धर्म क अर्थ एवं परिभार्षार्
धर्म क अर्थ कर्तव्य, संस्कारों और गुण से होतार् है। शार्ब्दिक दृष्टि से धर्म शब्द ‘धृ’ धार्रणे अर्थार्त धृ धार्तु जिसक अर्थ धार्रण करनार् होतार् है। धर्म क अर्थ है किसी वस्तु की अस्तित्ववत्तार् को धार्रण करनार् यार् सिद्ध करनार्। किसी वस्तु की अनिवाय सत्तार् को बनार्ये रखनार् धर्म क अनिवाय गुण है। जैसे सूर्य क प्रकाश तथार् शर्करार् की मिठार्स। विश्व की सार्मार्जिक स्थिति को निर्धार्रित करने तथार् सार्मार्जिक स्तरीकरण की व्यवस्थार् क निर्मार्ण करने में और सार्मार्जिक नियंत्रण के एक प्रमुख अभिकरण के रूप में धर्म क सर्वोच्च स्थार्न है। संकुचित अर्थ में धर्म क अर्थ अन्धविश्वार्स करनार्, मार्लार् जपनार्, मंदिर जार्नार्, तिलक लगार्नार् आदि क्रियार्ओं से लगार्यार् जार्तार् है। व्यार्पक अर्थों में धर्म क तार्त्पर्य हृदय को पवित्र बनार्नार्, उत्तम चरित्र एवं नैतिकतार् प्रार्प्त करनार्, मन में आध्यार्त्मिक मूल्यों को स्थार्पित करनार् आदि क्रियार्एं आती है। धर्म एस मौलिक श्क्ति के रूप में जार्नार् जार् सकतार् है जो भौतिक और आध्यार्त्मिक व्यवस्थार् क आधार्र रूप है और जो उस व्यवस्थार् को बनार्ये रखने के लिए आवश्यक है।

धर्म की परिभार्षार्

एडवर्ड टार्यलर के अनुसार्र धर्म आध्यार्त्मिक शक्ति क विश्वार्स है। मैलिनोवस्की के अनुसार्र धर्म क्रियार् की एक विधि है और सार्थ ही विश्वार्सों की एक व्यवस्थार् भी। धर्म एक समार्जशार्स्त्रीय घटनार् के सार्थ-सार्थ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है। हॉबल के अनुसार्र, धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वार्स पर आधार्रित है जिसमें आत्मवार्द व मार्नववार्द दोनों सम्मिलित हैं।

उपरोक्त परिभार्षार्ओं के आधार्र पर हम कह सकते है कि धर्म किसी न किसी प्रकार की अतिमार्नवीय यार् अलौकिक शक्ति पर विश्वार्स है जिसक आधार्र भय, श्रद्धार्, भक्ति और पवित्रतार् की धार्रणार् है और जिसकी अभिव्यक्ति प्राथनार्, पूजार् यार् आरार्धनार् आदि के रूप में की जार्ती है। यह व्यक्तिगत और सार्मार्जिक जीवन क आधार्र है, जीवन क शार्श्वत सत्य है, जो श्रेष्ठ है। हिन्दू धर्म में त्यार्ग और भोग क आर्दश समन्वय पार्यार् जार्तार् है। व्यक्ति को यहार्ं सार्ंसार्रिक सुखों क उपभोग और जीवन की वार्स्तविकतार् से परिचय प्रार्प्त करते हुए, अपने इहलोक और परलोक को उत्तम बनार्ने की ओर अग्रसर कियार् गयार् है। हिन्दू धर्म में कत्र्तव्य की भार्वनार् पर जोर दियार् गयार् है।

धर्म क वर्गीकरण

वर्ण धर्म – 

सार्मार्जिक संगठन के आधार्र पर वर्णों को चार्र भार्गों में विभक्त कियार् जार्तार् है। ब्रार्हमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। धामिक रूप से इन चार्रों वर्णों के पृथक-पृथक धर्म निर्धार्रित है जिससे प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की तुलनार् में अपने दार्यित्वों क उचित रूप से निर्वार्ह कर सके। अर्थार्त् ब्रार्ह्मण क धर्म है कि पढ़ार्नार्, आत्मनियंत्रण तथार् तप क अभ्यार्स करनार् तथार् यज्ञ करार्नार्। अध्ययन करनार्, लोगों की रक्षार् करनार्, युद्व करनार् आदि क्षत्रियों क धर्म है। उसी प्रकार गार्य-बैल आदि पशुओं की रक्षार् करनार्, दार्न करनार्, उचित सार्धनों हेतु धन क उपाजन करनार्, व्यार्पार्र करनार् आदि वैश्य क मुख्य कर्तव्य धर्म है। शूद्र की सृष्टि अन्य तीनों वर्णों के सेवक के रूप में बिनार् ईष्यार् के सेवार् करनार् है।

