तुगलक वंश क पतन के कारण और परिणार्म

भार्रत में इस्लार्म क आगमन और प्रसार्र
मुसलमार्न कई कारणों से अपनी इस्लार्मी संस्कृति के सार्थ भार्रत में आ
बसे थे। उनक मूल स्थार्न भार्रत में न होकर कहीं और थार्। भार्रत में उनका
पदापण युद्ध, शक्ति और व्यार्पार्र के मार्ध्यम से हुआ थार्। इस्लार्म के आगमन
और प्रसार्र की विस्तृत चर्चार् हम निम्न प्रकार कर सकते हैं

भार्रत पर अरबों क आक्रमण और उसक परिणार्म

प्रार्चीन काल से ही भार्रत विदेशियों के लिये आकर्षण क केन्द्र रहार् है।
भार्रत और पश्चिमी देशें के सार्थ व्यार्पार्रिक सम्बन्ध बहुत प्रार्चीन काल से है।
यहार्ं की धन-सम्पन्नतार् ने सदैव से विदेषियों को आक्रमण के लिये प्रोत्सार्हित
कियार् है। भार्रत पर यवन, हूण, शक, कुशार्ण और मंगोलों ने आक्रमण कियार्;
किन्तु ये भार्रत में अपनी सत्तार् स्थार्पित करने में आंशिक रूप से सफल हुए थे।

जिस उत्सार्ह और लगन के सार्थ तीव्र गति से इस्लार्म धर्म क प्रचार्र एवं
प्रसार्र हुआ, उतने अल्प काल में विश्व में किसी भी धर्म क प्रचार्र एवं प्रसार्र
नहीं हुआ। यही कारण है कि इस्लार्म क प्रचार्र एवं प्रसार्र कुछ क्षेत्रों तक ही
सीमित नहीं रहार् वरन् विश्व के अनेक क्षेत्रों तक इसक विस्तार्र हुआ।
मुहम्मद बिन कासिम द्वार्रार् सिंध विजय की वार्स्तविकतार् तिथि 712 ई.
है, किन्तु अरबों के लिये यह भार्रत क अभियार्न प्रार्रम्भिक नहीं थार्।

भार्रत को जिन मुसलमार्न आक्रमणकारियों क सबसे पहले सार्मनार् करनार् पड़ार्, वे सब
तुर्क न होकर अरब थे और जो महार्न पैगम्बर के देहार्वसार्न के बार्द संसार्र भर
में ‘स्वर्ग और नरक’’ की कुंजी लेकर अपने धर्म क प्रचार्र करने के लिये
अपनी रेगिस्तार्नी जन्मभूमि से निकल पड़े थे। खलीफार् हजरत उमर के समय
से ही भार्रत के पश्चिमी समुद्र तट पर अरबों के धार्वे होते आये थे।

खलीफार् उमर के शार्सनकाल (सन् 636-37 ई.) में आमे ार्न नार्मक स्थार्न से भार्रत के
समुद्र तटवर्ती प्रदेश लूटने क पहलार् अभियार्न शुरू कियार् गयार् थार्। इन
प्रार्रम्भिक हमलों क उद्देश्य केवललचार्ल लूटमार्र करनार् ही थार्, न कि रार्ज्य विस्तार्र
करनार्। इन हमलों में कठिनार्इयों क अनुभव करने के बार्द खलीफार् ने इस
ओर से मुख मोड़ लियार्।

उमर के बार्द खलीफार्ओं ने समुद्री हमलों की फिर से यार्जे नार्यें बनार्ने
क अभियार्न शुरू कियार्। इसी अभियार्न में अब्दुल्लार्-बिन-उमर-बिन-रबी ने
643-44 ई. में किरमार्न पर आक्रमण कियार् तथार् सीस्तार्न अथवार् सिविस्तार्न
की ओर बढ़कर अपनार् अधिकार स्थार्पित कर लियार्। इस प्रकार उस
बलूचिस्तार्न और उसके तटवर्ती प्रदेश मकरार्न पर अरबों क अधिकार हो
गयार्। जिसकी सीमार् सिंध में लगी हुई थी। खलीफार् की ललचार्इ दृष्टि सिंध
पर पड़ी और आक्रमण के लिये कारण भी उपस्थित हो गये।

खलीफार् अलवलीद के समय में हज्जार्ब बड़ार् ही योग्य और शक्तिशार्ली
शार्सक थार्। अत: खलीफार् ने इरार्क,ईरार्न एवं मकरार्न आदि क शार्सन कार्य
हज्जार्ज को सौंप दियार् थार्। पूर्व की ओर सार्म्रार्ज्य विस्तार्र के लिये संधि पर
आक्रमण करनार् आवश्यक समझार् गयार् और उन्हें शीघ्र ही एक अवसर भी मिल
गयार्। सिंहल (लंका) में कुछ अरबी मार्झियों की मृत्यु हो गयी।

