निर्देशन क अर्थ, परिभार्षार् एवं उद्देश्य

मार्नव अपने जीवन काल में व्यक्तिगत व सार्मार्जिक दोनों ही पक्षों में अधिकतम विकास लार्ने के लिए सदैव सचेष्ट रहतार् है इसके लिये वह अपने आस पार्स के पर्यार्वरण को समझतार् है और अपनी सीमार्ओं व सम्भार्वनार्ओं, हितों व अनहितों गुणों व दोषों को तय कर लेतार् है। परन्तु जीवन की इस चेष्टार् में कभी वे क्षण भी आते हैं जहॉ पर वह इन अद्भुत क्षमतार्ओं क प्रदर्शन अपनी योग्यतार् के अनुरूप नहीं कर पार्तार् है और तब वह इसके लिये दूसरे से सहयोग लेतार् है जिससे वह अपनी समस्यार् को समझ सके एवं अपनी क्षमतार् के योग्य समार्धार्न निकाल सके। यह प्रयार्स सम्पूर्ण जीवन चलतार् है और यह जीवन के विविध पक्षों के सार्थ बदलतार् जार्तार् है यही निर्देशन कहलार्तार् है। यह आदिकाल से ही ‘सलार्ह’ के रूप में विद्यमार्न थी परन्तु बीसवीं सदी में इसक वर्तमार्न स्वरूप उभरार्। निर्देशन क अर्थ स्पष्ट करने के लिये इसक समझनार् आवश्यक है। अनेक विद्वार्नों ने इसे एक विशिष्ट सेवार् मार्नार् है और यह व्यक्ति को उसके जीवन के विविध पक्षों में सहयोग देने हेतु प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। यह वार्स्तव में निर्देशन कार्मिक द्वार्रार् किसी व्यक्ति को उसकी समस्यार् को दृष्टिगत रखते हुये अनेक विकल्प बिन्दुओं से अवगत करार्ते हुये अपेक्षित रार्य व सहार्यतार् देने की प्रक्रियार् है।

वार्स्तव में शिक्षार् एवं निर्देशन एक दूसरे के पर्यार्य हैं क्योंकि इन दोनों के अन्तर्गत व्यक्ति यार् बार्लक को उसके शैक्षिक,व्यार्वसार्यिक, व्यक्तिगत, सार्मार्जिक, नैतिक, आध्यार्त्मिक यार् शार्रीरिक जीवन पक्षों के विकास हेतु सहार्यतार् दी जार्ती है। निर्देशन वार्स्तव में एक अविरल प्रक्रियार् है जो कि व्यक्ति हेतु जीवन पर्यन्त चार्हिये। इस क्षेत्र में हर प्रशिक्षित व सार्धक व्यक्ति निर्देशन कार्मिक कहलार्तार् है। इस प्रक्रियार् में विद्यार्लय, परिवार्र, समार्ज व रार्जनीतिक परिवेश सम्मिलित होते हैं। विद्यार्लय से सम्बन्धित शिक्षक, उपबोधक तथार् अन्य सहकर्मी, परिवार्र के अन्य सभी सदस्य, अभिभार्वक,मित्र रार्जनीतिज्ञ इस व्यार्पक प्रक्रियार् को मूर्त स्वरूप प्रदार्न करते हैं। निर्देशन क अटूट क्रम है और यह व्यक्ति को उसके जीवन के विविध पक्षों में आवश्यक हो जार्ती है। वार्स्तव में यह समय व परिस्थिति के सार्थ केन्द्रि परार्मर्शदार्तार् व सेवाथी केन्द्रित हो जार्ती है जब यह परार्मर्शदार्तार् को केन्द्र मार्नकर दी जार्ती है तो परार्मर्शदार्तार् केन्द्रित और परार्मर्श प्राथी को केन्द्र बिन्दु मार्नकर दी जार्ती है तो यह परार्मर्श प्राथी केन्द्रित हो जार्ती है। हमार्रे देश में निर्देशनकर्मी अपनी औपचार्रिक भूमिक क निर्वार्ह अनेकानेक ‘मनोनितिक’ उपकरणों के अनुप्रयोग के अलार्वार् व्यक्तिनिष्ठ यार् आत्मनिष्ठ प्रार्विधियों के मार्ध्यम से करते चले आ रहे हैं ।

इस दृष्टि से व्यक्ति के बार्रे में विश्वसनीय एवं वैध आंकड़े तथार् आधार्र सार्मग्री, प्रार्प्त करने के लिये मनोनितिक उपकरण यथार् योग्यतार् व अभिक्षमतार् परीक्षण व्यक्तित्व मार्पन, निर्धार्रण मार्पनी तथार् अभिवृत्ति एवं रूचि तार्लिक परीक्षणों क प्रयोग कियार् जार्तार् है जिससे कि उसे आवश्यक एवं उपयोगी सलार्ह दी जार् सके और उसे अपनी समस्यार्ओं के प्रति उचित समझ विकसित हो यही निर्देशन कहलार्तार् है।

निर्देशन की परिभार्षार्

निर्देशन एक प्रक्रियार् है जिसके अनुसार्र एक व्यक्ति को सहार्यतार् प्रदार्न की जार्ती है जिससे कि वह अपने समस्यार् को समझते हुए आवश्यक निर्णय ले सके और निष्कर्ष निकालते हुये अपने उद्देश्यों को प्रार्प्त कर सके। यह प्रक्रियार् व्यक्ति को उसे व्यक्तित्व ,क्षमतार्, योग्यतार् तथार् मार्नसिक स्तर क ज्ञार्न प्रार्प्त करार्ती है यह व्यक्ति को उसकी समस्यार् को समझने योग्य बनार् देती है। यह मुख्यतयार् व्यक्ति को उन उपार्यों क ज्ञार्न करार्ती है यह व्यक्ति को उसकी समस्यार् को समझने योग्य बनार् देती है। यह मुख्यतयार् व्यक्ति को उन उपार्यों क ज्ञार्न करार्ती है जिनके मार्ध्यम से उसे अपनी प्रार्कृतिक शक्तियों क बोध होतार् है और ऐसार् होने पर उसक जीवन व्यक्तिगत व सार्मार्जिक स्तर पर अधिकतम हितकर होतार् है।

