दूरस्थ शिक्षार् क प्रार्रूप एवं आवश्यकतार्

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् की अवधार्रणार् 

दूरस्थ शिक्षार् शब्द से ही स्पष्ट है कि दूर से ही स्थार्न पर प्रदत्त शिक्षार्। दूरस्थ शिक्षार् से तार्त्पर्य ऐसे गैर प्रचलित और अपरम्परार्गत शिक्षार् के मार्नकों पर एक प्रण्न चिन्ह लगार्ते हुये इनसे अलग विशेषतार्ओं को धार्रण करने वार्ली शिक्षार् से है। दूरस्थ शिक्षार् विविध शैक्षिक पृष्ठभूमि वार्ले तथार् विविध भौगोलिक क्षेत्रों में बिखरे अधिगमकर्तार्ओं की एक बड़ी संख्यार् को उनकी रूचि और सुविधार् के अनुकूल ज्ञार्न, कौशल व अभिवश्त्ति प्रदार्न करने क एक मार्ध्यम है। यह शिक्षार् में एक नवार्चार्र है। इस उपार्गम में परम्परार्गत शिक्षार् की मौखिक अनुदेशन की विधियों क प्रयोग कदार्चित कियार् जार्तार् है। इसमें उच्च कोटि की अधिगम सार्मग्री के निर्मार्ण, उत्पार्दन तथार् सम्प्रेषण में तकनीकि एवं संचार्र मार्ध्यमों क समुचित रूप से व्यार्पक उपयोग कियार् जार्तार् है।

दूरस्थ शिक्षार् में मुद्रित एवं अमुद्रित बहुमार्ध्यमों क प्रयोग शिक्षक एवं छार्त्र के बीच संचार्र मार्ध्यम के रूप में कियार् जार्तार् है। दूरस्थ शिक्षार्, शिक्षार् की ऐसी प्रणार्ली है, जो सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक पर्यार्वरण से सुसम्बद्ध है। इलेक्ट्रार्निक संचार्र मार्ध्यमों क विकास इस दिशार् में सर्वार्द्रिार्क महत्वपूर्ण विकास है। इस शिक्षार् ने सम्प्रेषण की नर्इ विधियों को जन्म दियार्। दूरस्थ शिक्षार् को अनेक शिक्षार्णार्स्त्रियों ने अपने ढंग से पार्रिभार्षित कियार् है। कुछ प्रमुख विचार्रकों ने दूरस्थ शिक्षार् की विशेषतार्ओं को उजार्गर करते हुये नीचे कुछ परिभार्षार्यें प्रस्तुत की गयी है बेडमीयर- वडे मीयर ने सन् 1977 में दूरस्थ शिक्षार् को मुक्त अधिगम, स्वतत्रंत अधिगम व दूरवर्ती अध्ययन (शिक्षार्) के रूप में प्रयोग कियार् है। स्वतंत्रत अध् ययन को अत्यधिक महत्वपूर्ण बनार्ते हुये उन्होने लिखार् है-

‘‘स्वतंत्र अध्ययन विभिन्न प्रकार की शिक्षण अधिगम व्यवस्थार्ओं क समुच्चय है, जिससे शिक्षक एवं शिक्षाथी एक दूसरे से दूर होते हुये भी अपने कार्यों एवं दार्यित्वों क निर्वहन करते हैं, एवं विभिन्न सम्प्रेषण प्रक्रियार्ओं क प्रयोग करते हैं। दूरस्थ शिक्षार् क मुख्य उद्देश्य विद्याथियों को शिक्षण हेतु कक्षार् के अनुपयुक्त स्थार्नों तथार् प्रार्रूपों से मुक्त रखनार्, विद्यार्लय से बार्हर के शिक्षाथियों को उनके अपने वार्तार्वरण में अध्ययन हेतु अवसर प्रदार्न करनार् एवं स्वत: निर्देशित अधिगम की क्षमतार् विकसित करनार्।’’ मूरे- मूरे (1972-73) ने दूरस्थ शिक्षार् को एक व्यवस्थित स्व अधिगम की प्रक्रियार् के रूप में परिभार्षित कियार् कि-’’दूरस्थ शिक्षण को अनुदेशन विधियों के परिवार्र के रूप में परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है, जिसमें शिक्षण व्यवहार्र अधिगम व्यवहार्र (प्रक्रियार्) से अलग अर्थार्त् कहीं दूर पर सम्पन्न किये जार्ते हैं। इनके अन्तर्गत छार्त्र की उपस्थिति में सम्पन्न होने वार्ली क्रियार्यें भी सम्मिलित होती है। अत: शिक्षक एवं शिक्षार्थ्र्ार्ी के मध्य सम्प्रेषण को मुद्रित सार्मग्री, इलेक्ट्रार्निक, यार्ंत्रिक एवं अन्य सार्धार्नों से सुगम बनार्यार् जार् सकतार् है।’’

 कुछ तथ्य जो उभरे-

  1. इस परिभार्षार् में भी वेडमीयर की ही तरह स्व-अधिगम की बार्त स्पष्ट हुर्इ।
  2. शिक्षण व्यवहार्र अधिगम व्यवहार्र से अलग है। 
  3. इलेक्ट्रार्निक एवं अन्य संचार्र मार्ध्यमों के प्रयेार्ग की बार्त स्पष्ट की गयी है। 

डोहमेन – डार्हे मने ने 1977 में दूरस्थ शिक्षार् को एक स्वअध्ययन हेतु विधिवत सगंठित रूप में पार्रिभार्षित कियार् ‘‘जिसमें छार्त्र परार्मर्ण, अधिगम सार्मग्री क प्रस्तुतीकरण तथार् छार्त्रों की सफलतार् क सुनिश्चितीकरण एवं निरीक्षण शिक्षकों के एक समूह द्वार्रार् कियार् जार्तार् है, तथार् प्रत्येक शिक्षक क अपनार् दार्यित्व है। संचार्र मार्ध्यमों के द्वार्रार् बहुत दूर रहने वार्ले शिक्षर्थियों के लिये इसे सम्मत बनार्यार् जार्तार् है।’’ 

इससे निम्न तथ्य उभरे कि- 

  1. दूरस्थ शिक्षण में स्व-अधिगम पर बल। 
  2. संचार्र मार्ध्यमों क शैक्षिक सम्प्रेषण में प्रयोग। 

पीटर्स- पीटर्स (1973) ने दूरस्थ शिक्षार् को ‘‘ज्ञार्न, कौशल एवं अभिवृत्ति पद्रार्न करने की एक विधि के रूप में परिभार्षित कियार्, जिसे तकनीकी संचार्र मार्ध्यमों के व्यार्पक प्रयोग के सार्थ-सार्थ श्रम विभार्जन तथार् संगठनार्त्मक सिद्धार्न्तों के प्रयोग द्वार्रार् तर्क संगत बनार्यार् जार्तार् है। इसमें विणेण रूप से उच्च स्तरीय शिक्षण अधिगम सार्मग्री के पुननिर्मार्ण क उद्देश्य निहित होतार् है, जिससे छार्त्रों की बहुल संख्यार् को एक ही समय में अनुदेशन प्रदार्न करनार् सम्भव होतार् है, यह शिक्षण अधिगम काध् एक औद्योगिक रूप है।’’  होमबर्ग- हार्मे बर्ग (1981) ने शिक्षार् में दूरस्थ शिक्षार् को शिक्षार् क वह प्रकार बतार्यार् है ‘‘जिसमें शिक्षार् के विभिन्न स्तरों पर अध्ययन के विभिन्न प्रकार, उन विद्याथियों के लिये जो शिक्षकों के निरन्तर एवं तुरन्त निरीक्षण में कक्षार्ओं में नहीं होते हैं, प्रयुक्त किये जार्ते हैं, किन्तु जो किसी भी प्रकार के शैक्षशिक संस्थार्ओं से नियोजन निर्देशन एवं शिक्षण से कम लार्भ नहीं प्रदार्न करते हैं।’’ इस परिभार्षार् से यह तथ्य उभरार्- दूरस्थ शिक्षार् अध्ययन के विभिन्न स्तरों को व्यवस्थित करती है, और सुगम बनार्ती है।

