तुगलक वंश की स्थार्पनार्

खुसरो खार्ँ क वध कर गार्जी मलिक गयार्सुद्दीन तुगलकशार्ह के नार्म से दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठार्। इस नए तुगलक वंश ने सन् 1320 में गयार्सुद्दीन के रार्ज्यार्रोहण से लेकर 1414 ई0 में सैय्यद वंश की स्थार्पनार् तक सल्तनत की बार्गड़ोर सम्भार्ली। इस वंश में निम्नलिखित शार्सक हुए-

  1. गयार्सुद्दीन तुगलक (1320-1325 ई0)
  2. मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351 ई0)
  3. फीरोजशार्ह तुगलक (1351-1388 ई0)
  4. फीरोज के उत्तरार्धिकारी गयार्सुद्दीन तुगलक द्वितीय, अबूबक्र, नार्सिरूद्दीन मुहम्मद शार्ह, अलार्उद्दीन सिकन्दरशार्ह (हुमार्यूँ), नार्सिरुद्दीन महमूदशार्ह (1388 से 1412 ई0)

14 अप्रैल, 1316 ई0 को सत्रह यार् 18 वर्ष की अल्प आयु में मुबार्रक खार्ं कुतुबुद्दीन मुबार्रकशार्ह के नार्म से दिल्ली क सुल्तार्न बन गयार्। प्रथार्नुसार्र उत्सव मनार्ये गये और रार्ज्य के प्रमुख व्यक्तियों और अमीरों को पदवियार्ं तथार् सम्मार्न प्रदार्न किये गये। मलिक काफूर की हत्यार् और कुतुबुद्दीन मुबार्रकशार्ह के सिंहार्सनार्रोहण से दरबार्र के उन अमीरों को रार्हत मिली जो अलार्उद्दीन के घरार्ने के प्रति स्वार्मीभक्त थे। नये सुल्तार्न ने कठोर अलार्ई नियमों को शिथिल करके अमीर वर्ग को अपने पक्ष में कर लियार्। उसने सभी कैदियों को छोड़ दियार् और बार्जार्र नियंत्रण संबंधी कठोर दण्डों को हटार् दियार्। अमीरों की जो भूमियार्ं जब्त की थी यार् उनके जो गार्ंव हस्तगत कर लिये गए थे वे उन्हें लौटार् दिये गये। सैनिकों को छ: मार्ह क वेतन पुरस्कार स्वरूप दियार् गयार् और मलिकों तथार् अमीरों के वेतन बढार्ने क आदेश दियार् गयार्। सुल्तार्न ने अपनी स्थिति और भी सुदृढ़ करने के लिये पुरार्ने अलार्ई अमीर वर्ग को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कियार्। सबसे अधिक आश्चर्यजनक उन्नति गुजरार्त,

के सार्मार्न्य दार्स हसन की हुई जिसे सुल्तार्न ने विशेष सम्मार्न और खुसरो खार्ं की पदवी से सुशोभित कियार् तथार् मलिक नार्यब क लार्व-लश्कर और आक्तार् प्रदार्न कियार्। कुछ समय बार्द ही शार्सन के पहले ही वर्ष में सुल्तार्न ने उसे वजीर के पद पर पदोन्नत कर दियार्। खुसरो खार्ं के प्रति सुल्तार्न के झुकाव से कुछ प्रमुख अमीर असन्तुष्ट हो गए।

कुतुबुद्दीन मुबार्रकशार्ह ने गद्दी पर बैठने के बार्द लगभग दो वर्ष तक तो बड़ी तत्परतार् और लगन के सार्थ कार्य कियार्; परन्तु शीघ्र ही वह आलस्य, विलार्सितार्, इन्द्रिय लोलुपतार् व्यभिचार्र आदि दुर्गुणों क शिकार हो गयार्, चॅूंकि सुल्तार्न खुल्लम खुल्लार् रार्त दिन व्यभिचार्र तथार् दुरार्चार्र में लगार् रहतार् थार्, अत: प्रजार् के हृदय में भी व्यभिचार्र तथार् दुरार्चार्र के भार्व उत्पन्न हो गये। इमरद गुलार्म, रूपवार्न ख्वार्जार्सरार् तथार् सुन्दर कनीजों (दार्सियों) क मूल्य पार्ंच सौ, हजार्र तथार् दो हजार्र टंक हो गयार्। यद्यपि सुल्तार्न कुतुबुद्दीन के अलार्ई आदेशों में केवल मदिरार्पार्न की मनार्ही क आदेश उसी प्रकार चार्लू रक्खार् गयार् जैसार् कि अलार्उद्दीन खल्जी के समय थार् किन्तु उसकी आज्ञार्ओं तथार् उसके आदेशों क भय न होने के कारण प्रत्येक घर मंिदरार् की दुकान बन गयार् थार्। मुल्तार्नी अपनी इच्छार्नुसार्र कार्य करने लगे। वे सुल्तार्न अलार्उद्दीन की बुरार्ई करते थे और सुल्तार्न कुतुबुद्दीन को दुआ देते थे। मजदूरी चौगुनार् बढ़ गई। जो लोग 10-12 टंक पर नौकर थे उनक वेतन 70-80 और 100 टंक तक पहुंच गयार्। घूस, धोखार्धड़ी तथार् अपहरण के द्वार्र खुल गये। सुल्तार्न के आदेशों के भय क लोगों के हृदय से अन्त हो गयार्।

सुल्तार्न कुतुबुदुदीन को अपने रार्ज्यकाल के चार्र वषोर्ं तथार् चार्र महीनों मे मदिरार्पार्न गार्नार् सुनने, भोग-विलार्स, ऐश व इशरत तथार् दार्न के अतिरिक्त कोई कार्य ही न रह गयार् थार्। कोई नहीं कह सकतार् कि यदि उसके रार्ज्यकाल में मंगोल सेनार्, आक्रमण कर देती यार् कोई उसके रार्ज्य पर अधिकार जमार्ने क प्रयत्न प्रार्रम्भ कर देतार् यार्

किसी ओर से कोई बहुत बड़ार् विद्रोह तथार् उपद्रव उठ खड़ार् होतार् तो उसकी असार्वधार्नी, भोग-विलार्स तथार् लार्परवार्ही से देहली के रार्ज्य की क्यार् दशार् हो जार्ती, किन्तु उसके रार्ज्यकाल में न तो कोई अकाल पड़ार्, न मुगलों के आक्रमण क भय हुआ, न आकाश से कोई ऐसी आपत्ति आई, जिसे दूर करने में लोग असमर्थ होते न किसी ओर से कोई विद्रोह तथार् उपद्रव हुआ और न किसी को कोई कष्ट थार् और न क्लेश किन्तु उसक विनार्श उसकी असार्वधार्नी तथार् भोग-विलार्स के कारण हो गयार्।8 अनुभवी लोग जिन्होंने बल्बनी रार्ज्य की दृढ़तार् तथार् सुल्तार्न मुइज्जुद्दीन की असार्वधार्नी, अलार्ई रार्ज्य क अनुशार्सन तथार् सुल्तार्न कुतुबुद्दीन क नियमों क पार्लन न करनार् देखार् थार् वे इस बार्त से सहमत थे, कि सुल्तार्न में अनुशार्सन स्थार्पित करने की योग्यतार्, कठोरतार् अपनी आज्ञार्ओं क पार्लन करार्ने की शक्ति तथार् अहंकार एवं आतंक क होनार् आवश्यक है।

उसने बड़ी निरंकुशतार् प्रार्रम्भ कर दी। उसने ऐसे कार्य करने प्रार्रम्भ कर दिये जो किसी शार्सक को शोभार् नहीं देते। उसकी आंखों की लज्जार् समार्प्त हो गयी। वह स्त्रियों के वस्त्र तथार् आभूषण धार्रण करके मजमे में आतार् थार्। नमार्ज, रोजार् पूर्णतयार् त्यार्ग दियार् थार् तथार् अपने अमीरों और मलिकों को स्त्रियों तथार् व्यभिचार्री विदूषकों से इतनी बुरी-बुरी गार्लियार्ं इस प्रकार दिलवार्तार् थार् कि हजार्र-सितून में उपस्थित जन उन्हें सुनते थे।

चूंकि उसक पतन निकट थार् इसलिये उसने खुल्लम खुल्लार् शेख निजार्मुद्दीन को भलार्-बुरार् कहार् और अपने अमीरों को आदेश दियार् कि कोई भी शेख के दर्शनाथ गयार्सपुर न जार्ये। सुल्तार्न की हसन पर आसक्ति बढ़ती ही गयी। जिसने भी सुल्तार्न को हसन की तरफ से सार्वधार्न करने क प्रयत्न कियार् उसे ही सुल्तार्न ने दण्डित कियार्। उसने चंदेरी के मुक्तार् मलिक तमर क पद घटार् दियार् और दरबार्र से निष्कासित कर दियार् तथार् चंदेरी की आक्तार् उससे लेकर खुसरो को दे दी। उसने कड़े के मुक्तार् मलिक तुलबगार्यगदार् के मुंह पर जो कि

मार्बर अभियार्न के दौरार्न खुसरो खार्ं की विद्रोही प्रवृत्ति को बयार्न कर रहार् थार् के मुंह पर चार्ंटे मार्रे और उसक पद, आक्तार् तथार् लार्वलश्कर जब्त कर लियार्। जिन लोगों ने खुसरो खार्ं की दुष्टतार् के बार्रे में गवार्ही दी उन्हें कठोर दण्ड दिये और कैद करके दूर-दूर के स्थार्नों पर भेज दियार्। इस प्रकार सभी को यह बार्त ज्ञार्त हो गयी कि जो भी अपनी रार्जभक्ति के कारण खुसरो खार्ं के खिलार्फ कुछ कहेगार् उसे दण्ड क भार्गी बननार् पड़ेगार्। दरबार्रियों तथार् शहर के निवार्सियों ने समझ लियार् कि सुल्तार्न कुतुबुद्दीन क अंतिम समय निकट आ गयार् है। दरबार्र के प्रतिष्ठित तथार् गणमार्न्य व्यक्तियों ने विवश होकर खुसरो खार्ं की शरण में जार्नार् प्रार्रम्भ कर दियार् थार्। लोग खुसरो खार्ं को सुल्तार्न के विरूद्ध “ार्ड्यन्त्र करते देखते थे पर क्रोध, अन्यार्य तथार् दण्ड के भय से कुछ न कह सकते थे। सम्रार्ट के शिक्षक काजी खार्ं जो उस समय सदरे जहार्ं थे और कलीददार्री (तार्ली रखने का) क उच्च पद उन्हें प्रार्प्त थार् के समझार्ने क भी सुल्तार्न पर असर न हुआ। खुसरो खार्ं ने सुल्तार्न कुतुबुद्दीन को सहमत कर और उसकी दार्नशीलतार् की प्रशंसार् कर गुजरार्त से अपने बरवार्र रिश्तेदार्रों को बुलार् लियार् और अपने सम्बन्धियों से मिलने क वार्स्तार् देकर छोटे द्वार्र की कुंजी सुल्तार्न से प्रार्प्त कर ली। इब्नबतूतार् क विवरण यहार्ं थोड़ार् अलग है।

उसके अनुसार्र एक दिन खुसरो खार्ं ने सम्रार्ट से निवेदन कियार् कि कुछ हिन्दू मुसलमार्न होनार् चार्हते है। प्रथार् के अनुसार्र सम्रार्ट की अभ्यर्थनार् के लिए उसकी उपस्थिति आवश्यक थी इसलिये सुल्तार्न ने जब उन पुरूषों को भीतर बुलार्ने को कहार् तो उसने उत्तर दियार् कि अपने सजार्तीयों से लज्जित और भयभीत होने के कारण वे रार्त को आनार् चार्हते हैं। इस पर सम्रार्ट ने रार्त को आने की अनुमति दे दी। अब मलिक खुसरो ने अच्छे वीर हिन्दुओं को छार्टार् और अपने भ्रार्तार् खार्नेखार्नार् को भी उसमें सम्मिलित कर लियार्। गर्मी के दिन थे, सम्रार्ट सबसे ऊँची छत पर थार्। मलिक खुसरो के अतिरिक्त उसके पार्स कोई न थार्। खुसरो खार्ं क मार्मार् रन्धौल कुछ बरवार्रियों के सार्थ छिपार् थार् वह परदों के

पीछे छिपतार् हुआ हजार्र सुतून में पहुंचार् और काजी जियार्उद्दीन के पार्स पहुॅंच कर उसे एक पार्न क बीड़ार् दियार्। उसी समय जहार्रियार् बरवार्र ने जो सुल्तार्न कुतुबुद्दीन की हत्यार् के लिये नियुक्त थार्, काजी जियार्उद्दीन के निकट पहुंचकर परदे के पीछे से काजी जियार्उद्दीन की ओर एक तीर मार्रार् और काजी को उसी स्थार्न पर मृत्यु की नींद सुलार् दियार्। हजार्र सुतून बरवार्रियों से भर गयार् जिससे बड़ार् शोरगुल होने लगार्। यह शोरगुल सुल्तार्न के भी कान में पहुँचार् और उसने खुसरो खार्ं से पूछार् कि नीचे यह शोरगुल कैसार् हो रहार् है। खुसरो खार्न कोठे की दीवार्र तक आयार् और नीचे झार्ंक कर सुल्तार्न से निवेदन कियार् कि ‘खार्से के घोड़े छूट गये है और वे हजार्र सितून के आंगन में दौड़ रहे है, लोग घेर कर उन घोड़ों को पकड़ रहे है। जबकि इब्नबतूतार् क विवरण इससे अलग है। उसके अनुसार्र खुसरो मलिक ने सुल्तार्न से यह कहार् कि हिन्दुओं को भीतर आने से काजी रोकते है इसी कारण कुछ वार्द-विवार्द उत्पन्न हो गयार् है। इस बीच जार्हरियार् अन्य बरवार्रों को लेकर हजार्र सुतून के कोठे पर पहुँच गयार्, शार्ही द्वार्र के दरबार्नों की, जिनके नार्म इब्रार्हीम तथार् इश्हार्क थे, तीर मार्र कर हत्यार् कर दी। सुल्तार्न समझ गयार् कि कोई “षडयंत्र हो गयार् है। इसलिये वह अन्त:पुर की ओर भार्गार् पर खुसरो खार्न ने पीछे से उसके केश पकड़ लिये। सुल्तार्न ने उसे नीचे पटक दियार् और उसके ऊपर सवार्र हो गयार् परन्तु उसी समय वहार्ं अन्य बरवार्री आ गये। जार्हरियार् बरवार्र ने सुल्तार्न क शीश काट डार्लार् और उसक मृतक शरीर हजार्र सुतून के कोठे से हजार्र सुतून के आंगन में फेंक दियार्। उनमें एक “षडयंत्रकारी सूफी अपने कुछ, ब्रार्दों सार्थियों को लेकर आगे बढ़ार् तार्कि यदि कोई कुतुबुद्दीन की ओर से जोर मार्रे तो उसकी हत्यार् कर दी जार्य। ब्रार्दों लोगों ने यह तय करनार् प्रार्रम्भ कियार् कि अब किसे सिंहार्सनार्रूढ़ कियार् जार्य। खुसरो के हितैषियों ने इस अवसर पर किसी शहजार्दे को सिंहार्सनार्रूढ़ करने में बड़ी आपत्ति प्रकट की और कहार् कि, ‘‘जब तूने अपने स्वार्मी की हत्यार् कर ही दी है तो अब स्वयं सुल्तार्न बन अन्यथार् तुझे कोई जीवित न छोड़ेगार्।’’ इस परार्मर्श में खुसरो के मुस्लिम सहार्यक भी सम्मिलित थे। कुतुबुद्दीन के भार्इयों फरीद खार्ं और अबूबक्र खार्ँ की हत्यार् कर दी गयी और तीन छोटे भार्ईयों अली खार्ँ, बहार्दुर खार्ँ और उस्मार्न को अन्धार् बनार् दियार् गयार्। अलार्ई रार्जभवन में बार्हर से भीतर तक बरवार्रों क अधिकार स्थार्पित हो गयार्। अत्यधिक मशार्ल और डीबट जलार् दिये गये। दरबार्र सजार् दियार् गयार्। उसी आधी रार्त में मलिक ऐनलमुल्क मुल्तार्नी, मलिक बहीदुद्दीन कुरैशी, मलिक फखरूद्दीन जूनार्, मलिक बहार्उद्दीन दबीर, मलिक क़िरार्बेग के पुत्रों को जिनमें से सभी प्रतिष्ठित तथार् गणमार्न्य मलिक थे एवं अन्य प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों को बुलवार्यार् गयार्। उन्हें महल के द्वार्र पर लार्यार् गयार् और वहार्ं से वे हजार्र सुतून के कोठे पर पहुंचार् दिये गये। भीतर प्रवेश करने पर उन्होंने मलिक खुसरो को सिंहार्सनार्रूढ़ देखार् ओर उसके हार्थ पर भक्ति की शपथ ली। खुसरो मलिक की पदवी सुल्तार्न नार्सिरूद्दीन निश्चित हुई। इनमें से कोई व्यक्ति प्रार्त: काल तक बार्हर न जार् सका।

सूर्योदय होते ही समस्त रार्जधार्नी में विज्ञप्ति करार् दी गयी और बार्हर के सभी अमीरों के पार्स बहुमूल्य खिलअत (सिरोपार्) तथार् आज्ञार्पत्र भेजे गये। सभी अमीरों ने ये खिलअते स्वीकार कर ली। केवल दीपार्लपुर के हार्किम तुगलकशार्ह ने इनको उठार्कर फेंक दियार् और आज्ञार्पत्र पर आसीन होकर उसकी अवज्ञार् की। यह सुनकर खुसरो ने अपने भ्रार्तार् खार्नेखार्नार् को उस ओर भेजार् परन्तु तुगलकशार्ह ने उसको परार्स्त कर भगार् दियार्।29 खुसरो मलिक ने सुल्तार्न होकर हिन्दुओं को बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त करनार् प्रार्रम्भ कर दियार् और गोवध के विरूद्ध समस्त देश में आदेश निकाल दियार्। अपने सिंहार्सनार्रोहण के पार्ंच दिन के भीतर ही खुसरो ने महल में मूर्ति पूजार् आरम्भ करवार् दी।

इब्नबतूतार् बतार्तार् है कि मुल्तार्न नगर में तुगलक द्वार्रार् निर्मित मस्जिद में उसने यह फतवार् पढ़ार् थार् कि 48 बार्र तार्तरियो को रण में परार्स्त करने के कारण उसे मलिक गार्जी की उपार्धि दी गई थी।

सम्रार्ट कुतुबुद्दीन ने इसको दीपार्लपुर के हार्किम के पद पर प्रतिष्ठित कर इसके पुत्र जूनार् खार्ं को मीर-आखूर के पद पर नियुक्त कियार्। सम्रार्ट खुसरो ने भी इसको इसी पद पर रखार्।
नार्सिरुद्दीन खुसरो के विरूद्ध विद्रोह क विचार्र करते समय गार्जी तुगलक के अधीन केवल तीन सौ विश्वसनीय सैनिक थे। अतएव इसने तत्कालीन सुल्तार्न के वली किशलू खार्न को (जो केवल एक पड़ार्व की दूरी पर मुल्तार्न नगर में थार्) लिखार् कि इस समय मेरी सहार्यतार् कर अपने स्वार्मी के रूधिर क बदलार् चुकाओ परन्तु किशलू खार्ँ ने यह प्रस्तार्व अस्वीकार कर दियार् क्योंकि उसक पुत्र खुसरो खार्ं के पार्स थार्।

अब तुगलकशार्ह ने अपने पुत्र जूनार् खार्ँ को लिखार् कि किशलू खार्ं के पुत्र को सार्थ लेकर, जिस प्रकार संभव हो दिल्ली से निकल आओ। मलिक जूनार् निकल भार्गने के तरीके पर विचार्र कर ही रहार् थार् कि दैवयोग से एक अच्छार् अवसर उसके हार्थ आ गयार्। खुसरो मलिक ने एक दिन उससे यह कहार् कि घोड़े बहुत मोटे हो गये हैं, तुम इनसे परिश्रम लियार् करो। आज्ञार् होते ही जूनार् खार्ं प्रतिदिन घोड़े फेरने बार्हर जार्ने लगार्, किसी दिन एक घंटे में ही लौट आतार्, किसी दिन दो घंटे में और किसी दिन तीन-चार्र घंटों में एक दिन वह जोहर (एक बजे की नमार्ज) क समय हो जार्ने पर भी न लौटार्। भोजन करने क समय आ गयार्। अब सुल्तार्न नें सवार्रों को खबर लार्ने की आज्ञार् दी। उन्होंने लौट कर कहार् कि उसक कुछ भी पतार् नहीं चलतार्। ऐसार् प्रतीत होतार् है कि किशलू खार्ं के पुत्र को लेकर अपने पितार् के पार्स भार्ग गयार् है।

पुत्र के दीपार्लपुर पहुंचने पर गार्जी मलिक ने खुशियार्ं मनार्ई और दबीरे खार्स को बुलार्कर एक पत्र मुगलती मुल्तार्न के शार्सक के नार्म, दूसरार् मुहम्मद शार्ह सिविस्तार्न के शार्सक के नार्म, तीसरार् मलिक बहरार्म ऐबार् को, चौथार् यकलखी अमीर सार्मार्नार् को और पार्ंचवार् जार्लौर के मुक्तार् अमीर होशंग को सहार्यतार् प्रार्प्ति हेतु लिखवार्यार्।

बहरार्म ऐबार् ने पूरे उत्सार्ह से गार्जी मलिक की सहार्यतार् क वचन दियार्। जबकि मुगलती अमीर अत्यन्त रुष्ट हुआ इस पर गार्जी मलिक ने मुल्तार्न के अन्य अमीरों को गुप्त रूप से यह संकेत कर दियार् कि वे मुगलती अमीर पर आक्रमण कर दें। एक मोची के अलार्वार् उसक सार्थ किसी ने न दियार् और विद्रोहियों के नेतार् बहरार्म सिरार्ज ने उसक सिर धड़ से उड़ार् दियार्। जब मुहम्मदशार्ह लुर सिविस्तार्न के पार्स यह संदेश पहुंचार् तो उस समय उसके अमीरों ने विद्रोह कियार् हुआ थार्। विद्रोही सरदार्रों ने गार्जी मलिक से संधि कर ली और उसकी सहार्यतार् क वचन दियार् किन्तु प्रस्थार्न में इतनार् विलम्ब कियार् कि युद्ध ही समार्प्त हो गयार्।

गार्जी मलिक ने जो पत्र ऐनलमुल्क मुल्तार्नी को लिखार् उसे उसने खुसरो खार्ं को दिखार् दियार्। गार्जी मलिक ने पुन: एक गुप्तचर उसके पार्स भेजार्। ऐनलमुल्क ने उससे कहार् कि इस समय वह विवश है और खुसरो खार्ं क सहार्यक बनार् हुआ है किन्तु उसे खुसरो से हादिक घृणार् है और वह युद्ध आरम्भ होते ही गार्जी मलिक के पार्स आ जार्येगार् फिर वह उसे चार्हे दण्ड दे यार् मार्फ कर दे। सार्मार्नार् के अमीर यखलखी ने पत्र पार्कर विरोध करनार् प्रार्रम्भ कर दियार्, वार्स्तव में वह हिंदू से परिवर्तित मुस्लिम थार् और उसने यह पत्र मलिक खुसरो को भेज दियार् और गार्जी मलिक के विरूद्ध प्रस्थार्न कियार् परंतु उसकी परार्जय हुई और नगरवार्सियों ने उस पर आक्रमण कर उसकी हत्यार् कर दी।

अब गार्जी तुगलक ने विद्रोह प्रार्रम्भ कर दियार् और किशलू खार्ं की सहार्यतार् से सेनार् एकत्र करनार् शुरू कर दियार्। सुल्तार्न ने अपने भ्रार्तार् खार्नेखार्नार् को युद्ध करने को भेजार् परन्तु वह परार्जित होकर भार्ग आयार्, उसके सार्थी मार्रे गये और रार्जकोष तथार् अन्य सार्मार्न गार्जी तुगलक के हार्थ आ गयार्।

उस समय मलिक गार्जी तुगलक ने तीन स्वप्न देखे। एक में किसी बुजुर्ग ने उसे बार्दशार्ही की सूचनार् दी। दूसरे स्वप्न में तीन चार्ंद दिखार्ई दिये जिनक अर्थ तीन शार्ही छत्र समझे गये। तीसरे स्वप्न में एक बहुत सुन्दर उद्यार्न देखार् जिसक अर्थ यह थार् कि यह रार्जत्व क बार्ग है जो
उसे प्रार्प्त होने वार्लार् है। अब तुगलक दिल्ली की ओर अग्रसर हुआ और खुसरो ने भी उससे युद्ध करने की इच्छार् से नगर के बार्हर निकल आतियार्बार्द में अपनार् शिविर डार्लार्। सम्रार्ट ने इस अवसर पर हृदय खोलकर रार्जकोष लुटार्यार्, रूपयों की थैलियों पर थैलियार्ं प्रदार्न की। खुसरो खार्ं की सेनार् भी ऐसी जी तोड़कर लड़ी कि तुगलक की सेनार् के पार्ंव न जमे और वह अपने डेरे इत्यार्दि लुटते हुए छोड़कर ही भार्ग खड़ी हुई।

तुगलक ने अपने वीर सिपार्हियों को फिर एकत्र कर कहार् कि भार्गने के लिए अब स्थार्न नहीं है। खुसरो की सेनार् तो लूट में लगी हुई थी और उसके पार्स इस समय थोड़े से मनुष्य ही रह गए थे। तुगलक अपने सार्थियो को ले उन पर फिर जार् टूटार्।

भार्रतवर्ष में सम्रार्ट क स्थार्न छत्र से पहचार्नार् जार्तार् है। मिस्र देश में सम्रार्ट केवल ईद के दिवस पर ही छत्र धार्रण करतार् है परंतु भरतवर्ष में और चीन में देश, विदेश, यार्त्रार् आदि सभी स्थार्नों में सम्रार्ट के सिर पर छत्र रहतार् है।

गार्जी तुगलक के इस प्रकार से सुल्तार्न पर टूट पड़ने पर भीषण यु़द्ध हुआ। जब सुल्तार्न की समस्त सेनार् भार्ग गई, कोई सार्थी न रहार्, तो उसने घोड़े से उतर अपने वस्त्र तथार् अस्त्रार्दिक फेंक दिए और भार्रतवर्ष के सार्धुओ की भार्ंति सिर के केश पीछे की ओर लटक लिए और एक उपवन में जार् छिपार्।

इधर गार्जी तुगलक के चार्रों ओर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई। नगर में आने पर कोतवार्ल ने नगर की कुंजियार्ं उसको अर्पित कर दी। अब रार्जप्रार्सार्द में घुसकर उसने अपनार् डेरार् भी एक ओर को लगार् दियार् और किशलू खार्ं से कहार् कि तू सुल्तार्न हो जार्। किशलू खार्ं ने इस पर कहार् कि तू
ही सुल्तार्न बन। जब वार्द-विवार्द में ही किशलू खार्ं ने कहार् कि यदि तू सुल्तार्न होनार् नहीं चार्हतार् तो हम तेरे पुत्र को ही रार्जसिंहार्सन पर बिठार्ए देते हैं, तो यह बार्त गार्जी तुगलक ने अस्वीकार की और स्वयं सुल्तार्न गयार्सुद्दीन की पदवी लेकर सिंहार्सन पर बैठ गयार्। सिंहार्सन पर बैठने के पश्चार्त् अमीर और जनसार्धार्रण सबने उसकी आधीनतार् स्वीकार की।

सिंहार्सनार्रोहण से पूर्व तुगलक ने तख्त पर बैठने में आनार् कानी की थी और उपस्थित अमीरों से कहार् थार् कि- खुसरो खार्ं के कृत्यों को सुनकर मैने तीन प्रतिज्ञार्यें की थीं- (1) मैं इस्लार्म के लिये जिहार्द करूँगार् (2) इस रार्ज्य को इस तुच्छ हिन्दू के पुत्र से मुक्त करार् दँूगार् और उन शहजार्दों को जो सिंहार्सन के योग्य होंगे सिंहार्सनार्रूढ़ करार्ऊँगार् (3) जिन काफिरों ने शार्ही वंश क विनार्श कियार् है उन्हें दण्ड दॅूंगार्। इसलिये यदि मैने अब रार्ज्य स्वीकार कर लियार् तो लोग कहेंगे कि मैने रार्ज्य ही के लिये युद्ध कियार् थार्।

खुसरो खार्ं तीन दिन तक उपवन में ही छिपार् रहार्। तृतीय दिवस जब वह भूख से व्यार्कुल हो बार्हर निकलार् तो एक बार्गबार्न ने उसे देख लियार्। उसने बार्गबार्न से भोजन मार्ंगार् परंतु उसके पार्स भोजन की कोई वस्तु न थी। इस पर खुसरो ने अपनी अंगूठी उतार्री और कहार् कि इसको गिरवी रखकर बार्जार्र से भोजन ले आ। जब बार्गबार्न बार्जार्र में गयार् और अंगूठी दिखार्ई तो लोगों ने संदेह कर उससे पूछार् कि यह अंगूठी तेरे पार्स कहार्ं से आई। वे उसको कोतवार्ल के पार्स ले गए। कोतवार्ल उसको गार्जी तुगलक के पार्स ले गयार्। गार्जी तुगलक ने उसके सार्थ अपने पुत्र को खुसरो खार्ं को पकड़ने के लिए भेज दियार्। खुसरो खार्ं इस प्रकार पकड़ लियार् गयार्। जब जूनार् खार्ं उसको टट्टू पर बैठार्कर सुल्तार्न के सम्मुख ले गयार् तो
उसने सुल्तार्न से कहार् कि ‘‘मैं भूखार् हूँ’’। इस पर सुल्तार्न ने शर्बत और भोजन मंगार्यार्।
जब गार्जी तुगलक उसको भोजन, शर्बत, तथार् पार्न इत्यार्दि सब कुछ दे चुक तो उसने सुल्तार्न से कहार् कि मेरी इस प्रकार से अब और भर्तस्नार् न कर, प्रत्युत मेरे सार्थ ऐसार् बर्तार्व कर जैसार् सुल्तार्नों के सार्थ कियार् जार्तार् है। इस पर तुगलक ने कहार् कि आपकी आज्ञार् सिर मार्थे पर। इतनार् कह उसने आज्ञार् दी कि जिस स्थार्न पर इसने कुतुबुद्दीन क वध कियार् थार् उसी स्थार्न पर ले जार्कर इसक सिर उड़ार् दो और सिर तथार् देह को भी उसी प्रकार छत से नीचे फेंको जिस प्रकार इसने कुतुबुद्दीन क सिर तथार् देह फेंकी थी। इसके पश्चार्त् इसके शव को स्नार्न करार् कफन दे उसी समार्धि स्थार्न में गार्ड़ने की आज्ञार् प्रदार्न कर दी।

उल्लेखनीय है कि तुगलकनार्मार् बतलार्ती है कि जब खुसरो खार्ं को कैद कर गार्जी तुगलक के सम्मुख लार्यार् गयार् तो गार्जी तुगलक ने उससे पॅूंछार् कि “तूने अपने स्वार्मी की हत्यार् क्यों की, उसने तुझे अपने हृदय में स्थार्न दियार् और तूने उसक रक्त बहार् दियार्।” खुसरो खार्ं ने उत्तर दियार् कि- “मेरी दशार् सब लोगों को ज्ञार्त है, यदि मुझसे अनुचित व्यवहार्र न कियार् जार्तार् तो जो कुछ मैने कियार् वह न करतार्।”

विद्धार्नों ने तुगलक वंश की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मत प्रकट किये हैं। इनकी उत्पत्ति के विषय में तीन मत मिलते है-प्रथम तुगलक मंगोल थे, द्वितीय तुर्क थे और तृतीय वे मिश्रित जार्ति के थे। तुगलक मंगोल थे, इस मत के प्रवर्तक मिर्जार् हैदर हैं। इन्होने अपने ग्रंथ तार्रीख-ए-रशीदी’ में तुगलकों को चगतार्ई मंगोल बतार्यार् है। उन्होंने यह स्पष्ट कियार् कि मंगोल दो प्रमुख श्रेणियों में विभक्त थे- प्रथम मंगोल, द्वितीय चगतार्ई मंगोल। दोनों में परस्पर वैमनष्य थार् और संघर्ष चलतार् रहतार् थार्। दोनों ही एक दूसरे को हेय समझते थे, इसलिए घृणार् भी करते थे। इसी भार्वनार् के कारण मंगोल श्रेणी के लोग चगतार्ई मंगोलों को ‘करार्वनार्’ कहते थे ओर चगतार्ई मंगोल अन्य मंगोलो को ‘जार्टव’ कहते थे। ‘करार्वनार्’ और ‘करौनार्’ में समतार् है। ‘करार्वनार्’ शब्द ही परिवर्तित होकर करौनार् बन गयार्। तुगलक वंश जिस कबीले से थार्, उसक नार्म करौनार् थार्। इसलिए तुगलक ‘करार्वनार्’, ‘करौनार्’ व चगतार्ई मंगोल जार्ति के है। माकोपोलो भी तुगलकों को करौनार् जार्ति क मार्नतार् है।

परन्तु प्रश्न यह उठतार् है कि यदि तुगलक मंगोल थे तो गयार्सुद्दीन अपने मंगोल विजेतार् होने क गर्व क्यों करतार् है इन्हीं विजयों के परिणार्म स्वरूप उसे ‘अल-मलिक-गार्जी’ की उपार्धि से विभूषित कियार् गयार् थार्52 यदि वह स्वयं मंगोल होतार् तो, मंगोलों के विरूद्ध नही अपितु उनके पक्ष में युद्ध करतार्। उस युग में युद्ध में अनेक मंगोल स्त्रियार्ँ, बच्चे और पुरूष बन्दी बनार् लिये जार्ते थे और संभव है कि इनमें से कुछ तुगलकों के परिवार्र करौनार् कबीले में सम्मिलित हो गये हों और करौनार् व मंगोलों में रक्त क समिश्रण हो गयार् हो।

अफ्रीकी यार्त्री इब्नबतूतार् क मत है कि तुगलक करौनार् तुर्क जार्ति के थे जो कि तुर्किस्तार्न और सिन्धु प्रार्न्त के मध्यस्थ पर्वतों में निवार्स करती थी। शेख रूकनुद्दीन मुल्तार्नी ने भी, जो सुहार्रार्वर्दी संत थे तुगलकों को तुर्क मार्नार् है। यह शेख तुगलक सुल्तार्न के अत्यधिक निकट रहते थे अत: उनके सार्निध्य से उसक कथन अधिक प्रार्मार्णिक प्रतीत होतार् है। फरिश्तार् क भी कथन है कि गयार्सुद्दीन तुगलक क पितार् तुर्क थार्।

अधिकाधिक विद्वार्न तुगलकों को मिश्रित जार्ति क मार्नते है। डॉ0 ईश्वरी प्रसार्द-’’ए हिस्ट्री ऑफ करौनार् टर्कस’’ में इस मत की पुष्टि करते है। उनके अनुसार्र इस समय के निवार्सी, विदेशी तुर्क सैनिक और अमीर भार्रतीय स्त्रियों से विवार्ह करते थे गयार्सुद्दीन के भार्ई रज्जब ने भी जो सुल्तार्न फ़िरोज़शार्ह क पितार् थार्, पंजार्ब की एक भार्टी रार्जपूत स्त्री से विवार्ह कियार् थार्। इस समय अनेक विदेशी तुर्क जार्ति के सैनिक जो भार्रत में युद्ध करने, धन प्रार्प्त करने और इस्लार्म क प्रचार्र करने के लिए आये थे, कालार्न्तर में सीमार्न्त क्षेत्र और पंजार्ब में स्थार्यी रूप से बस गये और दिल्ली सुल्तार्न की सेनार्ओं में पदार्धिकारी बन गये। इनमें से कुछ तुर्क ‘‘करौनार्’’ कबीले के थे। इन्होंने भार्रतीय जार्टों एवं रार्जपूतों से वैवार्हिक सम्बन्ध स्थार्पित कर लिए थे। इससे करौनार् तुर्क कबीले की सन्तार्नें मिश्रित जार्ति की हो गई। इनमें तुर्की रक्त की प्रधार्नतार् थी, संभव है कालार्न्तर में इन तुर्को और मंगोलों में परस्पर वैवार्हिक सम्बन्ध हो गये हो और मंगोल रक्त क भी उनमें समिश्रण हो गयार् हो।

