नार्गरिक अधिकार आंदोलन क्यार् है ?
नार्गरिक अधिकारों क इतिहार्स उतनार् ही पुरार्नार् है जितनार् की लोकतंत्र का। नार्गरिक अधिकार आंदोलन उन आंदोलनो को कहार् जार्तार् है जिनके द्वार्रार् श्विधि के समक्ष समार्नतार्श् के लिए संघष कियार् गयार्। यह विश्व के अलग-अलग देशों में विभिन्न असंतुष्ट नेतार्ओं और लोकप्रिय विद्रार्हियों के नेतृत्व में लगभग 1950 से 1980 के मध्य अलग-अलग रूप से चलार्यार् गयार्। कर्इ देशों में इस आंदोलन की प्रक्रियार् दीर्घकालिक, तनार्वपूर्ण और जटिल रहीं। यद्यपि इन आंदोलनों में से अधिकतर अपने लक्ष्यों को पूर्णत: हार्सिल नहीं कर सके। तथार्पि लोकतंत्र के इतिहार्स में ये आंदोलन अत्यार्धिक महत्वपूर्ण है। विश्व के अलग-अलग देशों में नार्गरिक अधिकार आंदोलन स्वतंत्र रूप से हुये किन्तु अध्ययन की सुविधार् के लिए इन आंदोलनों क विवेचन निम्नार्नुसार्र कियार् जार् सकतार् है।

यूरोप में नार्गरिक अधिकार आंदोलन 

यूरोप में नार्गरिक अधिकार आंदोलन की जड़े मूलत: कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदार्यों के मध्य संघर्ष में देखी जार् सकती है। यह सघर्ष उत्तरी आयरलैण्ड में 60 के दशक में आयरलैण्ड सरकार की भेदभार्वपूर्ण नीति को लेकर प्रार्रंभ हुआ और शनै: शनै: नार्गरिक अधिकार आंदोलन में परिवर्तित हो गयार्। कैथोलिको ने न केवल सरकार की अन्यार्यपूर्ण आवार्स नीति को चुनौती दी बल्कि उन्होंने नार्गरिक अधिकारों के लिए लड़ाइ की ओर भी पहलार् कदम उठार्यार्। अपने समुदार्य की स्थिति को सुधार्रने हेतु उन्होंने विभिन्न प्रकार के मार्ध्यमों क सहार्रार् लेते हुये एक विशार्ल र्इसाइ जन समुदार्य को स्थार्नीय एवं आंतरिक मुद्दों से दूर हटार्कर नार्गरिक अधिकारों के लिए संघर्ष की ओर प्रेरित कियार्।

