दर्शन क अर्थ, परिभार्षार्, आवश्यकतार् एवं विशेषतार्एँ

दर्शन क अर्थ

दर्शन शब्द संस्कृत की दृश् धार्तु से बनार् है- ‘‘दृश्यते यथाथ तत्वमनेन’’ अर्थार्त् जिसके द्वार्रार् यथाथ तत्व की अनुभूति हो वही दर्शन है। अंग्रेजी के शब्द फिलॉसफी क शार्ब्दिक अर्थ ‘‘ज्ञार्न के प्रति अनुरार्ग’’ होतार् है। भार्रतीय व्यार्ख्यार् अधिक गहराइ तक पैठ बनार्ती है, क्योंकि भार्रतीय अवधार्रणार् के अनुसार्र दर्शन क क्षेत्र केवल ज्ञार्न तक सीमित न रहकर समग्र व्यक्तित्व को अपने आप में समार्हित करतार् है। दर्शन चिन्तन क विषय न होकर अनुभूति क विषय मार्नार् जार्तार् है। दर्शन के द्वार्रार् बौद्धिक तश्प्ति क आभार्स न होकर समग्र व्यक्तित्व बदल जार्तार् है। यदि आत्मवार्दी भार्रतीय दर्शन की भार्षार् में के कहार् जार्ये तो यह सत्य है कि दर्शन द्वार्रार् केवल आत्म-ज्ञार्न ही न होकर आत्मार्नुभूति हो जार्ती है। दर्शन हमार्री भार्वनार्ओं एवं मनोदणार्ओं को प्रतिबिम्बित करतार् है और ये भार्वनार्यें हमार्रे कार्यो को नियंत्रित करती है।

1. दर्शन क भार्रतीय सम्प्रत्यय –

भार्रत में दर्शन क उद्गम असन्तोष यार् अतश्प्ति से मार्नार् जार्तार् है। हम वर्तमार्न से असन्तुष्ट होकर श्रेण्ठतर की खोज करनार् चार्हते है। यही खोज दाशनिक गवेशणार् कहलार्ती है। दर्शन के विभिन्न अर्थ बतार्ये गये हैं। उपनिषद् काल में दर्शन की परिभार्षार् थी-जिसे देखार् जार्ये अर्थार्त् सत्य के दर्शन किये जार्ये वही दर्शन है। (दृश्यते अनेन इति दर्शनम्- उपनिषद) डार्0 सर्वपल्ली रार्धार्कृष्णन के अनुसार्र- दर्शन वार्स्तविकतार् के स्वरूप क ताकिक विवेचन है।

2. दर्शन क पार्श्चार्त्य सम्प्रत्यय –

पश्चार्त्य जगत में दर्शन क सर्वप्रथम विकास यूनार्न में हुआ। प्रार्रम्भ में दर्शन क क्षेत्र व्यार्पक थार् परन्तु जैसे-जैसे ज्ञार्न के क्षेत्र मे विकास हुआ दर्शन अनुशार्सन के रूप में सीमित हो गयार्।

  1. प्लेटो के अनुसार्र- जो सभी प्रकार क ज्ञार्न प्रार्प्त करने की इच्छार् रखतार् है और सीखने के लिये आतुर रहतार् है कभी भी सन्तोष करके रूकतार् नहीं, वार्स्तव में वह दाशनिक है। उनके ही शब्दों में- ‘‘पदाथों के सनार्तन स्वरूप क ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् ही दर्शन है।’’
  2. अरस्तु के अनुसार्र- ‘‘दर्शन एक ऐसार् विज्ञार्न है जो परम तत्व के यथाथ स्वरूप की जॉच करतार् है।’’
  3. कान्ट के अनुसार्र-’’दर्शन बोध क्रियार् क विज्ञार्न और उसकी आलोचनार् है।’’ परन्तु आधुनिक युग में पश्चिमी दर्शन में भार्री बदलार्व आयार् है, अब वह मूल तत्व की खोज से ज्ञार्न की विभिन्न शार्खार्ओं की ताकिक विवेचनार् की ओर प्रवृत्त है। अब दर्शन को विज्ञार्नों क विज्ञार्न और आलोचनार् क विज्ञार्न मार्नार् जार्तार् है। कामटे के शब्दों में- ‘‘दर्शन विज्ञार्नों क विज्ञार्न है।’’ और हरबाट स्पेन्सर के शब्दो में ‘‘दर्शन विज्ञार्नों क समन्वय यार् विश्व व्यार्पक विज्ञार्न है।’’

