पार्ठ्यक्रम क अर्थ, परिभार्षार् एवं प्रकृति
‘पार्ठ्यक्रम’ शब्द अंग्रेजी भार्षार् के ‘करीक्यूलम’ (Curriculum) शब्द क हिन्दी रूपार्न्तर है। ‘करीक्यूलम’ शब्द लैटिन भार्षार् से अंग्रेजी में लियार् गयार् है तथार् यह लैटिन शब्द ‘कुर्रेर’ से बनार् है। ‘कुर्रेर’ क अर्थ है ‘दौड़ क मैदार्न’। दूसरे शब्दों में, ‘करीक्यूलम’ वह क्रम है जिसे किसी व्यक्ति को अपने गन्तव्य स्थार्न पर पहुँचने के लिए पार्र करनार् होतार् है। अत: पार्ठ्यक्रम वह सार्धन है, जिसके द्वार्रार् शिक्षार् व जीवन के लक्ष्यों की प्रार्प्ति होती है। यह अध्ययन क निश्चित एवं तर्कपूर्ण क्रम है, जिसके मार्ध्यम से शिक्षाथी के व्यक्तित्व क विकास होतार् है तथार् वह नवीन ज्ञार्न एवं अनुभव को ग्रहण करतार् है। शिक्षार् के अर्थ के बार्रे में दो धार्रणार्यें है – पहली, प्रचलित अथवार् संकुचित अर्थ और दूसरी, वार्स्तविक यार् व्यार्पक अर्थ। संकुचित अर्थ में शिक्षार् केवल स्कूली शिक्षार् यार् पुस्तकीय ज्ञार्न तक ही सीमित होती है, परन्तु विस्तृत अर्थ में पार्ठ्यक्रम के अन्तर्गत वह सभी अनुभव आ जार्ते है जिन्हें एक नई पीढ़ी अपनी पुरार्नी पीढ़ियों से प्रार्प्त करती है। सार्थ ही विद्यार्लय में रहते हुए शिक्षक के संरक्षण में विद्याथी जो भी क्रियार्यें करतार् है, वह सभी पार्ठ्यक्रम के अन्तर्गत आती है तथार् इसके अतिरिक्त विभिन्न पार्ठ्यक्रम सहगार्मी क्रियार्यें भी पार्ठ्यक्रम क अंग होती है। अत: वर्तमार्न समय में ‘पार्ठ्यक्रम’ से तार्त्पर्य उसके विस्तृत स्वरूप से ही है।

पार्ठ्यक्रम के अर्थ को और अच्छी तरह समझने के लिए हमें शिक्षार् के विकास पर भी एक दृष्टि डार्लनी आवश्यक है। आदिकाल में शिक्षार् क स्वरूप पूर्णतयार् अनौपचार्रिक होतार् थार् अर्थार्त् शिक्षार् किसी विधि एवं क्रम से बँधी हुई नहीं थी। उस समय बार्लकों की शिक्षार् उनके परिवार्र एवं समार्ज की जीवनचर्यार् के मध्य चलती रहती थी तथार् बार्लक उसमें भार्गीदार्री बनकर प्रत्यक्ष अनुभव एंव निरीक्षण के मार्ध्यम से तथार् अपने बड़ों एंव पूर्वजों के अनुभव सुनकर शिक्षार् प्रार्प्त करतार् थार्, किन्तु सभ्यतार् के विकास के सार्थ – सार्थ मार्नव के ज्ञार्नरार्शि के संचित कोष में निरन्तर वृद्धि होती गयी तथार् मनुष्य के जीवन में जटिलतार्यें एवं विविधतार्यें आती गयीं। परिणार्मस्वरूप व्यक्ति के पार्स समय और सार्धन क अभार्व होने लगार् तथार् उसकी शिक्षार् अपूर्ण रहने लगी। अत: प्रत्येक विकासशील समार्ज ने अपने बार्लकों को समुचित शिक्षार् प्र्रदार्न करने के उद्देश्य से इसे विधिवत् एवं क्रमबद्ध बनार्ने के प्रयार्स प्रार्रम्भ किये। विद्यार्लयों क उद्भव तथार् उनकी स्थार्पनार् इन्हीं प्रयार्सों क परिणार्म है। इस उसने समार्ज को उपयोगी एवं महत्वपूर्ण ज्ञार्न अपने बार्लकों को समुचित ढंग से नहीं दे पार् रहार् थार्। उसने उसकी जिम्मेदार्री अनुभवी विद्वार्नों को सौंप दी। इन विद्यार्लयों द्वार्रार् बार्लकों को जीवन के उद्देश्यों को प्रार्प्त करने तथार् उन्हें समुचित ढंग से शिक्षार् प्रदार्न करने हेतु जो ज्ञार्नरार्शि निश्चित एवं निर्धार्रित की गयी तथार् की जार्ती है उसे ही ‘पार्ठ्यक्रम’ क नार्म दियार् गयार् है। इस प्रकार हम यह कह सकते है। कि पार्ठ्यक्रम अध्ययन क ही एक क्रम है, जिसके अनुसार्र चलकर विद्याथी अपनार् विकास करतार् है। अत: यदि शिक्षार् की तुलनार् दौड़ से की जार्ये तो पार्ठ्यक्रम उस दौड के मैदार्न के समार्न है जिसे पार्र करके दौड़ने वार्ले अपने निश्चित लक्ष्य तक पहुँच जार्ते है।

पार्ठ्यक्रम की परिभार्षार्

विद्यार्लयों क प्रमुख कार्य बार्लकों को शिक्षार् प्रदार्न करनार् होतार् है और इसको पूर्ण करने के लिए वहार्ँ पर जो कुछ कियार् जार्तार् है उसे ‘पार्ठ्यक्रम’ क नार्म दियार् गयार् है। इसीलिए ‘पार्ठ्यक्रम’ को परिभार्षित करते हुए एक विद्वार्न ने इसे हृार्ट ऑफ एजूकेशन (What of Education) कहार् है। प्रथम दृष्टि में यह परिभार्षार् बहुत अधिक सरल एंव स्पष्ट प्रतीत होती है, परन्तु इस ‘हृार्ट’ की व्यार्ख्यार् करनार् तथार् कोई निश्चित उत्तर प्रार्प्त करनार् बहुत कठिन कार्य है। इस सम्बन्ध में अमेरिक के ‘नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन’ ने अपनी टिप्पणी इस प्रकार की है – ‘‘विद्यार्लयों क कार्य क्यार् है ? यह एक ऐसार् प्रश्न है जिसक उत्तर कई बार्र अनेक ढंग से दियार् जार् चुक है, फिर भी बार्र – बार्र उठार्यार् जार्तार् है। कारण स्पष्ट है, यह एक ऐसार् शार्श्वत प्रश्न है जिसक उत्तर अन्तिम रूप से कभी दियार् भी नहीं जार् सकतार् है। यह एक ऐसार् प्रश्न है जिसक उत्तर प्रत्येक समार्ज एवं प्रत्येक पीढ़ी की बदलती हुई प्रकृति एंव आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र बदलतार् रहतार् है।’’

