परीक्षण मार्नक क अर्थ एवं महत्व

शिक्षार्, मनोविज्ञार्न व समार्जशार्स्त्र के अधिकांश चरों की प्रकृति अपरोक्ष होती है जिसके कारण उनके मार्पन की किसी एक सर्वस्वीकृत मार्नक र्इकार्इ क होनार् सम्भव नही हो सकतार् है। ऐसी परिस्थितियों में प्रार्प्तार्ंकों को अर्थयुक्त बनार्ने यार् उसकी व्यार्ख्यार् करने की समस्यार् उत्पन्न होती है। इसके लिए परीक्षण निर्मार्तार् कुछ ऐसे सन्दर्भ बिन्दु निर्धार्रित करतार् है जिनके आधार्र पर प्रार्प्तार्ंकों की व्यार्ख्यार् की जार् सके। इन सन्दर्भ बिन्दुओं को मार्नक कहते है।

अत: परीक्षण मार्नक वे सन्दर्भ बिन्दु है जिनकी सहार्यतार् से यार् जिनसे तुलनार् करके परीक्षण पर प्रार्प्त अंकों की व्यार्ख्यार् की जार् सकती हो। क्योंकि मार्नकों के अभार्व में परीक्षण से प्रार्प्त परिणार्मों की व्यार्ख्यार् नही की जार् सकती है इसलिए परीक्षण मार्नकीकरण (प्रमार्पीकरण) की प्रक्रियार् में मार्नक निर्धार्रण क कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण स्वीकार कियार् जार्तार् है। स्टेनली तथार् हार्पे किन्स के अनुसार्र- ‘‘मार्नक छार्त्रों के बडे़ समूहों की निष्पार्दनतार् के आधार्र पर प्रार्प्तार्ंकों क किसी अधिक साथक पैमार्ने पर प्रत्यार्वर्तनों को प्रतिपार्दित करनार् मार्त्र है।’’

  1. एनेस्तसी (Anastasi) के अनुसार्र- ‘‘किसी परीक्षण के मार्नक वार्स्तव में किसी प्रतिनिधि समूह के द्वार्रार् उस परीक्षण पर प्रार्प्त अंकों क संक्षिप्त रूप होतार् है।’’
  2. र्इबिल (Ebel) के अनुसार्र- ‘‘किसी परीक्षण के मार्नक बतार्ते है कि किसी विशेष सन्दर्भ समूह के सदस्य परीक्षण पर किस प्रकार से अंक प्रार्प्त करते है।’’
  3. रैमर्स गेज तथार् रुमेल (Remmers, Gage and Rummel) के अनुसार्र-‘‘मार्नक छार्त्रों के किसी परिभार्षित समूह के द्वार्रार् परीक्षण पर प्रार्प्त निष्पार्दन स्तर है।’’

मार्नक के प्रकार

मार्नक कर्इ प्रकार के होते है। मनोवैज्ञार्निक परीक्षण में व्यक्ति के प्रार्प्तार्ंकों की व्यार्ख्यार् करने के लिए मुख्य रूप से चार्र प्रकार के मार्नकों क प्रयोग कियार् जार्तार् है- 1. आयु मार्नक 2. कक्षार् मार्नक 3. शंतार्शीय मार्नक 4. मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंक मार्नक।

