निर्देशन के सिद्धार्न्त एवं तकनीकी

निर्देशन की मार्न्यतार्यें

आज के भौतिकवार्दी जीवन में हतार्शार्, निरार्शार् एवं कुसमार्योजन की समस्यार्ओं ने भयार्वह रूप ले लियार् है। इन सभी समस्यार्ओं ने जीवन के प्रत्येक चरण में निर्देशन की आवश्यकतार् को जन्म दियार्। निर्देशन प्रक्रियार् कुछ परम्परार्गत मार्न्यतार्ओं पर निहित होतार् है। ये मार्न्यतार्यें हैं-

  1. व्यक्ति भिन्नतार्ओं क होनार्-व्यक्ति अपनी जन्मजार्त योग्यतार्, क्षमतार्, अभिवृतियों एवं रूचियों के सार्थ अन्य व्यक्तियों से अलग होतार् है। यह भिन्नतार् उसकी समस्यार्ओं की भिन्नतार् को जन्म देती है। यह उसके व्यवहार्र एवं व्यक्तित्व के स्वरूप को निर्मित करती है इसलिये उसके भिन्नतार् की उपेक्षार् नहीं की जार् सकती है और निर्देशन प्रक्रियार् में इसको ध्यार्न में रखार् जार्तार् है।
  2. अवसरों की विभिन्नतार्-व्यक्ति अपने वंशार्नुक्रम एवं वार्तार्वरण की भिन्नतार् को लेकर उत्पन्न होतार् है। यह विविधतार् उसके शैक्षिक, सार्मार्जिक तथार् व्यार्वसार्यिक अवसरों की अनेकरूपतार् में प्रार्य: देखी जार् सकती है, वार्स्तव में इन अवसरों की भिन्नतार् सम्पूर्ण जीवन में विविधतार् लार् देती है और यह निर्देशन प्रक्रियार् की प्रमुख मार्न्यतार् भी है।
  3. वैयैयक्तिक विकास को सम्भार्वित मार्नार् जार् सकतार् है-हमार्रे वैयक्तिक विकास की प्रक्रियार् तथार् भार्वी उपलब्धियों के सम्बन्ध में योग्यतार् परीक्षणों, अभिक्षमतार् परखों, रूचियों एवं व्यक्ति के व्यक्तित्व मार्पनी तथार् पूर्व की उपलब्धियों  के आधार्र पर भविश्य कथन सम्भव है।
  4. सार्मन्जस्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकतार्-मार्नव जीवन की सफलतार् उसकी सार्मन्जस्य योग्यतार् पर निर्भर करती है और मनुश्य अधिक समय परिस्थितियों के सार्थ संघर्श करके उसमें सार्मन्जस्य करने क प्रयार्स करतार् है। सार्मन्जस्य व्यक्ति की मूल आवश्यकतार् है।
  5. वैयैयक्तिक व सार्मार्जिक विकास हेतु सार्मन्जस्य एवं परिस्थितियों की विविधतार् के सार्थ तार्लमेल आवश्यक है-वैयक्तिक एवं सार्मार्जिक विकास अन्त:सम्बन्धित होते हैं वैयक्तिक उन्नति व्यक्ति की योग्यतार्ओं, अभिक्षमतार्ओं एवं रूचियों तथार् बार्ह्य अवसरों में तार्लमेल एवं समुचित सार्मन्जस्य पर निर्भर करतार् है। सार्मन्जस्य की प्रक्रियार् को सहज निश्कंटक तथार् सरल बनार्ने में औपचार्रिक एवं अनौपचार्रिक रूप में उपलब्ध निर्देशन में सहार्यक होते है। निर्देशन की सम्पूर्ण प्रक्रियार् उपरोक्त सभी मार्न्यतार्ओं पर निर्भर है। मार्नव जीवन की सफलतार् उसके सार्मन्जस्य क्षमतार् पर निर्भर करती है और इसके लिये वह निरन्तर प्रयार्सरत रहतार् है। आज के युग में विविध प्रकार के मनोवैज्ञार्निक तनार्व एवं विसंगतियों जिस हद तक हमार्री सार्मार्जिक व्यवस्थार् पर कुठार्रार्घार्त करती है तब निर्देशन की आवश्यकतार् स्वयं उपस्थित हो जार्ती है।

निर्देशन के सिद्धार्न्त

निर्देशन में व्यक्ति के विकास और समार्जहित दोनों पर ही ध्यार्न दियार् जार्तार् है। वार्स्तव में निर्देशन की प्रक्रियार् उन सभी कार्यो एवं प्रयार्सों क संगठन है जिसमें व्यक्ति को सार्मन्जस्य समार्हित विशिष्ट तकनीकों के प्रयोग द्वार्रार् परिस्थितियों को संभार्लने, एक व्यक्ति को उसके अधिकतम विकास तक पहुॅचार्ने जिसमें उसक शार्रीरिक, व्यक्तित्व, सार्मार्जिक, व्यवसार्यिक, सार्ंस्कृतिक एवं आध्यार्त्मिक विकास हो, सम्मिलित है। निर्देशन कुछ निश्चित सिद्धार्न्तों पर कार्य करतार् है। इसके प्रमुख सिद्धार्न्तों को लेस्टर डी0 क्रो एवं एलिस क्रो ने अपनी रचनार् ‘‘एन इण्ट्रोडक्षन टु गार्इडेन्स’’ में वर्णित कियार् है। इनक विवरण नीचे दियार् जार् रहार् है।

  1. व्यक्ति क सम्पूर्ण प्रदर्शित व्यक्तित्व एवं व्यवहार्र एक महत्वपूर्ण घटक होतार् है। निर्देशन सेवार्ओं में इन तत्वों के महत्व को दियार् जार्नार् चार्हिये। 
  2. मार्नव की सभी विभिन्नतार्ओं को स्तरार्नुसार्र एवं आवश्यकतार्नुसार्र महत्व देनार् चार्हिए। 
  3. व्यक्ति को प्रेरक, उपयोगी तथार् प्रार्प्त होने योग्य उद्देष्यों के निरूपण में मदद करनार्। 
  4. वर्तमार्न उपस्थित समस्यार्ओं के उचित समार्धार्न हेतु प्रशिक्षित एवं अनुभवी निर्देशनदार्तार् द्वार्रार् यह दार्यित्व निभार्नार् जार्नार् चार्हिए।
  5. निर्देशन को बार्ल्यार्वस्थार् से प्रौढ़ार्वस्थार् तक अनवरत रूप से चलने वार्ली प्रक्रियार् के रूप में प्रस्थार्पित करनार्। 
  6. निर्देशन की प्रक्रियार् को सर्वसुलभ बनार्यार् जार्नार् चार्हिये जिससे कि वह आवश्यकतार् को न बतार्ने वार्ले व्यक्ति को भी मिल सके। 
  7. विविध पार्ठ्यक्रमों के लिये गठित अध्ययन सार्मग्रियों तथार् शिक्षण पद्धतियों में निर्देशन क दृष्टिकोण झलकनार् चार्हिये। 
  8. शिक्षकों एवं अभिभार्वकों को निर्देशनपरक उत्तरदार्यित्व सौपार् जार्नार् चार्हिये।
  9. निर्देशन को आयु स्तर पर निर्देशन की विशिष्ट समस्यार्ओं को उन्हीं व्यक्तियों को सुपुर्द करनार् चार्हिये जो इसके लिये प्रशिक्षित हो। 
  10. निर्देशन के विविध पक्षों को प्रशार्सन बुद्धिमतार्पूर्वक एवं व्यक्ति के सम्यक अवबोध के आधार्र पर करने की दृश्टि से व्यक्तिगत मूल्यार्ंकन एवं अनुसंधार्न कार्यक्रमों को संचार्लित करनार् चार्हिये। 
  11. वैयक्तिक एवं सार्मुदार्यिक आवश्यकतार्ओं के अनुकूल निर्देशन क कार्यक्रम लचीलार् होनार् चार्हिये।
  12. निर्देशन कार्यक्रम क दार्यित्व सुयोग्य एवं सुप्रशिक्षित नेतृत्व पर केन्द्रित होनार् चार्हिये।
  13. निर्देशन के कार्यक्रमों क सतत् मूल्यार्ंकन करनार् चार्हिये। और इस कार्यक्रम में लगे लोगों क इसके प्रति अभिवृित्त्ार्यों क भी मार्पन होनार् चार्हिये क्योंकि इनक लगार्व ही इस कार्यक्रम की सफलतार् क रार्ज होतार् है।
  14. निर्देशन कार्यक्रमों क सम्यक संचार्लन हेतु अत्यन्त कुषल एवं दूरदर्षितार् नेतृत्व अपेक्षित है। 

