पत्रकारितार् के कार्य, सिद्धार्ंत एवं प्रकार
‘पत्रकारितार्’ के मुख्य कार्य सूचनार्, शिक्षार्, मनोरंजन, लोकतंत्र क रक्षक एवं जनमत से आशय एवं पत्रकारितार् के सिद्धार्न्त की चर्चार् की गर्इ है। इसके सार्थ ही पत्रकारितार् के विभिन्न प्रकार की चर्चार् भी सविस्तार्र से की गर्इ है।

पत्रकारितार् के कार्य 

प्रार्रंभिक अवस्थार् में पत्रकारितार् को एक उद्योग के रूप में नहीं गिनार् जार्तार् थार् । इसक मुख्य कार्य थार् नए विचार्र क प्रचार्र प्रसार्र करनार्। तकनीकी विकास, परिवहन व्यवस्थार् में विकास, उद्योग एवं वार्णिज्य के प्रसार्र के कारण आज पत्रकारितार् एक उद्योग बन चुक है। इसक कार्य भी समय के अनुसार्र बदल गयार् है। आज पत्रकारितार् क तीन मुख्य कार्य हो चलार् है। पहलार्, सूचनार् प्रदार्न करनार्, दूसरार्, शिक्षार् और तीसरार्, मनोरंजन करनार्। इसके अलार्वार् लोकतंत्र की रक्षार् एवं जनमत संग्रह करनार् इसक मुख्य कार्य में शार्मिल है।

सूचनार् 

अपने आसपार्स की चीजों घटनार्ओं और लोगों के बार्रे में तार्जार् जार्नकारी रखनार् मनुष्य क सहज स्वभार्व है। उसमें जिज्ञार्सार् क भार्व बहुत प्रबल होतार् है। जिज्ञार्सार् नहीं रहेगी तो समार्चार्र की भी जरूरत नहीं रहेगी। पत्रकारितार् क विकास ही इसी सहज जिज्ञार्सार् को शार्ंत करने के प्रयार्स के रूप में हुआ। यह मूल सिद्धार्न्त के आधार्र पर ही यह काम करती है। पत्रकारितार् क मुख्य कार्य घटनार्ओं को लोगों तक पहुंचार्नार् है। समार्चार्र अपने समय के विचार्र, घटनार् और समस्यार्ओं के बार्रे में सूचनार् प्रदार्न करतार् है। यार्नी कि समार्चार्र के मार्ध्यम से देश दुनियार् की समसार्मयिक घटनार्ओं समस्यार्ओं और विचार्रों की सूचनार् लोगों तक पहुंचार्यार् जार्तार् है। इस सूचनार् क सीधे सीधे अधिक से अधिक लोगों पर प्रभार्व पड़तार् है। जैसे भार्रत में नोटबंदी हार् े यार् किसार्नों क ऋण मार्फी यार् जीएसटी लार्गू करने क निर्णय। यह सब सूचनार्एँ लोगों को प्रभार्वित करती है। ये सूचनार्एँ हमार्रे दैनिक जीवन के सार्थ सार्थ पूरे समार्ज को प्रभार्वित करती हैं। यही कारण है कि आधुनिक समार्ज में सूचनार् और संचार्र मार्ध्यमों क महत्व बहुत बढ़ गयार् है। आज देश दुनियार् में जो कुछ हो रहार् है, उसकी अधिकांश जार्नकारियार्ँ हमें समार्चार्र मार्ध्यमों से ही मिलती है। सच तो यह है कि हमार्रे प्रत्यक्ष अनुभव से बार्हर की दुनियार् के बार्रे में हमें अधिकांश जार्नकारियार्ँ समार्चार्र मार्ध्यमों द्वार्रार् दिए जार्नेवार्ले समार्चार्रों से ही मिलती है। तो इस तरह पत्रकारितार् आज के जमार्ने में सूचनार् प्रदार्न करने क सबसे बड़ार् मार्ध्यम बन गयार् है।

शिक्षार् 

समार्चार्र के मार्ध्यम से हमें देश दुनियार् की तमार्म घटनार्ओं विचार्र, समस्यार्ओं की जार्नकारी मिलती है। यह समार्चार्र हमें विभिन्न समार्चार्र मार्ध्यमों के जरिए हमार्रे घरों में पहुंचते हैं। समार्चार्र सगंठनों में काम करनेवार्ले पत्रकार देश दुनियार् में घटनेवार्ली घटनार्ओं को समार्चार्र के रूप में परिवर्तित करके हम तक पहुंचार्ते हैं। यह हमे विभिन्न विषय में शिक्षार् प्रदार्न करते हैं। हमें विद्यार्लय से लेकर विश्वविद्यार्लय तक डिग्री प्रार्प्त करने के लिए औपचार्रिक पढ़ाइ के लिए पुस्तक पढ़नी पड़ती है। उन पुस्तकों में इतिहार्स, भूगोल, विज्ञार्न, वार्णिज्य, सार्हित्य, समार्ज, संस्‟ति आदि क उल्लेख रहतार् है। उनमें समार्ज में घटित हुर्इ घटनार्ओं को लेखकों द्वार्रार् लिखी गर्इ बार्तों को पढ़कर शिक्षार् प्रार्प्त करते हैं। लेकिन संचार्र मार्ध्यम चार्हे वह समार्चार्र पत्र पत्रिकाएँ हो यार् रेडियो यार् दूरदर्शन यार् फिर इंटरनेट यार् फिर सोशल मीडियार् भी लोगों को वर्तमार्न में घटित हो रही घटनार्ओं को समार्चार्र के रूप में परिवर्तित करके पेश करते हैं। यह समार्चार्र सम सार्मयिक घटनार्ओं विचार्रों की परूी जार्नकारी प्रदार्न करती है जो अनौपचिरक रूप से व्यक्ति को, पार्ठक को यार् दर्शक को शिक्षार् प्रदार्न करती है। जैसे कि अंतरिक्ष में भार्रत ने क्यार् उपगह्र छोडाऱ् , भूकंप से बचार्व के लिए पहले जार्नकारी प्रार्प्त करने कौन सी नर्इ तकनीकी बनाइ गर्इ है, स्वार्स्थ्य सेवार् में क्यार् बदलार्व लार्यार् गयार्, रार्जनीति में क्यार् परिवर्तन हार्े रहार् है, प्रसिद्ध सार्हित्यकारों ने समार्ज की समस्यार्ओं पर क्यार् लेखनी चलाइ आदि। समार्चार्र पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित फीचर के जरिए कर्इ ऐसी पहलू पर मागदर्शन दियार् जार्तार् है जो पार्ठîपुस्तकों जैसे औपचार्रिक पढ़ाइ में नहीं मिल पार्ती है। दूसरी बार्त यह कि समार्चार्र पत्र पत्रिकाओं में स्वार्स्थ्य, समार्ज, नार्री, विज्ञार्न, ज्योतिष, वार्णिज्य में नित्य हार्े रहे बदलार्व आरै उसक प्रभार्व पर विश्लेषण, समीक्षार् आदि समार्ज क मागदर्शन करतार् है। विभिन्न क्षेत्र के सफल व्यक्तियों के सार्क्षार्त्कार से जहार्ं समार्ज को उनक संघर्ष क पतार् चलतार् है तो उनके विचार्र, मूल्य के बार्रे में जार्नकारी मिलती है। इस तरह पत्रकारितार् न केवल सूचनार् प्रदार्न करतार् है बल्कि पार्ठक, दर्शक को सीधे एवं अनौपचार्रिक रूप से शिक्षार् प्रदार्न करने क कार्य करती है।

मनोरंजन 

पत्रकारितार् क आयार्म बहुत ही विस्तृत हो चलार् है। यह केवल सूचनार् और शिक्षार् प्रदार्न करने तक सीमित न रहकर लोगों क मनार्रेंजन करने के लिए भी सशक्त मार्ध्यम के रूप में उभर कर सार्मने आयार् है। समार्चार्र पत्र में जैसे कथार्, कहार्नी, जीवनी, व्यंग्य आदि लेख प्रकाशित होते हैं। इस तरह के सार्हित्यिक लेखों से लोगों क मनार्रेंजन होतार् है। इसके अलार्वार् समार्ज में नित्य प्रतिदिन घटित हार्े रही घटनार्ओं पर कार्टून तथार् व्यंग्य चित्र पश्े ार् किए जार्ते हैं। समार्चार्र पत्र पत्रिकाओं तथार् श्रव्य दृश्य मार्ध्यमों में सिनेमार्, दूरदर्शन, नार्टक आदि से जुड़ी खबरें लेख प्रकाशित किये जार्ते हैं जो पार्ठकों तथार् दर्शकों क पूरार् मनोरंजन करते हैं। हम कहीं ट्रेन में बस में यार् हवाइ जहार्ज में सफर कर रहे होते हैं तो समय काटनार् बड़ार् कठिन होतार् है। इस समय पर दिल को बहलार्ने के लिए लोगों को अक्सर समार्चार्र पत्र एवं पत्रिकाओं को पढ़ते देखार् जार्तार् है। एसेे वक्त में लोगों क दिल बहलार्ने के सार्थ सार्थ शिक्षार् एवं सूचनार्एं भी प्रदार्न करते हैं। आज कल तो समार्चार्र पत्र पत्रिकाएं बच्चों को खार्स ध्यार्न में रखकर बार्ल पत्रिकाओं क प्रकाशन कर रहे हैं सार्थ ही बड़े समार्चार्र पत्र समूह बार्ल मनोविज्ञार्न से संबंधित कथार्, कहार्नियार्ं सचित्र प्रकाशित कर बार्ल मनोरंजन कर रहे हैं। यहार्ं तक कि टेलीविजन पर अनेक चैनल भी हैं जो केवल बार्ल मनोविज्ञार्न पर आधार्रित कार्यक्रम पेश करते हैं। दर्शकों, श्रार्तेार्ओं, पार्ठकों को केवल समार्चार्र से मन उब न जार्ए इसलिए मन बहलार्ने के लिए हर समार्चार्र मार्ध्यमों द्वार्रार् समार्चार्रों के प्रसार्रण के सार्थ ही मनोरंजन क भी यथार्संभव प्रसार्रण एवं प्रकाशन कियार् जार् रहार् है।