आश्रम धर्म – 

समार्ज में प्रत्येक व्यक्ति के सभी कर्तव्यों को दूसरे व्यक्ति के प्रति, समार्ज के प्रति, स्वयं के प्रति पूरार् करने के दृष्टिकोण से जीवन को चार्र भार्गों में विभार्जित कियार् जार्तार् है- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वार्नप्रस्थ आश्रम तथार् सन्यार्स आश्रम। प्रत्येक आश्रम में व्यक्ति के कुछ विशेष कर्म निर्धार्रित है जिन्हे मार्नसिक, शार्रीरिक, नैतिक और आध्यार्त्मिक गुणों क विकास करके अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की ओर बढतार् है।

वर्णार्श्रम धर्म – 

चार्रों वर्णों के पृथक पृथक वर्ण धर्म में प्रार्विधार्न के सार्थ ही आश्रम धर्म के पार्लन क विधार्न कियार् गयार् थार्। प्रथम तीन वर्ण के व्यक्तियों द्वार्रार् ही आश्रम धर्म क पार्लन कियार् जार्तार् थार्। शूद्र वर्ण के लिए आश्रम धर्म नहीं थार्।

गुण धर्म –

गुण धर्म क संबंध रार्जधर्म से थार् जिसक तार्त्पर्य केवल क्षत्रिय धर्म से नहीं वरन् जो प्रजार् की रक्षार् करें अर्थार्त् शार्सनकर्तार् के धर्म से है। क्योकि पूजार् समार्ज तथार् धर्म क रक्षक है इसलिए सम्पूर्ण सार्मार्जिक व्यवस्थार् को संतुलित बनार्ने के लिए रार्जार् क कर्तव्य दूसरे व्यक्तियों के धर्मों से बहुत भिन्न है अर्थार्त् रार्जधर्म भी एक विशेष धर्म है।

निमित्त धर्म – 

वर्ण धर्म और आश्रम धर्म के निमित्त जो विधियार्ं है उनको नैमितक धर्म कहते है। उनके पार्लन में जो भी कुछ त्रुटियार्ं हो जार्ती हैं उनको दूर करने के लिए प्रार्यश्चित विधि भी इसके अन्तर्गत आती है।

सार्धार्रण धर्म – 

सार्मार्न्य धर्म क अर्थ धर्म के उस रूप से है जो सभी द्वार्रार् अनुसरणीय है। व्यक्ति चार्हे किसी भी वर्ण, आयु, लिंग, वर्ग आदि क क्यों न हो सार्मार्न्य धर्म क पार्लन करनार् सभी क कत्र्तव्य है। यह धर्म व्यक्ति विशेष क न होकर समस्त मार्नव जार्ति क होतार् है।

इसके नैतिक नियम समस्त मार्नव जार्ति के लिए समार्न होते हैं इसी कारण इसे ‘मार्नव धर्म’ के नार्म से सम्बोधित कियार् जार्तार् है।यदि इसक पार्लन किसी इच्छार् की पूर्ति के लिए कियार् जार्य तो इससे लौकिक कल्यार्ण में वृद्धि होगी और निश्काम रूप से इसक पार्लन करने से मोक्ष की प्रार्प्ति होती है। इस धर्म क मुख्य उद्देश्य यह है कि मार्नव में सद्गुणों क विकास करनार् तथार् इस लक्ष्य की प्रार्प्ति करनार् कि सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरार्मयार्:। इस प्रकार सार्मार्न्य धर्म क उद्देश्य मनुष्य की इसी श्रेष्ठतार् को बनार्ये रखनार् और उसे सार्मार्न्य कल्यार्ण की ओर प्रेरित करनार् है।

