न्यार्यिक पुनरार्वलोकन क अर्थ और परिभार्षार् एवं विशेषतार्एँ

भार्रत में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की उत्पत्ति को समझार्ते हुए, जस्टिस पी. बी. मुखर्जी ने स्पष्ट कियार्, भार्रत में यह संविधार्न ही है जो सर्वोच्च है और संसद के सार्थ-सार्थ रार्ज्य विधार्न सभार्ओं को न केवल संविधार्न की सार्तवीं सूची में दर्ज तीन सूचियों में वर्णित उन संबंधित क्षेत्रों की सीमार्ओं के अंदर ही कार्य करनार् होतार् है, बल्कि इसके सार्थ-सार्थ संविधार्न के भार्ग III के अधीन दिए गए मौलिक अधिकारों को दी गई संवैधार्निक सुरक्षार् को विश्वसनीय बनार्नार् होतार् है। न्यार्यार्लय किसी भी ऐसे कानून को रद्द कर देती हैं जोकि संविधार्न क उल्लंघन करने क दोषी पार्यार् जार्तार् है।

भार्रत में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन क संवैधार्निक आधार्र

संविधार्न क कोई भी एक अनुच्छेद न्यार्यार्लय की न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की व्यार्ख्यार् नहीं करतार्। इसकी संवैधनिक स्थिति और विधि अनुवूफलतार् उन व्यवस्थार्ओं से उत्पन्न होती है जो यह घोषित करती है कि संविधार्न देश क सर्वोच्च कानून है और संविधार्न की सुरक्षार् और व्यार्ख्यार् करने की शक्ति सर्वोच्च न्यार्यार्लय के पार्स है। संविधार्न के कई अनुच्छेद न्यार्यिक पुनरार्वलोकन संवैधार्निक आधार्र प्रदार्न करते हैं:

  1. अनुच्छेद 13 (Article 13)–यह अनुच्छेद न्यार्यार्लय की न्यार्यिक पुनरार्वलोकन शक्ति को आधर प्रदार्न करतार् है। इसमें लिखार् गयार् है : फ्रार्ज्य ऐसार् कोई कानून नहीं बनार्एगार् जो भार्ग III के द्वार्रार् दिए अधिकारों को वार्पस लेतार् यार् कम करतार् हो और इस अनुच्छेद के उल्लंघन में बनार्यार् कानून विरोध के कारण रद्द हो जार्एगार्। दूसरे शब्दों में यह निर्धार्रित करतार् है कि कानून, जौ मौलिक अधिकारों के विरुद्व हैं, रद्द किए जार्ते हैं। सर्वोच्च न्यार्यार्लय के पार्स उनकी संवैधार्निकतार् क निर्णय करने की शक्ति है।
  2. अनुच्छेद 32 (Article 32)–यह अनुच्छेद संविधार्न के भार्ग III में दिए मौलिक अधिकारों को लार्गू करवार्ने के लिए सर्वोच्च न्यार्यार्लय तक पहुंच करने क अधिकार देतार् है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय मौलिक अधिकारों की सुरक्षार् के लिए न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति क प्रयोग करतार् है।
  3. अनुच्छेद 131 और 132 (Article 131 & 132)–यह दो अनुच्छेद सर्वोच्च न्यार्यार्लय के प्रार्रंभिक और अपीलीय अधिकार-क्षेत्रों क क्रमवार्र वर्णन करते हैं। इसमें केन्द्र-रार्ज्य झगड़ों से निपटने, रार्ज्यों के मध्य झगड़ों को निपटने की शक्ति और संविधार्न की व्यार्ख्यार् करने की सर्वोच्च न्यार्यार्लय की शक्ति शार्मिल है। इन शक्तियों क प्रयोग करते समय, सर्वोच्च न्यार्यार्लय न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति क प्रयोग करतार् है।
  4. अनुच्छेद 226 (Article 226)–अनुच्छेद 226 रार्ज्य उच्च न्यार्यार्लयों को न्यार्यिक पुनरार्वलोकन शक्ति क प्रयोग क आधार्र प्रदार्न करतार् है जो संविधार्न के भार्ग iii की ओर से दिए लोगों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षार् के लिए प्रयोग की जार्ती है।
  5. अनुच्छेद 246 (Article 246)–अनुच्छेद 246 के अधीन संघ और रार्ज्यों में वैधार्निक शक्तियों क विभार्जन कियार् गयार् है। क्योंकि सर्वोच्च न्यार्यार्लय को संघ-रार्ज्य झगड़ों के सभी मुकद्दमों क निर्ण करने की शक्ति दी गई है जो उनके बीच शक्तियों के विभार्जन के संबंध में पैदार् होतो हैं, यह अनुच्छेद भी न्यार्यिक पुनरार्वलोकन को आधार्र प्रदार्न करतार् है।
  6. अनुच्छेद 124 (6) और 219 (Article 124 (6) & 219)–इन अनुच्छेदों के अधीन, सर्वोच्च न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लयों के न्यार्यार्धीशों को क्रमवार्र कानून के द्वार्रार् स्थार्पित संविधार्न के प्रति निष्ठार् की शपथ उठार्नी पड़ती है।