लोकतंत्र क रक्षक 

रार्जनैनिक परिदृश्य में मीडियार् की भूमिक सबसे अहम है। पत्रकारितार् की पहुंच क सीधार् अर्थ है जनमत की पहुंच। इसलिए कहार् गयार् है कि पत्रकारितार् लोकतंत्र की सुरक्षार् एवं बचार्व क सबसे बड़ार् मार्ध्यम है। यह दोनों नेतार् एवं जनतार् के लिए लार्भकारी है। नेतार् जनतार् तक अपनी सुविधार् अनुसार्र पहुंच पार्ते हैं लेकिन खार्सकर के इलेक्ट्रार्निक मीडियार् के मार्ध्यम से नेतार् एक ही समय में काफी लोगों तक पहुंच पार्ने में सक्षम हो जार्ते हैं। मीडियार् में पहुंच क फार्यदार् यह होतार् है कि उन्हें तथ्य, विचार्र एवं व्यवहार्र में सुधार्रने क मौक मिलतार् है। रेडियो एवं टीवी के कारण अब दूरी मिट गर्इ है। इस तरह नेतार् इसके मार्ध्यम से जनतार् तक पहुंच जार्ते हैं। और मीडियार् के मार्ध्यम से उनके द्वार्रार् किए गए कार्य क विश्लेषण कर उन्हें चेतार्यार् जार्तार् है।

जनमत 

पत्रकारितार् क कार्य में सबसे प्रमुख है जनमत को आकार देनार्, उसको दिशार् निर्देश देनार् और जनमत क प्रचार्र प्रसार्र करनार्। पत्रकारितार् क यह कार्य लोकतंत्र को स्थार्पित करतार् है। लोकतार्ंत्रिक शार्सन व्यवस्थार् में पत्रकारितार् यार्नि मीडियार् लोगों के मध्य जार्गरूकतार् लार्ने क एक सशक्त मार्ध्यम है। और यह शार्सक पर सार्मूहिक सतर्कतार् बनार्ए रखने के लिए सबसे बड़ार् अस्त्र है। और यह तभी संभव है जब बड़ी आबार्दी तक मीडियार् की पहुंच हो।

एजेडार् निर्धार्रण 

इन कार्यों के अलार्वार् पत्रकारितार् यार्नी मीडियार् अब एजेडार् निर्धार्रण करने के कार्य में भी शार्मिल हार्े चुक है। इसक अर्थ यह है कि मीडियार् ही सरकार और जनतार् क एजेडार् तय करतार् है- मीडियार् में जो हार्गेार् वह मुद्दार् है और जो मीडियार् से नदार्रद है वह मुद्दार् नहीं रह जार्तार्। एजेडार् निर्धार्रण में मीडियार् की यह भूमिक बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है। मीडियार् में कौन सी बार्त उठ रही है उसे सरकार प्रार्थमिकतार् देने लगी है और उस पर त्वरित कार्रवाइ कर रही है। दूसरी ओर जनतार् भी मीडियार् के मार्ध्यम से जो दिषार् निर्देष मिलते हैं उसी हिसार्ब से अपनार् कामकाज करने लगी है। मीडियार् में खबर आने के बार्द सरकार एवं जनतार् यह तय करते हैं कि उनक अगलार् कदम क्यार् होगार्। जैसे कि मीडियार् में खबर आइर् कि आनेवार्ले दिनों में जीएसटी लार्गू हो जार्एगी। व्यार्पार्री उसी हिसार्ब से अपनी तैयार्री “ार्ुरू कर देते हैं।

पत्रकारितार् के मुख्य कार्यों पर नजर डार्लें तो हम यह कह सकते हैं कि समार्चार्र के मार्ध्यम से लोगों को घटित घटनार्ओं को सूचित करनार् है। सूचित करने की इस प्रक्रियार् में लोग शिक्षित भी होते हैं दूसरे पक्ष पर अगर हम विचार्र को लें तार्े इसक संपार्दकीय और लेख हमें जार्गरूक बनार्ते हैं। इसके अलार्वार् खेल, सिनेमार् की खबरें आरै विभिन्न विशयों पर आधार्रित फीचर क उद्देश्य ही लोगों क मनोरजं न करनार् होतार् है रार्जनैनिक परिदृष्य में इसक मुख्य कार्य लोकतंत्र की सुरक्षार् एवं बचार्व करनार् है। जहार्ं इसके मार्ध्यम से नेतार् सीधे जनतार् तक पहुंच जार्ते हैं वहÈ इसके मार्ध्यम से उनके द्वार्रार् किए गए कार्य क विश्लषेण कर उन्हें चेतार्यार् जार्तार् है। लोकतंत्र में जनमत ही सर्वोपरि होती है। वर्तमार्न में मीडियार् ही जनमत क सबसे बड़ार् मार्ध्यम बन गयार् है। शार्सक पर सार्मूहिक सतर्कतार् बनार्ए रखने के लिए सबसे बड़ार् अस्त्र बन गयार् है। पत्रार्रितार् के कार्य में अब एक और नयार् कार्य जुड़ गयार् है वह है सत्तार् एवं जनतार् क एजेडार् निर्धार्रण करनार्।

पत्रकारितार् के सिद्धार्ंत 

पत्रकारितार् और पत्रकार एवं पत्रकारितार् के मूल्य पर चर्चार् करते समय हमने देखार् कि अपनी पूरी स्वतंत्रतार् के बार्वजूद उस पर सार्मार्जिक और नैतिक मूल्यों की जवार्बदेही होती है। यह सार्मार्जिक और नैतिक मूल्य की जवार्बदेही उसे एक नियम कानून के दार्यरे में चलने को मजबूर करतार् है। दूसरी बार्त यह है कि लोकतंत्र में पत्रकारितार् को चौथार् स्तंभ मार्नार् गयार् है। इस हिसार्ब से न्यार्यपार्लिका, कार्यपार्लिका, विधयिक जैसे तीन स्तंभ को बार्ंधे रखने के लिए पत्रकारितार् एक कड़ी के रूप में काम करती है। इस कारण पत्रकार की भूमिक महत्वपूर्ण होती है। उसके सार्मने कर्इ चुनौतियार्ँ होती है और दबार्व भी। सार्मार्जिक सरोकारों को व्यवस्थार् की दहलीज तक पहुँचार्ने और प्रशार्सन की जनहितकारी नीतियों तथार् योजनार्ओं को समार्ज के सबसे निचले तबके तक ले जार्ने के दार्यित्व क निर्वहन करनार् पत्रकार और पत्रकारितार् क कार्य है।

इस दृष्टि से देखार् जार्ए तो अन्य विषय की तरह पत्रकारितार् भी कुछ सिद्धार्न्त पर चलती है। एक पत्रकार से यह अपेक्षार् की जार्ती है कि वह इसक पार्लन करे। यह पत्रकारितार् क आदर्श है। इस आदर्श को पार्लन कर एक पत्रकार पार्ठकों क विष्वार्स जीत सकतार् है। और यह विश्वसनीयतार् समार्चार्र संगठन की पूंजी है। पत्रकारितार् की सार्ख बनार्ए रखने के लिए निम्नलिखित सिद्धार्न्तों क पार्लन करनार् जरूरी है-

यथाथतार् 

पत्रकार पर सार्मार्जिक और नैतिक मूल्य की जवार्बदेही है। यह वार्स्तविकतार् यार् यथाथतार् की ओर इशार्रार् करती है। एक पत्रकार संगठन को अपनी सार्ख बनार्ए रखने के लिए समार्ज के यथाथ को दिखार्नार् होगार्। यहार्ं पर कल्पनार् की कोर्इ जगह नहीं होती है। यह पत्रकारितार् की पहली कसौटी है। समार्चार्र समार्ज के किसी न किसी व्यक्ति, समूह यार् देश क प्रतिनिधित्व करतार् है। इसलिए इसक जुड़ार्व सीधे समार्ज की सच्चाइ यार्नी वार्स्तविकतार् से हो जार्तार् है। यार्नी कि यह कह सकते हैं कि समार्चार्र समार्ज क प्रतिबिंब होतार् है। पत्रकार हमेशार् समार्चार्र यथाथ को पेश करने की कोशिश करतार् है। यह अपने आप में एक जटिल प्रक्रियार् है। दरअसल मनुष्य यथाथ की नहीं यथाथ की छवियों की दुनियार् में रहतार् है। किसी भी घटनार् के बार्रे में हमें जो भी जार्नकारियार्ं प्रार्प्त होती है उसी के अनुसार्र हम उस यथाथ की एक छवि अपने मस्तिष्क में बनार् लेते हैं। और यही छवि हमार्रे लिए वार्स्तविक यथाथ क काम करती है। दूसरे शब्दार्ंे में कहार् जार्ए कि हम संचार्र मार्ध्यमों द्वार्रार् सृजित छवियों की दुनियार् में रहते हैं।