जनवरी 1964 में बेलफार्स्ट में श्सार्मार्जिक न्यार्य के लिए अभियार्न(Campaign for Social Justice) की स्थार्पनार् की गर्इ। इस संस्थार् ने सरकार के खिलार्फ आवार्स नीति पर महिलार्ओं के संघर्ष एवं रोजगार्र में भेदभार्व के मुद्दे को उठार्यार्। उन्होंने सरकार के इस वार्दे को चुनौती दी की उनक मार्मलार् स्ट्रॉसबर्ग में संयुक्त रार्ष्ट्र संघ के मार्नवार्धिकार आयोग में उठार्यार् जार्येगार्। 60 के दशक के अंतिम वर्षों एवं सत्तर के दशक के प्रार्रंभ में यह आंदोलन एक स्थार्नीय संघर्ष से परिवर्तित होकर पूर्णतयार् नार्गरिक अधिकारों क आंदोलन बन गयार्। इसी दौरार्न उत्तरी आयरलैण्ड श्नार्गरिक अधिकार सभार्श्(Northen Ireland Civil Rights Association) क गठन कियार् गयार्। इस संस्थार् ने आंदोलन को संगठित रूप प्रदार्न कियार् और अमेरिकन नार्गरिक अधिकार आंदोलन एवं अफ्रीकन नार्गरिक अधिकार आंदोलनो से प्रेरणार् प्रार्प्त की। अफ्रो-अमेरिकन आंदोलन से प्रेरित आयरलैण्ड के कैथोलिक समुदार्य ने अल्पसंख्यकों के लिए बेहतर सुविधार्यें एवं अधिकार प्रार्प्त करने हेतु जगह-जगह विरोध माच और धरनार् प्रदर्शन कियार्। इनकी प्रमुख मार्ंगों में, एक व्यक्ति एक वोट, आवार्सीय नीति में भेदभार्व क अंत और स्थार्नीय शार्सन में प्रतिनिधित्व में भेदभार्व क अंत आदि विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। शीघ्र ही आंदोलनकारियों ने संपूर्ण आयरलैण्ड में श्नार्गरिक-अवज्ञार्श् आंदोलन प्रार्रंभ कर दियार्। किन्तु कालार्ंतर में कैथोलिक समुदार्य में श्प्रोविन्शियल ऑयरिस रिपब्लिकन आर्मीश् के उदय के सार्थ ही यह आंदोलन हिंसक हो उठार्। इस संगठन ने आयरलैण्ड में ब्रिटिश हुकुमत को उखार्ड़ फेंकने के लिए आंतकवार्दी तरीको क सहार्रार् लियार्। प्रत्युत्तर में ब्रिटिश शार्सन ने इस आंदोलन क कठोरतार् से दमन कियार्। इस दौरार्न प्रोटेस्टेण्ट बहुसंख्यक भी कैथोलिकों के विरूध्द मैदार्न में कूद पडे़े। अनेक कट्टरपंथी प्रोटेस्टेण्टो ने सैकड़ों कैथोलिको की हत्यार्एं कर दी। इस कार्य में उन्हें ब्रिटिश शार्सन क अप्रत्यक्ष समर्थन मिलार्। वस्तुत: ब्रिटिश शार्सन ने कैथोलिको के आंदोलन को बरबरतार् पूर्ण तरीके से दबार्ने की कोशिश की। 1978 में जब आयरलैण्ड गणरार्ज्य के द्वार्रार् इस तरह के एक प्रकरण को श्यूरोपीय मार्नवार्धिकार न्यार्यार्लयश् के संज्ञार्न में लार्यार् गयार् तो न्यार्यार्लय ने स्वीकार कियार् कि कैथोलिक नार्गरिक अधिकार आंदोलनकारियों के प्रति ब्रिटिश सेनार् क व्यवहार्र श्अमार्नवीय एवं अपमार्नजनकश् थार्। कुल मिलार्कर आयरलैण्ड में नार्गरिक अधिकारों क आंदोलन विभिन्न प्रकार के विकास चरणों से होकर गुजरार्। यद्यपि इसमें श्खूनी रविवार्रश् जैसे काले दिन भी आये लेकिन अन्तत: आयरलैण्ड सरकार को नार्गरिक अधिकारवार्दियों की कर्इ मार्ंगे मार्ननी पड़ी और धीरे-धीरे कैथोलिकों के आर्थिक विकास एवं जीवन स्तर में सुधार्र के बार्द यह आंदोलन धीमार् पड़तार् चलार् गयार्। यद्यपि वर्तमार्न में उत्तरी आयरलैण्ड के कर्इ भार्गों में इस समस्यार् पर तनार्व बनार् हुआ है किन्तु सभी पाटियों के बीच श्खुले संवार्द की नीतिश् के कारण एवं सरकार द्वार्रार् कैथोलिकों के अधिकारों के संरक्षण के कारण यह मुद्दार् कम महत्वपूर्ण होतार् जार् रहार् है।

यूरोप में उत्तरी आयरलैण्ड के अलार्वार् कर्इ देशों में अलग-अलग तरीके से नार्गरिक अधिकार आंदोलन हुये। 1960 के अंत में जर्मनी में नार्गरिक अधिकार आंदोलन हुआ। मूलत: यह एक श्विरोध प्रदर्शन आंदोलनश् थार् जो कि उन छार्त्रों के द्वार्रार् चलार्यार् गयार् थार् जिनका, नार्जीवार्द की पश्चार्त्वर्ती जर्मन सरकार एवं अन्य पश्चिमी सरकारों के सत्तार्वार्द एवं पार्खंड से मोह भंग हो चुक थार्। इस आंदोलन के दौरार्न हिंसक प्रदर्शन हुये जिसक कि जर्मन पुलिस ने दमन कर दियार्। इस आंदोलन को तत्कालीन विश्वव्यार्पी आंदोलनो से प्रेरणार् प्रार्प्त हुर्इ तथार् इस आंदोलन ने जर्मनी में छार्त्र रार्जनीति के महत्व को चिन्हार्ंकित कियार्।