  1. यूनार्इटेड ऑफिस एजुकेशन ने लिखार् है –‘‘निर्देशन एक ऐसी प्रक्रियार् है जो व्यक्ति क परिचय विभिन्न उपार्योंं से, जिनमें विशेष प्रशिक्षण भी सम्मिलित है जिनके मार्ध्यम से व्यक्ति को प्रार्कृतिक शक्तियों क भी बोध हो, करार्ती है जिससे वह अधिकतम, व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक हित कर सकें।’’
  2. शले हैमरिन के अनुसार्र –‘‘व्यक्ति को अपने आपको पहचार्नने में मदद करनार् जिससे वह अपने जीवन में आगे बढ़ सके, निर्देशन कहलार्तार् है’’। वस्तुत: इसमें निर्देशन द्वार्रार् स्वयं आत्मार् की अनुभूति करार्नार् मनोवैज्ञार्निक एवं आध्यार्त्मिक दोनों ही दृष्टियों से जटिल एवं दुसार्ध्य होने की प्रवृत्ति दिखाइ देती है।’’
  3. चार्इशोम इस व्यार्ख्यार् को इस प्रकार लिखते है कि –रचनार्त्मक उपक्रम तथार् जीवन से सम्बन्धित समस्यार्ओं के समार्धार्न की व्यक्ति में सूझ विकसित करनार् निर्देशन क उद्देश्य है तार्कि वह अपनी जीवन भर की समस्यार्ओं क समार्धार्न करने के योग्य बन सके।
  4. जोन्स ने उपरोक्त परिभार्षार् क सार्रार्ंश देते हुये कहार् – निर्देशन से तार्त्पर्य ‘‘इंगित करनार्, सूचित करनार् तथार् पथ प्रदर्शन करनार् है। इसक अर्थ सहार्यतार् देने से अधिक है।’’ इस परिभार्षार् में निर्देशन व्यक्ति को व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक दृष्टि से उपयोगी क्षमतार्ओं के अधिकतम विकास के लिये प्रदत्त सहार्यतार् से सम्बन्धित निरन्तर चलने वार्ली प्रक्रियार् के रूप में इंगित कियार् गयार् है –
  5. एमरी स्टूप्स ने अपनी परिभार्षार् को अलग ढंग से व्यक्त करते हुये लिखार् है – ‘‘व्यक्ति को स्वयं तथार् समार्ज के उपयोग के लिये स्वयं की क्षमतार्ओं के अधिकतम विकास के प्रयोजन ने निरन्तर दी जार्ने वार्ली सहार्यतार् ही निर्देशन है।’’ गार्इडेन्स कमेटी ऑफ सार्ल्ट लेक सिटी स्कूल्स ने निर्देशन की यथाथवार्दी परिभार्षार् देते हुये बतार्यार् कि वार्स्तविक अर्थ में हर प्रकार की शिक्षार् में उसे वैयक्तिक बनार्ने की चेष्टार् यार् चिन्तार् प्रगट होती है। इसक अभिप्रार्य यह है कि प्रत्येक शिक्षक की जिम्मेदार्री है कि वह अपने बार्लक की रूचियों, योग्यतार्ओं तथार् भार्वनार्ओं को समझे तथार् उसकी आवश्यकतार्ओं की सन्तुष्टि हेतु शैक्षिक कार्यक्रमों में तदनुरूप आवश्यक परिवर्तन लार्ये ।
  6. आर.एल. गिलक्रिस्ट व डब्लू. रिन्कल्स के अनुसार्र –‘‘निर्देशन क अभिप्रार्य है विद्याथी को उपयुक्त तथार् प्रार्प्त होने योग्य उद्देश्यों के निर्धार्रण कर सकने तथार् उन्हें सिद्ध करने हेतु अपेक्षित योग्यतार् क विकास करने में मदद देनार् एवं अभिप्रेरित करनार् ।  इसमें मुख्य तथ्य थे – उद्देश्यों क निरूपण संगत अनुभवों क प्रार्वधार्न करनार्, योग्यतार्ओं क विकास करनार् व उद्देश्यों की सम्प्रार्प्ति सुनिश्चित करनार्।’’
  7. ट्रैक्सलर के मतार्नुसार्र –’’निर्देशन वह गतिविधि है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यतार्ओं तथार् रूचियों को समझने, उन्हें यथार् सम्भव विकसित करने, उन्हें जीवन तथ्यों से जोड़ने तथार् अन्तत: अपनी सार्मार्जिक व्यवस्थार् के वार्ंछनीय सदस्य की हैसियत से एक पूर्ण एवं परिपक्व आत्मनिर्देशन की व्यवस्थार् तक पहुॅंचने में सहार्यक होती है।’’
  8. लफेवर ने निर्देशन को परिभार्षित करते हुये लिखार् है कि शिक्षार् प्रक्रियार् की उस व्यवस्थित एवं गठित अवस्थार् को निर्देशन कहार् जार्तार् है जो युवार् वर्ग क अपनी जिन्दगी में ठोस दिशार् प्रदार्न करने की दृष्टि से उसकी क्षमतार् को बढ़ार्ने में मदद देतार् है तथार् वह व्यक्तिगत अनुभव रार्शि में समृद्धि सुनिश्चित करने के सार्थ-सार्थ प्रजार्तार्न्त्रिक समार्ज में अपनार् अनुपम अवदार्न करतार् है।
  9. क्रो0 एवं क्रो0 ने निर्देशन की परिभार्षार् देते हुये कहार् है‘‘निर्देशन लक्ष्य करनार् नहीं है। यह अपने विचार्र को दूसरों पर लार्दनार् नहीं है। यह उन निर्णयों क जिन्हें एक व्यक्ति को अपने लिये स्वयं लेनार् चार्हिए। निश्चित करनार् नहीं है, यह दूसरों के दार्यित्व को अपने ऊपर लेनार् है, वरन् निर्देशन वह सहार्यतार् है जो एक कुशल परार्मर्शदार्तार् द्वार्रार् किसी भी आयु के व्यक्ति को अपनार् जीवन निर्देशन करने, अपनार् दृष्टिकोण विकसित करने, स्वयं निर्णय लेने तथार् उत्तरदार्यित्व संभार्लने के लिये दी जार्ती है।’’

