धर्म सुधार्र आंदोलन एवं धर्म सुधार्र विरोधी आन्दोलन

1517 र्इ. से 1648 र्इ. तक क युग धर्म सम्बन्धी सुधार्रों क युग थार्। चर्च और पोप के भ्रश्ट तंत्र के विरूद्ध जो आंदोलन हुआ वह धर्म सुधार्र आंदोलन थार्। इस आंदोलन के दो लक्ष्य थे- (1) र्इसाइयों में धामिक, नैतिक और आध्यार्त्मिक जीवन को पुन: उन्नत और श्रेश्ठ करनार् और (2) रोम के पोप और उसके अधीनस्थ अन्य धर्मार्धिकारियों के धर्म संबधी अनेक व्यार्पक अधिकारों को कम करनार्। मध्ययुग में पूर्ण यूरोपीय समार्ज धर्मकेन्द्रित, धर्मप्रेरित और धर्मनियंत्रित थार् और पोप, धामिक जीवन क नियंतार् ही नहीं थार्, अपितु रार्जनीतिक क्षेत्र में भी सर्वोपरि थार्। धर्म सुधार्र आंदोलन ऐसे सार्मार्जिक और धामिक जीवन के विरूद्ध एक असार्धार्रण प्रक्रियार् थी, परंतु रार्ज्य और व्यक्ति के जीवन को इस आंदोलन ने सर्वार्धिक प्रभार्वित कियार्। इस आंदोलन के दो स्वरूप थे-एक धामिक और दूसरार् रार्जनीतिक। इस आंदोलन से र्इसाइयों में जो धामिकतार्, नैतिकतार् और आध्यार्त्मिकतार् की वृद्धि हुर्इ, उस दृष्टि से यह धर्म सुधार्र आंदोलन थार्। इसके अतिरिक्त जब पार्पे के अनेक अधिकारों के उन्मूलन के विरूद्ध आंदोलन कियार् गयार् और इससे रार्ष्ट्रीय रार्जतंत्र और पोप में जो परस्पर संघर्श छिड़ार् उस दृष्टि से यह रार्जनीतिक आंदोलन थार्।

धर्म सुधार्र आन्दोलन के कारण

रार्जनीतिक कारण

चर्च और पोप के पार्स व्यार्पक रार्जनीतिक ओर आर्थिक अधिकार और शक्तियार्ँ थीं। पोप से लेकर गार्ँव के पार्दरी तक चर्च के सभी अधिकारी रार्जार् की सत्तार् से स्वतंत्र थे। उनके पार्स विशार्ल जार्गीरें थी, वे रार्ज्य के करों से मुक्त थे, पर जनतार् से विभिन्न प्रकार के कर वसूल करते थे, चर्च के स्वतंत्र न्यार्यार्लय भी थे जहार्ँ वे जनतार् के मुकदमों को सुनते और निणर्य देते थे। पार्पे रार्ज्य के आतं रिक और बार्हरी मार्मलों में हस्तक्षपे करतार् थार्। वह रार्जार् को र्इसाइ धर्म से बहिश्कृत करने, रार्ज्य में चर्च के पार्दरियों और अधिकारियों को नियुक्ति करने क आदेश भी दे सकतार् थार्। उदीयमार्न रार्ष्ट्रीय रार्जार्ओं ने चर्च और पार्पे के इन व्यार्पक धार्मिर्क ओर रार्जनीतिक अधिकारों क घोर विरोध कियार् क्योंकि ये विस्तृत अधिकार रार्ष्ट्रीय रार्जतंत्रों के अधिकारों की अभिवृद्धि में बार्धक थे। नवीन शार्सकगण इन अवार्ंछनीय अधिकारों को समार्प्त कर अपनी प्रभु-सत्तार् और शक्ति को सुदृढ़ करनार् चार्हते थे।

रार्ष्ट्रीय जार्गृति से रार्जार्ओं को जन समर्थन प्रार्प्त हो गयार् थार्। रार्ष्ट्रीय भार्वनार् से जन सार्धार्रण में यह भार्वनार् जार्गृत हो गयी कि पोप एक विदेशी सत्तार् है। अपने देश के प्रति देशभक्त रहकर उसकी उन्नति को महत्वपूर्ण समझनार् और पोप के प्रभार्व व अधिकारों को समार्प्त करनार् प्रत्येक देश अपनार् कर्तव्य मार्नने लगार्। इसीलिए रार्जार्गण अपनी निरंकुश रार्जसत्तार् को अधिकार दृढ़ करने के लिए अपने रार्ज्य में फैली चर्च की अतुल धन सम्पित्त व जार्गीरों को ही हड़पनार् चार्हते थे। वे गिरजार्घरों की अतुल सम्पित्त और आर्थिक स्रोतों पर अधिकार करने के लिए लार्लार्यित थे। एसेी दशार् में रार्ष्ट्रीय रार्जार्ओं ने धर्म सुधार्र आंदोलन क समर्थन कियार्।

आर्थिक कारण

मध्ययुगीन यूरोप में सार्मतं वार्दी व्यवस्थार् में कृशक दार्स थे और उद्यार्गेार्ं में श्रेणी व्यवस्थार् से श्रमिक और शिल्पी को व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् नहीं थी। परंतु सोलहवीं सदी में विभिन्न कारणों से यह सार्मंतवार्दी व्यवस्थार् विघटित हो गयी और व्यार्पार्र, वार्णिज्य ओर उद्यार्गेार्ं के विकास होने से कृशक, कारीगर ओर मजदूर विभिन्न उद्योग धंधों एवं कल कारखार्नों में लग गये। वार्णिज्यवार्द और पूँजीवार्द क उत्कर्श हुआ। इससे समार्ज में धन सम्पन्न वणिक वर्ग और उद्योगपतियों क वर्ग बन गयार्। चर्च इसके ब्यार्ज और मुनार्फ़ार् अर्जित करने के सार्धनों को वर्जित करतार् थार्। अत: इस नवीन पूँजीवार्दी वणिक वर्ग ने चर्च क विरोध कियार्, वे चर्च की अतुल सम्पित्त को भी अपने व्यार्पार्र और उद्योगों की वृद्धि के लिए हड़पनार् चार्हते थे, क्योंकि वे चर्च की धन सम्पित्त को अनुत्पार्दक मार्नते थे, इसलिए उन्होंने धर्म सुधार्र आंदोलन को हवार् दी।

