तनार्व क अर्थ, लक्षण एवं कारण
तनार्व वर्तमार्न जीवन की एक बड़ी समस्यार् है। मनोवैज्ञार्निकों ने तनार्व के कर्इ तरीकों से परिभार्षित कर उसे समझने क प्रयार्स कियार् है। इन मनोवैज्ञार्निकों में हैंस सेली क नार्म सर्वार्धिक प्रमुखतार् से लियार् जार्तार् है। आइये हम तनार्व की प्रमुख परिभार्षार्ओं को जार्नें।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक हैंस सेली ने अपनी पुस्तक ‘द स्ट्रेस ऑफ लार्इफ’ में तनार्व को एक अनुक्रियार् के रूप में परिभार्षित करते हुए कहार् है कि ‘तनार्व से तार्त्पर्य शरीर द्वार्रार् उसके प्रति प्रस्तुत की गर्इ मार्ंग के प्रति अविशिष्ट अनुक्रियार् से होतार् है।

मॉर्गन, किंग, विस्ज एवं स्कॉपलर के अनुसार्र – हमलोग तनार्व को एक ऐसी आन्तरिक अवस्थार् के रूप में परिभार्षित करते हैं जो शरीर के सम्मुख एक शार्रीरिक आवश्यकतार्ओं (जैसे कि बीमार्री की अवस्थार्एॅं, व्यार्यार्म, तार्पमार्न की अतिरंजतार् आदि) यार् वैसे वार्तार्वरणीय एवं सार्मार्जिक परिस्थितियॉं जिन्हें कि संभार्वित रूप से नुकसार्नदेह, नियंत्रण से बार्हर तथार् निबटने के उपलब्ध संसार्धनों को चुनौति देने वार्ले के रूप में मूल्यॉंकित कियार् जार्तार् है, से उत्पन्न होतार् है।

मनोवैज्ञार्निक बैरोन अपनी पुस्तक ‘मनोविज्ञार्न’ में तनार्व को परिभार्षित करते हुए कहते हैं कि- ‘तनार्व एक बहुआयार्मी प्रक्रियार् है जो हम लोगों में वैसी घटनार्ओं के प्रति अनुक्रियार् के रूप में उत्पन्न होती है जो हमार्रे शार्रीरिक एवं मनोवैज्ञार्निक प्रकार्यों को विकृत करतार् है यार् विकृत करने की धमकी देतार् है।’ वुड एवं वुड ने तनार्व को इस प्रकार परिभार्षित कियार् है-’अधिकतरमनोवैज्ञार्निक तनार्व को एक ऐसी घटनार् के प्रति शरीरक्रियार्वैज्ञार्निक एवं मनोवैज्ञार्निक अनुक्रियार् के रूप में परिभार्षित करते हैं जो व्यक्ति को चुनौती देती है अथवार् धमकी देती है तथार् जिसमें अनुकूलन अथवार् समार्योजन के किसी प्रकार की जरूरत होती है।’ उपरोक्त परिभार्षार्ओं के विश्लेषण से निम्न बार्तें स्पष्ट होती हैं –

