नियोजन क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार, महत्व एवं सिद्धार्न्त

नियोजन भविष्य में किये जार्ने वार्ले कार्य के सम्बन्ध में यह निर्धार्रित करतार् है कि अमुक कार्य को कब कियार् जार्य, किस समय कियार् जार्य कार्य को कैसे कियार् जार्य कार्य में किन सार्धनों क प्रयोग कियार् जार्य, कार्य कितने समय में हो जार्येगार् आदि ।

उदार्हरण : श्री शिवम से उनके व्यवसार्यिक सहयोगी श्री सत्यम किसी कार्य के सम्बन्ध में मिलनार् चार्हते है। श्री शिवम द्वार्रार् उनसे मिलने के सम्बन्ध में निम्नलिखित बार्तों क निर्धार्रण नियोजन ही है।

– सत्यम से किस दिन मिलार् जार्य?
– किस समय मिलार् जार्य?
– कहॉं मिलार् जार्य?
– किस सम्बन्ध में मुलार्कात होनी है?
– किन बार्तों पर विचार्र विमर्श होनार् है?
– विचार्र विमर्श में किसको शार्मिल कियार् जार्य आदि?

इस प्रकार किसी भी कार्य को करने से पहले उसके सम्बन्ध में सब कुछ पूर्व निर्धार्रित करनार् ही नियोजन कहलार्तार् है। नियोजन क आशय पूर्वार्नुमार्न नहीं है अपितु यह किसी कार्य को करने के सम्बन्ध में पहले से ही निर्णय कर लेनार् है। व्यवसार्य में पग पग पर निर्णय की आवश्यकतार् पड़ती है। व्यवसार्य के प्रवर्तन से समार्पन तक निर्णयन की आवश्यकतार् पड़ती है। जो नियोजन पर ही आधार्रित होतार् है।

प्रबन्ध के क्षेत्र में नियोजन से आशय वैकल्पिक उद्देश्यों, नीतियों कार्यविधियों तथार् कार्यक्रमों मे से सर्वश्रेष्ठ क चयन करने से है। पीटर एफ-ड्रकर के अनुसार्र ‘‘एक प्रबंधक जो भी क्रियार्यें करतार् है वे निर्णय पर आधार्रित होती है।’’

नियोजन की परिभार्षार्एँ 

नियोजन के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वार्नों ने अपने मत व्यक्त किये हैं जिन्हें हम परिभार्षार्यें कह सकते हैं, उनमें से कुछ प्रमुख परिभार्षार्एं निम्नलिखित हैं :-

  1. बिली र्इं गोत्ज : नियोजन मलूत: चयन करतार् है और नियोजन की समस्यार् उसी समय पैदार् होती है जबकि किसी वैकल्पिक कार्यविल्पिार् की जार्नकारी हुर्इ हो। 
  2. कूण्टज और ओ डोनल – व्यवसार्यिक नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रियार् है किसी क्रियार् के कारण क सचेत निर्धार्रण है, निर्णयों को लक्ष्यों तथ्यों तथार् पूर्व-विचार्रित अनुमार्नों पर आधार्रित है ।’’ 
  3. एम.र्इ.हर्ले – ‘‘क्यार् करनार् चार्हिए इसक पहले से ही निधारण करनार् नियोजन कहलार्तार् है।वैज्ञार्निक लक्ष्यों, नीतियों, विधियों तथार् कार्यक्रमों में से सर्वश्रेष्ठ क चयन करनार् ही व्यार्वसार्यिक नियोजन कहलार्तार् है। 
  4. मेरी कुशिंग नार्इल्स – ‘‘नियोजन किसी उदद्ेश्य को पूरार् करने के लिए सर्वोत्तम कार्यपथ क चुनार्व करने एवं विकास करने की जार्गरूक प्रक्रियार् है। यह वह प्रक्रियार् है जिस पर भार्वी प्रबन्ध प्रकार्य निर्भर करतार् है’’। 
  5. जाज आर. टेरी – ‘‘नियोजन भविष्य में झोंकने की एक विधि है। भार्वी आवश्यकतार्ओं क रचनार्त्मक पुनर्निरीक्षण है जिससे कि वर्तमार्न क्रियार्ओं को निर्धार्रित लक्ष्यों के सन्दर्भ में समार्योजित कियार् जार् सके। 