3. दर्शन क वार्स्तविक सम्प्रत्यय –

ऊपर की गयी चर्चार् से यह स्पष्ट है कि भार्रतीय दृष्टिकोण और पार्श्चार्त्य दृष्टिकोण में मूलभूत अन्तर है। परन्तु दर्शन की मूलभूत सर्वसम्मत परिभार्षार् होनी चार्हिये- दर्शन ज्ञार्न की वह शार्खार् है, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्म्र्रार्ण्ड एवं मार्नव के वार्स्तविक स्वरूप सृष्टि-सृष्टार्, आत्मार्-परमार्त्मार्, जीव-जगत, ज्ञार्न-अज्ञार्न, ज्ञार्न प्रार्प्त करने के सार्धन और मनुष्य के करणीय और अकरणीय कर्मोर्ंं क ताकिक विवेचेचन कियार् जार्तार् है।। इस परिभार्षार् में प्रार्कृतिक, सार्मार्जिक, अनार्त्मवार्दी व आत्मवार्दी और सभी दर्शन आ जार्ते है, और दर्शन के अर्थ प्रतिबिम्बित होते हैं-

  1. दर्शन क मूल ज्ञार्न के लिये प्रेम- दर्शन शब्द के लिये अगेंज्री शब्द फिलॉसफी है। इस शब्द की उत्पत्ति दो यूनार्नी शब्द से हुयी है। फिलॉस जिसक अर्थ है- प्रेम तथार् सोफियार् जिसक अर्थ है आफ विज्डम। इस प्रकार से फिलार्स्फी क अर्थ है ‘लव फार्र विज्डम’यार् ज्ञार्न के लिये प्रेम। सुकरार्त के अनुसार्र ‘‘वे व्यक्ति दाशनिक हेार्ते हैं जो सत्य के दर्शन हेतु इच्छुक होते हैं।’’
  2. दर्शन क अर्थ सत्य की खोज- दसू री आरे प्रथम परिभार्षार् भी यह स्पष्ट करती है कि दर्शन जीवन के सत्यों की खोज और उसे जार्नने की इच्छार् तथार् उसके सार्क्षार्त्कार को कहते हैं। डी0वी0ने स्पष्ट लियार् है’’ दर्शन विचार्रने क प्रयत्न है। हम यह भी कह सकते हैं कि जीवन तथार् संसार्र के सम्बंध में विभिन्न तथ्यों को एक सार्थ एकत्र करनार् जो एकनिष्ठ सम्पूर्ण बनकर जो यार् तो एकतार् में हो यार् द्वितत्ववार्दी सम्प्रदार्य में हों, अन्तिम सिद्धार्न्तों की एक छोटी संख्यार् में बहुवितरणों को बदल दे।
  3. विचार्रीकरण की कलार्- पैट्रिक ्के अनुसार्र- ‘‘दर्शन को हम सम्यक्, विचार्रीकरण की कलार् कह सकते हैं।’’ इसमें व्यक्ति तर्क एवं विधिपूर्वक संसार्र की वस्तुओं के वार्स्तविक रूप को जार्नने क प्रयार्स करतार् है। इस प्रकार से हम यह भी मार्न सकते हैं कि व्यक्ति जन्म से कुछ दाशनिक होतार् है।
  4. अनुभव की बोध गम्यतार्- बार्इटमैन के अनुसार्र- ‘‘ दर्शन को हम वो प्रयार्स कह सकते हैं जिसके द्वार्रार् सम्पूर्ण मार्नव अनुभवों के विषय में सत्यतार् के सार्थ विचार्र करते हैं अथवार् हमार्रे सम्पूर्ण अनुभव बोधगम्य बनते हैं।’’
  5. जीवन की आलोचनार् – दर्शन में जगत के दिग्दर्शन क बुिद्धवार्दी पय्र त्न कियार् जार्तार् है। इसमें प्रयत्न कियार् जार्तार् है कि तत्वों एवं पहलुओं के सार्थ समग्र ब्रह्मार्ण्ड की धार्रणार् पर पहॅुच सके तथार् पार्रस्परिक सम्बंध समझ सकें।- दर्शन जीवन की आलोचनार् है।
  6. अंतिम उत्तर के रूप में – दर्शन को उस उत्तर के रूप में देखे जार् सकतार् है जिसमें अंतिम प्रश्नों क आलोचनार्त्मक ढंग से उत्तर दियार् जार्तार् है। वार्स्तव में दर्शन क अध्ययन केवल प्रश्नों के उत्तर के लिये नहीं अपितु प्रश्नों के लिये भी हेार्तार् हैं।
  7. समस्यार्ओं पर विचार्र करने क ढग- नवीनतम विचार्र के अनसु ार्र दर्शन केवल गूढ़ एवं सूक्ष्म विचार्र ही नहीं वरन् यह समस्यार्ओं पर विचार्र करने क ढंग है। इसके फलस्वरूप ज्ञार्न आदर्श मूल्य एवं अच्छाइ मिलती है। हैण्डरसन लिखते हैं- ‘‘दर्शन कुछ अत्यन्त कठिन समस्यार्ओं क कठोर, नियंत्रित एवं सुरक्षित विश्लेषण है, जिसक सार्मनार् मनुष्य सर्वदार् करतार् है।’’

निष्कर्ष – केवल र्इश्वर ब्रह्म, जीव, प्रकश्ति, मनुष्य इसकी यर्थार्थतार् एवं अंतिम वार्स्तविकतार् आदि से सम्बंधित प्रश्नों तथार् उत्तरों को ही दर्शन की परिधि में नहीं रखते। व्यार्पक अर्थ में दर्शन वस्तुओं, प्रकृति तथार् मनुष्य उसके उद्गम और लक्ष्य के प्रतिवीक्षण क एक तरीक है, जीवन के विषय में एक शक्तिशार्ली विश्वार्स है जो उसको धार्रण करने वार्ले अन्य से अलग करतार् है।

दर्शन की परिभार्षार् 

हम यह कह सकते हैं कि दर्शन क सम्बधं ज्ञार्न से है और दर्शन ज्ञार्न को व्यक्त करतार् है। हम दर्शन के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने हेतु कुछ परिभार्षार्यें दे रहे हैं।

  1. बरटे्रड रसेल- ‘‘अन्य विधार्ओं के समार्न दर्शन क मुख्य उद्देश्य-ज्ञार्न की प्रार्प्ति है।’’
  2. आर0 डब्लू सेलर्स-’’दर्शन एक व्यवस्थित विचार्र द्वार्रार् विश्व और मनुष्य की प््रकृति के विषय में ज्ञार्न प्रार्प्त करने क निरन्तर प्रयत्न है।’’
  3. जॉॅन डी0वी0 क कहनार् है- ‘‘जब कभी दर्शन पर गम्भीरतार्पवू के विचार्र कियार् गयार् है तो यही निश्चय हुआ कि दर्शन ज्ञार्न प्रार्प्ति क महत्व प्रकट करतार् है जो ज्ञार्न जीवन के आचरण को प्रभार्वित करतार् है।’’
  4. हैन्डर्सन के अनुसार्र- ‘‘दर्शन कुछ अत्यन्त कठिन समस्यार्ओ क कठार्रे नियंत्रित तथार् सुरक्षित विश्लेषण है जिसक सार्मनार् मनुष्य करतार् है। 
  5. ब्रार्इटमैन ने दर्शन को थोडे़ विस्तृत रूप में परिभार्षित कियार् है – कि दर्शन की परिभार्षार् एक ऐसे प्रयत्न के रूप में दी जार्ती है जिसके द्वार्रार् सम्पूण्र मार्नव अनुभूतियों के विषय में सत्यतार् से विचार्र कियार् जार्तार् है अथवार् जिसके द्वार्रार् हम अपने अनुभवों द्वार्रार् अपनें अनुभवों क वार्स्तविक सार्र जार्नते हैं।