चर्च की असंख्य भू स्वार्मित्व जार्गीरों से, विभिन्न करों, चन्दो एवं अनुदार्नों से चर्च के पार्स अतुलनीय धन सम्पित्त संग्रहीत हो गयी थी। इसक उपयोग चर्च के पार्दरी और अधिकारी सार्ंसार्रिकतार् और भोगविलार्स में करते थे। इससे जनसार्धार्रण में रोश व्यार्प्त हो गयार् और उन्होने रार्ष्ट्रीय हित में इसे हड़पनार् चार्हार्। अत: उन्होंने धर्म सुधार्र आंदोलन को समर्थन और सहयोग दियार्।

धामिक कारण

आधुनिक युग के प्रार्रंभ होने तक चर्च और पोपशार्ही में अनेक दोष उत्पन्न हो गये थे। चर्च के बहुसंख्यक पार्दरी ओर धर्मार्धिकारी अपने धामिक कर्तव्यों की अपेक्षार् करते थे। वे पार्पे की भार्ँति आचरण-भ्रश्ट व अनैतिक थे तथार् सार्ंसार्रिक सुख-सुविधार्ओं और वैभव विलार्सितार् में मग्न रहते थे। वे रार्जनीति, प्रदशर्न, शार्नशौकत और भौतिकवार्दी प्रवृित्तयों में डूबे हुए थे। चर्च क स्वरूप मुख्यतयार् व्यार्वसार्यिक हो गयार् थार्। चर्च के विभिन्न पदों पर नियुक्तियार्ँ योग्यतार् के आधार्र पर नहीं होकर, अनुशसंओ, प्रभार्वों और धन के प्रलोभन के आधार्र पर होती थी। पार्पे गिरजार्घरों के विभिन्न पदों को बेचतार् थार्। चर्च में एक दोष “प्लुरेलिटिज” प्रथार् थी। इनके अंतर्गत एक ही पार्दरी अनेक गिरजार्घरों क अध्यक्ष हो सकतार् थार् और अनेक पदों पर कार्य कर सकतार् थार्। इससे एक ही व्यक्ति की सत्तार् और सम्पन्नतार् में खूब वृद्धि होती थी।

चर्च में व्यार्प्त इस अनैतिकतार् और विलार्सितार् के अतिरिक्त चर्च जनसार्धार्रण क शोषण भी करतार् थार्। चर्च द्वार्रार् विभिन्न करो, उपहार्रों और दार्नों से धन एकत्र कियार् जार्तार् थार्। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आय क दसवार्ँ भार्ग अनिवाय रूप से चर्च को देनार् पड़तार् थार्। इसके अतिरिक्त भंटे , उपहार्र और चढ़ार्वार् भी चर्च को देनार् पड़तार् थार्। पोप भी अन्य प्रकार के कर लगार्कर जनतार् क शोषण करतार् थार्। इस आर्थिक शोषण से तो जनसार्धार्रण में आक्रोश थार् ही, पर करों द्वार्रार् एकत्रित धन देश के बार्हर पोप के पार्स रोम भेजार् जार्तार् थार्। इससे लोग चर्च के विरोधी हो गये। रार्ष्ट्रीय चेतनार् के कारण नवीन शार्सक वर्ग चर्च द्वार्रार् इस प्रकार वसूल किये और रोम भेजे गये धन को अपने रार्ज्य की आय की चोरी समझतार् थार्। इस धन को शार्सक लोकहित में और रार्जतंत्र को दृढ़ करने में हार्थियार्नार् चार्हते थे। पोपशार्ही में भी अनेक दोष और दुर्बलतार्एँ उत्पन्न हो गयी थीं। रोम में पोप क दरबार्र भयंकर व्यभिचार्र और भ्रष्टार्चार्र क घर बन गयार् थार्। पार्पे और उसके सहयोगी धर्मार्धिकारी भव्य रार्जप्रसार्दों में वैभव और विलार्सितार् से रहते थे। उसक व्यक्तिगत जीवन अनैतिकतार् और अनार्चार्र से भरार्पूरार् होतार् थार्। पार्पे एलेक्जेडंर शश्ट (1492-1503) तो विलार्सितार् के लिए एक पूरार् हरम रखतार् थार् तथार् व्यभिचार्र से उत्पन्न अपने अवैध पुत्रों के लिए जार्गीरें खोज करतार् थार्।

पोप अपने आपको र्इशवर क प्रतिनिधि मार्नतार् थार् और उसने अधिकतम धन संग्रह करने के लिए “क्षमार्पत्रों” यार् “पार्पमार्चे न-पत्रो” को अपने पार्दरियों द्वार्रार् जनतार् में बेचनार् शुरू कियार्। कोर्इ भी व्यक्ति अपने पार्पों से मुक्त होने के लिए धन देकर क्षमार् पत्र प्रार्प्त कर सकतार् थार्। इस क्षमार् पत्र पर कुछ भी नहीं लिखार् रहतार् थार्। पोप ने यह प्रचार्र कियार् थार् कि जो व्यक्ति मृत्यु के पूर्व पार्प-मोचन पत्र खरीद लेगार्, वह मृत्यु के बार्द स्वर्ग प्रार्प्त करेगार्। इन सबक सार्मूहिक परिणार्म धर्म सुधार्र आंदोलन थार्।

तार्त्कालिक कारण

पार्प मोचन पत्रों की बिक्री के समय जर्मनी में जो विस्फार्टे क घटनार् घटी उससे धर्म सुधार्र आंदोलन क सूत्रपार्त हो गयार्। जब 1817 र्इ. में पार्पे क एजेटं टेटजेल जर्मनी में पार्प मोचन पत्रों को विटनवर्ग में खुले आम बेच रहार् थार् तब माटिन लूथर ने इसक कड़ार् विरोध कियार् और अपने लिखित “95 प्रसंगों” द्वार्रार् पोप को चुनौती दी और इस प्रकार पोप के विरूद्ध खुलार् विद्रोह कर दियार्। लूथर क कथन थार् कि धन देकर मोक्ष प्रार्प्त नहीं हो सकतार्, अपितु पार्पों से मुक्ति पार्ने के लिए र्इशवर पर विशवार्स रखनार् और र्इशवर की असीम दयार् प्रार्प्त तथार् अच्छे कर्म करनार् आवशयक है। उसने र्इशवर के प्रति श्रद्धार् और विशवार्स तथार् स्वयं की प्रार्यश्चित की भार्वनार् द्वार्रार् दोष मुक्ति क सिद्धार्ंत प्रतिपार्दित कियार्। इसके लिए उसने पार्प मोचन पत्र की आवश्यकतार् निरर्थक बतलार्यी और इस प्रकार धर्मसुधार्र आन्दोलन क प्रार्रंभ हो गयार्।

धर्मसुधार्र आन्दोलन के प्रणेतार्

माटिन लूथर के पूर्व धर्म सुधार्रकों ने चौदहवीं सदी से ही चर्च और पार्पे शार्ही की अनैतिकतार्, भ्रश्टतार्, विलार्सितार् ओर शोशण के विरूद्ध अपनी आवार्ज बुलंद की ओर उन्होने धर्म सुधार्र की पृष्ठ्भूमि तैयार्र की। ये अधोलिखित हैं।

जार्न वार्इक्लिफ (1320 र्इ.-1384 र्इ.) 