इसी प्रकार शिक्षार् के इतिहार्स से भी इस बार्त की पुष्टि होती है कि समय के सार्थ – सार्थ पार्ठ्यक्रम में भी परिवर्तन होते रहे हैं तथार् इसमें कभी व्यार्पकतार् और कभी संकीर्णतार् आती रही है, परन्तु शिक्षार्विदों को जब इस बार्त क आभार्स मिलार् कि विद्यार्लयों में शिक्षित युवक सदैव अपने भार्वी जीवन में सफल नहीं हो पार्ते हैं तब यह निष्कर्ष निकालार् गयार् कि जीवन की तैयार्री के लिए पढ़नार्-लिखनार् ही सब कुछ नहीं है। मनोविज्ञार्न के विकास ने भी इस धार्रणार् को बल प्रदार्न कियार् कि मार्त्र अध्ययन-अध्यार्पन पर ही पूरार् दबार्व रखनार् बार्लकों के विकास की दृष्टि से न केवल एकांगी है, बल्कि अन्य प्रवृत्तियों के समुचित विकास के अभार्व में हार्निप्रद भी हो सकतार् है। इस दृष्टिकोण क प्रभार्व विद्यार्लयों के कार्यक्रमों पर पड़ार् और उनमें व्यार्पकतार् आनी प्रार्रम्भ हुई। अत: विद्यार्लयों में पार्ठ्य-विषयों के सार्थ-सार्थ ऐसी प्रवृत्तियों क समार्वेश भी कियार् जार्ने लगार्, जिनसे बार्लकों में बौद्धिक ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ स्वार्स्थ्य, सौन्दर्य-बोध, सृजनार्त्मकतार् तथार् अन्य मार्नवीय एवं सार्मार्जिक गुणों क समुचित विकास भी हो सके। इस प्रकार विभिन्न उतार्र-चढ़ार्व के पश्चार्त् वर्तमार्न शतार्ब्दी में पार्ठ्यक्रम की व्यार्पकतार् की दृष्टि से अनेक विद्वार्नों ने इसको अपने-अपने ढंग से परिभार्षित करने क प्रयार्स कियार् है।

बबिट महोदय के अनुसार्र – ‘‘उच्चतर जीवन के लिए प्रतिदिन और चौबीस घण्टे की जार् रही समस्त क्रियार्यें पार्ठ्यक्रम के अन्तर्गत आ जार्ती है।’’

एक अन्य विद्वार्न ले के अनुसार्र – ‘‘पार्ठ्यक्रम क विस्तार्र वहार्ँ तक है, जहार्ँ तक जीवन का।’’

परन्तु इन विचार्रों को पार्ठ्यक्रम की समुचित परिभार्षार् मार्ननार् तर्कसंगत नहीं लगतार् है, क्योंकि पार्ठ्यक्रम क सम्बन्ध शिक्षार् के औपचार्रिक अभिकरण विद्यार्लय से है तथार् विद्यार्लय ही पार्ठ्यक्रम की सीमार् भी है। इस दृष्टि से पार्ठ्यक्रम को विद्यार्लय के घेरे में ही परिभार्षित करनार् उचित लगतार् है।

वार्ल्टर एस. मनरो के शब्दकोष के अनुसार्र – ‘‘पार्ठ्यक्रम को किसी विद्याथी द्वार्रार् लिये जार्ने वार्ले विषयों के रूप में परिभार्षित नहीं कियार् जार्नार् चार्हिए। पार्ठ्यक्रम की कार्यार्त्मक संकल्पनार् के अनुसार्र इसके अन्तर्गत वह सब अनुभव आ जार्ते है जो विद्यार्लय में शिक्षार् के लक्ष्यों की प्रार्प्ति के लिए प्रयुक्त किये जार्ते है।’’
इस संकल्पनार् के अनुसार्र पार्ठ्यक्रम विकास के अन्तर्गत प्रयुक्त किये जार्ने वार्ले अनुभवों के आयोजन में पार्ठ्यक्रम को व्यवस्थित करने, उसे क्रियार्न्वित करने तथार् उसक मूल्यार्ंकन करने सम्बन्धी पक्ष सम्मिलित होते है।

ब्लार्ंडस के शिक्षार् कोष के अनुसार्र – ‘‘पार्ठ्यक्रम को क्रियार् एवं अनुभव के परिणार्म के रूप में समझार् जार्नार् चार्हिए न कि अर्जित किये जार्ने वार्ले ज्ञार्न और संकलित किये जार्ने वार्ले तथ्यों के रूप में। विद्यार्लय जीवन के अन्तर्गत विविध प्रकार के कलार्त्मक, शार्रीरिक एवं बौद्धिक अनुभव तथार् प्रयोग सम्मिलित रहते है।’’

रार्बर्ट एम. डब्ल्यू. ट्रेवर्स से अपनी पुस्तक ‘इण्ट्रोक्शन टू रिसर्स’ में पार्ठ्यक्रम की गत्यार्त्मकतार् पर बल देते हुए लिखार् है- ‘‘एक शतार्ब्दी पूर्व पार्ठ्यक्रम की संकल्पनार् उस पार्ठ्य-सार्मग्री क बोध करार्ती थी जो छार्त्रों के लिए निर्धार्रित की जार्ती थी, परन्तु वर्तमार्न समय में पार्ठ्यक्रम की संकल्पनार् में परिवर्तन आ गयार् है। यद्यपि प्रार्चीन संकल्पनार् अभी भी पूर्णरूपेण लुप्त नहीं हुई है, लेकिन अब मार्नार् जार्ने लगार् है कि पार्ठ्यक्रम की संकल्पनार् में छार्त्रों की ज्ञार्न – वृद्धि के लिए नियोजित सभी स्थितियार्ँ, घटनार्यें तथार् उन्हें उचित रूप में क्रमबद्ध करने वार्ले सैद्धार्ंतिक आधार्र समार्हित रहते है।’’

सी.वी. गुड द्वार्रार् सम्पार्दित शिक्षार् कोष में पार्ठ्यक्रम की तीन परिभार्षार्यें दी गई है, जो इस प्रकार है –

  1. ‘‘अध्ययन के किसी प्रमुख क्षेत्र में उपार्धि प्रार्प्त करने के लिए निर्धार्रित किये गये क्रमबद्ध विषयों अथवार् व्यवस्थित विषय-समूह को पार्ठ्यक्रम के नार्म से अभिहित कियार् जार्तार् है।’’
  2. ‘‘किसी परीक्षार् को उत्तीर्ण करने अथवार् किसी व्यार्वसार्यिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए किसी शिक्षार्लय द्वार्रार् छार्त्रों के लिए प्रस्तुत विषय-सार्मग्री की समग्र योजनार् को पार्ठ्यक्रम कहते है।’’
  3. ‘‘व्यक्ति को समार्ज में समार्योजित करने के उद्देश्य से विद्यार्लय के निर्देशन में निर्धार्ति शैक्षिक अनुभवों क समूह पार्ठ्यक्रम कहलार्तार् है।