निर्देशन के मूलभूत सिद्धार्न्त 

निर्देशन के अधिकांश सिद्धार्न्तों के विषय में ऊपर पढ़ चुके है। यह स्पष्ट हो गयार् कि यह निर्देशन कार्मिकों, प्रशार्सकों, शिक्षकों, विषेशज्ञों एवं निर्देशन क लार्भ उठार्ने वार्ले सेवाथियों क आपसी सहयोग उनकी निष्ठ तथार् प्रेरणार् पर निर्भर करतार् है। निर्देशन के मूलभूत सिद्धार्न्त हैं जिनपर यह कार्य करतार् है।

  1. निर्देशन जीवन पर्यन्त चलने वार्ली प्रक्रियार् है जो कि जीवन के प्रत्येक चरण में उपयोगी होती है।
  2. निर्देशन व्यक्ति विषेश पर बल देतार् है। यह प्रक्रियार् व्यक्ति को स्वतन्त्रतार् देते हुये उसे अपनी समस्यार्ओं को सुलझार्ने हेतु उसकी आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र ही सहयोग देतार् है। 
  3. निर्देशन स्व निर्देशन पर बल देतार् है। यह प्रक्रियार् सेवार्थ्री को स्वयं अपनी दक्षतार् विकसित करने योग्य बनार्ती है। 
  4. निर्देशन सहयोग पर आधार्रित प्रक्रियार् है अर्थार्त् यह सेवार् प्रदार्तार् एवं सेवार्थ्री के आपसी तार्लमेल पर निर्भर करतार् है।
  5. निर्देशन एक पूर्व नियोजित एवं व्यवस्थित प्रक्रियार् है। यह अपने विविध चरणों से आगे बढ़ती हुयी संचार्लित की जार्ती है। 
  6. निर्देशन में सेवार्थ्री से सम्बन्धित आवश्यक जार्नकारी को पूरी तरह से व्यवस्थित एवं गोपनीय रखी जार्ती है।
  7. यह कम से कम संसार्धनों के अनुप्रयोग द्वार्रार् अधिक से अधिक निर्देशन सेवार्ओं को उपलब्ध करार्ने के सिद्धार्न्त पर निर्भर करती है।
  8. निर्देशन के लिये जो भी संसार्धन उपलब्ध हैं, के गहन रूप में उपयोग क सिद्धार्न्त अपनार्यार् जार्तार् है। 
  9. निर्देशन के कार्यक्रमों क सेवार्थ्री की आवश्यकतार्ओं के अनुकूल संगठन कर आवश्यकतार्ओं की संतुश्टि पर ध्यार्न केन्द्रित कियार् जार्तार् है।
  10. निर्देशन प्रक्रियार् सेवार्ओं के विकेन्द्रीकरण पर बल देती है। 
  11.  निर्देशन सेवार्ओं में समन्वय लार्ने क कार्य कियार् जार्तार् है।

निर्देशन की प्रविधियॉ

निर्देशन प्रक्रियार् में सबसे अधिक आवश्यक होतार् है सेवार्थ्री की व्यक्तिगत विशेषतार्ओं , योग्यतार्ओं यार् इच्छार्ओं को जार्ननार्। इनको जार्ने बिनार् परार्मर्ष द्वार्रार् दियार् जार्ने वार्लार् सहयोग अप्रभार्वी हो जार्तार् है। विद्याथियों की पृष्ठभूमि जार्नने की आवश्यकतार् को बतार्ते हुये रीविस एवं जुड ने इस प्रकार व्यक्त कियार् कि-’’छार्त्रों’’ की पृष्ठभूमि तथार् उनके अनुभवों के सम्बन्ध में ज्ञार्न प्रार्प्त किये बिनार् उनके विकास में पथ प्रदर्शन करने क प्रयत्न असम्भव के लिये प्रयत्न करने के समार्न है।’’ जोन्स ने कहार् है कि-’चुनार्व करने में जो सहार्यतार् दी जार्ये उसक आधार्र व्यक्ति से सम्बन्धित पूर्ण ज्ञार्न, उनकी प्रमुख आवश्यकतार्ये तथार् उनके निर्णय को प्रभार्वित करने वार्ली परिस्थितियों क ज्ञार्न होनार् चार्हिये।’’ निर्देशन हेतु निम्न सूचनार्यें प्रार्प्त की जार्ती है-सार्मार्न्य सूचनार्ये, पार्रिवार्रिक व सार्मार्जिक वार्तार्वरण, स्वार्स्थ्य, विद्यार्लयी इतिहार्स और कक्षार् कार्य क आलेख सार्फल्य, मार्नसिक योग्यतार्, अभियोग्यतार्, रूचियों, व्यक्तित्व, समार्योजन स्तर एवं भविश्य की योजनार्। सूचनार्यें प्रार्प्त करने की दो विधियॉ हैं- 1. प्रमार्पीकृत परीक्षार्ये 2.अप्रमार्पीकृत परीक्षार्ये ।

निर्देशन के सिद्धार्न्त एवं तकनीकी

वृतार्न्त अभिलेख-

यह अवलार्केन विधि की एक शार्खार् है। यह व्यक्तित्व अध्ययन में भी सहार्यक है। अध्यार्पक द्वार्रार् छार्त्रों के प्रतिदिन के कार्यो क निरीक्षण कियार् जार्ये और उसको लिख ले। रेटस ल्यूइस के अनुसार्र-किसी छार्त्र के जीवन की महत्वपूर्ण घटनार् क प्रतिवेदन ही वृतार्न्त अभिलेख है। यह वार्स्तविक स्थिति में बच्चे के चरित्र तथार् व्यक्तित्व सम्बन्धी अभिलेख होतार् है। इसमें सहयोग प्रार्प्त करनार्, प्रार्रूप तैयार्र करने, मुख्य अभिलेख प्रार्प्त करनार् व संक्षिप्तीकरण आदि चरण होते है।

आत्मकथार्-

यह एक आत्मनिष्ठ विधि है। यह दो प्रकार की होती है-निर्देशित व व्यक्तिगत इतिहार्स। निर्देशित आत्मकथार् में व्यक्ति अपने सम्बन्ध में लिखने के लिये स्वतन्त्र नहीं होतार् है। यह एक प्रश्नार्वली के रूप में होती है। व्यक्तिगत इतिहार्स में किसी प्रकार के निर्देष नहीं होते है। छार्त्र अपने सम्बन्ध में सब कुछ लिखतार् है। इस प्रकार क विवरण यार् गार्थार् क्रमबद्ध यार् व्यवस्थित नहीं होतार् है।

क्रम निर्धार्रण मार्न-

इस विधि से व्यक्तित्व तथार् निश्पति क मार्पन होतार् है। यह एक आत्मनिष्ठ विधि है जिसमें वैद्यतार् तथार् विष्वसनीयतार् कम पार्यी जार्ती है। रूथ स्ट्रैंग के अनुसार्र निर्देशित परीक्षण ही क्रम निर्धार्रण मार्न है। इसके प्रकार है- रेखार्ंकित मार्पदण्ड 2. संख्यार्त्मक मार्पदण्ड 3. संचयी अंकविधि 4. पदक्रम मार्पदण्ड रेखार्ंकित मार्पदण्ड क व्यार्पक रूप में होतार् है इसमें एक रेखार् बनी रहती है इसको कर्इ भार्गों में विभक्त कियार् जार्तार् है। निर्णार्यक को इनमें से ही किसी एक पर चिन्ह लगार्नार् होतार् है। संख्यार्त्मक मार्पदण्ड में अंकों को निश्चित उद्दीपकों के सार्थ सम्बन्धित कर देते हैं। इस मार्पदण्ड में छार्त्रों को गुणों के आधार्र पर अंक मिलते हैं। संचयी अंक विधि में व्यक्ति के गुणो क मूल्यार्ंकन करके अंक प्रदार्न कर दिये जार्ते है। पदक्रम मार्पदण्ड में नियमार्नुसार्र उच्च से निम्न स्तर की ओर क्रम से स्थार्न दिये रहते हैं।