सभी परिभार्षार्यें शिक्षार् के सम्पूर्ण कार्यों के अधिक समीप है। जिस प्रकार से शिक्षार् क प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति क अधिकतम विकास करनार् है उसी प्रकार निर्देशन अपनी वितरण एंव समार्योजन सेवार् द्वार्रार् इस विकास में सुविधार् प्रदार्न करतार् है।

निर्देशन की प्रकृति

  1. यह एक प्रक्रियार् है जो कि सतत् चलती है।
  2. यह मूर्तस्वरूप में है और एक विशेष प्रकार की सेवार् के रूप में परिलक्षित होती है। 
  3. निर्देशन क कार्य अपने स्वभार्व से एक मार्ली के कार्य जैसार् है जो कि अपने पौधों के विकास की प्रक्रियार् से जुड़ार् रहतार् है। 
  4. निर्देशन मूलरूप से आदिकाल से मार्नव जीवन के सार्थ विद्यमार्न रहार्। इसक वर्तमार्न स्वरूप बीसवीं सदी के परिणार्म है।
  5. निर्देशन मार्नव विकास के सार्थ जुड़ार् रहतार् है। दाशनिक परिप्रेक्ष्य में यह व्यक्ति के पूर्णतम विकास क पोषक, उसकी स्वार्भार्विक शक्तियों क संरक्षक तथार् जीवन पर्यन्त गतिशील प्रक्रियार् क द्योतक मार्नार् जार्तार् है। 
  6. मनोवैज्ञार्निक पृष्ठभूमि में यह अन्तक्रियार्त्मक व्यार्पार्र है जिसके जरिये एक विशेषज्ञ व्यक्ति समस्यार् ग्रस्त व्यक्ति को उसकी शैक्षिक, सार्मार्जिक, व्यार्वसार्यिक एवं व्यक्तिक परिस्थितियों से समंजन की प्रक्रियार् को सरल एवं सहज बनार्ने में मदद देतार् है। 
  7. समार्जशार्स्त्रीय पृष्ठभूमि में यह एक समार्ज एवं व्यक्ति के हित हेतु कियार् जार्ने वार्लार् कार्य है। यह समार्ज कल्यार्ण के अवसरों में विस्तार्र करतार् है।
  8. यह व्यक्ति की अभिवृत्तियों रूचियों एवं आकर्षणों पर विशेष ध्यार्न अपेक्षित है।
  9. निर्देशन सेवार्ओं क उद्देश्य व्यक्ति क परिस्थिति विशेष से समार्योजन कायम करनार् है।
  10.  निर्देशन क स्वरूप वस्तुनिष्ठ एवं आत्मनिष्ठ दोनों होतार् है क्योंकि इसमें व्यक्ति सम्बन्धी जार्नकारी एकत्र करने हेतु परीक्षार् तथार् परार्मर्श बार्तचीत व पूछतार्छ क उपयोग कियार् जार्तार् है। 
  11.  इसमें व्यक्ति व समार्ज दोनों के कल्यार्ण की भार्वनार् सुनिश्चित की जार्ती है। 
  12. निर्देशन प्रक्रियार् क स्वरूप एक जैसार् न होकर बहुपक्षीय होतार् है। इसमें उपयुक्त सूचनार्ओं क संकलन निदार्नार्त्मक मूल्यार्ंकन, सार्क्षार्त्कार, प्रेक्षण, व्यक्ति अध्ययन एवं चिकित्सार्त्मक पद्धतियों आवश्यकतार्नुसार्र एक सार्थ प्रयुक्त हो सकती है। यह किसी विशेष आयु वर्ग तक ही परिसीमित नहीं है।

    निर्देशन क क्षेत्र

    निर्देशन क केन्द्र बिन्दु व्यक्ति होतार् है परन्तु इसक विषय क्षेत्र अत्यन्त व्यार्पक है इसके अध्ययन क्षेत्र के अन्तर्गत सेवाथी समूह समस्यार्यें तथार् अनेकानेक शैक्षिक व्यार्वसार्यिक तथार् वैयक्तिक परिस्थितियार्ँ सम्मिलित हैं। सेवार्थी्र से सम्बन्धित आवश्यक तथ्यों, विवरणों तथार् आख्यार्ओं क अध्ययन समूह की आवश्यकतार्ओं को जार्ननार्, समस्यार्ओं को विविध श्रेणियों में रखकर उनके कारण मूल तत्वों क विश्लेषण उनक सुधार्रार्त्मक पक्ष को विकसित करनार् इसके अन्तर्गत आतार् है। निर्देशन क विषय क्षेत्र सम्पूर्ण मार्नव जीवन है। मार्नव जीवन के विविध पक्ष निर्देशन क कार्य क्षेत्र बन जार्तार् है जिसे हम इस तरह से देख सकते हैं –

    (1) शिक्षार् में निर्देशन- 

    1. शैक्षिक निर्देशन के तहत विविध पार्ठ्यक्रमों के चयन हेतु सहयोग ।
    2. शैक्षिक निष्पत्ति एवं प्रगति हेतु सहयोग।
    3. विद्याथियों में अपेक्षित अभिक्षमतार् स्तर, रूचि तथार् अभिवृत्ति क विकास।
    4. शिक्षण अधिगम की व्यवस्थार् हेतु सहयोग ।
    5. अधिगम सम्बन्धी समस्यार्ओं क निदार्न।
    6. विद्यार्लय में समार्योजन सम्बन्धी समस्यार् क निदार्न।
    7. अन्य सहपार्ठियों के सार्थ सम्बन्धों क ज्ञार्न ।
    8. शैक्षिक एवं पार्ठ्य सहगार्मी क्रियार्ओं के द्वार्रार् व्यक्तिगत विकास हेतु सहयोग।

    (2) व्यक्तिगत निर्देशन –

    1. व्यक्तिगत निर्देशन के अन्तर्गत उसे शार्रीरिक, मार्नसिक, संवेगार्त्मक विकास से जुड़ी समस्यार्ओं हेतु उनक अध्ययन, व्यक्ति की विशेष परिस्थितियों क जार्यजार् लेनार्, वैवार्हिक व यौन सम्बन्धी विशेषतार्ओं क अध्ययन ।