उपर्युक्त परिभार्षार्ओं के अध्ययन एवं विश्लेषण के आधार्र पर हम कह सकते हैं कि, ‘‘नियोजन प्रबंध क एक आधार्रभूत कार्य है, जिसके मार्ध्यम से प्रबन्ध द्वार्रार् अपने सार्धनों को निर्धार्रित लक्ष्यों के अनुसार्र समार्योजित करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है और लक्ष्य पूर्ति हेतु भविष्य के गर्भ में झॉंककर सर्वोत्तम वैकल्पिक कार्यपथ क चयन कियार् जार्तार् है जिससे कि निश्चित परिणार्मों को प्रार्प्त कियार् जार् सके।’’

नियोजन की विशेषतार्एॅ 

नियोजन की परिभार्षार्ओं के अध्ययन एवं विश्लेषण के आधार्र पर इसकी निम्नलिखित विशेषतार्एं दृष्टिगोचर होती हैं –

  1. नियोजन प्रबंध क प्रार्थमिक कार्य है क्योंकि नियोजन प्रबन्ध के अन्य सभी कार्यो जैसे स्टार्फिंग, सन्देशवार्हन, अभिप्रेरण आदि से पहले कियार् जार्तार् है। 
  2. नियोजन क सार्र तत्व पूर्वार्नुमार्न है।
  3. नियोजन में ऐक्यतार् पार्यी जार्ती है अर्थार्त एक समय में किसी कार्य विशेष के सम्बन्ध में एक ही योजनार् कार्यार्न्वित की जार् सकती है। 
  4. प्रबंध के प्रत्येक स्तर पर नियोजन पार्यार् जार्तार् है। 
  5. नियोजन उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प क चयन है। 
  6. नियोजन एक सतत एवं लोचपूर्ण प्रक्रियार् है। 
  7. नियोजन एक मागदर्शक क कार्य करती है। 
  8. नियोजन में प्रत्येक क्रियार्ओं में पार्रस्परिक निर्भरतार् पार्यी जार्ती है।
  9. नियोजन में संगठनार्त्मकतार् क तत्व पार्यार् जार्तार् है।
  10. निर्णयन नियोजन क अभिन्न अंग है। 
  11. नियोजन भार्वी तथ्यों व आंकड़ों पर आधार्रित होतार् है। यह इन क्रियार्ओं क विश्लेषण एवं वर्गीकरण करतार् है। इसके सार्थ ही यह इन क्रियार्ओं क क्रम निर्धार्रण करतार् है। 
  12. नियोजन लक्ष्यों, नीतियों, नियमों, एवं प्रविधियों को निश्चित करतार् है, 
  13. नियोजन प्रबन्धकों की कार्यकुशलतार् क आधार्र है। 

