पंच प्रणार्ली व पंचार्यतों क स्वरूप
पंचार्यती रार्ज क इतिहार्स कोर्इ नयार् नहीं अपितु यह आदिकाल से हमार्री पुरार्तन धरोहर है। भार्रतीय ग्रार्मीण व्यवस्थार् में सार्मुदार्यिकतार् की भार्वनार् प्रार्चीन काल से विद्यमार्न रही है। इसी सार्मुदार्यिकतार् व परम्परार्गत संगठन के आधार्र पर पंचार्यत व्यवस्थार् क जन्म हुआ। इसीलिए हमार्रे देश में पंचार्यतों की व्यवस्थार् भी सदियों से चली आ रही है। भार्रतीय संस्कृति के विकास के सार्थ पंचार्यती व्यवस्थार् क जन्म और विकास हुआ। पंचार्यत शब्द पंच+आयत से बनार् है। पंच क अर्थ है समुदार्य यार् संस्थार् तथार् आयत क अर्थ है विकास यार् विस्तार्र। अत: सार्मूहिक रूप से गार्ंव क विकास ही पंचार्यत क वार्स्तविक अर्थ है। ये संस्थार्यें हमार्रे समार्ज की बुनियार्दी संस्थार्यें हैं और किसी न किसी रूप में ये संस्थार्एं हमार्री संस्कृति व शार्सन प्रणार्ली क अभिन्न हिस्सार् रही हैं। ग्रार्मीण क्षेत्रों के विकास, प्रशार्सन व न्यार्य की जिम्मेदार्री इन्हीं संस्थार्ओं की थी।रार्जार् महार्रार्जार् भी स्थार्नीय स्तर पर काम काज के संचार्लन हेतु इन्हीं संस्थार्ओं पर निर्भर रहते थे। स्थार्नीय स्तर पर सत्तार् एक व्यक्ति के हार्थ में न रह कर सार्मूहिक रहती थी। इसी लिए इन्हें गणतन्त्र की स्थार्नीय इकार्इयों के रूप में मार्न-सम्मार्न दियार् जार्तार् थार्। ग्रार्म पंचार्यत ग्रार्मीण क्षेत्रों में शार्सन प्रबन्ध, शार्न्ति और सुरक्षार् की एकमार्त्र संस्थार्एं रही है। डार्क्टर रार्धार्कुमुद मुखर्जी ने लिखार् है कि “ये समस्त जनतार् की सार्मार्न्य सभार् के रूप में अपने सदस्यों के समार्न अधिकारों, स्वतंत्रतार्ओं के लिए निर्मित होती हें, तार्कि सब मं समार्नतार्, स्वतंत्रतार् तथार् बुधुत्व क विचार्र दृढ़ रहे।” अत: यह कहार् जार् सकतार् है कि हमार्रे देश में पंचार्यती रार्ज क गौरवशार्ली अतीत रहार् है।

पंच परमेश्वर प्रणार्ली 

प्रार्चीन काल में पंचार्यतों क स्वरूप कुछ और थार्। यद्यपि इन संस्थार्ओं को संवैधार्निक दर्जार् नही प्रार्प्त थार् लेकिन गार्ंवों से जुड़े विकास व न्यार्य सम्बन्धित निर्णयों के लिए ये संस्थार्एं पूर्ण रूप से जिम्मेदार्र थीं। प्रार्चीन काल में गार्ंवों में पंच परमेश्वर की प्रणार्ली मौजूद थी। गार्ंव में सर्वसहमति से चुने गये पार्ँच गणमार्न्य व बुद्धिमार्न व्यक्तियों को गार्ंव में न्यार्य व्यवस्थार् बनार्ने व गार्ंव के विकास हेतु निर्णय लेने क अधिकार थार्। उन्हें तो पंच परमेश्वर तक कहार् जार्तार् थार्। पंच परमेश्वर द्वार्रार् न्यार्य को सरल और सुलभ बनार्ने की प्रथार् काफी मजबूत थी। उस समय ये पंच एक संस्थार् के रूप में कार्य करते थे। गार्ंव के झगड़े, गार्ंव की व्यवस्थार्यें सुधार्रनार् जैसे मुख्य कार्य पंच परमेश्वर संस्थार् कियार् करती थी। उसके कायदे कानून लिखित नहीं होते थे फिर भी उनक प्रभार्व समार्ज पर ज्यार्दार् होतार् थार्। पंचों के फैसले के खिलार्फ जार्ने की कोर्इ सोच भी नही सकतार् थार्। पंचों क सम्मार्न बहुत थार् व उनके पार्स समार्ज क भरोसार् और तार्कत भी थी। लोग पंचों के प्रति बड़ार् विश्वार्स रखते थे और उनक निर्णय सहज स्वीकार कर लेते थे। पंच परमेश्वर भी बिनार् किसी पक्षपार्त के कोर्इ निर्णय कियार् करती थी। मंश्ु ार्ी प्रेमचन्द ने अपनी कहार्नी पंच परमेश्वर द्वार्रार् प्रार्चीन काल में स्थार्पित इस पंच प्रणार्ली को काफी सरल तरीके से समझार्यार् है। प्रार्चीन काल में जार्तिगत व कबार्इली पंचार्यतों क भी जिक्र भी मिलतार् है। इन पंचार्यतों के प्रमुख गार्ंव के विद्वार्न व कबीले के मुखियार् हुआ करते थे। इन पंचार्यतों में कोर्इ भी निर्णय लेने हेतु तब तक विचार्र विमर्श कियार् जार्तार् थार् जब तक कि सर्वसहमति से निर्णय न हो जार्ये।