विशिष्ट धर्म – 

विशिष्ट धर्म को स्वधर्म भी कहार् जार्तार् है क्योकि यह विशेष व्यक्ति क अपनार् धर्म है। समय, परिस्थिति और स्थार्न के अनुसार्र सभी व्यक्तियों के लिए भिन्न भिन्न कर्तव्यों को पूरार् करनार् आवश्यक होतार् है। इसके अतिरिक्त विभिन्न व्यक्तियों के गुण, स्वभार्व, व्यवहार्र, आयु और सार्मार्जिक पद में भी भिन्नतार् होती है। ऐसी स्थिति में सभी व्यक्तियों क धर्म अथवार् कर्त्तव्य एक दूार्रे से भिन्न होनार् आवश्यक है। उदार्हरण के लिए ब्रार्ह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथार् शूद्र के धर्म अपने अपने वर्ण के अनुसार्र है, स्त्री और पुरूष क धर्म अलग- अलग है, गुरू और शिष्य क एक-दूसरे से भिन्न होतार् है, सैनिक क धर्म एक तथार् रार्जार् क धर्म दूसरार् होतार् है। इस प्रकार समार्ज में दूसरे व्यक्तियों की तुलनार् में एक व्यक्ति की जो स्थिति निर्धार्रित होती है। और उसके सार्मने जिस प्रकार की परिस्थितियार्ं होती है, उसके अनुसार्र निर्धार्रित होने वार्ले कर्त्तव्यों को ही विशिष्ट धर्म कहते है। इस धर्म की विशेषतार् यह है कि व्यक्ति क विशिष्ट धर्म चार्हे उसे नीची स्थिति प्रदार्न करतार् हो अथवार् ऊँची लेकिन ऐसार् विश्वार्स कियार् जार्तार् है कि अपने धर्म क पार्लन करने से ही मोक्ष क अधिकारी होतार् है।

धर्म क प्रार्दुर्भार्व

धर्म कैसे शुरू हुआ? और धर्म कैसे विकसित हुआ? यह विकासवार्दी चिन्तन डाविन के विकासवार्द सिद्धार्ंत से प्रभार्वित थार्। कालार्ंतर में इन सवार्लों ने दो मुख्य सिद्धार्ंतों आत्मवार्द और प्रकृतिवार्द को जन्म दियार्।

आत्मवार्द – 

आत्मवार्द के अनुसार्र आत्मार् की धार्रणार् धर्म के मूल में है अर्थार्त् आत्मार्ओं में विश्वार्स। इसीलिए इसक नार्म आत्मवार्द है। टार्यलर के अनुसार्र आदिम आत्मार् के विचार्र को गलती से अपनार्तार् थार्। आत्मार् क विचार्र मनुष्यों के सार्मार्न्य जीवन की जार्ग्रत और सुप्त दो अवस्थार्ओं के दृश्यों के विषय में भ्रार्मक ज्ञार्न उत्पन्न हुआ है। आदिम मनुष्य स्वप्न में दिखार्ई देने वार्ले दृश्यों को जार्ग्रत अवस्थार् में दिखार्ई देने वार्ले तथ्यों के समार्न ही सत्य और महत्वपूर्ण समझतार् है। अत: व्यक्ति को यह अनुभव होने लगार् कि व्यक्ति के शरीर में दो आत्मार् है। एक सोते समय शयन स्थार्न पर विद्यमार्न रहतार् है, और एक शरीर को छोड़कर बार्हर विचरण करतार् है। शरीर से पृथक शून्य में स्वतन्त्र विचरण करने वार्ली यह आत्मार् ही पूर्वार्त्मार् यार् सार्मार्न्य शब्दों में ये प्रेतार्त्मार् बन जार्ती है। अत: आदिम मनुष्य प्रत्येक घटनार् की व्यार्ख्यार् इन प्रेतार्त्मार्ओं के आधार्र पर करतार् है। बीमार्री, पार्गलपन इत्यार्दि सभी प्रेतार्त्मार्ओं क फल मार्न लियार् जार्तार् है। इस प्रकार मनुष्य के द्वार्रार् प्रेतार्त्मार्ओं को प्रसन्न करने के लिए की पूजार् करने लगे जबकि आत्मार् अमूर्त होती है और मनुष्य के द्वार्रार् आत्मार् में शक्ति क विश्वार्स मार्नकर पूर्वजों की पूजार् करनार् आरम्भ कर देते हैं।