  1. तनार्व एक बहुआयार्मी प्रक्रियार् एवं अनुक्रियार् है। 
  2. तनार्व नार्म अनुक्रियार् आसेधकों (stressors) के कारण उत्पन्न होती है। 
  3. तनार्व उत्पन्न करने वार्ली सभी परिस्थितियॉं, वस्तु अथवार् व्यक्ति आसेधक कहलार्ते हैं। 
  4. तनार्व परिस्थितियों के मूल्यॉंकन के स्वरूप पर निर्भर करतार् है। जब जीवन की परिस्थितियॉं व्यक्ति के सम्मुख चुनौतियों के रूप में सार्मने आती हैं तब व्यक्ति उन चुनौतियों से निपटने हेतु अपनी तैयार्री को देखतार् है एवं उपलब्ध संसार्धनों तथार् अपनी योग्यतार् अथवार् सहयोग क मूल्यॉंकन करतार् है। यदि उसे उपलब्ध संसार्धन एवं अपनी योग्यतार् तथार् सहयोग की उपलब्धतार् चुनौतियों क यथोचित सार्मनार् करने हेतु पर्यार्प्त प्रतीत होते हैं तो उसे तनार्व नहीं होतार् है। परन्तु यदि उसे उपलब्ध संसार्धन, योग्यतार् अथवार् सहयोग अपर्यार्प्त प्रतीत होते हैं तब उसे तनार्व हो जार्तार् है।उदार्हरण के लिए यदि आप एक विद्यार्थ्र्ार्ी हैं जिसक मूल्यॉंकन परीक्षार् में प्रार्प्त अंकों के आधार्र पर कियार् जार्तार् है, मार्न लीजिए कि एक दिन कक्षार्ध्यार्पक आपको यह सूचनार् देते हैं कि आज सार्यंकाल आपको पढ़ाइ गयी किसी इकार्इ से प्रश्न पूछ कर आपकी परीक्षार् ली जार्येगी तथार् इसमें प्रार्प्त होने वार्ले अंक मुख्य परीक्षार् में जुड़ेंगे। अब यदि आप सदैव तत्पर रहते हुए परीक्षार् हेतु तैयार्र रहते हैं, अथवार् आप समझते हैं कि सार्यंकाल तक आप परीक्षार् में सफल होने हेतु पर्यार्प्त तैयार्री कर लेंगे एवं जरूरी पुस्तकें एवं नोट्स आपके पार्स हैं तब आपको तनार्व क अनुभव नहीं होगार्। वहीं यदि आप परीक्षार् हेतु सदैव तैयार्र नहीं रहते तथार् जरूरी पुस्तकें अथवार् नोट्स तैयार्र नहीं करते हैं तथार् सार्यंकाल तक परीक्षार् की तैयार्री कर पार्नार् आपके लिए संभव नहीं है तो होने वार्ली परीक्षार् की यही परिस्थिति आपको तनार्वग्रस्त कर देगी।
  5. तनार्व न केवल परिस्थितियों के नकारार्त्मक होने पर ही उत्पन्न नहीं होतार् है बल्कि जीवन की सकारार्त्मक कही जार्ने वार्ली परिस्थितियॉं भी व्यक्ति को तनार्व ग्रस्त बनार् देती हैं। उदार्हरण के लिए यदि किसी महिलार् अथवार् पुरूष को यदि अचार्नक अपनी नौकरी में तय अनुभव प्रार्प्त होने से पूर्व ही प्रोन्नति मिल जार्ती है तब उस पद के उपयुक्त कार्य निष्पार्दन करने के लिए उस पर स्वत: ही दबार्व बढ़ जार्तार् है जब उसे लगतार् है कि उपयुक्त कार्य निष्पार्दन हेतु जिस योग्यतार् अथवार् कुशलतार् की जरूरत है उसकी योग्यतार् में कुछ अथवार् अधिक बढ़ोत्तरी की आवश्यकतार् है तब उसे तनार्व की अनुभूति होती है यह तनार्व वस्तुत: सकारार्त्मक स्वरूप क होतार् है अतएव इसे सकारार्त्मक तनार्व के रूप में जार्नार् जार्तार् है। इसी प्रकार क अनुभव व्यक्तियों को किसी उच्च अथवार् अति उत्तम कुल में विवार्ह होने, बहुत बड़े सम्मार्न अथवार् पुरस्कार से नवार्जे जार्ने पर भी उत्पन्न होतार् है।कनार्डार् के प्रिस़़द्ध विद्वार्न हैंस सेली ने इसी आधार्र पर तनार्व को दो भार्गों में बॉंटार् है सकारार्त्मक तनार्व एवं नकारार्त्मक तनार्व। सकारार्त्मक तनार्व को अंगे्रजी में यूस्ट्रेस (eustress) एवं नकारार्त्मक तनार्व को उन्होंने डिस्ट्रेस (distress) कहार् है। 
  6. तनार्व क कोर्इ न कोर्इ कारण होतार् है तथार् तनार्व के बहुआयार्मी प्रभार्व भी होते हैं। तनार्व प्रार्रम्भ में संज्ञार्नार्त्मक कारणों से उत्पन्न होतार् है तथार् बार्द में इसके मनोवैज्ञार्निक (psyhchological) एवं शरीरक्रियार्वैज्ञार्निक (physiological) प्रभार्व भी होते हैं।
  7. तनार्व की कोर्इ तय समय सीमार् नहीं होती है। तनार्व आसेधकों के स्वरूप, उनकी तीव्रतार्, उपस्थिति की अवधि, एवं अनुभव कर्तार् की क्षमतार् के अनुसार्र कम एवं लम्बी अवधि वार्लार् हो सकतार् है। तनार्व कम समय तक चलेगार् यार् लम्बे समय तक चलेगार्, यह बहुत कुछ तनार्व उत्पन्न करने वार्ली घटनार्ओं यार् परिस्थितियों पर निर्भर करतार् है। जब व्यक्ति परिस्थितियों पर शीघ्र नियंत्र्ार्ण पार् लेतार् है तब उसे लघु अवधि क तनार्व होतार् है तथार् जब व्यक्ति को परिस्थितियों पर नियंत्रण पार्ने में अधिक समय लगतार् है तब उसे लम्बी अवधि क तनार्व होतार् है। 8. सार्ररूप में तनार्व जीवन में उत्पन्न चुनौतियों के मूल्यॉंकन के उपरार्न्त उसके प्रति की गयी एक विशेष अनुक्रियार् होती है जिसके शार्रीरिक, मार्नसिक प्रभार्व होते हैं।

तनार्व के लक्षण / अनुक्रियार्यें

आप तनार्व के लक्षणों को अनुक्रियार्ओं के अध्ययन द्वार्रार् सरलतार्पूर्वक समझ सकते हैं। मुख्यत: तनार्व के प्रति व्यक्ति दो प्रकार की अनुक्रियार्यें करतार् है। 1. मनोवैज्ञार्निक अनुक्रियार्यें (psychological responses) एवं 2. शरीरक्रियार्वैज्ञार्निक अनुक्रियार्यें (physiological responses)।

1. मनोवैज्ञार्निक अनुक्रियार्यें (psychological responses)

मनोवैज्ञार्निक अनुक्रियार्ओं में वे सभी अनुक्रियार्एॅं सम्मिलित हैं जिन्हें मार्नसिक प्रक्रियार्ओं एवं भार्व-.संवेग, व्यवहार्र के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है। यहॉं पर मार्नसिक प्रक्रियार्ओं से हमार्रार् तार्त्पर्य अवधार्न, प्रत्यक्षण, भार्षार्, अधिगम, स्मृति, समस्यार् समार्धार्न क्षमतार् आदि सभी से है। भार्व-संवेग में सभी संवेग (जैसे- क्रोध, हर्ष, विषार्द, आक्रार्मकतार् आदि) एवं अनुभूतिपरक लक्षण एवं अनुक्रियार्यें सम्मिलित हैं।
संज्ञार्नार्त्मक लक्षण – तनार्व की अवस्थार् में व्यक्ति की एकाग्रतार् (concentration) प्रभार्वित होती है, जिससे व्यक्ति अपने कार्यों क उत्कृश्टतार् के सार्थ निष्पार्दन नहीं कर पार्तार् है।तनार्व से व्यक्ति की ताकिक क्षमतार् (logical ability) भी प्रभार्वित होती हैं। व्यक्ति व्यवस्थित रूप से तर्कपूर्ण चिन्तन नहीं कर पार्तार् है। चिन्तन में चिन्तार् की भूमिक बढ़ जार्ती है एवं व्यक्ति कार्य विशेष के, परिस्थिति विशेष के सभी पहलुओं पर ठीक ढंग से विचार्र नहीं कर पार्तार् है।