स्थार्नीय स्वशार्सन की संस्थार्ओं के रूप में पंचार्यत व्यवस्थार् 

रार्जार्-महार्रार्जार् काल में स्थार्नीय स्वशार्सन को काफी महत्व दियार् गयार्। उनके द्वार्रार् भी जनतार् को सत्तार् सार्ंपै ने की प्रथार् को अपनार्यार् गयार्। भार्रत जसै े विशार्ल देश को एक केन्द्र से शार्सित करनार् रार्जार्ओं व सम्रार्टों के लिए सम्भव नहीं थार्। अत: रार्ज्य को सूबों, जनपद, ग्रार्म समितियों अथवार् ग्रार्म सभार्ओं में बार्ंटार् गयार्। वेदों, बौद्ध ग्रन्थों, जार्तक कथार्ओं, उपनिषदों आदि में इस व्यवस्थार् के रूप में पंचार्यतों के आस्तित्व के पूर्ण सार्क्ष्य मिलते हैंं। मनुस्मृति तथार् महार्भार्रत के शार्ंति पर्व में ग्रार्म सभार्ओं क उल्लेख है। रार्मार्यण में इसक वर्णन जनपदों के नार्म से आतार् है। महार्भार्रत काल में भी इन संस्थार्नों को पूर्ण स्वतन्त्रतार् प्रार्प्त थी। वैदिक कालीन तथार् उत्तर वैदिक कालीन इतिहार्स के अवलोकन में यह बार्त स्पष्ट हो गर्इ है कि प्रार्चीन भार्रत क प्रत्येक ग्रार्म एक छोटार् सार् स्वार्यत्त रार्ज्य थार्। इस प्रकार के कर्इ छोटे-छोटे गार्ंवों छोटे-छोटे प्रार्देशिक संघ मिलकर बड़े संघ बन जार्ते थे। संघ पूर्णत: स्वार्वलम्बी थे तथार् एक-दूसरे से बड़ी अच्छी तरह जुड़े हुए तथार् सम्बन्धित थे। कौटिल्य के अर्थशार्स्त्र में भी गार्ंव के छोटे छोटे गणरार्ज्य की बार्त कही गर्इ है। सर चार्ल्र्स मेटकाफ ने तो पंचार्यतों के लिये गार्ंव के छोटे छोटे गणतन्त्र कहार् थार् जो स्वयं में आत्मनिर्भर थे। बौद्ध व मौर्य काल के समय पंचार्यतों के आस्तित्व की बार्त कही गर्इ है। बौद्ध काल के संघों की कार्य पद्धति ग्रार्म रार्ज्य की प्रथार् को दर्शार्ती है। बौद्ध संघों के शार्सन की प्रणार्ली वस्तुत: भार्रत की ग्रार्म पंचार्यतों तथार् ग्रार्म संघों से ही ली गर्इ थी। गुप्त काल में भी ग्रार्म समितियार्ं पंचार्यतों के रूप में कार्य करती थीं। चन्द्रगुप्त के दरबार्र में रहने वार्ले यूनार्नी रार्जदूत मैगस्थनीज के वृतार्न्त से उसके बार्रे मं काफी सार्मग्री मिलती है। मैगस्थनीज के वृतार्न्त से उस समय के नगर प्रशार्सन तथार् ग्रार्म प्रशार्सन पर खार्सार् प्रकाश पड़तार् है। नगरों क प्रशार्सन भी पंचार्यती प्रणार्ली से ही होतार् थार् और पार्टलिपुत्र क प्रशार्सन उसकी सफलतार् क सूचक है। मैगस्थनीज के अनुसार्र नगर प्रशार्सन भी ग्रार्म प्रशार्सन की भार्ंति ही होतार् थार्। नगर क शार्सन एक निर्वार्चित संस्थार् के हार्थ में होतार् थार् जिसमें 30 सदस्य होते थे। सदस्य 6 समितियों में विभक्त होते थे। प्रत्येक समिति अलग-अलग विषयों क प्रबन्धन करती थी। कुछ विषय अवष्य ऐसे थे जो सीधी रार्जकीय नियंत्रण में होते थे।