आत्मवार्द की विशेषतार्एं

  1. आत्मवार्द अपने आप में कर्म नहीं है। यह तो एक आदर्श प्रार्रूप है जिसे द्वार्रार् धर्म के उद्विकास क अध्ययन कियार् जार्तार् है। 
  2. आत्मवार्द में जीवार्त्मार् की अवधार्रणार् है। जीवार्त्मार् वह है जो जीवित व्यक्तियों के शरीर में निवार्स करती है। मृत्यु के पश्चार्त् यार् शरीर नष्ट हो जार्ने के बार्द भी जीवार्त्मार् बनी रहती है। 
  3. प्रेतार्त्मार् और जीवार्त्मार् दोनों अलौकिक शक्ति के रूप है और इन्हे पेड़-पौधों, पत्थर इत्यार्दि में देखार् जार् सकतार् है। 
  4. मनुष्य प्रकृति के सार्थ होने वार्ले अपने संघर्ष में जीवार्त्मार् की पूजार् करके सुरक्षित रहनार् चार्हतार् है। 

प्रकृतिवार्द –

इस सिद्धार्ंत के मुख्य प्रतिपार्दक मैक्समूलर रहे हैं। मैक्समूलर ने धर्म की प्रकृतिवार्दी एवं अनुभूतिपरक व्यार्ख्यार् प्रस्तुत की मैक्समूलर के अनुसार्र धर्म को यदि हमार्री चेतनार् के वैध तत्व के रूप में स्थार्न प्रार्प्त करनार् है, तो इसे अन्य समस्त ज्ञार्न की भार्ंति इन्द्रियार्त्मक अनुभव के प्रार्रम्भ होनार् चार्हिए। मैक्समूलर ने वेदों के आधार्र पर प्रकृतिवार्द के सिद्धार्ंत को प्रस्तुत कियार्। मैक्समूलर उन अनुभूतियों की व्यार्ख्यार् करतार् है जिनके कारण धर्म की उत्पत्ति हुई। इनके आत्मवार्द में प्रार्कृतिक शक्तियों के प्रति श्रद्धार् और भय मिश्रित भार्वनार्ओं के कारण धर्म क विकास हुआ। मैक्समूलर ने प्रत्येक जड़ व चेतन पदाथ में एक जीवित सत्तार् क विश्वार्स कियार् है वे कहते है कि आदि मार्नवों ने विभिन्न प्रार्कृतिक शक्तियों जैसे सूर्य, चन्द्रमार्, अग्नि, वार्यु, जल, पेड़- पौधों के प्रति पूजार् और आरार्धनार् द्वार्रार् अपनी श्रद्धार् को दिखार्ते है जिससे वे प्रार्कृतिक के दुष्परिणार्मों से बचकर उसकी शक्ति से लार्भ उठार् सकें। इस प्रकार प्रकृतिवार्द मार्नव की संवेदनार्ओं पर प्रकृति की शक्तियों व चमत्कारों के प्रभार्वों की प्रतिक्रियार् है। उनके अनुसार्र देवतार्ओं के नार्म प्रार्कृतिक तथ्यों के नार्म पर रखे गये हैं। मैक्समूलर ने जोर देकर कहार् कि प्रकृति की वस्तुओं के प्रति भय यार् प्रेम व आदर क व्यवहार्र एक बीमार्र दिमार्ग की उपज थार् जिसने जीवनरहित चीजों में जीवन और वे सभी शक्तियार्ं डार्ल दीं जो जीवन से संबंधित हैं। यह पुन: प्रार्रम्भिक मनुष्य की मूर्खतार् से उपजार् जिसके मूल में उसक भार्षिक अहार्पोह थार् ये भार्षिक गड़बड़ियार्ं जैसे सूरज उगतार् और डूबतार् है यार् आंधी बार्रिश भेजती है और पेड़ पत्तियार्ं व फूल पैदार् करते हैं इस धार्रणार् को मजबूत बनार्ने में सफल रहीं कि सूरज, पेड़ तथार् आंधी में कोई न कोई शक्ति अन्तनिर्हित है। इस प्रकार एक आत्मार् को बीच में लार्नार् जरूरी हो गयार् जो उनके नार्म पर होने वार्ले अनुष्ठार्नों क आलबंन है। मैक्समूलर के विचार्रोनुसार्र मनुष्य के सार्मने सबसे पहली वार्स्तविकतार् प्रकृति के रूप में ही दृष्टिगोचर हुई, और उसने प्रार्कृतिक तथ्यों को देखकर आश्चर्य का, भय का, शोभार् और सौन्दर्य क अनुभव कियार्। प्रकृति के तथ्य स्थार्यी और बार्र-बार्र प्रकट होने के कारण ही प्रार्कृतिक कहलार्ए। प्रकृति क ऐसार् कोई पक्ष नहीं है, जो हमार्रे मन में एक अनन्त की यह अत्यधिक अनुभूति जगार्ने के योग्य नहीं है, जो हमार्रे चार्रों ओर व्यार्प्त है, हम पर शार्सन करतार् है।