नियोजन की प्रकृति 

  1. नियोजन की निरन्तरतार्  -नियोजन की आवश्यकतार् व्यवसार्य की स्थार्पनार् के पूर्व से लेकर, व्यवसार्य के संचार्लन में हर समय बनी रहती है। व्यवसार्य के संचार्लन में हर समय किसी न किसी विषय पर निर्णय लियार् जार्तार् है जो नियोजन पर ही आधार्रित होते हैं। भविष्य क पूर्वार्नुमार्न लगार्ने के सार्थ सार्थ वर्तमार्न योजनार्ओं में भी आवश्यकतार्नुसार्र परिवर्तन करने पड़ते हैं । एक योजनार् से दूसरी योजनार्, दूसरी योजनार् से तीसरी योजनार्, तीसरी योजनार् से चौथी योजनार्, चौथी योजनार् से पार्ंचवीं योजनार्, इस प्रकार नियोजन एक निरन्तर चलने वार्ली प्रक्रियार् है।
  2. नियोजन की प्रार्थमिकतार्  –  नियोजन सभी प्रबन्धकीय कार्यों में प्रार्थमिक स्थार्न रखतार् है। प्रबन्धकीय कार्यों में इसक प्रथम स्थार्न है। पूर्वार्नुमार्न की नींव पर नियोजन को आधार्र बनार्यार् जार्तार् है।इस नियोजन रूपी आधार्र पर संगठन, स्टार्फिंग, अभिप्रेरण एवं नियंत्रण के स्तम्भ खड़े किये जार्ते हैं। इन स्तम्भों पर ही प्रबंध आधार्रित होतार् है। प्रबंध के सभी कार्य नियोजन के पश्चार्त ही आते हैं तथार् इन सभी कार्यों क कुशल संचार्लन नियोजन पर ही आधार्रित होतार् है।
  3. नियोजन की सर्वव्यार्पकतार्  –  नियोजन की प्रकृति सर्वव्यार्पक होती है यह मार्नव जीवन के हर पहलू से सम्बन्धित होने के सार्थ सार्थ संगठन के प्रत्येक स्तर पर और समार्ज के प्रत्येक क्षेत्र में पार्यार् जार्तार् है।संगठन चार्हे व्यार्वसार्यिक हो यार् गैर व्यार्वसार्यिक (धामिक, रार्जनीतिक, सार्ंस्कृतिक, यार् सार्मार्जिक) छोटे हों यार् बड़े, सभी में लक्ष्य व उद्देश्यों को प्रार्प्त करने के लिए नियोजन की आवश्यकतार् पड़ती है।
  4. नियोजन की कार्यकुशलतार्  –  नियोजन की कार्य कुशलतार् आदार्य और प्रदार्य पर निर्भर करती है। उसी नियोजन को सर्वश्रेष्ठ मार्नार् जार्तार् है जिसमें न्यूनतम लार्गत पर न्यूनतम अवार्ंछनीय परिणार्मों को प्रबट करते हुए अधिकतम प्रतिफल प्रदार्न करें। यदि नियोजन कुशलतार् पूर्वक कियार् गयार् है तो व्यक्तिगत एवं सार्मूहिक सन्तोष अधिकतम होगार्।
  5. नियोजन एक मार्नसिक क्रियार्  –  नियोजन एक बौद्धिक एवं मार्नसिक प्रक्रियार् है। इसमें विभिन्न प्रबन्धकीय क्रियार्ओं क सजगतार्पूर्वक क्रमनिर्धार्रण कियार् जार्तार् है। नियोजन उद्देश्यों तथ्यों व सुविचार्रित अनुमार्नों की आधार्रशिलार् हैं।

नियोजन के  उद्देश्य

नियोजन एक सर्वव्यार्पी मार्नवीय आचरण है। मार्नव को प्रत्येक क्षेत्र में सतत विकास के लिए नियोजन क सहार्रार् लेनार् पड़तार् है। संगठनों में भी नियोजन प्रत्येक स्तर पर देखने को मिलतार् है। नियोजन के प्रमुख हैं – 

  1. नियोजन कार्य विशेष के निष्पार्दन के लिये भार्वी आवश्यक रूपरेखार् बनार्कर उसे एक निर्दिष्ट दिशार् प्रदार्न करनार् है। 
  2. नियोजन के मार्ध्यम से संगठन से सम्बन्धित व्यक्तियों (आन्तरिक एवं बार्ह्य) को संगठन के लक्ष्यों एवं उन्हें प्रार्प्त करने की विधियों के सम्बन्ध में जार्नकारी प्रार्प्त होती हैं। 
  3. नियोजन संगठन की विविध क्रियार्ओं में एकात्मकतार् लार्तार् है जो नीतियार्ं के क्रियार्न्वयन के लिये आवश्यक होतार् है। 
  4. नियोजन उपलब्ध विकल्पों में सर्वश्रेष्ठ विकल्प क चयन है। जिसके परिणार्मस्वरूप क्रियार्ओं में अपव्यय के स्थार्न पर मितव्ययतार् आती है। 
  5. भार्वी पूर्वार्नुमार्नों के आधार्र पर ही वर्तमार्न की योजनार्यें बनार्यी जार्ती हैं। पूर्वार्नुमार्न को नियोजन क सार्रतत्व कहते हैं।
  6. नियोजन क उद्देश्य संस्थार् के भौतिक एवं मार्नवीय संसार्धनों में समन्वय स्थार्पित कर मार्नवीय संसार्धनों द्वार्रार् संस्थार् के समस्त संसार्ध् ार्नों को सार्मूहिक हितों की ओर निर्देशित करतार् है। 
  7. नियोजन में भविष्य की कल्पनार् की जार्ती है। परिणार्मों क पूर्वार्नुमार्न लगार्यार् जार्तार् है एवं संस्थार् की जोखिमों एवं सम्भार्वनार्ओं को जॉचार् परखार् जार्तार् है। 
  8. नियोजन के परिणार्मस्वरूप संगठन में एक ऐसे वार्तार्वरण क सृजन होतार् है जो स्वस्थ प्रतिस्पर्धार् को प्रोत्सार्हित करतार् है। 
  9. नियोजन में योजनार्नुसार्र कार्य को पूरार् कियार् जार्तार् है जिससे संगठन को लक्ष्यों की प्रार्प्ति अपेक्षार्कृत सरल हो जार्ती है। 
  10. नियोजन, संगठन में स्वस्थ वार्तार्वरण क सृजन करतार् है जिसके परिणार्मस्वरूप स्वस्थ मोर्चार्बन्दी को भी प्रोत्सार्हन मिलतार् है। 
  11. नियोजन समग्र रूप से संगठन के लक्ष्यों, नीतियों, उद्देश्यों, कार्यविधियों कार्यक्रमों, आदि में समन्वय स्थार्पित करतार् है। 