संपूर्ण यथाथ को प्रतिबिंबित करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि तथ्यों के चयन में संपूर्णतार् क ध्यार्न रखनार् हार्गेार्। समार्चार्र लिखते समय यह ध्यार्न रखनार् होगार् कि कौन सी सूचनार्एं और कौन सार् तथ्य संपूर्ण घटनार् क प्रतिनिधित्व कर सकतार् है, एसेे तथ्य एवं सूचनार्ओं क चयन करनार् हार्गेार्। जैसे कि एक नस्ली, जार्तीय यार् धामिक हिंसार् की घटनार् क समार्चार्र कर्इ तरह से लिखार् जार् सकतार् है। इसे तथ्यपरक ढंग से इस तरह भी लिखार् जार् सकतार् है कि किसी एक पक्ष की शैतार्न की छवि सृजित कर दी जार्ए और दूसरे पक्ष को इसके कारनार्मों क शिकार। घटनार् के किसी एक पक्ष को अधिक उजार्गर कर एक अलग ही तरह की छवि क सृजन कियार् जार् सकतार् है। यार् फिर इस घटनार् में आम लोगों के दु:ख दर्द को उजार्गर कर इस तरह की हिंसार् के अमार्नवीय और बर्बर चेहरे को भी उजार्गर कियार् जार् सकतार् है। एक रोती विधवार्, बिलखते अनार्थ बच्चे यार् तो मार्त्र विधवार् और अनार्थ बच्चों के बार्रे में पेश करके यह दिखार्नार् कि जार्तीय यार् धामिक हिंसार् ने यह हार्लत की है। यार् फिर यह पेश कियार् जार् सकतार् है कि चूिक ये किसी खार्स जार्ति यार् धर्म के हैं इसलिए ये विधवार् और अनार्थ हैं। इस तरह समार्चार्र को वार्स्तव में हकीकत के करीब रखने के लिए एक पत्रकार को प्रोफेशनल और बौद्धिक कौशल में महार्रथ हार्सिल करनार् जरूरी है।

वस्तुपरकतार् 

वस्तु की अवधार्रणार् हमें सार्मार्जिक मार्हौल से मिलते हैं। बचपन से ही हम घर में, स्कूल में, सड़क पर चलते समय हर कदम, हर पल सूचनार्एँ प्रार्प्त करते हैं और दुनियार् भर के स्थार्नों लोगों संस्‟तियों आदि सैकड़ों विषय के बार्रे में अपनी एक धार्रणार् यार् छवि बनार् लेते हैं। हमार्रे मस्तिष्क में अनेक मौकों पर इस तरह छवियार्ं वार्स्तविक भी हो सकती है और वार्स्तविकतार् से दूर भी हो सकती है। वस्तुपरकतार् क संबंध सीधे सीधे पत्रकार के कर्तव्य से जुड़ार् है। जहार्ं तक वस्तुपरकतार् की बार्त है पत्रकार समार्चार्र के लिए तथ्यों क संकलन और उसे प्रस्तुत करते हुए अपने आकलन को अपनी धार्रणार्ओं यार् विचार्रों से प्रभार्वित नहीं हार्नेे देनार् चार्हिए क्योंिक वस्तुपरकतार् क संबंध हमार्रे सार्मार्जिक-सार्ंस्‟तिक, आर्थिक मूल्यों से कहीं अधिक है।

वैसे भी दुनियार् में हर चीज को देखने क नजरियार् हर व्यक्ति में अलग अलग होती है। ऐसे में पत्रकार क कर्तव्य है कि वह समार्चार्र को ऐसार् पेश करे कि पार्ठक उसे समझते हुए उससे अपनार् लगार्व महसूस करे। समार्चार्र लेखन में लेखक को अपनी रार्य प्रकट करने की छूट नहीं मिल पार्ती है। उसे वस्तुपरक होनार् अनिवाय है। लेकिन यह ध्यार्न रखनार् होतार् है कि वस्तुपरकतार् से उसकी जिम्मेदार्री भी जुड़ी हुर्इ है। पत्रकार क उत्तरदार्यित्व की परख तब होती है जब उसके पार्स कोर्इ विस्फोटक समार्चार्र आतार् है। आज के संदर्भ में दंगे को ही लें किसी स्थार्न पर दार्े समुदार्यों के बीच दंगार् हो जार्तार् है और पत्रकार सबकुछ खुलार्सार् करके नमक-मिर्च लगार्कर समार्चार्र पेश करतार् है तो समार्चार्र क परिणार्म विध्वंसार्त्मक ही होगार्। ऐसी स्थिति में अनुभवी पत्रकार अपने विवेक क सहार्रार् लेते हैं और समार्चार्र इस रूप से पेश करते हैं कि उससे दंगार्इयों को बल न मिले एसेे समार्चार्र के लेखन में वस्तुपरकतार् और भी अनिवाय जार्न पड़ती है।

इसलिए कोर्इ भी समार्चार्र एक सार्थ वस्तुपरक नहीं हो सकतार् है। एक ही समार्चार्र को एक पत्रकार वस्तुपरक बनार् सकतार् है तो दूसरार् पूर्वार्ग्रह से प्रभार्वित होकर बनार् सकतार् है। चार्हे जो भी हो एक पत्रकार को जहार्ं तक संभव हो अपने समार्चार्र प्रस्तुतीकरण में वस्तुपरकतार् को अवश्य ध्यार्न में रखनार् चार्हिए। यही कारण है कि वस्तुपरकतार् को भी तथ्यपरकतार् से आंकनार् जरूरी है। क्योंकि वस्तुपरकतार् और यथाथतार् के बीच काफी कुछ समार्नतार्एं भी है और दोनों के बीच अंतर भी है। यथाथतार् क संबंध अधिकाधिक तथ्यों से है वहीं वस्तुपरकतार् क संबंध इस बार्त से है कि कोर्इ व्यक्ति उस तथ्य को कैसे देखतार् है। जैसे कि किसी विषय यार् मुद्दे के बार्रे में हमार्रे मस्तिष्क में पहले से सृजित छवियार्ं समार्चार्र के मूल्यार्ंकन की हमार्री क्षमतार् को प्रभार्वित करती है और हम इस यथाथ को उन छवियों के अनुरूप देखने क प्रयार्स करते हैं। लेकिन पत्रकार को जहार्ं तक संभव हार्े अपने लेख में वस्तुपरकतार् क अवश्य ध्यार्न रखनार् चार्हिए।

निष्पक्षतार् 

चूंकि पत्रकारितार् लोकतंत्र क चौथार् स्तंभ है इसलिए रार्ष्ट्रीय एवं सार्मार्जिक जीवन में इसकी अहम भूमिक है। इसलिए पत्रकारितार् सही आरै गलत, न्यार्य और अन्यार्य जैसे मसलों के बीच तटस्थ नहीं होनार् चार्हिए बल्कि वह निष्पक्ष होते हुए सही एवं न्यार्य के सार्थ होनार् चार्हिए। इसलिए पत्रकारितार् क प्रमुख सिद्धार्न्त है उसक निष्पक्ष होनार्। पत्रकार को उसक शतप्रतिशत पार्लन करनार् जरूरी है तभी उसके समार्चार्र संगठन की सार्ख बनी रहेगी। पत्रकार को समार्चार्र लिखते समय न किसी से दोस्ती न किसी से बैर वार्ले सिद्धार्ंत को अपनार्नार् चार्हिए तभी वह समार्चार्र के सार्थ न्यार्य कर पार्एगार्। और जब पत्रकारितार् की आजार्दी की बार्त आती है तो इसमें न्यार्यसंगत होने क तत्व अधिक अहम होतार् है। आज मीडियार् की तार्कत बढ़ी है। एक ही झटक में वह किसी को सर आख्ों पर बिठार् सकतार् है तार्े किसी को जमीन के नीचे गिरार् सकतार् है। इसलिए किसी के बार्रे में समार्चार्र लिखते समय इस बार्त क ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि कहीं किसी को अनजार्ने में ही सही उसे बिनार् सुनवाइ के फार्ंसी पर तो नहीं लटकायार् जार् रहार् है। इसलिए पत्रकार एवं पत्रकार संगठन की जिम्मेदार्री है कि वह निष्पक्ष होकर हमेशार् सच्चाइ को सार्मने रखे और सही एवं न्यार्य क सार्थ दे।

संतुलन 

पत्रकारितार् में निष्पक्षतार् के सार्थ संतुलन की बार्त भी जुड़ी हुर्इ है। जब किसी समार्चार्र के कवरेज पर यह आरोप लगार्यार् जार्तार् है कि वह संतुलित नहीं है तो यहार्ं यह बार्त सार्मने आती है कि समार्चार्र किसी एक पक्ष की ओर झुक हुआ है। यह ऐसे समार्चार्र में सार्मने आती है जब किसी घटनार् में अनेक पक्ष शार्मिल हों और उनक आपस में किसी न किसी रूप में टकरार्व हार्े एसेी स्थिति में पत्रकार को चार्हिए कि संबद्ध पक्षों की बार्त समार्चार्र में अपने अपने समार्चार्रीय महत्व के अनुसार्र स्थार्न देकर समार्चार्र को संतुलित बनार्नार् होगार्। एक और स्थिति में जब किसी पर कोर्इ किसी तरह के आरोप लगार्ए गए हों यार् इससे मिलती जुलती कोर्इ स्थिति हो। उस स्थिति में निष्पक्षतार् और संतुलन की बार्त आती है। ऐसे समार्चार्रो  में हर पक्ष की बार्त को रखनार् अनिवाय हो जार्तार् है अन्यथार् एक पक्ष के लिए चरित्र हनन क हथियार्र बन सकतार् है। तीसरी स्थिति में व्यक्तिगत किस्म के आरार्पेों में आरार्ेिपत व्यक्ति के पक्ष को भी स्थार्न मिलनार् चार्हिए। यह स्थिति तभी संभव हो सकती है जब आरोपित व्यक्ति सावजनिक जीवन में है आरै आरोपों के पक्ष में पक्के सबतू नहीं हैं। लेकिन उस तरह के समार्चार्र में इसकी जरूरत नहीं होती है जो घोषित अपरार्धी हों यार् गंभीर अपरार्ध के आरोपी। संतुलन के नार्म पर मीडियार् इस तरह के तत्वों क मंच नहीं बन सकतार् है। दूसरी बार्त यह कि यह सिद्धार्ंत सावजनिक मसलों पर व्यक्त किए जार्नेवार्ले विचार्रों और „ष्टिकोणों पर लार्गू नहीं कियार् जार्नार् चार्हिए।