टोटमवार्द

यह उस सार्मार्जिक व्यवहार्र क बोध करार्तार् है जिसके अंतर्गत सार्ंकेतिक रूप से मार्नवीय और गैर मार्नवीय वस्तुओं प्रार्य: जीव जंतु यार् बनस्पति के बीच तार्दार्त्म्य स्थार्पित कियार् जार्तार् है। दुर्खीम के अनुसार्र आस्ट्रेलियार् के आदिवार्सियों में टोटमवार्द सरलतम और सबसे बुनियार्दी धर्म-रूप है। इन लोगों के बीच टोटम की वस्तु न केवल धर्म से बल्कि कुल की सदस्यतार् से भी जुड़ी है। हर कुल क एक टोटम होतार् है जो प्रार्य: कोई जार्नवर यार् पौधार् होतार् है। दुर्खीम किसी गोत्र समूह की दो प्रमुख विशेषतार्ओं क उल्लेख करतार् है।

  1. गोत्र क सदस्य परस्पर नार्तेदार्री के सम्बन्धों के आधार्र पर संगठित होतार् है।
  2. गोत्र क नार्म किसी भौतिक वस्तु के नार्म पर होतार् हे जिसे टोटम कहते है।

अत: टोटम की विवेचनार् में गोत्र की विवेचनार् अत्यन्त आवश्यक है।

टोटमवार्द की विशेषतार्एं – 

  1. इसके सार्थ एक गोच के सदस्य अपनार् कई प्रकार क गूढ़, अलौकिक तथार् पवित्र संबंध मार्नते है।
  2. टोटम के सार्थ इस अलौकिक तथार् पवित्र संबंध के आधार्र पर ही यह विश्वार्स कियार् जार्तार् है कि टोटम उस शक्ति क अधिकारी है जो उस समूह की रक्षार् करती है, सदस्यों को चेतार्वनी देती है और भविष्यवार्णी करती है।
  3. टोटम के प्रति भय, श्रृद्धार् और भक्ति की भार्वनार् रखी जार्ती है। वह इस बार्त पर निर्भर नहीं होती कि कौन सी वस्तु टोटम है यार् वह कैसी है, क्योंकि टोटम तो प्रार्य: अहार्निकारक पशु यार् पौधार् होतार् है। टोटम सार्मुदार्यिक प्रतिनिधित्व क प्रतीक है तथार् टोटम की उत्पत्ति उसी सार्मुदार्यिक रूप में समार्ज के प्रति श्रद्धार्भार्व के कारण हुई। यही श्रद्धार्भार्व पवित्रतार् को जन्म देती है। 
  4. टोटम के प्रति भय, श्रृद्धार् और भक्ति की भार्वनार् रखी जार्ती है। टोटम को खार्नार्, मार्रनार्, हार्ंनि पहुचार्नार् वर्जित होतार् है। उसके चित्र रखे जार्ते हैं और उससे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु को पवित्र मार्नार् जार्तार् है।
  5. टोटम के संबंध में जो निशेध होते हैं उनक कड़ार्ई से पार्लन कियार् जार्तार् है और मर्यार्दार् भंग करने पर दंड क प्रार्वधार्न होतार् है। 
  6. टोटम एक प्रकार की ऐसी रहस्यमयी सर्वशक्ति वस्तु समझी जार्ती है जो समूह के सम्पूर्ण जीवन को निर्देशित और नियंत्रित करती है।

