववार्दी कहलार्ते हैं। इन मार्नववार्दी विद्वार्नों ने बड़े उत्सार्ह एवं लगन के सार्थ प्रार्चीन ग्रंथों की खोज शुरू की। इन्है। रार्जार्ओ, प्रभार्वशार्ली एवं धन-सम्पन्न व्यक्तियों तथार् विद्यार्पे्रमी लोगों की ओर से पर्यार्प्त प्रोत्सार्हन, संरक्षण एवं सहयोग प्रार्प्त हुए। अत: पनु र्जार्गरण ने ही लोगों में बौद्धिक उत्सुकतार्, आलोचनार्त्मक प्रवृित्त तथार् ज्ञार्न-संचय की अभिरुचि उत्पन्न की।

(2) कलार् – 

जिस प्रकार यूरोप के विद्वार्नों ने 14वीं सदी से लेकर 16वीं सदी तक प्रार्चीन रोमन एवं यूनार्नी सार्हित्य के प्रति बड़ी अभिरुचि दिखार्यी, उसी प्रकार कलार्कारों एवं शिल्पियों ने भी प्रार्चीन ललित कलार्ओं से प्रेरणार् प्रार्प्त की एवं संतति के लिए नये आदशर् से इसक विकास कियार्। मध्ययुगीन यूरोप की कलार् मुख्यतयार् र्इसाइ धर्म से संबंधित थी, परन्तु सार्हित्य एवं प्रार्चीन सभ्यतार् के प्रभार्वस्वरूप पंद्रहवीं एवं सोलहवीं सदियों में यूरोपीय कलार् क महार्न् रूपार्ंतर व परिवर्द्धन हुआ। अब कलार् पर सार्हित्य व प्रार्चीनतार् की छार्प स्पश्टतयार् दिखार्यी देने लगी एवं कलार् के सभी क्षेत्रों-ं स्थार्पत्य-कलार्, मूर्तिकलार्, चित्रकलार् एवं संगीत में प्रार्चीनतार् के आदर्श अपनार्येजार्ने लगे एवं इनकी अद्वितीय उन्नति हुर्इ। मध्ययुग में जहार्ँ यूरोप में लार्के भार्षार्ओं क प्रार्रंभिक विकास प्रार्रंभ हुआ, वहार्ँ सार्थ ही, इटली में कर्इ महत्वपूर्ण सार्हित्य की रचनार् हो चुकी थी, परंतु पंद्रहवीं सदी में इटार्लियन विद्वार्नों द्वार्रार् प्रार्चीन लैटिन एवं यूनार्नी सार्हित्य के प्रति अत्यार्धिक रुचि-प्रदशर्न के कारण इटार्लियन लोकभार्षार् क विकास अवरूद्ध हो गयार्। इस युग के प्रसिद्ध इटार्लियन सार्हित्यकार एवं विद्वार्न लैटिन एवं यूनार्नी सार्हित्य के महार्न उपार्सक थे, परंतु अपनी रार्ष्ट्रीय भार्षार् व सार्हित्यार्ं े के प्रति बड़े उदार्सीन थे। यद्यपि पटे ्राक इटार्लियन भार्षार् में सुंदर कवितार्ओं की रचनार् कर सकतार् थार्, परंतु वह ऐसी रचनार् करने में हीनतार् क बार्ध्े ार् करतार् थार्। दूसरी ओर , लैटिन भार्षार् में लिखने में उस े गर्व थार्। इन विद्वार्नों ने होरेस, सिसेरो एवं वर्जिल की रचनार्ओं क अनुसरण कियार् एवं उन्होंने प्रार्चीन सार्हित्य के गौरव एवं वार्स्तविक सौंदर्य क द्वार्र प्रशस्त कर दियार्। प्रार्चीन यूनार्नी तथार् लैटिन सार्हित्य एवं ग्रंथों की खोज एवं वैज्ञार्निक अध्ययन के परिणार्म स्वरूप विद्वार्नों में वैज्ञार्निक आलार्चे नार् की प्रवृत्ति जार्गतृ हइुर् । इस युग में रार्जार्ओं यार् सेनार्पतियों की प्रशस्ति की अपक्ष्े ार्ार् विद्वार्नों एवं कलार्कारों के जीवन चरित्र लिखे एवं पढ़े जार्ने लगे।