यह इंग्लैण्ड में आक्सफोर्ड विशवविद्यार्लय में प्रोफसेर थार्। उसने कैथोलिक धर्म और चर्च की अनेक गलत परम्परार्ओं और गतिविधियों की ओर जनसार्धार्रण क ध्यार्न आकृश्ट कियार्। उसने बार्इबल क अंगे्रजी में अनुवार्द कियार् जिससे कि सार्धार्रण जनतार् र्इसाइ धर्म के वार्स्तविक सिद्धार्ंतों को समझ सके एवं पार्दरियों द्वार्रार् गुमरार्ह होने से बच सके। प्रत्येक र्इसाइ को बार्इबल के सिद्धार्ंतों के अनुसार्र कार्य करनार् चार्हिए। इसलिए पार्दरियों के मागदशर्न की आवश्यकतार् नहीं है। उसके मतार्नुसार्र चर्च में व्यार्प्त भ्रष्टार्चार्र क कारण उसकी अतुल सम्पित्त है, इसलिए उसने रार्जार् को सुझार्व दियार् कि रार्ज्य इस अतुल सम्पित्त को ले ले और गिरजार्घरों को पवित्र स्थल बनार्वे।

जार्नहस

यह जमर्न ी में बार्हे ेि मयार् क निवार्सी थार् ओर प्रार्ग विशवविद्यार्लय में प्रोफसे र थार्। उसने यह मत प्रतिपार्दित कियार् कि एक सार्धार्रण र्इसाइ बार्इबल के सिद्धार्ंतों क अनुकरण कर मुक्ति प्रार्प्त कर सकतार् है। इसके लिए गिरजार्घर और पार्दरी की आवश्यकतार् नहीं है। चर्च की आलोचनार् करने पर उसे नार्स्तिक कहार् गयार् और नार्स्तिकतार् के आरोप में उसे 1415 र्इ. में जीवित जलार् दियार्।

सेवोनार्रोलार् (1452 र्इ.-1498 र्इ.)

यह इटली में फ्लोरंस नगर क विद्वार्न पार्दरी थार्। उसने पोप की अनैतिकतार्, भ्रश्टतार् और विलार्सितार् तथार् चर्च में व्यार्प्त दोषों की कटु आलार्चे नार् की। इस पर पार्पे और उसकी परिशद ने उसे दंडित कर जीवित जलार् दियार्।

इरार्समस (1466 र्इ.-1536 र्इ.)

यह हार्लैण्ड निवार्सी थार्। उसने लेटिन सार्हित्य तथार् र्इसाइ धर्मॉार्स्त्रों क अध्ययन कियार्। इस अध्ययन से उसमें मार्नवतार्वार्दी पवित्र भार्वनार्एँ जार्गृत हइुर् । 1484 ई. में वह र्इसाइ मठ में धामिक जीवन व्यतीत करने चलार् गयार्। 1492 र्इ. तक उसने यहार्ँ एक पार्दरी के पद पर कार्य कियार्। यहार्ँ उसने चर्च व मठों में व्यार्प्त भ्रष्टार्चार्र और विलार्स को स्वयं देखार्। 1499 र्इ. में वह इंग्लैण्ड चलार् गयार्। वहार्ँ वह टार्मस, मूर, जार्न कालेट, टार्मस लिनेकर जसै इंग्लैण्ड के विद्वार्नों के संपर्क में आयार् और उसने अनेक पुस्तकें और लेख लिखे। उसकी रचनार्ओं में कलेक्टिनियार् एडगियार्रे म जिसक अनुवार्द अनेक भार्षार्ओं में हुआ, “कोलोक्वीज” , “हैण्डबुक ऑफ ए क्रिश्चियन गलेजर” और 1511 र्इ. में लिखी द पे्रज ऑफ फार्ली प्रमुख है। अंतिम ग्रंथ में उसने व्यंग्य और परिहार्स की शैली में धर्मार्धिकारियों की पोल खोली और चर्च में व्यार्प्त दोषो और अनैतिकतार् पर प्रहार्र किये। उसने 1515 र्इ.में उसने बार्इबल क लेटिन भार्षार् में अनुवार्द कियार्।

माटिन लूथर (1483 र्इ.-1546 र्इ.)

जर्मनी में सेक्सनी क्षेत्र के गार्ँव आइबेन में लूथर क जन्म 10 नवम्बर 1483 को एक सार्धार्रण कृशक परिवार्र में हुआ थार्। उसने इरफर्ट विवि में धर्म शार्स्त्र और मार्नववार्दी शार्स्त्र क अध्ययन कियार्। 1508 र्इ. में वह गटेनवर्ग के विशवविद्यार्लय में धर्म और दशर्न शार्स्त्र क प्रोफसे र नियुक्त हुआ। पर वह पार्दरी और प्रोफेसर बन गयार्। उसने र्इसाइ धर्म और संतों के सिद्धार्ंतों क गहन अध्ययन कियार् और इस निश्कर्श पर पहुँचार् कि मोक्ष प्रार्प्ति के लिए मनुश्य में र्इशवर के प्रति श्रद्धार् एवं र्इशवर की क्षमार्शीलतार् में विशवार्स नितार्तं आवशयक है। उसने तत्कालीन कैथार्ेिलक धर्म में प्रचलित सप्त संस्कारों के सिद्धार्तं क खंडन कियार्।

1511 ई. में वह एक धर्म यार्त्री के रूप में रार्मे गयार् ओर वहार्ँ पार्पे की अनैतिकतार्, भ्रष्टार्चार्र और विलार्सितार् को स्वयं देखकर उसे गहरार् क्षोभ हुआ और उसने कहार् कि र्इसाइ धर्म रोम के जितनार् समीप है उतनार् ही वह दोषों से परिपूर्ण है। इस समय तक लूथर पोप और कैथोलिक चर्च क विरोधी नहीं थार्। किंतु पार्प मोचन पत्रों यार् क्षमार् पत्रों की खुली बिक्री ने उसे विरोधी बनार् दियार्। इस बिक्री से प्रार्प्त धन को पार्पे रार्मे में सेंट पीटर गिरजार्घर के निर्मार्ण में लगार् रहार् थार्।