लंक के रार्जार् ने उनकी स्त्रियों तथार् बच्चों को उनकी प्राथनार् पर अब
भेजने क प्रबन्ध कर दियार् और उन्हें अरबी जहार्जों पर चढ़ार्कर भार्रत के
समुद्री तटवर्ती माग से अरब भेजार् गयार्।7 देवल के पार्स इन जहार्जों पर छार्पे
पड़े और स्त्रियों बच्चों सहित उनकी सम्पत्ति आदि को उतार्र लियार् गयार्।
कुछ लोग जो किसी प्रकार बच निकले थे, जब इसकी सूचनार् हज्जार्ज को दी
तो वह तत्कालीन सिंध के रार्जार् दार्हिर से यह मार्ंग की कि बंदियों को शीघ्र
मुक्त करके उसके पार्स भेज दियार् जार्य। दार्हिर उसकी मार्ंग को पूरार् नहीं
कियार्। इस पर हज्जार्ज कासिम के नेतृत्व में एक अभियार्न भेजार्। नि:सन्देह
हज्जार्ज के लिये संधि पर आक्रमण करने के लिये एक बहार्नार् मिल गयार् और
उसने एक सेनार् (इतनार् उन स्त्रियों-बच्चों के उद्धार्र के लिये नहीं, जितनार्
सिन्ध को जीतने एवं इस्लार्म के प्रसार्र के लिये) भेजी।

भार्रत पर दुर्भार्ग्य के बार्दल मंडरार् रहे थे। दुर्भार्ग्यवश उस समय एक और घटनार् घट गयी। मकरार्न
के कुछ अपरार्धी एवं विद्रोही भार्गकर सिंध में दार्हिर के कारण में आ गये।
उन्हार्ंने दार्हिर के नेतृत्व में अरबों के विरूद्ध एक सगं ठन बनार् लियार्। इस
घटनार् से हज्जार्ज और उत्तेजित हो उठार्। उसके क्रोध की सीमार् न रही और
उसने अपने सार्हसी भतीजे मुहम्मद-बिन-कासिम को सिंध पर आक्रमण करने
के लिये भेजार्। यह सही है कि सिंध पर आक्रमण के लिये परिस्थितियों ने योग
तैयार्र कर दियार्; किन्तु इसके मूल में इस्लार्म के प्रसार्र की भार्वनार् अधिक
तर्कसंगत प्रतीत होती है।

इस्लार्म के प्रसार्र की भार्वनार् ने भार्रत की ओर अरबों को अग्रसार्रित
करने में सहार्यतार् दी। मुहम्मद-बिन-कासिम मुल्तार्न की रार्ह ली। अनेक
संकटों और अवरोधों को पार्र करतार् हुआ वह मुल्तार्न के द्वार्र पर जार् पहुंचार्
और आत्मसमर्पण के लिये बार्ध्य कियार्। नगर में भीशण रक्तपार्त हुआ तथार् यहार्ं
लटू में इतनी सम्पत्ति प्रार्प्त हुर्इ कि अरबों ने इसक नार्म स्वर्ण नगर रख
दियार्


मुहम्मद-बिन-कासिम के लौटने के बार्द तथार् उसके मृत्यु क समार्चार्र
सुनकर सिंध के सरदार्रों ने मुस्लिम शार्सन के जुए को उतार्र फेंकने क प्रयार्स
कियार्। खलीफार् उमर द्वितीय (717-720 ई.) ने सिंध के शार्सकों को अपने
अधीन स्वतंत्रतार् देने क शर्त पर आश्वार्सन दियार् कि वे इस्लार्म स्वीकार कर
लेपरिस्थितियों “क दार्हिर के पुत्र जयसिंह ने इस्लार्म स्वीकार कर लियार्।
किन्तु, हिषार्म की खिलार्फत (724-743 ई.) में इस्लार्म को जयसिंह ने छोड़
दियार् आरै जुनैद के विरूद्ध युद्ध की घोशणार् कर दी। युद्ध में जयसिंह परार्स्त
हुआ और बन्दी बनार् लियार् गयार्। इस प्रकार सिंध पर से हिन्दू रार्ज्य क अन्त
हो गयार्। सिंध पर से हिन्दू रार्ज्य क अन्त भार्रत को परार्धीनतार् की बेड़ी में
आबद्ध होने की अशुभ घड़ी थी।

दक्षिण भार्रत के सार्थ अरब व्यार्पार्रियों क सम्बन्ध बहुत पुरार्नार् है।
लेकिन, वह सम्बन्ध व्यार्पार्र तक ही सीमित थार्। उत्तर भार्रत पर अरबों का
प्रसार्र एक ऐसी घटनार् है जिसने इतिहार्स को एक नयार् मोड़ प्रदार्न कियार्। यह
बार्त अब स्पष्ट होती जार् रही थी कि अरबों क उद्देश्य केवल व्यार्पार्र करनार्
नहीं है, बल्कि भार्रत को अपने आधिपत्य में लेने क भी है।