कनिंघम के अनुसार्र ‘‘पार्ठ्यक्रम कलार्कार (शिक्षक) के हार्थ में एक सार्धन है जिससे वह अपनी सार्मग्री (शिक्षाथी) को अपने आदर्श (उद्देश्य) के अनुसार्र अपनी चित्रशार्लार् (विद्यार्लय) में ढार्ल सके।’’

डीवी के अनुसार्र-’’सीखने क विषय यार् पार्ठ्यक्रम, पदाथो, विचार्रों और सिद्धार्ंतों क चित्रण है जो निरंतर उद्देश्यपूर्ण क्रियार्न्वेषण से सार्धन यार् बार्धार् के रूप में आ जार्ते हैं।’’

सैमुअल के अनुसार्र –’’पार्ठ्यक्रम में शिक्षाथी के वे समस्त अनुभव समार्हित होते हैं जिन्हें वह कक्षार्कक्ष मे, प्रयोगशार्लार् में, पुस्तकालय में, खेल में मैदार्न में, विद्यार्लय में सम्पन्न होने वार्ली अन्य पार्ठ्येतर क्रियार्ओं द्वार्रार् तथार् अपने अध्यार्पकों एवं सार्थियों के सार्थ विचार्रों के आदार्न-प्रदार्न के मार्ध्यम से प्रार्प्त करतार् है।’’

होर्नी के शब्दों में –’’पार्ठ्यक्रम वह है जो शिक्षाथी को पढ़ार्यार् जार्तार् ह। यह सीखने की क्रियार्ओं तथार् शार्न्तिपूर्वक अध्ययन करने से कहीं अधिक है। इसमें उद्योग, व्यवसार्य, ज्ञार्नोपाजन, अभ्यार्स तथार् क्रियार्यें सम्मिलित होती है। इस प्रकार यह विक्षाथी के स्नार्युमण्डल में होने वार्ले गतिवार्दी एवं संवेदनार्त्मक तत्वों को व्यक्त करतार् हैं समार्ज के क्षेत्र में यह उन सब की अभिव्यक्ति करतार् है जो कुछ जार्ति ने संसार्र के सम्पर्क में आने से किये हैं।’’

मार्ध्यमिक शिक्षार् आयोग के अनुसार्र –’’पार्ठ्यक्रम क अर्थ केवल उन सैद्धार्न्तिक विषयों से नहीं है जो विद्यार्लयों में परम्परार्गत रूप से पढ़ार्ये जार्ते हैं, बल्कि इसमें अनुभवों की वह सम्पूर्णतार् भी सम्मिलित होती है, जिनको विद्याथी विद्यार्लय, कक्षार्, पुस्तकालय, प्रयोगशार्लार्, कार्यशार्लार्, खेल के मैदार्न तथार् शिक्षक एवं छार्त्रों के अनेक अनौपचार्रिक सम्पर्को से प्रार्प्त करतार् है। इस प्रकार विद्यार्लय क सम्पूर्ण जीवन पार्ठ्यक्रम हो जार्तार् है जो छार्त्रों के जीवन के सभी पक्षों को प्रभार्वित करतार् है और उनके संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहार्यतार् देतार् है।

वेण्ट और क्रोनोबर्ग के अनुसार्र –’’पार्ठ्यक्रम क पार्ठ्यवस्तु क सुव्यवस्थित रूप है जो बार्लकों की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति हेतु तैयार्र कियार् जार्तार् है।’’

फ्रोबेल के मतार्नुसार्र –’’पार्ठ्यक्रम सम्पूर्ण मार्नव जार्ति के ज्ञार्न एवं अनुभव क प्रतिरूप होनार् चार्हिए।’’

पार्ठ्यक्रम की प्रकृति

शिक्षार् जीवनपर्यन्त चलने वार्ली प्रक्रियार् है, जिसके द्वार्रार् व्यक्ति के व्यवहार्र में निरंतर परिवर्तन एवं परिमाजन होतार् है। व्यक्ति के व्यवहार्र में यह परिवर्तन अनेक मार्ध्यमों से होते हैं, किन्तु मुख्य रूप से इन मार्ध्यमो को दो रूपों में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है – औपचार्रिक एवं अनौपचार्रिक। औपचार्ार्रिक रूप के अंतर्गत वे मार्ध्यम आते हैं जिनक नियोजन कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए व्यवस्थित ढंग से संस्थार्पित संस्थार्ओं में कियार् जार्तार् है। इस प्रकार की संस्थार्ओं को विद्यार्लय कहार् जार्तार् है, किन्तु व्यक्ति के परिवर्तन की प्रक्रियार् विद्यार्लय एवं विद्यार्लयी जीवन में ही पूर्ण नहीं हो पार्ती है, बल्कि वह विद्यार्लय से बार्हर तथार् जीवन भर चलती रहती है। अत: व्यक्ति के व्यवहार्र में होने वार्ले अनेक परिवर्तन विद्यार्लय की सीमार् से बार्हर की परिस्थितियों के परिणार्मस्वरूप होते हैं। चूँकि ऐसी परिस्थितियार्ँ सुनियोजित ढंग से प्रस्तुत नहीं की जार्ती हैं, अत: वे अनौपचार्रिक मार्ध्यम के अंतर्गत आती हैं। विद्यार्लय में विद्याथियों को जो कुछ भी कक्षार् एवं कक्षार् के बार्हर प्रदार्न कियार् जार्तार् है, उसक निश्चित उद्देश्य होतार् है एवं उसे किसी विशेष मार्ध्यम से ही पूरार् कियार् जार्तार् है। हमार्री कुछ संकल्पनार्यें होती हैं कि एक विशेष कक्षार् उत्तीर्ण 10 करने के बार्द विद्याथी के व्यवहार्र में अमुक परिवर्तन आ जार्येगार्, परन्तु यह परिवर्तन किस प्रकार लार्यार् जार्येगार्? किसके द्वार्रार् लार्यार् जार्येगार्? और कितनार् लार्यार् जार्येगार्? आदि ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिनक समार्धार्न पार्ठ्यक्रम जैसे सार्धन से प्रार्प्त होतार् है। अत: पार्ठ्यक्रम क संबंध शिक्षार् के अनौपचार्रिक मार्ध्यम से है।

