धर्म की अवधार्रणार्, विशेषतार्एं एवं धर्म की उत्पत्ति के सिद्धार्न्त

धृति क्षमार् दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह।

धी विद्यार् सत्यमक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम्।

धर्म के दस लक्षण धृति, क्षमार्, दम, स्तेय, शुचितार्, इन्द्रिय निग्रह, धीर, विज्ञार् (ज्ञार्न), सत्य, अक्रोध (भार्वनार्त्मक असंतुलन) है।

अंग्रेजी में ‘रिलीजन’ शब्द की उत्पति लैटिन के दो शब्दों से हुयी – री और लीगर । इसक अर्थ है टू बार्इन्ड बैक’’ अर्थार्त् ‘‘सम्बन्ध स्थार्पित करनार्’’। इस प्रकार, धर्म वह है जो सम्बन्ध स्थार्पित करतार् है। गिस्बर्ट ने लिखार् है- ‘‘धर्म दोहरार् सम्बन्ध स्थार्पित करतार् है: पहलार् मनुष्य और र्इश्वर के बीच दूसरार् – र्इश्वर की संतार्न होने के कारण मनुष्य और मनुष्य के बीच’’। धर्म के दो पक्ष आन्तरिक पक्ष में र्इश्वर से सम्बन्धित मनुष्य के विचार्र, विश्वार्स और भार्वनार्यें आती है। बार्ºय पक्ष में प्राथनार्यें और धामिक रीति रिवार्ज आते है। डार्सन ने स्पष्ट कियार् है -’’जब कभी और जहॉ कही मनुष्य ऐसी बार्ºय शक्तियो पर निर्भरतार् अनुभव करतार् है, जो रहस्यपूर्ण और मनुष्य की शक्तियों से कही अधिक उच्चतम मार्नी जार्ती है वही धर्म होतार् है।’’ गिस्बर्ट के अनुसार्र – ’’धर्म र्इश्वर यार् सेवार्ओं के प्रति उसके उपर मनुष्य अपने को निर्भर अनुभव करतार् है, गतिशील, विश्वार्स एवं आत्म समर्पण है।

भार्वनार् के रूप में धर्म – 

धर्म क पोषण मनुष्य की भार्वनार्ओं से होतार् है। हार्किंग ने धर्म की ‘‘वह अन्तभार्विनार् यार् प्रकृति कहार् है जो अतं: प्रेरणार् के सार्थ होती है। ‘‘ सार्लोमन रीनार्स ने लिखार् है कि-’’धर्म इच्छार्ओं क योग है जो हमार्री बौद्धिक शक्तियों के स्वतंत्र प्रयोग में बार्धार् डार्लती है।’’ जबकी फ्रार्यड ने कहार् है – ‘‘धर्म को मार्नवतार् की दबी हुर्इ भार्वनार्ओं से प्रेरित विश्वव्यार्पी मार्नस विकार मार्नार् जार्नार् चार्हिये।’’ भार्वनार् ने ही धर्म में कट्टरतार् उत्पन्न की जो वर्तमार्न में विश्व समार्ज के समक्ष अनसुलझी उलझन है और इसने कर्इ बार्र विश्व की मार्नव जार्ती को संकट में डार्लार् ।