तनार्व से व्यक्ति की अवधार्न क्षमतार् (attention ability) भी प्रभार्वित होती है। अवधार्न विस्तार्र (attention span) कम हो जार्तार् है।

स्मृति क्षमतार् भी तनार्व से प्रभार्वित होती है। तनार्व की अवस्थार् में स्मृति शक्ति कमजोर हो़ जार्ती है फलत: व्यक्ति भूतकाल की घटनार्ओं को स्पष्ट रूप में बतार् नहीं पार्तार् है तथार् नयी जार्नकारियों को पूर्णरूप से अपनी स्मृति में धार्रण नहीं कर पार्तार् है।

उपरोक्त संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओं के तनार्व से प्रभार्वित होने के कारण व्यक्ति की समस्यार् समार्धार्न क्षमतार् एवं सृजनार्त्मक क्षमतार् पर भी विपरीत प्रभार्व पड़तार् है एवं व्यक्ति की ये क्षमतार्यें भी कमजोर पड़ जार्ती हैं।

संवेगार्त्मक लक्षण – तनार्व की अवस्थार् में व्यक्ति में कर्इ प्रकार के सार्ंवेगिक परिवर्तन होते देखे गये हैं। आप सभी ने अपने जीवन में इसे अवश्य ही अनुभव कियार् होगार्। जब व्यक्ति तनार्व की स्थिति में होतार् है तब उसमें नकारार्त्मक सार्ंवेगिक अनुक्रियार्ओं की अधिकतार् हो जार्ती है। दूसरे शब्दों में नकारार्त्मक सार्ंवेगिक अनुक्रियार्ओं की बार्रंबार्रतार् में बढ़ोत्तरी हो जार्ती है। तनार्व के परिणार्म स्वरूप होने वार्ली इन सभी नकारार्त्मक अनुक्रियार्ओं क वर्णन निम्नार्ंकित पंक्तियों में कियार् जार् रहार् है।

चिंतार् (anxiety)- तनार्व की अवस्थार् में व्यक्ति में प्रार्य: सर्वप्रथम उत्पन्न होने वार्ली सार्ंवेगिक अनुक्रियार् चिंतार् है। आप सभी ने यह अनुभव कियार् होगार् कि जब आप किसी तनार्वपूर्ण परिस्थिति क सार्मनार् करते हो तब उस परिस्थिति के संभार्वित परिणार्म आपको डर, आशंक एवं घबरार्हट से भर देतार् है। इस अनुभव की प्रतिक्रियार् दो रूपो में देखने को मिलती है एक तो सार्मार्न्य चिंतार् (normal anxiety) के रूप में एवं दूसरी स्नार्युविकृत चिंतार्(neurotic anxiety) के रूप में।
सार्मार्न्य चिंतार् में चिंतार् की मार्त्रार् कम होने के कारण यह व्यक्ति के परिस्थिति के सार्थ समार्योजन में मददगार्र सार्बित होती है। दूसरे शब्दों में यह कार्यों के बेहतर निष्पार्दन में मददगार्र भी सार्बित होती है एवं समस्यार् क समार्धार्न ढूंढने के लिए हमें एकाग्रचित भी कर देती है।

स्नार्युविकृत चिंतार् में चिंतार् की यह मार्त्रार् उस सीमार् तक बढ़ जार्ती जिससे व्यक्ति क परिस्थिति के सार्थ समार्योजन विकृत हो जार्तार् है। व्यक्ति तनार्व उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति से इतनार् भयग्रस्त हो जार्तार् है यार् आशंकित हो उठतार् है कि उसके कारण वह परिस्थिति के सभी पहलुओं पर ठीक प्रकार से विचार्र ही नहीं कर पार्तार् है एवं उसकी समस्यार् समार्धार्न क्षमतार् क ह्रार्स हो जार्तार् है। क्रोध एवं आक्रार्मकतार् (anger and aggression) – तनार्वपूर्ण परिस्थिति जब व्यक्ति के अपने लक्ष्य अथवार् उद्देश्य की प्रार्प्ति में बार्धार् बन जार्ती है तो उससे व्यक्ति में कुंठार् क भार्व उत्पन्न हो जार्तार् है यही कुंठार् तदन्तर क्रोध एवं आक्रार्मकतार् को जन्म देती है। सर्वप्रथम तनार्वपूर्ण परिस्थिति के प्रति व्यक्ति में क्रोध उत्पन्न होतार् है तथार् जब यह क्रोध लम्बे समय तक बरकरार्र रहतार् है तो इसकी परिणति आक्रार्मक व्यवहार्र के रूप में होने लगती है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक सिगमण्ड फ्रार्यड के अनुसार्र कभी-कभी जब तनार्व उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति, वस्तु अथवार् व्यक्ति के प्रति क्रोध उत्पन्न होने के बार्वजूद जब व्यक्ति उसके प्रति आक्रार्मक व्यवहार्र की अभिव्यक्ति नहीं कर पार्तार् है तब उसक यह क्रोध विस्थार्पित होकर विस्थार्पित आक्रार्मक व्यवहार्र (displaced aggressive behaviour) में बदल जार्तार् है। फ्रार्यड ने इसक वर्णन अपने व्यक्तित्व सिद्धार्न्त में सुरक्षार् प्रक्रम (defense mechanism) के संप्रत्यय के अन्तर्गत इसक वर्णन कियार् है। उदार्हरण के लिए यदि कोर्इ व्यक्ति अपनी नौकरी में प्रोन्नति चार्हतार् है, परन्तु किसी गलतफहमी की वजह से उसक बॉस उससे नार्रार्ज हो जार्तार् है तथार् उसे फटकार लगार्तार् है तो इससे उस व्यक्ति में क्रोध उत्पन्न होतार् है परन्तु वह इस भय के कारण कि कहीं उसकी नौकरी ही खतरे में न पड़ जार्ये वह क्रोध की आक्रार्मक अभिव्यक्ति को नियन्त्रित कर लेतार् है। लेकिन वही व्यक्ति जब अपने इस गुस्से को किसी अन्य व्यक्ति पर जैसे कि उसकी पत्नी अथवार् पुत्र पर आक्रार्मक व्यवहार्र के रूप में करतार् है तो यह विस्थार्पित आक्रार्मक व्यवहार्र कहलार्येगार्।