उपरोक्त नार्गरिक आंदोलनों के अतिरिक्त यूरोप में फ्रार्ंस क आंदोलन उल्लेखनीय है। मर्इ 1968 में फ्रार्ंस की रार्जधार्नी पैरिस में एक आंदोलन भड़क उठार्। मुख्यत: इस आंदोलन में हाइस्कूलों, विश्वविद्यार्लयों के छार्त्रों ने भार्ग लियार्। छार्त्रों के सार्थ-सार्थ संपूर्ण फ्रार्ंस के लगभग दो-तिहाइ मजदूरों ने भी भार्ग लियार्। कतिपय इतिहार्सकारो और दाशनिकों ने इस आंदोलन को फ्रार्ंस में बीसवीं सदी की एकमार्त्र क्रार्ंतिकारी घटनार् क दर्जार् दियार् है। इस आंदोलन के तहत लार्खो छार्त्र एवं कामगार्रो ने अपने अधिकारों के पक्ष में सरकार के विरूध्द सड़कों पर प्रदर्शन कियार्। इस हड़तार्ल को फ्रार्ंस की कम्यूनिस्ट पाटी क समर्थन प्रार्प्त थार्। विद्रोही चार्हते थे कि तत्कालीन श्दी गार्लेश् सरकार को बर्खार्स्त कर दियार् जार्ए।

सरकार ने इस विद्रोह को कठोरतार् से दबार् दियार्। सरकार ने कामगार्रो को आश्वार्सन देते हुये सुधार्रो क वार्दार् कियार् तथार् उन्हें वार्पिस अपने कार्यों पर जार्ने के लिए कहार्। इसके सार्थ ही श्दी गार्लेश् की सरकार ने प्रदर्शनकारियों को चेतार्वनी देते हुये सैन्य बलों तथार् पुलिस को आंदोलन दबार्ने के लिए आदेशित कियार्। जून 1968 में श्दी गार्लेश् सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ते हुये हड़तार्लियों को आपार्तकाल लगार्ने की धमकी देकर हतोत्सार्हित करते हुये शार्ंति एवं व्यवस्थार् बनार्ने की कोशिश की। सरकारी दमन चक्र चलने के पश्चार्त् विद्रार्हियों में हतार्शार् फैल गर्इ और कम्यूनिस्ट पाटी ने आंदोलन से अपने हार्थ खींच लिये। जून 1968 में ही रार्ष्ट्रीय असेम्बली को भंग कर दियार् गयार् और 23 जून 1968 में नये निर्वार्चन करार्ये गये। इन निर्वार्चनों में कम्यूनिस्टो को शिकस्त खार्नी पड़ी और श्दी गार्लेश् सरकार पुन: अधिक शक्तिशार्ली बनकर उभरी। यद्यपि यह एक असफल अभियार्न थार् किन्तु अपनी न्यार्योचित मार्ंगों के कारण इस आंदोलन क नार्गरिक अधिकारों के आंदोलनो के इतिहार्स में विशिष्ट स्थार्न हैं। इन आंदोलनो के अतिरिक्त यूरोप में चैक गणरार्ज्य क श्प्रार्ग-िस्प्रंगश् नार्मक आंदोलन भी नार्गरिक आंदोलन के इतिहार्स में उल्लेखनीय मार्नार् जार्तार् है।

अमेरिक में नार्गरिक अधिकार आंदोलन 

अपेक्षार्कृत स्थिर रार्जनैतिक तंत्र के विकासक्रम में एक ऐसी स्थिति आती है जब प्रत्येक नार्गरिक को विधि के समक्ष समार्न अधिकार तो प्रार्प्त हो जार्ते है किन्तु भेदभार्व एक व्यवहार्रिक समस्यार् के रूप में विद्यमार्न रहते है। यहार्ं तक कि प्रत्येक व्यक्ति के सार्थ रार्ज्य के द्वार्रार् समार्नतार् क व्यवहार्र कियार् जार्तार् है किन्तु भेदभार्व के कारण समार्ज में रोजमर्रार् की जिंदगी में नार्गरिक स्वतंत्रतार् के हनन की संभार्वनार् बनी रहती है। 20वीं सदी के आते-आते अमेरिकी लोकतंत्र प्रौढ़ हो चुक थार्। मगर वो रार्जनैतिक और सार्मार्जिक समस्यार्एं पूर्ववत बनी हुर्इ थी जिनके बीज अमेरिक के विगत इतिहार्स में निहित थे। रंगभेद, नस्लवार्द और लैंगिक असमार्नतार् आदि वे ऐसे मुद्दे थे, जिनसे अमेरिकी समार्ज अभी तक पूर्णत: नहीं उबर पार्यार् थार्।