(3) धामिक क्रार्ंति व प्रोटेस्टेंट धर्म क उत्थार्न- 

सोलहवीं सदी के प्रार्रंभ में, यद्यपि सार्मार्न्यत: र्इसाइयों पर कैथलिक धर्म क प्रभार्व अक्षुण्ण बनार् रहार्, परंतु सार्ंस्कृतिक पनु रुत्थार्न के परिणार्मस्वरूप सर्वसार्धार्रण जनतार् में स्वतंत्र चिंतन एवं धामिक विशयों क वैज्ञार्निक अध्ययन प्रार्रभ्ं ार् हो गयार् थार्। सार्ंस्कृतिक पुररुत्थार्न के परिणार्मस्वरूप यूरोप के विभिन्न रार्ज्यों में लार्के भार्षार्ओं एवं रार्ष्ट्रीय सार्हित्य क विकास आरंभ हुआ। सर्वसार्धार्रण जनतार् ने क्लिश्ट एवं जटिल लैटिन भार्षार् क परित्यार्ग कर अपनी मार्तृभार्षार्ओं में रचित सरल एवं बार्ध्े ार्गम्य रचनार्ओं एवं सार्हित्य क अध्ययन आरंभ कर दियार् थार्। सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण द्वार्रार् जटिल सार्हित्य, विज्ञार्न, कलार् एवं बौद्धिक जार्गृति ने सर्वसार्धार्रण जनतार् को एक नयी स्फूर्ति, स्पंदन और चिंतन से अनुप्रार्णित कर दियार्। अत: सदियों से प्रचलित कैथलिक धर्म के निर्देशों एवं अधिकारों क पार्लन करने के लिए अब लोग तैयार्र नहीं थे। अब वे कैथलिक चर्च के अधिकारों एवं निर्देशों क विरोध करने लगे, क्योंकि कैथलिक चर्च क नैतिक स्तर काफी नीचे गिर गयार् थार्, अब चर्च की कटुआलोचनार्एँ होने लगीं एवं चर्च के विरूद्ध आक्षेप एवं आरोप होने लगे। यद्यपि प्रार्रंभ में चर्च ने अलोचकों यार् विरोधियों को नार्स्तिक कहकर धर्म से निश्कासित कियार् तथार् उन्हें समार्ज-शत्रु कहकर मृत्यु दण्ड प्रदार्न कियार्, परंतु चर्च के विरूद्ध आलोचनार्एँ निरंतर बढ़ती ही गयीं। वस्तुत: चर्च के विरूद्ध आलोचनार्एँ आधुनिक युग के आगमन एवं मध्ययुग की समार्प्ति की सूचक थीं। सोलहवीं सदी के प्रार्रंभ तक यूरोप में सर्वथार् नवीन वार्तार्वरण उत्पन्न हो चुक थार्। अब संदेहवार्द एवं नार्स्तिकतार् की उत्त्ार्रोत्त्ार्र वृद्धि हो रही थी, जो कालार्ंतर में कैथलिक र्इसाइ-जगत के लिए बड़ी घार्तक सिद्ध हुर्इ। सोलहवीं सदी के प्रार्रंभ में उत्पन्न हुर्इ नवीन जार्गृति ने एक महार्न धामिक क्रार्ंति उत्पन्न कर दी, जिसके परिणार्मस्वरूप कैथलिक र्इसाइ चर्च के परम्परार्गत अधिकारों के विरूद्ध सशस्त्र तथार् सक्रिय विरोध-आंदोलन प्रार्रंभ हो गयार्। यही आंदोलन धर्म-सुधार्र के नार्म से प्रख्यार्त है। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में नवोत्थार्न ने मनुश्य के बौद्धिक विकास क पथ प्रशस्त कर दियार् एवं स्वतंत्र-चिंतन-पद्धति को जन्म दियार्। माटिन लूथर द्वार्रार् जर्मन भार्षार् में ‘बाइबिल’ धर्म-गं्रथ क अनुवार्द एवं पक्र ार्शन धर्म-सुधार्र एवं प्रोटेस्टेटं -आदं ार्ले न के लिए सबसे महत्वपूर्ण एवं सहार्यक कारण सिद्ध हुआ।