विषार्द (depression) – तनार्व पूर्ण अवस्थार् क प्रभार्व व्यक्ति में अवसार्द भार्व की उत्पत्ति के रूप में भी देखने को मिलतार् है। सार्मार्न्य तौर पर आपने देखार् होगार् कि जब व्यक्ति के जीवन में उसके सम्मुख कुछ ऐसी चुनौतियॉं उत्पन्न हो जार्ती हैं जिनसे निपटने में व्यक्ति को असफलतार् हार्थ लगती है तो व्यक्ति में गुस्सार् अथवार् आक्रार्मक अभिव्यक्ति के स्थार्न पर निरार्शार् क भार्व जन्म ले लेतार् है। व्यक्ति कर्इ बार्र परिस्थिति के प्रति उदार्सीन भार्व भी अपनार् लेतार् है जिसे भार्वशून्यतार् (apathy) भी कहते हैं। मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र विषार्द क अर्जित निस्सहार्यतार् (learned helplessness) से भी सीधार् संबंध होतार् है। अर्जित निस्सहार्यतार् अवसार्द की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ती है। यह निस्सहार्यतार् व्यक्ति में तब उत्पन्न होती है जब जीवन की कठिनार्इयों से वह स्वयं को घिरार् हुआ देखतार् है तथार् उनसे निपट नहीं पार्तार् तथार् वह ऐसी ही अन्य कठिनाइयों के संबंध में भी यह सोच लेतार् है कि इनसे वह अब बच नहीं सकतार् अतएव वह निस्सहार्य महसूस करनार् सीख लेतार् है।

व्यवहार्रार्त्मक लक्षण (behavioural symptoms) – व्यवहार्रार्त्मक लक्षणों अथवार् अनुक्रियार्ओं में वे सभी अनुक्रियार्यें आती हैं जो तनार्वपूर्ण परिस्थितियॉं उत्पन्न होने पर व्यक्ति द्वार्रार् वार्तार्वरण, समार्ज अथवार् परिस्थिति के प्रति स्थूल रूप में की जार्ती हैं। इनक वर्णन निम्नार्ंकित है।

तनार्व उत्पन्न होने पर व्यवहार्र में चिड़चिड़ार्पन (irritability) बढ़ जार्तार् है। व्यक्ति के व्यवहार्र में झुंझुलार्हट बढ़ जार्ती है।

तनार्वपूर्ण परिस्थिति के कारण व्यक्ति में आक्रार्मकतार् (aggressiveness) की मार्त्रार् बढ़ जार्ती है। व्यक्ति जोर-जोर से चिल्लार् कर अपनी खीझ प्रदर्शित करतार् है, अथवार् कुर्सी, मेज आदि वस्तुओं को फेंककर उसकी अभिव्यक्ति करतार् है।

तनार्व के कारण कर्इ बार्र व्यक्ति परिहार्री दृष्टिकोण (avoidance approach) अपनार् लेतार् है। परिणार्मस्वरूप वह परिहार्री व्यवहार्र क प्रदर्शन करने लगतार् है। वह परिस्थितियों, व्यक्तियों आदि से बचने क प्रयार्स प्रार्रंभ कर देतार् है यथार्संभव सार्मार्जिक परिस्थितियों से लोगों से दूरी बनार् कर रखने लगतार् है।

तनार्व सार्मार्न्यतयार् देखे जार्ने वार्ले व्यवहार्रार्त्मक प्रभार्व हैं-

  1. सार्धार्रण मुद्दों पर बहस एवं झगड़ार् करनार्
  2. अतिनिर्भरतार् 
  3. अपनी बार्त समझार् न पार्नार् 
  4. अताकिकतार्
  5. प्रेम से किनार्रार् करनार् 
  6. लैंगिक रूचि में कमी अथवार् अधिकतार्