प्रार्चीन काल में रार्जार् लोग महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय इन पंचार्यतों से पूर्ण विचार्र विमर्श करते थे। स्थार्नीय स्वशार्सन की ये संस्थार्एं स्थार्नीय स्तर पर अपनार् शार्सन खुद चलार्ती थी। लोग अपने विकास के बार्रे में खुद सोचते थे, अपनी समस्यार्यें स्वयं हल करते थे एवं अपने निर्णय स्वयं लेते थे। वार्स्तव में जिस स्वशार्सन की बार्त हम आज कर रहे हैं, असली स्वशार्सन वही थार्। यह कह सकते हैं कि हमार्रे गार्ंव क काम गार्ंव मे और गार्ंव क रार्ज गार्ंव मे थार्। पंचार्यत हमार्रे गार्ंव समार्ज की तार्कत थी। ग्रार्मों के इस संगठनों की सफलतार् क रहस्य केवल यह थार् कि ग्रार्मीण अपने अधिकारों की अपेक्षार् कर्तव्यों की अधिक चिंतार् करते थे। इस तरह भार्रत के ग्रार्मों के संगठन की परम्परार् उत्पन्न हुर्इ, पनपी ओर इसमें दीर्घकाल तक सफलतार् से देश के ग्रार्मीणों को समृद्ध, सुसम्पन्न तथार् आत्मनिर्भर बनार्यार्। पंचार्यतों के कारण ही काफी समय तक विदेशी अपनार् आर्थिक प्रभुत्व जमार्ने में असमर्थ रहे।

मध्य काल में पंचार्यतों के विकास पर खार्स ध्यार्न नहीं दियार् गयार्। इस दौरार्न समय-समय पर विदेषियों के आक्रमण भार्रत में हुए। मुगलों के भार्रत में आधिपत्य के सार्थ ही शार्सन प्रणार्ली में नकारार्त्मक बदलार्व आये। लोगों की अपनी बनाइ हुर्इ व्यवस्थार्एं चरमरार्कर धरार्शार्यी हो गर्इ। समस्त सत्तार् व शक्ति बार्दशार्ह व उसके खार्स कर्मचार्रियों के हार्थों में केन्द्रित हो गयी। यद्यार्पि मुगल बार्दशार्ह अकबर द्वार्रार् स्थार्नीय स्वशार्सन को महत्व दियार् गयार् और उस समय ग्रार्म स्तरीय समस्त कार्य पंचार्यतों द्वार्रार् ही कियार् जार्तार् थार्। लेकिन अन्य “ार्ार्सकों के शार्सनकाल में पंचार्यत व्यवस्थार् क धीरे-धीरे विघटन क दौर शुरू हुआ, जो ब्रिटिश काल के दौरार्न भी अंग्रेजों की केन्द्रीकरण की नीति के कारण चलतार् रहार्। पंच-परमेश्वर प्रथार् की अवहेलनार् से पंचार्यतों व स्थार्नीय स्वशार्सन को गहरार् झटक लगार्। जिसके परिणार्म स्वरूप जो छोटे-छोटे विवार्द पहले गार्ंव में ही सुलझ जार्यार् करते थे अब वह दबार्ये जार्ने लगे व सदियों से चली आ रही स्थार्नीय स्तर पर विवार्द निपटार्ने की प्रथार् क स्थार्न कोर्ट कचहरी ने लेनार् शुरू कियार्। जिन प्रार्कृतिक संसार्धनों की सुरक्षार् व उपयोग गार्ंव वार्ले स्वयं करते थे वे सब अंग्रेजी शार्सन के अन्र्तगत आ गये और उनक प्रबन्धन भी सरकार के हार्थों चलार् गयार्। स्थार्नीय लोगों के अधिकार समार्प्त हो गये। कुल मिलार् कर यह कहार् जार् सकतार् है कि स्थार्नीय स्वशार्सन की परम्परार् प्रार्चीन काल में काफी मजबूत थी। स्थार्नीय स्वशार्सन की संस्थार्एं जन समुदार्य की आवार्ज हुआ करती थी। वर्तमार्न की पंचार्यत व्यवस्थार् क मूल आधार्र हमार्री पुरार्नी सार्मुदार्यिक व्यवस्थार् ही है। यद्यपि मध्यकाल व ब्रिटिश काल मे पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् लडखड़ार् गर्इ थी लेकिन भार्रत की स्वतन्त्रतार् के पश्चार्त स्थार्नीय स्वशार्सन को मजबूत बनार्ने के लिए पुन: प्रयार्स शुरू हुए और पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् भार्रत मे पुन: स्थार्पित की गर्इ ।

पंच-परमेश्वर (कहार्नी) मुन्शी प्रेमचन्द

जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गार्ढ़ी मित्रतार् थी। सार्झे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी सार्झार् थार्। एक को दूसरे पर अटल विश्वार्स थार्। जुम्मन जब हज करने गये थे, और अलगू जब कभी बार्हर जार्ते, तो जुम्मन पर अपनार् घर छोड़ देते थे। उनमें न खार्न-पार्न क व्यवहार्र थार्, न धर्म क नार्तार्, केवल विचार्र मिलते थे। मित्रतार् क मूल मंत्र भी यही है। … और पढ़ें

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