नियोजन के प्रकार 

नियोजन समार्न तथार् विभिन्न समयार्वधि व उद्देश्यों के लिए कियार् जार्तार् है इस प्रकार नियोजन के प्रमुख प्रकार हैं :- 

  1. दीर्घकालीन नियोजन – जो नियोजन एक लम्बी अवधि के लिय े कियार् जार्ए उसे दीर्घकालीन नियोजन कहते हैं। दीर्घकालीन नियोजन, दीर्घकालीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कियार् जार्तार् है। जैसे पूंजीगत सम्पत्तियों की व्यवस्थार् करनार्, कुशल कार्मिकों की व्यवस्थार् करनार्, नवीन पूंजीगत योजनार्ओं को कार्यार्न्वित करनार्, स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धार् बनार्ये रखनार् आदि। 
  2. अल्पकालीन नियोजन – यह नियोजन अल्पअवधि के लिय े कियार् जार्तार् है। इसमें तत्कालीन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। यह दैनिक, सार्प्तार्हिक, पार्क्षिक, तिमार्ही, छमार्ही यार् वाषिक हो सकतार् है। 
  3. भौतिक नियोजन – यह नियोजन किसी उद्देश्य के भौतिक संसार्धनों से सम्बन्धित होतार् है। इसमें उपक्रम के लिए भवन, उपकरणों आदि की व्यवस्थार् की जार्ती है। 
  4. क्रियार्त्मक नियोजन – यह नियोजन संगठन की क्रियार्ओं से सम्बन्धित होतार् है। यह किसी समस्यार् के एक पहलू के एक विशिष्ट कार्य से सम्बन्धित हो सकतार् है। यह समस्यार्, उत्पार्दन, विज्ञार्पन, विक्रय, बिल आदि किसी से भी सम्बन्धित हो सकतार् है। 
  5. स्तरीय नियोजन – यह नियोजन ऐसी सभी सगंठनों में पार्यार् जार्तार् है जहॉं कुशल प्रबन्धन हेतु प्रबंध को कर्इ स्तरों में विभार्जित कर दियार् जार्तार् है यह उच्च स्तरीय, मध्यस्तरीय तथार् निम्नस्तरीय हो सकते हैं। 
  6. उद्देश्य आधार्रित नियोजन – इस नियोजन में विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति हेतु नियोजन कियार् जार्तार् है जैसे सुधार्र योजनार्ओं क नियोजन, नवार्चार्र योजनार् क नियोजन, विक्रय सम्वर्द्धन नियोजन आदि। 

नियोजन के सिद्धार्न्त

नियोजन करते समय हमें विभिन्न तत्वों पर ध्यार्न देनार् होतार् है। इसे ही विभिन्न सिद्धार्न्तों में वर्गीकृत कियार् गयार् है। दूसरे शब्दों में नियोजन में सिद्धार्न्तों पर ध्यार्न देनार् आवश्यक है। 