स्रोत 

पत्रकारितार् के मूल में समार्चार्र है। समार्चार्र में कोर्इ सूचनार् यार् जार्नकारी होती है। पत्रकार उस सूचनार् एवं जार्नकारी के आधार्र पर समार्चार्र तैयार्र करतार् है लेकिन किसी सूचनार् क प्रार्रंभिक स्रोत पत्रकार नहीं होतार् है। आमतौर पर वह किसी घटनार् के घटित होने के समय घटनार्स्थल पर उपस्थित नहीं होतार् है। वह घटनार् के घटने के बार्द घटनार्स्थल पर पहुंचतार् है इसलिए यह सब कैसे हुआ यह जार्नने के लिए उसे दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहनार् पड़तार् है। उस सूचनार् एवं जार्नकारी में क्यार् सही है, क्यार् असली घटनार् है, कौन शार्मिल है उसकी पूरी जार्नकारी के बिनार् यह अधूरार् एवं एक पक्ष होती है जो हमने पत्रकारितार् के सिद्धार्ंतों में यथाथतार्, वस्तुपरकतार्, निष्पक्षतार् और संतुलन पर चर्चार् करते हुए देखार् है। किसी भी समार्चार्र के लिए जरूरी सूचनार् एवं जार्नकारी प्रार्प्त करने के लिए समार्चार्र संगठन एवं पत्रकार को कोर्इ न कोर्इ स्रोत की आवश्यकतार् होती है। यह समार्चार्र स्रोत समार्चार्र संगठन के यार् पत्रकार के अपने हार्तेे हैं। स्रोतों में समार्चार्र एजेंिसयार्ं भी आती हैं।

समार्चार्र की सार्ख बनार्ए रखने के लिए उसमें शार्मिल की गर्इ सूचनार् यार् जार्नकारी क क्यार् स्रोत है उसक उल्लेख करनार् आवश्यक हो जार्तार् है। खार्सकर एसे े समार्चार्र जो सार्मार्न्य के दार्यरे से निकलकर खार्स श्रेणी में आते हैं। स्रोत के बिनार् समार्चार्र क महत्व कम हो जार्तार् है। इसलिए समार्चार्र में समार्हित सूचनार्ओं क स्रोत होनार् आवश्यक है। हार्ँ जिस सूचनार् क कोर्इ स्रोत नहीं है उसक स्रोत यार् तो पत्रकार स्वयं है यार् फिर यह एक सार्मार्न्य जार्नकारी है जिसक स्रोत देने की जरूरत नहीं होती है।

पत्रकारितार् के प्रकार 

संसार्र में पत्रकारितार् क इतिहार्स बहुत पुरार्नार् नहीं है लेकिन इक्किसवीं शतार्ब्दी में यह एक ऐसार् सशक्त विषय के रूप में उभरार् है जिसकी कल्पनार् नहीं की जार् सकती है। आज इसक क्षेत्र बहुत व्यार्पक हो चुक है और विविधतार् भी लिए हुए है। शार्यद ही कोर्इ क्षेत्र बचार् हो जिसमें पत्रकारितार् की उपार्देयतार् को सिद्ध न कियार् जार् सके। इसलिए यह कहनार् अतिशयोक्ति न होगी कि आधुनिक युग में जितने भी क्षेत्र हैं सबके सब पत्रकारितार् के भी क्षेत्र हैं, चार्हे वह रार्जनीति हो यार् न्यार्यार्लय यार् कार्यार्लय, विज्ञार्न हो यार् प्रौद्योगिकी हो यार् शिक्षार्, सार्हित्य हो यार् संस्‟ति यार् खेल हो यार् अपरार्ध, विकास हो यार् कृषि यार् गार्ंव, महिलार् हो यार् बार्ल यार् समार्ज, पर्यार्वरण हो यार् अंतरिक्ष यार् खोज। इन सभी क्षेत्रों में पत्रकारितार् की महत्तार् एवं उपार्देयतार् को सहज ही महसूस कियार् जार् सकतार् है। दूसरी बार्त यह कि लोकतंत्र में इसे चौथार् स्तंभ कहार् जार्तार् है। ऐसे में इसकी पहुंच हर क्षेत्र में हो जार्तार् है। इस बहु आयार्मी पत्रकारितार् के कितने प्रकार हैं उस पर विस्तृत रूप से चर्चार् की जार् रही है।

खोजी पत्रकारितार् 

खोजी पत्रकारितार् वह है जिसमें आमतौर पर सावजनिक महत्व के मार्मले जैसे भ्रष्टार्चार्र, अनियमिततार्ओं और गड़बड़ियार्ंे की गहराइ से छार्नबीन कर सार्मने लार्ने की कोशिश की जार्ती है। स्टिंग ऑपरेशन खोजी पत्रकारितार् क ही एक नयार् रूप है। खोजपरक पत्रकारितार् भार्रत में अभी भी अपने शैशवकाल में है। इस तरह की पत्रकारितार् में ऐसे तथ्य जुटार्कर सार्मने लार्ए जार्ते हैं, जिन्हें आमतौर पर सावजनिक नहीं कियार् जार्तार्। लेकिन एक वर्ग यह मार्नतार् है कि खोजपरक पत्रकारितार् कुछ है ही नहीं क्योंिक कोर्इ भी समार्चार्र खोजी „ष्टि के बिनार् लिखार् ही नहीं जार् सकतार् है। लोकतंत्र में जब जरूरत से ज्यार्दार् गोपनीयतार् बरती जार्ने लगे और भ्रष्टार्चार्र चरम पर हो तो खोजी पत्रकारितार् ही उसे सार्मने लार्ने क एकमार्त्र विकल्प होती है। खोजी पत्रकारितार् से जुड़ी पुरार्नी घटनार्ओं पर नजर ड़ार्लें तो माइ लाड कांड, वार्टरगेट कांड़, एंडर्सन क पेंटार्गन पेपर्स जैसे अंतरार्ष्ट्रीय कांड तथार् सीमेटं घोटार्लार् कांड़, बोफर्स कांड, तार्बूत घोटार्लार् कांड जैसे रार्ष्ट्रीय घोटार्ले खोजी पत्रकारितार् के चर्चित उदार्हरण हैं। संचार्र क्रार्ंति, इंटरनेट यार् सूचनार् अधिकार जैसे प्रभार्वशार्ली अस्त्र अस्तित्व में आने के बार्द तो घोटार्ले उजार्गर होने क जैसे दौर शुरू हो गयार्। इसक नतीजार् है कि पिछले दिनार्ंे 2जी स्पेक्ट्रम घोटार्लार्, कमनवेल्थ गेम्स घोटार्लार्, आदर्श घोटार्लार् आदि उल्लेखनीय हैं। समार्ज की भलाइ के लिए खोजी पत्रकारितार् अवश्य एक अंग है लेकिन इसे भी अपनी मर्यार्दार् के घेरे में रहनार् चार्हिए।

वार्चडार्ग पत्रकारितार् 

लोकतंत्र में पत्रकारितार् को चौथार् स्तंभ मार्नार् गयार् है। इस लिहार्ज से इसक मुख्य कार्य सरकार के कामकाज पर निगार्ह रखनार् है और कहीं भी कोर्इ गड़बड़ी हो तो उसक पर्दार्फार्श करनार् है। इसे परंपरार्गत रूप से वार्चडार्ग पत्रकारितार् कहार् जार् सकतार् है। दूसरी आरे सरकारी सूत्रों पर आधार्रित पत्रकारितार् है। इसके तहत मीडियार् केवल वही समार्चार्र देतार् है जो सरकार चार्हती है और अपने आलोचनार्परक पक्ष क परित्यार्ग कर देतार् है। इन दार्े बिंदुओ  के बीच तार्लमेल के जरिए ही मीडियार् और इसके तहत काम करनेवार्ले विभिन्न समार्चार्र संगठनों की पत्रकारितार् क निर्धार्रण होतार् है।

एडवोकेसी पत्रकारितार्

 एडवोकेसी यार्नि पैरवी करनार्। किसी खार्स मुद्दे यार् विचार्रधार्रार् के पक्ष में जनमत बनार्ने के लिए लगार्तार्र अभियार्न चलार्नेवार्ली पत्रकारितार् को एडवोकेसी पत्रकारितार् कहार् जार्तार् है। मीडियार् व्यवस्थार् क ही एक अंग है। और व्यवस्थार् के सार्थ तार्लमेल बिठार्कर चलनेवार्ले मीडियार् को मुख्यधार्रार् मीडियार् कहार् जार्तार् है। दूसरी ओर कुछ ऐसे वैकल्पिक सोच रखनेवार्लार् मीडियार् होते हैं जो किसी विचार्रधार्रार् यार् किसी खार्स उद्देश्य की पूर्ति के लिए निकाले जार्ते हैं। इस तरह की पत्रकारितार् को एडवोकेसी (पैरवी) पत्रकारितार् कहार् जार्तार् है। जैसे रार्ष्ट्रीय विचार्रधार्रार्, धामिक विचार्रधार्रार् से जुड़े पत्र पत्रिकाएँ।