20वीं सदी के उत्तराध में 1955 से 1968 के बीच अमेरिक में नस्लीय, लैगिंक एवं कानूनी समार्नतार् को लक्ष्य में रखकर एक आंदोलन चलार्यार् गयार् जिसे अमेरिक में श्नार्गरिक अधिकार आंदोलन की संज्ञार् दी गर्इ है। इसे श्द्वितीय-पुर्ननिर्मार्ण’(Second Re-construction) के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। यह आंदोलन अमेरिकी श्सुधार्रवार्दी आंदोलनश् क एक हिस्सार् भी मार्नार् जार् सकतार् है।

19वीं सदी के अंतिम दशक में अमेरिक में नस्लीय भेदभार्व वार्ले कानूनों और प्रजार्तीय हिंसार् क बोलबार्लार् थार्। अमेरिक के इतिहार्स में इस काल को श्अमेरिकी प्रजार्तीय संबंधों क नार्दिरश् के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् थार्। विशेष रूप से टैक्सार्स, लुसियार्नार्, मिसीसिपी, अलार्बार्मार्, जाजियार्, फ्लोरिडार्, सार्उथ, कैरोलिनार्, नाथ कैरोलिनार्, वर्जिनियार्, अरार्कांसस, टैनिसी, ओकलोहार्मार्, और कैसार्ंस ऐसे रार्ज्य थे जिनमें सरकारी एवं गैरसरकारी स्तर पर अफ्रो-अमेरिकी लोगो के सार्थ प्रत्येक क्षेत्र में भेदभार्व कियार् जार्तार् थार्। यह भेदभार्व लगभग सभी जैसे, मतार्धिकार, आर्थिक अवसर, स्थार्नीय रार्जनीतिक प्रतिनिधित्व, रोजगार्र के अवसर आदि स्तरों में व्यार्प्त थार्। इस भेदभार्व पूर्ण नीति से प्रभार्वित लोगो ने (मुख्यत: अश्वेतों ने) प्रार्रंभिक अवस्थार् में श्प्रत्यक्ष-कार्यवार्हीश् के सार्थ श्अहिंसक-प्रतिरोधश् की रणनीति अपनार्ते हुये 1955 में आंदोलन प्रार्रंभ कर दियार् जो कालार्ंतर में श्नार्गरिक-अवज्ञार्श् के नार्म से विख्यार्त हुआ। आंदोलनकारियों ने अपनी मार्ंगों के समर्थन के लिए विभिन्न प्रकार के श्बहिष्कारों, पैदल माच और बैठकों क आयोजन कियार्। इनमें प्रमुखत: श्मोंटेगोमरी बस बहिष्कारश् 1955-1956, ग्रीन्स बरो बैठक 1960 और सेल्मार् से मार्ंटेगोमरी माच 1965 आदि उल्लेखनीय है। इन विरोध प्रदर्शनों में संभवत: श्रोजगार्र एवं स्वतंत्रतार् के लिए वार्ंशिगटन माचश् सर्वार्धिक प्रसिध्द है, जिसमें किंग मॉर्टिन लूथर जूनियर (King Martin Luther Junior) ने अत्यंत प्रभार्वशार्ली भार्षण दियार् और आंदोलनकारियों क प्रमुख अगुवार् बनकर उभरार्। इस आंदोलन को संपूर्ण अफ्रो -अमेरिकी अश्वेतों के अतिरिक्त भी कर्इ श्वेत बुध्दिजीवियों, विचार्रको और रार्जनीतिज्ञों क समर्थन हार्सिल थार्। इस आंदोलन के प्रमुख नेतार् जो श्बडे़ छ: (Big Six) भी कहलार्ते है, फिलिप रेण्डोल्फ, रॉय विलकिन्स, मॉर्टिन लूथर किंग, व्हिटनी यंग, जैम्स फामर और जॉन लेविस थे। इस आंदोलन के दौरार्न सरकार ने त्वरित उपार्य करते हुये संकट कालीन स्थिति को समार्प्त करने क प्रयार्स कियार् और आंदोलनकारियों की कतिपय मार्ंगों को स्वीकार भी कियार्।