  1. प्रार्ार्थमिकतार् क सिद्धार्न्त – यह सिद्धार्नत इस मार्न्यतार् पर आधार्रित है कि नियोजन करते समय प्रार्थमिकतार्ओं क निर्धार्रण कियार् जार्नार् चार्हिए और उसी के अनुसार्र नियोजन करनार् चार्हिए। 
  2. लोच क सिद्धार्न्त – प्रत्येक नियोजन लोचपूर्ण होनार् चार्हिए। जिससे बदलती हुर्इ परिस्थितियों में हम नियोजन में आवश्यक समार्योजन कर सकें। 
  3. कार्यकुशलतार् क सिद्धार्न्त- नियोजन करते वक्त कार्यकुशलतार् को ध् यार्न में रखनार् चार्हिए। इसके तहत न्यूनतम प्रयत्नों एवं लार्गतों के आध् ार्ार्र पर संगठन के लक्ष्यों को प्रार्प्त करने में सहयोग दियार् जार्तार् है। 
  4. व्यार्पकतार् क सिद्धार्न्त – नियोजन में व्यार्पकतार् होनी चार्हिए।नियोजन प्रबन्ध के सभी स्तरों के अनुकूल होनार् चार्हिए। 
  5. समय क सिद्धार्न्त – नियोजन करते वक्त समय विशेष क ध्यार्न रखनार् चार्हिए जिससे सभी कार्यक्रम निर्धार्रित समय में पूरे किये जार् सकें एवं निर्धार्रित लक्ष्यों को प्रार्प्त कियार् जार् सके। 
  6. विकल्पों क सिद्धार्न्त – नियोजन के अन्तगर्त उपलब्ध सभी विकल्पों में से श्रेष्ठतम विकल्प क चयन कियार् जार्तार् है जिससे न्यूनतम लार्गत पर वार्ंछित परिणार्म प्रार्प्त किये जार् सकते हैं। 
  7. सहयोग क सिद्धार्न्त – नियोजन हेतु सगंठन में कायर्रत सभी कामिर्कों क सहयोग अपेक्षित होतार् है। कर्मचार्रियों के सहयोग एवं परार्मर्श के आधार्र पर किये गये नियोजन की सफलतार् की सम्भार्वनार् अधिकतम होती है। 
  8. नीति क सिद्धार्न्त – यह सिद्धार्न्त इस बार्त पर बल देतार् है नियोजन को प्रभार्वी बनार्ने के लिए ठोस एवं सुपरिभार्षित नीतियॉं बनार्यी जार्नी चार्हिए। 
  9. प्रतिस्पर्द्धार्त्मक मोर्चार्बन्दी क सिद्धार्न्त – यह सिद्धार्न्त इस बार्त पर बल देतार् है कि नियोजन करते समय प्रतिस्पध्र्ार्ी संगठनों की नियोजन तकनीकों, कार्यक्रमों, भार्वी योजनार्ओं आदि को ध्यार्न में रखकर ही नियोजन कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  10. निरन्तरतार् क सिद्धार्न्त – नियोजन एक गतिशील तथार् निरन्तर जार्री रहने वार्ली प्रक्रियार् है। इसलिये नियोजन करते समय इसकी निरन्तरतार् को अवश्य ध्यार्न में रखार् जार्नार् चार्हिये। 
  11. मूल्यार्ंकन क सिद्धार्न्त – नियोजन हेतु यह आवश्यक है कि समय समय पर योजनार्ओं क मूल्यार्ंकन करते रहनार् चार्हिए। जिससे आवश्यकतार् पड़ने पर उसमें आवश्यक दिशार् परिवर्तन कियार् जार् सके। 
  12. सम्प्रेषण क सिद्धार्न्त – प्रभार्वी सम्प्रेषण के मार्ध्यम से ही प्रभार्वी नियोजन सम्भव है।नियोजन उसके क्रियार्न्वयन, विचलन, सुधार्र आदि के सम्बन्ध में कर्मचार्रियों को समय समय पर जार्नकारी दी जार् सकती है और सूचनार्यें प्रार्प्त की जार् सकती हैं। 

नियोजन की प्रक्रियार् 

नियोजन छोटार् हो यार् बड़ार्, अल्पकालीन हो यार् दीर्घकालीन, उसे विधिवत संचार्लित करने हेतु कुछ आवश्यक कदम उठार्ने पड़ते हैं। इन आवश्यक कदमों को ही नियोजन प्रक्रियार् कहते हैं। नियोजन प्रक्रियार् के प्रमुख चरण हैं –