पीत पत्रकारितार् 

पार्ठकों को लुभार्ने के लिए झूठी अफवार्हों, आरोपों प्रत्यार्रोपों प्रमे संबंधों आदि से संबंधित सनसनीखेज समार्चार्रों से संबंधित पत्रकारितार् को पीत पत्रकारितार् कहार् जार्तार् है। इसमें सही समार्चार्रों की उपेक्षार् करके सनीसनी फैलार्नेवार्ले समार्चार्र यार् ध्यार्न खींचनेवार्लार् शीर्षकों क बहुतार्यत में प्रयोग कियार् जार्तार् है। इसे समार्चार्र पत्रों की बिक्री बढ़ार्ने, इलेक्ट्रिनिक मीडियार् की टीआरपी बढ़ार्ने क घटियार् तरीक मार्नार् जार्तार् है। इसमें किसी समार्चार्र खार्सकर एसेे सावजनिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति द्वार्रार् कियार् गयार् कुछ आपत्तिजनक कार्य, घोटार्ले आदि को बढ़ार्चढ़ार्कर सनसनी बनार्यार् जार्तार् है। इसके अलार्वार् पत्रकार द्वार्रार् अव्यवसार्यिक तरीके अपनार्ए जार्ते हैं।

पेज थ्री पत्रकारितार् 

पजे थ्री पत्रकारितार् उसे कहते हैं जिसमें फैशन, अमीरों की पाटियों महिलार्ओं और जार्नेमार्ने लोगों के निजी जीवन के बार्रे में बतार्यार् जार्तार् है।

खेल पत्रकारितार् 

खेल से जुड़ी पत्रकारितार् को खेल पत्रकारितार् कहार् जार्तार् है। खेल आधुनिक हों यार् प्रार्चीन खेलों में हार्नेेवार्ले अद्भूत कारनार्मों को जग जार्हिर करने तथार् उसक व्यार्पक प्रचार्र-प्रसार्र करने में खेल पत्रकारितार् क महत्वपूर्ण योगदार्न रहार् है। आज परूी दुनियार् में खेल यदि लोकप्रियतार् के शिखर पर है तो उसक काफी कुछ श्रेय खेल पत्रकारितार् को भी जार्तार् है। खेल केवल मनोरंजन क सार्धन ही नहीं बल्कि अच्छे स्वार्स्थ्य, शार्रीरिक दमखम और बौद्धिक क्षमतार् क भी प्रतीक है। यही कारण है कि पूरी दुनियार् में अति प्रार्चीनकाल से खलेों क प्रचलन रहार् है। आज आधुनिक काल में पुरार्ने खेलों के अलार्वार् इनसे मिलते जुलते खेलों तथार् अन्य आधुनिक स्पर्धार्त्मक खलेों ने परूी दुनियार् में अपनार् वर्चस्व कायम कर रखार् है। आज स्थिति यह है कि समार्चार्र पत्र तथार् पत्रिकाओं के अलार्वार् किसी भी इलेक्ट्रनिक मीडियार् क स्वरूप भी तब तक परिपूर्ण नहीं मार्नार् जार्तार् जब तक उसमें खेल क भरपूर कवरेज नहीं हो। दूसरी बार्त यह है कि आज भार्रत ही नहीं पूरी दुनियार् में आबार्दी क एक बड़ार् हिस्सार् युवार् वर्ग क है जिसकी पहली पसंद विभिन्न खले स्पर्धार्एं हैं। शार्यद यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में अगर सबसे अधिक कोर्इ पन्न पढ़े जार्ते हैं तो वह खेल से संबेधित होते हैं। प्रिंट मीडियार् के अलार्वार् टीवी चार्नै लों क भी एक बड़ार् हिस्सार् खले प्रसार्रण से जुड़ार् हार्तेार् है। दूसरी आरे कुछ खेल चैनल हैं जो चौबीसों घंटे कोर्इ न कोर्इ खले लेकर हार्जिर ही रहते हैं। पार्ठकों और दर्शकों की खले के प्रति दीवार्नगी क ही नतीजार् है कि आज खेल की दुनियार् में अकूत धन बरस रहार् है। आज धन चार्हे विज्ञार्पन के रूप में हो चार्हे पुरस्कार रार्शि के रूप में न लुटार्नेवार्लो ं की कमी है आरै पार्नेवार्लों की। खलेों में धन वर्षार् क प्रार्रंभ कर्पोरेट जगत के इसमें प्रवश्े ार् से हुआ। खलेों में धन की बरसार्त में कोर्इ बुरार्इर् नहीं है लेकिन उसक बदसूरत पहलू भी है। खलेों में गलार्काट स्पर्धार् के कारण इसमें फिक्सिंग और डोपिगं जैसी बुरार्इयों क प्रचलन भी बढ़ने लगार् है। फिक्सिंग और डोपिगं जैसी बरुार्इयार्ं न खिलार्ड़ियार्ंे के हित में है और न खलेों के। खले पत्रकारितार् की यह जिम्मदेार्री है कि वह खलेों में पनप रही उन बुरार्इयों के खिलार्फ लगार्तार्र आवार्ज उठार्ती रहे। खेल पत्रकारितार् से यह अपेक्षार् की जार्ती है कि खेल में खेल भार्वनार् की रक्षार् हर कीमत पर होनी चार्हिए। खेल पत्रकारितार् से यह उम्मीद भी की जार्नी चार्हिए कि आम लोगों से जुड़े खलेों को भी उतनार् ही महत्व और प्रोत्सार्हन मिले जितनार् अन्य लोकप्रिय खलेों को मिल रहार् है।

महिलार् पत्रकारितार् 

महिलार् परुु“ार् समार्नतार् के इस दौर में महिलार्एं अब घर की दहलीज लार्ंघ कर बार्हर आ चुकी है। प्रार्य: हर क्षेत्र में महिलार्ओं की उपस्थिति और भार्गिदार्री नजर आ रही है। ऐसे में पत्रकारितार् के क्षेत्र में महिलार्ओं की भार्गिदार्री भी देखी जार्ने लगी है। दूसरी बार्त यह है कि शिक्षार् ने महिलार्ओं को अपने अधिकारों के प्रति जार्गरूक बनार्यार् है। अब महिलार्एं भी अपने करियर के प्रति सचेत हैं। महिलार् जार्गरण के सार्थ सार्थ महिलार्ओं के प्रति अत्यार्चार्र और अपरार्ध के मार्मले भी बढ़े हैं। महिलार्ओं की सार्मार्जिक सुरक्षार् सुनिश्चित करने के लिए बहुत सार्रे कानून बने हैं। महिलार्ओं को सार्मार्जिक सुरक्षार् दिलार्ने में महिलार् पत्रकारितार् की अहम भूमिक रही है। आज महिलार् पत्रकारितार् की अलग से जरूरत ही इसलिए है कि उसमें महिलार्ओं से जुड़े हर पहलू पर गौर कियार् जार्ए और महिलार्ओं के सवांगीण विकास में यह महत्वपूर्ण भूमिक निभार् सके।

वर्तमार्न दौर में रार्जनीति, प्रशार्सन, सेनार्, शिक्षण, चिकित्सार्, विज्ञार्न, तकनीकी, उद्योग, व्यार्पार्र, समार्जसेवार् आदि सभी क्षेत्रों में महिलार्ओं ने अपनी प्रतिभार् और दक्षतार् के बलबतू अपनी रार्ह खुद बनाइ है। कर्इ क्षेत्रों में तो कड़ी स्पर्धार् और चुनौती के बार्वजूद महिलार्ओं ने अपनार् शीर्ष मुकाम बनार्यार् है। विकास के निरंतर तेज गति से बदलते दार्रै ने महिलार्ओं को प्रगति क समार्न अवसर प्रदार्न कियार् लेकिन पुरुषों की तुलनार् में अपनी प्रतिभार् आरै लगन के बलबतू पर समार्ज के हर क्षेत्र में अपनी अमिट छार्प छोडऩे क जो सिलसिलार् शुरू कियार् है वह लगार्तार्र जार्री है। इसक उदार्हरण भार्रत की इंदिरार् नूर्इ, नैनार् किदवाइ, चंदार् कोचर, नंदिनी भट्टार्चाय, सार्क्षी मलिक, पीवी सिंधु आदि के रूप में देखार् जार् सकतार् है। आज के दौर में कोर्इ भी ऐसार् क्षेत्र नहीं जहार्ं महिलार्ओं की उपस्थिति महसूस नहीं की जार् रही हो। ऐसे में पत्रकारितार् भी कहार्ं पिछे रहेगी। मृणार्ल पार्ंडे, विमलार् पार्टील, बरखार् दत्त, सीमार् मुस्तफार्, तवलीन सिंह, मीनल बहोल, सत्य शरण, दीनार् वकील, सुनीतार् ऐरन, कुमुद संघवी चार्वरे, स्वेतार् सिंह, पूर्णिमार् मिश्रार्, मीमार्ंसार् मल्लिक, अंजनार् ओम कश्यप, नेहार् बार्थम, मिनार्क्षी कंडवार्ल आदि महिलार् पत्रकारों के आने से देश के हर लड़की को अपने जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणार् मिल रही है।

महिलार् पत्रकारितार् की साथकतार् महिलार् सशक्तिकरण से जुड़ी है, क्योंकि नार्री स्वार्तंत्र्य और समार्नतार् के इस युग में भी आधी दुनियार् से जुड़ ऐसे अनेक पहलू हैं जिनके महत्व को देखते हुए महिलार् पत्रकारितार् की अलग विधार् की जरूरत महसूस की जार् रही है।