पार्ठ्यक्रम क क्षेत्र

सार्मार्न्य बोलचार्ल की भार्षार्, में विद्यार्लयों में विद्याथियों को शिक्षित करने हेतु जो कुछ कियार्जार्तार् है, उसे पार्ठ्यक्रम के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। विभिन्न शिक्षार्शार्स्त्रियों ने पार्ठ्क्रम को कुछ निश्चित शब्दों में बार्ँधने अथवार् परिभार्षित करने क प्रयार्स भी कियार् है, किन्तु पार्ठ्यक्रम के विस्तार्र क्षे? की सीमार्यें सुनिश्चित कर पार्नार् अत्यन्त कठिन कार्य है। फिर भी कतिपय मार्नवीय शैक्षिक एवं सार्मार्जिक प्रवृत्तियों के आधार्र पर पार्ठ्यक्रम के विस्तार्र क्षेत्र की सीमार्ओं को चिन्हार्ंकित करने क प्रयार्स कियार् गयार् है।

यदि हम पार्ठ्यक्रम के इतिहार्स पर एक दृष्टि डार्लें तो स्पष्ट रूप से पतार् चलतार् है कि पार्ठ्यक्र के अंतर्गत सम्मिलित किये जार्ने वार्ले ज्ञार्न क स्वरूप एवं विस्तार्र अनिवाय रूप से संबन्धित समार्ज द्वार्रार् मार्न्य शैक्षिक उद्देश्यों पर निर्भर करतार् है। इसीलिए देश और काल की भिन्नतार्र के अनुसार्र वहार्ँ के पार्ठ्यक्रमों में भिन्नतार् भी पार्यी जार्ती है। भार्रतीय संदर्भ में यदि हम वैदिक काल की शिक्षार् पर दृष्टिपार्त करें तो पार्ते हैं कि वैदिक काल में भार्रतीय शिक्षार् के प्रमुख उद्देश्य ईश्वर भक्ति एवं धामिक भार्वनार् को दृढ़ करनार्, बार्लकों क चरित्र निर्मार्ण एवं उनके व्यक्तित्व क विकास करनार् तथार् सार्मार्जिक कुशलतार् में वृद्धि करनार् थार्। इस दृष्टि से उस समय क पार्ठ्यक्र भी अत्यन्त विस्तृत थार्। उसमें परार् विद्यार् अर्थार्त् धामिक सार्हित्य क अध्ययन तथार् अपरार् विद्य अर्थार्त् लौकिक एवं सार्ंसार्रिक ज्ञार्न दोनों क ही समार्वेश थार्। उस समय शिक्षार् कार्य गुरूकुलों में होतार् थार् तथार् शिक्षाथी पूरे शिक्षार्काल में गुरूकुल यार् गुरू-परिवार्र के समस्य के रूप में रहतार् थार्। वह गुरू से ज्ञार्न प्रार्प्त करने के सार्थ-सार्थ गुरू एवं गुरू-पत्नी की सेवार्, आश्रम की सफार्ई, पशुओं की देखभार्ल तथार् भिक्षार्टन के मार्ध्यम से कर्त्तव्यपार्लन, सेवार्भार्व, विनयशीलतार् तथार् अन्य चार्रित्रिक गुणों की शिक्षार् भी प्रार्प्त करतार् थार्। कभी-कभी शिक्षार् प्रार्प्त करने हेतु शिष्यों को देशार्टन पर भी जार्नार् पड़तार् थार्। इस प्रकार वैदिककालीन पार्ठ्यक्र में पठन-पार्ठन के सार्थ-सार्थ विद्याथियों को व्यार्वहार्रिक अनुभव प्रार्प्त करने के समुचित अवसर भी प्रार्प्त होते थे तथार् उसक सम्पार्दन भी अध्ययन कक्षों और समय के घण्टों में सीमित नहीं थार्।

इसी प्रकार यदि हम यूरोप के इतिहार्स क अध्ययन करें तो वहार्ँ के पार्ठ्यक्र के सीमार् क्षेत्र क आभार्स मिलतार् है। प्रार्चीन यूनार्न के नगर रार्ज्य स्पाटार् को प्रार्य: युद्धरत हरनार् पड़तार् थार्, अत: वहार्ँ पर बार्लकों के शार्रीरिक विकास एवं शस्त्र विद्यार् पर अधिक ध्यार्न दियार् जार्तार् रहार्, जबकि एथेन्स नगर रार्ज्य में शार्न्ति एवं स्थार्यित्व होने वे वहार्ँ पर सार्हित्य, दर्शन एवं ललित कलार्ओं को अधिक महत्त्व दियार् जार्तार् थार्। प्रार्रंभ में यूरोप और अमेरिक में भी शिक्षार् क उद्देश्य छार्त्रों को पढ़ार्ने, लिखने एवं सार्मार्न्य गणनार् कर सकने के योग्य बनार् देनार् मार्त्र थार्। अत: उस समय पार्ठ्यक्रम भी 3 R’s तक सीमित थार्। यह स्थिति एक लम्बी अवधि तक बनी भी रही, क्योंकि पार्श्चार्त्य देशों में भी पार्ठ्यक्रम के अंतर्गत उन्हीं प्रवृत्तियों क समार्वेश कियार् जार्तार् रहार् जो कक्षार् के अंदर पार्ठ पढ़ार्ते समय आयोजित की जार्ती थी। कालार्न्तर में भार्रत में भी अनेक रार्जनीतिक कारणों से पार्ठ्यक्रम क रूप पश्चिमी देशों जैसार् ही हो गयार् तथार् गुरूकुलों एवं आश्रमों के स्थार्न पर पार्ठशार्लार्ओं क उदय हुआ जिनक कार्य केवल पार्ठ पढ़ने-पढ़ार्ने तक ही सीमित रह गयार्। इस प्रकार पठन-पार्ठन से इतर प्रवृत्तियों को पार्ठशार्लार् के क्षेत्र से बार्हर की चीज मार्नार् जार्ने लगार्।

शिक्षार् के इतिहार्स से भी इस बार्त क पतार् चलतार् है कि समय के सार्थ-सार्थ पार्ठ्यक्रम में भी परिवर्तन होते रहे हैं तथार् इसमें कभी व्यार्पकतार् और कभी संकीर्णतार् भी आती रही है। इसक बहुत अच्छार् उदार्हरण खेलकूद प्रवृत्ति की धार्रणार् है। हमार्रे देश में अभी कुछ समय पहले तक अध्ययन एवं खेलकूद खेलकूद प्रवृत्ति को एक-दूसरे क विरोधी मार्नार् जार्तार् थार्, किन्तु बार्द में जब इसक आभार्स हुआ कि विद्यार्लयों से निकले हुए युवक वार्स्तविक जीवन में असफल भी हो रहे हैं तब यह धार्रणार् विकसित हुई कि जीवन की तैयार्री के लिए पढ़नार्-लिखनार् ही सब कुछ नहीं है।