धर्म एक संस्थार् के रूप में –

धर्म को एक सस्ंथार् के रूप में भी देखार् जार् सकतार् है क्योंकि इसक निर्मार्ण सम्वेत रूप से समार्ज ने ही कियार् है और उनके वैचार्रिक भार्वनार्त्मक, परम्परार्त्मक एवं व्यवहार्रार्त्मक एकतार् पाइ जार्ती है जिसक पार्लन उस धर्म के मार्नने वार्ले यार् संस्थार् के सदस्य करते है। धर्म को सदैव व्यार्पक अर्थ में स्वीकार करनार् चार्हिए क्योंकि वह मार्नवतार् के प्रति व्यक्तिगण और सार्मार्जिक, नैतिक, आध्यार्त्मिक तथार् सार्ंसार्रिक लौेकिक तथार् पार्रलौकिक दोनों रूपों में विभिन्न कर्तव्यों के पार्लन में होतार् है। धर्म को धार्रण कर व्यक्ति क अस्तित्व एवं व्यक्तित्व दोंनों पुरार् हों जार्तार् है। धर्म जीवन के प्रति सर्वव्यार्पक सर्वदेशीय, सर्वकालिक दृष्टिकोणबनार्तार् है। ग्रैण्डमार्इसन लिखते है कि –‘धर्म व्यक्तित्व और सार्मार्जिक विश्वार्सों, स्थार्यी भार्वों और अभ्यार्सों क कुल योग है, जिसक अपनार् एक उदेश्य होतार् है, एक शक्ति जिसे मनुष्य सबसे बडाऱ् मार्नतार् है, जिस पर निर्भर रहतार् है और जिसके सार्थ वह संम्बन्ध स्थार्पित कर सकतार् है अथवार् सम्बन्ध स्थपित कर लियार् है।’’

धर्म के मुख्य विशेषतार्एँ

1. अलौकिक शक्ति में विश्वार्स

धर्म क संबंध अनेक ऐसे विश्वार्सों से है जो किसी अलौकिक शक्ति से संबंधित होते हैं। इस अलौकिक शक्ति को कुछ समूह सार्कार रूप में देखते हैं, जबकि कुछ समूहों में इस शक्ति क रूप निरार्कार मार्नार् जार्तार् है। व्यक्ति यह विश्वार्स करते हैं कि यह अलौकिक शक्ति ही उन्हें जीवन में विभिन्न प्रकार के सुख-दुख, लार्भ-हार्नि अथवार् सफलतार्एँ और असफलतार्एँ देती है।

2. एक सैधार्न्तिक व्यवस्थार्

धर्म में केवल विश्वार्सों क ही समार्वेश नहीं होतार् बल्कि इन विश्वार्सों को अनेक सिद्धार्न्तों के रूप में इस तरह विकसित कियार् जार्तार् है जिससे अलौकिक शक्ति के प्रति व्यक्ति के विश्वार्स अधिक दृढ़ बन सकें। यही सिद्धार्न्त ‘धामिक वैचार्रिकी’ क आधार्र होते हैं।

3. धामिक क्रियार्ओं व कर्मकाण्डों क समार्वेश 

प्रत्येक धर्म में पूजार्-आरार्धनार् की विभिन्न पद्धतियों, पवित्र आचरणों और तरह-तरह के कर्मकाण्डों क समार्वेश होतार् है। व्यक्तियों क यह विश्वार्स होतार् है कि इन क्रियार्ओं और कर्मकाण्डों के द्वार्रार् ही अलौकिक शक्ति को प्रसन्न करके इच्छित फल प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। र्इश्वर की आरार्धनार्, आत्म-संयम, तीर्थ-यार्त्रार्एँ, पवित्र कार्य, त्यार्गमय जीवन तथार् संस्कारों की पूर्ति धामिक क्रियार्ओं और कर्मकाण्डों के ही विभिन्न रूप हैं।

4. प्रतीक व पौरार्णिक गार्थार्एँ 

सभी धर्मों में धामिक विश्वार्सों को कुछ प्रतीकों के द्वार्रार् स्पष्ट कियार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए, हिन्दू धर्म में मूर्ति अलौकिक शक्ति क प्रतीक है, जबकि र्इसाइ धर्म में ‘क्रार्स’ र्इसार् मसीह के आश्र्ार्ीवार्द क प्रतीक है। रार्मार्यण, बार्इबिल तथार् कुरार्न आदि र्इश्वरीय ज्ञार्न के प्रतीक हैं। रेशमी वस्त्र पवित्रतार् के सूचक हैं, जबकि फूल और धूपबत्ती आध्यार्त्मिक सुगन्ध के प्रतीक हैं। पौरार्णिक गार्थार्एँ अनेक कहार्नियों के रूप में मनुष्य और अलौकिक शक्ति के संबंध को स्पष्ट करती हैं।