व्यक्ति-वृत अध्ययन-व्यक्ति-

वृत अध्ययन विधि क प्रयार्गे भी व्यक्ति से सम्बन्धित सूचनार्ये एकत्रित करने के लिये कियार् जार्तार् है। इस विधि क सर्वप्रथम उपयोग 19वीं शतार्ब्दी के अन्तिम चरण में सुव्यवस्थित रूप से हुआ। इसमें व्यक्ति से सम्बन्धित सभी सूचनार्यें एकत्रित तथार् व्यवस्थित की जार्ती है। छार्त्रों की कठिनार्इयों के कारण ज्ञार्त करने के लिये उन सूचनार्ओं क अध्ययन कियार् जार्तार् है।

समार्ज भिति-

मार्नव एक सार्मार्जिक प्रार्णी है। उसको समार्ज के अन्य व्यक्तियों के सार्थ रहनार् पड़तार् है। एण्ड्रू एवं विली के अनुसार्र ‘‘समार्जभिति एक रेखार्चित्र है जिसमें कुछ चिन्ह और अंक किसी सार्मार्जिक समूह के सदस्यों द्वार्रार् सार्मार्जिक स्वीकृति यार् त्यार्ग क ढंग प्रदर्षित करने के लिये प्रयुक्त होते हैं। इसके द्वार्रार् एक समूह के सदस्यों की पार्रस्परिक भिन्नतार् क पतार् लगार्यार् जार् सकतार् है। इसमें प्रमुख रूप से दो विधियॉ काम में लार्यी जार्ती है-1. प्रश्नार्वली 2. निरीक्षण। समार्जभिति क अध्ययन व्यक्तियों के पार्रस्परिक सार्मार्जिक सम्बन्धों को प्रकट करतार् है।

प्रश्नार्वली-

यह एक आत्मनिष्ठ विधि है। गुड एव हैट ने प्रश्नार्वली की परिभार्शार् इस प्रकार दी है-सार्मार्न्यत: प्रश्नार्वली शब्द प्रश्नो के उत्तर प्रार्प्त करने की योजनार् की ओर संकेत करतार् है। व्यक्ति को स्वयं प्रश्नार्वली फाम भरनार् होतार् है।’’ इसके दो रूप होते है- अ) प्रमार्पीकृत प्रश्नार्वली-यह इन्वेन्ट्री कहलार्ती है इसको व्यक्तित्व के जॉच के लिये प्रयोग में लार्यार् जार्तार् है। प्रश्नार्वली-इस प्रश्नार्वली द्वार्रार् व्यक्ति की सार्धार्रण सूचनार्यें प्रार्प्त की जार्ती हैं। प्रश्नार्वली के दो प्रकार होते हैं-

  1. बन्द प्रश्नार्वली-इसमें  व्यक्ति हार्ँ यार् नही में उत्तर देतार् है स्वय कुछ नहीं लिखतार्।
  2. खुली प्रश्नार्वली-इस प्रकार की प्रश्नार्वली में प्रश्नो के आगे उत्तर लिखने के लिये रिक्त स्थार्न रहतार् है। इस विधि से प्रश्नार्वली बनार्ने व प्रार्प्त उत्तरों की व्यार्ख्यार् करने में समय लगतार् है।

सार्क्षार्त्कार-

सार्क्षार्त्कार एक उद्देष्यपूर्ण संवार्द है। विंघम और मूर के अनुसार्र यह एक गंभीर संवार्द है जो सार्क्षार्त्कारजन्य संतोश की अपेक्षार् एक निश्चित उद्देष्य की ओर उन्मुख होतार् है। सार्क्षार्त्कार आयोजित करने के उद्देश्य-परिचयार्त्मक, तथ्यार्श्रित, मूल्यार्ंकनपरक, ज्ञार्नवर्धक तथार् चिकित्सकीय प्रकृति वार्ली सूचनार्ए एकत्र करनार्। इसकी दूसरी विषेशतार् है-सार्क्षार्त्कारकर्तार् तथार् जिससे सार्क्षार्त्कारदार्तार् के मध्य परस्पर संबंध स्थार्पित होनार् है। इस अवसर क उपयोग सार्क्षार्तकर्तार् से मित्रवत् अनौपचार्रिक बार्तचीत के लिए कियार् जार्नार् चार्हिए। उसे आत्मविष्वार्सपूर्ण मुक्त तथार् वार्तार्वरण में बार्तचीत करने की अनुमति दी जार्नी चार्हिए।

विभिन्न प्रकार के सार्क्षार्त्कार


जिन-जिन उद्देष्यों को ध्यार्न में रखकर सार्क्षार्त्कार कियार् जार्तार् है उनके अनुसार्र ही सार्क्षार्त्कार भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। यदि किसी पद के लिए किसी प्रत्यार्षी क चयन करनार् है तो यह नियोजन यार् रोजगार्र संबंधी सार्क्षार्त्कार होगार्। यदि सार्क्षार्त्कार क उद्देश्य तथ्य संग्रह यार् उनकी संपुश्टि करनार् है तो इसे तथ्यार्न्वेशी सार्क्षार्त्कार कहार् जार्एगार्। इस प्रकार सार्क्षार्त्कारों क वर्गीकरण उनके उद्देश्यनुसार्र होतार् है। दूसरे प्रकार के विभार्जन क आधार्र सार्क्षार्त्कार करने वार्ले और सार्क्षार्त्कार देने वार्ले व्यक्तियों के मध्य संबंधों के स्वरूप के आधार्र पर ही सार्क्षार्त्कारों को वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है। यदि सार्क्षार्त्कार में उपबोधक की मुख्य भूमिक है तो इसे उपबोधक केंद्रित सार्क्षार्त्कार कहार् जार्एगार्। यदि यह उपबोधक-प्रार्थ्री को प्रमुखतार् देतार् है तो इसे उपबोध् ार्न-प्रार्थ्री केंद्रित सार्क्षार्त्कार कहार् जार्तार् है। कभी-कभी सार्क्षार्त्कार करने के तरीके से भी सार्क्षार्त्कार के प्रकार क निर्धार्रण होतार् है। सार्क्षार्त्कार के प्रमुख प्रकार हैं :-