मनोविज्ञार्न के विकास से भी बार्लकों की अन्य प्रवृत्तियों के समुचित विकास को महत्त्व मिलार् तथार् यह मार्नार् जार्ने लगार् कि केवल पठन-पार्ठन पर ही ध्यार्न देनार् बार्लकों के विकास की दृष्टि से एकांगी है। इस नवीन दृष्टिकोण क प्रभार्व विद्यार्लयों के कार्यक्रमों पर पड़ार् और उनमें व्यार्पकतार् विकसित हुई। अत: विद्यार्लयों में पार्ठ्य-विषयों के सार्थ-सार्थ ऐसी प्रवृत्तियों क समार्वेश भी कियार् जार्ने लगार् जिनसे बार्लकों में बौद्धिक ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ ऐसी प्रवृत्तियों क समार्वेश भी कियार् जार्ने लगार् जिनसे बार्लकों में बौद्धिक ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ स्वार्स्थ्य, सौन्दर्य-बोध, सृजनार्त्मकतार् तथार् अन्य महत्त्वपूर्ण गुणों क विकास भी हो सके।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पूर्व में पार्ठ्यक्रम की संकल्पनार् में परिवर्तन आते रहे हैं, किन्तु बीसवीं सदी के उत्तराद्ध से पार्ठ्यक्रम क क्षेत्र निरंतर व्यार्पकतार् की ओर बढ़ रहार् है तथार् इसके अंतर्गत विविध प्रवृत्तियों क समार्वेश होतार् चलार् जार् रहार् है। इसके क्षेत्र के विस्तार्र की गति वर्तमार्न समय में इतनी तेज है कि उसकी सीमार् को चिन्हार्ंकित करते ही उसमें कई अन्य प्रवृत्तियों क समार्वेश हो जार्तार् है। इसी स्थिति को देखकर बबिट महोदय ने कहार् भी है- ‘‘उच्चतर जीवन के लिए प्रतिदिन और चौबीसों घण्टे की जार् रही समस्त क्रियार्यें पार्ठ्यक्रम के अंतर्गत आ जार्ती हैं।’’

प्रार्रंभ में पार्ठ्यक्रम क सीमार्-क्षत्र विषयों की निर्धार्रित पार्ठ्यवस्तु तक ही सीमित थार् तथार् शिक्षार् क उद्देश्य सूचनार्त्मक ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् होतार् थार्, किन्तु बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में शैक्षिक मनोविज्ञार्न, शैक्षिक समार्जशार्स्त्र एवं शैक्षिक दर्शनशार्स्त्र आदि व्यवहार्र संबंधी विज्ञार्नों क तीव्र गति से विकास हुआ जिसक प्रभार्व पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण पर भी पड़ार्। सार्थ ही शिक्षण अधिगम के क्षेत्र में किये गये अनुसंधार्नों क भी पार्ठ्यक्रम के विकास पर महत्त्वपूर्ण प्रभार्व पड़ार्। पूर्व में यह धार्रणार् महत्त्वपूर्ण थी कि यदि शिक्षक अपने विषय ज्ञार्न क अच्छार् ज्ञार्तार् है तथार् विषयवस्तु पर उसक स्वार्मित्व है तो वह सफल शिक्षण भी कर सकतार् है तथार् वह ज्ञार्न बार्लकों को भी प्रदार्न कर सकतार् है, किन्तु यह धार्रणार् प्रार्य: गलत सिद्ध होती हुई देखी गयी। मनोवैज्ञार्निक अनुसंधार्नों से इस तथ्य की पुष्टि हो गयी है कि जब तक शिक्षाथी नवीन ज्ञार्न को प्रार्प्त करने के लिए मार्नसिक रूप से तैयार्र न हो, उसे कुछ भी सिखार्यार् नही जार् सकतार् है। सार्थ ही किसी नवीन ज्ञार्न को प्रार्प्त कर लेनार् ही बार्लक के लिए पर्यार्प्त नहीं होतार्। जब तक बार्लक उस नवीन ज्ञार्न को प्रार्प्त करने के लिए मार्नसिक रूप से तैयार्र न हो, उसे कुछ भी सिखार्यार् नहीं जार् सकतार् है। सार्थ ही किसी नवीन ज्ञार्न को प्रार्प्त कर लेनार् ही बार्लक के लिए पर्यार्प्त नहीं होतार् । जब तक बार्लक उस नवीन ज्ञार्न को आत्मसार्त् नहीं कर लेतार् तब तक व्यार्वहार्रिक दृष्टि से उसकी कोई उपयोगीतार् नहीं होती है। इस प्रकार विभिन्न शोधों के द्वार्रार् इस तथ्य की पुष्टि हो गयी कि अधिगम क परिपक्वतार् से संबंध होतार् है तथार् अधिगम में व्यक्तिगत भेदों एवं प्रत्यक्ष अनुभव की विशेष भूमिक होती है। इस दृष्टिकोण ने विद्यार्लयों के कार्यो में महत्वपूर्ण परिवर्तन लार् दियार्। अब विद्यार्लयों क कार्य बार्लको को ज्ञार्न देने के स्थार्न पर ऐसी स्थितियार्ँ प्रस्तुत करनार् मार्नार् जार्ने लगार् है जो बार्लकों को स्वार्नुभव द्वार्रार् ज्ञार्न प्रार्प्त करने में सहार्यक सिद्ध हो सकें। इस धार्रणार् के फलस्वरूप क्रियार् आधार्रित पार्ठ्यक्रम की सफल्पनार् प्रस्तुत की गयी, जिसमें पार्ठ्यवस्तु के महत्व को बनार्ये रखते हुए उसके चयन एवं क्रियार्न्वयन के आधार्र को परिवर्तित कर दियार् गयार्।

अनुभव एवं क्रियार् आधार्रित पार्ठ्यक्रम को सार्कार रूप देने की दिशार् में सर्वप्रथम प्रयार्स करने क श्रेय संयुक्त रार्ज्य अमेरिक के वर्जीनियार् रार्ज्य को है, जहार्ँ पर शिक्षार्विदों ने शिक्षार् के लक्ष्य को सूचनार्त्मक ज्ञार्न से हटार्कर ‘सम्पूर्ण व्यक्तित्व निर्मार्ण’ की और निर्देशित कियार्। इन शिक्षार्विदों ने दो प्रमुख प्रश्नों-बार्लक को किस प्रकार क व्यक्ति बननार् चार्हिए ? तथार् उसे सार्मार्जिक प्रार्णी होने के कारण किस प्रकार क व्यवहार्र करनार् चार्हिए ? के विस्तृत उत्तरो के आधार्र पर शिक्षार् के लक्ष्यों को निर्धार्रित कियार्। इन शिक्षार्विदों ने यह अनुभव कियार् कि शिक्षार् के निर्धार्रित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु समुचित परिवेश सार्मार्जिक जीवन के स्वार्भार्विक कार्यो को पूरार् करने में ही मिल सकतार् हैं अत: पार्ठ्यक्रम को ऐसे कार्यो पर आधार्रित करने क निश्चय कियार् गयार्, जिसके फलस्वरूप विषयवस्तु के रूप में प्रतिष्ठित पार्ठ्यक्रम क स्थार्न ऐसी अभिवृत्तियों, अवबोधनों, योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं आदि ने ले लियार् जो सार्मार्न्य सार्मार्जिक जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकें। इस प्रकार पार्ठ्यक्रम ‘पार्ठ्य-सार्मग्री की सूची के स्थार्न पर अधिगमार्नुभवों के रूप में परिभार्षित कियार् जार्ने लगार् और उसे इस संकल्पनार् के रूप में प्रतिष्ठार् भी प्रार्प्त हुई।