5. उद्वेगपूर्ण अभिव्यक्त

धर्म से संबंधित विश्वार्सों को लोग अनेक उद्वेगपूर्ण व्यवहार्रों के रूप में अभिव्यक्त करते हैं। भार्व-विºवल होकर प्राथनार् और नृत्य करनार्, शार्रीरिक कष्ट के सार्थ अलौकिक शक्ति में अपनी श्रद्धार् दिखार्नार्, किसी धामिक त्रुटि के लिए बड़े-बड़े प्रार्यश्चित करनार् तथार् अलौकिक शक्ति के प्रति भय की भार्वनार् को विकसित करनार् उद्वेगपूर्ण अभिव्यक्ति के ही उदार्हरण हैं। ऐसे व्यवहार्रों क बुद्धि और तर्क से कोर्इ संबंध नहीं होतार्।

धामिक क्रियार्एँ

विभिन्न धर्मों के मौलिक सिद्धार्न्तों के अध्ययन से यह पतार् चलतार् है कि इनमें से हर धर्म में अलौकिक, सर्वशक्तिमार्न शक्ति पर विश्वार्स निहित होतार् है। सार्थ ही इसी शक्ति को प्रसन्न करके लार्भ उठार्ने तथार् उसके कोप से बचने के लिए विभिन्न सार्धनों क विधार्न होतार् है। इन्हीं सार्धनों को धामिक क्रियार्ओं की संज्ञार् दी जार् सकती है। ये धामिक क्रियार्एँ मुख्यत: निम्नलिखित होती हैं-

1. प्राथनार्

धामिक क्रियार् के रूप में प्राथनार् क स्थार्न लगभग प्रत्येक धर्म में ही सदार् से महत्वपूर्ण रहार् है। सभ्यतार् के उच्च स्तर पर प्राथनार् धामिक क्रियार् क प्रधार्न अंग बन जार्ती है। प्राथनार् अलौकिक शक्ति को प्रसन्न करके उसकी कृपार्-दृष्टि प्रार्प्त करने, उसके कोपों से बचने, अपरार्धों के लिए क्षमार्-भिक्षार् चार्हने तथार् भौतिक सुख, समृद्धि यार् सफलतार् को प्रार्प्त करने के लिए की जार्ती है।

2. समार्धि

ध्यार्नमग्न होकर उस अलौकिक शक्ति क चिन्तन करनार्, प्रार्णार्यार्म करनार्, समार्धि लगार्नार्, योग सार्धनार् इत्यार्दि क्रियार्एँ इस श्रेणी में आती हैं। इन क्रियार्ओं क मुख्य उद्देश्य अलौकिक शक्ति क दर्शन पार्नार् और उस अनार्दि शक्ति में ही लीन होने क प्रयत्न करनार् आदि होतार् है। भार्रत क धामिक इतिहार्स इस प्रकार की क्रियार्ओं के उदार्हरणों से भरपूर है। अक्सर यह देखार् जार्तार् है कि मन्दिरों, मस्जिदों यार् गिरजार्घरों आदि में अनेक व्यक्ति एकत्रित होकर सार्मूहिक रूप से पूजार्-पार्ठ, कीर्तन, प्राथनार्, आरार्धनार् आदि करते हैं। बहुत दिनों तब जब एक सार्मूहिक धामिक क्रियार् को बार्र-बार्र दोहरार्यार् जार्तार् है तो वह एक धर्म विशेष क अंग बन जार्ती है। इसलिए हम यह पार्ते हैं कि इस्लार्म धर्म को मार्नने वार्ले एकसार्थ इकट्ठे होकर नमार्ज़ पढ़ते हैं तथार् र्इसाइ लोग चर्च में सार्मूहिक प्राथनार् में सम्मिलित होते हैं।