(1) आयु मार्नक – 

पार््रय: ऐसे परीक्षणों में जहार्ँ आयु के कारण परिवर्तन दिखाइ पड़तार् है, वहार्ँ आयु मार्नक निर्धार्रित कियार् जार्तार् है। किसी परीक्षण के आयु मार्नकों क अभिप्रार्य विभिन्न आयु वर्ग के व्यक्तियों के द्वार्रार् अर्जित प्रार्प्तार्ंकों के औसत से है। आयु मार्नक को ज्ञार्त करने के लिए परीक्षण को उस आयु वर्ग के प्रतिदर्श समूह पर प्रशार्सित कियार् जार्तार् है तथार् परीक्षण में उस आयु वर्ग के प्रतिदर्श समूह के छार्त्रों द्वार्रार् अर्जित प्रार्प्तार्ंकों क औसत ज्ञार्त करके ‘मार्नक’ ज्ञार्त कर लियार् जार्तार् है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न आयु वर्ग के प्रतिनिधि समूहों क अलग-अलग औसत प्रार्प्तार्ंक की गणनार् करके आयु मार्नक निर्धार्रित किये जार्ते है। उदार्हरणाथ यदि 12 वर्ष आयु वार्ले लड़कों क प्रतिनिधि समूह (प्रतिदर्श) लेकर उनकी ऊँचार्इयार्ं मार्प ले तथार् उसकी औसत ऊँचाइ ज्ञार्त कर ले तो हम कह सकते है कि यह औसत ऊँचाइ 12 वर्ष आयु के लड़कों क मार्नक निर्धार्रित करती है। इसी प्रकार 7, 8, 9, 10, 11,, 13, 14 वर्ष आदि आयु के लड़कों की औसत ऊँचाइ ज्ञार्त की जार् सकती है अत: प्रत्येक आयु वर्ग के लड़कों की औसत ऊँचाइ यार् मार्नक निर्धार्रित करने के बार्द किसी भी लड़के की ऊँचाइ के विषय में व्यार्ख्यार् की जार्ती है। मार्न लियार् एक लड़के की आयु 9 वर्ष है परन्तु उसकी ऊँचाइ 13 वर्ष के लड़कों की औसत ऊँचाइ के बरार्बर है तो उसे अधिक ऊँचाइ वार्लार् लड़क कहार् जार्येगार्। अत: किसी छार्त्र द्वार्रार् किसी परीक्षण में प्रार्प्त अंकों की व्यार्ख्यार् करने के लिए उस छार्त्र की आयु-वर्ग के मार्नक (औसत प्रार्प्तार्ंक) से की जार्ती है। एनेस्तसी के शब्दो में ‘‘प्रत्येक आयु वर्ग के बार्लकों के प्रतिनिधि समूह द्वार्रार् अर्जित प्रार्प्तार्ंकों के औसत मार्न किसी परीक्षण के आयु मार्नकों क निर्धार्रण करते है।’’ प्रार्य: सभी बुद्धि परीक्षणों में आयु मार्नकों को मार्नसिक आयु के रूप में तथार् उपलब्धि परीक्षणों में शैक्षिक आयु के रूप में व्यक्त कियार् जार्तार् है।

आयु मार्नकों क उपयोग-

  1. आयु के सार्थ परिवर्तित होने वार्ले गुणों के सन्दर्भ में आयु मार्नक अधिक उपयोगी होते है। जैसे ऊँचाइ, वजन, मार्नसिक योग्यतार्, शैक्षिक उपलब्धि आदि के मार्पन के लिए आयु मार्नकों क प्रयोग कियार् जार्तार् है 
  2. कम आयु के बच्चों अर्थार्त् प्रार्रम्भिक अवस्थार् में बार्लकों में गुणों एवं विशेषतार्ओं में तीव्र गति से परिवर्तन होतार् है इसलिए इस अवस्थार् में मार्पन हेतु आयु मार्नकों क उपयोग कियार् जार्तार् है।

(2) कक्षार् मार्नक – 

कक्षार् मार्नक, आयु मार्नक की तरह क दूसरार् प्रत्यय है। जिस प्रकार आयु मार्नकों को ज्ञार्त करने के लिए विभिन्न आयु वर्ग के प्रतिदर्शो (प्रतिनिधि समूहों) के छार्त्रों के प्रार्प्तार्ंकों क औसत ज्ञार्त कियार् जार्तार् है, उसी प्रकार कक्षार् मार्नक ज्ञार्त करने के लिए विभिन्न कक्षार्ओं के प्रतिनिधि समूह (प्रतिदर्श) छार्त्रों के प्रार्प्तार्ंकों क औसत ज्ञार्त कियार् जार्तार् है।