  1. स्थार्न/रोजगार्र सार्क्षार्त्कार : इस प्रकार के सार्क्षार्त्कार क उद्देश्य पद के लिए प्रत्यार्शी की पार्त्रतार् क आकलन करनार् है। इसमें सार्क्षार्त्कारकर्तार् अधिक बोलतार् है यार्नी प्रश्न पूछतार् जार्तार् है और उसकी तुलनार् में सार्क्षार्त्कार देने वार्लार् कम बोलतार् है यार्नी प्रश्न पूछतार् जार्तार् है और उसकी तुलनार् में सार्क्षार्त्कार देने वार्लार् कम बोलतार् है यार्नी वह केवल पूछे गये प्रश्नो के उत्तर ही देतार् है।
  2. तथ्यार्न्वेशी सार्क्षार्त्कार : अन्य स्रोतों से सकं लित आकंडाऱ्े सूचनार्ओं तथार् तथ्यों की संपुश्टि करनार् तथ्यार्न्वेशण सार्क्षार्त्कार क उद्देश्य  होतार् है।
  3. निदार्नार्त्मक सार्क्षार्त्कार : इस प्रकार के सार्क्षार्त्कार क उद्देश्य समस्यार् के निदार्न खोजकर उसक उपचार्र करनार् है। इसमें सार्क्षार्त्कारकर्तार् द्वार्रार् सार्क्षार्त्कार देने वार्ले व्यक्ति की समस्यार् क निदार्न करके उसके लक्षणों को ज्ञार्त करने क प्रयत्न कियार् जार्तार् है। यार्नी सार्क्षार्त्कार देने वार्ले व्यक्ति की समस्यार् क हल करने के लिए आवश्यक सूचनार्ओं क संकलन कियार् जार्तार् है।
  4. उपबोधन प्रधार्न सार्क्षार्त्कार : उपबोधन प्रधार्न सार्क्षार्त्कार क उद्देष्य देने वार्ले व्यक्ति की अंतर्दृश्टि क विकास करनार् होतार् है। इस प्रकार के सार्क्षार्त्कार प्रार्रंभ सूचनार् के संकलन कार्य से होतार् है। फिर निर्देशन प्रक्रियार् के सार्थ-सार्थ अग्रसर होतार् हुआ वह समस्यार् के मनोवैज्ञार्निक उपचार्र के रूप में समार्प्त हो जार्तार् है।
  5. व्यक्तिगत तथार् सार्मूहिक सार्क्षार्त्कार : जब एक समहू में बहुत से लोगों क सार्क्षार्त्कार जियार् जार्ए, तो इसे सार्मूहिक सार्क्षार्त्कार कहते हैं। किंतु मूलरूप में सभी प्रकार के सार्मूहिक सार्क्षार्त्कार व्यक्तिगत सार्क्षार्त्कार ही हुआ करते हैं, क्योंकि सार्मूहिक सार्क्षार्त्कार भी तो व्यक्ति के रूप में सार्क्षार्त्कार देने वार्ले व्यक्तियों क ही सार्क्षार्त्कार है। सार्मूहिक सार्क्षार्त्कार क उद्देश्य  समूह की सार्मार्न्य समस्यार्ओं क संकलन करनार् और उनकी जार्नकारी प्रार्प्त करनार् है। व्यक्तिनिष्ठ सार्क्षार्त्कार में विषेश से संबंधित समस्यार्ओं की ओर ही झुकाव रहतार् है। काल रोजर्स क व्यक्तिनिष्ठ सार्क्षार्त्कार के विषय में भिन्न मत हैं। उनक मत है कि व्यक्तिनिष्ठ सार्क्षार्त्कार क केंद्र बिंदु व्यक्ति को प्रभार्वित करने वार्ली समस्यार् नहीं है बल्कि उसक केंद्र बिंदु तो स्वयं व्यक्ति ही है। व्यक्तिनिष्ठ सार्क्षार्त्कार क उद्देष्य व्यक्ति विषेश की किसी एक समस्यार् क निरार्करण करनार् नहीं होतार् अपितु सार्क्षार्त्कार देने वार्ले को इस प्रकार सहार्यतार् प्रदार्न करनार् है कि वह खुद ही इतनार् सक्षम हो जार्ए कि वह वर्तमार्न की और भविश्य में आने वार्ली सभी समस्यार्ओं क कुषलतार्पूर्वक और समार्योजित ढंग से सार्मनार् कर सके।
  6. सत्तार्वार्दी तथार् गैैर-सत्तार्वार्दी सार्क्षार्त्कार (Authoritarian v/s Non authoritarian) सत्तार्वार्दी सार्क्षार्त्कार में सेवार्थ्री तथार् उसकी समस्यार्ए पीछे छूट जार्ती हैं और सार्क्षार्त्कारकर्तार् अपनी उन्नत स्थिति क लार्भ उठार्कर सार्क्षार्त्कार प्रक्रियार् में हार्वी हो जार्तार् है। गैर-सत्तार्वार्दी सार्क्षार्त्कार में सार्क्षार्त्कारकर्तार् की अधिनार्यक जैसी भूमिक क वर्जन होतार् है। भले ही सार्क्षार्त्कार देने वार्लार् व्यक्ति सार्क्षार्त्कारकर्तार् को सत्तार् संपन्न समझे फिर भी इस प्रकार के सार्क्षार्त्कार में सार्क्षार्त्कारकर्तार् एक अधिनार्यक की भॉँति व्यवहार्र नहीं करतार् । वह सेवार्थ्री की भार्वनार्ओं क आदर करतार् है, उनकी वर्जनार् नहीं करतार्। वह सार्क्षार्त्कार लेते समय कर्इ प्रकार की तकनीकों क उपयोग करतार् है, जैसे प्रत्यार्षी/उम्मीदवार्र को सुझार्व देनार्, उत्सार्हित करनार्, उपबोधन देनार्, आष्वार्सन प्रदार्न करनार्, व्यार्ख्यार् करनार् तथार् सूचनार् प्रदार्न करनार्।
  7. निदेशित व अनिदेशित सार्क्षार्त्कार : निदेशित सार्क्षार्त्कार के अंतर्गत सार्क्षार्त्कारकर्तार् सेवार्थ्री को निर्देशन देतार् है। कभी वह सुझार्व देकर, प्रोत्सार्हित कर अथवार् डरार्-धमकाकर अपने उपबोधन से माग प्रषस्त करतार् है। किंतु अनिदेशित, सार्क्षार्त्कार में यह मार्न लियार् जार्तार् है कि सार्क्षार्त्कार देने वार्ले व्यक्ति में स्वयं विकास और अभिवृद्धि करने की क्षमतार् विद्यमार्न है। अनिदेशित सार्क्षार्त्कारों में सेवार्थ्री को अपनी भार्वनार्ओं और संवेगों को प्रकट करने की पूर्ण स्वतंत्रतार् रहती है। सार्क्षार्त्कार लेने वार्लार् सेवार्थ्री के भूतकाल में न तो झॉँककर देखने क प्रयत्न करतार् है और न ही उसे कोर्इ सुझार्व देतार् है। वह प्रार्थ्री को पुनर्षिक्षित करने यार् परिवर्तित करने क प्रयत्न भी नहीं करतार्।
  8. संरचित व असंरचित सार्क्षार्त्कार : संरचित सार्क्षार्त्कार में निश्चयार्त्मक प्रश्नों की एक श्रंखलार् पूर्वनिश्चित होती है। सार्क्षार्त्कारकर्तार् प्रश्न करते समय स्वयं को केवल उन्हीं बिंदुओं तक सीमित रखतार् है जिनकी सार्क्षार्त्कार के समय चर्चार् करनार् चार्हतार् है। संरचित सार्क्षार्त्कार मे निश्चित प्रश्न ही पूछे जार्ते हैं जबकि असंरचित सार्क्षार्त्कार में ऐसार् कोर्इ प्रतिबंध नहीं होतार्। उसमें सार्क्षार्त्कार लेने वार्लार् अपने विचार्र व्यक्त करने में पूर्ण स्वतंत्र होतार् है। चर्चार् क विषय पूर्व निर्धार्रित नहीं होतार्। असंरचित सार्क्षार्त्कार में कभी-कभी ऐसी सूचनार्ए भी प्रार्प्त होती हैं जो देखने में महत्वहीन यार् तुच्छ लगें किंतु जब उनकी व्यार्ख्यार् की जार्ती है तो वे अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होती हैं।
    सार्क्षार्त्कार के मार्ध्यम से किए जार्ने वार्ले उपबोधन के सार्मार्न्य नियम –

    1. किसी भी सार्क्षार्त्कार की सफलतार् में निम्नलिखित बार्तों पर विषेश ध्यार्न दियार् जार्ए: सार्क्षार्त्कार की परिस्थिति ऐसी हो जहॉँ अधिक अनुभवी और प्रशिक्षित व्यक्ति दूसरे की बार्त भली प्रकार सुनने को तत्पर रहे। 
    2. उपबोध्य को सार्क्षार्त्कार और उपबोधन की आवश्यकतार् महसूस होनी चार्हिए। 
    3. उपबोधन प्रार्रंभ करने के पूर्व सेवार्थ्री के संबंध में अपेक्षित सभी तथ्यों की पूरी जार्नकारी उपबोधक के सार्मने रहे।
    4. उपबोधक और उपबोध्य में सौहाद पूर्ण संबंध स्थार्पित हो जार्नार् चार्हिए। यह एक प्रकार से उपबोधक विष्वार्स तथार् समार्दरपूर्ण संबंध है जो कि विष्वार्स और सुरक्षार् की भार्वनार् पर आधार्रित है। 
    5. सार्क्षार्त्कार क प्रार्रंभ पार्रस्परिक मधुर और स्नेहपूर्ण अभिवार्दनों से होनार् चार्हिए। इसमें ऐसी प्रतीत नहीं होनी चार्हिए कि सेवार्थ्री उपबोधक के अधीन है यार् कि एक व्यक्ति दूसरे पर हार्वी है। 
    6. चर्चार् को मूल मुद्दे तक ही सीमित रखनार् चार्हिए। 
    7. जब उपबोध्य अपनी बार्त कहनार् चार्हे तो उसे अपनी बार्त कहने की अनुमति मिलनी चार्हिए। उपबोध्य क विरोध करके अथवार् उसको नीचार् दिखार्ने से उपबोधक को कुछ भी हार्थ लगने वार्लार् नहीं है।
    8. सार्क्षार्त्कार क लक्ष्य उपबोध्य में समस्यार् को समझने की अंतदरृश्टि पैदार् करनार् तथार् उससे संबंधित परिणार्मों तक पहुचनार् होनार् चार्हिए। 
    9. निर्णय लेने में उपबोध्य को अग्रिम भूमिक निभार्ने क अवसर देनार् चार्हिए। 
    10. सार्क्षार्त्कार की समार्प्ति रचनार्त्मक सुझार्वों से होनी चार्हिए।