3. सार्मूहिक क्रियार्ए

प्रत्येक धर्म में उचित और अनुचित आचरण के संबंध में निश्चित निर्देशन तथार् मार्पदण्ड होते हैं। प्रार्य: प्रत्येक धर्म उन क्रियार्ओं को अनुचित ठहरार्तार् है जो समार्ज तथार् र्इश्वर के विरुद्ध होती हैं। कोर्इ भी धर्म चोरी करने, झूठ बोलने, लार्लच करने, नार्स्तिक बनने आदि को पुण्य कार्यों के अन्तर्गत सम्मिलित नहीं करतार्; सदार्चार्र, र्इमार्नदार्री, निष्कपट आचरण आदि पर अत्यधिक बल देतार् है, और कुछ ऐसे आचरण अनुकरणीय मार्नतार् है जिनके पार्लन की ओर विशेष रूप से ध्यार्न दियार् जार्तार् है। दूसरी ओर, कुछ ऐसे निषिद्ध कार्य भी होते हैं जिनके करने पर धर्म में दण्ड तक क विधार्न होतार् है।

4. बलि

धर्म के इतिहार्स से अनेक प्रकार की बलियों के विषय में भी पतार् चलतार् है। इन बलियों को प्रमुख रूप से दो श्रेणियों में रखार् जार् सकतार् है- सम्मार्नार्त्मक बलि तथार् पार्पनार्शार्त्मक बलि। जब अलौकिक शक्ति को प्रसन्न करने के लिए उसके सम्मार्न में कोर्इ वस्तु भेंट की जार्ती है तो उसे ‘सम्मार्नार्त्मक बलि’ कहते हैं। प्रसार्द चढ़ार्नार्, भोग लगार्नार्, अन्न-वस्त्र आदि भेंट करनार् ‘सम्मार्नार्त्मक’ बलि के अन्तर्गत आतार् है। इसके विपरीत जब अपने किसी पार्प क प्रार्यश्चित करने यार् अलौकिक शक्ति के रोष को शार्न्त करने के लिए किसी पशु, पक्षी अथवार् प्रार्णी की बलि दी जार्ती है, तो उसे ‘पार्पनार्शार्त्मक बलि’ कहते हैं। इस संबंध में यह स्मरणीय है कि इस प्रकार की बलि चढ़ार्ने की प्रथार् सभ्यतार् के विकास के सार्थ-सार्थ कम होती जार् रही है।

5. तार्न्त्रिक क्रियार्ए

तार्न्त्रिक क्रियार्ओं द्वार्रार् मनुष्य को कष्ट देने वार्ले यार् उसक अनिष्ट करने वार्ले देवी-देवतार्ओं तथार् प्रेतों को वश में करने क प्रयत्न कियार् जार्तार् है। प्रार्चीन काल में इन क्रियार्ओं क काफी प्रचलन थार्। इनमें जार्दू-टोनों और टोटकों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। मन्त्रों द्वार्रार् बीमार्री ठीक करनार्, पार्नी बरसनार् तथार् शत्रु को नुकसार्न पहुँचार्नार्, और तार्वीज़ यार् तार्न्त्रिक अंगूठी द्वार्रार् सन्तार्न दिलार् देनार् आदि तार्न्त्रिक क्रियार्ओं की ही विभिन्न अभिव्यक्तियार्ँ हैं।

धर्म की उत्पत्ति  के सिद्धार्न्त

मार्नव-समार्ज में धर्म की उत्पत्ति कैसे हुर्इ, इस संबंध में विद्वार्नों के अपने पृथक्-पृथक् विचार्र हैं। विकासवार्दी लेखकों के अनुसार्र आधुनिक सभ्य समार्ज जनजार्तीय यार् आदिकालीन समार्जों क ही क्रमिक विकसित रूप है, इस कारण धर्म की उत्पत्ति भी सर्वप्रथम जनजार्तीय समार्जों में हुर्इ होगी। अत: अनेक विद्वार्न जनजार्तियों के जीवन क विश्लेषण करके धर्म की उत्पत्ति और उसके प्रार्रम्भिक रूप को खोजने क प्रयत्न करते हैं। धर्म की उत्पत्ति के
  कुछ सिद्धार्न्त इस तथ्य को और भी स्पष्ट कर देंगे-