मार्लकोन एडिसेशियार् – दूरस्थ शिक्षार् से अभिप्रार्य- ‘‘सीखने और सिखार्ने की वह प्रक्रियार् जिसमें स्थार्न और समय के आयार्म सीखने और सिखार्ने के मध्य दखलदार्ंजी करते हैं।

‘‘कीगन (1986) – कीगन ने 1986 में एक सम्पूर्ण व्यार्वहार्रिक एवं व्यार्पक परिभार्षार् प्रस्तुत की और जिसमें दूरस्थ शिक्षार् शिक्षार् क वह मार्ध्यम है- 

  1. अधिगम के सम्पूर्ण काल तथार् शिक्षक एवं शिक्षार्थ्र्ार्ी के मध्य अर्ध स्थार्यी अलगार्व बनार् रहतार् है, यही दूरस्थ शिक्षार् को परम्परार्गत शिक्षार् से अलग करती है। 
  2. यह शिक्षण संस्थार्ओं को अधिगम सार्मग्री तैयार्र करने हेतु नियोजन करने के लिये प्रेरित करती है, यह उसे स्व शिक्षण एवं व्यक्तिगत अध्ययन से अलग करती है। 
  3. शिक्षक एवं शिक्षार्थ्र्ार्ी को मिलार्ने हेतु प्रौद्योगिकी मार्ध्यम मुद्रण, श्रव्य, विडियो यार् कम्प्यूटर क प्रयोग। पार्ठ्यवस्तु के सम्प्रेषण क आधार्र देती है। 
  4. अधिगम के सम्पूर्ण काल तक अधिगम समूह की पूर्ण उपस्थिति के अभार्व में व्यक्तिगत शिक्षण क रूप ले लेतार् है और विणेण अवसरों पर सार्मार्जीकरण व परार्मर्ण हेतु मिलार्प होतार् है। कीगन की परिभार्षार् ने दूरस्थ शिक्षार् के विषय में जो महत्वपूर्ण भ्रम थे उन्हें भी दूर किये। जिससे दूरस्थ शिक्षार् को परम्परार्गत विश्वविद्यार्लयों से अलग करनार् जिसमें कि बिनार् दीवार्र, अनुभव आधार्रित अधिगम वार्ह्य परिसर शिक्षार्, मुक्त अधिगम एवं परिसर प्रसार्र जैसे तथ्य सम्मिलित हुये।

 विभिन्न विद्वार्नों की परिभार्षार्ओं से दूरस्थ शिक्षार् के विषय में सरलतार् से समझार् जार् सकतार् है।

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् की प्रकृति 

विभिन्न विद्वार्नों की परिभार्षार्ओं से दूरस्थ शिक्षार् की प्रकृति के कुछ तथ्य उभर कर आये- 

  1. दूरस्थ शिक्षार् एक नवार्चार्र है, जो कि परम्परार्गत शिक्षार् प्रणार्ली से तुलनार् में अत्यन्त उदार्र है। 
  2. दूरस्थ शिक्षार् में शिक्षण व्यवहार्र व अधिगम व्यवहार्र में सीधार् सम्पर्क नहीं होतार् है। इसमें छार्त्र की उपस्थिति से सम्बंधित क्रियार्यें यदार् कदार् सम्मिलित हैं। 
  3. इस विधार् में श्रम विभार्जन एवं संगठनार्त्मक सिद्धार्न्तों क प्रयोग करके इसे तर्कसंगत बनार्यार् जार्तार् है। 
  4. इसमें उच्च स्तरीय स्व अधिगम सार्मग्री के निर्मार्ण पर विणेण बल दियार् जार्तार् है। 
  5. दूरस्थ शिक्षार् क नियोजन किसी शैक्षिक संस्थार् एवं संगठन द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। इस प्रकार यह व्यक्गित अध्ययन से भिन्न है। इस प्रणार्ली में शिक्षक कक्षार् तथार् विद्यार्लय की आवश्यकतार् नहीं पड़ती है। 
  6. इसमें आयु एवं समय की आबद्धतार् नहीं है, यह आवश्यकतार् आधार्रित है।
  7. इसमें शिक्षक एवं शिक्षाथी दोनों एक-दूसरे से अलग हेार्ते हैं, और आपस में सीधार् सम्पर्क व प्रत्यक्ष संवार्द नहीं यार् न्यूनतम रहतार् है। दोनो दूर रहकर अपने दार्यित्वों क निर्वहन करते हैं। 
  8. दूरस्थ शिक्षार् में विद्याथियों को स्व-निर्मित वार्तार्वरण में स्व-निर्देशित स्व अर्मिार्गम क अवसर दियार् जार्तार् है। 
  9. शिक्षाथियों को अधिगम सार्मग्री के सम्प्रेषण के लिये मुद्रित, तकनीकी, संचार्र मार्ध्यमों क प्रयोग कियार् जार्तार् है, जैसे- रेडियो, दूरदर्णन, वीडियो, कैसेट्स, तथार् कम्प्यूटर सहार्यिक अधिगम, प्रिन्टेड पत्र पत्रिकायें प्रयुक्त होते हैं।
  10. इस प्रणार्ली में शिक्षक एवं शिक्षाथियों के मार्ध्यम द्विपक्षीय सम्पर्क बनार् रहतार् है। शिक्षक की सार्मग्री के प्रस्तुतीकरण को समार्कलित एवं सम्पोशित करतार् रहतार् है।
  11. यह प्रणार्ली शिक्षाथियों क आवश्यकतार् एवं व्यवसार्यनुरूप उसके ज्ञार्न एवं कौशल में वश्द्धि करने तथार् उसमें परिमाजन लार्ने के लिये शिक्षण, पुन: शिक्षण क अवसर प्रदार्न करने में सक्षम है।
  12. विद्याथियों क अपने ही समूह के सदस्यों से अलगार्व रहतार् है। 
  13. यह शिक्षण व अधिगम क एक औद्योगीकश्त रूप है। 
  14. यह शैक्षिक प्रक्रियार् क वैयक्तीकरण को बढ़ार्वार् देतार् है। 