1517 ई. में पार्पे क एक पार्दरी एजेटं जर्मनी के विटेनवर्ग में क्षमार् पत्रों को बचे रहार् थार्। लूथर ने इस बिक्री की घोर निंदार् की और इसके विरोध में विटेनवर्ग के गिरजार्घर के प्रवेश द्वार्र पर “95 प्रसंगों” को लिख कर लगार् दियार्। वस्तुत: इन 95 कारणों में क्षमार् पत्रों की बिक्री क ही नहीं, अपितु चर्च द्वार्रार् विभिन्न सार्धनों से धन एकत्र करने क विरोध कर उनकी कटु आलोचनार् की गयी थी। इसके बार्द 1519 र्इ. में जर्मनी के एक नगर में खुले वार्द-विवार्द में लूथर ने कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च सत्तार् को और धर्मार्धिकारियों को अमार्न्य कर दियार्। उसक कथन थार् कि मनुश्य ओर इशर् वर के बीच पोप की सहार्यतार् और मध्यस्थतार् निरर्थक है। मनुश्य को र्इशवर की दयार् और अनुकंपार् की प्रार्प्ति के लिए किसी पार्दरी यार् पोप की मध्यस्थतार् की आवश्यकतार् नहीं है। इस प्रकार लूथर ने कैथोलिक चर्च की निरंकुशतार् और सर्वोच्चतार् पर पहली बार्र कुठार्रार्घार्त कियार्। 1520 र्इ. में उसने तीन प्रसिद्ध छोटी पुस्तिकाएँ लिखीं और चर्च व पोप पर घार्तक आक्रमण किये।

लूथर के इन प्रहार्रों और आक्षेपों ने क्षबुध होकर पोप ने 1520 र्इ. में लूथर को कैथार्ेिलक चर्च से निश्कासित करने क आदेश दियार्। पर लूथर ने विटेनवर्ग के खुले बार्जार्र में इस निश्कासन आज्ञार् को जलार् दियार्। स्पेन सम्रार्ट चार्ल्र्स पंचम इस समय कैथार्लिक धर्म क प्रबल समर्थक थार्। जर्मनी में भी उसकी सर्वोच्च रार्जसभार् थी। 1521 र्इ. में वम्र्स नगर में चार्ल्र्स की अध्यक्षतार् में जमर्न रार्ज्यों की एक धर्म सभार् आयोजित की गयी और लूथर से कहार् गयार् कि वह इसके सम्मुख अपनार् स्पश्टीकरण दे। लूथर वहार्ं भी अपने सिद्धार्ंतो पर अडिग रहार्। इस पर सभार् ने उसकी रचनार्ओं को गैर कानूनी घोशित कर दियार् और उसे नार्स्तिक करार्र देकर उसे रार्ज्य की सुरक्षार् से वंचित कर दियार्। इसी बीच लूथर ने जर्मन भार्षार् में बार्इबल क अनुवार्द कियार् जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। इससे जनतार् लूथर के सिद्धार्ंतों और विचार्रों को सरलतार् से समझ सकी। इस समय लूथर रार्ज्य की सुरक्षार् से वंचित कर दियार् गयार् थार्। इससे उसकी हत्यार् की संभार्वनार् थी। इस संकट में लूथर के समर्थक जर्मनी में सेक्सनी के सार्मंत फडे रिक ने उसे वर्टम्वर्ग के दुर्ग में शरण देकर उसकी सुरक्षार् की।

तत्कालीन सार्मार्जिक, धामिक और रार्जनीतिक अव्यवस्थार् क लार्भ उठार्ते हुए लूथर ने चर्च, पोप और सम्रार्ट पंचम की उपेक्षार् की और अपने विचार्रों व सिद्धार्ंतों क खूब प्रचार्र कियार्। शीघ्र ही लूथर क धर्म सुधार्र आंदोलन जर्मनी में लोकप्रिय रार्ष्ट्रीय आंदोलन हो गयार्। सार्ंसार्रिक लोग और स्थार्नीय जर्मन शार्सक जो चर्च की अतुल सम्पित्त हथियार्नार् चार्हत थे और वे जर्मन देशभक्त जो विदेशी पार्दरियों के शोशण के विरूद्ध थे, लूथर के धर्म सुधार्र आंदोलन के समर्थक बन गये। समस्त जर्मनी में लूथरवार्दी सिद्धार्ंतों क प्रसार्र हुआ, अत: चर्च के विरूद्ध विद्रोह हो गयार्, कैथोलिक मठ विध्वंस कर दिये गए, चर्च की सम्पत्ति छीन ली गयी। पोप की रार्जनीतिक, धामिक और अधिक सत्तार् अमार्न्य कर दी गयी।

प्रोटेस्टेंट धर्म क उदय

1526 र्इ. में पवित्र सार्म्रार्ज्य की सभार् की बैठक स्पीयर में हुर्इ, इसमें जर्मनी के शार्सक कैथोलिक और लूथरवार्दी दो दलों में विभक्त हो गये थे। 1529 र्इ. में स्पीयर में ही दूसरी सभार् हुर्इ। इसमें सम्रार्ट चार्ल्र्स पंचम ने कैथोलिक धर्म क प्रबल समर्थन कियार् और नये धर्म सुधार्र आंदोलन के विरूद्ध कर्इ कठोर निर्देश पार्रित किए। इन सभार् में इस एक पक्षीय निर्णयों क सुधार्रवार्दी शार्सकों और समर्थकों ने विरोध कियार्। इस विरोध और प्रतिवार्द के कारण इस धर्म सुधार्र आंदोलन क नार्म प्रोटेस्टेंट पड़ार्। 1530 र्इ. में प्रोटेस्टेंट धर्म के सिद्धार्ंतों को निर्दिश्ट एकीकृत रूप दियार् गयार्। इसमें लूथर के सिद्धार्ंत सम्मिलित कर लिए गए। यूरोप में यह प्रोटेस्टेंट धर्म क उदय थार्।

आम्सवर्ग की संधि (1555 र्इ.)