विभिन्न कक्षार्ओं के प्रतिनिधि समूहों के औसत प्रार्प्तार्ंक ही कक्षार् मार्नक कहे जार्ते है। यदि किसी मनोवैज्ञार्निक परीक्षण क कक्षार् मार्नक निर्धार्रित करनार् है तो इसके लिए विद्यार्लय की विभिन्न कक्षार्ओं जैसे छठी, सार्तवी, आठवी, नौवी, दसवी आदि के प्रतिनिधि समूहों पर अलग-अलग उस परीक्षण क प्रशार्सन करेगे और प्रत्येक कक्षार् के प्रतिनिधि समूहों (छार्त्रों) के प्रार्प्तार्ंकों क औसत ज्ञार्त कर लियार् जार्तार् है। यही औसत प्रार्प्तार्ंक उस परीक्षण के कक्षार् मार्नक कहलार्ते है। इस कक्षार् मार्नकों को आधार्र यार् सन्दर्भ बिन्दु मार्नकर विभिन्न कक्षार् के किसी भी छार्त्र द्वार्रार् अर्जित अंक की व्यार्ख्यार् की जार् सकती है। जैसे यदि कोर्इ पार्ँचवीं कक्षार् क छार्त्र छठी कक्षार् के लिए निर्धार्रित मार्नक के बरार्बर अंक प्रार्प्त करतार् है तो वह श्रेष्ठ बार्लक कहार् जार्येगार्। इसके विपरीत यदि कोर्इ दसवी कक्षार् क बार्लक मार्त्र सार्तवीं कक्षार् के मार्नक (औसत अंक) के बरार्बर अंक प्रार्प्त करतार् है, तो उसे निम्न स्तर क बार्लक समझार् जार्येगार्।

कक्षार् मार्नक क उपयोग-

  1. इनक प्रयोग मुख्य रूप से विषयों की निष्पत्ति परीक्षणों में कियार् जार्तार् है। 
  2. प्रार्रम्भिक कक्षार्ओं के लिए कक्षार् मार्नकों की उपयोगितार् अधिक होती है क्योंकि छोटी कक्षार्ओं में बार्लकों की शैक्षिक प्रगति अपेक्षार्कृत अक्षिार्क होती है। 
  3. विद्यार्लय के प्रधार्नार्चाय तथार् अध्यार्पकगण कक्षार् मार्नकों की सहार्यतार् से छार्त्रों के द्वार्रार् प्रार्प्त अंकों की व्यार्ख्यार् कर लेते है। इससे छार्त्रों को योग्यतार्नुसार्र विभिन्न वर्गो में विभक्त कियार् जार् सकतार् है। 
  4. किसी विषय के उपलब्धि परीक्षण में छार्त्र द्वार्रार् अर्जित प्रार्प्तार्ंक की कक्षार् मार्नकों से तुलनार् करने पर अध्यार्पक को इस बार्त क संकेत मिलतार् है कि छार्त्र उक्त विषय में किस प्रकार प्रगति यार् उन्नति कर रहार् है। 
  5. इन मार्नकों से यह भी पतार् लगतार् है कि कक्षार् क कोर्इ छार्त्र किस सीमार् तक एक निश्चित स्तर क कार्य कर सकतार् है। 