दर्शन की आवश्यकतार्

दर्शन यार्नी दार्शर्निक चिन्तन की बुनियार्द, उन बुनियार्दी प्रश्नों में खोजी जार् सकती है, जिसमें जगत की उत्पत्ति के सार्थ-सार्थ जीने की उत्कंठार् की साथकतार् के तत्वों को ढूढने क प्रश्न छिपार् है। प्रकृति के रहस्यों को ढूढनें से शुरू होकर यह चिन्तन उसके मनुष्य धार्रार् के सार्मार्जिक होने की इच्छार् यार् लक्ष्य की साथकतार् को अपनार् केन्द्र बिन्दु बनार्ती है। मनुष्य विभिन्न प्रकार के ज्ञार्न अपने जीवन में प्रार्प्त करतार् है। उस ज्ञार्न क कुछ न कुछ लक्ष्य अवश्य हेार्तार् है। दर्शनशार्स्त्र के अध्ययन शिक्षार्शार्स्त्र के विद्याथियों के लिये विशेष कर आवश्यक जार्न पड़तार् है। इसके कर्इ कारण है-

  1. जीवन को उपयोगी बनार्ने के दृष्टिकोण से- भार्रतीय एवं पार्श्चार्त्य दोनो विचार्रों के अनुसार्र दर्शन की आवश्यकतार् सर्वप्रथम जीवन के लिये होती है। प्रत्येक व्यक्ति विद्वार्न यार् सार्धार्रण ज्ञार्न यार् न जार्नने वार्लार् हो वह अवश्य ही विचार्र करतार् है। व्यक्ति अपने जीवन की घटनार्ओं को यार्दकर उनसे आगार्मी घटनार्ओं क लार्भ उठार्तार् है। यह अनुभव उसको जीवन में एक विशिष्ट दृष्टिकोण रखने वार्लार् बनार् देते हैं। यही उसक जीवन दर्शन बन जार्तार् है।
  2. अर्थव्व्यवस्थार् के दृष्टिकोण- दर्शन क एक रूप हमें अर्थव्यवस्थार् में भी मिलतार् है, जिसके आर्थिक दर्शन भी कहते हैं। आर्थिक क्रियार्ओं पर एक प्रकार क नियंत्रण होतार् है। इसक प्रयोग व्यक्तिगत एवं रार्ष्ट्रीय जीवन में होतार् है। परिणार्मस्वरूप दोनों को लार्भ होतार् है। मितव्ययितार् एक विचार्र है और इसक उदार्हरण है। व्यक्तिगत एंव रार्ष्ट्रीय येार्जनार् क आधार्र यही दर्शन होतार् है। अर्थव्यवस्थार् शिक्षार् के क्षेत्र में भी होतार् है। जिससे लार्भों की दृष्टि में रखकर योजनार्यें बनती हैं।
  3. रार्जनैतिक व्यवस्थार् के दृष्टिकोण से- विभिन्न रार्जनैतिक व्यवस्थार् में विभिन्न प्रकार के दर्शन होते हैं। जनतंत्र में जनतार्ंत्रिक दर्शन होतार् है। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को समार्न अधिकार मिलते हैं। विभिन्न ढंग से उसे समार्न अवसर दिये जार्ते हैं और उसे पूर्ण स्वतंत्रतार् मिलती है। विभिन्न ढंग से एक दाशनिक दृष्टिकोण एवं सिद्धार्न्त बनतार् है। दर्शन रार्ष्ट्रीय मूल्यों क स्थार्पन कर उनक क्रमिक विकास करतार् है। 
  4. शैक्षिक विकास की दृष्टिकोण से- सस्ंकृति जीने की कलार् है एव  तरीकों क योग हैं । दर्शन इन विधियों क परिणार्म कहार् जार् सकतार् है। संस्कृति क परिचय दर्शन से मिलतार् है। भार्रतीय संस्कृति क ज्ञार्न उसके दर्शन से होतार् है। भार्रतीय परम्परार् में सुखवार्द को स्थार्न नहीं, त्यार्ग एवं तपस्यार् क स्थार्न सर्वोपरि है अतएव भार्रतीय दर्शन में योगवार्दी आदर्श पार्ये जार्ते हैं और भार्रतीय दर्शन आदर्शवार्दी है। 
  5. व्यक्ति को चिन्तन एवं तर्क से पूर्ण बनार्ने की दृष्टि से – दर्शन जीवन पर, जीवन की समस्यार्ओं पर और इनके समार्धार्न पर चिन्तन एवं तर्क की कलार् है। इससे जार्नने की आवश्यकतार् हर व्यक्ति को हो।