बार्ल पत्रकारितार् 

एक समय थार् जब बच्चों को परीकथार्ओं, लोककथार्ओं पौरार्णिक, ऐतिहार्सिक, धामिक कथार्ओं के मार्ध्यम से बहलार्ने फुसलार्ने के सार्थ सार्थ उनक ज्ञार्नवर्धन कियार् जार्तार् थार्। इन कथार्ओं क बच्चों के चार्रित्रिक विकास पर भी गहरार् प्रभार्व होतार् थार्। लेकिन आज संचार्र क्रार्ंति के इस युग में बच्चों के लिए सूचनार्तंत्र काफी विस्तृत और अनंत हो गयार् है। कंप्यूटर और इंटरनेट तक पहुंच ने उनके बार्ल मन स्वभार्व के अनुसार्र जिज्ञार्सार् को असीमित बनार् दियार् है। ऐसे में इस बार्त की आशंक और गुंजार्इश बनी रहती है कि बच्चों तक वे सूचनार्एं भी पहुंच सकती है जिससे उनके बार्लमन के भटकाव यार् वि‟ ती भी संभव है। एसे ी स्थिति में बार्ल पत्रकारितार् की साथक सोच बच्चों को सही दिशार् की आरे अग्रसर कर सकती है। क्योंिक बार्ल मन स्वभार्वतरू जिज्ञार्सु आरै सरल हार्ते ार् है। जीवन की यह वह अवस्थार् है जिसमें बच्चार् अपने मार्तार् पितार्, शिक्षक और चार्रों तरफ के परिवेश से ही सीखतार् है। बच्चे पर किसी भी घटनार् यार् सूचनार् की अमिट छार्प पड़ती है। बच्चे के आसपार्स क परिवेश उसके व्यक्तित्व निर्मार्ण में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है। एसेे में उसे सही दिशार् दिखार्नार् क काम पत्रकारितार् ही कर सकतार् है। इसलिए बार्ल पत्रकारितार् की महसूस की जार्ती है।

आर्थिक पत्रकारितार् 

आर्थिक पत्रकारितार् में व्यक्तियों संस्थार्नार्ंे रार्ज्यों यार् देशों के बीच हार्नेेवार्ले आर्थिक यार् व्यार्पार्रिक संबंध के गुण-दोषों की समीक्षार् और विवेचन की जार्ती है। जिस प्रकार आमतौर पर पत्रकारितार् क उद्देश्य किसी भी व्यवस्थार् के गुण दोषों को व्यार्पक आधार्र पर प्रचार्रित प्रसार्रित करनार् है ठीक उसी तरह आर्थिक पत्रकारितार् अर्थ व्यवस्थार् के हर पहलू पर सूक्ष्म नजर रखते हुए उसक विश्लष्ेार्ण कर समार्ज पर पड़नेवार्ले उसके प्रभार्वों क प्रचार्र प्रसार्र करनार् होनार् चार्हिए। दूसरी बार्त यह भी है कि आर्थिक पत्रकारितार् को आर्थिक व्यवस्थार् और उपभेक्तार् के बीच सेतू की भूमिक निभार्नी पड़ती है।

आर्थिक उदार्रीकरण आरै विभिन्न देशों के बीच आपसी व्यार्पार्रिक संबंधों ने पूरी दुनियार् के आर्थिक परि„श्य को बहुत ही व्यार्पक बनार् दियार् है। आज किसी भी देश की अर्थ व्यवस्थार् बहुत कुछ अंतर्रार्ष्ट्रीय व्यार्पार्र संबंधों पर निर्भर हो गर्इ है। दुनियार् के किसी कोने में मची आर्थिक हलचल यार् उथल पुथल अन्य देशों की अर्थ व्यवस्थार् को प्रभार्वित करने लगी है। सोने और चार्दंी जैसी बहुमूल्य धार्तुओं कच्चे तेल, यूरो, डलर, पार्ंड, येन जैसी मुद्रार्ओं की कीमतों में उतार्र चढ़ार्व क प्रभार्व पूरी दुनियार् पड़ने लगी है। कहने क मतलब यह है कि हर देश अपनी अर्थ व्यवस्थार्ओं के स्वयं नियार्मक एवं नियंत्रक हों लेकिन विश्व के आर्थिक हलचलों से अछूते नहीं हैं। पूरार् विश्व एक बड़ार् बार्जार्र बन गयार् है। इसलिए उसकी गतिविधियों से देश की अर्थ व्यवस्थार् निर्धार्रित होने लगी है। ऐसे में पत्रकारितार् एक प्रमुख भूमिक निर्वार्ह कर रही है। उस पर एक बड़ी जिम्मेदार्री है कि विश्व की अर्थ व्यवस्थार् को प्रभार्वित करनेवार्ले विभिन्न कारकों क निरंतर विश्लष्ेार्ण करने के सार्थ सार्थ उसके गुण दोषों के आधार्र पर एहतियार्ती उपार्यों की चर्चार् करे। इसमें लेकिन विश्व क आर्थिक परिवेश को जार्नने समझने की एक बड़ी चुनौती होती है। इयके अलार्वार् कर चोरी, कालार्धन और जार्ली नोट की समस्यार् को उजार्गर करनार् भी एक चुनौती होती है। विकसित और विकासशील देशों में कालार्धन सबसे बड़ी चुनौती है। कालार्धन भ्रष्टार्चार्र से उपजतार् है और भ्रष्टार्चार्र को ही बढ़ार्वार् देतार् है। भ्रष्टार्चार्र देश के विकास में बार्धक बनती है। इसलिए आर्थिक पत्रकारितार् की जिम्मेदार्री है कि कालार्धन आरै आर्थिक अपरार्धों को उजार्गर करनेवार्ली खबरों क व्यार्पक प्रचार्र प्रसार्र करे। दूसरी आरे व्यार्पार्र के परंपरार्गत क्षेत्रों के अलार्वार् रिटेल, बीमार्, संचार्र, विज्ञार्न एवं तकनीकी व्यार्पार्र जैसे आधुनिक क्षेत्रों ने आर्थिक पत्रकारितार् को नयार् आयार्म दियार् है।

ग्रार्मीण एवं कृषि पत्रकारितार् 

भार्रत जैसे कृषि प्रधार्न देश में हमार्री अथर् व्यवस्थार् काफी कुछ कृषि और कृषि उत्पार्दों पर निर्भर है। भार्रत में आज भी लगभग 70 प्रतिशत आबार्दी गार्ंवों में बसती है। देश के बजट प्रार्वधार्नार्ंे क बड़ार् हिस्सार् कृषि एवं ग्रार्मीण विकास पर खर्च होतार् है। ग्रार्मीण विकास के बिनार् देश क विकास अधूरार् है। ऐसे में आर्थिक पत्रकारितार् क एक महत्वपूर्ण जिम्मेदार्री है कि वह कृषि एवं कृषि आधार्रित योजनार्ओं तथार् ग्रार्मीण भार्रत में चल रहे विकास कार्यक्रम क सटीक आकलन कर तस्वीर पेश करे।

विशेषज्ञ पत्रकारितार् 

पत्रकारितार् केवल घटनार्ओं की सूचनार् देनार् नहीं है। पत्रकार से अपेक्षार् की जार्ती है कि वह घटनार्ओं की तह तक जार्कर उसक अर्थ स्पष्ट करे और आम पार्ठक को बतार्ए कि उस समार्चार्र क क्यार् महत्व है। इसलिए पत्रकार को भी विशेषज्ञ बनने की जरूरत पड़ती है। पत्रकारितार् में विषय के आधार्र पर सार्त प्रमुख क्षेत्र हैं। इसमें संसदीय पत्रकारितार्, न्यार्यार्लय पत्रकारितार्, अर्थिक पत्रकारितार्, खेल पत्रकारितार्, विज्ञार्न और विकास पत्रकारितार्, अपरार्ध पत्रकारितार् तथार् फेशन आरै फिल्म पत्रकारितार् शार्मिल हैं। इन क्षेत्रों के समार्चार्र उन विषयों में विशष्ेार्ज्ञतार् हार्सिल किए बिनार् देनार् कठिन हार्तेार् है। एसेे में इन विषयों के जार्नकार ही विषय की समस्यार्, विषय के गुण दार्ष्ेार् आदि पर सटिक जार्नकारी हार्सिल कर सकतार् है।

रेडियो पत्रकारितार् 

मुद्रण के आविष्कार के बार्द संदशेार् और विचार्रों को शक्तिशार्ली आरै प्रभार्वी ढंग से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचनार् मनुष्य क लक्ष्य बन गयार्। इसी से रेडियो क जन्म हुआ। रेडियो के आविष्यकार के जरिए आवार्ज एक ही समय में असख्ं य लोगों तक उनके घरों को पहुंचने लगार्। इस प्रकार श्रव्य मार्ध्यम के रूप में जनसंचार्र को रेडियो ने नये आयार्म दिए। आगे चलकर रेडियो को सिनेमार् और टेलीविजन और इंटरनेट से कडी चुनौतियार्ं मिली लेकिन रेडियो अपनी विशिष्टतार् के कारण आगे बढ़तार् गयार् और आज इसक स्थार्न सुरक्षित है। रेडियो की विशेषतार् यह है कि यह सावजनिक भी है और व्यक्तिगत भी। रेडियो में लचीलार्पन है क्योंकि इसे किसी भी स्थार्न पर किसी भी अवस्थार् में सुनार् जार् सकतार् है। दूसरार् रोडियो समार्चार्र और सूचनार् तत्परतार् से प्रसार्रित करतार् है। मौसम संबंधी चेतार्वनी और प्रार्‟तिक विपत्तियों के समय रेडियो क यह गुण शक्तिशार्ली बन पार्तार् है। आज भार्रत के कोने-कोने में देश की 97 प्रतिशत जनसंख्यार् रेडियो सुन पार् रही है। रेडियो समार्चार्र ने जहार्ं दिन प्रतिदिन घटित घटनार्ओं की तुरंत जार्नकारी क कार्यभार्र संभार्ल रखार् है वहीं श्रोतार्ओं के विभिन्न वर्गों के लिए विविध कार्यक्रमों की मदद से सूचनार् और शिक्षार् दी जार्ती है। जैसे युवार्ओं, महिलार्ओं, बच्चों किसार्न, गृहिणी, विद्याथियों के लिए अलग अलग समय में कार्यक्रम प्रसार्रित होते हैं। इस तरह हर वर्ग जोड़े रखने में यह एक सशक्त मार्ध्यम के रूप में उभरकर सार्मने आयार् है।