1. टार्यलर क आत्मवार्द

टार्यलर के अनुसार्र, ‘‘आत्मार् की धार्रणार् ही आदिम मनुष्यों से लेकर सभ्य मनुष्यों तक के धर्म के दर्शन क आधार्र है।’’ यह आत्मार्वार्द दो वृहत् विश्वार्सों में विभार्जित है- प्रथम तो यह है कि मनुष्य की आत्मार् क अस्तित्व मृत्यु यार् शरीर के नष्ट होने के पश्चार्त् भी बनार् रहतार् है और द्वितीय यह है कि मनुष्यों की आत्मार्ओं के अतिरिक्त शक्तिशार्ली देवतार्ओं की अन्य आत्मार्एँ भी होती हैं। टार्यलर के अनुसार्र आत्मार्एँ प्रेतार्त्मार्ओं से लेकर शक्तिशार्ली देवतार्ओं की श्रेणी तक की होती हैं। ये पार्रलौकिक आत्मार्एँ केवल अमर ही नहीं हैं, वरन् वे इस भौतिक संसार्र की सभी घटनार्ओं तथार् मनुष्यों के जीवन की दिशार् को भी नियन्त्रित व निर्देशित करती हैं। इसके अतिरिक्त, इन आत्मार्ओं को प्रसन्न रखने से मनुष्य को लार्भ और इसके अप्रसन्न होने पर हार्नि हो सकती है। इसीलिए इनकी विनती यार् आरार्धनार् करनार् आवश्यक है, जिससे वे हमार्रार् अनिष्ट न करें। इसी विश्वार्स को लेकर आदिम मनुष्यों ने पितरों आदि की विनती और आरार्धनार् प्रार्रम्भ की, और यही आगे चलकर धर्म के रूप में विकसित हुर्इ।

2. मैक्स मूलर का प्रकृतिवार्द

मैक्स मूलर के अनुसार्र प्रकृति के विभिन्न रूपों को देखकर आदिकाल में मार्नव के मन में भय, आतंक, आश्चर्य आदि होनार् स्वार्भार्विक ही थार्। इन मार्नसिक भार्वनार्ओं के कारण वह प्रकृति से ऐसे डरने लगार्, जैसे किसी प्रार्णी से डरतार् हो और इसीलिए उसके प्रति उनके दिल में श्रद्धार्, भक्ति आदि की भार्वनार्एँ आर्इं। इसी के आधार्र पर संस्कृति और भार्षार्शार्स्त्र के प्रसिद्ध विद्वार्न् मैक्स मूलर ने यह निष्कर्ष निकालार् कि धर्म की उत्पत्ति क प्रथम चरण प्रकृति के विभिन्न पदाथों जैसे सूर्य, चन्द्रमार्, अग्नि, वार्यु आदि की आरार्धनार् थी। मिस्र में तथार् अन्यत्र हुर्इ खुदार्इयों से इस विचार्र को पुष्टि मिली। मिस्र में सबसे बड़ार् देवतार् ‘रार्’ अर्थार्त् सूर्य थार्। यह कहार् जार्तार् है कि प्रकृति के विभिन्न पदाथों को सजीव समझनार् और उनके प्रति श्रद्धार्, प्रेम यार् भय की भार्वनार् क जन्म दोषपूर्ण भार्षार् के कारण हुआ। प्रार्य: यह कहार् जार्तार् है कि सूर्य उदय यार् अस्त होतार् है’, ‘आँधी चल रही है’, इत्यार्दि। परन्तु वार्स्तव में सूर्य न तो उदय ही होतार् है और न अस्त ही होतार् है। कुछ भी हो, आदि मार्नव प्रकृति की इस विशार्लतार् के सम्मुख नतमस्तक होतार् है और धर्म की प्रथम नींव पड़ती है।