दर्शन क विषय क्षेत्र

भार्रतीय विचार्रधार्रार् के अनुसार्र दर्शन एवं जीवन में किसी प्रकार क अन्तर नहीं है। अत: सम्पूर्ण जीवन को दर्शन क विषय क्षेत्र मार्नार् गयार् है। हम दर्शन को मुख्यत: दो रूप में ग्रहण करते हैं- 1. सूक्ष्म तार्त्विक ज्ञार्न के रूप में। 2. जीवन की आलोचनार् और जीवन की क्रियार्ओं की व्यार्ख्यार् के रूप में। एक शार्स्त्र के रूप में दर्शन के अन्तर्गत  विषयों को अध्ययन कियार् जार्तार् है।

  1. आत्मार् सम्बंधी तत्व ज्ञार्न- इसमें आत्मार् से सम्बंि धत प्रश्नो पर विचार्र कियार् जार्तार् है: यथार् आत्मार् क्यार् है? आत्मार् क स्वरूप क्यार् है? जीव क्यार् है? आत्मार् क शरीर से क्यार् सम्बंध है? इत्यार्दि। 
  2. र्इश्वर सम्बंधी तत्व ज्ञार्न- इसमें र्इश्वर विषयक प्रश्नो के उत्तर खोजे जार्ते हैं : जैसे कि र्इश्वर क्यार् है? उसक अस्तित्व है यार् नहीं? र्इश्वर क स्वरूप कैसार् है? इत्यार्दि। 
  3. सत्तार्-शार्स्त्र- इसमें अमूर्त सत्तार् अथवार् वस्तुओं के तत्व के स्वरूप क अध्ययन कियार् जार्तार् है: यथार्- ब्रह्मार्ण्ड के नश्वर तत्व क्यार् है? ब्रह्मार्ण्ड के अक्षर तत्व कौन-कौन से हैं ? 
  4. सृष्टि-शार्स्त्र- इसमें सृष्टि की रचनार् एवं विकास से सम्बंिधत समस्यार्ओं पर विचार्र कियार् जार्तार् है : यथार्- क्यार् सृष्टि अथवार् ब्रह्मार्ण्ड की रचनार् भौतिक तत्वों से हुयी है? क्यार् ब्रह्मार्ण्ड क निर्मार्ण आध्यार्त्मिक तत्वों से हुआ है? इत्यार्दि। 
  5. सृष्टि उत्पत्ति क शार्स्त्र- इस शार्स्त्र में सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में विचार्र कियार् जार्तार् है : यथार्- सृष्टि अथवार् विश्व की उत्पत्ति किस प्रकार हुयी है? क्यार् इसकी रचनार् की गयी है? यदि हार्ं तो इसकी रचनार् किसने की है? इत्यार्दि। 
  6. ज्ञार्न-शार्स्त्र- इस शार्स्त्र में सत्य ज्ञार्न से सम्बंि धत समस्यार्ओं क हल खोजार् जार्तार् है : जैसे कि सत्य ज्ञार्न क्यार् है? इस ज्ञार्न को प्रार्प्त करने के कौन- से सार्धन है? क्यार् मार्नव बुद्धि इस ज्ञार्न को प्रार्प्त कर सकती है? इत्यार्दि। 
  7. नीति-शार्स्त्र- इसमें व्यक्ति के शुद्ध एव अशुद्ध आचरण से सम्बध्ं ार् रखने वार्ली बार्तों क अध्ययन कियार् जार्तार् है। जैसे नीति क्यार् है? मनुष्य को कैसार् आचरण करनार् चार्हिये। मनुष्य क कौन सार् आचरण नीति विरुद्ध है।
  8. तर्क-शार्स्त्र- इसमें ताकिक चिन्तन के विषय में विचार्र कियार् जार्तार् है- यथार् : ताकिक चिन्तन कैसे कियार् जार्तार् है? तर्क की विधि क्यार् है? ताकिक चिन्तन क स्वरूप क्यार् है? इत्यार्दि।
  9. सैार्न्दर्य-शार्स्त्र- इसमें सौन्दर्य- विषयक प्रश्नो के उत्तर खोजे जार्ते है  : यथार्- सौन्दर्य क्यार् होतार् है? सौन्दर्य क मार्पदण्ड क्यार् है? इत्यार्दि। 
  10. दर्शन मनुष्य एवं जगत के सम्बंध्ंध क अध्ययन- दर्शन जीवन की आलोचनार् तथार् जीवन क्रियार्ओं की व्यार्ख्यार् है वहार्ं दर्शन मनुष्य क सम्बंध जगत से तथार् जगत की विविध गतिविधियों से क्यार् है, अध्ययन करतार् है। जीवन क इस जगत से सम्बंध समार्ज और समार्ज की आर्थिक, रार्जनैतिक णैक्षिक आदि क्रियार्ओं के सार्थ है। अस्तु सार्मार्जिक दर्शन, आर्थिक दर्शन, रार्जनैतिक दर्शन तथार् शिक्षार् दर्शन भी अध्ययन के विषय बन गये हैं। इन सभी विषयों में समस्यार्ओं के अध्ययन के सार्थ उनमें आदर्श एवं मूल्यों की स्थार्पनार् होती है।