अधिकांश इतिहार्सकार सुबक्तगीन के पुत्र और भार्रतवर्ष के महार्न
विजेतार् महमूद को मुस्लिम इतिहार्स क सर्वप्रथम ‘सुल्तार्न’ होने क श्रेय प्रदार्न
करते हैं। महमूद की विजयों ने एक नये ढंग के सार्म्रार्ज्य क उदय कियार्
जिसे सुल्तनत कहते हैं और जो यद्यपि खलीफार् द्वार्रार् मार्न्यतार् प्रार्प्त थार् किन्तु
वार्स्तव में विजयों पर आधार्रित थार्। महमूद इस्लार्म धर्म के प्रसार्र के प्रति
अत्यन्त संवेदनशील थार्। गोर में इस्लार्मी सभ्यतार् के सार्ंस्कृतिक एवं
रार्जनीतिक प्रभार्व सुल्तार्न महमूद गजनवी (998-1030) के समय से आरंभ हुये
जिसके विषय में यह कहार् जार्तार् है कि उसने अपने 1010-11 के अभियार्न के
पश्चार्त गोरियों को इस्लार्म धर्म के सिद्धार्न्तों की
शिक्षार् देने के लिये शिक्षक
नियुक्त किये।

महमूद गजनवी क भार्रत पर आक्रमण 1000 ई. में आरंभ हुआ, जब
उसने लार्भधन के पार्स कुछ किलों को जीतार्। 1001 ई. में उसे हिन्दू मार्ही वंश
के रार्जार् जयपार्ल को पेशार्वर के पार्स हुये युद्ध में परार्जित कियार्। जयपार्ल का
उत्तरार्धिकारी उसक पुत्र आनन्द पार्ल बनार्। आठ वर्शों के पश्चार्त् पुन: महमूद
क आक्रमण हुआ और उसने सिंधु क्षेत्र को पार्र करके आन्नद पार्ल को
परार्जित कियार्। यह युद्ध 1009 ई. में वहिन्द में हुआ। महमूद ने पंजार्ब और
पूर्वी रार्जस्थार्न पर बार्र-बार्र आक्रमण करके रार्जपूत प्रतिरोध को नश्ट कियार्।
1025-26 मेंउसने प्रसिद्ध सोमनार्थ (गुजरार्त) पर आक्रमण को मंदिर लूटने
क मौक मिल गयार्।

इस प्रकार महमूद ने अपने 17 अभियार्नों से अफगार्निस्तार्न के पूर्व से भार्रत में स्थित गंगार्-यमुनार् घार्टी तक रौंदने में
सफल हो गयार्। दूसरी ओर वह गुजरार्त में स्थित सोमनार्थ मंदिर तक लूट
लियार् किन्तु उसके समस्त अभियार्नों क रार्जनीतिक परिणार्म यह हुआ कि
रार्बी के तक क भूभार्ग भार्रत से निकलकर गजनी सार्म्रार्ज्य में जार् मिलार्।
महमूद ने कवे ल उन कवियों के प्रति उदार्रतार् दिखार्यी, जिन्होंने उसकी
प्रषंसार् में कवितार्यें लिखी। लेकिन अन्य विद्वार्नों के प्रति वह निश्ठुर बनार् रहार्।
अलबरूनी, जो 1017 ई. में ख्वार्रिज्म के शार्ह के पतन के पश्चार्त् बन्दी बनार्
लियार् गयार् थार्, को काफी कम पार््रेत्सार्हन मिलार्। इसी के सरं क्षण काल में
फार्रसी भार्षार् की नींव पर दौसी के शार्हनार्मार् से पड़ी। फार्रसी मुस्लिम
संस्कृति क दूसरार् भंडार्र बन गयी। भार्तर पर आक्रमण के सार्थ ही इस्लार्मी
संस्कृति ने भी प्रवेश कियार्। इसके आक्रमण से इस्लार्म के प्रसार्र को काफी
बल मिलार्।

गोरियों के अभियार्नों क उद्देश्य धामिक बतार्यार् जार्तार् है। उपलब्ध
विवरणों के सार्वधार्न विष्लेशण से यह धार्रणार् निर्मूल सार्बित होती है। इसमें
कोई संदेह नहीं कि सैनिक मुसलमार्न थे किन्तु वे इस्लार्म के प्रतिनिधि नहीं
थे। संभव है कि कभी-कभी उनके कार्य धामिक प्रवृत्तियों से प्रेरित होते होंगे
किन्तु अधिकतर वे रार्जनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हार्ते थे। मुहम्मद गोरी के
नेतृत्व में भार्रत पर लगभग 1178 से 1206 ई. तक निरन्तर आक्रमण होते रहे।
इस आक्रमण क रार्जनीतिक परिणार्म यह हुआ कि अब मुस्लिम सार्म्रार्ज्य रार्वी
से लेकर गंगार्-यमुनार् घार्टी सहित ब्रºमपुत्र की घार्टी तक फैल गयार्। इसी
मुस्लिम सार्म्रार्ज्य पर उसके निर्मार्तार् की 1206 में मृत्यु होने पर एक स्वतंत्र
भार्रतीय मुस्लिम सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् हुर्इ।