(3) शंतार्शीय मार्नक – 

किसी व्यक्ति यार् छार्त्र की स्वयं की आयु समूह एवं कक्षार् समूह में तुलनार् करने के लिए हम शतार्ंशीय मार्न की गणनार् करते है। इसक अर्थ यह है कि शतार्ंशीय मार्नक की सहार्यतार् से व्यक्ति की तुलनार् यार् स्थिति उस समूह में ज्ञार्त करते है जिसक वह सदस्य होतार् है। शतार्ंशीय मार्नकों क तार्त्पर्य परीक्षण में छार्त्रों के किसी प्रतिनिधि समूह (प्रतिदर्श) के द्वार्रार् प्रार्प्त अंकों के विभिन्न शतार्ंशों से है। कोर्इ शतार्ंश वह बिन्दु होतार् है जिसके नीचे दिए गए प्रतिशत छार्त्र अंक प्रार्प्त करते है। जैसे P10 वह बिन्दु है, जिसके नीचे 10% छार्त्र अंक प्रार्प्त करते है। ‘‘शतार्ंशीय मार्न एक ऐसार् बिन्दु है जिसके नीचे किसी वितरण (समूह) क एक निश्चित प्रतिशत होतार् है।’’ शतार्ंशीय मार्न 99 होते है, परन्तु सुविधार् के लिए कुछ चुने हुए शतार्ंशें जैसे P10, P20, P30, P40, P50, P60, P70, P80, P90 आदि को ज्ञार्त करते है। समूह के किसी व्यक्ति क परीक्षण में प्रार्प्तार्ंक ज्ञार्त होने पर उसकी समूह में स्थिति ज्ञार्त करने के लिए शतार्ंशीय क्रम ज्ञार्त करते है।

शतार्ंशीय मार्नक क उपयोग-

  1. शतार्ंशीय मार्नक क प्रयोग वहार्ँ विशेष रूप से कियार् जार्तार् है, जहार्ँ आयु के सार्थ गुण यार् विशेषतार् में परिवर्तन नही होतार् है, जैसे बुद्धि परीक्षण, अभिरूचि परीक्षण, अभिवश्त्ति तथार् व्यक्तित्व परीक्षण आदि के लिए शंतार्शीय मार्नक क प्रयोग कियार् जार्तार् है। 
  2. शतार्ंशीय क्रम क प्रयोग बार्लक की समूह में स्थिति ज्ञार्त करने के लिए कियार् जार्तार् है।
  3. शतार्ंशीय मार्नकों क प्रयोग सभी मनोवैज्ञार्निक एवं शैक्षणिक परीक्षणों में कियार् जार्तार् है। चूंकि उनक प्रयोग एक ही सार्मार्न्य समूह के समस्त व्यक्तियों पर कियार् जार्तार् हैं इसलिए इसके सम्बन्ध में कहार् जार् सकतार् कि ‘‘शतार्ंशीय मार्नक किसी विशेष समूह में व्यक्ति के प्रार्प्तार्ंक क विवेचन हेतु आधार्र प्रस्तुत करतार् है।’’ 
  4. विभिन्न समूह के व्यक्तियों के बीच तुलनार् करने के लिए शतार्ंशीय मार्नक क प्रयोग कियार् जार्तार् है।
  5. मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंक मार्नक (Standardisedscore Norms) विभिन्न प्रकार के मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंकों क प्रयोग भी मार्नक की तरह कियार् जार् सकतार् हैं। मूल प्रार्प्तार्ंकों (row scores) को अर्थपूर्ण बनार्ने के लिए इन्हें किसी मार्नक अथवार् प्रतिमार्न सन्दर्भित प्रार्प्तार्ंक में रूपार्न्तरित कियार् जार्तार् है। इन्हें व्युत्पन्न प्रार्प्तार्ंक भी कहते है। मूल प्रार्प्तार्ंकों को मध्यमार्न तथार् मार्नक विचलन (S.D.) की सहार्यतार् से मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंकों में परिवर्तित कियार् जार्तार् है।

‘‘मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंक किसी व्यक्ति की मध्यमार्न से प्रार्मणिक विचलन की इकार्इ में विचलन यार् दूरी को व्यक्त करतार् है।’’मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंक एक प्रकार के व्युत्पन्न प्रार्प्तार्ंक ही होते है। मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंक निम्नलिखित प्रकार के होते है-