नियोजन की प्रक्रियार्
  1. लक्ष्य निर्धार्रण करनार् – व्यार्वसार्यिक नियोजन क प्रार्रम्भ लक्ष्यों को निर्धार्रित करने से होतार् है। सर्वप्रथम संगठन क लक्ष्य निर्धार्रित कियार् जार्तार् है। इसके पश्चार्त इसे विभार्गों और उपविभार्गों में विभार्जित कर दियार् जार्तार् है। कर्मचार्री जिस विभार्ग से सम्बन्धित हो, उसे उस विभार्ग के लक्ष्य के बार्रे में अवश्य ही जार्नकारी होनी चार्हिए। लक्ष्य निर्धार्रण से ही योजनार्ओं क क्रियार्न्वयन सरलतार्पूर्वक कियार् जार् सकतार् है। 
  2. पूर्वार्नुमार्न करनार् – लक्ष्य निर्धार्रण के पश्चार्त पूर्वार्नुमार्न की आवश्यकतार् पड़ती है। व्यवसार्य से सम्बन्धित विभिन्न बार्तों क पूर्वार्नुमार्न लगार्नार् पड़तार् है। जैसे – पूंजी की आवश्यकतार् है? कितनार् उत्पार्दन करनार् है? कच्ची सार्मग्री कहॉं से क्रय करनार् उपयुक्त होगार्? उत्पार्दन में कितनार् समय लगनार् चार्हिए। उत्पार्दन लार्गत कितनी होनी चार्हिए? किसे कितनार् पार्रिश्रमिक देनार् चार्हिए? विक्रय मूल्य कितनार् हो? विक्रय कब, कहॉ, कितनार् कियार् जार्नार् चार्हिए? आदि इसके अतिरिक्त व्यार्वसार्यिक वार्तार्वरण से सम्बन्धित अन्य तथ्यों को भी पूर्वार्नुमार्न कियार् जार्तार् है। इसमें तेजी, मन्दी, सरकारी नीतियॉं, वैश्विक दशार्यें आदि प्रमुख हैं। 
  3. सीमार् निर्धार्रण करनार् – नियोजन की सीमार्यें भी होती हैं ऐसे नियोजन जिन पर संगठन क पूर्ण नियंत्रण होतार् है नियंत्रण योग्य सीमार्यें कहलार्ती हैं। इनमें कम्पनी की नीतियॉं, विकास कार्यक्रम कार्यार्लय तथार् शार्खार्ओं की स्थिति आदि आते हैं। अर्द्धनियंत्रण में ऐसे नियोजन को सम्मिलित कियार् जार्तार् है जिन पर संगठन क पूर्ण नियंत्रण नहीं होतार् है, इसे आंशिक रूप से ही नियंत्रित कियार् जार् सकतार् है। इसे अर्द्ध नियंत्रण योग्य नियोजन कहते हैं।इसमें मूल्य नीति, विक्रय क्षेत्र,पार्रिश्रमिक, अनुलार्भ आदि प्रमुख हैं। अनियंत्रण योग्य नियोजन वह है जिन पर संगठन क कोर्इ नियंत्रण नहीं होतार् है। इसमें देश की जनसंख्यार्, रार्जनीतिक वार्तार्वरण, कर दरें, भार्वी मूल्य स्तर, व्यार्पार्र चक्र आदि प्रमुख हैं। नियोजन की सीमार्ओं में प्रबन्धकों में परस्पर मतभेद हैं। यह संगठन एवं उसके लक्ष्यों पर ही निर्भर करतार् है कि उनके नियोजन की सीमार्यें क्यार् होनी चार्हिए। 
  4. वैकल्पिक कार्यविधियों क विश्लेषण एवं मूल्यार्ंकन  – नियोजन के इस चरण में वैकल्पिक कार्यविधियों क विश्लेषण एवं मूल्यार्ंकन कियार् जार्तार् है। विकल्पों के विश्लेषण से हमें यह जार्नकारी प्रार्प्त हो जार्ती है कि उपलब्ध विकल्पों में क्यार् गुण दोष हैं तथार् इनके मूल्यार्ंकन से हमें यह पतार् चलतार् है कि कौन सार् विकल्प किन परिस्थितियों में हमें सर्वोत्तम परिणार्म देगार्। 
  5. श्रेष्ठतम विकल्प क चयन  – नियोजन के इस चरण में उपलब्ध विकल्पों के विश्लेषण एवं मूल्यार्ंकन के पश्चार्त संगठन के लिए श्रेष्ठतम विकल्प क चयन कियार् जार्तार् है। यह आवश्यक नहीं है कि एक संगठन के लिए जो श्रेष्ठतम विकल्प हो वही दूसरे संगठन के लिए भी श्रेष्ठतम विकल्प हो। अत: प्रत्येक संगठन आवश्यकतार्नुसार्र श्रेष्ठ विकल्प क चयन करतार् है। 
  6. योजनार्ओं क निर्मार्ण  – श्रेष्ठतम विकल्प के चयन के पश्चार्त योजनार्ओं और उपयोजनार्ओं क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है। जिससे लक्ष्य को प्रार्प्त करने में सरलतार् हो। इन योजनार्ओं में समय, लार्गत, लोचशीलतार्, प्रतिस्पर्द्धार् की नीति,आदि घटकों क भी ध्यार्न रखार् जार्तार् है। उपयोजनार्यें, मूल योजनार्ओं के क्रियार्न्वयन को सरल कर देती है। इसके पश्चार्त योजनार्ओं के सुचार्रू संचार्लन के उद्देश्य से क्रियार्ओं के निष्पार्दन क क्रम व समय भी निध्र्धार्रित कर दियार् जार्तार् है। योजनार्ओं के निर्मार्ण के समय विभिन्न कर्मचार्रियों क सहयोग लियार् जार्तार् है जिससे योजनार्ओं क भली-भॉंति निर्मार्ण हो सके। 
  7. अनुगमन  – योजनार्ओं के क्रियार्न्वयन के पश्चार्त उनकी सफलतार्ओं क मार्पन कियार् जार्तार् है और यदि आवश्यक हुआ तो योजनार्ओं में आवश्यक संशोधन कियार् जार्तार् है। बदलती हुर्इ आवश्यकतार्ओं, परिस्थितियों एवं सम्भार्वित परिवर्तनों के सम्बन्ध में भी योजनार्ओं में आवश्यक संशोध् ार्न कियार् जार्तार् है इस प्रकार अनुगमन में योजनार्ओं के क्रियार्न्वयन के पश्चार्त हमें जो परिणार्म प्रार्प्त होते हैं। उन्हीं के अनुसार्र हम आवश्यक कदम उठार्ते हैं। 