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् के समकालिक प्रत्यय 

दूरस्थ शिक्षार् के सम्प्रत्यय को स्पष्ट समझने की आवश्यकतार् है, क्योंकि कर्इ समकालिक शब्दों जैसे गैर परम्परार्गत शिक्षार्, अनौपचार्रिक शिक्षार्, मुक्त शिक्षार्, प्रत्रार्चार्र शिक्षार्, दूरस्थ शिक्षार् आदि मिलते-जुलते है, इससे यह स्पष्ट है कि दूरस्थ शिक्षार् शब्द को लेकर भ्रार्ंतियार्ं है, वैसे तो उपरोक्त सभी प्रकार की शिक्षार्प्रणार्ली में कुछ समार्नतार्यें, समार्न उद्देश्य व समार्न दर्णन के तथ्य उभर कर आते हैं, कुछ विणेणतार्यें एक जैसी होने के बार्द भी ये सभी शब्द समार्नाथी नहीं है, और अधिगम में मुक्ततार् की भार्वनार् की मार्त्रार् सभी में अलग है। हमें दूरस्थ शिक्षार् को समझने के लिये पत्रार्चार्र शिक्षार्, मुक्त शिक्षार्, दूरवर्ती शिक्षार्, अनौपचार्रिक शिक्षार् के सम्प्रत्यय को समझनार् आवश्यक है।

1. मुक्त शिक्षार् – 

इस शिक्षार् प्रणार्ली में यह परम्परार्गत नियमों के तहत सम्पूर्ण शिक्षार् व्यवस्थार् संचार्लित नहीं होती है। यह मुक्ति क सम्प्रत्यय है, जिसमे नियमों परिनियमों के बन्धन अधिक न हो अर्थार्त् प्रवेण नियम, उपस्थिति की बार्ध्यतार्, परीक्षार् सम्बंधी नियम, पार्ठ्यक्रम प्रकार व समय के सम्बंधित प्रतिबंध, शिक्षणार्त्मक कार्यों से सम्बंधित नियम इत्यार्दि। इनकी अधिक से अधिक कमी ही मुक्ततार् की मार्त्रार् को बढ़ार्येगार्। सभी पत्रार्चार्र शिक्षार् व दूरवर्ती शिक्षार् मुक्त हो और परम्परार्गत शिक्षार् से अपने व्यवस्थार् एवं नियमों परिनियमों में लचीलार्पन अपनार्कर मुक्त शिक्षार् प्रदार्न करने वार्लार् हो सकतार् है।

2. पत्रार्चार्र शिक्षार्- 

पत्रार्चार्र शिक्षार् एक ऐसी प्रकार की शिक्षार् है, जिसमें अध्यते ार् को मुद्रित अथवार् सार्इक्लोस्टार्इल्ड सार्मग्री विद्याथियों को डार्क द्वार्रार् भेजी जार्ती है तथार् ये मुद्रित सार्मग्री शिक्षकों द्वार्रार् कक्षार् शिक्षण के प्रस्तुतीकरण के रूप में होती है, और एक पक्षीय सम्प्रेषण के रूप में सम्बंध स्थार्पन हो जार्तार् है, परन्तु इनमें प्रवेण परम्परार्गत पार्ठ्यक्रमों के समार्न ही होतार् है, इस विधार् में कक्षार् शिक्षण यार् प्रत्यक्ष सम्बंध एवं सम्प्रेषण नहीं हेार्तार् और शिक्षकों के व्यार्ख्यार्न रूप में शैक्षशिक सार्मग्री को वितरित करने क कार्य कियार् जार्तार् है।

3. दूरवर्ती/दूरस्थ शिक्षार् – 

यह पत्रार्चार्र शिक्षार् क ही विणुद्ध रूप है यार् यह कहार् जार् सकतार् है कि पत्रार्चार्र शिक्षार् पर ही दूरवर्ती शिक्षार् क उद्भव हुआ। दरअसल दूरवर्ती शिक्षार् क उद्भव पहले हुआ और कनार्डार् में सन् 1982 में आयोजित पत्रार्चार्र शिक्षार् की अन्तर्रार्ष्ट्रीय परिषद् के बार्रहवें विश्व सम्मेलन में ‘‘पत्रार्चार्र शिक्षार्’’ को ही ‘‘दूरवर्ती शिक्षार्’’ के नार्म में बदल दियार् गयार्, और अपने परिषद् क नार्म भी ‘‘दूरवर्ती शिक्षार् की अन्तर्रार्ष्ट्रीय परिषद्’’ रखार्। दूसरी ओर ब्रिटिश ओपन यूनिवर्सिटी की स्थार्पनार् से पत्रार्चार्र शिक्षार् के नार्म पर बहस हो रही थी और 1982 में दूरस्थ शिक्षार् नार्म पर सर्वसम्मति बन सकी। दूरवर्ती एवं दूरस्थ शिक्षार् एक ही शब्द के लिये प्रयुक्त होने वार्ले शब्द है। इसमें प्रत्यक्ष सम्प्रेषण नहीं हेार्तार् है एवं मौखिक सम्प्रेषण द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली स्वार्भार्विक गतिणीलतार् क अभार्व होतार् है। इसमें शिक्षक की उपस्थिति से उत्पन्न होने वार्ली शैक्षिक जीवन्ततार् की कमी के दोष् ार् से युक्त होती है पर शैक्षिक अधिगम सार्मग्री को प्रत्यक्ष सम्प्रेषण प्रणार्ली के तत्वों में वश्द्धि करके छार्त्रों के अधिगम अनुभवों के परिवेण के अनुरूप निर्मित करके पूर्ण करने क प्रयार्स करती है।

4. अनौपचार्रिक शिक्षार्-

शिक्षार् की वह विधार् जिसमें 6 से 14 वर्ष वर्ग के बच्चों को आधार्रभूत सार्क्षरतार् प्रदार्न करने व कुणलतार्ओं को विकसित करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। विशेषकर स्कूल न जार्ने वार्ले बच्चों के लिये जिन्होनें पढ़ाइ छोड़ दी। यह शिक्षार् परम्परार्गत, रूढ़िवार्दितार् एवं जटिलतार्ओं से मुक्त होती है। यह औपचार्रिक शिक्षार् क विस्तृत एवं लचीलार् रूप है। इसमें समय, स्थार्न, सत्र एवं प्रवेण, नियमन सरल एवं लचीले तथार् व्यार्पक होते है। यह सार्मार्जिक मार्ंग व सुविधार् के अनुसार्र ही दी जार्ती है। शिक्षाथी अपने खार्ली समय में इस शिक्षार् को प्रार्प्त करते हैं। अनौपचार्रिक शिक्षार् से अभिप्रार्य उस शिक्षार् प्रक्रियार् से है, जो व्यक्ति को प्रत्येक स्थार्न, समय व परिस्थिति में औपचार्रिकेतर रूप से नार्गरिकों को कुणलतार्पूर्वक जीवन जीने की योग्यतार् प्रदार्न करती है। यह औपचार्रिक शिक्षार् की विरोधी नहीं वरन् उसकी सहार्यक है। औपचार्रिक शिक्षार् की सीमार् जहार्ं समार्प्त होती है, वहार्ं से औपचार्रिकेतर शिक्षार् की सीमार् प्रार्रम्भ होती है, और जो अनवरत् चलती रहती है।
उपरोक्त विवेचनार्ओं से यह स्पष्ट है कि दूरवर्ती शिक्षार् के प्रयोग से शिक्षार् प्रणार्ली में खुलार्पन आतार् है अत: मुक्त विश्वविद्यार्लय दूरस्थ शिक्षार् प्रणार्ली क ही प्रयोग करते हैं।

अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर मुक्त अधिगम के स्थार्न पर ‘दूरस्थ शिक्षार्’ शब्द क प्रचलन अधिक है और कुछ अन्य छोटे शब्द भी बोले जार्ती है, जिनमें भ्रम न हेार् अत: उनकी चर्चार् नीचे की जार् रही है। 