    सार्क्षार्त्कार से लार्भ


    सार्क्षार्त्कार व्यक्ति के अध्ययन हेतु काम आने वार्ली एक अमार्नकीकृत तकनीक है। छार्त्रों को उपबोधन प्रदार्न करने में सार्क्षार्त्कार क प्रार्य: उपयोग होतार् है। यह वह तकनीक है जिसके अभार्व में उपबोधन क कार्य संभव नहीं है। यह एक मूल्यवार्न तकनीक है जिससे सूचनार्ओं की प्रार्प्ति, समूह को सूचनार्ए प्रदार्न करनार् तथार् नए कर्मचार्री क चयन करनार् संभव होतार् है एवं व्यक्ति को समार्योजन करने तथार् समस्यार् के समार्धार्न में सहार्यतार् प्रदार्न की जार्ती है। निर्देशन और उपबोधन की तकनीक के रूप में सार्क्षार्त्कार के लार्भ हैं :-

    1. निर्देशन की अन्य तकनीकों से जो कार्य संभव नहीं है उन्हें सम्पन्न करने हेतु निर्देशन-कार्य में व्यार्पक रूप से प्रयुक्त होने वार्ली यह उत्तम तकनीक है। उदार्हरणाथ, व्यक्ति के निजी जीवन से संबधित अधिकतर ऑँकड़ों/सूचनार्ओं क अपेक्षार्कृत अल्प समय और कम श्रम से संकलन करने में यह प्रविधि कारगर सिद्ध होती है। 
    2. यह बहुत लचीली तकनीक है। विभिन्न पृश्ठभूमि के सभी प्रकार के व्यक्तियों की सभी परिस्थितियों में यह तकनीक बहुत उपयोगी है। 
    3. यह बहुतेरे उद्देष्यों की पूरक है। आप अपनार् उद्देष्य निर्धार्रित कर तद्नुसार्र सार्क्षार्त्कार कर सकते हैं। तथ्यार्न्वेशी सार्क्षार्त्कार क आयोजन करनार् चार्हें तो आप छार्त्र के मार्तार्-पितार्, मित्र, संबंधी, अध्यार्पक अथवार् जो भी व्यक्ति उसके अधिक सम्पर्क में आयार् हो, उससे सार्क्षार्त्कार करें। 
    4. इसक बहुत अधिक उपचार्रार्त्मक मूल्य भी है। सार्क्षार्त्कारकर्तार् और सार्क्षार्त्कार देने वार्ले व्यक्ति के मध्य में सार्क्षार्त्कार आमने-सार्मने क संबंध स्थार्पित करतार् है। प्रत्यक्ष संबंध स्थार्पित होने से सेवार्थ्री की समस्यार् के प्रति अंतदर्ृश्टि क विकास होतार् है। सार्क्षार्त्कारकर्तार् को सेवार्थ्री के संबंध में जो जार्नकारी प्रार्प्त होती है उसक बहुत उपचार्रार्त्मक महत्व है। 
    5. समस्यार् के निदार्न में सार्क्षार्त्कार सहार्यक है। प्रार्थ्री द्वार्रार् अनुभूत समस्यार् के कारणों क उद्घार्टन करने में यह बहुत सहार्यक है। इसलिए कुछ मनोवैज्ञार्निक सार्क्षार्त्कार को निदार्न और उपचार्र के बहुत उपयोगी तकनीक मार्नते हैं। 
    6. आमने सार्मने के सम्पर्क से सेवार्थ्री के व्यक्तित्व के संबंध में बहुत से महत्वपूर्ण सूत्र हार्थ लग जार्ते हैं। मुख-मुद्रार्, भार्वभंगिमार् तथार् बैठने क ढंग आदि मनोभार्वों की प्रतीति करार्ने में सहार्यक हैं तथार् भार्वनार् और अभिवृत्ति को अप्रत्यक्ष रूप से उद्घार्टित कर देते हैं। 
    7. सार्क्षार्त्कार सेवार्थ्री के लिए भी उपार्देय है। इससे उसे अपनी समस्यार् तथार् स्वयं के बार्रे में विचार्र करने में सहार्यतार् मिलजी है। सार्क्षार्त्कार ही वह सर्वार्धिक उपयोगी परिस्थिति होती है, जब सेवार्थ्री अपने बार्रे में, अपनी योग्यतार्ओं, कौषलों, अभिरूचियों तथार् अपने कार्यजगत के बार्रे में समुचित समझ प्रार्प्त करतार् है। 8. सार्क्षार्त्कार के मार्ध्यम से उपबोधक तथार् सेवार्थ्री दोनों में ही अपने-अपने विचार्र तथार् अभिवृत्तियों को पार्रस्परिक संवार्द द्वार्रार् प्रकट करने की इच्छार् जार्ग्रत होती है।

    एक तकनीक के रूप में सार्क्षार्त्कार की सीमार्ए

    1. सार्क्षार्त्कार एक व्यक्तिनिष्ठ तकनीक है। सेवार्थ्री के बार्रे में सूचनार्ओं क संकलन करने में इसके अंदर वस्तुनिष्ठतार् की कमी है। सार्क्षार्त्कार के मार्ध्यम से संकलित सूचनार्ओं की व्यार्ख्यार् में सार्क्षार्त्कारकर्तार् क व्यवहार्र पक्षपार्त और पूर्वार्ग्रहों से ग्रस्त हो सकतार् है। 
    2. व्यक्तिगत पक्षपार्त हो तो सार्क्षार्त्कार कम विष्वसनीय और अवैध होगार्। 
    3. सार्क्षार्त्कार के परिणार्मों की व्यार्ख्यार् करनार् बहुत कठिन है।
      सार्क्षार्त्कार की उपयोगितार् सीमित है। सार्क्षार्त्कार की सफलतार् सार्क्षार्त्कारकर्तार् के व्यक्तित्व के गुणों पर निर्भर करती है। वह किस प्रकार से सार्क्षार्त्कार ले रहार् है। यदि सार्क्षार्त्कारकर्तार् एकपक्षीय बार्तचीत के द्वार्रार् एकाधिकार बनार्ए हुए है और सेवार्थ्री जो कुछ कह रहार् है, उसे सुनार्-अनसुनार् कर रहार् है तो ऐसी स्थिति में सार्क्षार्त्कार क मूल्य समार्प्त हो जार्तार् है।

    निर्देशन में सूचनार् सकंलन की प्रमार्पीकृत विधियॉ

    निर्देशन कार्यक्रमों में प्रमार्पीकृत परीक्षार्ओं को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार् गयार् है। क्योंकि-

    1. प्रमार्पीकृत परीक्षार्यें निश्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ विधि है।
    2. इसमें सूचनार्यें एकत्रित करने में समय लगतार् है।
    3. परीक्षार्ओं द्वार्रार् व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्यार्ओं क अप्रत्यक्ष रूप से पतार् लगार्नार् सम्भव है। प्रमार्पीकृत परीक्षार्ओं की उपयोगितार् अधिक है परन्तु इनकी कुछ परिसीमार्यें हैं। जो कि वैधतार्, विष्वसनीयतार्, उपयोगितार् तथार् प्रतिदर्शी के क्षेत्रों में पार्यी जार्ती हैं। इनक विभार्जन कियार् जार्तार् है :-
      1. बुद्धि परीक्षार्यें 
      2. सार्फल्य परीक्षण 
      3. अभियोग्यतार् परीक्षार्यें
      4. रूचि परीक्षार्यें 
      5. व्यक्तित्व परीक्षार्यें

    बुद्धि परीक्षण-

    सर्वप्रथम 1875 में व्यक्तिगत भदे पर ध्यार्न केिन्द्रत कियार् गयार् और फिर अनेक प्रयोग व्यक्तिगत विभेद पर किये गये। इनमें कैटिल एवं गार्ल्टन के नार्म प्रमुख हैं। और बुद्धिमार्पन क कार्य मुख्य रूप में बिने ने प्रार्रम्भ कियार्। 1905 में प्रथम बुद्धि परीक्षण निकालार् गयार् और 1908 एवं 1911 में इस परीक्षण क संषोधन कियार् गयार् और फिर बिने ने सहयोगियों से सार्थ मिलकर ‘‘स्टेनफोर्ड-बिने टेस्ट’’ निकालार्। उनके अनुसार्र-

                                मार्नसिक आयु (M.A.)