    (3) व्यार्वसार्यिक निर्देशन –

    1. व्यक्ति में व्यार्वसार्यिक क्षमतार्ओं के विकास की अवस्थार्ओं क अध्ययन।
    2. विविध व्यवसार्यों से सम्बन्धित पूर्ण एवं विश्वसनीय आंकड़ों क एकत्रीकरण।
    3. तथ्यों एवं जार्नकारी को प्रदार्न करने हेतु उचित मार्ध्यमों क अध्ययन।
    4. व्यार्वसार्यिक अभिक्षमतार् विश्लेषणं।
    5. व्यवसार्य के प्रति रूचियों,दृष्टिकोणों, बुद्धिस्तर, शार्रीरिक स्वार्स्थ्य एवं पार्त्रतार् क विश्लेषण।

    (4) निर्देशन के लिये उपलब्ध विविध सेवार्एँ 

    1. उपबोधन,स्थार्नन, अनुवर्तन, अनुसंधार्न, मार्पन एवं मूल्यार्ंकन ।

    (5) अन्य क्षेत्र 

    1. दर्शन, मनोविज्ञार्न, समार्जशार्स्त्र, मनोमिति चिकित्सार् मनोविज्ञार्न, सार्ंख्यिकी, शिक्षार्शार्स्त्र, अर्थशार्स्त्र तथार् विज्ञार्न आदि की विधियों क भी समार्वेश।

    विद्यार्लयी निर्देशन प्रक्रियार् के प्रमुख अंग –

    1. मूल्यार्कंन – जिस व्यक्ति को निर्देशन देनार् है उसके गुणों क वस्तुनिष्ठ व विश्वसनीय ज्ञार्न प्रार्प्त करने हेतु निरन्तर मूल्यार्ंकन की क्रियार् की जार्ती है। 
    2. समार्योजन – तार्त्कालिक शैक्षिक, व्यक्तिगत, सार्मार्जिक एवं व्यार्वसार्यिक समस्यार्त्मक परिस्थिति के सार्थ समार्योजन हेतु विद्याथियों को तत्काल सहयोग देनार्। – व्यक्तिगत कमियों को जार्ननार् और उनको परिस्थितिजन्य उपचार्र करनार्। – विद्यार्लय के शैक्षिक एवं शिक्षणेत्तर क्रियार्कलार्पों के सार्थ व्यक्ति क समार्योजन/ सम्बन्ध स्थार्पित करनार्। जीवन की वार्स्तविक परिस्थितियों एवं सत्य को जार्नने योग्य व्यक्ति की सहार्यतार् करनार्।
    3. नवीन परिस्थितियों को उत्पन्न करनार् – बार्लकों हेतु विद्यार्लय एवं व्यवसार्य को उचित दशार्ओं क ज्ञार्न देकर समार्योजन योग्य परिस्थितियॉं प्रदार्न करनार्। 
    4. विकास हेतु परिवेश प्रदार्न करनार् – व्यक्ति की योग्यतार्ओ को समझते हुये उन्हें सही दिशार् में विकसित करनार् तार्कि वह स्वयं तथार् अपने परिवेश को समझते हुये उसके अनुकूल विकास हेतु परिवेश प्रदार्न करनार्।

    निर्देशन के उद्देश्य

    निर्देशन व्यार्पक एवं संकुचित दोनों ही अर्थों में एक प्रकार की सेवार् है जिसक उद्देश्य व्यक्ति एवं उसके सार्मार्जिक सन्दर्भों की गुणवत्तार्,समरसतार्, उत्कृष्ठतार् एवं परस्पर तार्लमेल को सॅवार्रनार्, सुधार्रनार् तथार् संजोनार् है। वार्स्तव में शिक्षार् तथार् निर्देशन के उद्देश्य एक ही जैसे हैं क्योंकि दोनों ही व्यक्ति के विकास से सम्बन्धित हैं। निर्देशन की क्रियार् परिस्थितिजन्य, व्यवस्थित, औपचार्रिक व आनुषार्ंगिक हो सकती है और इसके निम्न उद्देश्य होते हैं –

    1. व्यक्तिगत उद्देश्य –

    1. निर्देशन क प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति क विकास है।
    2. व्यक्ति की आत्म विवेचन एवं आत्मविज्ञतार् को बढ़ार्नार्।
    3. अपने व्यक्तित्व के सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक पक्षो, गुणों एवं सीमार्ओं प्रतिमार्ओं तथार् न्यूनतार्ओं को स्वयं समझने की क्षमतार् विकसित करनार्।
    4. व्यक्ति को अपनी आवश्यकतार्ओं, क्षमतार्ओं,रूचियों एवं आकर्षणों के विषय में उचित समझ विकसित करनार्।
    5. व्यक्ति को अपनी क्षमतार्ओं को समझने में सहार्यतार् देनार् और अपनी सार्मथ्र्य क एहसार्स करार्नार्।
    6. व्यक्ति के आत्मविकास एवं वृद्धि के माग को प्रशस्त करनार्।

    2. समार्ज से सम्बन्धित उद्देश्य –

    1. निर्देशन क प्रमुख उद्देश्य मार्त्र व्यक्ति की मदद नहीं समार्ज कल्यार्ण भी है।
    2. निर्देशन द्वार्रार् समार्ज को तनार्वमुक्त पीढ़ी प्रदार्न करनार्।
    3. समार्ज की आवश्यकतार्ओं एवं समस्यार्ओं के प्रति व्यक्ति में उचित समझ पैदार् करनार्।
    4. समार्ज के विविध क्षेत्रों में योग्य व कुशल व्यक्तियों को उपर्युक्त स्थार्न दिलार्नार्।
    5. समार्ज को विकास हेतु उपर्युक्त सहयोग देनार्।

    3. व्यवसार्य सम्बन्धी उद्देश्य –

    1. व्यवसार्यों व व्यक्ति के मध्य संगति बढ़ार्नार्।
    2. व्यवसार्यों के प्रति उचित समझ विकसित करनार्।
    3. व्यक्ति को उचित व्यवसार्य चयनित करने में सहयोग देनार्।
    4. विभिन्न व्यवसार्यों को निरीक्षण करने की सुविधार् प्रदार्न करनार्।
    5. विभिन्न व्यार्वसार्यिक अवसरों की जार्नकारी देनार्।
    6. व्यक्ति में विभिन्न व्यवसार्य सम्बन्धी सूचनार्ओं क विश्लेषण करने की क्षमतार् क विकास करनार्।
    7. कार्य के प्रति एक आदर्श भार्वनार् जार्गृत करनार्।