  1. स्वतंत्र अध्ययन – वडे मेयर ने स्वतत्रं अधिगम/अध्यन शब्द क प्रयोग सर्वार्धिक कियार् है। इसीलिये अमेरिक में इस शब्द क प्रचलन बढ़ार् है।
  2. बार्ह्य परिसर अध्ययन- विद्यार्लय के अन्दर प्रदार्न किये जार्ने वार्ली परम्परार्गत शिक्षार् से अलग हटकर दी जार्ने वार्ली शिक्षार् ही बार्ह्य परिसर अध् ययन कही जार् सकती है। इस शिक्षार् की मुख्य विणेणतार् परिसर के अन्दर के बन्धनों से मुक्ति है। इस शब्द क मुख्य रूप से प्रयोग आस्टे्रलियार् एवं दक्षिण पूर्व एशियाइ देणों में होतार् है।
  3. बार्ह्य प्रणार्ली/ अध्ययन – लन्दन में बार्हय् प्रणार्ली शब्द अत्यधिक पच्र लित थार्। इस प्रणार्ली में विद्यार्थ्र्ार्ी बिनार् शिक्षण के मार्न्यतार् प्रार्प्त शिक्षण संस्थार्ओं से परीक्षार् उत्तीर्ण करने क अवसर दियार् जार्तार् है। इस शिक्षार् में भी शिक्षाथियों को कक्षार् शिक्षण हेतु उपस्थिति की अनिवायतार् नहीं होती। इस प्रत्यय में भी मुक्त अधिगम के सभी गुण परिलक्षित नहीं होते हैं, न ही यह दूरस्थ शिक्षार् के जितनार् स्पष्ट है। यह शब्द आस्टे्रलियार् में प्रयुक्त होतार् है।
  4. गृह अध्ययन- इसक सीधार् अभिप्रार्य है विद्याथियो को बन्धनों से उन्मुक्त मुक्त वार्तार्वरण में स्वयं अध्ययन करने हेतु अवसर प्रदार्न करनार्। इस शब्द क सर्वप्रथम प्रयोग ‘‘स्वीडिस स्कूल आफ करेस्पार्न्डेन्स कोर्सेज’’ के द्वार्रार् कियार् गयार्। अब यह शब्द यूरोप में ही प्रयोग में लार्यार् जार्तार् है। 

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् और परम्परार्गत शिक्षार् में अन्तर 

दूरस्थ शिक्षार् के सम्प्रत्यय को समझने के लिये यह आवश्यक है कि इससे परम्परार्गत शिक्षार् के अलगार्व को समझार् जार्ये। हम मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् को इस प्रकार से परम्परार्गत शिक्षार् से अलग इन बिन्दुओं पर देख सकते है-

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् और परम्परार्गत शिक्षार् में अन्तर 

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् परम्परार्गत शिक्षार्
इस व्यवस्थार् में शैक्षिक तकनीकी क बहुत अधिक प्रयोग है।  इस व्यवस्थार् में सम्प्रेषण क आधार्र
शैक्षिक, विधियार्ं है एव प्रत्यक्ष सम्प्रेषण है।
इस विधार् में प्रत्यक्ष कक्षार् शिक्षार् क प्रार्वधार्न नहीं है। इसमें प्रत्यक्ष कक्षार् शिक्षण ही शिक्षार् की मुख्य प्रक्रियार् है।
दूरस्थ शिक्षार् में आयु, प्रवेण,नियम, व्यार्वसार्यिक पार्ठ्यक्रमों को छोड़कर अधिकांशत: में नही के बरार्बर है। इसमें आयु, प्रवेण एवं पूर्व उपलब्धि पार्ठ्यक्रम में उपलब्धि सम्बंधित से सम्बंधित कठोर नियम होते हैं। 
इसमें शिक्षक एवं छार्त्र के बीच प्रत्यक्ष कक्षार्गत व्यवहार्र नहीं हेार्तार् है। यह शिक्षक एवं छार्त्र के बीच प्रत्यक्षकक्षार्गत परिस्थितियों में सम्पन्न होने वार्ली शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् है।
यह विद्याथियों को मुद्रित सार्मग्री प्रदार्न करती है।  यह विद्याथियों को मुद्रित सार्मग्री नही देती है। इसमें मौखिक अभिव्यक्ति क मुख्य स्थार्न है।
यह विधार् विद्यार्लयी बन्धनों से उन्मुक्त है। यह शिक्षार् विद्यार्लयी बन्धनों से युक्त है।
यह विद्याथियों को प्रथम स्थार्न देकर स्वतंत्र अध्ययन व स्वगति से बढ़ने हुए भी गौण रहतार् है और अध्ययन हेतु प्रेरित करतार् है। इसमें विद्याथियों क प्रथम स्थार्न होत पार्ठ्यक्रम एवं उपलब्ध समय के आधार्र पर संचार्लित होतार् है।
यह विद्याथियों की रूचि एवं आवश्यकतार् पर आधार्रित है। यह विद्याथियेार्ं की रूचि एवं आवश्यकतार् से पूर्णतयार् सम्बंध नहीं रख पार्ती है।
इसमें विद्याथी स्वप्रेरित व स्वनिर्देशित हेार्तार् है। इसमें विद्याथी शिक्षक प्रेरित एवं शिक्षक निर्देशित होतार् है।
यह अत्यधिक लचीली है और अध्येतार् के समय आवश्यकतार् एवं स्थार्न के सार्पेक्ष ढल जार् रही है। यह लचीली नहीं है।
इसमें अध्यार्पक परार्मर्णदार्तार् और यही कार्य भी करतार् है। इस प्रणार्ली में शिक्षण करने वार्लार् कहलार्तार् है, शिक्षक/शिक्षिक कहलार्ते है।
इस व्यवस्थार् में अधिगम करने दूर- अध्येतार् कहलार्ते हैं  इसमें अधिगम करने वार्लार् वार्लेशिक्षाथी कहलार्तार् है।
दूरस्थ शिक्षार् क प्रार्रूप स्पष्ट एवं पहचार्न में आ सकने वार्लार् नहीं होतार् है। परम्परार्गत शिक्षार् क प्रार्रूप स्पष्ट एव पहचार्न में आ सकने वार्लार् होतार् है।
यह वार्स्तविक जीवन से जुड़ी हुर्इ शिक्षार् है।  इसमें जीवन से वार्स्तविक सम्बंध क अभार्व पार्यार् जार्तार् है।
शिक्षक-छार्त्र के प्रत्यक्ष सम्पर्क न होने के कारण यह कम जीवन्त के कारण यह अधिक जीवन्त रहती मार्नी जार्ती है। शिक्षक-छार्त्र के प्रत्यक्ष सम्पर्क होने है।

मुक्त एवं दूरूरस्थ शिक्षार् की आवश्यकतार् 

दूरस्थ शिक्षार् व्यवस्थार् वर्तमार्न शिक्षार् व्यवस्थार् क पर्यार्य बन चुकी है। दीर्घकाल में इसकी आवश्यकतार् और बढ़ेगी। 21वीं सदी में दूरस्थ शिक्षार् अपने स्वतंत्र एवं महत्वपूर्ण अनुशार्सनार्त्मक अस्तित्व के सार्थ शिक्षार् जगत में नयार् इतिहार्स रच रही है। दूरस्थ शिक्षार् मुक्त शिक्षार् के रूप में अपने अभिनव स्वरूप के सार्थ उध्र्वगार्मी यार्त्रार् कर रही है। दूरस्थ शिक्षार् को शिक्षार् में नवार्चार्र न मार्नकर मुक्त शिक्षार् को दूरस्थ शिक्षार् में नवार्चार्र के रूप में मार्ननार् चार्हिये। 