इस प्रकार वर्तमार्न समय में विद्यार्लय क कार्यक्षेत्र समयबद्ध पठन-पार्ठन के सीमित घेरे से निकलकर एक व्यार्पक रूप धार्रण कर चुक है तथार् इसमें निरंतर वृद्धि भी होती जार् रही है, जिसके कारण इसकी सीमार्यें निश्चित कर पार्नार् बहुत कठिन होतार् जार् रहार् है। चँूकि विद्यार्लयों में आयोजित की जार्ने वार्ली सभी प्रवृत्तियार्ँ पार्ठ्यक्रम क ही अंग होती है। अत: पार्ठ्यक्रम के विस्तार्र क्षेत्र क निर्धार्रण करनार् भी उतनार् ही कठिन कार्य है। फिर भी शिक्षार्विदों ने पार्ठ्यक्रम को उसके अन्तर्गत सम्पार्दित किये जार्ने वार्ले कार्यो के आधार्र पर सीमार्ंकित करने क प्रयार्स कियार् है।

मार्इकेल पेलाडी के अनुसार्र-’’सार्मार्न्यतयार् पार्ठ्यक्रम को विद्याथी के उन समस्त अनुभवों के रूप मे परिभार्षित कियार् जार्तार् है। जिनक दार्यित्व विद्यार्लय अपने उपर लेतार् है। इस रूप में पार्ठ्यक्रम क तार्त्पर्य प्रार्य: उन क्रमिक कार्यो से है जो इन अनुभवों से पूर्व इनके होने के सार्थ-सार्थ तथार् इन अनुभवों के बार्द आयोजित किये जार्ते है।’’ इन कार्यो को आठ वर्गो में समार्हित कियार् जार् सकतार् है-

  1. लक्ष्यों एवं उददेश्यों क निर्धार्रण,
  2. बार्लकों के संज्ञार्नार्त्मक विकास क पोषण,
  3. बार्लकों के मनोवैज्ञार्निकों एवं सार्मार्जिक स्वार्स्थ्य क संवर्धन,
  4. अधिगम हेतु व्यवस्थार्,
  5. शैक्षणिक स्त्रोतों क उपयोग,
  6. छार्त्रों क व्यक्तिगत बोध तथार् उनके अनुरूप शिक्षण व्यवस्थार्,
  7. समस्त कार्यक्रमों एवं बार्लकों के कार्यो क मूल्यार्ंकन,
  8. नवीन प्रवृत्तियों क सार्हचर्य

इन उपर्युक्त कार्यो को सम्पार्दित करने के लिए विद्यार्लयों में जिन प्र्रवृत्तियों क आयोजन कियार् जार्तार् है। उनके प्रकार एवं संख्यार् में बहुत विविधतार् पार्यी जार्ती है किन्तु व्यार्पक दृष्टिकोण के आधार्र पर इन्हे तीन प्रमुख वर्गो में वर्गीकृत कियार् जार्तार् है-

  1. शैक्षिण क्रियार्यें,
  2. पार्ठ्य-सहगार्मी क्रियार्यें,
  3. रूचि कार्य।

शैक्षिण प्रवृत्तियार्ँ अथवार् क्रियार्यें – 

यद्यपि विद्यार्लयों के समस्त क्रियार्कलार्पों के सार्थ-सार्थ शिक्षार् -क्षेत्र की सभी प्रवृत्तियार्ँ वे जहार्ँ भी, जिस रूप में भी चार्हे जब भी आयोजित की जार्ती हों, शैक्षिण ही होती है किन्तु सार्मार्न्य रूप से उन्हीं प्रवृत्तियों को शैक्षिण कहार् जार्तार् है। जिनक नियोजन कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु निर्धार्रित पार्ठ्य-विषयों के पठन-पार्ठन की दृष्टि से कियार् जार्तार् है। इन प्रवृत्तियों क आयोजन मुख्य रूप से व्यार्वहार्रिक ज्ञार्न अर्थार्त् प्रार्योगिक कार्यो क पार्ठ्यक्रम में समार्वेश होने तथार् नवीन शिक्षण विधियों द्वार्रार् बार्लकों की सक्रियतार् पर अधिक बल देने के फलस्वरूप प्रयोगशार्लार्यें, कार्यशार्लार्यें तथार् पुस्तकालय आदि शैक्षिण प्रवृत्तियों के कार्यस्थल बन गये है। इसके सार्थ ही अब अधिगम अनुभवों अर्थार्त् विद्याथियों द्वार्रार् वार्स्तविक परिस्थितियों में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञार्न प्रार्प्त करने पर भी अधिक बल दियार् जार्ने लगार् है। इस उददेश्य की पूर्ति हेतु विभिन्न भौगोलिक,वैज्ञार्निक,औद्योगिक,धामिक,ऐतिहार्सिक,व्यार्वसार्यिक एवं सार्ंस्कृतिक महत्व के स्थार्नों के भ्रमण एवं सर्वेक्षण आदि भी आयोजित किये जार्ते है। जहार्ँ पर छार्त्र जार्कर वार्स्तविक स्थितियों क प्रत्यक्ष अनुभव करते है। अत: इन्हें भी शैक्षिक प्रवृत्तियों में ही सम्मिलित कियार् जार्तार् है।

पार्ठ्य-सहगार्मी क्रियार्यें

प्रार्रम्भ में पार्ठ्यक्रम क क्षेत्र विभिन्न विषयों की पार्ठ्य-वार्स्तुओं के अध्ययन-अध्यार्पार्न तक ही सीमित मार्नार् जार्तार् थार्। विद्यार्लयों में आयोजित होने वार्ली अन्य प्रवृत्तियों जैसे- खेलकूद, व्यार्यार्म, सार्ंस्कृतिक क्रियार्कलार्प आदि को पार्ठ्येतर क्रियार्यें मार्नार् जार्तार् थार् परन्तु पार्ठ्यक्रम के व्यार्पक दृष्टिकोण के आधार्र पर अब इन प्रवृत्तियों को पार्ठ्य-सहगार्मी क्रियार्ओं के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। वर्तमार्न समय में विद्यार्लयों में शिक्षकों के निर्देशन में विभिन्न प्रकार की पार्ठ्य-सहगार्मी क्रियार्यें आयोजित की जार्ती है जिन्हें कुछ प्रमुख वर्गो में निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है-