सम्रार्ट चार्ल्र्स प्रथम ने जर्मनी में आम्सवर्ग में एक सभार् आयार्ेिजत की ओर उसमें प्रोटेस्टेंटों को अपने सिद्धार्तों को प्रस्तुत करने की आज्ञार् दी। फलत: प्रोटेस्टेंटों ने अपने एकीकृत सिद्धार्ंतों को एक दस्तार्वेज के रूप प्रस्तुत कियार्। इस दस्तार्वेज को “आम्सवर्ग की स्वीकृति” कहते हैं, परंतु चार्ल्र्स पंचम ने इसे अमार्न्य कर दियार् और नवीन सुधार्रवार्दी धर्म के दमन क निशचय कियार्। इसक सार्मनार् करने के लिए लूथरवार्दी जर्मन रार्जार्ओं से 1531 र्इ. में शमार्लकाडेन लीग नार्मक सुरक्षार्त्मक संघ बनार्यार्। अब सम्रार्ट चार्ल्र्स पंचम ने प्रोटेस्टंटों क सार्मूहिक नार्श करने क निणर्य लियार्। फलत: जर्मनी में गृह युद्ध प्रार्रंभ हो गयार्। इसे शमार्लकाडेन क युद्ध (1546 र्इ.-1555 र्इ.) कहते हैं। पर कुछ समय बार्द इस गृह युद्ध से त्रस्त होकर सम्रार्ट चार्ल्र्स के उत्तरार्धिकारी फर्डिनेण्ड ने 1555 र्इ. में आम्र्सवर्ग की संधि कर ली। इसकी धार्रार्एँ अधोलिखित थीं –

  1. जर्मनी ने प्रत्येक रार्जार् को (प्रजार् को नहीं) अपनार् और अपनी प्रजार् क धर्म चुनने की स्वतंत्रतार् दी गयी। 
  2. 1552 र्इ. के पूर्व कैथोलिक चर्च की जो धन सम्पित्त प्रोटेस्टेंटों के हार्थों में चली गयी, वह उनकी मार्न ली गयी।
  3. लूथरवार्द के अतिरिक्त अन्य किसी धामिक सम्प्रदार्य को मार्न्यतार् नहीं दी गयी। 
  4. कैथार्ेिलक धर्म के क्षेत्रों में रहने वार्ले लूथरवार्दियों को उनक धर्म परिवर्तन करने के लिए विवश नहीं कियार् जार्येगार्। 
  5. “धामिक रक्षण” की व्यवस्थार् की गयी। इसके अनुसार्र यदि कोर्इ कैथोलिक पार्दरी प्रोटेस्टेंट हो जार्ए तो उसे अपने कैथोलिक पद और उससे संबंधित सभी अधिकारों को त्यार्गनार् होगार्। 

संधि की समीक्षार् 

  1. इस संधि से 1530 र्इ. में लूथरवार्दी संप्रदार्य क जो सैद्धार्ंतिक स्वरूप निर्दिश्ट कियार् गयार् थार् उसे 1555 र्इ. की इस संधि द्वार्रार् सरकारी मार्न्यतार् प्रार्प्त हो गयी। 
  2. जिं वग्लीवार्दी ओर कैल्विनवार्दी जैसे अन्य प्रोटेस्टंट संप्रदार्यों को मार्न्यतार् नहीं मिलने से पुन: धामिक युद्ध (तीस वर्षीय युद्ध) प्रार्रंभ हो गयार् जो वेस्ट फेलियार् की संधि से समार्प्त हुआ। 
  3. 1552 र्इ. के बार्द प्रोटेस्टेंटों ने धर्म परिवर्तन के सार्थ सम्पित्त हस्तार्ंतरण के सिद्धार्ंत पर बल दियार्। इससे कैथार्लिकों और प्रोटेस्टंटों में  झगड़े बढ़। इन दोषो के बार्वजूद भी आम्सवर्ग की संधि ने 1619 र्इ. तक जर्मनी में धामिक व्यवस्थार् बनार्ए रखी।

इंग्लैण्ड में धर्म सुधार्र आंदोलन

हेनरी क उत्तरार्धिकारी एडवर्ड छठार् अवयस्क थार्, इसलिए उसके शार्सनकाल (1547 र्इ.-1553 र्इ.) में उसके संरक्षक ड्यूक ऑफ सार्मरसेट और ड्यूक ऑफ नाबम्बरलैण्ड ने प्रोटेस्टेंट धर्म के सिद्धार्ंतों क प्रचार्र कियार् और इंग्लैण्ड के चर्च को इन सिद्धार्ंतों के आधार्र पर संगठित कियार् तथार् अंगे्रजी भार्षार् में 42 सिद्धार्ंतों वार्ली “सार्मार्न्य प्राथनार् पुस्तक” प्रचलित की। इससे इंग्लैण्ड के चर्च की आरार्धनार् पद्धति में कर्इ परिवर्तन किये गये। इन सब कारणों से अब इंग्लैण्ड क चर्च एंग्लिकन चर्च कहार् जार्ने लगार्। एडवर्ड की मृत्यु के बार्द मेरी ट्यूडर (1553 र्इ.-1558 र्इ.) के शार्सनकाल में कैथोलिक धर्म और पोप की सर्वोपरितार् को पुन: इंग्लैण्ड में प्रतिश्ठित करने के प्रयार्स किये गये और लगभग 300 धर्म सुधार्रको, जिनमें आर्क बिशप क्रेनमर, लेटिमर और रिडल प्रमुख थे, को मृत्यु दंड भी दियार्। किंतु प्रोटेस्टेंट आंदोलन और धर्म प्रचार्र क पुर्णरूपेण दमन नहीं हो सका।

इस प्रकार धर्म सुधार्र आंदोलन के परिणार्मस्वरूप यूरोप में कैथोलिक सम्प्रदार्य के सार्थ-सार्थ लूथर सम्प्रदार्य, कैल्विन सम्प्रदार्य, एंग्लिकन सम्प्रदार्य और प्रेसबिटेरियन संप्रदार्य प्रचलित हो गये। इंग्लैण्ड और यूरोपीय देशों में हुए धर्म सुधार्र आन्दोलनो में अंतर है। यूरोप के देशों में हुआ धर्म सुधार्र आंदोलन पूर्णरूपेण धामिक थार्। इसके विपरीत इंग्लैण्ड क धर्म सुधार्र आंदोलन व्यक्तिगत और रार्जनीतिक थार्। यूरोप में धर्म सुधार्र क प्रार्रंभ धामिक नेतार्ओं ओर उनके बहुसंख्यक अनुयार्यियों ने कियार्। कालार्ंतर में जनतार् ने उसे अपनार् लियार्। प्रार्रंभ में अनेक रार्जार्ओं ने धर्म सुधार्र आंदोलन क विरोध कर उसक दमन कियार्। इसके विपरीत इंग्लैण्ड में रार्जार् हेनरी अश्टम ने धर्म सुधार्र आंदोलन प्रार्रंभ कियार् और उसके उत्तरार्धिकारी एडवर्ड षष्ठम के मंत्रियों ने और रार्नी एजिलार्बेथ ने नवीन धर्म को प्रजार् के लिए अनिवाय कर दियार् और पोप के स्थार्न पर रार्जार् इंग्लैण्ड के चर्च क संरक्षक और सर्वोच्च अधिकारी बन गयार्।