  1. परम्परार्गत शिक्षार् व्यवस्थार् अपनी अपरिवर्तनणील कठोर नियमों में आबद्धतार् के कारण आधुनिक वैज्ञार्निक और तकनीकी युग की शैक्षिक आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने में सक्षम नहीं है और दूरस्थ शिक्षार् इन आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने क प्रयार्स कर रही है। 
  2. यह विधार् लार्गत प्रभार्वी ही नहीं लार्गत कुणल भी है। यह नम्य व नवार्चार्रार्त्मक शिक्षार् प्रणार्ली को बढ़ार्वार् देती है। 
  3. यह प्रणार्ली सार्मार्जिक शैक्षिक एवं आर्थिक स्थितियों के कारण उत्पन्न पश्थकतार् को दूर करने में सहार्यतार् प्रदार्न करती है। 
  4. यह प्रणार्ली लोकतंत्र समार्ज की सभी आवश्यकतार्ओं को पूरार् करते हुये भार्रतीय संविधार्न में सभी के लिये शिक्षार् के समार्न अवसर प्रदार्न करने में सक्षम है।
  5. यह प्रणार्ली कम खर्चीली है इसमें अध्येतार्ओं को परम्परार्गत शिक्षार् की अपेक्षार् कर्म खर्च करनार् पड़ रहार् है। 
  6. दूरस्थ शिक्षार् प्रणार्ली देण के 75 प्रतिशत गार्ंवो में बस रही जनसंख्यार् को भी शिक्षार् प्रदार्न करने में सक्षम हैं। 
  7. यह शिक्षार् प्रणार्ली व्यवस्थार् विभिन्न व्यवसार्यों में कार्यरत लोगों को भी आगे पढ़ने के सुअवसर प्रदार्न करती है।
  8. यह प्रणार्ली घर-घर शिक्षार् उपलब्ध करार्ने में असमर्थ परम्परार्गत शिक्षार् प्रणार्ली के पूरक के रूप में कार्य कर रही है। 
  9. यह प्रणार्ली सार्मार्जिक व आर्थिक रूप में पिछड़े लोगों को समार्ज के उपयोगी नार्गरिक बनने में सहार्यतार् करती है। 
  10.  विभिन्न व्यवसार्यों से सम्बंधित पार्ठ्यक्रमों को संचार्लित कर यह घर बैठे लोगों को व्यवसार्य विणेण में प्रशिक्षित कर आत्म निर्भर बनार्ने में विणेण योगदार्न निभार् रही है। 
  11. दूरस्थ शिक्षार् सभी शैक्षिक उपलब्धि वार्ले विद्याथियों केार् आगे की शिक्षार् प्रार्प्त करने व निरन्तरतार् रखने क आधार्र प्रदार्न करती है। 
  12. दूरस्थ शिक्षार् प्रणार्ली हमार्री शिक्षार् व्यवस्थार् को भूण्मण्डीकरण के चुनौतियों के अनुरूप तैयार्र करने में समर्थ है क्योंकि इसक प्रचार्र-प्रसार्र क क्षेत्र व्यार्पक है, और यह आन लार्इन शिक्षण एवं मूल्यार्ंकन की व्यवस्थार् देती है, और तकनीकी सार्धनों, प्रिन्ट, दश्ण्य श्रब्य, एवं कम्प्यूटर क प्रयोग करके इस प्रणार्ली को अधिक आधुनिक बनार् दियार् गयार् है। 

मुक्त एवं दूरूरस्थ शिक्षार् के विभिन्न सिद्धार्न्त 

दूरस्थ शिक्षार् व्यवस्थार् की अपनी विशिष्ट प्रकृति है और यही प्रकृति विभिन्न सिद्धार्न्तों के रूप में परिलक्षित होती है। प्रमुख विचार्रकों ने दूरस्थ शिक्षार् के भिन्न सिद्धार्न्त बतार्ये हैं। यह सिद्धार्न्त है- 

  1. चार्ल्र्स बेडेमियर क स्वतंत्र अध्ययन क सिद्धार्न्त। 
  2. मार्इकेन मुरे के स्वतंत्र अध्ययन क पुनरार्वलोकित सिद्धार्न्त। 
  3.  आटोपीटर्स क शिक्षण अधिगम क औद्योगिकश्त रूप क सिद्धार्न्त। 
  4. बोजी होमबर्ग क निर्देशित शैक्षिक वातार्लार्प क सिद्धार्न्त।
  5. जॉन बार्थ क द्विमागी डार्क सम्प्रेषण क सिद्धार्न्त।
  6. डेविड स्पाट क शिक्षण अधिगम के औद्योगिकश्त रूप में मार्नवीय तत्व क सिद्धार्न्त। 

उपरोक्त सभी सिद्धार्न्त सम्पूर्ण दूरस्थ शिक्षार् प्रणार्ली की विवेचनार् करते हैं, इनको विस्तृत रूप में हम आगे पढ़ेंगे।

1- चार्ल्र्स बेडेमियर क स्वतंत्रत अध्ययन क सिद्धार्न्त- 

अमेरिक के विस्कान्सिल विश्वविद्यार्लय में शिक्षार् के प्रोफेसर रह चुके बेडेमियर 1960 से 1970 तक दूरस्थ शिक्षार् प्रणार्ली से जुड़े रहे। बेडेमियर ने दूरस्थ शिक्षार् व परम्परार्गत शिक्षार् व्यवस्थार् को आमने-सार्मने रखकर उनके मध्य अन्तर क विण्लेणण कियार् जो कि दूरस्थ शिक्षार् की पहचार्न के रूप में उभरे हैं। 

शिक्षाथी की स्वतंत्रतार्- बडेमियर के सभी लेखों में स्वतत्रं अध्ययन, मुक्त अधिगम व दूरस्थ शिक्षार् क उल्लेख मिलार्। संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में उच्च स्तर के पत्रार्चार्र पार्ठ्यक्रम ‘‘स्वतंत्र अध्ययन’’ शब्द के रूप में पुकारार् जार्तार् है। मुक्त अधिगम शब्द ने ही मुक्त विश्वविद्यार्लय शब्द की उत्पत्ति की, और दूरस्थ शिक्षार् ने ‘‘पत्रार्चार्र शिक्षार्’’ शब्द क स्थार्न लियार्। बेडेमियर ने शिक्षाथी स्वतंत्रतार् को मुख्य रूप से मुक्त शिक्षार् क आधार्र बतार्यार् है, उनके अनुसार्र- ‘‘स्वतंत्रत अध्ययन के अन्तर्गत वे शिक्षण संस्थार्यें आती है, जिनमें शिक्षक व शिक्षाथी एक-दूसरे से अलग रहते हुये अपने कार्यों एवं उत्तरार्दार्यित्वों क निर्वहन करते हैं। इसक उद्देश्य विद्यार्लयी आबद्ध नियमों से शिक्षाथियों केार् उन्मुक्त रखते हुये स्वतंत्र वार्तार्वरण में अध्ययन हेतु अवसर प्रदार्न करनार् तथार् स्वगति से स्वनिर्देशित होकर आगे बढ़ने की क्षमतार् क विकास करनार् है।’’ 

