न्यार्यपार्लिक की स्वतंत्रतार्

न्यार्यिक स्वतन्त्रतार् की उत्पत्ति

न्यार्यार्लय की स्वतन्त्रतार् की संकल्पनार् इग्लैण्ड से ली गयी है। सन् 1616 में न्यार्यार्धीश कोक को उनके पद से (किंग बेन्च के मुख्य न्यार्यार्धीश) पदच्युत कियार् गयार् थार्। इस समय न्यार्यार्धीश अपने पद को सम्रार्ट के प्रसार्दपर्यन्त धार्रणार् करते थे और सम्रार्ट के अन्य कर्मचार्रियों के समार्न थे। वे सम्रार्ट की इच्छार् से पद से हटार्ये जार् सकते थे, इसलिए न्यार्यार्धीश कार्यपार्लिक के अधीन थे। न्यार्यार्लय स्वतन्त्रतार् इग्लैण्ड में न्यार्यिक सेटलमेन्ट एक्ट, 1701 द्वार्रार् संरक्षित थी। जिसमें द्वार्रार् न्यार्यार्धीश अपने अच्छे आचरण तक आजीवन पद पर बने रहते थे तथार् उनके पद से हटार्ने के बार्रे में यह विधिपूर्ण होगार् कि उन्हें संसद के दोनों सदनों द्वार्रार् पार्रित संकल्प के द्वार्रार् हटार्यार् जार्ये। आजीवन पद की सुरक्षार् की स्थिति ने न्यार्यार्लय की स्वतन्त्रतार् को स्थार्पित कियार्।

एक स्वतन्त्र और निश्पक्ष न्यार्यपार्लिक ही नार्गरिकों के अधिकारों की संरक्षिक हो सकती है तथार् बिनार् भय तथार् पक्षपार्त के सबको समार्न न्यार्य प्रदार्न कर सकती है। इसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उच्चतम न्यार्यार्लय अपने कर्तव्यों के पार्लन में पूर्ण रूप से स्वतन्त्र और सभी प्रकार के रार्जनीतिक दबार्वों से मुक्त हो। संविधार्न निर्मार्तार् न्यार्यपार्लिक की स्वतन्त्रतार् को लेकर प्रतिबद्ध थे इसलिए इसे बनार्ये रखने के लिए उन्होंने संविधार्न में अनेक उपबन्ध कायम किये गये हैं।

संवैधार्निक उपबन्ध

भार्रतीय संविधार्न में न्यार्यार्पार्लिक की स्वतन्त्रतार् स्थार्पित करने हेतु प्रार्वधार्न किये गये हैं।

  1. कार्यपार्लिक से न्यार्पार्लिक क पृथ्थकरण 
  2. न्यार्यार्धीशों की पदार्वधि की संरक्षार् 
  3. न्यार्यार्धीशों की नियुक्तियार्ँ
  4. न्यार्यार्धीशों के वेतन एवं भत्ते 
  5. प्रसार्द पर्यन्त क सिद्धार्न्त 
  6. संसद को न्यार्यार्धीशों के आचरण पर चर्चार् करने पर रोक
  7. न्यार्यलय अवमार्न्य हेतु दण्ड शक्ति 
  8. सेवार्निवृत्ति के बार्द प्रक्टिस पर रोक 

1. कार्यपार्लिक से न्यार्पार्लिक क पृथ्थकरण

अनुच्छेद-50 रार्ज्य को निर्देश देतार् है कि रार्ज्य लोक-सेवार्ओं में न्यार्यपार्लिक को कार्यपार्लिक से पृथक करने क प्रयार्स करेगार्। न्यार्यपार्लिक क कार्यपार्लिक के नियन्त्रण से मुक्त रहनार् उसकी स्वतन्त्रतार् और निश्पक्षतार् के लिए अत्यन्त आवश्यक है। द0प्र0 सं0 1973 में न्यार्यिक एवं कार्यपार्लक मजिस्ट्रेट को अलग कर दियार् गयार् है।