इस आंदोलन के परिणार्मस्वरूप आंदोलनकारियों ने अमेरिक में महत्वपूर्ण उपलब्धियार्ं हार्सिल कर ली। यद्यपि इस आंदोलन की सफलतार् पर इतिहार्सकारों में मतभेद है किन्तु जो सफलतार्एं मिली थी वे उस युग में अत्यंत महत्वपूर्ण थी जैसे कि शिक्षार् के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलतार्, 1964 क नार्गरिक अधिकार अधिनियम जिसके द्वार्रार् रोजगार्र, जन-आवार्ार्स आदि के क्षेत्र में भेदभार्व को अवैध घोषित कर दियार् गयार् थार्। इस आंदोलन की अन्य उपलब्धियों में 1965 क निर्वार्चन अधिकार अधिनियम, जिसके द्वार्रार् मतार्धिकार को सुरक्षित कियार् गयार्। इसके अतिरिक्त 1968 क नार्गरिक अधिकार अधिनियम जिसने आवार्स के बेचने यार् किरार्ये से देने में होने वार्ले भेदभार्व क अंत कर दियार् थार्। इस प्रकार अमेरिक के इतिहार्स में 1955 से 1968 तक क काल अत्यंत विशिष्ट स्थार्न रखतार् है। जिसने विश्व के अनेक रार्ष्ट्रों और समार्जों को नार्गरिक अधिकारो की ओर प्रेरित कियार्। इस तार्रतम्य की चरम परिणीति सन् 2009 में दिखाइ दी जब अमेरिक के प्रथम अश्वेत रार्ष्ट्रपति बरार्क ओबार्मार् ने शपथ लेकर अमेरिक में एक नवीन युग क सूत्रपार्त कियार्। वार्स्तव में यह घटनार् नार्गरिक अधिकारवार्दियों के द्वार्रार् अमेरिक में किये गये दीर्घकालिक संघर्ष की एक सुखद परिणीती है।

अन्य नार्गरिक अधिकार आंदोलन 

अमेरिक और यूरोप में हुये नार्गरिक अधिकार आंदोलनों ने लगभग संपूर्ण विश्व को प्रभार्वित कियार्। 1960 में इसकी एक लहर नव-स्वतंत्र अफ्रीक महार्द्वीप में भी उठी। इसमें श्अंगोलार् क स्वतंत्रतार् संग्रार्मश्, गिनी-बिस्सार्उन रिवोल्यूशन, मोजार्म्बिक स्वार्तंत्र्य युध्द, और दक्षिण अफ्रीक में रंगभेद (Apartheid) के खिलार्फ संघर्ष आदि घटनार्ये प्रमुख रूप से गिनाइ जार् सकती है। इन संघर्षों के परिणार्मस्वरूप श्पार्न-अफ्रीकानिज्मश् को बल प्रार्प्त हुआ और बार्द में 1963 में श्अफ्रीकी एकतार् संगठन’(Organisation of African Uniti) की स्थार्पनार् की गर्इ। अफ्रीक के अलार्वार् 20वीं सदी के उत्तराध में विश्व के अन्य देशों में भी छुटपुट रूप से नार्गरिक अधिकारों के लिए संघर्ष कियार् गयार्। इनमें से कुछ सफल रहें और कुछ असफल, किन्तु इन संघर्षों ने लोकतंत्र और मार्नवार्धिकारों के विकास में निश्चित रूप से योगदार्न दियार्। इनमें मैक्सिको क आंदोलन 2 अक्टूबर 1968, कनार्डार् क अक्टूबर-संकट 1968, द्वितीय विश्वयुध्द के बार्द अमेरिक से संधि के नवीनीकरण के विरोध में जार्पार्नी आंदोलन 1960, आदि ऐसी प्रमुख घटनार्यें है जिन्होंने प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष रूप से नार्गरिक अधिकारों के महत्व को स्थार्पित कियार् है।

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