3. फ्रेज़र क सिद्धार्न्त

फ्रेज़र के मतार्नुसार्र सर्वप्रथम आदिम मनुष्यों ने जार्दू-टोने (magic) के द्वार्रार् प्रकृति पर नियन्त्रण करके अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने क प्रयत्न कियार् और असफल होने पर यह मार्न लियार् कि ‘संसार्र’ में उनसे भी कोर्इ अधिक शक्तिशार्ली है जो उनके प्रयत्नों को व्यर्थ करतार् है और इस कारण उस शक्ति पर जार्दू-टोने के द्वार्रार् शार्सन करनार् कदार्पि सम्भव नहीं। इस धार्रणार् के फलस्वरूप ही वह उस शक्ति पर शार्सन करने की इच्छार् त्यार्गकर उसकी आरार्धनार् करने लगार् और इसी से धर्म की उत्पत्ति हुर्इ। संक्षेप में, फ्रेज़र के अनुसार्र धर्म की प्रार्थमिक अवस्थार् (initial primacy) जार्दू-टोनार् थार्। जार्दू-टोने से निरार्श होकर ही लोगों ने धर्म की शरण ली थी। इस प्रकार धर्म प्रकृति के द्वार्रार् परार्जित मनोवृत्ति क ही परिणार्म है।

4. दुर्खीम क सिद्धार्न्त

दुर्खीम ने अनेक विद्वार्नों की कमियों क उल्लेख करते हुए धर्म की उत्पत्ति के संबंध में एक सम्पूर्ण सार्मार्जिक व्यार्ख्यार् को प्रस्तुत कियार्। आपके अनुसार्र ‘समार्ज’ ही धर्म की उत्पत्ति क मूल कारण है। धर्म ‘समार्ज’ की ही प्रतिछार्यार् है।

दुर्खीम के मतार्नुसार्र सार्मूहिक जीवन की समस्त वस्तुओं को, चार्हे वे सरल हों यार् जटिल, वार्स्तविक हों यार् आदर्शत्मक, दो प्रमुख भार्गों में बार्ँटार् जार् सकतार् है- (1) सार्धार्रण, (2) पवित्र। समस्त धर्म क संबंध पवित्र वस्तुओं से होतार् है। परन्तु इसक अर्थ यह नहीं है कि सभी पवित्र वस्तुएँ र्इश्वरीय यार् धर्म से संबंधित होती हैं, यद्यपि धर्म-संबंधी प्रत्येक वस्तु यार् विचार्र पवित्र अवश्य ही होते हैं। ये पवित्र वस्तुएँ समार्ज की प्रतीक यार् सार्मुदार्यिक प्रतिनिधि हैं। आदिम समार्जों में व्यक्ति सार्मूहिक शक्ति के सम्मुख अपनी शक्ति को सर्वथार् अर्थहीन पार्तार् है और इसीलिए उसके सम्मुख नतमस्तक होतार् है। यह सार्मूहिक शक्ति सावजनिक संस्कारों तथार् उत्सव आदि के समय अनुभव की जार्ती है। इस सार्मूहिक शक्ति को आदिम मार्नव पवित्र मार्नतार् है और इसी कारण उससे प्रभार्वित रहतार् है। समार्ज के लोग जिन्हें पवित्र समझते हैं उन्हें अपवित्र और सार्धार्रण से सदार् दूर बचार्कर रखने क प्रयत्न करते हैं और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे अनेक विश्वार्सों, आचरणों, संस्कारों और उत्सवों को जन्म देते हैं। धर्म इन्हीं प्रयत्नों क फल है। चूँकि इन प्रयत्नों से संबंधित विश्वार्सों, आचरणों संस्कारों आदि के पीछे समस्त समार्ज की अभिमति और दबार्व होतार् है इस कारण समार्ज की उस सार्मूहिक सत्तार् के समक्ष मनुष्य को नतमस्तक होनार् पड़तार् है। धर्म की नींव वहीं से पड़ती है। यदि सूक्ष्म रूप से विश्लेषण कियार् जार्ए तो स्पष्ट होगार् कि धर्म की उत्पत्ति किसी एक विशेष कारण से नहीं हुर्इ, इसकी उत्पत्ति में तो एकाधिक कारणों क योगदार्न रहार् है।