व्यार्ख्यार्त्मक पत्रकारितार् 

पत्रकारितार् केवल घटनार्ओं की सूचनार् देनार् नहीं है। पत्रकार से अपेक्षार् की जार्ती है कि वह घटनार्ओं की तह तक जार्कर उसक अर्थ स्पष्ट करे और आम पार्ठक को बतार्ए कि उस समार्चार्र क क्यार् महत्व है। पत्रकार इस महत्व को बतार्ने के लिए विभिन्न प्रकार से उसकी व्यार्ख्यार् करतार् है। इसके पीछे क्यार् कारण है। इसके पीछे कौन थार् और किसक हार्थ है। इसक परिणार्म क्यार् होगार्। इसके प्रभार्व से क्यार् होगार् आदि की व्यार्ख्यार् की जार्ती है। सार्प्तार्हिक पत्रिकाओं संपार्दकीय लेखों में इस तरह किसी घटनार् की जार्ंच पड़तार्ल कर व्यार्ख्यार्त्मक समार्चार्र पेश किए जार्ते हैं। टीवी चैनलों में तो आजकल यह ट्रेडं बन गयार् है कि किसी भी छोटी सी छोटी घटनार्ओं के लिए भी विशेषज्ञ पेनल बिठार्कर उसकी सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक व्यार्ख्यार् की जार्ने लगी है।

विकास पत्रकारितार् 

लोकतंत्र क मूल उद्देश्य है लोगों के लिए शार्सन लोगों के द्वार्रार् शार्सन। इस लोकतंत्र में तीन मुख्य स्तंभ है। इसमें संसदीय व्यवस्थार्, शार्सन व्यवस्थार् एवं कानून व्यववस्थार्। इन तीनों की निगरार्नी रखतार् है चौथार् स्तंभ – पत्रकारितार्। लोकतंत्र क मूल उद्देश्य है लोगों के लिए। शार्सन द्वार्रार् लोगों क जीवन स्तर सुधार्रने के लिए सही ढंग से काम कियार् जार् रहार् है यार् नहीं इसक लेखार् जोखार् पेश करने की जिम्मेदार्री मीडियार् पर है। इसक खार्सकर भार्रत जैसे विकासशील देशों के लिए आरै भी अहम भूमिक है। देश में शिक्षार्, स्वार्स्थ्य, बेरोजगार्री, कृषि एवं किसार्न, सिंचाइ, परिवहन, भूखमरी, जनसंख्यार् बढ़ने प्रार्‟तिक आपदार् जैसी समस्यार्एं हैं। इन समस्यार्ओं से निपटने सरकार द्वार्रार् क्यार् क्यार् कदम उठार्ए जार् रहे हैं। कोर्इ योजनार् बनी तो उसक फार्यदार् लोगों तक पहुंच पार् रहार् यार् नहीं यार् उसे सही ढंग से लार्गू कियार् जार् रहार् है यार् नहीं उस बार्रे में पत्रकार विश्लेषण कर समार्चार्र पेश करने से शार्सक की आख्ंों खुल सकती है। कहने क तार्त्पर्य यह कि क्यार् इन सरकारी योजनओं से देश क विकास हो रहार् है यार् नहीं उसक आकलन करनार् ही विकास पत्रकारितार् क कार्य है। विकास पत्रकारितार् के जरिए ही इसमें यथार् संभव सुधार्र लार्ने क माग प्रशस्त होगार्।

संसदीय पत्रकारितार् 

लोकतंत्र में संसदीय व्यवस्थार् की प्रमुख भूमिक है। संसदीय व्यवस्थार् के तहत संसद में जनतार् द्वार्रार् चुने हुए प्रतिनिधि पहुंचते हैं। बहुमत हार्सिल करनेवार्लार् शार्सन करतार् है तार्े दूसरार् विपक्ष में बैठतार् है। दार्नेों की अपनी अपनी अहम भूमिक होती है। इनके द्वार्रार् किए जार् रहे कार्य पर नजर रखनार् पत्रकारितार् की अहम जिम्मेदार्री है क्योंकि लोकतंत्र में यही एक कड़ी है जो जनतार् एवं नेतार् के बीच काम करतार् है। जनतार् किसी क चुनार्व इसलिए करते हैं तो वह लोगों की सुख सुविधार् तथार् जीवनस्तर सुधार्रने में कार्य करे। लेकिन चुनार् हुआ प्रतिनिधि यार् सरकार अगर अपने माग पर नहीं चलते हैं तो उसको चेतार्ने क कार्य पत्रकारितार् करती है। इनकी गतिविधि, इनके कार्य की निगरार्नी करने क कार्य पत्रकारितार् करती है।

टेलीविजन पत्रकारितार् 

समार्चार्र पत्र एवं पत्रिक के बार्द श्रव्य मार्ध्यम क विकास हुआ। और इसके बार्द श्रव्य „श्य मार्ध्यम क विकास हुआ। दूर संचार्र क्रार्ंति में सेटेलाइट, इंटरनेट के विकास के सार्थ ही इस मार्ध्यम क इतनी तेजी से विकास हुआ कि आज इसके बिनार् चलनार् मुश्किल सार् हार्े गयार् है। इसे मुख्यत: तीन वर्गों में रखार् जार् सकतार् है जिसमें सूचनार्, मनोरंजन और शिक्षार्। सूचनार् में समार्चार्र, सार्मयिक विषय आरै जनसचार्र उद्घोषणार्एं आते हैं। मनोरजंन के क्षेत्र में फिल्मों से संबंधित कार्यक्रम, नार्टक, धार्रार्वार्हिक, नृत्य, संगीत तथार् मनोरजं न के विविध कार्यक्रम शार्मिल हैं। इन कार्यक्रमों क प्रमखु उद्देश्य लोगों क मनोरंजन करनार् है। शिक्षार् क्षेत्र में टेलीविजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदार्री है। पार्ठय सार्मग्री पर आधार्रित और सार्मार्न्य ज्ञार्न पर आधार्रित दार् े वर्गों में शैक्षिक कार्यक्रमों को बार्ंटार् जार् सकतार् है।

आज उपगह्र के विकास के सार्थ ही समार्चार्र चैनलों के बीच गलार्काट प्रतिस्पर्धार् चल पड़ी है। इसके चलते छोटी सी छोटी घटनार्ओं क भी लार्इव कवरेज होने लगार् है।

विधि पत्रकारितार् 

लोकतंत्र के चार्र स्तंभ में विधि व्यवस्थार् की भूमिक महत्वपूर्ण है। नए कानून, उनके अनुपार्लन और उसके प्रभार्व से लोगों को परिचित करार्नार् बहुत ही जरूरी है। कानून व्यवस्थार् बनार्ए रखनार्, अपरार्धी को सजार् देनार् से लेकर शार्सन व्यवस्थार् में अपरार्ध रार्के ने, लोगों को न्यार्य प्रदार्न करनार् इसक मुख्य कार्य है। इसके लिए निचली अदार्लत से लेकर उच्च न्यार्यार्लय, सर्वोच्च न्यार्यार्लय तक व्यवस्थार् है। इसमें रोजार्नार् कुछ न कुछ महत्वपूर्ण फैसले सुनार्ए जार्ते हैं। कर्इ बड़ी बड़ी घटनार्ओं के निर्णय, उसकी सुनवाइ की प्रक्रियार् चलती रहती है। इसबार्रे में लोग जार्नेन की इच्छुक रहते हैं, क्योंकि कुछ मुकदमें ऐसे होते हैं जिनक प्रभार्व समार्ज, संप्रदार्य, प्रदेश एवं देश पर पड़तार् है। दूसरी बार्त यह है कि दबार्व के चलते कानून व्यवस्थार् अपरार्धी को छोड़कर निर्दोष को सजार् तो नहीं दे रही है इसकी निगरार्नी भी विधि पत्रकारितार् करती है।

फोटो पत्रकारितार् 

फोटो पत्रकारितार् ने छपाइ तकनीक के विकास के सार्थ ही समार्चार्र पत्रों में अहम स्थार्न बनार् लियार् है। कहार् जार्तार् है कि जो बार्त हजार्र शब्दार्ंे में लिखकर नहीं की जार् सकती है वह एक तस्वीर कह देती है। फोओ टिप्पणियों क असर व्यार्पक और सीधार् होतार् है। दूसरी बार्त ऐसी घटनार् जिसमें सबूत की जरूरत हार्तेी है वसैे समार्चार्रों के सार्थ फार्टेो के सार्थ समार्चार्र पशेार् करने से उसक विश्वसनीयतार् बढ़ जार्ती है।