2. तनार्व के शरीरक्रियार्वैज्ञार्निक लक्षण 

उपरोक्त वर्णित सेक्शन में अब तक हमने तनार्व के मुख्य रूप से केवल मनोवैज्ञार्निक लक्षणों अथवार् अनुक्रियार्ओं के बार्रे में बार्त की है परन्तु तनार्व की अवस्थार् में तनार्व से निबटने की तैयार्री के रूप में इन मनोवैज्ञार्निक अनुक्रियार्यों के अलार्वार् व्यक्ति के शरीर में कर्इ प्रकार की दैहिक यार् शरीरक्रियार्वैज्ञार्निक अनुक्रियार्यें भी होने लगती हैं। इन अनुक्रियार्ओं क वर्णन निम्न पंक्तियों में कियार् जार् रहार् है।

ये अनुक्रियार्यें स्वार्यत्त तंत्रिक तंत्र (autonomic nervours system) के द्वार्रार् प्रार्रंभ की जार्ती हैं। तनार्व हृदय गति, स्वसन गति, रक्तचार्प और पार्चन को प्रभार्वित करतार् है। जब आपार्तअवस्थार् टल जार्ती है तो व्यक्ति क शरीर पुन: पूर्वार्वस्थार् में लौट आतार् है। व्यक्ति की मार्ंसपेशियों में तनार्व भी काफी बढ़ जार्तार् है। लार्र की मार्त्रार् में काफी कमी आ जार्ती है तार्कि फेफड़ों को अधिक-से- अधिक हवार् प्रवेश करने के माग में कहीं कोर्इ रूकावट नहीं आए। शार्यद यही कारण है कि तनार्वपूर्ण परिस्थिति में व्यक्ति को मुॅंह सूखार् होने क अनुभव होतार् है।

तनार्व की स्थिति में एन्डोरफिन्स (स्वार्भार्विक दर्दनार्शक )के स्रार्व में बढ़ोत्तरी हो जार्ती है तथार् शरीर की त्वचार् में पार्यी जार्ने वार्ली रक्त नलिकायें सिकुड़ जार्ती हैं तार्कि शरीर मे कुछ घार्व होने की स्थिति में कम मार्त्रार् में रक्तस्रार्व हो।

तनार्व की अवस्थार् में प्लीहार् द्वार्रार् अधिक मार्त्रार् में लार्ल रक्त कणिकाओं क उत्सर्जन होतार् है तार्कि अधिक से अधिक ऑक्सीजन शरीर के अंगों को मिल सके। उपरोक्त सभी अनुक्रियार्यें स्वार्यत्त तंत्रिक तंत्र तथार् अन्त:स्रार्वी ग्रन्थी विशेषकर एड्रीनल ग्रन्थि तथार् पीयूष ग्रंथि की मदद से नियमित एवं नियंत्रित होती हैं। प्रार्य: ऐसी परिस्थिति में स्वार्यत्त तंत्रिक तंत्र के कार्यों पर एक प्रकार से हार्इपोथैलेमस क नियंत्रण होतार् है।

तनार्व क सबसे बड़ार् प्रभार्व हार्इपरटेंशन होतार् है। उच्च रक्तचार्प को ही हार्इपरटेंशन कहार् जार्तार् है। हृदय द्वार्रार् उत्पन्न किये जार्ने वार्ले दबार्व से रक्त शरीर के विभिन्न भार्गों में पहुॅंचतार् है। शरीर की आवश्यकतार्नुसार्र हृदय क यह दार्ब घटतार्-बढ़तार् रहतार् है। दिन के समय के अनुसार्र भी यह बदलतार् रहतार् है। सुबह के समय जब हम गहरी निद्रार् में सो रहे होते हैं यह दबार्व सबसे कम रहतार् है एवं हमार्रे उठने के समय से दिन शुरू करने अथवार् व्यार्यार्म के दौरार्न धीरे धीरे बढ़तार् जार्तार् है। जब यह रक्तचार्प निरन्तर सार्मार्न्य से अधिक बनार् रहतार् है तो इसे हार्इपरटेंशन कहार् जार्तार् है।

हार्इपरटेंशन के बहुत से कारणों में व्यक्ति की जीवनशैली प्रमुख है। सार्मार्न्य तौर पर यह पार्यार् गयार् है कि हार्इपरटेंशन के मरीजों क व्यवहार्र पैटर्न टार्इप ‘ए’ प्रकार क होतार् है जैसे कि ये लोग लक्ष्य केंद्रित, आक्रार्मक एवं स्वयं को नीचार् देखे जार्ने के प्रति बिल्कुल भी सहनशीलनहीं होते हैं और इसीलिए इनके उद्देश्य उच्च से उच्चतर होते हैं। इनक सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम हमेंशार् ही सतत रूप से बढ़ी हुर्इ सक्रियतार् में रहतार् है जिसके कारण उच्च रक्तचार्प की स्थिति बनी रहती है। सार्ंवेगिक अवस्थार् भी रक्तचार्प को प्रभार्वित करती है। उत्तेजनार्, गुस्सार् एवं टेंशन रक्तचार्प को बढ़ार् देते हैं हार्लॉंकि यह कुछ ही मिनटों में सार्मार्न्य स्तर पर वार्पस आ जार्तार् है। यह पार्यार् गयार् है कि हार्इपरटेंशन परिवार्र में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में फैलतार् है। टार्इप ए प्रकार के व्यक्तित्व के मार्तार्-पितार् के बच्चों के रक्तचार्प के रोगी होने की संभार्वनार् काफी बढ़ जार्ती है।

तनार्व के दैहिक प्रभार्व केवल हार्इपरटेंशन अथवार् हृदय की स्थिति तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह रोगप्रतिरोधक क्षमतार् को भी प्रभार्वित करतार् है (Lovallo, 1997)। तनार्व की वजह से रिह्यूमेटार्इड आर्थ्रार्इटिस क खतरार् भी बढ़ जार्तार् है ।