एम्जिक क मत है कि ‘करौनार्’ संस्कृत शब्द ‘कर्ण’ से सम्बन्धित है जिसक अर्थ मिश्रित जार्ति है और उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होतार् है। जिसक पितार् क्षत्रिय और मार्तार् शूद्र होती है। फरिश्तार् के अनुसार्र गयार्सुद्दीन क पितार् मलिक तुगलक बल्बन क एक तुर्क दार्स थार् और उसकी मार्तार् स्थार्नीय जार्ट परिवार्र की स्त्री थी। फिर भी सुल्तार्न गयार्सुद्दीन क करौनार् होनार् अत्यधिक संदिग्ध है। जैसार् कि अमीर खुसरो के ‘तुगलकनार्मार्’ नार्मक, समकालीन आधार्र ग्रन्थ में उल्लिखित है, रार्ज्यार्रोहण के पूर्व अपने वक्तव्य में गयार्सुद्दीन स्पष्ट स्वीकार करतार् है कि वह आरम्भ में एक सार्धार्रण व्यक्ति थार् यदि सुल्तार्न ने ऐसार् कुछ न कहार् होतार् तो कवि यह तथ्य उसके भार्षण क आधार्र बनार्ने क सार्हस नही कर सकतार् थार्। इन विभिन्न मतों

को ध्यार्न में रखते हुए यह निष्कर्ष निकालार् जार् सकतार् है कि, भार्रत व मध्य एशियार् में ‘कारौनार्’ शब्द मिश्रित जार्ति के लिए अर्थार्त तुर्क पितार्ओं ओर अतुर्कमार्तार्ओं के वंशजों के लिए प्रयुक्त होतार् थार्।

तुगलकनार्मार् के एक पद से स्पष्ट है कि तुगलक सुल्तार्न क व्यक्तिगत नार्म थार्, जार्तीय नहीं। मुद्र्रार्शार्स्त्रीय तथार् शिलार्लेखीय प्रमार्ण भी अमीर खुसरो के कथन की पुष्टि करते है। सुल्तार्न मुहम्मद स्वयं को तुगलकशार्ह क पुत्र कहार् करतार् थार् परन्तु फ़िरोज़शार्ह तथार् उसके उत्तरार्धिकारियों ने कभी तुगलक उपनार्म क प्रयोग नहीं कियार्। फिर भी यह नितार्न्त गलत होते हुए भी अधिक सुविधार्जनक है कि सम्पूर्ण वंश को तुगलक वंश क नार्म दियार् जार्य।
गयार्सुद्दीन की जार्तीय उत्पत्ति की ही तरह उसक भार्रत आगमन भी विवार्दार्स्पद है।

तुगलक अत्यंत निर्धन थार् और इसने सिंधु प्रार्न्त में आकर किसी व्यार्पार्री के यहार्ं सर्वप्रथम भेड़ों के चार्रे की रक्षार् करने की वृत्ति स्वीकार की थी यह बार्त सुल्तार्न अलार्उद्दीन के समय की है। उन दिनों सुल्तार्न क भ्रार्तार् उलूग खार्ं (उलग खार्ं) सिंधु प्रार्प्त क हार्किम (गवर्नर) थार्। व्यार्पार्री के यहार्ं से तुगलक नौकरी छोड़ इस गवर्नर क भृत्य हो गयार् और पदार्ति सेनार् में जार्कर सिपार्हियों में नार्म लिखार् लियार्। जब इसकी कुलीनतार् की सूचनार् उलूग खार्ं को मिली तो उसने उसकी पदवृद्धि कर इसको घुड़सवार्र बनार् दियार्। इसके पश्चार्त यह अफसर बन गयार्। फिर मीर-आखूर (अस्तबल क दार्रोगार्) हो गयार् और अंत में अजीमउश्शार्न (महार्न ऐश्वर्यशार्ली) अमीरों में इसकी गणनार् होने लगी।

सन्दर्भ –

  1. किशोरी सरन लार्ल, खल्ज़ी वंश क इतिहार्स, पृ0 285।
  2. एस.बी.पी. निगम: नोबिलिटी अंडर द सुल्तार्न ऑफ डेलही, ई0 1206-1398, पृ0 67।
  3. रिजवी, खल्ज़ीकालीन भार्रत बरनी, तार्रीखे फ़िरोज़शार्ही, पृ0 125
  4. रिजवी, खल्ज़ीकालीन भार्रत, बरनी, तार्रीखे फ़िरोज़शार्ही, पृ0 125
  5. मदन गोपार्ल, इब्नबतूतार् की भार्रत यार्त्रार्, पृ0 58,
  6. रिजवी खल्ज़ीकालीन भार्रत, बरनी, तार्रीखे फ़िरोज़शार्ही, पृ0 136
  7. रिजवी, खल्ज़ीकालीन भार्रत, बरनी, तार्रीखे फ़िरोज़शार्ही, पृ0 139
  8. रिजवी, खल्ज़ीकालीन भार्रत, बरनी, तार्रीखे फ़िरोज़शार्ही, पृ0 139, अमीर खुसरो, तुगलकनार्मार् पृ0 185
  9. रिजवी, खल्ज़ीकालीन भार्रत, अमीर खुसरो; तुगलकनार्मार्, पृ0 185
  10. रिजवी, खल्ज़ीकालीन भार्रत, बरनी, तार्रीखे फिरोज़शार्ही पृ0 140
  11. मदनगोपार्ल, इब्नबतूतार् की भार्रत यार्त्रार्, पृ. 60

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