नियोजन क महत्व 

नियोजन की अनुपस्थिति में व्यवसार्यिक सफलतार् प्रार्प्त करनार् असम्भव है। जिस प्रकार एक उद्देश्यहीन व्यक्ति जीवन में सफल नहीं हो सकतार् है उसी प्रकार बिनार् नियोजन के कोर्इ भी संगठन, व्यार्वसार्यिक यार् गैर व्यार्वसार्यिक, सफल नहीं हो सकतार् है। नियोजन ही संगठन क मागदर्शन करतार् है तथार् माग में आने वार्ली बार्धार्ओं पर विजय प्रार्प्त करने में सहार्यक होतार् है। अर्नेस्ट सी. मिलर ने ठीक ही कहार् है कि, ‘‘बिनार् नियोजन के कोर्इ भी कार्य केवल निष्प्रयोजन क्रियार् होगी जिससे अव्यवस्थार् के अतिरिक्त कुछ भी प्रार्प्त न होगार्। नियोजन क महत्व निम्नलिखित बिन्दुओ से और भी अधिक स्पष्ट होतार् है – 

  1. संगठन के उददेश्यों पर ध्यार्न केन्द्रित करनार्   – प्रत्येक व्यार्वसार्यिक संगठन के आधार्रभूत लक्ष्य होते हैं। इन लक्ष्यों को प्रार्प्त करने के लिए ही नियोजन कियार् जार्तार् है। नियोजन से संगठन के प्रबंधकों क लक्ष्य की ओर ध्यार्न केन्द्रित रहतार् है, जिससे संगठन के प्रत्येक कर्मचार्री जार्गरूक और सतर्क बने रहते हैं।संगठन के लक्ष्यों के प्रति सभी क ध्यार्न केन्द्रित रहने से अन्र्तविभार्गीय क्रियार्ओं में परस्पर समन्वय बनार् रहतार् है।इस प्रकार नियोजन विभिन्न क्रियार्ओं को व्यवस्थित करतार् है। नियोजन ही संगठन की नीतियों, क्रियार्विधियों, कार्यक्रमों तथार् अन्य विभार्गों में समन्वय स्थार्पित करतार् है। 
  2. लार्गत व्ययों को कम करनार्   – नियोजन के मार्ध्यम से संगठन की प्रत्येक क्रियार् निर्धार्रित ढंग से की जार्ती है। यह विधि उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम होती है जिससे व्ययों में कमी आती है। संकट की परिस्थितियों में इनसे निपटने के लिए नियोजन क ही सहार्रार् लेनार् पड़तार् है। अनेकों व्यार्वसार्यिक व्यार्धियों के उपचार्र हेतु पूर्वार्नुमार्न क सहार्यक होतार् है। नियोजन से कार्यकुशलतार् में वृद्धि होती है। जिससे लार्गत व्यय में कमी आ जार्ती है। 
  3. भविष्य की अनिश्चिततार् क सार्मनार् करने के लिए   – भविष्य सदार् अनिश्चित रहतार् है। आज के व्यार्वसार्यिक वार्तार्वरण ने इस अनिश्चिततार् को और भी अधिक बढ़ार् दियार् है। इन अनिश्चिततार्ओं पर पूर्ण रूप से तो नहीं अपितु काफी हद तक नियोजन के मार्ध्यम से निपटार् जार् सकतार् है। भविष्य के गर्भ में झार्ंककर अनिश्चिततार्ओं क उपचार्र करनार् ही तो नियोजन है। बार्ढ़, अग्निकाण्ड, भूकम्प, व्यार्पार्रिक उतार्र चढ़ार्व, बदलती हुर्इ बार्जार्र स्थिति कर व्यवस्थार्ओं में बदलार्व आदि अनिश्चिततार् ही तो है जिन क नियोजन के मार्ध्यम से सार्मनार् कियार् जार् सकतार् है। 