विज्ञार्न पत्रकारितार् 

इक्कीसवीं शतार्ब्दी को विज्ञार्न क युग कहार् गयार् है। वर्तमार्न में विज्ञार्न ने काफी तरक्की कर ली है। इसकी हर जगह पहुचं हो चली है। विज्ञार्न में हमार्री जीवन शैली को बदलकर रख दियार् है। वैज्ञार्निकों द्वार्रार् रोजार्नार् नर्इ नर्इ खोज की जार् रही है। इसमें कुछ तो जनकल्यार्णकारी हैं तो कुछ विध्वंसकारी भी है। जैसे परमार्णु की खोज से कर्इ बदलार्व लार् दियार् है लेकिन इसक विध्वंसकारी पक्ष भी है। इसे परमार्णु बम बनार्कर उपयोग करने से विध्वंस हार्गेार्। इस तरह विज्ञार्न पत्रकारितार् दोनों पक्षों क विश्लेषण कर उसे पेश करने क कार्य करतार् है। जहार्ं विज्ञार्न के उपयोग से कैसे जीवन शैली में सुधार्र आ सकतार् है तो उसक गलत उपयोग से संसार्र ध्वंस हो सकतार् है।

विज्ञार्न पत्रकारों को विस्तृत तकनीकी आरै कभी कभी शब्दजार्ल को दिलचस्प रिपोर्ट में बदलकर समार्चार्र पार्ठक दर्शक की समझ के आधार्र पर प्रस्तुत करनार् होतार् है। वैज्ञार्निक पत्रकारों को यह निश्चिय करनार् होगार् कि किस वैज्ञार्निक घटनार्क्रम में विस्तृत सूचनार् की योग्यतार् है। सार्थ ही वैज्ञार्निक समुदार्य के भीतर होनवेार्ले विवार्दार्ंे को बिनार् पक्षपार्त के आरै तथ्यों के सार्थ पेश करनार् चार्हिए।

शैक्षिक पत्रकारितार् 

शिक्षार् के बिनार् कुछ भी कल्पनार् करनार् संभव नहीं है। पत्रकारितार् सभी नर्इ सूचनार् को लोगों तक पहुंचार्कर ज्ञार्न में वृद्धि करती है। जब से शिक्षार् को औपचार्रिक बनार्यार् गयार् है तब से पत्रकारितार् क महत्व और बढ़ गयार् है। जब तक हमें नर्इ सूचनार् नहीं मिलगेी हमें तब तक अज्ञार्नतार् घेर कर रखी रहेगी। उस अज्ञार्नतार् को दूर करने क सबसे बड़ार् मार्ध्यम है पत्रकारितार्। चार्हे वह रेडियो हार्े यार् टेलीविजन यार् समार्चार्र पत्र यार् पत्रिकाएं सभी में नर्इ सूचनार् हमें प्रार्प्त हार्तेी है जिससे हमें नर्इ शिक्षार् मिलती है। एक बार्त आरै कि शिक्षित व्यक्ति एक मार्ध्यम में संतुष्ट नहीं होतार् है। वह अन्य मार्ध्यम को भी देखनार् चार्हतार् है। यह जिज्ञार्सार् ही पत्रकारितार् को बढ़ार्वार् देतार् है तो पत्रकारितार् उसकी जिज्ञार्सार् के अनुरूप शिक्षार् एवं ज्ञार्न प्रदार्न कर उसकी जिज्ञार्सार् को शार्ंत करने क प्रयार्स करतार् है। इसे पहुंचार्नार् ही शैक्षिक पत्रकारितार् क कार्य है।

सार्ंस्कृतिक-सार्हित्यिक पत्रकारितार् 

मनुष्य में कलार्, संस्‟ति एवं सार्हित्य की भूमिक निर्विवार्दित है। मनुष्य में छिपी प्रतिभार्, कलार् चार्हे वह किसी भी रूप में हो उसे देखने से मन को तृप्ति मिलती है। इसलिए मनुष्य हमेशार् नर्इ नर्इ कलार्, प्रतिभार् की खोज में लगार् रहतार् है। इस कलार् प्रतिभार् को उजार्गर करने क एक सशक्त मार्ध्यम है पत्रकारितार्। कलार् प्रतिभार्ओं के बार्रे में जार्नकारी रखनार्, उसके बार्रे में लोगों को पहुंचार्ने क काम पत्रकारितार् करतार् है। इस सार्ंस्कृतिक सार्हित्यिक पत्रकारितार् के कारण आज कर्इ विलुप्त प्रार्चीन कलार् जैसे लोकनृत्य, लोक संगीत, स्थार्पत्य कलार् को खोज निकालार् गयार् है और फिर से जीवित हो उठे हैं। दूसरी ओर भार्रत जैसे विशार्ल और बहु सार्ंस्कृति वार्ले देश में सार्ंस्कृतिक सार्हित्यिक पत्रकारितार् के कारण देश की एक अलग पहचार्न बन गर्इ है। कुछ आंचलिक लोक नृत्य, लोक संगीत एक अंचल से निकलकर देश, दुनियार् तक पहचार्न बनार् लियार् है। समार्चार्र पत्र एवं पत्रिकाएं प्रार्रंभ से ही नियमित रूप से सार्ंस्कृतिक सार्हित्यिक कलम को जगह दी है। इसी तरह चौनलों पर भी सार्ंस्कृतिक, सार्हित्यिक समार्चार्रों क चलन बढ़ार् है। एक अध्ययन के अनुसार्र दर्शकों के एक वर्ग ने अपरार्ध व रार्जनीति के समार्चार्र कार्यक्रमों से कहीं अधिक अपनी सार्ंस्कृति स े जुड़े समार्चार्रों व समार्चार्र कार्यक्रमों से जुड़नार् पसंद कियार् है। सार्हित्य व सार्ंस्कृति पर उपभेक्तार्वार्दी सार्ंस्कृति व बार्जार्र क प्रहार्र देखकर केद्रं व प्रदेश की सरकारें बहुत बड़ार् बजट इन्हें संरक्षित करने व प्रचार्रित प्रसार्रित करने में खर्च कर रही है। सार्हित्य एव सार्ंस्कृति के नार्म पर चलनेवार्ली बड़ी बड़ी सार्हित्यिक व सार्ंस्कृति संस्थार्ओं के बीच वार्द प्रतिवार्द, आरोप-प्रत्यार्रोप और गुटबार्जी ने सार्हित्य सार्ंस्कृति में मसार्लार् समार्चार्रों की संभार्वनार्ओं को बहुत बढ़ार्यार् है।

अपरार्ध पत्रकारितार् 

रार्जनीतिक समार्चार्र के बार्द अपरार्ध समार्चार्र ही महत्वपूर्ण होते हैं। बहुत से पार्ठकों व दशर्कों को अपरार्ध समार्चार्र जार्नने की भूख होती है। इसी भूख को शार्ंत करने के लिए ही समार्चार्रपत्रों व चौनलों में अपरार्ध डार्यरी, सनसनी, वार्रदार्त, क्रार्इम फार्इल जैसे समार्चार्र कार्यक्रम प्रकाशित एवं प्रसार्रित किए जार् रहे हैं। एक अनुमार्न के अनुसार्र किसी समार्चार्र पत्र में लगभग पैंतीस प्रतिशत समार्चार्र अपरार्ध से जुड़े हार्तेे हैं। इसी से अपरार्ध पत्रकारितार् को बल मिलार् है। दूसरी बार्त यह कि अपरार्धिक घटनार्ओं क सीधार् संबंध व्यक्ति, समार्ज, संप्रदार्य, धर्म और देश से हार्तेार् है। अपरार्धिक घटनार्ओं क प्रभार्व व्यार्पक हार्तेार् है। यही कारण है कि समार्चार्र संगठन बड़े पार्ठक दर्शक वर्ग क ख्यार्ल रखते हुए इस पर विशेष फोकस करते हैं।

रार्जनैतिक पत्रकारितार् 

समार्चार्र पत्रों में सबसे अधिक पढ़े जार्नेवार्ले आरै चैनलों पर सर्वार्धिक देखे सुने जार्नेवार्ले समार्चार्र रार्जनीति से जुड़े होते हैं। रार्जनीति की उठार् पटक, लटके झटके, आरोप प्रत्यार्रोप, रोचक रोमार्ंचक, झूठ-सच, आनार् जार्नार् आदि से जुड़े समार्चार्र सुर्खियों में होते हैं। रार्जनीति से जुड़े समार्चार्रों क परूार् क पूरार् बार्जार्र विकसित हो चुक है। रार्जनीतिक समार्चार्रों के बार्जार्र में समार्चार्र पत्र और समार्चार्र चौनल अपने उपभेक्तार्ओं को रिझार्ने के लिए नित नये प्रयोग करते नजर आ रहे हैं। चुनार्व के मौसम में तो प्रयोगों की झडी लग जार्ती है और हर कोर्इ एक दूसरे को पछार्ड़कर आगे निकल जार्ने की होड़ में शार्मिल हो जार्तार् है। रार्जनीतिक समार्चार्रों की प्रस्तुति में पहले से अधिक बेबार्की आयी है। लोकतंत्र की दुहाइ के सार्थ जीवन के लगभग हर क्षेत्र में रार्जनीति की दखल बढ़ार् है और इस कारण रार्जनीतिक समार्चार्रों की भी संख्यार् बढ़ी है। एसेे में इन समार्चार्रों को नजरअंदार्ज कर जार्नार् संभव नहीं है। रार्जनीतिक समार्चार्रों की आकर्षक प्रस्तुति लोकप्रियार् हार्सिल करने क बहुत बड़ार् सार्धन बन चुकी है।

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