    4. शिक्षार् सम्बन्धी उद्देश्य –

    आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि शिक्षार् और निर्देशन क कार्य एक ही जैसार् है। शिक्षार् के उद्देश्य विविध शिक्षार् स्तरों पर बदलते जार्ते हैं।

    1. पूर्व प्रार्ार्थमिक स्तर पर –अपनी आदतों क विकास करने में सहार्यतार् देनार्, भार्वनार्त्मक नियंत्रण की आदत विकसित करने, वार्तार्वरण को जार्नने की कुशलतार् विकसित करने, अभिव्यक्ति की क्षमतार् विकसित करनार्।प्र्रार्थमिक स्तर पर – सृजनार्त्मक कार्यों के प्रति रूचि जार्गृत करनार् आत्मार्नुशार्सन विकसित करनार्, भार्वनार्त्मक सन्तुलन विकसित करनार्, सार्मार्जिकतार् की भार्वनार् जार्गृत करनार्।
    2. जूनियर हाइ स्कूूल स्तर पर –विचार्रो अभिरूचियार्ं व भार्वनार्ओं को प्रकट करने के अवसर देनार्, भार्वनार्त्मक नियन्त्रण की क्षमतार्, विकसित करनार्, योग्यतार् एवं रूचि के अनुसार्र व्यवसार्य चयन में सहयोग देनार्।हाइ स्कूल स्तर पर – मार्नसिक स्थिरतार् विकसित करने में सहयार्गे देनार्, अच्छार् नार्गरिक बनने में सहयोग देनार्, स्वतन्त्र कार्य करने व निर्णय करने में सहयोग देनार्, उचित पार्ठ्यक्रम चयन में सहयोग देनार्, व्यवसार्य के प्रति उचित समझ विकसित करने में सहयोग देनार्।
    3. उच्च शिक्षार् स्तर पर –पार्ठ्यक्रम व विषय चयन सम्बन्धी समस्यार्ओं  क निदार्न, व्यवसार्य खोजने में सहयोग, आर्थिक समस्यार्ओं को दूर करने में सहयोग, दैनिक जीवन को तनार्वमुक्त बनार्ने में सहयोग देनार्।

    5. समस्यार् समार्धार्न सम्बन्धी उद्देश्य –

    व्यक्तियों में उनके व्यक्तिगत, सार्मार्जिक, शैक्षिक, व्यवसार्यिक जीवन में समार्योजन की समस्यार् क निदार्न हेतु योग्यतार् विकसित करनार्। व्यक्तियों को पार्रिवार्रिक समस्यार्ओं , स्वार्स्थ्य सम्बन्धी समस्यार्ओं एवं यौन समस्यार्ओं को सुलझार्ने में सहयोग प्रदार्न करनार्ं।

    निर्देशन की आवश्यकतार्

    निर्देशन आज मार्नव जीवन एवं शिक्षार् क अभिन्न अंग बन गयार् है। व्यक्ति को अपने विकास हेतु यथेष्ठ निर्देशन की आवश्यकतार् पड़ती है। इस प्रगतिवार्दी, प्रयोजनवार्दी एवं भौतिकवार्दी जीवन दर्शन के मार्नव जीवन को क्लिष्ट बनार् दियार् है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक स्तर पर निर्देशन की आवश्यकतार् होती है।

    1. सार्मार्जिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकतार्-

    समार्ज की सुरक्षार् और प्रगति के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति ऐसे स्थार्न पर रखार् जार्य जहॉं से वह समार्ज के कल्यार्ण तथार् प्रगति में अधिकतम योगदार्न कर सके अर्थार्त् प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार प्रशिक्षित कियार् जार्य कि वह एक योग्य एवं क्रियार्शील नार्गरिक बन जार्ए। आज क समार्ज अनेक नवीन परिस्थितियों से होकर गुजर रहार् है। संयुक्त परिवार्र प्रणार्ली विघटित होती जार् रही है, विभिन्न देशों की संस्कृति के सार्थ सम्पर्क बढ़ रहार् है। नवीन उद्योगों की स्थार्पनार् हो रही है। इस बदलते हुए सार्मार्जिक परिवेश में व्यक्ति के विकास को सही दिशार् देने में निर्देशन क महत्वपूर्ण स्थार्न है। यहॉं हम सार्मार्जिक दृष्टि से आवश्यक अन्य आधार्रों के सन्दर्भ में निर्देशन की आवश्यकतार् पर विचार्र करेंगे।