धामिक व्यवहार्र

धामिक व्यवहार्रों के द्वार्रार् समार्ज व धर्म के संबंध को रेखार्ंकित होते हैं प्रत्येक धर्म में कुछ तत्व समार्न होने के सार्थ ही कुछ विशिष्ट तत्व पार्ए जार्ते हैं जिनसे व्यक्ति क व्यवहार्र प्रभार्वित होतार् है। ये तीन प्रकार के होते हैं।

अनुष्ठार्न अथवार् कर्मकाण्ड- 

अनुष्ठार्न, विशिष्ट संस्कारें के अवसरों पर बार्र-बार्र दोहरार्यार् जार्ने वार्ल वार्लार् कार्य है जिसके मार्ध्यम से हर समुदार्य अपनी आस्थार् मूर्त रूप में अभिव्यक्त करतार् है।यह एक निश्चित विन्यार्स वार्लार् क्रियार्कलार्प है जिसक उद्देश्य मार्नवीय परिस्थितियों को नियंत्रित करनार् होतार् है। प्रत्येक धर्म में भिन्न-भिन्न अनुष्ठार्न किये जार्ते है जैसे पूजार्-पार्ठ, प्राथनार्, यज्ञ, हवन, नमार्ज आदि विभिन्न मार्नवीय समार्जों में अनुष्ठार्नों के अलग-अलग रूप और प्रकार मिलते है। कुछ अनुष्ठार्न सरल होते है और कुछ जटिल। त्यार्ग करनार् यह सभी धर्मों में पार्यार् जार्तार् है।

वार्लेस के अनुसार्र अलौकिक शक्ति को सक्रिय बनार्ने के लिए धर्म के मूलभूत घटक के रूप में अनुष्ठार्न को प्रयोग में लार्यार् जार्तार् है। यह परम्परार्ओं को स्थार्यित्व प्रदार्न करने क कार्य करतार् है।

हर अनुष्ठार्न में समूह के सदस्यों के बीच भार्वनार्त्मक एकतार् भी कायम करते है और इस तरह ऐसे अवसरों पर व्यक्ति और समूह दोनों के लिए एक नैतिक निर्देश/ नियम में विश्वार्स मजबूत होते हैं। इस प्रकार के नैतिक नियम अप्रत्यक्ष रूप में सार्मार्जिक व्यवस्थार् के संगठन में सहार्यतार् करते है। लोगों यार् व्यिक्त्यों क विश्वार्स है कि त्यार्ग करने में दैवीय शक्ति प्रसन्न होगी। इन दैवीय शक्ति की कृपार् जीवन पर्यन्त बनी रहेगी। इसीलिए लोग दार्न करते हैं। उदार्हरण सिक्ख धर्म में आय क कुछ प्रतिशत भार्ग दार्न यार् लंगर के रूप में लगार्यार् जार्तार् है। अनुष्ठार्न द्वार्रार् किसी भी सार्मार्जिक रीति से पवित्र बनार्यार् जार् सकतार् है और जो कुछ भी पवित्र होतार् है उसे अनुष्ठार्न क रूप दियार् जार् सकतार् है।

आस्थार्- 

डेविस के अनुसार्र आस्थार्एं धर्म क ज्ञार्नार्त्मक पक्ष होतार् है। ये अनुभव पर आधरित न होकर विश्वार्स पर आधार्रित होती हैें। प्रत्येक धर्म में कुछ कथन होते है जिन्हे अनुयार्यी मार्नते है। प्रत्येक धर्म में ये कथन भिन्न भिन्न होते हैं। आस्थार्एं मनुष्य यार् व्यक्तियों को अच्छार् जीवन जीने क मागदर्शन देती है इस उद्देश्य के बिनार् आस्थार्ओं क कोई अस्तित्व नही होतार् तथार् इन्हे नैतिक प्रभार्वी को मूल्यार्ंकित करनार् चार्हिए न संज्ञार्त्मक वैधतार् के लिए नही। इन्हे दो भार्गों में विभक्त कियार् जार्तार् है।