  1. शार्रीरिक विकास संबंधी क्रियार्यें- इसके अन्तर्गेत शार्रीरिक प्रशिक्षण (पी.टी.) व्यार्यार्म, खेलकूद, टे्रकिंग, पर्वतार्रोहण, हार्इकिंग, तैरार्की, नौकायन आदि क्रियार्ओं के सार्थ-सार्थ स्वार्स्थ्य परीक्षण रोगों से बचने के उपार्य, शुद्धतार् एवं स्वच्छतार् क ध्यार्न, शुद्ध एवं पौष्टिक आहार्र (मध्यार्न्ह भोजन) आदि बार्तों को समार्हित कियार् जार्तार् है।
  2. सार्हित्यिक क्रियार्यें- इसके अन्तर्गत भार्षण कलार्, वार्द-विवार्द, विचार्र-गोष्ठी, कार्य-संगोष्ठी, कवितार्-पार्ठ, अन्त्यार्क्षरी, परिचर्चार्, वातार्, आशुभार्षण, पत्रिक प्रकाशन, लेखन, समार्चार्र एवं पत्रवार्चन तथार् पुस्तकालय एवं वार्चनार्लय के उपयोग आदि से संबंधित प्रवृत्तियों क समार्वेश कियार् जार्तार् है।
  3. सार्ंस्कृतिक क्रियार्यों- इसके अन्तर्गत एकल अभिनय, मूल अभिनय, नार्टक प्रहसन, संगीत, नृत्य एवं अन्य मनोरंजनार्त्मक क्रियार्यें सम्मिलित होती है।
  4. सृजनार्त्मक क्रियार्यें- इस वर्ग में बार्लकों की रचनार् संबंधी प्रवृत्तियों जैसे चित्रकारी, पच्चीकारी, दस्तकारी, बार्गवार्नी, उपयोगी वस्तुओं क निर्मार्ण एवं नवीनतार् की खोज आदि को समार्हित कियार् जार्तार् है।
  5. सार्मार्जिक क्रियार्यें- विद्यार्लयों द्वार्रार् बार्लकों के मार्ध्यम से सफार्ई अभियार्न सार्क्षरतार् क प्रसार्र स्वार्स्थ्य संबंधी जार्नकारियों क प्रचार्र सार्मार्जिक कुरीतियों एवं अंधविश्वार्सों को दूर करने के लिए प्रचार्र अभियार्न आदि को संचार्लित करनार् इसके अन्तर्गत आतार् है।
  6. रार्ष्ट्रीय क्रियार्कलार्प- इसके अन्तर्गत दिवसों एवं रार्ष्ट्रीय नेतार्ओं की जंयतियों को मनार्नार्, रार्ष्ट्रीय कैडेट कोर (एन.सी.सी.) स्काउटिंग, रेडक्रॉस, रार्ष्ट्रीय सेवार् योजनार् (एन.एस.एस.) आपार्तकाल में देश एवं समार्ज सेवार् तथार् आन्तरिक सुरक्षार् में सहयोग, सार्म्प्रदार्यिक सद्भव में सहयोग तथार् रार्ष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रचार्र-प्रसार्र में सहयोग आदि प्रवत्तियार्ँ आती हैं।

रूचि कार्य 

इसके अन्तर्गत वे प्रवृत्तियार्ँ आती है जिनक आयोजन विद्यार्लयों द्वार्रार् बार्लकों की रूचियों क समुचित विकास करने के उददेश्य से कियार् जार्तार् है। इस प्रकार की प्रवृत्तियों में विभिन्न वस्तुओं जैसे-टिकट, सिक्के, पत्थर आदि क संग्रह करनार्, चित्र एवं कार्टून बनार्नार्, फोटोग्रार्फी करनार्, बेकार पड़ी चीजों से उपयोगी वस्तुयें बनार्नार्, विभिन्न प्रकार के चित्रों के एलबम तैयार्र करनार् आदि शार्मिल है। यद्यपि विद्यार्लयों में आयोजित की जार्ने वार्ली प्रवृत्तियों को उपर्युक्त तीन वर्गो में विभार्जित करने क प्रयार्स कियार् गयार् है। किन्तु सही मार्यने में न तो इन प्रवृत्तियों की पूर्ण सूची तैयार्र की जार् सकती है और न ही उन्हें निश्चित रूप से किसी एक वर्ग में रखार् ही जार् सकतार् है।

उदार्हरणाथ- वार्द-विवार्द, परिचर्चार्, पैनल चर्चार् आदि प्रवृत्तियों को पार्ठ्य-सहगार्मी प्रवृत्तियों के अन्तर्गत सार्हित्यिक प्रवृत्तियों में सम्मिलित कियार् जार्तार् है किन्तु यदि इन्हीं प्रवृत्तियों को निर्धार्रित पार्ठ्यक्रम के किसी प्रकरण के अध्ययन-अध्यार्पन की विधि के रूप में प्रयोग कियार् जार्तार् है। तब यही शैक्षिक प्रवृत्तियार्ँ हो जार्ती है। इसी प्रकार व्यवस्थार् परिवर्तन के फलस्वरूप भी इनमें परिवर्तन होतार् रहतार् है। उदार्हरणाथ- खेल पार्ठ्य-सहगार्मी प्रवृत्तियों के अन्तर्गत आतार् है, किन्तु कुछ रार्ज्यों ने इसे अब एक अनिवाय विषय के रूप में पार्ठ्यक्रम में एक निश्चित स्थार्न प्रदार्न कियार् है। अत: अब यह शैक्षिक प्रवृत्तियों में सम्मिलित हो गयार् है।