    1. परिवार्र क बदलतार् स्वरूप –प्रशिक्षण क दार्यित्व अब परिवार्र पर न रहकर विद्यार्लय पर आ जार्ने से विभिन्न प्रकार के वार्तार्वरण में पले विविध छार्त्रों को प्रशिक्षण देनार् विद्यार्लयों को कठिन हो गयार् क्योंकि विद्यार्लय समस्त छार्त्रों की पार्रिवार्रिक स्थिति, उनकी क्षमतार्ओं, योग्यतार्ओं आदि से अनभिज्ञ थें। अतएव छार्त्रों को उनकी योग्यतार् एवं क्षमतार् के अनुकुल प्रशिक्षण देने के लिए निर्देशन सहार्यतार् की आवश्यकतार् अनुभव की जार्ने लगी।
    2. बदलती व्यवसार्यों की तस्वीर –विभिन्न व्यवसार्यों में कार्य प्रणार्ली विभिन्न प्रकार की होती है। इन प्रणार्लियों को सीखनार् तथार् उनक प्रशिक्षण आवश्यक है। किन्तु प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक प्रणार्ली के अनुसार्र कार्य नहीं कर सकतार् है। अत: उपयुक्त प्रणार्ली क उपयुक्त व्यक्ति के लिए चयन निर्देशन द्वार्रार् ही सम्भव है।
    3. जनसंख्यार् में वृद्धि –भार्रत की जनसंख्यार् तीब्र गति से बढ़ रही है। सन् 1931 से हमार्रे देश की जनसंख्यार् करीब 2755 लार्ख थी। यही जनसंख्यार् 1951 में बढ़कर 3569 लार्ख हुर्इ तथार् अब यह जनसंख्यार् एक अरब हो गर्इ। जनसंख्यार् वृद्धि के सार्थ सार्थ जनसंख्यार् की प्रकृति में भी परिवर्तन हो गयार् है। अब व्यक्ति ग्रार्मों से नगरों की ओर दौड़ रहे हैं। परिणार्मस्वरूप शहरों में आबार्दी बढ़ती जार् रही है। जिससे नगरों क जीवन अत्यन्त भीड़ युक्त जटिल तथार् क्लिष्ट हो गयार् है। अत: जनसंख्यार् वृद्धि ने तथार् उनकी परिवर्तित प्रकृति ने निर्देशन की आवश्यकतार् को और बढ़ार् दियार् है।
    4. सार्मार्जिक मूल्यों क बदलतार् रूप –प्रार्चीन मूल्यों में आध्यार्त्मिक शार्न्ति पर विशेष बल दियार् जार्तार् थार्,किन्तु आज भौतिकतार्वार्द बढ़ रहार् है। भार्रत में जार्ति प्रथार् के प्रति व्यार्प्त संकुचित धार्रणार् में परिवर्तन आतार् जार् रहार् है और अन्तर्जार्तीय विवार्ह में लोगों की रूचि बढ़ती जार् रही है। इन समस्त परिवर्तित परिस्थितियों में मनुष्य अपने को किंकत्र्तव्यविमूढ़ सार् पार्तार् है। तो दूसरी ओर नवीन मूल्य निर्धार्रित नहीं हो पार् रही है। ऐसी विकट परिस्थिति में व्यक्तियों द्वार्रार् निर्देशन – सहार्यतार् की मॉग करनार् स्वार्भार्विक है।
    5. धामिक तथार् नैतिक मूल्यों में परिवर्तन –सार्मार्जिक, आर्थिक एवं औद्योगिक परिवर्तनों क प्रभार्व निश्चित रूप में हमार्रे नैतिक तथार् धामिक स्तर पर पड़ार् है। धामिक रीति रिवार्ज बदलने से कट्टरपंथी कम ही दृष्टिगत होते हैं। इसके सार्थ ही देश में व्यभिचार्र बढ़तार् जार् रहार् है। नैतिक दृष्टि से कोर्इ भी व्यक्ति अपने उत्तरदार्यित्व क पार्लन र्इमार्नदार्री से नहीं करतार् है। ऐसी परिस्थितियों से भार्वी पीढ़ी को बचार्ने के लिए हम निर्देशन -सहार्यतार् की उपेक्षार् नहीं कर सकते हैं।
    6. उचित समार्योजन की आवश्यकतार् –यदि व्यक्ति को अपनी योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं के अनुसार्र कार्य मिलतार् है तो इससे उसको व्यक्तिगत संतोष के सार्थ-सार्थ उत्पार्दन क्षमतार् में विकास के लिए प्रोत्सार्हन भी प्रार्प्त होतार् है। इस कार्य में निर्देशन अधिक सहार्यक सिद्ध हो सकतार् है।

    2. रार्जनीतिक दृष्टिकाण से निर्देशन की आवश्यकतार् –

    रार्जनीतिक दृष्टिकोण से भी देश में इस समय निर्देशन की बड़ी आवश्यकतार् है। रार्जनीतिक क्षेत्र में निर्देशन की आवश्यकतार् निम्नार्ंकित बिन्दुओं से स्पष्ट होती है। देश के अस्तित्व की रक्षार् – देश के अस्तित्व की रक्षार् की दृष्टि से इस समय देश में निर्देशन की अत्यन्त आवश्यकतार् है। भार्रत अब तक पंचशील के सिद्धार्न्तों क अनुयार्यी रहार् है। किन्तु चीन और उसके पश्चार्त् पार्किस्तार्न के आतंकवार्दी आक्रमणों ने भार्रत को अपनी सुरक्षार् को दृढ़ करने को मजबूर कर दियार्। सुरक्षार् की मजबूती केवल सेनार् तथार् युद्ध सार्मग्री हो जुटार् लेने से नहीं होती। जरूरत है योग्य सैनिकों तथार् अफसरों क चयन करनार्- ऐसे सैनिकों क चयन करनार्, जिनक मनोबल ऊॅंचार् हो और जो आवश्यकतार् पड़ने पर अपनार् बलिदार्न भी दे। इसके लिए उपयुक्त चयन-विधि क विकास करनार् जरूरी है, उचित व्यक्तियों की तलार्श करनार् जरूरी है। इन सबको केवल निर्देशन ही कर सकतार् है।

    1. प्रजार्तन्त्र की रक्षार् –भार्रत इस समय विश्व के प्रजार्तत्रं देशों में सबसे बडाऱ् देश है। यदि भार्रत में प्रजार्तन्त्र खतरे में पड़तार् है तो यह समझनार् चार्हिए कि सम्पूर्ण विश्व क प्रजार्तन्त्र खतरे में पड़ गयार् है। अत: हमें अपने प्रजार्तन्त्र की रक्षार् आवश्यक है। हमें अपनी बुद्धि तथार् विवेक से उचित प्रतिनिधियों क चयन करने की आवश्यकतार् है, अपने कर्तव्य व अधिकारों के ज्ञार्न, उचित प्रतिनिधियों क चयन, देश के प्रति हमार्रे दार्यित्व आदि की दृष्टि से भी निर्देशन की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है।
    2. धर्म-निरपेक्षतार् –भार्रत एक धर्म निरपेक्ष देश है। यहॉ सभी धर्मों को समार्न रूप से मार्न्यतार् प्रार्प्त है। ऐसे धर्म-निरपेक्ष रार्ष्ट्र में अन्य धर्मार्वलम्बियों के प्रति आचरण निश्चित करने में निर्देशन सहार्यक होतार् है।