  1. धामिक मूल्य- ये वे धार्रणार्एं है जो क्यार् अच्छार् है , क्यार् वार्ंछनीय है तथार् क्यार् उचित है आदि से संबंधित होती हैं ये उस धर्म के मार्नने वार्ले समस्त लोग मार्न्य करते हैं ये मूल्य व्यक्ति के व्यवहार्र को प्रभार्वित करते हैं तथार् सार्मार्जिक संस्थार्ओं में अमिट छार्प छोड़ते हैं। 
  2. ब्रह्मण्डिकी- इसके अंतर्गत उन धार्रणार्ओं क समार्वेश होतार् है जिसमें स्वर्ग, नरक, जीवन मृन्यु आदि क वर्णन होतार् है। प्रत्येक धर्म इनक वर्णन भिन्न प्रकार से करतार् है तथार् व्यक्ति के व्यवहार्र को प्रभार्वित करतार् है। उइार्हरण व्यक्ति समार्ज में बुरे कार्य इसलिए नहीं करतार् कि उसे मरने के बार्द नरक प्रार्प्त होगार्।

अनुभव- 

धामिक अनुभव से तार्त्पर्य उस अनुभव से है जब व्यक्ति दैवी शक्ति से एक रूप में हो जार्तार् है तथार् इन अनुभवों द्वार्रार् व्यक्ति शार्ंति प्रार्प्त करतार् है। किसी विशिष्ट धर्म की आस्थार्एं व अनुष्ठार्न धामिक अनुभवों के लिये सौहादपूर्ण अथवार् प्रतिकूल वार्तार्वरण क निर्मार्ण कर सकते हैं।

धर्म तथार् सार्मार्जिक नियंत्रण

धर्म मनुष्य के जीवन क एक अनिवाय तत्व है यह मार्नव जीवन के अनेक पक्षों एवं आयार्मों को प्रभार्वित करती है सार्थ ही मार्नव के व्यवहार्रों को नियंत्रित करतार् है। इसलिए धर्म सार्मार्जिक नियंत्रण क महत्वपूर्ण सार्धन है।

  1. धर्म समार्ज द्वार्रार् मार्न्य व्यवहार्र न करने पर समार्ज के सार्थ-सार्थ भगवार्न भी नार्रार्ज हो जार्येगार्। इस विचार्र से नियंत्रण में सहार्यतार् देते है। 
  2. धर्म की संस्थार्एं और उनके संगठन मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वार्रार् और उनसे संलग्न धामिक व्यक्ति विभिन्न स्तर पर अपने सदस्यों के व्यवहार्र को नियंत्रण करते रहते हैं। 
  3. संस्कारों, समार्रोह, प्राथनार्, पुजार्रियों की सत्तार्, धामिक प्रवचनों, उपदेशों के मार्ध्यम से भी सदस्यों के व्यवहार्रों पर संस्थार्गत नियंत्रण रखते हैं। 
  4. प्रत्येक धर्म में किसी न किसी रूप में पार्प और पुण्य की धार्रणार् क समार्वेश होतार् है। पार्प और पुण्य उचित और अनुचित, अच्छार्ई और बुरार्ई तथार् सद्कर्म और दुश्कर्म की धार्रणार्एं शैशवकाल से ही व्यवहार्र के अंग बन जार्ती है जो जीवनपर्यन्त व्यक्ति क निर्देशन करती रहती है। धर्म व्यक्ति में पार्प और पुण्य की भार्वनार् को विकसित कर व्यक्तियों में यह प्रेरणार् भरतार् है कि धर्म के अनुसार्र आचरण करने से उसे पुण्य होगार् और धर्म के विरूद्ध आचरण करने से उसे पार्प होगार्। इसलिए व्यक्ति धामिक आचरणों क उल्लघंन नही करते। अत: यह कहार् जार् सकतार् है कि धर्म के द्वार्रार् भी समार्जीकरण होतार् है। 
  5. धर्म व्यक्तियों में नैतिकतार् की भार्वनार् तथार् आत्म नियंत्रण पैदार् करतार् है क्योंकि धामिक नियमों क पार्लन करने से यह होतार् है। इसक फल उनको अच्छार् मिलेगार्। 
  6. धर्म एक ऐसार् तरीक है जिसमें व्यक्तिगत स्वाथ के स्थार्न पर सार्मूहिक स्वाथ क महत्व हो जिस कारण सार्मार्जिक एकीकरण को बढार्वार् मिलतार् है। वे परस्पर सहयोग करते हैं, उनमें समार्न भार्वनार्ए, विश्वार्स एवं व्यवहार्र पार्ए जार्ते है। धर्म व्यक्ति को कर्तव्यों के पार्लन की प्ररेणार् देतार् है। सभी व्यक्ति अपने कर्तव्यों कापार्लन करके सार्मार्जिक संगठन एवं एकतार् को बनार्ये रखने में योग देते हैं।