    बुद्धि लब्धि (I.Q.)= X —————-100

                                वार्स्तविक आयु (C.A.)

    बुद्धि परीक्षण के इस टेस्ट को कर्इ देशों में अनुवार्द कियार् गयार् यह मुख्यत: दो प्रकार में विकसित हुये।

    1. शार्ब्दिक बुुद्धि परीक्षण-भार्रत में 1922 में सर्वप्रथम बुद्धि परीक्षण क निर्मार्ण कियार् गयार् जब डॉ0 सी0एच0 रार्इस ने सर्वप्रथम ‘‘हिन्दुस्तार्नी ‘बिने’ परफार्रमेन्स पार्इन्ट स्केल’’ क निर्मार्ण कियार्। वी0वी0 कामथ ने सन् 1935 को फिर दूसरार् प्रयार्स कियार्। बार्द में पं0 लल्लार् शकर झार् ने सन् 1933 में ‘‘सिम्पल मेन्टल टेस्ट’’ को बनार्यार्। 1936 में डॉ0 एस0 जलोटार् ने सार्मूहिक बुद्धि परीक्षण क निर्मार्ण कियार्। सन् 1937 में श्री एल0 के0 शार्ह ने सार्मूहिक मार्नसिक योग्यतार् परीक्षण क निर्मार्ण कियार्। सन् 1950-60 के मध्य केन्द्रीय शिक्षार् संस्थार्न (CIF) दिल्ली तथार् मनो-वैज्ञार्निक शार्लार् इलार्हार्बार्द ने विभिन्न आयु वर्ग के बार्लकों के लिये सार्मूहिक शार्ब्दिक बुद्धि परीक्षण अलग-अलग तैयार्र किये। शार्ब्दिक बुद्धि परीक्षण क निर्मार्ण शब्दों के मार्ध्यम से कियार् जार्तार् जिसमें किसी भार्शार् लिपि क प्रयोग होतार् है।
    2. अशार्ब्दिक बुद्धि परीक्षण-वे बुद्धि परीक्षण जिनमें परीक्षण के निर्मार्ण में किसी भार्शार् लिपि को मार्ध्यम नहीं बनार्यार् जार्तार् अशार्ब्दिक बुद्धि परीक्षण कहलार्ते हैं। भार्रत में सर्वप्रथम अहमदार्बार्द के प्रो0 पटेल ने गुडएनफ को बनार्यार्। बड़ोदरार् की प्रमिलार् पार्ठक ने ‘‘ड्रार् ए मैन टेस्ट’’ क भार्रतीय परिस्थितियों के लिए अनुकूलन कियार्। सन् 1938 में मेन्जिल्य ने एक मौलिक अशार्ब्दिक परीक्षण बनार्यार्। 1942 में विकरी तथार् ड्रेयर ने भी एक परीक्षण बनार्यार्। 1967 में एस0 चटर्जी व एम0 मुकर्जी ने एक परीक्षण बनार्यार्।

    निष्पार्दन परीक्षण-

    इसके अतिरिक्त कुछ एसे भी परीक्षण बने जार्े कि निश्पार्दन पर आधार्रित थे इनमें प्रमुख गोडाड फाम बोर्ड, गुडएनफ क ड्रार्इंग ए मैन टैस्ट, कोहलर ब्लॉक डिजार्इन टेस्ट इत्यार्दि हैं। इन सभी परीक्षणों को भार्रतीय आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र रूपार्न्तरित कर लियार् गयार्।
    ये मुख्यत: सुविधार् व सरलतार् के आधार्र पर निम्न प्रकार के होते हैं।

    1. व्यक्तिगत परीक्षण-यह परीक्षण एक समय में एक ही व्यक्ति पर प्रशार्सित किये जार् सकते हैं। बिने के परीक्षण व्यक्तिगत परीक्षण थे। इनमें मुख्यत: बिने स्टेनफोर्ड, वैष्लर वैल्यू, बर्ट के तर्कषक्ति मिनेसोटार् पूर्व विद्यार्लय परीक्षण। 
    2. समूहिक परीक्षण- इन परीक्षणार् के एक ही समय पर परे समहू पर प्रशार्सित किये जार् सकतार् हैं ये परीक्षार्यें अत्यन्त उपयोगी हैं। जैसे कि आर्मी अल्फार् परीक्षण, आर्मी वीटार् परीक्षण, आर्मी जनरल, क्लार्सीफिकेषन, क्हूलमैन एण्डरसन बुद्धि परीक्षण। 
    3. शक्ति परीक्षण – इस परीक्षण के द्वार्रार् व्यक्ति की किसी एक विषेश क्षेत्र से सम्बन्धित शक्ति की परीक्षार् ली जार्ती है। इसमें समय निर्धार्रित नहीं होतार्। 
    4. गति परीक्षण – इनमें शक्ति परीक्षण के विपरीत प्रश्न जटिलतार् में समार्न हार्ते े हैं और समय निर्धार्रित होतार् है।
    5. शार्ब्दिक परीक्षण – इनको हल करने हेतु शब्दों क प्रयार्गे कियार् जार्तार् है। 
    6. क्रियार्त्मक परीक्षण – इस प्रकार की परीक्षार्ओं में समस्यार् क समार्धार्न शब्दों द्वार्रार् प्रकट नहीं करनार् पड़तार् है बल्कि उसे कुछ कार्य द्वार्रार् हल करनार् पड़तार् है जैसे-चित्र विधार्न चित्रपूर्ति, त्रुटि निकालनार्, वर्ग निर्मार्ण इत्यार्दि।

    रूचि परीक्षण –

    रूचि को हम शार्ब्दिक रूप में सम्बन्ध की भार्वनार् कह सकते हैं। बिंघम ने रूचि को परिभार्शित करते हुए लिखार् कि-’’रूचि किसी अनुभव में लिप्त हो जार्ने व चार्लू रखने की प्रवृत्ति है।’’ रूचि वार्स्तव में कोर्इ पृथक इकार्इ न होकर मार्नव व्यवहार्र क एक अहम पहलू है। रूमेल रेमर्ज व गेज ने लिखार् कि-रूचियॉँ सुखद व दुखद भार्वनार्ओं तथार् पसन्द न पसन्द व्यवहार्र के आकर्शण व विकर्शण की प्रतिच्छार्यार् के रूप में दर्षित होती है।’’

    वार्स्तव में यह मार्नार् गयार् कि रूचियों क जन्म मनोशार्रीरिक कारणों से होतार् है और उसके विकास पर वार्तार्वरण एवं वंशार्नुक्रम दोनों क प्रभार्व पड़तार् है। सुपर ने स्पष्ट कियार् कि रूचियॉँ जन्मजार्त न होकर मुख्य रूप में अर्जित होती है। रूचियॉँ मुख्यत: निम्न प्रकार की होती है।

    1. प्रदर्र्शन रूचि – वे रूचियॉँ जिन्हें व्यक्ति अपने शब्दों से व्यक्त न करके व्यवहार्र से व्यक्त करतार् है
    2. अभिव्यक्ति रूचि –जिन रूचियों को व्यक्ति शब्दों के मार्ध्यम से व्यक्त करतार् है।
    3. प्रपत्रित रूचि-जिन रूचियों क ज्ञार्न प्रमार्पीकृत रूचि प्रपत्रों तथार् परीक्षणों के मार्यम से होतार् है उन्हें प्रपत्रित रूचि कहते हैं।
    4. परीक्षित रूचि-जिन रूचियों क नार्म विभिन्न निश्पति परीक्षणों से हो व व्यक्ति क किसी विषय में ज्ञार्न व ज्ञार्न की उपलब्धि समार्न हों वे परीक्षित रूचि होती है।