आधुनिक युग के प्रार्रंभ के नवोत्थार्न-जनित प्रार्चीन सभ्यतार् एवं संस्कृति क पुन: विकास, सुदूरस्थ भौगोलिक खोजों, लोकभार्षार्ओं एवं रार्ष्ट्रीय सार्हित्य के सृजन की भार्ंति ही समार्नरूप से महत्वपूर्ण एवं युगार्ंतरकारी विशेशतार् वैज्ञार्निक अंवेशण तथार् वैज्ञार्निक उन्नति मार्नी जार्ती है। वस्तुत: सोलहवीं सदी क यूरोप न केवल, अपने महार्न कलार्कारों, विद्वार्नों एवं मार्नववार्दियों के कारण ही, वरन् सार्थ ही सार्थ अपने महार्न् वैज्ञार्निकों के कारण भी बड़ार् महत्वपूर्ण मार्नार् जार्तार् है। इन वैज्ञार्निकों ने समस्त विज्ञार्नजगत में अपने महार्न अन्वेषणों द्वार्रार् अपूर्व एवं महार्न् क्रार्ंति उत्पन्न कर दी। मध्ययुगीन यूरोपीय समार्ज की रूढ़िवार्दितार्, प्रगतिशीलतार्, धामिक कÍरतार्, अंधविशवार्स तथार् विज्ञार्न के प्रति व्यार्पक उदार्सीनतार् के कारण मध्ययुग में वैज्ञार्निक अंवेशण एवं प्रगति संभव न थी। किन्तु मध्यकाल के उत्त्ार्राद्ध एवं आधुनिक युग के प्रार्रंभ में विज्ञार्न के क्षेत्र में अनेक अनुसंधार्न, अंवेशण तथार् परिवर्तन हुए। अत: वैज्ञार्निक उन्नति होने लगी, समार्ज क स्वस्थ विकास होने लगार्, मनुश्यों में स्वतंत्र चिंतन-प्रवृित्त, वैज्ञार्निक दृष्टिकोण एवं वैज्ञार्निक आलोचनार्एँ आरंभ हुर्इ। अत: सर्वत्र क्रियार्शीलतार्, गतिशीलतार् एवं प्रगति आरंभ हुर्इ।

प्रार्चीन यूनार्नी सभ्यतार् व संस्कृति के पुनर्जार्गरण के प्रयार्सों के परिणार्मस्वरूप विस्तृत पार्इथार्गोरस के गणित संबंधी ‘सिद्धार्ंतों’ क पुन: अध्ययन होने लगार्। खगोल विद्यार् के क्षेत्र में कोपरनिकस, टार्इको ब्रार्च,े केल्पर एवं गैलीलियो इत्यार्दि वैज्ञार्निकों द्वार्रार् प्रतिपार्दित सिद्धार्ंतो, निश्कर्शों, अन्वेषणों व प्रयोगो क पुन: अध्ययन होने लगार्। सोलहवीं सदी में ‘खगोल विद्यार्’ ने ‘प्रार्चीन सभ्यतार् एवं संस्कृति के पुनर्जार्गरण’ से प्रेरणार् प्रार्प्त की एवं अपने विकास के माग को प्रशस्त कर दियार्। विज्ञार्न, गणित, यंत्र-विद्यार् एवं पदाथ-शार्स्त्र इत्यार्दि की बड़ी क्रार्ंतिकारी एवं जन उपयोग प्रगति आरंभ हो गयी। समकालीन पूँजीवार्द के विकास के परिणार्मस्वरूप बड़ े पैमार्ने पर खनिज-विज्ञार्न क प्रयोग कियार् जार्ने लगार्, अत: कालार्तं र में धार्तु-विज्ञार्न क भी विकास होने लगार्। सोलहवीं सदी में चिकित्सार्शार्स्त्र क विकास अपेक्षार्कृत कम हुआ। इस क्षत्रे में पैरार्सैल्ििसयस, वार्स्लस एवं हावे इत्यार्दि चिकित्सार्-शार्स्त्रियों ने बड़े महत्वपूर्ण कार्य किए। वनस्पति-विज्ञार्न एवं प्रार्णी विज्ञार्न के क्षेत्रों में भी नवीन अन्वेषण एवं अनुसंधार्न आरंभ हो गय।े 14वीं सदी में यूरोप में बार्रूद के आविष्कार एवं तत्जनित बार्रूद के प्रयोग सार्धनों के संबंधों में ज्ञार्न-वृद्धि के परिणार्मस्वरूप तोपें और बंदूकें बनने लगी। इन्होंने युद्ध-प्रणार्ली में आमूल परिवर्तन उत्पन्न कर दिए, सार्ंमतों की शक्ति को क्षीण बनार् दियार्, दुर्गों एवं ॉार्स्त्रार्स्त्र-सज्जित सैनिकों की उपयार्ेि गतार् को व्यर्थ कर दियार्। अब रार्जार्ओं की सेनार्एँ बड़ी शक्तिशार्ली बन गर्इं। रार्जार्ओं ने अपनी सैनिक शक्ति एवं मध्यम वर्ग के सहयार्गे के बल पर सुदृढ़ केन्द्रित तथार् सावभौम सरकारें कायम कर लीं। अत: यूरोप में सार्मंतवार्द की अवनति एवं रार्जतंत्रवार्द तथार् निरंकुश रार्जसत्त्ार्ार् की उन्नति होने लगी। आधुनिक काल के प्रार्रंभ में गतिशील अक्षरों एवं छार्पेखार्ने के आविष्कार के परिणार्मरूवरूप स्वतंत्र चिंतन एवं ज्ञार्न-प्रसार्र में अभतू पूर्व वृद्धि हुर्इ। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में प्रमुख अन्वेशणों में छार्पेखार्ने क अन्वेशण अत्यंत महत्वपूर्ण समझार् जार्तार् है, क्योंकि आधुनिक यूरोपीय इतिहार्स पर इसक अत्यंत गहन प्रभार्व पड़ार्। गतिशील अक्षरों एवं छार्पेखार्ने के सहयोग से ही सन् 1454 में सर्वप्रथम ‘बाइबिल’ क लैटिन संस्करण पक्र ार्शित हुआ। अब अधिकाधिक संस्थार् में एवं सुलभ पुस्तकें छार्पी जार्ने लगी। अत: ज्ञार्न व विद्यार् की परिधि अब सीमित न रही, वरन् सर्वसार्धार्रण के लिए विस्तृत हो गयी।

