दलित सार्हित्य क स्वरूप, परिभार्षार् एवं इतिहार्स

दलित सार्हित्य क स्वरूप, परिभार्षार् एवं इतिहार्स


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अनुक्रम

‘‘दलित हिन्दी सार्हित्य आन्दोलन’’ हिन्दी में मरार्ठी सार्हित्य के प्रभार्व कि देन है ‘‘सर्वप्रथम दलित आन्दोलन को स्पष्ट एवं सार्रगर्भित व्यार्ख्यार् को समझने के लिए हमें विभिन्न दृष्टिकोणों के मध्य महत्वपूर्ण प्रश्नों की स्पष्ट व्यख्यार् को समझनार् होगार्। इसके बार्द ही दलित सार्हित्य के स्वरूप क निर्धार्रण कियार् जार् सकतार् है। पहलार् प्रश्न है दलित है कौन ? एवं दूसरार् महत्वपूर्ण प्रश्न है। दलित सार्हित्य क अर्थ क्यार् है’’?

‘‘दलित वह है जिसक दमन कियार् गयार् है। जिसके मार्नव होने पर सवार्ल कियार् गयार् है, जिसे समार्ज से बहिष्कृत कियार् गयार् है, वर्षों से दमन कियार् जार् रहार् है। मनुस्मृति एवं धामिक मार्न्यतार्ओं को स्वीकार करने के लिए बार्ध्य कियार् गयार्। उसे अपमार्नित, प्रतार्ड़ित कियार् गयार्, उसें ‘‘दलित’’ कहार् गयार् है।’’

सार्थ ही सार्मार्जिक बनधनों में जकड़े, वर्ण व्यवस्थार्, जार्ति व्यवस्थार् से अभिशप्त भूमिहीन अधूत, बन्धुआ, दार्स, गुलार्म, उत्पीड़ित, उपेक्षित, शोषित, बन्धितनार्री बच्चे आदि दलित की श्रेणी में आते है। ‘‘दलित’’ के संबंध में अनेक व्यार्ख्यार्कारों ने दलित को परिभार्षित कियार् है। ‘‘डॉं. प्रभार्कर मार्ण्डे के अनुसार्र ‘‘दलित वह व्यक्ति है जो विशिष्ट सार्मार्जिक स्थिति क अनुभव करतार् है जिसके जीने के अधिकार को छीनार् गयार् है। मार्त्र जन्म के आधार्र पर जिनको समार्ज में एक ही प्रकार क जीवन मिलार् है मनुष्य के रूप में मूल्यों को नकारार् गयार् है। मार्नव के रूप में जिनके अधिकारों को ठुकरार्यार् गयार् है।’’

बार्बार् सार्हब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के अनुसार्र – ‘‘दलित जार्तियार्ँ वे है जो अपवित्रकारी होती है इनमें निम्न श्रेणी के कारीगर, धोबी, मोची, भंगी, बसोर, सेवक जार्तियार्ँ आती है कुछ जार्तियार्ँ परम्परार्गत कार्य करने के अतिरिक्त कृषि मजदूरी क कार्य करती हे। इनकी स्थिति अर्द्धदार्स, बंधुआ मजदूर जैसी रही हो।’’

सुप्रसिद्ध सार्हित्यकार श्री लक्ष्मण जोशी के अनुसार्र – ‘‘दलित मार्नवीय प्रगति में सबसे पीछे पड़ार् हुआ और पीछे ढकेलार् गयार् सार्मार्जिक वर्ग है। हिन्दु समार्ज में महार्र, चमार्र, डोम आदि, जिन जार्तियों को गार्ँव के बार्हर रहने के लिए बार्ध्य कियार् गयार् और जिनसे सवर्ण समार्ज शार्रीरिक सेवार्एँ तो लेतार् रहार् लेकिन जीवनार्वश्यक प्रार्थमिक जरूरतों से भी जिन्हे जार्नबूझकर वंचित रखार् गयार् है और पुशओं के स्तर से भी घृणित जीवन जीने के लिए बार्ध्य कियार् गयार् उनकों ‘‘अछूत’’ यार् ‘‘दलित’’ कहार् गयार्’’