दर्शन क उद्देश्य

दर्शन चिन्तन एवं विचार्र है, जीवन के रहस्यों को जार्नने क प्रयत्न है। अतएव दर्शन के उद्देश्य कहे जार् सकते हैं।

  1. रहस्यार्त्मक आश्चर्य की सन्तुष्टि- दर्शन क आरम्भ भार्रत में तथार् यनू ार्न में आश्चर्य सें हुआ है। वैदिक काल में मार्नव ने प्रकृति की सुन्दर वस्तुओं, घटनार्ओं एवं क्रियार्ओं को देखकर आश्चर्य कियार् कि सूर्य, चन्द्र, तार्रे, प्रकाण, आंधी, वर्षार्, गर्मी और मार्नव की उत्पत्ति कैसे हुयी? मार्नव में इसे जार्नने की इच्छार् हुयी। उसने परम सत्तार् की कल्पनार् की। उसने अपने (आत्म) एवं र्इश्वर (परम) में अन्तर कियार् और दोनों के पार्रस्परिक सम्बंध को खोजने के लिये प्रयत्नशील हुआ। मार्नव ने परमसत्तार् को समस्त चरार्चर में समार्विष्ट देखार् और चिन्तन द्वार्रार् अनुभूति यार् सार्क्षार्त्कार करने की मार्नव ने लगार्तार्र प्रयत्न कियार् और उस परमसत्तार् की प्रार्प्ति को मोक्ष कहार् यही परमसत्तार् की प्रार्प्ति भार्रतीय दर्शन कहलार्यार्। 
  2. तार्त्विक रहस्यों पर चिन्तन- येनार्न में ‘‘आश्चर्य’’ से दर्शन क जन्म मार्नार् गयार् है। यूनार्नी लोगों को भी प्रकृति की क्रियार्ओं पर आश्चर्य हुआ और संसार्र के मूलोद्गम को जार्नने की जिज्ञार्सार् ने जन्म लियार्। थेलीज ने जल को एनैकथीमैन्डर ने वार्यु और हैरार्क्लार्इटस ने अग्नि को उद्गम क मूल मार्नार्। वार्स्तव में ये तीन तत्व ही जगत निर्मार्ण के मूल मार्ने गये। यही तत्व भार्रत में भी सृष्टि निर्मार्ण के मूल तत्व मार्ने गये हैं बस पार्ंचवार् तत्व आकाश मार्नार् गयार् है। 
  3. तर्क द्वार्रार् संशय दूर करनार्- दर्शन क आरम्भी संशय से होतार् है। वार्स्तविक ज्ञार्न की प्रार्प्ति केवल किसी की बार्त को मार्न लेने से नहीं होतार् है जब तक कि इसे तर्क देकर सिद्ध न कियार् जार्ये। डेकार्टे ने मार्नार्- ‘‘मैं विचार्र करतार् हॅू इस लिये मेरार् अस्तित्व है’’ अर्थार्त् डेकार्टे ने आत्मार् को सन्देह रहित मार्नार्। आत्मार् मनुष्य में निहीत है परन्तु र्इश्वर की सत्तार् असंदिग्ध हैं। दर्शन सत्य ज्ञार्न प्रार्प्ति क माग प्रशस्त करतार् है। 
  4. यर्थार्थ स्वरूप क ज्ञार्न प्रार्प्त करनार्- भार्रतीय दृष्टिकोण से दर्शन क लक्ष्य सत्य की खोज करनार् है। यह सत्य प्रकृति सम्बंधी तथार् आत्मार् सम्बंधी हो सकतार् है। इस यूनार्न के दाशनिक प्लेटो ने मार्नार् और उनके अनुसार्र-दर्शन, अनन्त क तथार् वस्तुओं के यथाथ स्वरूप क ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् है। अरस्तु ने और अधिक स्पष्ट करते हुये लिखार् कि दर्शन क लक्ष्य प्रार्णी के स्वरूप क अन्वेषण करनार् है और उनमें निहित स्वार्भार्विक गुणों क पतार् लगार्तार् है। वून्ट ने स्पष्ट कियार्- विद्वार्नों द्वार्रार् प्रार्प्त समग्र ज्ञार्न क सार्मंजस्यपूर्ण एकतार् में एकत्रीकरण ही दर्शन है। अतएव ‘‘दर्शन पूर्ण रूपेण एकत्रित ज्ञार्न ही है।’’ दर्शन क लक्ष्य समग्र ब्रह्मार्ण्ड को समग्र वार्स्तविकतार् क दिग्दर्शन है। 
  5. जीवन की आलोचनार् और व्यार्ख्यार् करनार्- दर्शन क एक लक्ष्य आधुिनक वर्णों मे ंजीवन की आलोचनार् एवं व्यार्ख्यार् करनार् तथार् निश्चित धार्रणार्ओं को प्रार्प्त करार्नार् है जिससे जीवन को लार्भ हो सके। दर्शन क उद्देश्य व्यार्पक तथार् विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित है। 
  6. जीवन के आदर्शों क निर्मार्ण करनार्- पार््रचीन काल से आज तक अपने देश में तथार् अन्य सभी देशों में दर्शन क लक्ष्यों जीवन के आदर्शों क निर्मार्ण करनार् रहार् है। दर्शन जीवन के प्रति उस निर्णय को कहते है जो मार्नव करतार् है। अत: आदर्श निर्मार्ण दर्शन क एक महत्वपूर्ण लक्ष्य होतार् है। 