हेनरी अश्टम ने अपनी पत्नी केवरार्इन के तलार्क की अनुमति पोप द्वार्रार् नहीं दिये जार्ने पर पोप क विरोध कियार् और एक्ट ऑफ सुप्रीमेसी पार्रित कर वह इंग्लैण्ड के चर्च क सर्वोच्च अधिकारी हो गयार्। इस प्रकार उसने पोप से संबंध विच्छेद कर लिये और कैथोलिक मठों की धन सम्पित्त भी हथियार् ली। हेनरी अश्टम क उद्दशे य धर्म में सुधार्र नही  थार्। उसने पार्पे से संबंध विच्छेद करने पर भी कैथार्ेिलक धर्म के सिद्धार्तों को बनार्ये रखार्। उसकी सहार्नुभूति न तो लूथरवार्द के प्रति थी और न कैल्विनवार्द के प्रति। उसक विरोध तो केवल पोप से थार्, इसलिए इंग्लैण्ड में उसने पोप की सत्तार् को नष्ट कर दियार्। धर्म सुधार्र क यह कारण व्यक्तिगत थार्। हेनरी अष्टम ने कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों को दंडित कियार्। उसने कैथोलिकों को इसलिए दंडित कियार् कि वे उसे चर्च क प्रमुख और सर्वेसर्वार् नहीं मार्नते थे और प्रोटेस्टेंट ों को इसलिए दंडित कियार् कियार् कि वे कैथार्ेिलक धर्म के सिद्धार्तों को नहीं मार्नते थे। इंग्लैंड में धर्म सुधार्र क प्रसार्र धीरे-धीरे एडवर्ड शष्ठ के शार्सनकाल में प्रार्रंभ हुआ।

धर्म-सुधार्र-विरोधी आंदोलन

धर्म-सुधार्र-विरोधी आंदोलन से अभिप्रार्य

यूरोप में धर्म सुधार्र आंदोलन के कारण नवीन प्रोटेस्टेंट धर्म के प्रसार्र से चिंतित होकर कैथोलिक धर्म के अनुयार्यियों ने कैथोलिक चर्च व पोपशार्ही की शक्ति व अधिकारों को सुरक्षित करने और उनकी सत्तार् को पुन: सुदृढ़ बनार्ने के लिए कैथोलिक चर्च और पोपशार्ही में अनके सुधार्र किये। यह सुधार्र आंदोलन, कैथोलिकों की दृष्टि से उनके पुनरुत्थार्न क आंदोलन है और प्रोटेस्टेंट विरोधी होने से इसे धर्म-सुधार्र-विरोधी आंदोलन, यार् प्रतिवार्दी अथवार् प्रतिवार्दार्त्मक धर्म-सुधार्र आंदोलन कहार् गयार्। यह आंदोलन सोलहवीं सदी के मध्यार्न्ह से प्रार्रंभ हुआ। इस धर्म-सुधार्र-विरोधी आंदोलन क उद्देशय कैथार्ेिलक चर्च में पवित्रतार् और ऊँचे आदर्शों को स्थार्पित करनार् थार्, चर्च ओर पार्पे शार्ही में व्यार्प्त दोषो को दूर कर उसके स्वरूप को पवित्र बनार्नार् थार्। इस युग के नये पोप जैसे पॉल तृतीय, पॉल चतुर्थ, पार्यस चतुर्थ, पार्यस पंचम आदि पूर्व पोपों की अपेक्षार् अधिक सदार्चार्री, धर्मनिश्ठ, कर्तव्यपरार्यण और सुधार्रवार्दी थे। इनके प्रयार्सों से कैथोलिक धर्म में नवीन शक्ति, स्फूर्ति और पे्ररणार् आर्इ और कर्इ सुधार्र किये गये।

धर्म-सुधार्र-विरोधी आंदोलन क प्रयार्स और सार्धन

टे्रन्ट की धर्म सभार्एँ (1545 र्इ.-1565 र्इ.) दिसम्बर 1545 र्इ. में लूथर के दहेार्ंत के कुछ ही समय पहले जर्मनी में सम्रार्ट चार्ल्र्स पंचम ने एक धर्म सभार् आयार्ेि जत की जिससे कि यूरोप के सम्रार्ट चर्च में सुधार्र कर सकं।े इस सभार् की बठै कें 1545 र्इ. से 1565 र्इ. की अवधि में आयोजित होती रही। इनमें कैथोलिकों की प्रधार्नतार् थी और उनक अध्यक्ष भी कैथोलिक ही थार्। इन सभार्ओं में सुधार्र के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेकर उनको कार्यार्न्वित कियार् गयार्।

  1. कैथार्ेिलक चर्च क प्रधार्न पार्पे है। धामिक विशयों में उसके निर्मार्ण को अंतिम और श्रेश्ठ मार्नार् गयार्। 
  2. चर्च के विभिन्न पदों की बिक्री निशिद्ध कर दी गयी। योग्यतार् के आधार्र नर्इ नियुक्तियार्ँ की जार्एँ।
  3.  पार्दरियों बिशपों के प्रशिक्षण की व्यवस्थार् की गयी। उनको तथार् चर्च के धर्मार्धिकारियार्ं े को निर्देश दिए गए कि वे सार्ंसार्रिक भोग-विलार्सितार्ओं को त्यार्ग कर, अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में रहें और कर्तव्यों क समुचित पार्लन करें उनके जीवन को पवित्र, सदार्चार्री, अनुशार्सन युक्त तथार् क्रियार्शील बनार्ने के लिए विभिन्न नियम बनार्ये गये। 
  4. जन सार्धार्रण की भार्षार् में धामिक उपदेश दिये जार्एँ। 
  5. पार्प मोचन पत्रों यार् क्षमार् पत्रों क दुरुपयार्गे समार्प्त कर दियार् गयार्। 
  6. कैथोलिकों के लिए एक सी आरार्धनार् पद्धति व प्राथनार्-पुस्तक निर्धार्रित की गयी। 
  7. उन पुस्तकों को जिनमें प्रार्टेस्टेंट धर्म के सिद्धार्तों क निरूपण थार्, निशिद्ध कर दियार् गयार्। 
  8. कैथोलिक धर्म के सिद्धार्ंतों को अधिक स्पश्ट और सुदृढ़ कियार् गयार्। 
  9. लूथर क प्रतिपार्दित “श्रद्धार् समन्वित सिद्धार्ंत” असत्य और अमार्न्य घोशित कियार् गयार्। लूथर क यह मन कि केवल धामिक श्रद्धार् से ही पार्पी मुक्ति पार् सकतार् है गलत बतार्यार् गयार्। मुक्ति के लिए धामिक श्रद्धार्, सद्कार्य और पुण्य कर्म दोनों की आवश्यकतार् पर बल दियार् गयार्। “सप्त संस्कारों” की उत्पित्त र्इसार् से बतार् कर उसकी अनिवायतार् को बतलार्यार् गयार्। “लार्स्ट सपर” के सिद्धार्ंत की पुश्टि की गयी। 
  10. लेटिन भार्षार् में लिखी बार्इबल ही मार्न्य की गयी। मठो, गिरजार्घरों और पार्ठशार्लार्ओं में सर्वमार्न्य बार्इबल पढ़ार्ने की व्यवस्थार् की गयी।