इस परिभार्षार् में उदार्रवार्दी दश्ण्टिकोण क आभार्स मिलतार् है। उनके अनुसार्र बार्लक की आयु सार्मार्जिक, आर्थिक, व्यार्वसार्यिक, स्वार्स्थ्य सम्बंधी कोर्इ भी समस्यार् शिक्षार् प्रार्प्त करने के मध्य नहीं, आ सकती है। ऐसी शिक्षार् व्यवस्थार् ही ‘‘स्वतंत्र अध्ययन’’ कहलार् सकती है।

  1. स्वतंत्रत अध्ययन के अन्तर्गत शिक्षाथी को स्वतंत्रतार् होगी अपने ढंग, अपने गति से सीखने का। 
  2. अपने शैक्षिक लक्ष्यों को अपने तरीके से चयन करने की स्वतंत्रतार् होगी।
  3. अपने अध्ययन में उपलब्ध मार्ध्यमों एवं संसार्धनों क अधिकतम उपयोग कर सकेगार्। अपने अध्ययन क उत्तरदार्यित्व एवं मूल्यार्ंकन कर सकेगार्।

अ)-शिक्षक शिक्षाथी की दूरी- छार्त्र स्वतत्रं तार् क सबसे बडार् आधार्र शिक्षक से दूरी होगी। बेडेमियर ने इसको स्पष्ट कियार् कि कक्षार्-कक्ष के शिक्षण में शिक्षक, शिक्षार्थ्र्ार्ी, पार्ठ्यक्रम व सम्प्रेषण होतार् है। परन्तु दूरस्थ शिक्षार् में कक्षार्-कक्ष में निहित गतिविधि को लिखित एंव मुद्रित सार्मग्री के रूप में प्रस्तुत कियार् जार्तार् है और यह मुद्रित सार्मग्री शिक्षक द्वार्रार् दिये गये व्यार्ख्यार्न एवं मध्य में किये मूल्यार्ंकन (बोध प्रण्नों) एवं स्पष्टीकरण को समेटे रहती है। शिक्षक और छार्त्र के मध्य दूरी से यह स्पष्ट होतार् है कि-

  1. शिक्षाथी अपनी अधिगम क्रियार्ओं केार् प्रार्रम्भ करने, गति प्रदार्न करने तथार् समार्प्त करने के लिये स्वतंत्रत होतार् है और असफलतार् के लिये जिम्मेदार्र होतार् है। 
  2. शिक्षाथी को अपने परिवेण में अपने ढंग से अध्ययन क अवसर प्रार्प्त होतार् है। 
  3. शिक्षक एवं छार्त्र दोनेार्ं के लार्भ के लिये अन्य सम्भव मार्ध्यम जैसे मुद्रित सार्मग्री, श्रव्य दृण्य सार्धन आदि क उपयोग कियार् जार्तार् है। 
  4. अधिगम को अधिक प्रार्ंसगिक बनार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। 

ब)-संरचनार्त्मक व्यवस्थार्- दूरस्थ शिक्षार् शिक्षक एवं शिक्षाथी दार्ने ार् ें को आवश्यक सार्ंस्कश्तिक परिवर्तन करने के लिये बार्ध्य करती है। दोनों की भूमिक में परम्परार्गत शिक्षार् व्यवस्थार् से अधिक अन्तर है, इसमें शिक्षाथी को अपेक्षार्कश्त अधिक उत्तरदार्यित्व निर्वहन करनार् पड़तार् है।

  1. शिक्षाथी को पार्ठ्यवस्तु व अध्ययन विधि चयन की स्वतंत्रतार् है।
  2. शिक्षाथी व्यक्तिगत भिन्नतार्ओं के आधार्र पर ही अधिगम कर पार्ते हैं, और अपनी गति के आधार्र पर पार्ठ्यक्रम को पूर्ण करने की स्वतंत्रतार् होती है।
  3. विद्याथियों की उपलब्धि क मूल्यार्ंकन स्वतंत्र ढंग से कियार् जार्तार् है।
  4. शिक्षार् पार्ठ्यवस्तु की व्यवस्थार्पक के रूप में कार्य करतार् है, तथार् प्रशार्सनिक कार्यों से मुक्त रहतार् है। 
  5. शिक्षक कक्षार्-कक्ष में परार्मर्शदार्तार् के रूप में कार्य करतार् है। 
  6. सम्पूर्ण सहार्यक प्रणार्ली को शिक्षाथी के परिस्थिति के अनुरूप ही संचार्लित करनार् पड़तार् है। बेडेमियर के अनुसार्र शिक्षार् की जिस प्रणार्ली में यह गुण होते हैं वही स्वतंत्रत अध्ययन हेार्ती है। 

2. मार्इकल मूरे- स्वतंत्र अध्ययन की पुनरार्वलोकित सिद्धार्न्त- 

मार्इकले मूरे ने भी संयुक्त रार्ज्य अमेरिक की नोवार् स्कोटियार् एवं विसकान्सिन विश्वविद्यार्लय के शिक्षार् विभार्ग व ब्रिटिश मुक्त विश्वविद्यार्लय के वरिष्ठ काउन्सलर के अनुभवों के आधार्र पर दूरस्थ शिक्षार् के सिद्धार्न्तों को प्रतिपार्दित कियार् है। इन्होनें स्वतंत्र सिद्धार्न्त प्रस्तुत करने के बजार्य बेडेमियर के विचार्रों की ही अन्तर्दश्ष्टि एवं विश्लेषणार्त्मक प्रतिमार्न प्रस्तुत कियार् है। 

स्वतंत्रत अध्ययन के सम्बंध में मूरे क विचार्र- मूरे परम्परार्गत शिक्षार् प्रणार्ली में विद्यार्लय वार्तार्वरण को प्रमुख मार्नते हैं, क्योंकि कक्षार्-कक्ष के क्रियार्कलार्प शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् को प्रभार्वित करतार् है। दूरस्थ शिक्षण में दूरी एवं स्वतंत्रतार् दोनों निहित होते हैं। संवार्द एवं संरचनार् विहिनतार् ही दूरस्थ शिक्षार् व्यवस्थार् को अन्य शिक्षार् व्यवस्थार् से अलग करतार् है। 

  1. दूरस्थ शिक्षार् में कक्षार्-कक्ष के संवार्द को टेलीफोन, पत्रार्चार्र, दूरदर्शन, मुद्रित पार्ठ्यसमार्ग्री एवं अभिक्रमित अनुदेशन एवं कम्प्यूटर आधार्रित अनुदेशन के मार्ध्यम से कियार् जार्तार् है परन्तु टेलीफोन व पत्रार्चार्र से द्विपक्षीय संवार्द भी स्थार्पित होतार् है। 
  2. परम्परार्गत शिक्षार् व्यवस्थार् में शैक्षिक कार्यक्रमों की एक निश्चित संरचनार् एवं स्वरूप होतार् है। 

इसक तार्त्पर्य यह है कि औपचार्रिक शिक्षार् में उद्देश्य, अध्ययन विधियार्ं, पार्ठ्य सार्मग्री एवं मूल्यार्ंकन विधियों आदि पहले से ही निश्चित होते हैं तथार् निर्धार्रण में शिक्षाथियों की समस्यार्ओं की अनदेखी हो जार्ती है। इसके विपरित एसे शैक्षिक कार्यक्रम क जिसमें शिक्षाथियों की विशेषतार्ओं की विविधतार् के अनुरूप पर्यार्प्त लचीलार्पन हो, कोर्इ निश्चित स्वरूप नहीं हो सकतार् क्योंकि इसमें संरचनार् क अभार्व होतार् है, और यही अभार्व अधिगम के वैयक्तिकरण को सम्भव बनार्तार् है, क्योंकि इसमें शिक्षाथियों को ध्यार्न में रखकर उद्देश्य, विधियार्ं, पार्ठ्यसार्मग्री एवं मूल्यार्ंकन प्रणार्ली को निर्धार्रित कियार् जार्तार् है। 