  1. पवित्रतार् की भार्वनार्-दुर्खीम ने इस तथ्य पर विशेष बल दियार् कि धर्म क संबंध उन सभी विश्वार्सों, वस्तुओं और आचरणों से होतार् है जिन्हें पवित्र मार्नार् जार्तार् है। यही कारण है कि धर्म से संबंधित सभी वस्तुओं और क्रियार्ओं को अपवित्र वस्तुओं और अपवित्र आचरणों से अलग रखार् जार्तार् है। पवित्रतार् की यही धार्रणार् उन सभी व्यक्तियों को एकतार् के सूत्र में बार्ँधती है जो समार्न धामिक विश्वार्सों में आस्थार् रखते हैं।
  2. तर्क क अभार्व-धर्म क संबंध अलौकिक विश्वार्सों से होने के कारण इन्हें किसी परीक्षण अथवार् वैज्ञार्निक ज्ञार्न के द्वार्रार् प्रमार्णित नहीं कियार् जार् सकतार्। विश्वार्स ही धर्म की नींव है। यही कारण है कि धर्म क संबंध मार्नव जीवन के ताकिक पक्ष से न होकर भार्वनार्त्मक पक्ष से होतार् है।
  3. नियमों व निषेधो क समार्वेश- प्रत्येक धर्म में व्यवहार्र के कुछ विशेष नियमों क समार्वेश होतार् है। यह नियम पवित्रतार्, र्इमार्नदार्री, दयार्, न्यार्य, त्यार्ग तथार् सत्यतार् से संबंधित होते हैं। धामिक नियम यह स्पष्ट करते हैं कि विभिन्न दशार्ओं में व्यक्ति को किस प्रकार व्यवहार्र करनार् चार्हिए। निषेध क तार्त्पर्य उन नियमों से है जो व्यक्ति को छल, कपट, अनैतिकतार्, बेर्इमार्नी और दुरार्चरण से रोकते हैं। व्यक्तियों के व्यवहार्रों को नियन्त्रित करने में इन नियमों और निषेधों की एक महत्वपूर्ण भूमिक होती है।
  4. धामिक संस्तरण- संसार्र के सभी धर्मों में विभिन्न व्यक्तियों के बीच उच्चतार् और निम्नतार् क एक स्पष्ट संस्तरण होतार् है। इस संस्तरण में उन व्यक्तियों को सर्वोच्च स्थार्न मिलतार् है जिन्हें अपने धर्म क विशेष ज्ञार्न होतार् है। धर्मार्चाय, पोप, इमार्म तथार् ओझार् आदि इसी श्रेणी के व्यक्ति हैं। इन धामिक प्रतिनिधियों के समीप रहने वार्ले व्यक्तियों क धामिक संस्तरण में दूसरार् स्थार्न होतार् है। धामिक नियमों के अनुसार्र संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करने वार्ले लोगों को तीसरार् स्थार्न मिलतार् है। इस संस्तरण में वे व्यक्ति सबसे नीचे होते हैं जिन्हें यार् तो पवित्र नहीं समझार् जार्तार् अथवार् जिनक धर्म में कोर्इ विश्वार्स नहीं होतार्।