तनार्व के दैहिक प्रभार्वों एवं अनुक्रियार्ओं को प्रसिद्ध शरीरक्रियार्वैज्ञार्निक हैंस सेली ने तनार्व के स्वयं के द्वार्रार् प्रतिपार्दित मॉडल ‘सार्मार्न्य अनुकूलन संलक्षण’ (General Adaptation Syndrome or GAS) में विस्तार्र से स्पष्ट कियार् है। सेली क यह मॉडल उनके द्वार्रार् पशुओं पर किए गये अध्ययन पर आधार्रित थार् परन्तु उनक यह दार्वार् थार् कि तनार्व की अवस्थार् में मनुष्यों में भी यही दैहिक अनुक्रियार्यें होती हैं। इन दैहिक अनुक्रियार्ओं को सेली ने तीन अवस्थार्ओं में बॉंटार् है।

  1. चेतार्वनी की अवस्थार् (Stage of alarm reaction)
  2. प्रतिरोध की अवस्थार् (Stage of resistance)
  3. समार्पन की अवस्थार् (Stage of exhaustion)

चेतार्वनी की अवस्थार् (Stage of alarm reaction) – जब व्यक्ति तनार्वपूर्ण परिस्थिति से घिर जार्तार् है तब उसके शरीर में दैहिक अनुक्रियार्यें प्रार्रम्भ हो जार्ती हैं सबसे पहले होने वार्ली अनुक्रियार्ओं को चेतार्वनी अनुक्रियार् कहार् जार्तार् है। ये अनुक्रियार्यें दो उपअवस्थार्ओ के अन्तर्गत घटती हैं। पहली अनुक्रियार् आघार्त अवस्थार् (shock phase) तथार् दूसरी अवस्थार् प्रतिआघार्त (counter-shock phase) अवस्थार् कहलार्ती है। आसेधक से सार्मनार् होते ही व्यक्ति को आघार्त लगतार् है एवं वह आघार्त अवस्थार् में प्रवेश कर जार्तार् है इसकी प्रथम प्रतिक्रियार् स्वरूप दैहिक तार्प न्यून हो जार्तार् है, रक्तचार्प गिर जार्तार् है, हृदय गति मन्द हो जार्ती है तथार् मार्ंसेपेशियॉं शिथिल पड़ जार्ती हैं। इस अवस्थार् के तुरन्त पश्चार्त् प्रतिघार्त की अवस्थार् उत्पन्न होती है जिसमें शरीर अपने सुरक्षार् क्रियार्ओं को बढ़ार् देतार् है तथार् सभी तरह की आपार्तकालीन अनुक्रियार्एॅं जैसे कि रक्तचार्प, हृदय गति एवं श्वसन गति बढ़ जार्ती है। इसके परिणार्मस्वरूप व्यक्ति की प्रतिरोध क्षमतार् में बढ़ोत्तरी होती है।

प्रतिरोध की अवस्थार् (Stage of resistance) –यदि चेतार्वनी अवस्थार् में आसेधक की चुनौतियॉं समार्प्त नहीं होती बल्कि जार्री रहती हैं एवं आसेधक की उपस्थिति बनी रहती है तब शरीर को इससे निबटने हेतु अन्य उपार्यों क सहार्रार् लेनार् होतार् है। यह अवस्थार् प्रतिरोध की अवस्थार् कहलार्ती है क्योंकि इस अवस्थार् मे कुछ हार्रमोन्स क स्रार्व होतार् है जिनसे शरीर की प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ जार्ती है। इसके पीयूष ग्रंथि (pituitary gland) द्वार्रार् एड्रीनल ग्रंथि (adrenal gland) क नियंत्रण कियार् जार्तार् है जो एड्रिनोकोरटिकोट्रोपिक हार्रमोन (adrenocorticotropic hormone – ACTH) क रक्त में उत्सर्जन करतार् है जिससे शरीर आसेधक के शरीर पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों को रोक पार्ने में सक्षम हो जार्तार् है। इस ACTH के स्रार्व की मार्त्रार् क नियमन हार्इपोथेलेमस (हार्इपोथेलेमस आसेधक की लगार्तार्र मौजूदगी से उत्तेजित हो CRF के उत्सर्जन द्वार्रार् पीयूष ग्रंथि को संदेश भेजतार् है) द्वार्रार् कौरटिकोट्रोपिन-रिलीजिंग-फैक्टर (CRF) के उत्सर्जन द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। इस अवस्थार् में एड्रीनल कॉर्टेक्स के उत्तेजन से कॉर्टिसोल नार्मक हार्रमोन्स स्रार्वित हो रक्त में मिलतार् है तथार् शरीर को आसेधक के प्रतिरोध हेतु सक्षम बनार्तार् है। लम्बे समय तक इसके स्रार्वित होने पर यह शरीर के लिए हार्निकारक प्रभार्व उत्पन्न करने लगतार् है एवं व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। इस समय किसी नये आसेधक की उपस्थिति होने पर व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमतार् काफी घट जार्ती है और व्यक्ति समार्पन की अवस्थार् में पहुॅंच जार्तार् है।