उपर्युक्तमत ‘‘दलित’’ क व्यार्पक अर्थ प्रस्तुत करते हैं इसके अतिरिक्त कुछ मत संकुचित अर्थ प्रदार्न करते हैं जिनमें प्रमुख सार्हित्यकार के मत – श्री केशव मेश्रार्म के अनुसार्र :- ‘‘ हजार्रों वर्ष जिन लोगों पर अत्यार्चार्र हुआ ऐंसे अछूतों को दलित कहनार् चार्हिए’’

पत्रकार रार्जकिशोर के अनुसार्र :- ‘‘दलित शब्द एक वर्गीय शब्द ठहरतार् है। भार्रत एक गरीब देश है। यहार्ँ की आधी आबार्दी आर्थिक दृष्टि से दलित ही है। दलित शब्द उन जार्तियों के अर्थ में रूढ़ होतार् जार् रहार् है जिन्हे पहले अछूत यार् हरिजन कहार् जार्तार् थार् इनके लिए कानूनी शब्द अनुसूचित जार्ति है’’

इन मतों से स्वयं ही दलित शब्द अपनी परिभार्षार् उद्भार्षित करतार् है दलित शब्द एक सार्मार्जिक दर्पण है, परन्तु सार्हित्यकारों में मतभेद है कि दलित से आशय क्यार् है। जहार्ँ दलित क आशय सर्वहार्रार् पीड़ित शोषण के अधार्र पर व्यार्पक अर्थ लियार् गयार् है, तो कुछ सार्हित्यकारों ने संकुचित अर्थ में लियार् है। उनके अनुसार्र शूद्र ही दलित है। दलित शब्द को लेकर हिन्दी सार्हित्य जगत में अनेक मत प्रचलित है। जिनमें सार्हित्यकारों क एक वर्ग उन तमार्म लोगों को दलित की श्रेणी में सम्मिलित करतार् है जो किसी भी प्रकार से शोषित यार् पीड़ित है चार्हे वे किसी वर्ग से हो। जेकिन दूसरार् वर्ग केवल उन्ही लोगों को दलित मार्नतार् है जो शुद्ध और अति शूद्रों में आते है क्यों की उनक स्पष्ट मार्ननार् है की दो भिन्न वर्ग के लोगों की पीड़ार् और दमन समार्न हो लेकिन उच्चवर्ग के लोगों को समार्ज में शुद्ध व्यक्तियों से कहीं अधिक सम्मार्न और इज्जत प्रार्प्त होगी । दलित क संकुचित अर्थ ग्रहन करने वार्लों की संख्यार् ही अधिक है और वह उचित भी लगतार् है। अत: विभिन्नमतों के आधार्र पर दलित तो केवल उन्हें ही मार्ननार् उचित होगार् जो सार्मार्जिक व्यवस्थार् में सदियों से जिन्हे निम्न स्थार्न पर रखार् गयार् है। जो जार्ति एवं जन्म के आधार्र पर है न कि अर्थ (पैसार्) के आधार्र पर।

दलित सार्हित्य के आशय को स्पष्ट समझनार् भी उसी तरह कठिन है, जिस प्रकार दलित को, दलित सार्हित्य के संदर्भ में भी दो मत प्रचलित हैं जिसमें एक मत संकुचित एवं दूसरार् मत व्यार्पक है जहार्ं कुछ सार्हित्यकार इसके व्यार्पक अर्थ को ग्रहण करते हैं उनमें प्रमुख हैं-

श्रीमार्तार् प्रसार्द :- ‘‘दलित सार्हित्य को व्यार्पक अर्थ में ग्रहण करते है। कि ‘‘दलित सार्हित्य किसी वर्ण विशेष क न होकर उन सभी लोगों क है जिनक किसी न किसी रूप मे दमन कियार् गयार् है।’’ दलित सार्हित्य क संकुचित अर्थ ग्रहण करने वार्ले सार्हित्यकारों में प्रमुख है।’’