  4. प्रबन्धकीय कार्यो में समन्वय स्थार्पित करनार्   – प्रबन्धकीय कार्यों में नियोजन क प्रथम स्थार्न है। बिनार् नियोजन के अन्य सभी प्रन्धकीय कार्यों की कल्पनार् भी नहीं की जार् सकती है। नियोजन के मार्ध्यम से ही समुचित नियंत्रण, समन्वय, निर्देशन, अभिप्रेरण, स्टार्फिंग आदि किये जार् सकते हैं। अत: सभी प्रबन्धकीय कार्यों में समन्वय स्थार्पित करने के लिए नियोजन अपरिहाय है। 
  5. मनोबल एवं अभिप्रेरण में वृद्धि   – एक कुशल नियोजन पद्धति के अन्तर्गत प्रत्येक स्तर पर प्रबन्धकों की भार्गितार् एवं कर्मचार्रियों को प्रोत्सार्हित कियार् जार्तार् है। जिससे मनोबल एवं अभिप्रेरण में वृद्धि होती है। कर्मचार्रियों को यह पतार् होतार् है कि कौन सार् कार्य कब, कहॉं, कैसे, कितने समय में होनार् है? इससे उनके मनोबल में वृद्धि होती है। 
  6. उतार्वले निर्णयों पर रोक   – नियोजन के अन्तर्गत विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प क चयन कियार् जार्तार् है। विकल्प के चयन के समय परिस्थितियों, समस्यार्ओं, कठिनार्इयों व मिव्ययतार् क पर्यार्प्त ध्यार्न रखार् जार्तार् है। इससे उतार्वले निर्णयों पर रोक लगती है जिससे अनार्वश्यक हार्नि से संगठन सुरक्षित रहतार् है। प्रतिस्पर्धार्त्मक शक्ति में सुधार्र नियोजन से संगठन की प्रतिस्पर्धार् क्षमतार् में अभिवृद्धि होती है। नियोजन के मार्ध्यम से ही एक संगठन प्रतियोगितार् क सार्मनार् करने में सफल हो सकतार् है। कुशल नियोजन से ही एक संगठन अपने प्रतिद्वन्दी संगठन पर विजय प्रार्प्त कर सकतार् है। इस प्रकार नियोजन से प्रतिस्पर्धार्त्मक क्षमतार् में सुधार्र होतार् हैं। 
  7. सृजनार्त्मकतार् को प्रोत्सार्हन  – नियोजन में भविष्य के गर्भ में झार्ंककर बेहतर विकल्पों क चयन कियार् जार्तार् है। इससे संगठन की सृजनार्त्मकतार् को प्रोत्सार्हन मिलतार् है। शोध, नवप्रवर्तन आदि सृजनार्त्मकतार् के प्रोत्सार्हन क ही परिणार्म है। नियोजन मार्नव जीवन के सभी पहलुओं पर सम्बन्धित होतार् है। प्रत्येक संगठन की सफलतार् और विफलतार् नियोजन पर ही निर्भर करती है। कुशल नियोजन व्यार्वसार्यिक संगठन ही नहीं अपितु मार्नव जीवन, समार्ज एवं रार्ष्ट्र को भी प्रगति के पथ पर अग्रसर करतार् है। नियोजन के महत्व के संदर्भ में जितनार् भी कहार् जार्य कम है। 

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