इन सभी विशेष लोगों ने न्यार्यार्लय की न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति को आधार्र प्रदार्न कियार् जार्तार् है। डॉ एस सी डैश के शब्दों में, न्यार्यपार्लिक क यह पवित्र कर्तव्य है कि वह संविधार्न को विधार्नपार्लिक और कार्यपार्लिक के आक्रमणों के विरुद्व सर्वोच्च रखे…। यह सभी अनुच्छेद भार्रत में न्यार्यार्लयों के न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की कानूनी और संवैधार्निक आधार्र प्रदार्न करते हैं। इनके अतिरिक्त संविधार्न की कई अन्य विशेषतार्एँ भी न्यार्यार्लयों के न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति को आधार्र प्रदार्न करती हैं।

  1. सीमित सरकार क सिद्वार्न्त–संविधार्न स्पष्ट रूप में सरकार की शक्तियों को परिभार्षित करतार् है। सरकार केवल परिभार्षित शक्तियों क ही प्रयोग कर सकती है और असीमित शक्तियार्ं नहीं। सरकार क कोई अंग अपने निर्धार्रित अधिकार-क्षेत्र से बार्हर नहीं जार् सकतार्। यह देखनार् न्यार्यार्लयों क उत्तरदार्यित्व होतार् है कि सरकार और इसक प्रत्येक अंग संविधार्न के द्वार्रार् परिभार्षित अधिकार क्षेत्र के अंदर ही कार्य करें और यदि इस सिद्वार्न्त क उल्लंघन हो तो न्यार्यार्लय उल्लंघन करने वार्ले कार्य को रद्द कर सकते हैं।
  2. संघवार्द–संघीय प्रणार्ली में, न्यार्यपार्लिक के पार्स अतिरिक्त उत्तरदार्यित्व अर्थार्त् संविधार्न की सर्वोच्चतार् की सुरक्षार् करनार् होतार् है और संघ व रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों से बार्हर जार्ने पर प्रतिबन्ध भी होतार् है। इसके लिए भी न्यार्यिक पुनरार्वलोकन शक्ति क न्यार्यार्लय के द्वार्रार् प्रयोग अनिवाय हो जार्तार् है।
  3. लिखित अधिकार–जब कभी संविधार्न लोगों के लिए लिखित तथार् कानून द्वार्रार् लार्गू करने योग्य अधिकारों की व्यवस्थार् करतार् है तो न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की नींव रखतार् है। न्यार्यार्लयों को इन अधिकारों को लार्गू करने और इनकी सुरक्षार् करने की शक्ति मिल जार्ती है। भार्रत में संविधार्न में लिखित अधिकारों क बिल संवैधार्निक उपचार्रों के अधिकार सहित शार्मिल है जो संविधार्न की मौलिक संरचनार् क एक भार्ग है। इसके लिए यह न्यार्यिक पुनरार्वलोकन प्रदार्न करतार् है।
  4. न्यार्यपार्लिक की ओर से न्यार्यिक पुनरार्वलोकन शक्ति क प्रयोग–1950 में संविधार्न के लार्गू होने के पश्चार्त् से आज तक भार्रत में न्यार्यपार्लिक निरन्तर न्यार्यिक पुनरार्वलोकन शक्ति क प्रयोग करती आ रही है। इसने इस शक्ति को विधार्नपार्लिक और कार्यपार्लिक के कई कानूनों/आदेशों को रद्द करने केलिए प्रयोग कियार् जिनको इसने असंवैधार्निक पार्यार्। सर्वोच्च न्यार्यार्लय के ऐतिहार्सिक निर्णय जो इन मुकदमों में दिए गए-गोपार्लन मुकद्दमार्, गोलकनार्थ मुकदमार्, केशवार्नंदार् भार्रती मुकदमार्, मिनर्वार् मिलष मुकदमार् और कई अन्यों में भार्रत में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन के कापफी प्रमार्ण मिलते हैं और इसकी मार्न्यतार् सरकार और लोगों की ओर से मिलती है।
  5. 42वें और 43वें संशोधन–42वें और 43वें संशोधन ने न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण प्रणार्ली की संवैधार्निक उचित को शक्तिशार्ली कियार् है। 42वें संशोधन अधिनियम के द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय और रार्ज्य उच्च न्यार्यार्लयों की न्यार्यिक पुनरार्वलोकन शक्तियों पर कोई प्रतिबन्ध लगार्ए गए और 43वें संशोध्न अधिनियम के द्वार्रार् यह प्रतिबन्ध हटार् दियार् गए। इस प्रक्रियार् में, न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की प्रणार्ली को भार्रतीय संवैधनिक प्रणार्ली के मूल्यवार्न और अभिन्न भार्ग के रूप में मार्न्यतार् मिली है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लयों के पार्स विधार्नपार्लिक और कार्यपार्लिक के कानूनों/आदेशों/नियमों की संवैधार्निक उचिततार् क निरीक्षण करने की शक्ति है और इस शक्ति को न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति कहार् जार्तार् है।

भार्रत में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की विशेषतार्एँ

भार्रत में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन प्रणार्ली की मुख्य विशेषतार्एँ हैं:

  1. सर्वोच्च न्यार्यार्लय और रार्ज्य उच्च न्यार्यार्लयों दोनों न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति क प्रयोग करते हैं, परन्तु किसी कानून के संवैधार्निक औचित्य क निर्णय करने की अंतिम शक्ति भार्रत के सर्वोच्च न्यार्यार्लय के पार्स है।
  2. सभी संघीय और रार्ज्य कानूनों, कार्यपार्लिक आदेशों और संवैधार्निक संशोधनों के संबंध में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन कियार् जार् सकतार् है।
  3. संविधार्न की 9वीं सूची में दर्ज अधिनियमों के संबंध में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन नहीं कियार् जार् सकतार्।
  4. न्यार्यिक पुनरार्वलोकन स्वचार्लित नहीं है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय कानूनों पर न्यार्यिक पुनरार्वलोकन करने की कार्यवार्ही स्वयं अपने आप नहीं रकतार्। यह तब ही कार्यवार्ही करतार् है जब कानूनों को इसके सार्मने चुनौती दी जार्ती है जब किसी मुकदमे की कार्यवार्ही के दौरार्न किसी कानून के संवैधार्निक औचित्य क प्रश्न इसके सार्मने उठार्यार् जार्तार् है।
  5. सर्वोच्च न्यार्यार्लय चुनौती दिए कानूनों/आदेशों के पुनर्निरीक्षण के पश्चार्त् यह निर्णय कर सकती है: (i) कानून संवैधार्निक रूप में उचित है। इस मार्मले में कानून पहले की तरह लार्गू रहतार् है, अथवार् (ii) कानून संवैधार्निक रूप में अनुचित है। इस संबध में कानून निर्णय की तिथि से लार्गू होनार् बंद हो जार्तार् है, अथवार् (iii) कानून के केवल कुछ भार्ग यार् एक भार्ग अनुचित है। इस स्थिति में केवल अनुचित भार्ग लार्गू नहीं रहतार् और दूसरे भार्ग लार्गू रहते हैं। परन्तु यदि अनुचित पार्ए भार्ग कानून के लिए इतने महत्वपूर्ण हों कि दूसरे भार्ग इनके बिनार् न लार्गू हो सवेंफ, तो समस्त कानून को ही अनुचित ठहरार्यार् जार्तार् है और रद्द कर दियार् जार्तार् है।
  6. न्यार्यार्लय की ओर से असंवैधार्निक और अयोग्य घोषणार् करने के दिन से पहले कानून के आधार्र पर किए गए कार्य विद्यमार्न रहते हैं।
  7. सर्वोच्च न्यार्यार्लय अपने पहले निर्णयों में संशोधन कर सकतार् है यार् उनको रद्द कर सकतार् है।
  8. कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार् बनार्म कानून की उचित प्रक्रियार् (Procedure Established by Law vs. Due Process of Law) : भार्रत में न्यार्यिक पुनरार्वलोकन जिस सिद्वार्न्त के आधार्र पर शार्सित कियार् जार्तार् है वह है : कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार्य् न कि कानून की उचित प्रक्रियार् जो अमेरिक में लार्गू है। ‘कानून की उचित प्रक्रियार्’ के अधीन न्यार्यपार्लिक कानून की संवैधार्निकतार् की परख करने के लिए दोहरी परीक्षार् करती है। पहलार्, न्यार्यार्लय परख करतार् है कि क्यार् कानून बनार्ने के लिए संस्थार् ने प्रार्प्त शक्तियों की सीमार्ओं के अंदर कार्यवार्ही की है और निर्धार्रित प्रक्रियार् के अनुसार्र कार्य कियार् है अथवार् नहीं। दूसरार्, न्यार्यार्लय परख करतार् है कि क्यार् कानून प्रार्कृतिक न्यार्य के उद्देश्यों को पूर्ण करतार् है कि क्यार् यह एक उचित कानून है यार् नहीं। यदि कानून इन दोनों आधार्रों में से किसी एक पर भी पूरार् नहीं उतरतार् तो इसको असंवैधार्निक मार्न कर रद्द कर दियार् जार्तार् है। इससे विपरीत ‘कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार्’ के सिद्वार्न्त के अधीन जैसे भार्रत के संविधार्न में दर्ज कियार् गयार् है न्यार्यार्लय केवल यह तय करतार् है कि क्यार् कानून बनार्ने वार्ली संस्थार् ने संविधार्न के द्वार्रार् दी गई शक्तियों के अनुसार्र कानून बनार्यार् है और निर्धार्रित प्रक्रियार् क पार्लन कियार् है यार् नहीं। इस सिद्वार्न्त के अधीन न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण क क्षेत्र ‘कानून की उचित प्रक्रियार्’ सिद्वार्न्त के अधीन क्षेत्र से सीमित होतार् है। ‘कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार्’ अधीन, न्यार्यार्लय केवल कानून क पुनर्निरीक्षण यह निर्णय करने के लिए करतार् है कि क्यार् इसको संविधार्न के द्वार्रार् निर्धार्रित प्रक्रियार् के अनुसार्र बनार्यार् गयार् है यार् नहीं, और इसके लिए इसक क्षेत्र सीमित होतार् है। गोपार्लन बनार्म मद्रार्स रार्ज्य मुकदमे में दोषी की ओर से यह तक्र दियार् गयार् कि ‘कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार्’ और ‘कानून की उचित प्रक्रियार्’ में कोई अन्तर नहीं होतार्। परन्तु भार्रत के अटार्रनी जनरल ने यह मत दियार् कि कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार् की गार्रंटी ‘योग्य विधार्नपार्लिका’ के द्वार्रार् बनार्ए कानून के द्वार्रार् निर्धार्रित प्रक्रियार् की सुरक्षार् यार् अन्य कुछ नहीं। न्यार्यार्लय अटार्रनी जनरल की ओर से प्रकट किए गए विचार्र से सहमत हो गयार्। इस प्रकार भार्रत में न्यार्यार्लय उस समय ही कानून को रद्द घोषित कर सकतार् है जब वह पार्ए कि कानून बनार्ने वार्ली विधार्नपार्लिक ने उचित प्रक्रियार् क प्रयोग कानून-निर्मार्ण के समय नहीं कियार् थार्। परन्तु वार्स्तविक व्यवहार्र में, भार्रत के सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने कानून के औचित्य क निर्णय करने के लिए बहुत बार्र कानूनों ने औचित्य की जार्ंच व्यार्पक रूप में की है। इसने कभी भी संवैधार्निक संशोधनों यार् कानूनों के द्वार्रार् मौलिक अधिकारों पर संसद की ओर से लगार्ए प्रतिबन्धों के औचित्य क पुनर्निरीक्षण करने में झिझक नहीं दिखार्ई। ‘कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार्’ क पार्लन करते हुए और ‘कानून की उचित प्रक्रियार्’ को रद्द करते हुए भार्रतीय संविधार्न न्यार्यिक सर्वोच्चतार् और संसदीय प्रभुसत्तार् के दोनों सिद्वार्न्तों को रद्द करतार् है जैसे यह क्रमवार्र अमरीक और इंग्लैण्ड में प्रचलित हैं। यह केवल मध्य माग ग्रहण करतार् है। विधार्नपार्लिक के पार्स सर्वोच्चतार् है, परन्तु संविधार्न से प्रार्प्त क्षेत्र के संबंध में ही और इसक प्रयोग यह कानून के द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार् की सीमार्ओं के अंदर ही करती है।
  9. किसी कानून को रद्द घोषित करते हुए, सर्वोच्च न्यार्यलय को संविधार्न की उन व्यवस्थार्ओं/धार्रार्ओं जिनक कानून उल्लंघन करतार् है, के बार्रे स्पष्ट बतलार्नार् होतार् है। इसको उस कानून की अवैधतार् और असंवैधनिकतार् को सिद्व करनार् होतार् है जिसको रद्द कियार् होतार् है।

न्यार्यिक पुनरार्वलोकन क आलोचनार्त्मक मूल्यार्ंकन

कुछ आलोचकों ने न्यार्यार्यिक-पुनर्निरीक्षण के विरुद्व आपत्तियार्ँ उठार्ई हैं।

  1. अलोकतन्त्रीय-आलोचक न्यार्यिक पुनन्र्यार्यिक की प्रणार्ली को अलोकतन्त्रीय प्रणार्ली मार्नते हैं जो न्यार्यार्लय को रार्ष्ट्रीय जनमत और लोगों की प्रभुसत्तार्पूर्ण इच्छार् क प्रतिनिधित्व करने वार्ली विधनपार्लिक की ओर से पार्स किए कानूनों के भार्ग्य क निर्णय करने के योग्य बनार्ती है।
  2. स्पष्टतार् की कमी–भार्रत क संविधार्न न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की प्रणार्ली की स्पष्ट व्यार्ख्यार् नहीं करतार्। यह शक्ति अधिकतर संविधार्न की कई धार्रार्ओं की व्यार्ख्यार् पर गर्भित शक्तियों (Implied Powers) के सिद्वार्न्त पर निर्भर करती है।
  3. प्रशार्सनिक समस्यार्ओं क श्रोत–यह प्रणार्ली समस्यार्ओं क एक श्रोत रही है। जब किसी कानून यार् इसक किसी भार्ग/भार्गों को सर्वोच्च न्यार्यार्लय की ओर से असंवैधनिक घोषित करके रद्द कियार् जार्तार् है तो निर्णय उस तिथि से लार्गू हो जार्तार् है जिस दिन यह दियार् जार्तार् है। सर्वोच्च न्यार्यार्लयों की ओर से सुने जार्ते मुकदमे में जब किसी कानून की असंवैधार्निकतार् क प्रश्न उठतार् है तो ही न्यार्यिक पुनर्निरीक्षण कियार् जार्तार् है। कानून के लार्गू होने के 5 यार् 10 यार् अधिक वर्षों के पश्चार्त् अब ऐसार् मुकदमार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय के सार्मने आ सकतार् है। इस प्रकार जब न्यार्यार्लय इसको रद्द करतार् है तो यह प्रशार्सनिक समस्यार्एँ पैदार् करतार् है। कई बार्र न्यार्यिक पुनरार्वलोकन एक समस्यार् समार्धार्न करने से अधिक समस्यार्एँ पैदार् कर देतार् है।
  4. प्रतिक्रियार्वार्दी–कई आलोचक न्यार्यिक पुनरार्वलोकन प्रणार्ली को प्रतिक्रियार्वार्दी प्रणार्ली समझते हैं। यह समझते हैं कि किसी कानून के संवैधार्निक औचित्य क निर्णय करते समय, सर्वोच्च न्यार्यार्लय सार्मार्न्य रूप में कानूनी और रूढ़िवार्दी दृष्टिकोण अपनार्तार् है और सार्मार्जिक-आर्थिक विकास को बढ़ार्वार् देने के लिए विधार्नपार्लिक की ओर से निर्मित प्रगतिशील कानून रद्द कर देतार् है। न्यार्यिक पुनरार्वलोकन, इस प्रकार विधार्नपार्लिक पर एक रूढ़िवार्दी रोक है।
  5. देरी करने वार्ली प्रणार्ली–न्यार्यिक पुनरार्वलोकन प्रणार्ली एक देरी और अकुशलतार् क एक श्रोत रही है। जब एक कानून अस्तित्व में आ जार्तार् है तो कई बार्र लोग और विशेषकर कानून लार्गू करने वार्ली एजेंसियार्ँ धीरे चलने क निर्णय करती हैं यार् किसी कानून को लार्गू करने के संबंध में हार्थ पर हार्थ धर कर बैठ जार्ती हैं। वह तब तक प्रतीक्षार् करने को प्रार्थमिकतार् देती हैं जब तक सर्वोच्च न्यार्यार्लय अपने किसी मुकदमे में इसके संवैधार्निक औचित्य क निर्णय नहीं कर लेतार्। न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की प्रक्रियार् अपने-आप में एक धीमी और देरी करने वार्ली प्रक्रियार् है। इस प्रकार न्यार्यिक पुनरार्वलोकन देरी और अकुशलतार् क प्रार्य: एक श्रोत बनती है।