    3. शैक्षिक दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकतार् –

    ‘शिक्षार् सबके लिए और सब शिक्षार् के लिए है।’ इस विचार्र के अनुसार्र प्रत्येक बार्लक को शिक्षार् प्रदार्न की जार्नी चार्हिए। शिक्षार् किसी विशिष्ट समूह के लिए नहीं है। भार्रत सरकार ने भी संविधार्न में यह प्रार्वधार्न रखार् है कि शिक्षार् सभी के लिए अनिवाय शिक्षार् से तार्त्पर्य है कि प्रत्येक बार्लक को उसकी योग्यतार् एवं बुद्धि के आधार्र पर शिक्षित कियार् जार्ए। यह कार्य निर्देशन द्वार्रार् ही सम्भव है। शैक्षिक दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकतार् निम्न आधार्रों पर अनुभव की जार्ती है।

    1. पार्ठ्यक्रम क चयन –आर्थिक एवं औद्योगिक विविधतार् के परिणार्मस्वरूप पार्ठ्यक्रम में विविधतार् क होनार् आवश्यक थार्। इसी आधार्र पर मुदार्लियर आयोग ने अपने प्रतिवेदन में विविध पार्ठ्यक्रम को अपनार्ने की संस्तुति की। इस संस्तुति को स्वीकार करते हुए विद्यार्लयों में कृषि विज्ञार्न, तकनीकी, वार्णिज्य, मार्नवीय, गृहविज्ञार्न, ललित कलार्ओं आदि के पार्ठ्यक्रम प्रार्रम्भ किये। इसने छार्त्रों के समक्ष उपर्युक्त पार्ठ्यक्रम के चयन की समस्यार् खड़ी कर दी। इस कार्य में निर्देशन अधिक सहार्यक हो सकतार् है।
    2. अपव्यय व अवरोधन –भार्रतीय शिक्षार् जगत की एक बहुत बडी़ समस्यार् अपव्यय से सम्बन्धित है। यहॉ अनेक छार्त्र शिक्षार्-स्तर को पूर्ण किये बिनार् ही विद्यार्लय छोड़ देते हैं, इस प्रकार उस बार्लक की शिक्षार् पर हुआ व्यय व्यर्थ हो जार्तार् है। श्री के.जीसैय द्दीन ने अपव्यय की समस्यार् को स्पष्ट करने के लिए कुछ ऑकड़े प्रस्तुत किये हैं। सन् 1952-53 में कक्षार् 1 में शिक्षार् प्रार्प्त करने वार्ले 100 छार्त्रों मे से सन 1955-56 तक कक्षार् 4 में केवल 43 छार्त्र ही पहुंच पार्ये। इस प्रकार 57 प्रतिशत छार्त्रों पर धन अपव्यय हुआ। इसी प्रकार की समस्यार् अवरोधन की है। एक कक्षार् में अनेक छार्त्र कर्इ वर्ष तक अनुत्तीर्ण होते रहते हैं। बोर्ड तथार् विश्वविद्यार्लय की परीक्षार्ओं में तो अनुत्तीर्ण छार्त्रों की समस्यार् दिन-प्रतिदिन बढ़ती जार् रही है। गलत पार्ठ्यक्रम के चयन गन्दे छार्त्रों की संगति यार् पार्रिवार्रिक कारण अपव्यय यार् अवरोधन की समस्यार् के समार्धार्न में अधिक योगदार्न कर सकती है।
    3. विद्याथियों की संख्यार् में वृद्धि –स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के बार्द सरकार द्वार्रार् शिक्षार् प्रसार्र के लिए उठार्ये गये कदमों के परिणार्मस्वरूप विद्याथियों की संख्यार् में वृद्धि हुर्इ। कोठार्री आयोग ने तो सन 1985 तक कितनी वृद्धि होगी उसक अनुमार्न लगार्कर विवरण दियार् है। छार्त्रों की संख्यार् में वृद्धि के सार्थ-सार्थ कक्षार् में पंजीकृत छार्त्रों की व्यक्तिगत विभिन्नतार् सम्बन्धी विविधतार् में भी वृद्धि होगी। यह विविधतार् शिक्षकों एवं प्रधार्नार्चाय के लिए एक चुनौती रूप में होगी, क्योंकि उधर रार्ष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है कि छार्त्रों को उनकी योग्यतार्, बुद्धि क्षमतार् आदि के आधार्र पर शिक्षित एवं व्यवसार्य के लिए प्रशिक्षित करके एक कुशल एवं उपयोगी उत्पार्दक नार्गरिक बनार्यार् जार्य। यह कार्य निर्देशन सेवार् द्वार्रार् ही सम्भव हो सकतार् है।
    4. अनुशार्सनहीनतार् –छार्त्रों में बढ़ते हुए असन्तोष तथार् अनुशार्सनहीनतार् रार्ष्ट्रव्यार्पी समस्यार् हो गयी है। आये दिन हड़तार्ल करनार्, सावजनिक सम्पत्ति की तोड़-फोड़ करनार् एक सार्मार्न्य बार्त है। इस अनुशार्सनहीनतार् क प्रमुख कारण यह है कि वर्तमार्न शिक्षार् छार्त्रों की आवश्यकतार्ओं को सन्तुष्ट करने में असफल रही है। इसके सार्थ ही उनकी समस्यार्ओं क समार्धार्न के लिए विद्यार्लयों में ऐसी कोर्इ व्यवस्थार् नहीं है जहॉं वे उचित परार्मर्श प्रार्प्त करके लार्भार्न्वित हो सकें। निर्देशन सहार्यतार् बढ़ती हुर्इ अनुशार्सनहीनतार् को कम कर सकती है।
    5. सार्मार्न्य शिक्षार् के क्षेत्र में वृद्धि –हम ऊपर देख चुके हैं कि समस्त आर्थिक, रार्जनीतिक तथार् सार्मार्जिक वार्तार्वरण बदल गयार् है। इस परिवर्तित वार्तार्वरण के सार्थ शिक्षार् क्षेत्र में भी परिवर्तन आ गये हैं समार्ज की आवश्यकतार्ए दिन-प्रतिदिन बढ़ती जार् रही हैं । इन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करने हेतु नये-नये व्यवसार्य अस्तित्व में आ रहे हैं अतएव नये नये पार्ठ्य विषयों की संख्यार् दिनों दिन बढ़ती जार् रही है। पार्ठ्य विषयों क अध्ययन छार्त्र के लिए कुछ विशेष व्यवसार्यों में प्रवेश पार्ने में सहार्यक होतार् है। इनमें सफलतार् के हेतु भिन्न भिन्न बौद्धिक स्तर, मार्नसिक योग्यतार्, रूचि तथार् क्षमतार् आदि की आवश्यकतार् पड़ती है। अत: यह आवश्यक है कि मार्ध्यमिक शिक्षार् के द्वार्र पर पहुंचे हुए छार्त्र को उचित निर्देशन प्रदार्न कियार् जार्य जिससे वह ऐसे विषय क चयन कर सके जो उसकी योग्यतार् के अनुकूल हो।