दाशर्निक दृष्टिकोण की विशेषतार्एँ 

प्रकृति, व्यक्तियों और वस्तुओं तथार् उनके लक्ष्यों और उद्देश्यों के बार्रे में निरन्तर विचार्र करतार् है। र्इश्वर, ब्रह्मार्ण्ड और आत्मार् के रहस्यों और इनके पार्रस्परिक सम्बार्धों पर प्रकाश डार्लतार् है। जो व्यक्ति इनसे सम्बंधित प्रश्नों क उत्तर देने क प्रयार्स करतार् है उसे हम दाशनिक कहते हैं। रॉस ने लिखार् है कि- वे सब लोग जो सत्यतार् एवं सार्हस से उपर्युक्त प्रश्नों क कोर्इ उत्तर देने क प्रयत्न करते हैं और जिन उत्तरों में कुछ सुसंगति तथार् तर्कबद्धतार् होती है उनक दृष्टिकोण दाशनिक होतार् है- चार्हे वे भौतिकवार्दी धर्मशार्स्त्री यार् अज्ञेयवार्दी हो।’’ दाशनिक दृष्टिकोण की विशेषतार्एं है-

  1. विस्मय की भार्वनार्- दाशनिक वह व्यक्ति होतार् है, जार् े अपने चार्रार् ें आरे की प्रार्कण्तिक एवं सार्ंसार्रिक व्यवस्थार् एवं घटनार्ओं को देखकर आश्चर्य प्रकट करतार् है और मूल कारण की खोज करने लगतार् है। 
  2. सन्देह- दाशनिक प्रत्यके बार्त की ठार्से प्रमार्णों की खार्जे कर उसमें फसं ने क प्रयार्स करतार् है और प्रत्येक बार्त को सन्देार्हस्पद दृष्टि से देखतार् है।
  3. मीमार्ंसार्- दाशनिक किसी भी बार्त को ज्यों क त्यों नही  स्वीकार करतार् है, वरन् उसकी मीमार्ंसार् करके ही उसको मार्न्यतार् देतार् है।
  4. चिन्तन- मीमार्ंसार् के लिय े चिन्तन की आवश्यकतार् हो ती है और दाशनिक चिन्तनशील होतार् है। 
  5. तटस्थतार्- दार्शर्निक अन्धविश्वार्सी नहीं हार्तेार्। वह तटस्थ भार्व से किसी भी प््रार्श्न पर चिन्तन करतार् है। उसमें विचार्र स्वार्तंत्रय होतार् है। वह स्वयं अपने मत क निर्धार्रण करतार् है।

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