  6. संसद को गैर-उत्तरदार्यी बनार्ती है–आलोचक आगे तक्र देते हैं कि न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की प्रणार्ली संसद को कई बार्र गैर-उत्तरदार्यी बनार्ती है क्योंकि यह किसी कानून को पार्स करते समय यह सोच लेती है कि सर्वोच्च न्यार्यार्लय अपने-आप इसकी संवैधार्निकतार्/औचित्य क निर्णय कर लेगार्।
  7. न्यार्यिक निरंकुशतार्–सर्वोच्च न्यार्यार्लय की एक पीठ, संवैधनिक मुकदमार् जो इसके सार्मने आतार् है, को सुनती है और सार्धार्रण बहुमत से इसक निर्णय करती है, बहुत बार्र इस ढंग से एक ही न्यार्यधीश क तक्र ही किसी उस कानून के भार्गय क निर्णय देतार् है जो प्रभुसत्तार्धार्री लोगों के निर्वार्चित प्रतिनिधियों के बहुमत के द्वार्रार् पार्स कियार् गयार् होतार् है।
  8. सर्वोच्च न्यार्यार्लय की ओर से अपने ही निर्णयों को परिवर्तित करनार्–यह देखार् गयार् है कि कई अवसरों पर सर्वोच्च न्यार्यार्लय अपने निर्णयों को स्वयं ही रद्द कर देतार् है अथवार् परिवर्तित कर देतार् है। गोलकनार्थ मुकदमे में दिए निर्णय ने पहले निर्णयों को बदल दियार् और केशवार्नंद भार्रती मुकदमे में निर्णय ने पहले वार्ली स्थिति पुन: स्थार्पित कर दी। उसने एक कानून को पहले उचित ठहरार्यार्, फिर इसे अनुचित ठहरार्यार् और फिर इसको उचित ठहरार्यार्। ऐसे परिवर्तन उसकी एक ही जैसे मुकदमों के संबंध में अलग-अलग पीठों के द्वार्रार् और निर्णयों में व्यक्तिगत सोच के तत्त्व क प्रदर्शन करते हैं।
  9. न्यार्यार्लय के सम्मार्न पर तनार्ल क एक श्रोत–सर्वोच्च न्यार्यार्लय कई बार्र न्यार्यिक पुनरार्वलोकन की शक्ति क प्रयोग करते हुए रार्जनीतिक चर्चार् क केन्द्र बन जार्तार् है। गोलकनार्थ मुकदमे के निर्णय के पश्चार्त् नार्थ पार्ई बिल पर हुई संसद चर्चार् ने स्पष्ट रूप में इस तथ्य को उभार्रार् थार्। न्यार्यिक पुनरार्वलोकन न्यार्यार्लय के सम्मार्न के सम्मार्न को कम कर सकतार् है और इसको रार्जनीतिक चर्चार् के अखार्ड़े में लार् सकतार् है।
  10. न्यार्यपार्लिक और संसद के मध्य गतिरोधों की संभार्वनार्–जब सर्वोच्च न्यार्यार्लय किसी कानून को असंवैधार्निक घोषित करके रद्द करतार् है, तो प्रार्य: संसद संविधार्न के संशोधन से यार् अन्य कानून बनार्ने के निर्णयों के द्वार्रार् इस पर नियंत्रण करने क प्रयार्स करती है। इस प्रक्रियार् में न्यार्यपार्लिक और संसद के मध्य गतिरोध और विवार्द पैदार् हो जार्ते हैं। मौलिक अधिकारों (भार्ग III) और रार्ज्य नीति के निर्देशक सिद्वार्न्तों (भार्ग IV) के मध्य संबंधों के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यार्यार्लय और संसद के दृष्टिकोणों और व्यवहार्र में अन्तर ने दोनों के मध्य गतिरोध उत्पन्न कर दियार् थार्। ऐसे गतिरोध और विवार्द भविष्य में भी उत्पन्न हो सकते हैं।

इन सभी आधार्रों पर आलोचकों ने भार्रत में चल रही न्यार्यिक पुनरार्वलोकन प्रणार्ली की आलोचनार् की है।

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