    रूचि मार्पन – उपयुक्त व्यवसार्य निर्धार्रित करने तथार् उपयुक्त निर्देशन दने े के लिये रूचि मार्पन आवश्यक है। रूचि परीक्षण क सर्वप्रथम निर्मार्ण 1919 में ‘‘कार्नीगे इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’’ में प्रार्रम्भ हुआ। इसके पष्चार्त् मूर ने 1921 में इन्जीनियर्स की रूचियों क पतार् लगार्ने हेतु रूचि तार्लिक बनार्यी। 1924-25 में क्रेग ने विभिन्न प्रकार की रूचियों के मार्पन हेतु रूचि तार्लिक बनार्यी। कुछ प्रमुख रूचि परीक्षण हैं-

    1. स्ट्रार्ंग की व्यार्वसार्यिक रूचि परीक्षण-स्टने फोर्ड विष्वविद्यार्लय के र्इ0 क0े स्ट्रार्ंग ने व्यार्वसार्यिक रूचि परिसूची क निर्मार्ण व प्रमार्पीकरण कियार्। इसमें अनेक प्रकार के 420 पद हैं। ये पद विभिन्न व्यवसार्यों, मनोरंजन क्रियार्ओं, विद्यार्लय विषय एवं व्यक्तिगत विषेशतार्ओं से सम्बन्धित हैं। इस परिसूची के पॉँच प्रतिरूप हैं – प्रथम पुरूशों को, द्वितीय स्त्रियों को, तृतीय पुरूशों को, चतुर्थ स्त्रियों के लिये (जो अध्ययनरत हों) अन्तिम व पंचम पुरूशों के लिये है। 
    2. हेपनर की व्यार्वसार्यिक रूचि पर लब्धि-हेपनर ने व्यार्वसार्यिक रूचि लब्धि के हेतु एक महार्न कार्य कियार्। हेपनर ने चार्र प्रमुख कार्यक्षेत्रों की चेकलिस्ट बनार्यी। इसमें प्रोफेषन (24), वार्णिज्य आकुपेषन (24), दक्ष व्यार्पार्र (20) तथार् स्त्रियों से सम्बन्धित व्यवसार्य 24 सम्मिलित हैं।
    3. क्लीटन की व्यार्वसार्यिक रूचि तार्लिका-क्लीटन ने स्त्री व पुरूशार् े के लिये अलग-अलग रूचि तार्लिक बनार्यी है पुरूशों के प्रतिरूप में 630 पद हैं जिनकी जॉँच की जार्ती है। स्त्रियों के लिये भी 630 पद हैं। 
    4. कूडर अधिमार्न लेखार्-कूडर द्वार्रार् निर्मित इस लेखार् के कर्इ प्रतिरूप हैं जिसमें 168 पद हैं। प्रत्येक पद में तीन क्रियार्यें करनी पड़ती हैं। इन क्रियार्ओं को फिर मार्न के अनुरूप चयनित कियार् जार्तार् है। इस पूरे लेखे में कुल मिलार्कर 10 रूचि मार्पदण्ड हैं। अन्य रूचि तार्लिकायें हैं।
    1. मार्नसून अक्यूपेशनल इन्टरेस्ट ब्लेंक 
    2. ओब्रेलन वोकेशनल इन्टरेस्ट इन्क्वार्यरी 
    3. ली – थोरोप इन्वेन्टरी 
    4. थस्र्टन इन्टरेस्ट सीड्यूल

    निष्पति एवं व्यक्तित्व परीक्षण

    निष्पति विद्यार्लय में विषय सम्बन्धी अर्जित ज्ञार्न की परीक्षार् है। वार्स्तव में निष्पति यार् दक्षतार् परीक्षार् किसी व्यक्ति द्वार्रार् सीखे गये कार्य यार् दक्षतार् के स्तर को जार्नने हेतु संचार्लित की जार्ती है। निष्पति परीक्षण को सार्फल्य परीक्षण भी कहते हैं।

    निष्पति परीक्षार् के प्रकार-

    1.  वे परीक्षार्यें जो किसी व्यवसार्यगत दक्षतार् को मार्पने हेतु बनार्यी जार्ती हैं व्यवसार्य परीक्षार् कहलार्ती है। 
    2.  वे परीक्षार्यें जो विद्यार्लय के पार्ठ्यक्रम में किसी एक विषय के अर्जित ज्ञार्न को नार्पने हेतु बनार्यी जार्ती है। विद्यार्लय निश्पति परीक्षण कहलार्ते हैं।

      व्यक्तित्व परीक्षण

      व्यक्तित्व वार्स्तव में वह समग्रतार् है जिसमें व्यक्ति के सम्पूर्ण वार्ह्य एवं आन्तरिक गुण व अवगुणों क समार्वेशित दिग्दर्षन होतार् है। व्यक्तित्व में वे सभी मार्नसिक प्रक्रियार्यें सम्मिलित हैं जो क्रियार्षील व्यक्ति के व्यक्तित्व पर प्रभार्व डार्लती है। निर्देशन एवं परार्मर्ष में व्यक्तित्व के अध्ययन में बड़ार् महत्व है। व्यक्तित्व शब्द की उत्पित्त्ार् लेटिन शब्द ‘‘परसोनार्’’ से हुयी है। इसक अभिप्रार्य मुखौटार् होतार् थार्। व्यार्वहार्रिकवार्दी केम्प के अनुसार्र-’’व्यार्क्तित्व आदतों की उन अवस्थार्ओ क समन्वय है जो वार्तार्वरण के सार्थ व्यक्ति के विशिष्ट समार्योजन क प्रतिनिधित्व करती है।’’ वार्रेन और कारमीकल के अनुसार्र-’’मनुश्य की विकासार्वस्थार् के किसी भी स्तर पर मनुश्य की समस्त अवस्थार् ही व्यक्तित्व है।’’ इसी प्रकार से मोर्टन प्रिन्स ने व्यक्तित्व सम्बन्धी अपनी विचार्रधार्रार् प्रकट करतें हुये कहार् कि-’’व्यक्तित्व सभी जैविक जन्मजार्त प्रवृित्त्ार्यों, इच्छार्ओं, भूख एवं मूल प्रवृित्त्ार्यों क योग है तथार् इसमें अनुभव से प्रार्प्त अर्जित प्रवृित्त्ार्यॉँ भी निहित हैं।’’ वुडवर्थ ने इसे वह व्यवहार्र कहार् जो किसी को प्रिय लगतार् है किसी को अप्रिय। परन्तु व्यक्तित्व की सभी परिभार्शार्ओं में आलपोर्ट की परिभार्शार् सर्वश्रेश्ठ मार्नी जार्ती है जिसमें वे कहते हैं-’’व्यक्तित्व मनोदैहिक व्यवस्थार्ओं क वह गत्यार्त्मक संगठन है जो वार्तार्वरण के सार्थ उसके अपूर्व अभियोजन क निर्धार्रण करतार् है।’’ व्यक्तित्व क विकास में वंशार्नुक्रम एवं वार्तार्वरण दोनों ही निर्धार्रक कहलार्ते हैं।

      व्यक्तित्व मार्पन- 

      व्यक्तित्व मार्पन क इतिहार्स पुरार्नार् है जिसमें चहे रार् देखकर  व्यक्तित्व की पहचार्न की जार्ती थी कुछ समय बार्द लिखार्वट देखकर व्यक्तित्व के पहचार्न करने की विधि क भी निर्मार्ण हुआ जो ग्रार्फोलोजी कहलार्ती है। व्यक्तित्व क मार्पन की विधियों की सूची नीचे दी जार् रही है।