समार्पन की अवस्थार् (Stage of exhaustion) – प्रार्णी की शिथिलतार् बढ़ जार्ती है वह निष्क्रिय समार्न हो जार्तार् है तथार् रोगग्रस्त हो जार्तार् है। शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमतार् के घट जार्ने से बीमार्रियों के जकड़ लेने की संभार्वनार् बढ़ जार्ती है। अल्सर, उच्चरक्तचार्प, कैंसर एवं मधुमेह आदि रोग उत्पन्न हो जार्ते हैं एवं व्यक्ति की मृत्यु की संभार्वनार् बढ़ जार्ती है।

तनार्व के कारण

तनार्व उत्पत्ति के कारकों पर मनोवैज्ञार्निकों द्वार्रार् गहन अध्ययन कियार् गयार् है जिसके आधार्र पर तनार्व उत्पत्ति के प्रमुख कारकों की एक सूची विनिर्मित की गयी है। निम्नार्ंकित पंक्तियों मेंं इन्हीं कारकों क वर्णन कियार् जार् रहार् है। इनमें प्रमुख हैं- 1. कुंठार् (frustration) – 2. दैनिक उलझनें (daily hasseles) – 3. जीवन की तनार्वपूर्ण घटनार्यें (stressful events of life)- 4. अभिप्रेरकों क द्वन्द (conflict of motives) – 5. कार्यसंबंधी स्रोत (work-related sources) – 6. पर्यार्वरण संबंधी स्रोत (environmental sources)