धर्म की उपर्युक्त विशेषतार्ओं के आधार्र पर (Anderson) ने यह निष्कर्ष दियार् है कि ‘‘धर्म एक नैतिक-आध्यार्त्मिक संस्थार् अनेक विचार्रों, विश्वार्सों और उद्वेगों की एक संयुक्ततार् है जिसे किसी अलौकिक शक्ति के प्रति अभिव्यक्त कियार् जार्तार् है।’’

मार्नव जीवन मे धर्म क महत्व

1933 में महार्त्मार् गार्ँधी ने मार्नव जीवन में धर्म को एक महार्न शक्ति बतार्यार् है और कहार्-’’धर्म वह शक्ति है जो व्यक्ति क बड़े-बड़े संकट में र्इमार्नदार्र बनार्ये रखती है और यह इस संसार्र में दूसरे में भी व्यक्ति की आशार् क अन्तिम सहार्रार् है।’’ मार्नव जीवन में धर्म के निम्न कार्य बतार्ये जार् सकते है-

  1. धर्म व्यक्ति क व्यक्तित्व एव अस्तित्व को सुनिशिचत करतार् है। 
  2. धर्म जीवन को आधार्र प्रदार्न करतार् है। 
  3. यह मार्नव मस्तिष्क को शार्न्ति देतार् है और हृदय में आशार् क संचार्र करतार् है। 
  4. धर्म मार्नव जीवन कों मार्नसिक दृढतार् प्रदार्न कर नैतिक रखतार् है।
  5. यह मार्नव समूह को व्यवहार्रार्त्मक, विचार्रार्त्मक, परम्परार्त्मक एवं भार्वार्त्मक रूप से जोडें रहतार् है। 
  6. धर्म मनुष्य को संस्कृति एवं सभ्यतार् के निर्मार्ण एवं निर्वार्ह क आधार्र प्रदार्न करतार् है। 
  7. यह व्यक्ति को परिवार्र, समार्ज एवं देश से जोडतार् रहतार् है। 
  8. धर्म ने मार्नव जीवन के सम्पूर्ण इतिहार्स को नयार् रूप देकर संजोयार्। 
  9. धर्म मनुष्य को अध्यार्त्मिकतार् एव नैतिकतार् क माग दिखार्तार् है। 
  10. धर्म मनुष्य को वार्स्तविक जीवन की परिस्थितियों से संधर्ष करने की शक्ति क संचार्र करतार् है। 
  11. जीवन के अन्तिम सत्य (मोक्ष) को प्रार्प्त करने हेतु प्रथम सीढी़ धर्म क ही है। 
  12. धर्म व्यक्ति की भैार्तिक एंव आध्यार्त्मिक उन्नति को आधार्र प्रदार्न करतार् है। कहार् भी गयार् है- यतो अभ्युदय-निश्श्रेयस सिद्धि: स धर्म:। (जिससे व्यक्ति की शार्रीरिक और आध्यार्त्मिक उन्नति हो वही धर्म है) 
  13. मार्नव के सम्पूर्ण इतिहार्स पर धर्म की छार्प है इसकी पुष्टि करते हुये गिस्र्बट ने लिखार् है-’’अमरीकी और फ्रार्न्सीसी क्रार्ंन्तियों पर धर्म की छार्प थी और 09 जनवरी 1905 तक रूसी क्रार्न्तियों पर भी प्रबल धर्मिक प्रभार्व थार्। आधुनिक समय में महार्त्मार्गार्ँधी और आचाय विनोबार् भार्वे के नेतृत्व में होने वार्ले महार्न सार्मार्जिक और आथिक आन्दोलनो क आधर धर्म है।’’

हम संक्षेप में कह सकते है की धर्म एक सर्व व्यार्पक शक्ति है जो व्यक्ति और समार्ज को अनेक प्रकार से प्रभार्वित करती है। हुमार्युॅ कबीर ने सत्य लिखार् -’’धर्म अनेक संघर्षो क अन्त करतार् है। यह उन शक्तियों क संचार्र करतार् है जो कठिनार्इयों और परार्जयों कों स्वीकार नही करती है।’’

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