वार्स्तव में पार्ठ्यक्रम के विकास क इतिहार्स मार्नव जीवन के विकास की प्रक्रियार् क ही परिणार्म है। मार्नव द्वार्रार् प्रकृति पर विजय प्रार्प्त करने क अभियार्न, नवीन खोज एवं आविष्कार, निरन्तर परिवर्तित होने वार्ली सार्मार्जिक-आर्थिक परिस्थितियार्ँ, ज्ञार्न क विस्फोट तथार् विभिन्न रार्जनैतिक विचार्रधार्रार्ओं आदि के द्वार्रार् मार्नव को सदैव नई चुनौतियों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। इन चुनौतियों क सफलतार्पूर्वक समार्धार्न निकालने के लिए मार्नव को अपनी वर्तमार्न अवस्थार् में यथोचित परिवर्तन-परिवर्द्धन करते रहनार् पड़तार् है। समार्ज क भी यह प्रयार्स रहतार् है। कि वह बार्लकों को जीवन में ठीक प्रकार से समार्योजित हो सकने हेतु उपयुक्त शिक्षार् की व्यवस्थार् कर सके। अत: तदनुसार्र शिक्षार् के उद्देश्यों एवं पार्ठ्यक्रम में उपयुक्त परिवर्तन एवं परिवर्द्धन की प्रक्रियार् चलती रहती है। उदार्हरणाथ, प्रजार्तार्न्त्रिक शार्सन प्रणार्ली की स्थार्पनार् के परिणार्मस्वरूप विभिन्न देशों में नार्गरिकतार् की शिक्षार् की आवश्यकतार् उत्पन्न हुई। औद्योगिक प्रगति के कारण बढ़ती हुई दुर्घटनार्ओं से बचार्व हेतु पार्ठ्यक्रम में सुरक्षार् शिक्षार् तथार् मार्लिक-मजदूर के झगड़ों के निरार्करण हेतु पार्ठ्यक्रमों में समार्जवार्दी दृष्टिकोण क समार्वेश कियार् गयार्। वैज्ञार्निक प्रगति तथार् आवार्गमन के सार्धनों के विकास के फलस्वरूप विभिन्न देशों को एक दूसरे के नजदीक जार्ने क अवसर प्रार्प्त हुआ, उन्हें एक-दूसरे के भूभार्गों एवं वैभव-सम्पन्नतार् की जार्नकारी प्रार्प्त हुई। अत: विकसित देशों ने दूसरे छोटे देशों एवं रार्ज्यों को अपने अधिकार में करने तथार् उपनिवेश स्थार्पित करने प्रार्रम्भ किये, जिसके कारण छोटी-छोटी लडार्इयों के सार्थ-सार्थ दो विश्वयुद्धों से भी विश्व मार्नव जार्ति को गुजरनार् पड़ार्। इसके समार्धार्न हेतु अन्तर्रार्ष्ट्रीय सद्भार्व एवं विश्व शार्ंति स्थार्पित करने के प्रयार्स किये जार्ने लगे। परिणार्मस्वरूप पार्ठ्यक्रमों में रार्ष्ट्रीय एवं भार्वार्त्मक एकतार् तथार् नार्गरिकतार् की शिक्षार् के सार्थ-सार्थ अन्तर्रार्ष्ट्रीय सद्भार्व एवं विश्व-बन्धुत्व की शिक्षार् क भी समार्वेश कियार् गयार्।

पार्ठयक्रम के क्षेत्र विस्तार्र के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बार्त यह भी है कि प्रार्रम्भ में शिक्षार् समार्ज के अभिजार्त्य वर्ग तक ही सीमित थी। इस वर्ग को जीविकोपाजन की कोई चिंतार् नहीं होती थी तथार् वह अपने बार्लकों को अपने वर्गीय हितों को ध्यार्न में रखते हुए ही शिक्षार् प्रदार्न करने क प्रयार्स करतार् रहार्। इसके फलस्वरूप पार्ठ्यक्रम भार्षार्, सार्हित्य, इतिहार्स, ललित कलार्ओं तथार् सार्मार्न्य शिष्टार्चार्र तक ही सीमित थार् किन्तु शिक्षार् क प्रसार्र धीरे-धीरे मध्यम एवं निम्न वर्ग तक हो गयार्। इस मध्यम वर्ग को अपनी रोजी-रोटी कमार्ने हेतु व्यवसार्य की अधिक चिन्तार् रहती थी। अत: पार्ठ्यक्रम में बौद्धिक ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ व्यार्वसार्यिक विषयों क समार्वेश भी कर दियार् गयार्। अठार्रहवीं शतार्ब्दी में यूरोप की औद्योगिक क्रार्ंति ने पार्ठ्यक्रम मे अधिक से अधिक वैज्ञार्निक एवं औद्योगिक विषयों को सम्मिलित करने के लिए सभी को बार्ध्य कर दियार्। बार्द में व्यवसार्यों की संख्यार् बहुत अधिक बढ़ जार्ने के कारण व्यवसार्य विशेष में विशिष्टतार् प्रार्प्त करने की होड़ में अनुकूल विषय के चयन की आवश्यकतार् अनुभव की जार्ने लगी। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु पार्ठ्यक्रम में विभिन्न विकल्पों एवं धार्रार्ओं की व्यवस्थार् की गयी। छार्त्र अपनी योग्यतार्ओं,क्षमतार्ओं एवं अभिरूचियों के अनुसार्र सही विषय को चुन सकें, इसके लिए निर्देशन एवं परार्मर्श कार्यक्रम को भी पार्ठ्यक्रम में सम्मिलित कियार् गयार्। चूँकि बार्लक को व्यार्वसार्यिक जीवन के सार्थ-सार्थ पार्रिवार्रिक, सार्मार्जिक एवं वैयक्तिक जीवन में भी समुचित समार्योजन की आवश्यकतार् होती है। अत: निर्देशन एवं परार्मर्श क कार्यक्षेत्र व्यार्वसार्यिक के सार्थ सार्थ वैयक्तिक क्षेत्र तक फैल गयार्। तथार् इससे सम्बन्धित विषयों जैसे-अवकाश के शिक्षार् यौन शिक्षार् आदि को पार्ठ्यक्रम क अंग मार्नार् जार्नो लगार्। इसी प्रकार वर्तमार्न युग में जनसंख्यार् वृद्धि,महार्नगरों को घनी आबार्दी एवं गन्दी बस्तियों आदि के कारण मार्नव को विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के खतरे क सार्मनार् करनार् पड़ रहार् है जिससे अनेक प्रकार की बीमार्रियार्ँ उत्पन्न हो रही है। अत: अब पार्ठ्यक्रम में जनसंख्यार् शिक्षार्, स्वार्स्थ शिक्षार् एवं पर्यार्वरण शिक्षार् को स्थार्न देनार् अनिवाय होतार् जार् रहार् है। इसके सार्थ ही आधुनिक युग अन्तरिक्ष युग एवं कम्प्यूटर युग के रूप में विकसित हो रहार् है। अत: अब पार्ठ्यक्रम में अन्तरिक्ष सम्बन्धी ज्ञार्न तथार् कम्प्यूटर सम्बन्धी ज्ञार्न क अधिक से अधिक समार्वेश करने में काफी तत्परतार् से प्रयार्स किये जार् रहे है। परिणार्मस्वरूप नित्य नये विषयों के नार्म सुनने में आ रहे है। इस प्रकार हम देखते है कि मार्नव जीवन से सम्बन्धित हर एक पक्ष क पार्ठ्यक्रम पर प्रत्यक्ष प्रभार्व पड़तार् है अर्थार्त पार्ठ्यक्रम में संशोधन एवं संवर्धन की प्रक्रियार् तब तक चलती रहेगी जब तक मार्नव क अस्तित्व है।

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