      व्यक्तित्व मार्पन
      1. रोशाक परीक्षण-इस परीक्षण क निर्मार्ण स्विटजरलैण्ड निवार्सी हरमन रोर्षार्क ने कियार्। इसमें 10 कार्ड है जो विभिन्न आकार व रंग के स्यार्ही के धब्बों से परिपूर्ण हैं। 10 कार्ड में से 5 कार्ड काले, 2 पर काले व लार्ल तथार् 3 पर रंग-बिरंगे धब्बे हैं। यह 1921 में प्रकाशित हुआ। इसक प्रयोग व्यक्तिगत होतार् है और इसके द्वार्रार् व्यक्ति के गुणों व सार्मार्न्य प्रवृत्तियों क पतार् लगार्यार् जार् सकतार् है।
      2. टी0 ए0 टी0 परीक्षण – यह प्रार्संिगक अन्तबोध परीक्षण भी कहलार्तार् है। इसक निर्मार्ण मुरे ने 1938 में कियार्। इसके अन्तर्गत चित्र श्रंखलार् में 20 चित्रों के कार्ड हैं जिसे प्रस्तुत करने पर परीक्षार्थ्री के विभिन्न मार्नसिक अवस्थार्ओं, भार्वों, प्रवृत्तियों एवं अनुभूतियों को मार्लूम हो जार्तार् है। परीक्षार्थ्री द्वार्रार् चित्र वर्णन क विष्लेशण कियार् जार्तार् है और उसके व्यवहार्र, अभिवृत्ति कल्पनार् शक्ति, विचार्रों व गुणों क पतार् लगार्यार् जार्तार् है।
      3. शब्द सार्हचर्य विधि-इस विधि क प्रयोग गार्ल्टन ने अपनी मनोविज्ञार्न प्रयोगशार्लार् में 1879 में कियार्। गार्ल्टन के सार्थ बुण्ट ने दियार्। इसमें 75 शब्दों की एक सूची बनार्यी गयी है। सार्हचर्य शब्दों के स्मरण से कुछ मार्नसिक चित्र व प्रतिमार्यें मस्तिश्क में अंकित हो जार्ती है। इसे सार्हचर्य काल कहार् गयार् इसके मार्प हेतु क्रोनोमीटर क प्रयोग कियार् गयार् फिर उसक विष्लेशण कियार् और निश्कर्श प्रतिपार्दित किये गये। गार्ल्टन के पष्चार्त युग ने 100 शब्दों की एक सूची तैयार्र की। युग ने इस परीक्षण से संवेगार्त्मक ग्रन्थियों को पतार् लगार्ने क प्रयार्स कियार्।
      4. वार्क्यपूर्ति परीक्षण-इस परीक्षण विधि क सर्वप्रथम प्रयार्गे पार्इन तथार् टेण्डलर ने 1930 में कियार्। इसमें 20 वार्क्य थे। इसके उपरार्न्त हीलर, कैमरोन, लाज, थानडार्इक व एसेनफोर्ड ने इस विधि में संषोधन कियार्। इस विधि में विष्वसनीयतार् 0.83 पार्यी गयी है।
      5. खेल तथार् डार््रार्मार् विधि-यह व्यक्तित्व मार्पन की सर्वोत्तम विधि है क्योंकि परीक्षार्थ्री इसमें अपनी भार्वनार्ओं क स्वतंत्र प्रदर्षन करतार् है। इस विधि के निर्मार्तार् प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक जे0 एल0 मोरेनो थे। इसमें रोगग्रस्त व्यक्ति को प्रमुख भूमिक दी जार्ती है।

      अभियोग्यतार् परीक्षण-

      आप पूर्व में व्यक्तित्व मार्पन के विषय में पढ़ चुके हैं निर्देशन के क्षेत्र में अभियोग्यतार् क ज्ञार्न परार्मर्षदार्तार् को परार्मर्ष देने में सहार्यक होतार् है। वार्रेन ने अभियोग्यतार् को पार्रिभार्शित करते हुए लिखार् है कि अभियोग्यतार् वह दशार् यार् गुणों क रूप है जो व्यक्ति की उस योग्यतार् की ओर संकेत करती है जो प्रशिक्षण के बार्द ज्ञार्न, दक्षतार् यार् प्रतिक्रियार्ओं को सीखतार् है। टै्रक्सलर ने लिखार् – अभियोग्यतार् व्यक्ति की दशार्, गुण यार् गुणों क संग्रह है जो सम्भार्वित विस्तार्र की ओर संकेत करती है जो कि व्यक्ति कुछ ज्ञार्न, दक्षतार् यार् ज्ञार्न और दक्षतार् क मिश्रण प्रशिक्षण द्वार्रार् प्रार्प्त करेगार्। वार्स्तव में अभियोग्यतार् वर्तमार्न दशार् है जो व्यक्ति की भविश्य क्षमतार्ओं की ओर संकेत करती है। सुपर ने विशिष्टतार्, एकात्मक रचनार्, सीखने में सुविधार् स्थिरतार् अभियोग्यतार् की चार्र विषेशतार्यें बतार्यी हैं।

      1. अभियोयतार् परीक्षार्यें- विद्वार्नों ने निम्न प्रकार की अभियोग्यतार् परार्ीक्षार्ओं क निर्मार्ण कियार् है जो कि अधिकांषत: विभिन्न व्यवसार्यों से सम्बन्धित है इनमें से कुछ के विषय में हम जार्नेंगें।
        1. कलर्कियल एपटीट्य्यूूट टेस्ट कल्कि व्यवसार्य हेतु अभियोग्यतार् परीक्षार्- लिपिक अभियोग्यतार् परीक्षार् में कार्यार्लयों के विविध कार्यों को सुचार्रू रूप से करने हेतु विभिन्न गुणों को मार्पार् जार्तार् है। इसमें मुख्यत: गति एवं शुद्धतार् को मार्पार् जार्तार् है।
        2. मिनिसोटार् वोकेशनल टेस्ट फॉर क्लर्कियल वक्र्स – इस परीक्षण को व्यक्तिगत व सार्मूहिक दोनों परीक्षणों के लिये उपयोग कियार् जार्तार् है। इसके प्रयोग से टार्इपिंग, पत्रों को छॉँटनार् फार्इलों क कार्य तथार् बुक कीपिंग आदि अभियोग्यतार् क मार्पन होतार् है।
        3. नेशनल इन्सटीट्य्यूट ऑफ इन्डस्ट्रियल सार्इकोलेलॉजी क्लर्किर्ययल टेस्ट  –यह ब्रिटिष नेषनल इन्सटीट्यूट ऑफ इन्डस्ट्रियल सार्इकोलॉजी द्वार्रार् निर्मित है इसे सार्त भार्गों में बॉँटार् गयार् है।
      2. यार्न्त्रिक अभियोग्यतार् – विभिन्न यार्न्त्रिक अवयवो क मिश्रण ही यार्न्त्रिक अभियोग्यतार् है। इसमें स्थार्न, हस्त निपुणतार्, शक्ति, गति, धैर्य आदि यार्न्त्रिक योग्यतार्यें आती हैं। जैसे कि –
        1. मिनिसोटार् मेकेनिकल एपटीट्य्यूड टेस्ट – इस परीक्षार् क निर्मार्ण सर्वप्रथम जूनियर हाइस्कूल के छार्त्रों के लिये हुआ इसमें 33 यार्न्त्रिक वस्तुयें तीन सन्दूकों में रखी रहती है।
        2. स्टेनक्विस्ट टेस्ट फॉर मेकेनिकल एपटीट्य्यूड – इस परीक्षण क निर्मार्ण स्टैनक्विस्ट नार्मक व्यक्ति ने कियार्। इस परीक्षार् में भी निश्चित समय मे निश्चित यार्न्त्रिक विधियों द्वार्रार् कुछ हिस्सों को जोड़ने के लिये कहार् जार्तार् है। 
        3. -ओरूरकी मेकेनिकल एपटीट्य्यूड टेस्ट-यह परीक्षार् इस सिद्धार्न्त पर आधार्रित है कि जो व्यक्ति यार्न्त्रिक अभियोग्यतार् रखते हैं वे उन व्यक्तियों की अपेक्षार् मषीन सम्बन्धी ज्ञार्न शीघ्र सीख लेते हैं।
      3. संगीत अभियोग्यतार्-संगीत अभियोग्यतार् क ज्ञार्न यार्न्त्रिक रूप, चित्रार्कंन क रूप, व व्यार्ख्यार्त्मक रूप से प्रकट होने पर होतार् है।
        1. सीशोर म्यूजिकल टेस्ट – इस परीक्षण क निर्मार्ण सीशार्रे द्वार्रार् कियार् गयार्। इस परीक्षण के अन्तर्गत संगीत अनुभूति संगीतार्त्म क्रियार्यें, संगीतार्त्मक बुद्धि तथार् संगीतार्त्मक भार्वनार्ओं को जार्नने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।
      4. कलार् अभियोग्यतार् – इसके परीक्षण हेतु दो विधियॉँ अपनार्यी जार्ती है एक तो मौलिक चित्र बनार्नार् दूसरार् पूर्व निर्मित चित्रों के गुण व दोशों क विवेचन करवार्यार् जार्तार् है। कुछ प्रसिद्ध कलार् अभियोग्यतार् परीक्षण हैं – हान की कलार् अभिरूचि सूची, नौबर की कलार् अभियोग्यतार् परीक्षण, मैकऐडोरी क कलार् परीक्षण।

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