शिक्षाथी स्वतंत्रतार्- परम्परार्गत शिक्षार् व्यवस्थार् शिक्षक निधारित होती है पर जब शिक्षण के उद्देश्य, विधियार्ं एवं शिक्षण सार्मग्री विद्याथी को देखकर निर्धार्रित किये जार्ते हैं, तब उसे हम शिक्षाथी निर्धार्रित कार्यक्रम कहेंगे। किसी कार्यक्रम में प्रदार्न की गयी शिक्षाथी स्वतंत्रतार् की मार्त्रार् के आधार्र पर उसे शिक्षाथी निर्धार्रित अर्थार्त् स्वतंत्र की संज्ञार् दी जार् सकती है। 

3. ऑटो पीटर्स की शिक्षण अधिगम के औद्योगीकश्त रूप क सिद्धार्न्त- 

जर्मनी के दूरस्थ शिक्षार् संस्थार्न में कार्य करते हुये आटो पीटर्स ने इस सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। सन् 1975 र्इ0 में उन्होनें जर्मनी के मुक्त विश्वविद्यार्लय के प्रथम वार्इस चार्न्सलर के रूप में कार्य करते हुये यह अनुभव कियार् कि उच्च विकसित समार्ज में वर्तमार्न की आवश्यकतार् के अनुसार्र शिक्षार् की आवश्यकतार् है जो कि परम्परार्गत शिक्षार् से सम्भव नहीं है, इन्होनें अपने विचार्र 1960 के दशक में अपनी पुस्तक ‘‘दि डिडेक्टिव स्ट्रकचर ऑफ डिस्टैन्स टिचींग इन्वेस्टीगेसन्स टुवर्डस एन इन्डस्ट्रिलार्इज्ड फाम आफ टीचिंग एण्ड लर्निंग’’ में लिखार्। इन्हेार्नें यह स्पष्ट कियार् कि दूरस्थ शिक्षार् की विषयवस्तु संक्षिप्त, स्पष्ट एवं बोधगम्य होती है, और शिक्षार् विधियार्ं परम्परार्गत शिक्षार् विधियों से बहुत अधिक भिन्न है। इनके अनुसार्र दूरस्थ शिक्षार् व्यवस्थार् के प्रमुख औद्योगिक विशेषतार्यें है- 

  1. श्रम क विभार्जन अर्थार्त् प्रत्येक स्तर पर विषय विशेषज्ञ, कोर्स लेखक, अनुदेशन सार्मग्री सम्पार्दक, मुद्रक, प्रेशक आदि होतार् है। यह सम्पूर्ण शैक्षशिक प्रक्रियार् पर भी लार्गू होतार् है। 
  2. दूरस्थ शिक्षार् में उद्योगो की भार्ंति व्यार्पक स्तर पर बढ़ती मार्ंग के अनुरूप शिक्षण सार्मग्री क उत्पार्दन कियार् जार्तार् है।
  3. कार्य प्रणार्ली को सुव्यवस्थित कियार् जार्तार् है, जिसमें नियोजन, प्रक्रियार् क औपचार्रीकरण उत्पार्दन क मार्नकीकरण, समूची प्रक्रियार् क व्यवस्थीकरण, मणीनीकरण जैसे सभी पक्ष सम्मिलित किये जार्ते हैं।
  4. पीटर्स के अनुसार्र मुक्त विश्वविद्यार्लय के परिसर क प्रार्रूप परम्परार्गत विश्वविद्यार्लयों के प्रार्रूप से भिन्न हेार्तार् है। यह काफी हद तक औद्योगिक क्षेत्रों के प्रार्रूपों जैसे हेार्ते है। 
  5. पीटर्स के अनुसार्र शैक्षिक सम्प्रेषण बनार्वटी होतार् है।
  6. दूरस्थ शिक्षार् में शिक्षक की भूमिक प्रबंधक जैसी है। इस व्यवस्थार् में शिक्षक तथार् शिक्षार्थ्र्ार्ी देार्नेार्ं की भूमिकाओं एवं प्रकृति में परिवर्तन आ जार्तार् है। 

4. बोर्जी होमबर्ग क निर्देशित शैक्षिक वातार्लार्प क सिद्धार्न्त – 

बोर्जी होमबर्ग ने एक प्रार्ध्यार्पक के रूप में 1956 में स्वीडन के हार्मॉडस पत्रार्चार्र शिक्षार् संस्थार्न में कार्य करते हुये दूरस्थ शिक्षार् की ओर प्रवश्त्त हुये थे। ये आगे चलकर पश्चिमी जर्मनी ने फर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुये। इनके अनुसार्र शिक्षार् क सार्र ‘‘व्यक्तिगत शिक्षाथी द्वार्रार् सीखनार्’’ होतार् है। व्यक्तिगत अध्ययन हेतु दूरस्थ मार्ध्यम सर्वोत्तम है, क्येार्ंकि यह अध्येतार् को पूर्ण स्वतंत्रतार् देतार् है, इसमें अध्येतार् को रेडियो, दूरदर्शन, श्रव्य दश्ण्य कैसेट, टेलीफोन, कम्प्यूटर व सम्पर्क कार्यक्रम के द्वार्रार् शिक्षण आदि को चुनने तथार् उनसे लार्भ उठार्ने की स्वतंत्रतार् होती है। सीखने व शैक्षिक लक्ष्यों को प्रार्प्त करने क दार्यित्व अध्येतार् क होतार् है। इनके अनुसार्र शैक्षिक वातार्लार्प दो प्रकार के होते हैं-

  1. वार्स्तविक व प्रत्यक्ष वातार्लार्प- यह द्विमागी हार्ते ार् है। यह दो व्यक्तियों यार् समूहों के आमने-सार्मने होने पर होतार् है, पर यह वार्स्तविक अन्त: क्रियार् को जन्म देतार् है। 
  2. नार्टकीय वातार्लार्प- इसमें अध्ययन सार्मग्री क प्रस्तुतीकरण एक तरफ से हार्ते ार् है, इसमें सम्पूर्ण शिक्षण प्रक्रियार् में अध्येतार् अकेलार् रहतार् है। इसमें पार्ठ्य सार्मग्री एक विशिष्ट ढंग से प्रस्तुत होती है। आप दूरस्थ शिक्षार् के विद्याथी होने के कारण यह समझ गये होंगे कि अप्रत्यक्ष वातार्लार्प की स्थिति उत्पन्न करने हेतु प्रस्तुत विषय सार्मग्री को एक विशिष्ट ढंग से प्रस्तुत करनार् होतार् है। हेार्मवर्ग ने इस सिद्धार्न्त को प्रतिपार्दित करते हुये कहार् कि ‘‘निर्देशित शैक्षशिक वातार्लार्प की विधि के रूप में मेरार् दूरस्थ शिक्षार् क सिद्धार्न्त यह बतलार्तार् है कि अच्छे दूरस्थ शिक्षार् की प्रकृति अधिगमोन्मुख निर्देशित वातार्लार्प से मेल खार्ती है तथार् इस प्रकार के वातार्लार्प के विशिष्ट तत्वों की उस्थिति अधिगम में सहार्यक होती है।’’ हेार्मवर्ग के अनुसार्र शैक्षशिक वातार्लार्प की विशेषतार्यें होनी चार्हिये- 
    1. अध्ययन सार्मग्री के बोधगम्यतार्, प्रस्तुतीकरण, स्पष्ट एवं शैक्षशिक भार्षार्, पठनीय लिखार्वट।
    2. विद्याथियों के लिये सहयोग एवं सुझार्व विचार्रों के आदार्न-प्रदार्न हेतु सुझार्व, निर्णय लेने की क्षमतार् व अध्येतार् को भार्वार्त्मक रूप से जोड़ने क प्रयार्स एवं सम्बोधन के व्यक्तिगत ढंग से होनार् चार्हिये।