  1. Z प्रार्प्तार्ंक (z-scores)
  2. टी- प्रार्प्तार्ंक (T-scores)
  3. स्टेन-प्रार्प्तार्ंक (Sten-scores)
  4. स्टेनार्इन-प्रार्प्तार्ंक (Stanine-scores)

मार्नकीकृति प्रार्प्तार्ंक क उपयोग-

  1. मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंकों की सहार्यतार् से किसी परीक्षण में व्यक्ति द्वार्रार् प्रार्प्त अंक की व्यार्ख्यार् अर्थपूर्ण ढंग से की जार् सकती है।
  2. मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंकों द्वार्रार् दो समूहों के छार्त्रों के निष्पार्दन क्षमतार् की तुलनार् आसार्नी से की जार् सकती है।

(1) Z प्रार्प्तार्ंक (Z-Scores): Z प्रार्प्तार्ंक, पार््रमणिक मार्पको (Standard Scores) क एक प्रकार है, जो यह इंगित करतार् है कि प्रार्प्त किये गये मूल प्रार्प्तार्ंक उस वितरण के मध्यमार्न (Mean) से कितने मार्नक विचलन (S.D) विचलित होते है।

Z प्रार्प्तार्ंक यो प्रार्प्तार्ंक व्यक्ति क यह प्रार्प्तार्ंक हैं, जिसे मूल प्रार्प्तार्ंक में से समूह (वितरण) के मध्यमार्न को घटार्कर व्यक्ति क विचलन प्रार्प्तार्ंक ज्ञार्त कर लियार् जार्तार् है। फिर विचलन प्रार्प्तार्ंक में मार्नक विचलन (S.D.) क भार्ग देकर Z प्रार्प्तार्ंक यार् सिगमार् प्रार्प्तार्ंक ज्ञार्त कियार् जार्तार् है।’’ यदि किसी छार्त्र क Z प्रार्प्तार्ंक शून्य है तो इससे यह संकेत प्रार्प्त होतार् है कि छार्त्र के मूल प्रार्प्तार्ंक क मार्न समूह (वितरण) के मध्यमार्न के बरार्बर है। ऋणार्त्मक Z प्रार्प्तार्ंक से संकेत मिलतार् है कि छार्त्र क मूल प्रार्प्तार्ंक मध्यमार्न से नीचे है तथार् धनार्त्मक Z प्रार्प्तार्ंक से स्पष्ट होतार् है कि छार्त्र क मूल प्रार्प्तार्ंक मध्यमार्न से ऊपर है। Z प्रार्प्तार्ंक क मध्यमार्न 0 तथार् विचलन होतार् है।

                    X-M 
Z प्रार्प्तार्ंक =—————-
                       σ

जिसमें Z = एक प्रार्मणिक मार्प, X = किसी छार्त्र क प्रार्प्तार्ंक M = वितरण (समूह) क मध्यमार्न, s = वितरण यार् समूह क मार्नक विचलन।

(2) टी- प्रार्प्तार्ंक (T-Score): Z प्रार्प्तार्ंक पार््र य: दशमल चिन्हों तथार् ऋणार्त्मक चिन्हों के सार्थ होते है जिसके कारण विभिन्न परीक्षार्ओं की तुलनार् करने में असुविधार् होती है। ऐसी स्थिति में प्रतिमार्न प्रार्प्तार्ंक (Standardscore) के दूसरे रूप ज् प्रार्प्तार्ंक क प्रयोग कियार् जार्तार् है। ज् प्रार्प्तार्ंक के प्रयोग क सुझार्व सर्वप्रथम मेक्कॉल ने दियार् थार्। T प्रार्प्तार्ंक के प्रतिमार्न सार्मार्न्यीकृत प्रार्प्तार्ंक है जिनक मार्पनी पर मध् यमार्न 50 तथार् मार्नक विचलन 10 है।T प्रार्प्तार्ंकों क प्रयोग प्रार्य: प्रयोज्य के प्रार्प्तार्ंकों की तुलनार् करने के लिए कियार् जार्तार् है। T प्रार्प्तार्ंक (T-Score) ज्ञार्त करने के लिए निम्न सूत्र क प्रयोग कियार् जार्तार् है।