2. न्यार्यार्धीशों की पदार्विधि की संरक्षार्

एक बार्र नियुक्त किये जार्ने पर न्यार्यार्धीशों को आसार्नी से पदच्युत नहीं कियार् जार् सकतार् है। उसे पदच्युत करने के लिए संविधार्न एक विशेष प्रक्रियार् क प्रार्वधार्न करतार् है –

  1. उसे केवल संविधार्न में दिये गये आधार्रों पर ही पदच्युत कियार् जार् सकतार् है। 
  2. इस प्रयोजन हेतु रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् पेश किए गये समार्वेदन संसद के प्रत्येक सदन के बहुमत द्वार्रार् तथार् उपस्थित और मतदार्न करने वार्ले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पार्रित कियार् जार्नार् चार्हिए। यह समार्वेदन संसद के एक ही सत्र में प्रस्तार्वित और पार्रित कियार् जार्नार् चार्हिए। उक्त प्रक्रियार् से स्पष्ट है कि न्यार्यार्धीशों को उनके पदों से पद मुक्त करनार् इतनार् आसार्न नहीं है।

3. न्यार्यार्धीशों की नियुक्तियार्ँ एवं पदच्युति

नियुक्तियार्ँ रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् भार्रत के मुख्य न्यार्यमूर्ति (प्रधार्न न्यार्यार्धीश) (उच्चतम न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश की दशार् में) और उच्च न्यार्यार्लय में मुख्य न्यार्यार्धीश (उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश की दशार् में) से परार्मर्श के पश्चार्त की जार्ती है। इससे यह सुनिश्चित हो जार्तार् है कि नियुक्तियार्ँ रार्जनीतिक आधार्र पर यार् निर्वार्चन के लार्भ के लिए नहीं की जार् रही है और रार्जनीतिक तत्व समार्प्त हो जार्तार् है।

एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसोशियन वनार्म भार्रत संघ (1993) और प्रेसीडेन्सियल रिफरेन्स (1999) के बार्द में बार्द न्यार्यार्धीशों को नियुक्त करने की प्रभार्वशार्ली शक्ति कार्यपार्लिक से न्यार्यार्पार्लिक को दे दी गयी, जिसने न्यार्यिक स्वतन्त्रतार् को शक्ति विस्तृत कर दियार् है। इससे सिद्ध होतार् है कि नियुक्तियार्ँ रार्जनीति से प्रभार्वित नहीं होती हैं।

संसद अभियोग से सम्बन्धित प्रक्रियार् की जार्ंच को विनियमित कर सकती है। संसद ने न्यार्यार्धीशों को पदच्युत करने के लिए जजेज इन्क्वार्यरी एक्ट 1968 बनार्यार् जो अब जजेज इन्क्वार्यरी बिल-2006 द्वार्रार् सप्लीमेन्ट कियार् गयार् है। न्यार्यार्धीश को कदार्चार्र यार् असमर्थतार् के लिए रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् हटार्यार् जार् सकतार् है। यह एक जटिल और कश्टसार्ध्य प्रक्रियार् है। अभी तक केवल एक न्यार्यार्धीश के विरूद्ध यह प्रक्रियार् हुर्इ है किन्तु उसमें भी समार्वेदन अपेक्षित बहुमत से पार्रित नहीं कियार् जार् सक है। न्यार्यार्धीश को भयमुक्त होकर काम करने की छूट है। निर्णय में चार्हें जितनी गंभीर भूल हो जार्ए उसे कदार्चार्र नहीं मार्नार् जार्तार् है। (सी0के0 दफ्तरी वनार्म गुप्तार् 1971 सु0को0)।

4. न्यार्यार्धीशों के वेतन एवं भत्ते

न्यार्यार्धीशों के वेतन, भत्ते आदि विधार्यिक के अधिकार क्षेत्र से परे हैं। उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों क वेतन संविधार्न के अनुसार्र नियत कियार् जार्तार् है और वह भार्रत की संचित निधि पर भार्रित होतार् है। उसपर संसद में मतदार्न नहीं होतार् है, उनके कार्यकाल के दौरार्न उनके वेतन, भत्तों में कोर्इ परिवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है। इसक एक अपवार्द है, वह यह कि देश में वित्तीय संकट के समय उनके वेतन और भत्तों में आवश्यक कटौती की जार् सकती है।

संसद ने उच्चतम न्यार्यार्लय एवं उच्च न्यार्यार्लय, न्यार्यार्धीश वेतन एवं सेवार् शर्तें अधिनियम 1986 पार्स कियार् थार्। न्यार्यार्लय के कर्मचार्री उच्चतम न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लय के अधिकारी और सेवक संबद्ध मुख्य न्यार्यार्धीश द्वार्रार् नियुक्त किए जार्ते हैं और न्यार्यार्लय क प्रशार्सनिक व्यय भार्रत की संचित निधि पर पार्रित होतार् है

5. प्रसार्द पर्यन्त क सिद्धार्न्त

कार्यपार्लिक रार्ष्ट्रपति के प्रसार्दपर्यन्त पद धार्रण करती है। यह नियम सिविल सेवकों और सैन्य बलों के लिए लार्गू होतार् है। रार्ज्यपार्लों की भी यही स्थिति है। किन्तु प्रसार्द क सिद्धार्न्त न्यार्यार्धीशों पर लार्गू नहीं होतार् है। यदि वे कदार्चरण नहीं करते हैं तो उन्हें पद से नहीं हटार्यार् जार् सकतार् है। प्रसार्द क सिद्धार्न्त स्वतन्त्रतार् के लिए घार्तक है।

6. न्यार्यार्लय की क्षेत्रार्धिकार एवं शक्तियार्ं

अनुच्छेद.140 के अनुसार्र सिविल मार्मलों में संसद उच्चतम न्यार्यार्लय में की जार्ने वार्ली अपीलों की आर्थिक सीमार् बदल सकती है, और इस प्रकार उसकी अधिकारितार् को बढ़ार् सकती है। संसद इसकी (उच्चतम न्यार्यार्लय) अपरार्धिक अधिकारितार् को कार्यसार्धक रूप में प्रयोग करने के लिए सहार्यक शक्तियार्ं प्रदार्न कर सकती है। अनुच्छेद.32 में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न किन्हीं अन्य प्रयोजनों के लिए निदेश, आदेश यार् लेख जिनके अन्तर्गत परमार्धिकार रिट भी शार्मिल है, निकालने की शक्ति प्रदार्न कर सकती है। संसद उच्चतम न्यार्यार्लय की शक्तियों एवं अधिकार को बढ़ार् सकती है, लेकिन घटार् नहीं सकती।

7. न्यार्यलय अवमार्ननार् हेतु दण्ड शक्ति

संविधार्न के अनुच्छेद-129ए उच्चतम न्यार्यार्लय हेतु और अनुच्छेद.215ए उच्च न्यार्यार्लय हेतु अपने अवमार्ननार् के लिए किसी भी व्यक्ति को दण्ड देने की शक्ति प्रदार्न करतार् है। यह शक्ति न्यार्यार्लयों की स्वतन्त्रतार् और निष्पक्षतार् को सुरक्षित रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है, लेकिन न्यार्यार्लय अथवार् न्यार्यार्धीशों की उचित और सत्य आलोचनार् वर्जित नहीं है। इसके लिए न्यार्यार्लय अवमार्ननार् अधिनियम, 1971 को निर्मित कियार् गयार् हैै। अवमार्ननार् सिविल यार् आपरार्धिक दो प्रकार की हो सकती है। अनुच्छेद-129 एवं 215 कोर्इ नर्इ शक्ति प्रदार्न नहीं करते हैं। न्यार्0अव0अधि0 1971 इन अनुच्छेदों के अतिरिक्त है, यह इन उपबन्धों क अल्पीकरण नहीं करतार् है। न्यार्यार्लय अवमार्न अधिनियम 1971 के अनुसार्र न्यार्यार्लय अवमार्न दो प्रकार के होते हैं-

  1. सिविल अवमार्ननार् 
  2. आपरार्धिक अवमार्ननार्

‘सिविल अवमार्ननार्’ क अर्थ है न्यार्यार्लय के किसी डिक्री, निर्णय, आदेश, निदेश, रिट यार् किसी अन्य प्रक्रियार् की जार्नबूझकर अवज्ञार् यार् न्यार्यार्लय क दिये हुए किसी वचन को जार्नबूझकर तोड़नार्।

‘आपरार्धिक अवमार्न’ क अर्थ है ऐसे विषय के प्रकाशन से (चार्हे वह मौखिक हो यार् लिखित हो) यार् ऐसे कार्यों के करने से है जो –

  1. न्यार्यार्लय की निन्दार् करते हो यार् ऐसी प्रवृति वार्ले यार् उसके प्रार्धिकार को कम करते हों यार् ऐसी प्रवृत्ति वार्ले हो।
  2. न्यार्यार्लय पर प्रतिकूल प्रभार्व डार्लने वार्ले हो यार् न्यार्यिक कार्यवार्ही में बार्धार् डार्लते हो यार् ऐसी प्रवृत्ति वार्ले हो।

किन्तु निम्न कार्य यार् प्रकाशन न्यार्यार्लय की अवमार्ननार् करने वार्ले नहीं मार्ने जार्येगें –

  1. निर्दोश प्रकाशन यार् उनक वितरण
  2. न्यार्यिक कार्यों की रिपोर्ट क सही एवं उचित प्रकाशन। 
  3. न्यार्यिक कार्यों की उचित आलोचनार्। 
  4. न्यार्यार्धीशों के विरूद्ध की गयी र्इमार्नदार्रीपूर्ण शिकायत। 
  5. न्यार्यार्लयों की गुप्त बैठकों की कार्यवार्ही क सही प्रकाशन।

न्यार्यार्धीश की मार्नहार्नि से अवमार्न नहीं होतार् है। मार्नहार्नि से अवमार्न तभी होगार् जब वह उचित टिप्पणी की सीमार् पार्र कर दे और न्यार्यार्लय की गरिमार् और प्रतिश्ठार् पर कलंक लगार्ये। अश्विनी कुमार्र घोश वनार्म अरविन्द घोश के वार्द में उच्चतम न्यार्यार्लय ने एक न्यार्यिक अधिकारी को विरोध करने, उसके सार्थ मार्रपीट करने और सड़क पर उसे प्रदर्शित करने के लिए गुजरार्त के पुलिस अधिकारियों को दण्डित कियार्।

पुन: दिल्ली न्यार्यिक सेवार् एसोसिएशन वनार्म गुजरार्त रार्ज्य (1991) के वार्द में निण्र्ार्ीत हुआ कि उच्चतम न्यार्यार्लय की अवमार्ननार् के लिए दंड देने की शक्ति अपने अवमार्न तक ही सीमित नहीं है। न्यार्यार्लय पूरे देश में किसी भी न्यार्यार्लय यार् अधिकरण के अवमार्न के लिए दण्ड दे सकतार् है। पुन: मो0 असलम वनार्म भार्रत संघ (1994) के वार्द में उ0प्र0 के मुख्यमंत्री कल्यार्ण सिंह को रार्म जन्मभूमि वार्द के संबन्ध में न्यार्यार्लय को दिए गये वचन क पार्लन न करने के लिए दंडित कियार् गयार्। उन्हें 1दिन क कारार्वार्स और जुर्मार्नार् की सजार् मिली थी।

8. सेवार्निवृत्ति के बार्द प्रक्टिस पर रोक

उच्चतम न्यार्यार्लय क सेवार्निवृत न्यार्यार्धीश भार्रत के किसी न्यार्यार्लय यार् प्रार्धिकारी के समक्ष अभिवचन यार् कार्य नहीं कर सकतार् है। कोर्इ व्यक्ति जो किसी उच्च न्यार्यार्लय क स्थार्यी न्यार्यार्धीश रहार् हो उच्चतम न्यार्यार्लय यार् जिस न्यार्यार्लय में वह नियुक्त कियार् गयार् थार् उससे भिन्न किसी उच्च न्यार्यार्लय के समक्ष अभिवचन यार् कार्य कर सकतार् है।

9. संसद को न्यार्यार्धीशों के आचरण पर चर्चार् करने पर रोक

संविधार्न ने न्यार्यार्लयों को रार्जनीतिक आलोचनार् से अलग रखार् है और इसलिए न्यार्यिक स्वतन्त्रतार् रार्जनीतिक दबार्व तथार् प्रभार्व से मुक्त रहती है। न ही संसद के किसी सदन में और न ही रार्ज्य के विधार्न मण्डल के किसी सदन में न्यार्यार्धीशों के अपने कत्र्तव्य पार्लन में किये गये आचरण पर चर्चार् हो सकती है। इन री केशव सिंह, ए0आर्इ0आर0 (1965) के वार्द में उच्चतम न्यार्यार्लय ने कहार् कि संविधार्न में प्रार्वधार्न है कि संसद के किसी भी सदन में न्यार्यार्धीशों से सम्बन्धित किसी भी प्रकरण की चर्चार् पर पूरी तरह रोक है सिवार्य तब के जब पदच्युत करने की प्रक्रियार् चल रही हो। पुन: निक्सन एण्ड जोजफ वनार्म भार्रत संघ (1989) सु0को0 क मार्मलार् भी इस विषय पर महत्वपूर्ण है।

इस वार्द में केरल उच्च न्यार्यार्लय के समार्न एक बहुत ही उपयोगी और महत्वपूर्ण सवार्ल उठार् कि क्यार् एक सेवार्निवृत न्यार्यार्धीश ;उच्चतम न्यार्यार्लय एवं उच्च न्यार्यार्लयद्ध किसी नौकरी को कर सकतार् है यार् चुनार्व में भार्ग ले सकतार् है। जबकि यहार्ं (संविधार्न में) किसी प्रकार की कोर्इ रोक नहीं है। यद्यपि यार्चिक अस्वीकार कर दी और सवार्ल को केन्द्रीय सरकार के विचार्र हेतु छोड़ दियार् गयार्। विद्वार्न न्यार्यार्धीश नार्रार्यन कुरूप इस बार्त क विचार्र रखार् कि न्यार्यार्धीशों को सेवार्निवृति के बार्द किसी भी प्रकार की सेवार्योजन से और रार्जनीतिक वार्तार्वरण से बचनार् चार्हिए। न्यार्यार्पार्लिक की गरिमार् विश्वसनीयतार् और स्वतन्त्रतार् को कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि न्यार्यार्धीशों को किसी भी प्रकार से अपनी न्यार्यिक छवि से समझौतार् नहीं करनार् चार्हिए। न्यार्य केवल कियार् ही नहीं जार्नार् चार्हिए बल्कि न्यार्य होतार् हुआ दिखाइ देनार् चार्हिए।

न्यार्यिक स्वतंत्रतार् एवं चुनौतियार्ँ

उच्चत्तम न्यार्यार्लय की स्थिति बहुत मजबूत है और इससे इसकी स्वतन्त्रतार् पर्यार्प्त रूप से संरक्षित है लेकिन कुछ ऐसे नुकसार्नदार्यक प्रवृत्तियार्ँ है जो इसकी स्वतन्त्रतार् को आघार्त पहुंचार् रही है –

  1. सेवार्निवृत्त न्यार्यार्धीशों की प्रति नियुक्ति 
  2. न्यार्यार्धीशों की न्यार्यार्लय में नियुक्ति 
  3. वार्दों क लम्बित होनार् 
  4. न्यार्यार्धीशों के विरूद्ध भ्रष्टार्चार्र के आरोप 
  5. पदच्युति की प्रक्रियार् की प्रभार्वहीनतार्

1. सेवार्निवृत्त न्यार्यार्धीशों की प्रतिनियुक्ति

यह न्यार्यिक स्वतन्त्रतार् के लिए बड़े खतरे की बार्त है कि न्यार्यपार्लिक के सेवार्निवृत न्यार्यार्धीश सरकार के अधीन किसी पद पर नियोजित होने की कोशिश करते रहते हैं। जबकि संविधार्निक सभार् ने इस प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश की लेकिन सफलतार् नहीं मिली।

भार्रतीय विधि आयोग ने सेवार्निवृत न्यार्यार्धीशों को आयोग एवं समितियों के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किये जार्ने की वर्तमार्न प्रथार् के संकटों के बार्रे में संकेत करते हुए इसे शीघ्रतार्शीघ्र समार्प्त करने की सरकार से सिफार्रिश की है। विधि आयोग क मार्ननार् है कि ‘‘स्पष्टतयार् यह अवार्ंछनीय है कि उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश अपनी सेवार् निवृति के पश्चार्त दूसरी सरकारी नियुक्ति की तरफ देखें।

उच्चतम न्यार्यार्लय में बहुत से मार्मलों में सरकार एक पक्षकार होती हे और सार्धार्रण नार्गरिकों के ऊपर यह प्रभार्व पड़तार् है कि वह न्यार्यार्धीश जो सेवार् निवृति के बार्द सरकार द्वार्रार् दूसरी नियुक्ति पार्ने की आशार् करतार् है, अपने कार्य में विचार्र की वह निश्पक्षतार् नहीं रख सकतार्, जो उन मार्मलों में, (जिनमें सरकार एक पक्षकार है), उन न्यार्यार्धीशार्ों से अपेक्षित है। हम लोगों क स्पष्ट विचार्र है कि इस प्रथार् क न्यार्यार्धीशों की स्वतन्त्रतार् पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है। अतएव इसे समार्प्त कर देनार् चार्हिए।’’

2. न्यार्यार्धीशों की न्यार्यार्लय में नियुक्ति

अनुच्देद.124 के अनुसार्र उच्चतम न्यार्यार्लय/उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश को िनुयक्त करने की विधिक शक्ति (नियुक्ति की) कार्यपार्लिक में निहित है लेकिन कार्यपार्लिक को उच्चतम न्यार्यार्लय और उच्च न्यार्यार्लय के जजों से परार्मर्श लेनार् आवश्यक है, लेकिन उच्चतम न्यार्यार्लय एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड तथार् री प्रेसिडेन्सियल रिफरेन्स वार्ले वार्द में उच्चतम न्यार्यार्लय ने यह निर्णय दियार् कि उच्चतम न्यार्यार्लय यार् उच्चन्यार्यार्लय में किसी भी न्यार्यार्धीश की नियुक्ति भार्रत के मुख्य न्यार्यमूर्ति की अध्यक्षतार् वार्ली कालेजियम की रार्य के अनुरूप ही की जार् सकती है अन्यथार् नहीं। यदि उससे असहमत है तो उसे कारण देनार् होगार्। यह प्रक्रियार् न ही अच्छी है और न ही पार्रदश्र्ार्ी है। इस बंधन रहित शक्ति क निहित कियार् जार्नार् विवेकपूर्ण नहीं है। इस पर बंधन लगार्ये जार्ने चार्हिए। यह सुझार्व दियार् गयार् है कि नियुक्त करने के लिए एक मंडल बनार्यार् जार्ए जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्ति हों। जो दोनों तरफ नियन्त्रण रख सके (कार्यकारिणी एवं न्यार्यपार्लिक के मध्य)। आस्ट्रेलियार् में ऐसी नियुक्तियों को अंतिम रूप न्यार्यिक आयोग देतार् है। 1990 में रार्ष्ट्रीय न्यार्यिक काउन्सिल के गठन के लिए विधेयक भी लार्यार् गयार् थार्। भार्रत के विधि आयोग ने 1987 में दिये गये अपने एक प्रतिवेदन में न्यार्यिक आयोग बनार्ने क सुझार्व दियार् थार्। इस आयोग क अध्यक्ष प्रधार्न न्यार्यार्धीश होगार्। इसके सदस्य उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश, उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश, सेवार्निवृत मुख्य न्यार्यमूर्ति, महार्न्यार्यवार्दी और कुछ लोग कार्यपार्लिक के हो सकते हैं।

3. वार्दों क लम्बित होनार्

वार्दों क लंबित होनार् एक अन्य गंभीर समस्यार् है, 2.5 करोड़ से अधिक वार्द न्यार्यार्लय के सार्मने लंबित हैं तथार् लगभग 25,000 वार्द अबतक उच्चतम न्यार्यार्लय के सार्मने लंबित हैं। जबकि लोकहित वार्दों के कारण भार्रतीय विधार्यन में विस्फोटक वृद्धि हुर्इ है, जिसक कारण विधार्यिका, कार्यपार्लिक की असमर्थतार्, जनसंख्यार् में वृद्धि, और आर्थिक वृद्धि आदि हैं। यह दिखाइ दे रहार् है कि कोर्इ भी सम्भार्वनार् नहीं है कि इस कार्यभार्र में कमी आये जबकि दूसरी तरफ इनकी संख्यार् निरन्तर बढ़ती जार् रही है।

4. न्यार्यार्धीशों के विरूद्ध भ्रष्टार्चार्र के आरोप

वर्तमार्न समय में कुछ तत्कालिक घटनार् हुर्इ है जिसमें कुछ उच्च न्यार्यार्लय और उच्चतम न्यार्यार्लय के जजों के ऊपर अनुशार्सनहीनतार् और भ्रष्टार्चार्र के आरोप लगार्ये गये हैं। इसने न्यार्यार्लय की स्वतन्त्रतार् को आघार्त पहुँचार्यार् है तथार् आम लोगों के विश्वार्स को तोड़ने क प्रयार्स कियार् है।

कुछ आरोप कर्नार्टक उच्चतम न्यार्यार्लय के जजों के विरूद्ध सेक्स स्कैन्डल में लिप्त होने के लिए लगार्ये गये हैं तथार् पंजार्ब पब्लिक सर्विस कमीशन घोटार्ले में जजों क शार्मिल होनार्, मुख्य न्यार्यमूर्ति के आदेश के विरूद्ध पंजार्ब तथार् हरियार्णार् उच्च न्यार्यार्लय के 26 जजों द्वार्रार् आकस्मिक अवकाश लेनार्, इलार्हार्बार्द उच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यमूर्ति जगदीश भल्लार् के विरूद्ध भ्रष्टार्चार्र क आरोप, न्यार्यार्धीश सौमित्र सेन के विरूद्ध भ्रष्ट प्रैक्टिस तथार् शक्ति क दुरूपयोग क आरोप आदि कुछ उदार्हरण हैं जो यह दर्शित करते हैं कि उच्चतम तथार् उच्च न्यार्यार्लय एक ऐसे वार्तार्वरण से गुजर रहें हैं जिसे उचित सुधार्र की अत्यन्त आवश्यकतार् है।

5. पदच्युति की प्रक्रियार् की प्रभार्वहीनतार्

अनुच्छेद -124(4), (5) भी न्यार्यार्लय की स्वतन्त्रतार् के विरूद्ध है क्योंकि यह पदच्युति की प्रक्रियार् को अत्यन्त जटिल बनार् देतार् है जिससे भ्रष्ट न्यार्यार्धीश किसी भी प्रकार के अभियोग से नहीं डरते हैं। न्यार्यार्धीश रार्मार् स्वार्मी के विरूद्ध उन्हें हटार्ने क प्रस्तार्व लोकसभार् में अपेक्षित विशेष बहुमत से पार्रित नहीं कियार् जार् सक क्योंकि कांग्रेस दल ने मतदार्न में भार्ग नहीं लियार् थार्। यह एक ज्वलन्त उदार्हरण है जो यह दिखार्तार् है कि यहार्ँ संविधार्न में कोर्इ ऐसार् व्यवहार्रिक प्रार्वधार्न नहीं है जिससे दोषी जज को सजार् दी जार् सके। कर्इ अन्य न्यार्यार्धीशों पर गम्भीर आरोप होने पर भी पदच्युति प्रक्रियार् की प्रभार्वहीनतार् के कारण न्यार्यार्लय की स्वतन्त्रतार् पर आघार्त पहुँचार् है।

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