धर्म और विज्ञार्न

धर्म और विज्ञार्न क भी मार्नव जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। दोनों ही संस्कृति के अभिन्न अंग है और दोनों क ही प्रयोग मार्नव आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिये कियार् जार्तार् है। धर्म और विज्ञार्न किसी अस्तित्व को देखने समझने और परखने की शैली है। विज्ञार्न परिस्थितियार्ं की समीक्षार् करतार् है जबकि धर्म जीवन जीने की कलार् सिखार्तार् है। धर्म नार्श्वार्न और श्रणिक वस्तुओं के प्रति उदार्सीन रहतार् है किन्तु विज्ञार्न उन्ही वस्तुओं क निरीक्षण, परीक्षण और सार्मार्न्यीकरण करतार् है। जहार्ं धर्म ईश्वर और पार्रलौकिक शक्ति के सहार्रे मार्नवीय समस्यार्ओं क समार्धार्न खोजतार् है वहीं विज्ञार्न वार्स्तविकतार् के आधार्र पर कार्य एवं कारण के सहार्रे समस्यार्ओं क ताकिक हल प्रस्तुत करतार् है वही धर्म क अताकिक स्वरूप समार्ज तथार् व्यक्ति दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। रूढ़िवार्दी धर्म ने विज्ञार्न क विरोध कियार् है। गैलिलियों ने सिद्ध कियार् थार् कि पृथ्वी सूर्य के चार्रों और घूमती है यह धामिक विश्वार्स के विरूद्ध थार् उसी कारण गैलिलियों को फार्ंसी पर लटकनार् पड़ार्।

धर्म और विज्ञार्न परस्पर विरोधी होने के बार्वजूद एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित है। विज्ञार्न जीवन में स्वतन्त्र चिन्तन, परिष्कृत विचार्र उत्पन्न करतार् है और धर्म जीवन में शुद्धतार्, प्रेम और त्यार्ग की भार्वनार् उत्पन्न करतार् है। अत: दोनों एक-दूसरे पर निर्भर है इसलिए आंइसटीन ने कहार् है कि विज्ञार्न धर्म के बिनार् लंगडार् है और धर्म विज्ञार्न के बिनार् अंधार्। धर्म और विज्ञार्न के बीच द्वन्द्व तब तक उपस्थित होतार् है जब धर्म प्रार्कृतिक प्रघटनार्ओं को व्यार्ख्यार्यित करने लगतार् है और ऐसी व्यार्ख्यार्यें अर्थहीन होती हैं। विज्ञार्न जोर देतार् है कि कोई सिद्धार्ंत केवल तभी जीवित रह सकतार् है जब वह अपनी अनुकूलतार् और भविष्य सूचक शक्ति की कठिन परीक्षार्ओं से गुजरे। इस प्रकार जब विज्ञार्न की परिधि व्यार्पक हो जार्ती है तब धर्म और विज्ञार्न के बीच द्वन्द्व होतार् है। विज्ञार्न उन्ही चीजों पर भरोसार् करतार् है जो कार्यकारण संबंधों पर आधार्रित और अलौकिक है। विज्ञार्न ने व्यक्ति की सोच को यथाथपरक बनकर स्वर्ग-नरक के चक्र से मुक्त कर दियार् है। पहले लोग नरक के भय से बुरे कर्मों से दूर रहते थे, इससे जहार्ं तक समार्ज में व्यवस्थार् बनी रहती है। इस प्रकार हम देखते है कि विज्ञार्न ने धर्म से अविभूत परंपरार्गत स्थिर भार्रतीय समार्ज को गतिशील समार्ज मे परिणत कर दियार् है जिससे समार्ज क संगठित ढार्ंचार् विघटित हुआ है। मैक्स वेबर ने विज्ञार्न और धर्म की पृष्ठभूमि क विश्लेषण करते हुए आर्थिक व्यवस्थार् से जुड़े हुए तर्क क प्रयोग कियार् विज्ञार्न और टैक्नोलार्जी क उन देशों में अधिक विकास नहीं हुआ जहार्ं लोगों की आस्थार् धर्म पर आधार्रित थी। विकसित समार्जों में धर्म की अपेक्षार् विज्ञार्न क महत्व अधिक है।

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