                     10 (x -M) 
T – प्रार्प्तार्ंक 50 +________ 
                           σ

जहार्ँ- X = प्रयोज्य यार् व्यक्ति क मूल प्रार्प्तार्ंक M = समूह के मूल प्रार्प्तार्ंकों क मध्यमार्न s = समूह के मूल प्रार्प्तार्ंकोंक मार्नक-विचलन

(3) स्टेन प्रार्प्तार्ंक (Sten Score)- मलू प्रार्प्तार्ंकों को स्टने प्रार्प्तार्ंकों में रूपार्न्तरित करने क पहलार् प्रयार्स आर.बी. कैटिल ने कियार्। यह एक मुख्य प्रतिमार्न प्रार्प्तार्ंक है जिसे स्टेन प्रार्प्तार्ंक कहते है। वार्स्तव में व्यक्ति के मूल प्रार्प्तार्ंक को 1 से 10 तक के प्रार्प्तार्ंक में रूपार्न्तरित कर दियार् जार्तार् है इसलिए इसे स्टेन प्रार्प्तार्ंक कहार् जार्तार् है। स्टेन मार्पनी पर औसत प्रार्प्तार्ंक 5. 5 होतार् है। प्रसार्र के औसत मूल प्रार्प्तार्ंकों को 4,5,6 एवं 7 बिन्दुओं यार् प्रार्प्तार्ंकों पर अधिक प्रार्प्तार्ंकों को 8,9,10 तथार् कम प्रार्प्तार्ंकों को 1,2,3 बिन्दुओं पर अंकित यार् व्यक्त कियार् जार्तार् है। इन प्रार्प्तार्ंकों के विषय में कहार् जार्तार् है- ‘‘स्टेन प्रार्प्तार्ंक वे प्रतिमार्न सार्मार्न्यीकृत प्रार्प्तार्ंक है जिनक मध्यमार्न 5. 5 तथार् मार्नक विचलन 2 होतार् है।

(4) स्टेनार्इन प्रार्प्तार्ंक (Stanine Scores)- परीक्षण प्रार्प्तार्ंकों को सुगमतार् से व्यक्त करने तथार् व्यार्ख्यार् की सुविधार् के लिए स्टेनार्इन प्रार्प्तार्ंकों क प्रयोग कियार् जार्तार् है। मूल प्रार्प्तार्ंकों को स्टेनार्इन प्रार्प्तार्ंकों में रूपार्न्तरित करने से परीक्षण के प्रार्प्तार्ंकों की व्यार्ख्यार् करनार् आसार्न हो जार्तार् है। स्टेनार्इन क प्रसार्र 1 से 9 तक होतार् है तथार् जिसक औसत 5 होतार् है। दूसरे शब्दों में स्टेनार्इन मार्पनी नौ बिन्दु वार्ली मार्नकीकृत मार्पनी है अर्थार्त जब किसी समूह के ‘प्रार्प्तार्ंकों को विभिन्न स्तरों के लिए व्यक्त करनार् होतार् है तो उन स्तरों को स्टेनार्इन के रूप में व्यक्त करते है, जिसक अर्थ हुआ सभी प्रार्प्तार्ंकों को नौ स्तरों में विभार्जित करनार्। स्टेनार्इन प्रार्प्तार्ंक 1 से 9 तक सार्मार्न्य सम्भार्व्य वक्र की तरह फैले होते है।