डॉं. वार्नखेड़े :- ‘‘दलित लेखकों द्वार्रार् दलित के विषय में लिखार् गयार् सार्हित्य ही दलित सार्हित्य कहलार्तार् है। दलितों द्वार्रार् लिखे सभी प्रकार के सार्हित्य को दलित सार्हित्य कहार् जार्ये यार् उनके द्वार्रार् व्यक्त पीड़ार्, आक्रोश, विद्रोह को दलित सार्हित्य कहार् जार्ये। दलित सार्हित्य के स्वरूप क निर्धार्रण दलित आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में ही होनार् चार्हिये।’’

इस सार्हित्य के अंतर्गत एक वर्ण विशेष की स्थिति पीड़ार्, विद्रोह क स्पष्ट एवं सच्चार्ई के धार्रार्तल पर रहते हुये अभिव्यक्ति करनार् ही दलित सार्हित्य है। यह एक आन्दोलन है यह निजी प्रेम यार् निजि अभिव्यक्तियों क सार्हित्य नहीं हो सकतार् इसमें केवल विद्रोहार्त्मक सार्हित्य ही मार्न्य कियार् जार्येगार् जो कि दलित सार्हित्य के आन्दोलन क उद्वेश्य है और यही विद्रोह दलित सार्हित्य की साथकतार् है।

श्री बुद्धशरण हंस केवल पीड़ार् की अभिव्यक्ति को दलित सार्हित्य नहीं मार्नते बल्कि उसकी पीड़ार् में पर्यवसार्न आवश्यक मार्नते हैं उन्होनें लिखार् है ‘‘दलित सार्हित्य कोई मर्सियार् नही हैं जो दलितों की दीनतार् और दुर्दशार् पर लिखार् एवं पढ़ार् जार्ये दलित सार्हित्य को दलितों की दुर्दशार् क शोक सार्हित्य नहीं बनने देनार् है। दलित सार्हित्य शक्ति और प्रेरणार् क स्त्रोत बने ऐसार् प्रयार्स दलित सार्हित्यकारों को करनार् है।

दलित सार्हित्य क केन्द्र बिन्दु मनुष्य है। मनुष्य क उत्थार्न ही दलित सार्हित्य क प्रयोजन है। यह दलित कुन्ठित मार्नव की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वार्लार् सार्हित्य है।

क्षेत्र एवं स्वरूप

दलित सार्हित्य क क्षेत्र बहुत व्यार्पक एवं विस्तृत है यह जन सार्मार्न्य तक पहुंच रखतार् है। क्यों की यह सर्वहार्रार् दलित, कुन्ठित, दमित, छुआछूत एवं अमार्नवीय संवेदनार्ओं को सहन कर रहे मार्नव के आन्दोलन क प्रेरणार्स्त्रोत है।

मार्नव के सार्थ हुई उन अमार्नवीय घटनार्ओं क कोरार् चिट्ठार् है जिसमें उसे मार्नव ही नहीं मार्नार् उसके सार्थ पशु के समार्न व्यवहार्र कियार् गयार् उसे अस्पश्र्ार्ीय मार्नार् गयार् समस्त प्रकार क बोजार् प्रार्चीन काल से वर्तमार्न काल तक किसी न किसी रूप में धर्म के नार्म पर, जन्म के आधार्र पर तो कभी समार्ज के बन्धनों के नार्म पर उस पर लार्दार् गयार् जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कियार्।