5. जॉन बार्थ क द्विमागी डार्क सम्पे्रषण क सिद्धार्न्त- 

पूर्व में आप हार्मे बर्ग के सिद्धार्न्त को पढ़ चुके हैें। जॉन बार्थ के विचार्र उनसे अलग नहीं है। स्वीडन के मूल निवार्सी जार्न बार्थ क हार्रमार्डस पत्रार्चार्र शिक्षार् संस्थार्न से नार्म जुड़ार्। वार्थ क मार्ननार् है कि, शिक्षार् को औद्योगीकश्त रूप प्रदार्न कर दूरस्थ शिक्षार् ने जन शिक्षार् क रूप लियार् यह वार्स्तव में स्वतंत्र अध्ययन है। वार्थ के अनुसार्र पत्रार्चार्र शिक्षार् प्रणार्ली मे अध्येतार् शिक्षकों को कुछ प्रश्नों के उत्तर लिखकर मूल्यार्ंकन हेतु संस्थार्न भेजनार् होतार् है और ये कार्य सत्रीय कार्य कहलार्ते हैं। संस्थार्न दूर शिक्षक से यह कार्य मूल्यार्ंकन करवार्तार् है, जिसमें सुधार्र हेतु शिक्षक टिप्पणी देतार् है। ये टिप्पणी विद्याथी को प्रतिपुष्टि प्रदार्न कर प्रेरित करती है। परन्तु शिक्षार् के औद्योगीकश्त रूप में शिक्षक टिप्पणी के महत्व को नकार दियार् है। द्विमागी सम्प्रेषण ने शिक्षण टिप्पणी एक कडी क काम करती है। वार्थ के अनुसार्र प्रदत्त कार्यों पर शिक्षक की टिप्पणी क विशेष शैक्षशिक महत्व होने पर भी द्विमागी डार्क सम्प्रेषण के प्रयोग में कमी की प्रवश्त्ति दखेने को मिलती है। यह प्रवश्त्ति समार्प्त होनी चार्हिये। शिक्षण अधिगम में सुधार्र हेतु द्विमागी सम्प्रेषण आवश्यक है। 

6. डेविड स्र्वार्ट क शिक्षण अधिगम के औद्योगीकश्त रूप में मार्नवीय तत्व क सिद्धार्न्त- 

डेविड स्र्वार्ट ने 1973 में ब्रिटने के मुक्त विश्वविद्यार्लय में दरू वर्ती शिक्षार् के प्रार्प्त अनुभव के आधार्र पर कहार् कि दूरस्थ शिक्षार् में टयूटोरियल सेवार्ओं क बहुत अधिक महत्व है। स्र्वार्ट क मार्ननार् है कि दूरस्थ शिक्षार् वार्स्तव में जनशिक्षार् की संस्थार्ये हैं। इसमें विशार्ल समूह को अध्ययन पैकेज दी जार्ती है, परन्तु इनमें शिक्षक के कार्यों क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। वार्स्तव में दूरस्थ शिक्षार् में त्वरितपोषण क अभार्व एवं अपने समूह के सार्थियों से अन्त: क्रियार् क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। स्र्वार्ट दूरस्थ शिक्षार् में भी मार्नवीय सम्बधंों पर विशेष बल देते हैं। स्र्वार्ट के अनुसार्र दूरस्थ शिक्षार् में भी शिक्षाथियों की विविध समस्यार्ओं क समार्धार्न होनार् चार्हिये और त्वरित पोषण तत्व प्रार्प्त होनार् चहिये तथार् शिक्षाथियों को स्वयं के समूह में प्रतिपुष्टि क अवसर मिलनार् चार्हिये। 

मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् के आधार्रभूत तत्व 

दूरस्थ शिक्षार् जन शिक्षार् के रूप में प्रचलित व्यार्पक शैक्षिक प्रणार्ली है इसक सम्प्रेषण क्षेत्र व्यार्पक है, यह विस्तृत अध्ययन परिस्थितियों के अन्तर्गत कार्य करती है। यह संरचनार् एवं संगठन के दश्ष्टि से व्यार्पक शिक्षार् प्रणार्ली है। इस की संरचनार् के आभार्रभूत तत्व है-

  1. मुद्रित सार्मग्री- इसके अन्तगर्त पुस्तके स्वयं पठनीय मुिदत्र मार्गर्दिशिर्क ार्यें आदि सम्मिलित है। यह सर्वार्धिक महत्वपूर्ण अंग है।
  2. श्रव्य दृश्य सहार्यक सार्मग्री- प्रत्यक्ष सम्पेषण क अभार्व होने के कारण इन मार्ध्यमों को अधिक लोकप्रिय बनार्यार् गयार् है। इनके अन्तर्गत फिल्म, रेडियो, स्लार्इड व दृश्य-श्रव्य कैसेट हेार्ते हैं।
  3.  रेडियों एवं दूरदर्शन- जनसचं ार्र के मार्ध्यम एक मागीय सम्प्रेषण को प्रभार्वशार्ली बनार्ने क कारगर उपार्य है, इनसे सम्प्रेषण सुगमतार् पूर्वक एवं व्यार्पक स्तर पर हो जार्तार् है। समस्यार् समार्धार्न हेतु द्विमागी वातार्लार्प हेतु फोन – इन कार्यक्रम शिक्षक तथार् शिक्षाथी के बीच एक मजबूत कड़ी क कार्य करते हैं।
  4. कम्प्यूटर आधार्रित शिक्षण अधिगम- दूरस्थ शिक्षार् के प्रचार्र-प्रसार्र एवं सम्प्रेषण क मुख्य आधार्र कम्प्यूटर है, यह एक मागीय सम्प्रेषण क प्रभार्वी सार्धन है। 
  5. दत्त कार्य- यह दूरस्थ शिक्षार् में शिक्षक व छार्त्र को जार्डे ने क एकमार्त्र सार्धन है, क्योंकि अध्येतार् कुछ प्रश्नों के उत्तर लिखकर जमार् करते हैं। इनक मूल्यार्ंकन कर सुझार्व दियार् जार्तार् है। इससे शिक्षक छार्त्र क सम्पर्क द्विमागी हो जार्तार् है। 
  6. परार्मर्श कक्षार्यें- दूरस्थ शिक्षार् ने दूरअध्येतार्ओं की समस्यार्ओं को सुलझार्ने के लिये परार्मर्श कक्षार्ओं क आयोजन कियार् जार्तार् है तथार् दूर शिक्षक इसमें विद्याथियों को परार्मर्श देते है। इस कार्यक्रम के मार्ध्यम से ही अध्येतार् एवं अध् यार्पक क अल्प सम्पर्क प्रत्यक्ष हो पार्तार् है।

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