गोर-आक्रमण से भार्रतवर्ष की सार्ंस्कृतिक गतिविधि एवं भार्षार् पर भी
व्यार्पक प्रभार्व पड़े। दिल्ली में तुर्क सत्तार् स्थार्पित हो जार्ने के बार्द फार्रसी भार्षार्
को शार्सकीय स्वरूप प्रदार्न कियार् गयार्।
बार्रहवीं शतार्ब्दी के भार्रतवर्ष क एक समग्र सर्वेक्षण करने के पश्चार्त्
हम निर्विवार्द रूप से इस निश्कर्श पर पहुंचते हैं कि वर्ण व्यवस्थार् और छूआछूत
की विचार्रधार्रार् ने ही देश की प्रगति रोक रखी थी और सार्मार्जिक अरार्जकतार्
तथार् रार्जनीतिक विशमतार् को उत्तर भार्रत में जन्म दियार्। तुर्क विजय ने इस
प्रणार्ली पर भीशण कुठार्रार्घार्त कियार् और स्वार्भार्विक रूप से ऐसे तत्वों की
सहार्यतार् प्रार्प्त की जो पिछली सार्मार्जिक व्यवस्थार् से पीड़ित थे। तुर्क सत्तार्
क भार्रतवर्ष में दीर्घकाल तक स्थार्पित रहनार् इस्लार्मी प्रसार्र क प्रतिफल थार्।

 दक्षिण भार्रत में इस्लार्म क प्रसार्र

अरब व्यार्पार्री व्यार्पार्र के सिलसिले में भार्रतीय समुद्र तट (श्रीलंका) हार्ते
हुये पूर्वी द्वीप समूह तथार् चीन तक चले जार्ते
थार् चूँकि भार्रत बीच में पड़तार्
थार्, अत: भार्रत से इनक सम्बन्ध बहुत पुरार्नार् थार्।25 व्यार्पार्रिक सम्बन्ध होने के
कारण ये पष्चिमी समुद्र तट पर आयार्-जार्यार् करते थे। भार्रतीय रार्जार् और
प्रजार् भौतिक समृद्धि की वृद्धि के लिए अत्यन्त उत्सुक थे।26
अत: इन अरब व्यार्पार्रियों को रार्ज्य की ओर से सुविधार्यें प्रदार्न की गयी
और प्रजार् ने भी इनके सार्थ सहार्नुभूति दिखार्ई। ये मुस्लिम व्यार्पार्री भार्रत के
दक्षिणी तट पर तीन नगरों में आबार्द हुये अरब सर्वप्रथम मार्लार्वार्र तट पर
सार्तवीं शतार्ब्दी के अन्त में लगभग जार् बसे। स्टरक ने भी मोपलार् लोगों के
वृतार्न्त में इसी बार्त क उल्लेख कियार्।

मुस्लिम प्रभार्व धीरे-धीरे बढ़तार् जार् रहार् थार्। दक्षिण भार्रत में धामिक
संघर्शो ने लोगों के आस्थार् को डगमगार् दियार् थार्। रार्जनीतिक रूप से भी यह
समय अस्थिरतार् और उथल-पुथल क थार्। इस्लार्म लोगों के सार्मने
सीधे- सार्दे सिद्धार्न्तो रीति-रिवार्जों, और विश्वार्स के रूप में प्रकट हुआ और
लोग इसकी तरफ आकर्षित हुए।

मार्लार्वार्र क चेरार्मन पेरूमल रार्जार् ने नये धर्म को स्वीकार कर लियार्।
रार्जार् क धर्म परिवर्तन लोगों के दिमार्ग पर जबरदस्त प्रभार्व डार्लार्। वह
अपने रार्ज्य में मुस्लिम धर्म प्रचार्र को सभी प्रकार की सुविधार्यें प्रदार्न कियार्।
जमोरिन के काल में मुस्लिम प्रभार्व क और अधिक विस्तार्र हुआ। दक्षिण भार्रत
के अनेक नगरों में इस्लार्म क प्रचार्र और प्रसार्र तेजी के सार्थ हुआ।
दसवीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ होने तक भार्रत के पूर्वी तट पर भी इस्लार्म
क प्रचार्र और प्रसार्र आरम्भ हो गयार् थार् और बहुत से मुस्लिम पीर और
औलियार् इन दोनों में अपने धर्म क प्रसार्र करने में तत्पर हो गये थे।

इसमें सन्देह नहीं है कि महमूद गजनवी के आक्रमण से पहले भार्रत के
अनेक प्रदेशों में इस्लार्म क प्रसार्र हो गयार् थार् और इस्लार्म फूल और फल
रहार् थार्। उस समय सिंध और दक्षिण के समुद्र तट के प्रदेश ऐसे क्षेत्र थे जहार्ँ
मस्जिदों की मीनार्रें एक नये धर्म की सत्तार् की सचू नार् दियार् करती थीं। उत्तरी
भार्रत में भी इस्लार्म क प्रसार्र हो रहार् थार् और कुछ स्थार्नों पर मसु लमार्नों ने
अपनार् एक महत्वपूर्ण स्थार्न बनार् लियार् थार्। महमूद गजनवी के आक्रमण के
पहले मुसलमार्नों के भार्रत में प्रवेश के लिए भार्रत क द्वार्र खुल गयार् थार्।
मुहम्मद गजनवी के निरन्तर आक्रमणों से भार्रत क द्वार्र भी इस्लार्म के
प्रचार्र के लिए खुल गयार् और मुहम्मद गोरी के विजय के बार्द भार्रत में इस्लार्म
क रार्ज्य स्थार्पित हो गयार्।