परन्तु वर्तमार्न काल में हिन्दी दलित सार्हित्य के रूप में एक प्रेरणार्दार्यक स्त्रोत प्रार्प्त हुआ और एक नये आन्दोलन को नई ऊर्जार् और मागदर्शन प्रार्प्त हुआ। अम्बेडकर जी ने कहार् थार् कि गुलार्म को गुलार्मी क एहसार्स करार् दो वो स्वयं संघर्ष कर आजार्द हो जार्येगार् और यही कार्य हिन्दी दलित सार्हित्य ने कियार् और आज दमित, दलित समार्ज से बहिष्कृत, ऊँच नीच को वर्षों से सहन कर रहे मार्नव को उसकी स्थिति क भार्न करार्ने क कार्य दलित सार्हित्य ने कियार्। यह सब जार्नकर दलित मार्नव, समार्ज की मुख्य धार्रार् में आने के लिए संघर्ष क शंखनार्द तो पूर्व में ही कर चुक है पर आज यह विश्वस्तर के आन्दोलन क रूप ले चुक है।

दलित सार्हित्य क स्वरूप भिन्न – भिन्न स्थार्नों पर भिन्न -भिन्न प्रकार क है। अमेरिक में अश्वेत लोगों क संघर्ष भार्रत में यह दलितों क संघर्ष है। दलित सार्हित्य के स्वरूप की स्पष्ट अवधार्रणार् यह है कि ऐंसार् सार्हित्य जो मार्नव की पीड़ार्, दमन, आक्रोश को व्यक्त करतार् है। न की व्यक्तिगत प्रेम एवं अभिव्यक्ति को। दलित समार्ज की पीड़ार् कि विद्रोहार्त्मक प्रवृत्ति दलित सार्हित्य को साथकतार् प्रदार्न करती है। जो दलित सार्हित्य को शक्ति और प्रेरणार् क सार्हित्य बनार्तार् है। किन्तु आज दलित सार्हित्य के नार्म पर जिन रचनार्ओं की बहुलतार् है उनमें यार् तो अशिष्ट व्यंजनार्एं है’’ यार् नार्रे बार्जी जो स्वभार्विक तो है पर दलित सार्हित्य को यह उचित स्थार्न एवं स्थार्यित्व नही दे सकतार् इसी विषय पर श्री बुद्धशरण हंस ने सार्हित्य में मर्यार्दार् को महत्व देते हुये कहार् है ‘‘दलित सार्हित्य की अपनी मर्यार्दार् होनी चार्हिए इसी तरह दलित सार्हित्यकार क अपनार् कर्तव्य होनार् चार्हिए। यथाथतार् के नार्म पर यर्थार्थ चित्रण के नार्म पर दलित पार्त्रों को नंगार् न करें, अपमार्नित न करें यह सार्वधार्नी होनी चार्हिए। दलित पार्त्रों को सम्मार्नजनक स्थिति, परिस्थिति में रखकर दलित सार्हित्य की रचनार् होनी चार्हिय। सत्य न सही काल्पनिक सार्हित्यिक रूपरेखार् तैयार्र कर सार्हित्य के मार्ध्यम से दलित के पार्त्रों को सम्मार्नजनक स्थिति परिस्थिति में रखकर दलित सार्हित्य की रचनार् होनी चार्हिये। सत्य सार्हित्य के मार्ध्यम से दलित समार्ज को महिमार् मण्डित, गौरवशार्ली प्रदार्न करने वार्लार् सार्हित्य दलित समार्ज के पार्ठकों को प्रेरणार् और प्रोत्सार्हन देगार् ‘‘

डॉं. लक्ष्मी नार्रार्यण दुबे दलित सार्हित्य क स्वरूप ‘‘मैं दलित सार्हित्य की संवेदनार्ओं क कायल हॅूं उसमे आम आदमी की खोज है। आम आदमी के द्वार्रार् आम आदमी के लिए। आज क दलित सार्हित्य हमार्रे युगरार्ष्ट्र तथार् जीवन के सार्मार्जिक एवं आर्थिक जगत के परिवर्तित व वार्स्तविक मूल्यों को सच्ची साथक निस्पृह अभिव्यक्ति प्रदार्न करतार् है। अभिजार्त्य आडम्बरी कृत्रिम तथार् ऊपरी मुखौटार् वार्ली सार्हित्यिक संस्कारवार्दितार् क उसने उच्छेदन करके सार्हित्य को आदमी के पार्स लार् बैठार् दियार् है। यह दलित, पीड़ित समस्त उपेक्षित एवं विस्तृत जन जीवन सम्वार्ही है। यह जन शक्ति क हथियार्र है। वह जिंदगी की तलहटी में बैठार् है। आज क सार्हित्य समार्ज से दूर रार्जनीति क पिछलग्गू बन गयार् है। वह उसमें विरार्म लगार्कर उसे जन-मन की अभिव्यंजनार् स्त्रोत बनार्ये हुए है दलित सार्हित्य दीन दुखियों क मसीहार् है। उसक निषेध सुनहरे काल क धुंधलक है। उसमें मुक्ति की मीन मचलती है। परन्तु वह द्रुतगतिशील सार्मार्तिक परिर्वतनों तथार् परिवेश की भिन्नतार् क प्रतीक है। जो स्वस्थ दृष्टि की परिचार्लक है’’।

दलित सार्हित्य क केन्द्र बिन्दु मार्नव है यार्नि मार्नव क उत्थार्न ही दलित सार्हित्य क मुख्य प्रयोजन है। यही है जो मार्नव को मार्नव के रूप में देखतार् है और मार्नव को आदर्शों जीवन मूल्यों को स्थार्पित करने के लिए क्रार्ंति क शंखनार्द कियार् है यह मार्नव को आर्थिक, रार्जनीतिक, सार्मार्जिक के बन्धनों से मुक्त कर मुक्ति के पथ पर ले जार्ने क प्रयार्स करतार् है। दलित सार्हित्य आन्दौलन यह एक ऐसार् आन्दोलन है जो समग्र क्रार्ंति के मार्ध्यम से समार्ज में समतार्, स्वतंत्रतार्, बन्धुतार् आदि की प्रतिस्थार्पनार् करने के उद्वेश्य के सार्थ आज समार्ज के बीच में है। दलित सार्हित्य कृत संकल्प है कि वह समार्ज में मार्नवीय मूल्यों को स्थार्पित करेगार्।

दलित सार्हित्य क उद्भव एवं विकास

भार्रतीय संस्कृति के मूल्यों में अद्धैत की प्रतिष्ठार् की गई है जिसके मूल्य में समतार्वार्दी सिद्धार्ंत को प्रतिपार्दित कियार् गयार् है, जिसमें मनुष्यों के बीच किसी भी प्रकार के भेद के लिए स्थार्न ही नहीं थार्। किन्तु संकीर्ण मार्नसिकतार् एवं स्वाथियों ने समार्ज में भेद के बीजों क रोपण कियार् जिससे वो अपने आप को उच्च एवं अन्य को निम्न सिद्ध कर सके। यह भेद वैदिक काल में ही हुआ। सवर्ण, असवर्ण, ऊॅंच, नीच क संघर्ष जहार्ं से प्रार्रंभ होतार् है वही से दलित सार्हित्य क जन्म होतार् है।

आदिकाल से ही भार्रतीय समार्ज में ब्रार्ह्मणों क वर्चस्व रहार् है। और इन्होंने अपनी इच्छार्नुसार्र समार्ज की व्यवस्थार् क निर्मार्ण कियार् जिससे भेदभार्व को बढ़ार्वार् मिलार् और ऊंच नीच अस्पृश्यतार्, आर्थिक शोषण, मार्नवीय अधिकारों क हनन हुआ और इसक परिणार्म हुआ नई विचार्र धार्रार्ओं क जन्म बौद्ध धर्म इसकी परिणति थी इस धर्म ने समार्नतार्मूलक दृष्टिकोण को अपनार्यार्। चौरार्सी सिद्धों में सिद्ध सरहपार्द क नार्म बड़े आदर के सार्थ लियार् जार्तार् है। स्वयं सवर्ण होकर असवर्ण स्त्री से विवार्ह करके समतार् क प्रार्रंभ कियार्। यह उनक भेदभार्व को दूर करने क पहलार् प्रयार्स थार् यही से सार्हित्यिक भार्वनार्ओं क विकास हुआ और प्रतिक्रयार् स्वरूप दक्षिण के महार्रार्ष्ट्रीय संत तथार् उनकी प्रेरणार् को पार्कर हिन्दी कवियों ने अपनी भार्वनार्ओं एवं उद्गार्र व्यक्त किए। दलित लेखन प्रार्चीन काल से चलार् आ रहार् जो दलित विरोधी सार्हित्य के प्रतिरोध क परिणार्म है। हिन्दू धर्म में मनु द्वार्रार् रचित ग्रन्थ शूद्रों के लिये अपमार्नित एवं अमार्नवीय जीवन जीने के लिए बार्ध्य करतार् है। इसी क परिणार्म बौद्ध धर्म क पार्दुर्भार्व हुआ। पर यह भी समार्ज से जार्ति व्यवस्थार् को समार्प्त नहीं कर पार्यार्। सुनीत भंगी और उपार्लि नार्ई जैसे हजार्रों लोगों ने बौद्ध धर्म की दीक्षार् ली परन्तु इसके बार्वजूद भी उन्हें उनकी पूर्व जार्ति क ही सम्बोधन एवं तिरस्कार प्रार्प्त हुआ उनकी जार्तीय पहचार्न खत्म नहीं हो सकी। हिन्दी दलित सार्हित्य के उद्भव क काल निश्चित नहीं कर सकते। लेकिन हिन्दी में दलित सार्हित्य कब आयार् एवं इसक विकास किन-किन चरणों में हुआ और वर्तमार्न स्थिति क्यार् है इन्ही प्रश्नों के मार्ध्यम से हिन्दी में दलित सार्हित्य क इतिहार्स क समग्र लेखार् प्रार्प्त करने क प्रयार्स कियार् जार् सकतार् है।

‘‘हिन्दी दलित सार्हित्य को हम उस समय की रचनार्ओं के मार्ध्यम एवं भार्षार् के द्वार्रार् कई भार्गों में विभार्जित कर सकते हैं – (1) संस्कृत वार्ड्मय (2) पार्लि-प्रार्कृत तथार् अपभ्रंश (3) सिद्ध एवं नार्थ सार्हित्य (4) मरार्ठी सार्हित्य (5) संत सार्हित्य परवर्ती हिन्दी सार्हित्य’’

कँवल भार्रती जी ने एवं अन्य मनीषियों ने भी हिन्दी दलित सार्हित्य के सरल अध्ययन के लिए तीन भार्गों में विभार्जित कियार् है जिससे इसक अध्यनन सरल हो सके (1) आदिकाल (2) मध्यकाल यार्नी विकासकाल (3) आधुनिक काल यार्नी मुक्तिकाल ।

हिन्दी दलित सार्हित्य के इतिहार्स के विषय में मनीषी एकमत नहीं है। विभिन्न मनिषियों क मत है, दलित चेतनार् क आरंभ सबसे पहले मरार्ठी सार्हित्य में हुआ। हिन्दी दलित सार्हित्य क मूल स्वर जार्तिवार्द, अस्पृश्यतार्, वर्णवार्द, अमार्नवीय व्यवहार्र, आर्थिक शोषण के विरूद्ध रहार् है। इस आधार्र पर निष्कर्ष निकालने पर यह सिद्ध होतार् है कि हिन्दी दलित सार्हित्य क विकास भक्तिकाल से ही होतार् है तो उपयुक्त ही होगार् परन्तु जब तक वैदिक काल से आधुनिक काल तक क अध्ययन दलित चेतनार् को मुख्य बिन्दु मार्नकर नही करत,े तब तक दलित सार्हित्य क सम्मयक निरिक्षण एवं परीक्षण नहीं कियार् जार् सकतार्। दलित सार्हित्य क आरंभ संस्कृत से पार्लि सिद्ध नार्गों के सार्हित्य से होती हुई, सन्तों और वहार्ं से महार्त्मार् फुले, गॉधी, अम्बेडकर आदि मनीषी समार्ज सुधार्र में अग्रसर हुये, और यह सार्हित्य विकसित होतार् हुआ वर्तमार्न तक आ पहुँचार्।