इस प्रकार ट्रेन्ट की धर्म सभार्ओं के कार्य दो प्रकार के थे – सैद्धार्ंतिक और सुधार्रार्त्मक। सैद्धार्ंतिक दृष्टि से कैथोलिक धर्म के सिद्धार्ंतों को अधिक स्पश्ट कियार् गयार् तथार् उसकी मार्न्यतार्ओं को पुन: पुश्ट कियार् गयार्। सुधार्र की दृष्टि से चर्च में नैतिकतार्, शुद्धतार्, पवित्रतार्, अनुशार्सन, धर्मपरार्यणतार् आदि की स्थार्पनार् की गर्इ। ट्रेन्ट की धर्म सभार्ओं के परिणार्मस्वरूप कैथार्ेिलक सम्प्रदार्य के संगठन में उच्च श्रेश्ठ आदशर् और अनुशार्सन स्थार्पित हो गये।

इगनेशियस लार्यलार् (1491 र्इ.-1556 र्इ.)

कैथार्ेिलक धर्म में सुधार्र के लिए धर्म सभार्ओं के प्रस्तार्व ओर निर्णयों पर्यार्प्त नहीं थे, उन्हें कार्यार्न्वित करने के लिए धामिक संगठनों की आवश्यकतार् थी, एसे स्वयं सेवकों की आवश्यकतार् थी जो विभिन्न स्थार्नों क भ्रमण कर कैथोलिक धर्म की ज्योति पुन: प्रज्जवलित करने और कैथोलिक धर्म के सिद्धार्तों क अनेक कश्टों को सहन करते हुए प्रचार्र करते। फलत: सोलहवीं सदी के उत्तराद्ध में एसे अनेक धामिक संघ बन गये। इनमें जेसुइट संघ और उसक संस्थार्पक इगनेशियस लार्यलार् विशेश प्रसिद्ध है।

इगनेशियस लार्यलार् स्पेन क एक सैनिक थार् जो सन 1521 में नवार्र के युद्ध में घार्यल होकर सदार् के लिए लगड़ार् हो गयार् थार्। उसके विचार्रों और मार्नसिक प्रवृित्तयों में परिवर्तन हुआ। उसने र्इसार्मसीह क सैनिक बनकर चर्च की सेवार् करने क निशचय कियार्। उसने कैथोलिक भिक्षु के वस्त्र धार्रण कर लिये और ज्ञार्न संचय के लिए सार्त वर्ष तक पेरिस विशव-विद्यार्लय में सार्हित्य, दशर्न शार्स्त्र और धर्म-शार्स्त्रों क गहन अध्ययन कियार्। यहीं एक दिन उसने सेन्टमेरी के गिरजार्घर में अपने सार्थियों सहित एकत्र होकर जीसस संघ स्थार्पित कियार्। इसक उद्देशय कैथोलिक चर्च और र्इसाइ धर्म की सेवार् करनार्, कैथोलिक धर्म क प्रचार्र करनार् तथार् अपरिग्रह, बह्यचर्य और पवित्रतार् से जीवन व्यतीत करनार् थार्।

जीसस संघ के कार्य और उपलब्धियार्ँ

इगनेशियस लार्यलार् और उसके सार्थी फ्रार्ंसिस जेवियर की श्रद्धार्, भक्ति और निस्वाथ सेवार् से प्रभार्वित होकर पोप पार्ल तृतीय ने 1540 र्इ. में इस जेसुइट संघ को स्वीकृति पत्र देकर इसे कैथोलिक चर्च के सक्रिय संघ और कार्यकर्तार्ओं में मार्न लियार्।

इस संघ क स्वरूप सैनिक थार्। इसक प्रमुख यार् अघ्यक्ष “जनरल” कहार् जार्तार् थार्। वह जीवन भर के लिए इस पद पर नियुक्त होतार् थार्। इसके सदस्य निस्वाथ सेवक थे। उनको अपने उच्च अधिकारियों के आदेशों क बड़ी कठार्रे तार् से पार्लन करनार् पड़तार् थार्। उन्होंने कर्इ शिक्षण संस्थार्एँ स्थार्पित की जहार्ँ नि:शुल्क शिक्षार् दी जार्ती थी। उन्होने सेवार्, दार्न, लार्के हितैशी कार्य, चिकित्सार् सेवार् कार्य धर्मोपदेश आदि के द्वार्रार् कैथोलिक कार्य और चर्च की खूब उन्नति की। उन्होंने चीन भार्रत, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, जार्पार्न, ब्रार्जील, पैरार्गुए जैसे गैर-र्इसाइ देशों में जार्कर भी कैथार्ेिलक धर्म क खूब प्रचार्र कियार्। अकबर के शार्सनकाल में जैसुइट पार्दरी धर्म प्रचार्र के लिए भार्रत आये थे। फ्रार्ंसिस जेवियर तो अकबर के दरबार्र में थार्। वे कट्टर और धर्मार्ंध थे। जेसुइट पार्दरियों के परिणार्मस्वरूप सत्रहवीं सदी के मध्य तक इटली, फ्रार्सं , स्पने , पोलैंड, नीदरलैण्ड, दक्षिणी जर्मनी, हगंरी आदि देशों में कैथोलिक धर्म पुन: प्रतिश्ठित हो गयार्।

जेसुइट धर्मार्धिकारियों ने इंग्लैण्ड में भी कैथार्ेिलक धर्म क प्रचार्र कियार्। उन्होने इंग्लैण्ड की रार्नी एलिजार्बेथ को कैथोलिक बनार्ने के कर्इ प्रयार्स किये किंतु असफल रहे।

इन्क्वीजिशन (धामिक न्यार्यार्लय)

प्रोटेस्टेंट धर्म की प्रगति को अवरूद्ध करने के लिए इन्क्वीजिशन नार्मक धामिक न्यार्यार्लय विभिन्न देशों में स्थार्पित किये गय।े इनकी स्थार्पनार् ओर गतिविधियों में जेसुइट पार्दरियों और धर्मार्धिकारियों क सबसे अधिक हार्थ रहार्।

इस विशिश्ट धामिक न्यार्यार्लय को 1552 र्इ. में पोप पॉल तृतीय ने रोम में पुनर्जीवित कियार्। यह न्यार्यार्लय सर्वोच्च अधिकारों युक्त थार्। नार्स्तिकों को ढूँढ निकालने, उनको कठोरतम दंड देने, कैथार्ेिलक चर्च के सिद्धार्तों को बलपूर्वक लार्गू करने, कैथार्ेिलक धर्म के विरोधियों को निर्ममतार् से कुचलने के लिए, दूसरे देशों से धर्म के मुकदमों में अपीलें सुनने आदि के कार्य यह न्यार्यार्लय करतार् थार्। प्रोटेस्टेंटों के विरूद्ध इस न्यार्यार्लय ने कठोरतम उपार्य किये। इस न्यार्यार्लय में बड़ी संख्यार् में मृत्यु दण्ड और जीवित जलार् देने की सजार्एँ भी दी। इससे कालार्तं र में यह न्यार्यार्लय कुख्यार्त हो गयार्।

धामिक आंदोलनों क प्रभार्व

  1. सोलहवीं सदी के प्रार्रंभ से लेकर सत्रहवीं सदी के मध्यार्न्ह तक यूरोप में जो धर्म सुधार्र आंदोलन और प्रतिवार्दी धर्म सुधार्र आंदोलन और संघर्श हुए- उसके परिणार्मस्वरूप यूरोप क र्इसाइ जगत दो प्रमुख भार्गों में विभक्त हो गयार्-कैथार्ेिलक और प्रोटेस्टेंट। अब कैथार्ेिलक धर्म के अंतगर्त यूरोप में इटली, स्पेन, पुर्तगार्ल, बेलजियम, स्विटजरलैण्ड, दक्षिणी जर्मनी, आयरलैण्ड, पोलैण्ड, लिथुनियार्, बोहेमियार्, उत्तरी यूगोस्लार्वियार्, हंगरी तथार् यूरोप से बार्हर पश्चिमी द्वीप समूह तथार् मध्य व दक्षिण अमेरिक थे। प्रोटेस्टेंट धर्म के अंतर्गत उत्तरी और मध्य जर्मनी, डेनमाक, नार्रवे, स्वीडन, फिनलैण्ड, एस्टोनियार्, लेटवियार्, उत्तरी नीदरलैण्ड (हार्लैण्ड), स्काटलैण्ड व स्विटजरलैण्ड के क्षत्रे थे। दूसरे शब्दों में उत्तरी  ओर पूर्वी यूरोप प्रोटेस्टेंट हो गयार् और दक्षिणी तथार् पश्चिमी यूरोप केथोलिक बनार् रहार्। 
  2. धामिक आंदोलनों के फलस्वरूप यूरोप में रार्श्ट्रों और सुदृढ़ रार्जतन्त्रो क विकास हुआ। अपने अधिकारों की वृद्धि करने और अपने रार्श्ट्र व रार्ज्य को सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने धामिक आंदोलनों में सक्रिय भार्ग लियार्। एक ओर कैथार्ेिलक धर्मार्वलंबी रार्जार्ओं ने कैथार्ेिलक धर्म क और दूसरी ओर प्रोटेस्टेंट रार्जार्ओं ने प्रोटेस्टेंट धर्म क समर्थन कियार्। उन्होंने चर्च के सहयोग से धामिक एकतार् स्थार्पित कर अपने-अपने रार्ज्य में सुदृढ़ रार्जतंत्र और रार्ष्ट्रीय एकतार् स्थार्पित की। 1517 र्इ. से 1646 र्इ. तक यूरोप क रार्जनीतिक क्षेत्र धर्म से पूर्ण प्रभार्वित थार्। 
  3. धामिक आंदोलनों के फलस्वरूप यूरोप के विभिन्न देशों में रार्ष्ट्रीय भार्वनार् क उदय और विकास हुआ। र्इसाइ धर्म क रार्ष्ट्रीयकरण हो गयार्। केथोलिक चर्च और पोपशार्ही के विरूद्ध आंदोलन को रार्ष्ट्रीयतार् की अभिव्यक्ति मार्नार् गयार्। प्रार्टेेस्टेंटवार्द क समीकरण रार्श्ट्रवार्द में हो गयार्। लूथरवार्द ने जर्मन रार्ष्ट्रीयतार्, कैल्विनवार्द ने डच और स्काटिश रार्ष्ट्रीयतार् और एंग्लिकन चर्च ने ब्रिटिश रार्ष्ट्रीयतार् क विकास कियार्। इसी प्रकार अन्य देशों में भी केथोलिक चर्च क स्वरूप रार्ष्ट्रीय हो गयार्।
  4. धर्म सुधार्रों से जन जार्गृति और स्वतंत्र वार्तार्वरण निर्मित हुआ ओर स्वतंत्र विचार्रों की अभिव्यक्ति हुर्इ तथार् मनन-चितंन की प्रवृित्त अधिक बलवती हुर्इ। जेसुइट पार्दरियों और धर्म प्रचार्रकों ने शिक्षार् को धर्म की उन्नति क सार्धन मार्नकर शिक्षार् की प्रगति और प्रसार्र की ओर विशेश ध्यार्न दियार्। न केवल जेसुइटों ने, अपितु लूथर और कैल्विन के अनुयार्यियों ने भी शिक्षार् के प्रसार्र और विकास पर अधिकाधिक बल दियार्। कैल्विन ने तो जेनेवार् को प्रोटेस्टेंट जगत क ज्ञार्न-विज्ञार्न क केन्द्र बनार् दियार् थार्। 
  5. धामिक आंदोलनों के परिणार्मस्वरूप र्इसाइयों क नैतिक जीवन अधिक उन्नत हो गयार्। विभिन्न र्इसाइ सम्प्रदार्यों में व्यार्वहार्रिक नैतिक, चार्रित्रिक पवित्रतार्, आचरण की श्रेश्ठतार्, सरल और संयमी जीवन प्रणार्ली पर अधिकाधिक बल दियार् जार्ने लगार्।

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