भार्रत के विभिन्न भार्गों में इस्लार्म के अनुयार्यी अब दिखार्ई पड़ने लगे।
अब उन्हें रार्जकीय संरक्षण भी मिलने की आषार् दिखलार्इ देने लगी। इसके
पहले भी हिन्दू शार्सकों ने मुसलमार्नों को अपने रार्ज्य में संरक्षण प्रदार्न कियार्
थार्। महुम्मद उल्फ एक कहार्नी के द्वार्रार् हिन्दू रार्जार्ओं और मुि स्लम व्यार्पार्रियों
के सम्बन्ध पर प्रकाश डार्लतार् है। जब काम्बे के हिन्दुओं ने मुस्लिम
व्यार्पार्रियों पर आक्रमण कर दियार् तो सिद्धरार्ज (1094-1143) ने पूरे मार्मले की
जार्ंच करवार्यी। कुछ हिन्दू रार्जार्ओं ने मुस्लिम लोगों की प्रषार्सनिक कार्यों में
भी नियुक्त कियार्। उदार्हरण के लिए सोमनार्थ के शार्सक ने कई मुस्लिम
अधिकारियों को अपने यहार्ँ रखार् थार्।

 इस्लार्म के प्रसार्र में मुस्लिम संतों की भूमिका

भार्रत में इस्लार्म के प्रचार्र आरै प्रसार्र में मुस्लिम संतों और फकीरों ने
भी महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई । नवीं शतार्ब्दी में अबहिजनी-रवि-बिन
सार्हब-अल-आदी-अल-बसरी सिंध आये और यही 106 हिजरी में इनकी मृत्यु
हो गयी।
10वीं शतार्ब्दी में मंसूर-अल-हल्लार्ज ने समुद्री माग द्वार्रार् भार्रत की
यार्त्रार् की और उत्तरी भार्रत तथार् तुर्किस्तार्न होते हुए वार्पस लौट गये। 11वीं
शतार्ब्दी में बार्बार् रिहार्न बगदार्द से दरवेषों के सार्थ भडोच आये।
ग्यार्रहवीं शतार्ब्दी में शेख इस्लार्इन और अब्दुल्लार् यमनी नार्म के फकीर
भार्रत में धर्म प्रचार्र के लिए आये। 12वीं शतार्ब्दी में नूर सतार्गर ईरार्नी भार्रत
आये और उन्होंने गुजरार्त के अछूत हिन्दुओं को इस्लार्म क अनुयार्यी बनार्यार्।
कुनबी, खरवार्र और कोरी जार्तियों को मुसलमार्न बनार्ने में इन्होंने महत्वपूर्ण
भूमिक निभार्ई।इस काल में यद्यपि मुस्लिम रार्ज-सत्त्ार्ार् की स्थार्पनार् अभी तक नहीं हो
पार्यी थी और इन मुस्लिम संतों को किसी प्रकार के रार्जनैतिक शक्ति का
सहार्रार् प्रार्प्त नहीं थार्, फिर भी इन फकीरों को इस्लार्म क प्रचार्र करने में
काफी सफलतार् प्रार्प्त हुयी क्योंकि वे उच्च चरित्र वार्ले थे तथार् अनेक प्रकार
की सार्धनार्ओं में प्रवीण थे। इस युग तक भार्रत के हिन्दुओं में संकीर्ण जार्ति
प्रथार् विकसित हो चुकी थी और जनसार्धार्रण के एक बहुत बड़े भार्ग को तुच्छ
भार्ग को हीन समझार् जार्तार् थार्। शूद्रों को समार्ज में उपेक्षार् की दृष्टि से देखार्
जार्तार् थार्।इस्लार्म के सार्मार्जिक समार्नतार् से आकृष्ट होकर अधिकांश मुद्रार् ने
हिन्दू समार्ज को छोड़कर इस्लार्म को स्वीकार करने के लिए लार्लार्यित हो
उठे। इसक लार्भ उठार्कर मुस्लिम संतों ने अपनार् निवार्स इन लोगों के
नजदीक बनार्यार् और इनके प्रति सहार्नुभूति जतार्कर इस्लार्म क प्रचार्र अच्छे
ढंग से कियार्। महमूद गजनवी के आक्रमण के बार्द बहुत से मुस्लिम संत और
फकीर भार्रत आये।इनमें अली-बिन-अल-हुजविरी क नार्म विशेष रूप से उल्लेखनीय है
जो गजनी के रहने वार्ले थे और अनेक मुस्लिम देशों के भ्रमण के बार्द लार्हौर
आये और वहीं 465 यार् 469 हिजरी सन् में ‘मृत्यु को प्रार्प्त हो गये। लेख
इस्मार्इल बुखार्री और फरीद्दीन अतार्र भी भार्रत आये ख्वार्जार् मुइनुद्दीन
चिष्ती 1197 में अजमरे आये और 1234 तक वहीं रहे।
लेख मुइनुद्दीन चिश्ती अपने जीवन काल में इतने लोकप्रिय हो गये थ
कि इन्हें मुहम्मद गोरी ने सुल्तार्न उल-हिन्द अर्थार्त हिन्द क आध्यार्त्मिक गुरू
की उपार्धि से विभूषित कियार् थार्।

13वीं शतार्ब्दी में शेख जलार्लुद्दीन बुखार्री उच्छ में भवार्लपुर में रहने
लगे तथार् बार्बार् फरीद पार्कपट्टन में। 14वीं शतार्ब्दी में अब्दुल करीम-अल-
जिली जो इब्नुल अरबी के आलोचक और इन्सार्न-ए-कामिल के लेखक थे
भार्रत की यार्त्रार् की।
पीर समुद्र सैयद युसूफउद्दीन और इमार्मशार्ह ने भार्रत को अपनार् कर्म
स्थल बनार्यार्। इसके अतिरिक्त सैयद मार्ह मीर, कुतुबुद्दीन बख्तियार्र काजी,
बार्बार् उद्दीन जकारियार्, जलार्लुद्दीन सूर्खपोष, मुहम्मद गोस आदि ने भार्रत
भूमि पर इस्लार्म के प्रचार्र एवं प्रसार्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई। इसके
व्यक्तिगत सम्पर्क और प्रभार्व से इस्लार्मी दर्शन और रहस्यवार्द क प्रसार्र
हुआ।

इस प्रकार मुसलमार्न व्यार्पार्री फकीर और सूफी शार्ंतिपूर्वक देश के
विभिन्न भार्गों में जार् पहुंचे तथार् कई महत्वपूर्ण भार्गों में जार् बसे। डार्0
आरनार्ल्ड क कहनार् है कि मुसलमार्न धर्म की सरलतार् को बहुत से लेखक
महत्व देते हैं और उनक कहनार् है कि इसकी बुद्धिग्रार्हतार् एवं समार्न बन्धुतार्
के आदर्श के स्वाथपरतार् के कारण अभिजार्त वर्ग द्वार्रार् दबार्ये गये कुछ हिन्दुओं
के वर्गो को बहुत आकर्षित कियार्।

 इस्लार्म धर्म क प्रसार्र में सत्तार् की भूमिका

जब तक भार्रत में मुस्लिम सत्त्ार्ार् की स्थार्पनार् नहीं हो पार्यी थी तब तक
पीरों और फकीरों द्वार्रार् शार्ंतिपूर्वक इस्लार्म क प्रचार्र होतार् रहार्। किन्तु, जब
मुहम्मद गोरी ने भार्रत को विजित करके अपने प्रतिनिधि शार्सक के रूप में
कुतुबुद्दीन ऐबक को नियुक्त कियार् तो भार्रतीय इतिहार्स ने भी एक करवट
ली। मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बार्द जब कुतुबुद्दन ऐबक शार्सक बनार् तो
भार्रत में एक नये शार्सक वंश की नींव पड़ गयी।

मुस्लिम सत्त्ार्ार् की स्थार्पनार् के बार्द इस्लार्म धर्म के प्रसार्र और प्रचार्र के
लिए अब तक जो शार्ंतिपूर्वक तरीके अपनार्ये गये उनमें भी परिवर्तन हुआ और
भार्रतीय जनतार् को इस्लार्म क अनुयार्यी बनार्ने के लिये मुस्लिम शार्सकों ने
बल प्रयोग करनार् शुरू कर दियार्। भार्रत में इस्लार्म क प्रचार्र अधिकांष
इस्लार्म के सिद्धार्न्तों की सरलतार् के कारण न होकर उसके रार्जधर्म होने के
कारण तथार् तलवार्र के बल पर फैलार्ये जार्ने के कारण हुआ।51 भार्रत में
मुसलमार्न रार्ज्य धामिक रार्ज्य ही बनार् रहार्।

मुसलमार्नों के अतिरिक्त जार्तियों पर रार्ज्य की ओर से अनेक प्रतिबन्ध
लगार्ये गये थे। बलार्त् धर्म परिवर्तन करने क आदेश भी रार्ज्य की ओर से
दियार् गयार् थार्। लोगों को इस्लार्म बनार्ने के लिए ‘जजियार्’ कर लगार्यार् गयार्।
यह कर केवल गैर मुसलमार्नों को ही देनार् पड़तार् थार्। हनीफी धर्मषार्स्त्रियों के
अनुसार्र, मुसलमार्न भिन्न जार्तियों को अपने प्रार्णों की रक्षार् के लिए जजियार्
देनार् पड़तार् है।

कुछ विद्वार्नों क मत है कि जजियार् कर रार्ज्य की आय क एक
महत्वपूर्ण स्रोत थार्।53 इसलिए मुस्लिम शार्सकों ने हिन्दूओं को धर्म परिवर्तनों के
लिए विवश नहीं कियार्। क्योंि क इससे रार्ज्य की आय कम जो जार्ती थी।54
सत्य जो कुछ भी हो यह नि:सन्देह है कि यह केवल गैर मुसलमार्नों पर
ही लगार्यार् जार्तार् थार् और यह हीनतार् क परिचार्यक थार्। जजियार् लगार्ने के
उद्देश्य यही थार् कि जजियार् के आर्थिक भार्र और भेदभार्व बर्तार्व से अधिकांष
हिन्दू किसी न किसी दिन इस्लार्म स्वीकार कर ही लंगे। अनेक मुसलमार्न
इतने धर्मार्न्ध थे कि वह नये मंदिरों क निर्मार्ण और पुरार्ने मंदिरों क मरम्मत
नहीं होने देते थे।

इल्तुतमिश के रार्ज्यकाल में उलेमार्ओं ने मिलकर मार्ंग की थी कि
हिन्दुओं को कुरार्न के आदेश के अनुसार्र इस्लार्म यार् मृत्यु चुनने को कहार्
जार्य। अलार्उद्दीन खिलजी के शार्सनकाल में काजी मुगिसुद्दीन ने भी यह
मार्ंग की थी। उसने कहार् थार् चूंकि हिन्दू पैगम्बर के कट्टर शत्रु हैं। इसलिए
खुदार् ने स्वयं हिन्दुओं क पूर्ण दमन करने के लिए आदेश दियार् है। पैगम्बर ने
कहार् है वे यार् तो इस्लार्म स्वीकार करें यार् नहीं तो उन्हें कत्ल कर दियार्
जार्य।

कुतुबुद्दीन मुबार्रकषार्ह के शार्सन क वर्णन करते हुए इब्नबतूतार् ने
लिखार् है कि इस्लार्म ग्रहण करने के इच्छुक हिन्दू को सुल्तार्न के सार्मने
उपस्थित कियार् जार्तार् थार् और सुल्तार्न उसकी बहुमूल्य वस्त्र और कंकण प्रदार्न
करतार् थार्।

फिरोज तुगलक के शार्सन काल में रार्ज्य द्वार्रार् धर्म परिवर्तन को
प्रोत्सार्हन कियार् गयार् और लोगों को इस्लार्म ग्रहण करने के लिए प्रलोभन दियार्
जार्ने लगार्। सुल्तार्न के “ार्ब्दों से उसके विचार्रों की पुश्टि होती है, जो हिन्दू
इस्लार्म धर्म ग्रहण करेगार् उसे जजियार् कर से मुक्त कर दियार् जार्येगार्। जनतार्
के कानों में इसकी खबर पहुंची आरै बहुत बड़ी सख्ंयार् में हिन्दू उपस्थित हो
गये और उनको इस्लार्म ग्रहण करने क सम्मार्न प्रदार्न कियार् गयार्।
विधर्मी प्रजार्जनों को इस्लार्म गह्र ण करने के लिये वह उत्सार्हित करतार्
है जो इस्लार्म ग्रहण कर लेते, उनको ‘जजियार्’ कर से मुक्त कर देतार् थार्।
एक ब्रार्ह्मण को जिसने अपने पूर्वजों क धर्म त्यार्गनार् अस्वीकार कर दियार् थार्,
यह दोश लगार्कर जीवित जलवार् दियार् कि वह मुसलमार्नों को सत्धमर् से विलग
होने को प्रवृत्त्ार् करतार् है।

फिरोज कट्टर सुन्नी मुसलमार्न थार्। उसने अपने शार्सनकाल में मंछिरों
को गिरार्यार् तथार् विधर्मियों के नेतार्ओं क वध कियार् जो दूसरों को भी बुराइ
की ओर घसीटते थे और इन मंदिरों के स्थार्न पर मस्जिद बनवाइ। केवल
युद्ध यार् सैनिक अभियार्नों के समय ही नहीं बल्कि शार्ंतिकाल में भी हिन्दुओं के
मंदिर गिरार् दिये जार्ते थे और उनकी देव मूर्तियों के टुकड़े- टुकड़े कर दिये
जार्ते थे।

फिरोज तुगलक ने पूर्ण “ार्ार्ंति के समय महल नार्मक एक गार्ंव पर
आक्रमण कर दियार् उसी समय इस गार्ंव के तार्लार्ब के किनार्रे इस गार्ंव की
हिन्दू जनतार् पूजार् के लिए एकत्र हुए थे और एक मेलार् भी लगार् हुआ थार्।
फिरोज तुगलक ने पूजार् अर्चनार् बन्द कर दी। इतनार् ही नहीं उसने मंदिरों का
भी विध्वंस कर डार्लार् और उपार्सकों क कत्ल कर देने क हुक्म दे दियार्।
फिरोज की भार्ँति सिकन्दर लोदी ने भी हिन्दुओं को इस्लार्म धर्म स्वीकार
करने के लिए प्रलोभन दियार्। इनक मुख्य लक्ष्य यह थार् कि किसी भी तरह
हिन्दअु ों को इस्लार्म क अनुयार्यी बनार्यार् जार्य और सभी प्रकार क दबार्व
डार्लकर मुसलमार्न बनार् लियार् जार्य। र्इश्वरी प्रसार्द ने लिखार् है ‘‘हिन्दुओं पर
रार्ज्य की ओर से इस्लार्म लार्दार् जार्ने लगार्।

मध्यकालीन मुसलमार्न शार्सक कभी-कभी हिन्दुओं को बड़ी संख्यार् में
मुसलमार्न बनार् लते थे। कश्मीर के बुतशिकन सिकन्दर ने हजार्रों हिन्दुओं को
मुसलमार्न बनार् लियार् थार् और जिन्होंने अपनार् धर्म परिवर्तन नहीं कियार् उन्हें
रार्ज्य से निकाल दियार् थार्।
बंगार्ल के जलार्लुद्दीन (1414-1430) ने भी सैकड़ों हिन्दुओं को बलार्त्
मुसलमार्न बनार् लियार् थार् और जो बार्की रहे थे उन पर खूब अत्यार्चार्र किये
थे।