हिन्दी सार्हित्य को सार्हित्यकारों ने काल विभार्जन उस समय की विशिष्ट रचनार्ओं के आधार्र पर कियार्। मगर दलित सार्हित्य को आधार्र किसी ने भी नहीं बनार्यार् जो अति महत्वपूर्ण विषय थार्। पर रार्जदरवार्री प्रथार्, चार्टुकारितार्, श्रृगार्ंर आदि को महत्व दियार् गयार् जबकि दलित चेतनार् को महत्व देनार् चार्हिये थार्। लेकिन सार्हित्यकारों ने दलित चेतनार् को अपने सार्हित्य क विषय नही बनार्यार्। क्योंकि इससे उनकी महिमार् कम होती नजर आ रही थी दलित चेतनार् ने अस्पृश्यतार्, सवर्ण, असवर्ण, आर्थिक शोषण, मार्नवीय अधिकारों क हनन को मुख्य रूप से समार्ज के सम्मुख रखार्। जो कि बहुत ही मार्मिक एवं हृदयस्पश्र्ार्ी थार् जो मार्नव होने पर ही सवार्ल उठार्तार् थार् दलित चेतनार् के विषय वैदिककाल से ही रचित किये गये और आधुनिक काल में तो यह दलित चेतनार् अपने उत्कर्ष पर है। आज सार्हित्य में इसे अपनार्यार् है। दलित सार्हित्य को विशिष्ट स्थार्न प्रदार्न कियार् है। यह दलित की पीड़ार्, कुंठार्, दमन, शोषण क सजीव वर्णन करतार् है।

वैदिककाल से आधुनिक काल तक यदि दलित चेतनार् पर विचार्र कियार् जार्ये तो मुख्य दलित सार्हित्य को हिन्दी सार्हित्य के सार्थ ही मुख्य रूप से तीन भार्गों में विभार्जित कर सकते है। (1) आदिकाल (2) मध्यकाल (3) आधुनिक काल। आदिकाल से भी पूर्व में दलित चेतनार् पर संक्षिप्त में रचनार्ऐं गढ़ी गई पर वह संस्कृत में थी।

सन्दर्भ

  1. दलित सार्हित्य की हुंकार सार्त समुंदर पार्र – सोहन पार्ल सुमनार्क्षर पृष्ठ-41
  2. सोहन पार्ल सुमनार्क्षर – दलित सार्हित्य – पेज-41
  3. डॉ. सोहनपार्न सुमनार्क्षर – शोधपत्र छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन यु.के 1999 के अवसर पर 14-9-1999 को लन्दन में प्रस्तुत से।
  4. डॉ. रजतशनी मीनू – नवें दशक की हिन्दी दलित कवितार् – पृष्ठ-3
  5. रार्जकिशोर – अगर मैं दलित होतार् – धर्मयुग, मई 1994 – पृष्ठ-22
  6. श्री नार्रार्यण सुर्वे – हंस – अक्टूबर 1992 – पृष्ठ-23
  7. डॉं. रार्मचन्द्र वर्मार् – संक्षिप्त शब्द सार्गर – नार्गरी प्रचार्रिणी -काशी- पृष्ठ-468
  8. सम्पार्दक – डॉं. सम्यप्रेमी – दलित सार्हित्य रचनार् और विचार्र – पृष्ठ-9
  9. सोहनपार्ल सुमनार्क्षर – दलित सार्हित्य की हुंकार सार्त समुंदर पार्र- पृष्ठ-45
  10. स. डॉं. पुरूषोत्तम सत्यप्रेमी – दलित सार्हित्य सृजन के सन्दर्भ
  11. सुरेशचन्द्र शुक्ल – हिन्दी दलित सार्हित्य क इतिहार्स – पृष्ठ 22-23

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