परीक्षण मार्नक

स्टेनार्इन स्केल जिसमें हर स्टेनार्इन के प्रतिशत अंक दर्शार्ये गये है।

अच्छे मार्नक की विशेषतार्एं

परीक्षण पर प्रार्प्त अंकों की व्यार्ख्यार् मार्नकों की सहार्यतार् से की जार्ती है। किसी भी परीक्षण के मार्नकों में चार्र विशेषतार्यें होनी चार्हिए। जो निम्न है

  1. नवीनतार् (Recency)- नवीनतार् से तार्त्पर्य है कि मार्नक अनेक वर्षो पूर्व तैयार्र किये हुए नही होने चार्हिए। समय के सार्थ छार्त्रों की योग्यतार् तथार् वितरण में परिवर्तन हो सकतार् है। अत: मार्नकों को समय-समय पर संशोधित करते रहनार् चार्हिए।
  2. प्रतिनिधित्वतार् (Representativeness)- अच्छे मार्नक की दूसरी विशेषतार् है प्रतिनिधित्वतार् अर्थार्त मार्नकों को छार्त्रों के एक प्रतिनिधि तथार् बड़े प्रतिदर्श से तैयार्र कियार् जार्नार् चार्हिये। विभिन्न प्रकार की जनसंख्यार् जैसे छार्त्र व छार्त्रार्एं यार् ग्रार्मीण यार् सार्मार्न्य स्कूल व कान्र्वेट स्कूल आदि के लिए भी अलग-अलग मार्नक तैयार्र किये जार्ने चार्हिए।
  3. साथकतार् (Relevancy)- मार्नकों में साथकतार् भी होनी चार्हिए। साथकतार् क सम्बन्ध मार्नकों के प्रकार से है। विकासार्त्मक चरों तथार् उद्देश्यों के मार्पन के सन्दर्भ में आयु मार्नक अथवार् कक्षार् मार्नक अधिक साथक होते है। इसके विपरीत अन्य प्रकार के चरों व उद्देश्यों क मार्पन करते समय शतार्ंक मार्नक अथवार् मार्नकीकृत प्रार्प्तार्ंक मार्नक उपयुक्त हो सकते है। परीक्षण के मार्नकों के प्रकार क निर्णय सार्वधार्नी पूर्ण ढंग से कियार् जार्नार् चार्हिये।
  4. तुलनीयतार् (Comparability)- समार्न योग्यतार् क मार्पन करने वार्ले विभिन्न परीक्षणों के मार्नक परस्पर तुलनीय भी होने चार्हिये। ऐसेार् न हो कि किसी परीक्षण पर मार्नकों के आधार्र पर किसी छार्त्र को श्रेष्ठ बतार्यार् जार् रहार् है जबकि उसी योग्यतार् के दूसरे परीक्षण पर उसी छार्त्र को औसत यार् निम्नस्तर क कहार् जार् रहार् है। ऐसी स्थिति में कम से कम एक परीक्षण के मार्नक में त्रुटि होने की सम्भार्वनार् है।

इसके अतिरिक्त मार्नकों की व्यार्ख्यार् स्पष्ट व विस्तृत होनी चार्हिये जिससे छार्त्रों के प्रार्प्तार्ंकों की ठीक प्रकार से व्यार्ख्यार् की जार् सके। मार्नकों के प्रयोग के लिये यह भी आवश्यक है कि छार्त्रों पर परीक्षण को ठीक उन्ही परिस्थितियों में प्रशार्सित कियार् जार्ये जिन परिस्थितियों मे परीक्षण निर्मार्तार् ने मार्नक तैयार्र करने के लिये प्रशार्सित कियार् थार्। छार्त्रों के लिये निर्देश, परीक्षण अवधि, छार्त्र अभिप्रेरणार् तथार् अन्य कोर्इ भी ऐसी परिस्थिति जो छार्त्रों के प्रार्प्तार्ंकों को प्रभार्वित कर सकती हो, समार्न होनी चार्हिए।

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