इस प्रकार सल्तनत काल में मुस्लिम शार्सक बलपूर्वक इस्लार्म स्वीकार
करार्ने में नहीं हिचकिचार्ते थे। इसक कारण इस्लार्म जो कुछ लोगों तक ही
सीमित थार् शार्सकों के पदार्पार्तीय दृष्टिकोण के कारण अधिक लोगों में फैलार्
तथार् भार्रत के विस्तृत भू-भार्ग में इसक प्रचार्र हुआ।
मुगल काल में बार्बर और हुमार्यूँ में भी धामिक असहिष्णुतार् विद्यमार्न थी।
लेकिन, सल्तनत कालीन शार्सकों की भार्ँति विशार्ल पैमार्ने पर नहीं। मुगल
काल में अकबर एक धर्मसहिष्णु शार्सक थार् आौर उसने सभी धर्मार्वलम्बियों को
अपने धर्म को मार्नने की पूर्ण स्वतंत्रतार् प्रदार्न की। वह विभिन्न धर्मों को एक
ही लक्ष्य की ओर ले जार्ने वार्ले विभिन्न माग मार्नने लगार्। वह इस परिणार्म
पर भी पहुंच गयार् थार् कि प्रत्येक धर्म के गहन और जनसुलभ अंग होते है।
अकबर के धामिक सहिश्णुतार् की नीति थोड़े-बहुत परिवर्तनों के सार्थ
औरंगजेब के काल तक चलती रही। जहार्ंगीर और शार्हजहार्ं यद्यपि अकबर की
भार्ँति धर्म-सहिष्णु नहीं थे फिर भी उनमें उतनी कट्टरतार् नहीं थी जितनी कि
औरंगजेब में। जहार्ंगीर के सम्बन्ध में रार्मप्रसार्द त्रिपार्ठी क कहनार् है कि वह
अपने पितार् से अधिक इस्लार्म परार्यण थार् और अपने पुत्र खुर्रम से कम।
कट्टर मुि स्लमों को रार्जी रखने के लिये ही वह कभी-कभी अकबर द्वार्रार्
स्थार्पित, और अपने से मार्न्य, सहिश्णुतार् के सिद्धार्न्तों से विचलित हो जार्तार्
थार्।

दुर्भार्ग्यवश उसके शार्सन काल में अनजार्ने ही धामिक अनार्चार्र के बीच
एक बार्र फिर बोये गये। एक उद्धार्रक दाशनिक पितार् और एक रार्जपूत रार्नी
क पुत्र होते हुये भी वह इस्लार्म धर्म को मार्नतार् थार् और उसने सिक्कों पर
अकबर द्वार्रार् हटार्ये गये धामिक सिद्धार्न्तों को फिर से जार्री कियार्। शार्हजहार्ं के सम्बन्ध में बनार्रसी प्रसार्द सक्सेनार् क कहनार् है कि
सहिश्णुतार् से हटकर घड़ी की सूई असहिष्णुतार् की ओर मुड़ गयी थी। सम्रार्ट
के आग्रह से हिन्दुओं को समझार् बुझार्कर यार् जबरियार् मुसलमार्न बनार्ने का
क्रमिक प्रयार्स आरम्भ हुआ। नौकरी एवं उपहार्रों क प्रलोभन देकर उनको
धर्म परिवर्तन के लिए बार्ध्य कियार् जार्तार् थार्। हिन्दुओं को अपने सम्बन्धियों
को मुसलमार्न बनने से रोकने की सख्त मनार्ही थी।

प्रिंगले केनेडी क कहनार् है ‘‘जो अकबर ने प्रार्प्त कियार् थार् और जिसकी
जहार्ंगीर और शार्हजहार्ं’ ने अपने अनेक दुर्गुणों के होते हुए भी रक्षार् की थी, वह
अर्थार्त् अपनी हिन्दू प्रजार् क स्नेह औरंगजेब ने खो दियार्। वह दार्र-उल-हरब
(काफिर देश) को दार्र-उल-इस्लार्म (सत्य धर्म क देश) बनार्नार् चार्हतार् थार्।
उसक उद्देश्य यह थार् कि हिन्दू बार्ध्य होकर इस्लार्म स्वीकार कर लें और इस
प्रकार भार्रत एक इस्लार्मी रार्ज्य बन जार्य।

इस प्रकार शार्सकों के सहयार्गे से भार्रत में इस्लार्म फूलतार् और फलतार्
रहार्। रार्जकीय संरक्षण प्रार्प्त होने के कारण इस्लार्म क विकास संभव हो सका
फिर भी ये कहनार् समीचीन प्रतीत होतार् हे कि इतने प्रयार्सों के बार्वजदू भी
इस्लार्म धर्म में भार्रत के अधिसख्ं य हिन्दुओं ने स्वीकार नहीं कियार् बल्कि उनके
अन्दर विद्वेश की भार्वनार् में वृद्धि ही हुई।
असहनीय कष्टों को सहकर भी भार्रत की हिन्दू जनतार् अपने धर्म के
प्रति आस्थार्वार्न बनी रही। यह उसके धैर्य और सहनषीलतार् क सर्वोत्तम
उदार्हरण कहार् जार् सकतार् है।

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