(4) भौगार्लिक खोजें – 

आधुनिक यूरोप के प्रार्रंभ में सार्ंस्कृतिक पनु र्जार्गरण के विकास के सार्थ ही भौगोलिक खार्जे ें भी बड़ी महत्वपूर्ण विशश्ेार्तार् मार्नी जार्ती है। सोलहवीं सदी के प्रार्रभं में विविध देशों के लार्गे अपने में ही सीमित थे एवं इन दिनों ‘विशव-एकतार् की सभ्यतार्’ जसै ी कोर्इ धार्रणार् न थी। परंतु सोलहवीं सदी के भौगोलिक अविष्कारों एवं खार्जे ों के परिणार्मस्वरूप संसार्र के विविध क्षत्रे परस्पर जुड़ गए। अत: आधुनिक युग में यूरोपीय विस्तार्र के फलस्वरूप ‘विशव-सभ्यतार्’ क सृजन संभव हो सका। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में यूरोपीय रार्जार्ओं द्वार्रार् विशवव्यार्पी भौगोलिक खार्जे ों एवं प्रसार्र के दो मुख्य कारण थे- प्रथम, आर्थिक एवं द्वितीय, धामिक। आर्थिक उद्देशयों की पूर्ति हेतु ही यूरोपवार्सियों ने संसार्र के विविध क्षेत्रों से संबंध स्थार्पित करनार् चार्हार्। निकट-पूर्व में (अर्थार्त पूर्वी यूरोप में) उस्मार्नियार् तुर्कों की प्रगति व आधिपत्य-स्थार्पन के परिणार्मस्वरूप पूर्वी देशों के सार्थ यूरोपीय व्यार्पार्र-संबंधों क विच्छेद हो गयार्। तुर्कों की युद्धप्रियतार्, व्यार्पार्रिक मागों की कठिनार्इयार्ँ एवं आपित्त्ार्यार्ँ इत्यार्दि व्यार्पार्र की अभिवृद्धि में बड़ी घार्तक सिद्ध हुर्इं। अत: अब भूमध्यसार्गर क व्यार्पार्रिक महत्व घटने लगार् एवं नयी भौगोलिक खोजों यार् व्यार्पार्रिक मागों के परिणार्मस्वरूप अटलार्ण्टिक महार्सार्गर क महत्व बढ़ने लगार्। सौभार्ग्यवश इस समय तक ‘कम्पार्स’ क अंवेशण हो चुक थार्, अत: दिशार्ओं क सही ज्ञार्न प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् थार्। पंद्रहवीं सदी के उत्त्ार्राद्ध में बड़े उत्सार्ह एवं लगन के सार्थ नये व्यार्पार्र मागों की खार्जे ें आरंभ की गयीं। पश्चिमी यूरोप के महत्वार्काक्ष्ं ार्ी रार्श्ट्रों यार् रार्जार्ओं ने अपने आर्थिक तथार् व्यार्पार्रिक स्वाथों एवं उद्देशयों की पूर्ति हेतु इन नार्विकों एवं सार्हसिकों को पर्यार्प्त प्रार्त्े सार्हन तथार् सहार्यतार् पद्र ार्न की। इन भौगोलिक खोजों क मुख्य उद्देशय व्यार्पार्र थार्, परंतु इसके परोक्ष उद्देशय उपनिवेश-स्थार्पन, धर्म-प्रचार्र एवं सार्म्रार्ज्य-विस्तार्र व रार्ष्ट्रीय गौरव की वृद्धि इत्यार्दि भी थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *