नौलि क्रियार् के प्रकार, क्रियार् की विधि और उसके लार्भ

नौलि क्रियार् के प्रकार, क्रियार् की विधि और उसके लार्भ

By Bandey

अनुक्रम

नौलि (लौलिकी) षटकर्मो में शुद्धिकरण की चौथी प्रक्रियार् है। नौलि क्रियार् अग्निसार्र क ही एक प्रकार है यार् यूँ कहे कि नौलि क्रियार् अग्निसार्र अन्त: धौति की उच्च अभ्यार्स है। जठरार्ग्नि को बढ़ार्ने वार्ली इस क्रियार् में उदरगत मॉसपेशियों की मार्लिश होती है यार् पेट की समस्त मार्ंसपेशियों की क्रियार्शीलतार् त्वरित गति से बढ़ती है।

नौलि क्रियार् के प्रकार

सार्मार्न्य यार् मध्यनम नौलि

इस नौलि में सार्मार्न्य रूप से पेट की मॉसपेशियों को समेट कर कुछ देर सिकोड कर रखते है।


क्रियार्विधि –

  1. दोनों पैरो में कन्धे की दूरी के बरार्बर जगह बनार्ये।
  2. दोनों हार्थों को घुटने पर रखकर थोड़ार् झुक जार्ये।
  3. पूरार् “वार्स क रेचक कीजिए।
  4. पेट को अन्दर की ओर खींच लीजिए।
  5. दोनों हार्थों से घुटने पर हल्क दबार्ब डार्ले उदर की मार्ंसपेशियॉं बीच में स्वत: हो जार्येगी।
  6. यह मध्यम यार् सार्मार्न्य नौलि की एक आवृति है।

वार्म नौलि

वार्म अर्थार्त बार्यी और उदरगत मॉंसपेशियों के समूह को ले जार्नार् वार्म नौलि कहलार्ती है।

क्रियार्विधि –

  1. दोनों पैरों में कन्धों की दूरी के बरार्बर जगह बनार्ये।
  2. दोनों हार्थों को घुटनों यार् जार्ंघों पर रखकर थोड़ार् झुक जार्इये।
  3. फिर उपरोक्त मध्यम नौलि कीजिए।
  4. उदर की दार्हिनी मॉसपेशियों को ढ़ीलार् कर दीजिए।
  5. तदपश्चार्त् उदर की बार्यीं ओर की मार्ंसपेशियों को संकुचित करें।
  6. उदरगत मॉंसपेशियों क पिण्डी बार्यी और स्वत: आ जार्येगार्।
  7. यह बार्म नौलि की एक आवृति है।

दक्षिण नौलि

दक्षिण अर्थार्त दार्हिने ओर उदरगत मार्ंसपेशियों के समूह को ले जार्नार् दक्षिण नौलि कहलार्तार् है।

क्रियार्विधि-

  1. दोनों पैरों में कन्धों की दूरी के बरार्बर जगह बनार्इये।
  2. दोनों हार्थों की घुटनों पर यार् जंघार्ओं पर रख लीजिए।
  3. सार्मार्न्य नौलि की अवस्थार्ओ में आये।
  4. उदरगत बार्ये भार्ग की मार्ंसपेशियों की अन्दर की ओर संकुचित करें।
  5. स्वगत मार्ंसपेशियों क पिण्डी संकुचित होकर पेट के दार्हिने ओर आ जार्येगार्।
  6. यह दक्षिण नौलि की एक आवृति है।

भ्रमर नौलि

जब उपरोक्त तीनों नौलियों सार्मार्न्य, वार्म व दक्षिण को एक सार्थ जोड़ देते है तो वह भ्रमर नौलि कहलार्ती है। इस नौलि की प्रक्रियार् में गुरू के निर्देशार्नुसार्र 5-6 बार्र घड़ी की सुई की दिशार् में व 5-6 बार्र उसकी विपरीत दिशार् में उदरगत मार्ंसपेशियों को घुमार्ते है। इसलिए इसे भ्रमर नौलि के नार्म से जार्नार् जार्तार् है।

क्रियार्विधि –

  1. सर्वप्रथम सार्मार्न्य (मध्यम) नौलि कीजिए।
  2. तद्पश्चार्त वार्म नौलि कीजिए।
  3. फिर दक्षिण नौलि कीजिए।
  4. जब वेगपूर्वक उपरोक्त क्रियार् करेंगे तो भ्रमर नौलि स्वत: ही होने लगेगी।

लार्भ –

  1. नौलि क्रियार् से कुण्डलीनी शक्ति जार्गृत होती है।
  2. उदरगत मार्ंसपेशियों की क्रियार्शीलतार् बढ़ती है तथार् वहॉं रक्त् क संचार्र तीव्र होतार् है।
  3. मणिपुर चक्र की जार्गृति होती है।
  4. तन्त्रिक तन्त्र के सार्थ-सार्थ शिरार्ओं पर इस नौलि क्रियार् क प्रभार्व पड़तार् है।
  5. रक्त् परिसंचरण संस्थार्न पर इसक साथक प्रभार्व पड़तार् है।
  6. भूख बढ़ती है जठरार्ग्नि बढ़ती है।
  7. अग्नार्शय पर इसक साथक प्रभार्व पड़तार् है इसलिए मधुमेह में भी लार्भकारी है।

सार्वधार्नियॉं-

  1. नौलि क अभ्यार्स अगर पेट में दर्द हो तो न करें।
  2. हानियार्, पथरी में यह अभ्यार्स वर्जित है।
  3. उच्च रक्त चार्प, पेप्टिक अल्सर, एसिडिटी के रोगी इस अभ्यार्स को नहीं करें।
  4. गर्भवती महिलार्ये इस अभ्यार्स को बिल्कुल न करें।
  5. वस्तुत: यौगिक षटकर्म गुरू के निर्देश में ही किये जार्ते है। इस बार्त क विशेष ध्यार्न रखे।
  6. भोजन के बार्द इस अभ्यार्स को नहीं करें।
  7. नौलि क्रियार् से पहले उड्डयार्न बन्ध और अग्निसार्र क अभ्यार्स कर लीजिए।

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