    4. मनोवैज्ञार्निक दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकतार्ए –

    प्रत्येक मार्नव क व्यवहार्र मूल प्रवृत्ति एवं मनोभार्वों द्वार्रार् प्रभार्वित है। उसकी मनोशार्रीरिक आवश्यकतार्ए होती है। इन आवश्यकतार्ओं की सन्तुष्टि एवं मनोभार्व व्यक्ति के व्यक्तित्व को निश्चित करते हैं। मनोवैज्ञार्निक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गयार् है कि व्यक्तित्व पर आनुवार्ंशिकतार् के सार्थ सार्थ परिवेश क भी प्रभार्व पड़तार् है। निर्देशन सहार्यतार् द्वार्रार् यह निश्चित होतार् है कि किसी बार्लक के व्यक्तित्व के विकास के लिए कैसार् परिवेश चार्हिए।

    1. वैयैयक्तिक भिन्नतार्ओं क महत्व –यह तथ्य सत्य है कि व्यक्ति एक दूसरे से मार्नसिक, संवेगार्त्मक तथार् गतिविधि आदि आदि दशार्ओं में भिन्न होते हैं। इसी कारण व्यक्तियों के विकास तथार् सीखने में भी भिन्नतार् होती है। प्रत्येक व्यक्ति के विकास क क्रम विभिन्न होतार् है तथार् उनके सीखने की योग्यतार् तथार् अवसर विभिन्न होते हैं । यह वैयक्तिक विभिन्नतार् वंशार्नुक्रम तथार् वार्तार्वरण के प्रभार्व से पनपती है। एक बार्लक कुछ लक्षणों को लेकर उत्पन्न होतार् है। तो उसकी व्यक्तिगत योग्यतार् को निर्धार्रित करते हैं। यह गुण वंशार्नुक्रम से प्रार्प्त होते हैं इसीलिए बार्लकों में भिन्नतार् होती है। वैयक्तिक विभिन्नतार् एक ऐसार् तथ्य है जिसकी अवहेलनार् हम नहीं कर सकते हैं। शिक्षार् बार्लकों के वैभिन्न के आधार्र पर ही दी जार्नी चार्हिए। इस कार्य में निर्देशनसेवार् अधिक सहार्यक होती है। यह सेवार् छार्त्रों की इन विभिन्नतार्ओं क पतार् लगार्कर उनकी योग्यतार्ओं, रूचियों एवं क्षमतार्ओं के अनुरूप शैक्षिक, एवं व्यार्वसार्यिक अवसरों क परार्मर्श देती है।
    2. उचित समार्योजन –उचित समार्योजन व्यक्ति की कार्य कुशलतार्, मार्नसिक, दशार् एवं सार्मार्जिक प्रवीणतार् को प्रभार्वित करने वार्लार् एक प्रमुख कारक है। सार्मार्जिक, शैक्षिक यार् व्यार्वसार्यिक कुसमार्योजन रार्ष्ट्र के लिए घार्तक होतार् है। व्यक्ति संतोषजनक समार्योजन उसी दशार् में प्रार्प्त कर पार्तार् है जबकि उसको अपनी रूचि एवं योग्यतार् के अनुरूप व्यवसार्य विद्यार्लय यार् सार्मार्जिक समूह प्रार्प्त हो। निर्देशन सेवार् इस कार्य में छार्त्रों की विभिन्न विशेषतार्ओं क मूल्यार्ंकन करके उनके अनुरूप ही नियोजन दिलवार्ने में अधिक सहार्यक हो सकती है
    3. भार्वार्त्मक समस्यार्ए –भार्वार्त्मक समस्यार्एं व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पन्न होने वार्ली कठिनार्इयों के कारण जन्म लेती है। ये भार्वार्त्मक समस्यार्ए व्यक्ति के व्यवहार्र को प्रभार्वित करके उसकी मार्नसिक शार्न्ति में विध्न पैदार् करती है। निर्देशन सहार्यतार् द्वार्रार् भार्वार्त्मक नियन्त्रण में सहार्यतार् मिलती है इसके सार्थ ही निर्देशक उन कठिनार्इयों क पतार् लगार् सकतार् है। जो भार्वार्त्मक अस्थिरतार् को जन्म देती है।
    4. अवकाश-काल क सदुपुयोग –विभिन्न वैज्ञार्निक यन्त्रों के फलस्वरूप मनुष्य के पार्स अवकाश क अधिक समय बचार् रहतार् है । वह अपने कार्यों को यन्त्रों के मार्ध्यम से सम्पन्न कर समय बचार् लेतार् है। इस बचे हुए समय को किस प्रकार उपयोग में लार्यार् जार्य, यह समस्यार् आज भी हमार्रे सम्मुख खड़ी हुर्इ है। समय बरबार्द करनार् मनुष्य तथार् समार्ज दोनों के अहित में है और समय क सदुपयोग करनार् समार्ज तथार् व्यक्ति दोनों के लिए हितकर है। अवकाश के समय को विभिन्न उपयोगी कार्यों में व्यय कियार् जार् सकतार् है।
    5. व्यक्तित्व क विकास –व्यक्तित्व शब्द की परिभार्षार् व्यार्पक है। इसके अन्तर्गत मनोशार्रीरिक विशेषतार्ए एवं अर्जित गुण आदि सभी सम्मिलित किये जार्ते हैं। प्रत्येक बार्लक के व्यक्तित्व क समुचित विकास करनार् शिक्षार् क उद्देश्य है । यही उद्देश्य निर्देशन क भी है ।

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