  1. कुंठार् (frustration) – तनार्व की उत्पत्ति के प्रमुख स्रोतों में मनोवैज्ञार्निक कारकों के रूप में कुंठार् की उत्पत्ति भी तनार्व क एक प्रमुख स्रोत है। कुंठार् एक प्रकार की मनोदशार् है यह तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति की चार्हतों अथवार् लक्ष्य प्रार्प्ति के बीच कोर्इ बार्धार् खड़ी हो जार्ती है। यार् किसी अन्य व्यक्ति अथवार् व्यक्तियों द्वार्रार् बार्धार् खड़ी कर दी जार्ती है। उदार्हरण के लिए ऐसे अनेक कारक हैं जो कि व्यक्ति की लक्ष्य प्रार्प्ति अथवार् इच्छार्पूर्ति में बार्धक हो सकते हैं जैसे-अनार्थ होनार्, विकलार्ंगतार्, दोषभार्व, कुशलतार् की कमी, आत्मनियंत्रण की कमी, आर्थिक भेदभार्व, जार्ति-धर्म-क्षेत्रीयतार् आधार्रित भेदभार्व आदि। उदार्हरण के लिए यदि आप क लक्ष्य नौकरी प्रार्प्त करनार् है परन्तु नौकरी हेतु सार्क्षार्त्कार देने के उपरार्न्त अन्य प्रतिभार्गियों से आप को ज्ञार्त होतार् है कि क्षेत्रीयतार् को वरीयतार् दी जार् रही है और आप उस क्षेत्र के नहीं हैं तो यह क्षेत्र आधार्रित भेद आपको आपके लक्ष्य में एक बार्धार् के रूप में खड़ार् दिखाइ देगार्। इससे आपके सम्मुख यह आसेधक क कार्य करेगार् एवं आप तनार्व ग्रस्त हो सकते हैं। इसी तरह यदि आप विकलार्ंग हैं तथार् नौकरी देने वार्ले एक पूर्णार्ंग वार्ले व्यक्ति को विकलार्ंग पर वरीयतार् दे रहे हैं तो आप को अपनी विकलार्ंगतार् एक बार्धार् के रूप में प्रत्यक्षित होगी एवं आप तनार्वग्रस्त हो जार्येंगे।
  2. दैनिक उलझनें (daily hassles) – लेजार्रस एवं कैनर जैसे मनोवैज्ञार्निकों ने जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी उलझनों से भी तनार्व होने की बार्त को अपने अध्ययनों के मार्ध्यम से सिद्ध कियार् है। उन्होंने इसके अध्ययन के लिए एक मार्पनी क भी निर्मार्ण कियार् है। जिसे उलझन मार्पनी यार्नि ‘हैजल्स स्केल’ (hassles scale) कहार् जार्तार् है। इसे मार्पनी में व्यक्ति को अपने पिछले महीने में घटी उन घटनार्ओं के बार्रे में बतार्नार् होतार् है जिन्में उसे उलझन क अनुभव हुआ थार्। इन उलझनों को तनार्व के सार्थ संहसंबंधित करने पर सकारार्त्मक सहसंबंध प्रार्प्त हुए हैं। जिनसे यह सार्बित होतार् है कि दिन-प्रतिदिन की उलझनों से व्यक्ति में तनार्व उत्पन्न होतार् है। इन उलझनों को इन मनोवैज्ञार्निकों निम्नलिखित रूप से वर्गीकृत कियार् है।
    1. पर्यार्वरणीय उलझनें (environmental hassles) – पर्यार्वरणीय उलझनों में वे सभी उलझनेंआती हैं जिनक संबंध आसपार्स के वार्तार्वरण से है। उदार्हरण के लिए लोगों की भीड़ से उत्पन्न शोरगुल जैसे बार्जार्र आदि, लार्उडस्पीकर, भार्री यार्तार्यार्त आदि से उत्पन्न उलझन, अपरार्ध जैसे-चोरी, लूट, मार्रपीट आदि में बढ़ोत्तरी, पार्स-पड़ोस में होने वार्ले झगड़ें आदि। 2. घरेलू उलझनें (household hassles) – घर के दैनिक कार्यों जैसे कि घर की सार्फ-सफाइ, भोजन बनार्नार्, सब्जी खरीदनार्, बिजली-पार्नी-किरार्यार् जमार् करनार्, दूध लेनार्, कपड़े धोनार् आदि को नित्यप्रति की घरेलू उलझनों के रूप में चिह्नित कियार् गयार् है।
    2. आन्तरिक उलझनें (inner concern hassles) – स्वयं से संबंधित उलझनों को इस वर्ग में रखार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए किसी स्वजन क नार्रार्ज हो जार्नार्, पत्नी क रूठ जार्नार्, मित्रों से मनमुटार्व हो जार्नार् आदि को आन्तरिक उल्झनों के रूप में चिह्नित कियार् जार्तार् है।
    3. समयार्भार्व से उत्पन्न उलझनें (hassles due to lack of time) – व्यक्ति द्वार्रार् एक सार्थ कर्इ भूमिकायें ले लेने पर यार् भूमिकायें होने पर उन्हें एक सार्थ पूरार् करने के लिए प्रार्य: समय की कमी पड़ जार्ती है। इस प्रकार की उलझनें समयार्भार्व से उत्पन्न उलझनों के अन्तर्गत रखी जार्ती हैं।
    4. आर्थिक जिम्मेदार्री से उत्पन्न उलझनें (hassles arising due to financial responsibility) –किसी अन्य संबंधी क आर्थिक उत्तरदार्यित्व आ पड़ने अथवार् किसी कंपनी, स्कूल आदि में आर्थिक जिम्मेदार्री दिये जार्ने से जो उलझन होती हैं उसे इस श्रेणी के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है।
    5. कार्य उलझनें (work hassles) – कार्य में रूचि न होनार्, कार्य के स्वरूप से असंतुष्टि होनार्, कार्य की कमी होनार्, कार्य क अतिरिक्त भार्र होनार्, कार्य क उचित पार्रिश्रमिक न मिलनार्, कार्य के स्थार्न क उचित न होनार्, प्रोन्नति के अवसर क न होनार्, कार्य से हटार्ये जार्ने की संभार्वनार् आदि से उत्पन्न उलझनों को कार्य उलझनों के अन्तर्गत रखार् जार्तार् है।
  3. जीवन की तनार्वपूर्ण घटनार्यें (stressful events of life)- प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक होम्स एवं रार्हे(Holmes & Rahe,1967) ने जीवन की तनार्वपूर्ण घटनार्ओं पर गहन अध्ययन कियार् है। इस अध्ययन के अनुसार्र व्यक्ति के जीवन में बहुत प्रकार की घटनार्यें घटती रहती हैं। कुछ घटनार्यें सुखद् होती हैं एवं कुछ दुखद्। जो व्यक्ति इन घटनार्ओं से अपनार् सार्मंजस्य बिठार् लेते हैं अर्थार्त परिस्थितियों से विचलित नहीं होते अर्थार्त् परिस्थितियों के सार्थ समार्योजन कर लेते हैं उन्हें तनार्व नहीं होतार् परन्तु वे व्यक्ति जो परिस्थितियों के सार्थ समार्योजन नहीं कर पार्ते वे तनार्वग्रस्त हो जार्ते हैं। परिणार्म स्वरूप व्यक्ति में कर्इ प्रकार के दैहिक एवं भार्वनार्त्मक परिवर्तन होते हैं। जीवन की तनार्वपूर्ण घटनार्ओं से उत्पन्न तनार्व को मार्पने के लिए होम्स एवं रार्हे ने ‘सार्मार्जिक पुनर्समार्योजन रेटिंग मार्पनी क निर्मार्ण कियार् है। इसके अन्दर विभिन्न प्रकार की 43 घटनार्ओं को रखार् गयार् है जैसे कि विवार्ह विच्छेद, विवार्ह, पति अथवार् पत्नी की मृत्यु, तलार्क, परिवार्र के किसी सदस्य की बीमार्री, ससुरार्ल वार्लों से झगड़ार्, घर के किसी सदस्य क गुम हो जार्नार् आदि। इन घटनार्ओं के को इकार्इ मूल्य प्रदार्न किये गये हैं। सर्वार्धिक तनार्वपूर्ण घटनार् क इकार्इ मूल्य 100 रखार् गयार् है। सभी इकार्इ मूल्यों को जोड़ने पर जो कुल अंक हार्सिल होते हैं वे तनार्व को निर्धार्रित करते हैं। अधिक प्रार्प्तार्ंक अधिक तनार्व को बतार्ते हैं।  यद्यपि यह सच है कि जीवन की महत्वपूर्ण घटनार्यें तनार्व क कारण होती हैं। परन्तु यह सभी व्यक्तियों पर लार्गू नहीं होतार् है। क्योंकि व्यार्वहार्रिक तौर पर यह पार्यार् गयार् है कि कुछ व्यक्तियों के लिए जो घटनार् अत्यंत महत्वपूर्ण होती है तथार् जिससे उन्में गंभीर तनार्व होतार् है वही घटनार् अन्य व्यक्तियों के लिए तनिक भी महत्वपूर्ण नही होती है अत: उन्हें उसके सार्थ समार्योजन की आवश्यकतार् ही नहीं होती। ऐसी स्थिति में होम्स एवं रार्हे द्वार्रार् विभिन्न प्रकार की घटनार्ओं के लिए निर्धार्रित इकार्इ मूल्य विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों के लिए कम अथवार् ज्यार्दार् भी हो सकते हैं। फिर भी जीवन की महत्वपूर्ण घटनार्एॅं तनार्व क एक प्रमुख स्रोत हैं इससे इंकार नहीं कियार् जार् सकतार् है।
  4. अभिप्रेरकों क द्वन्द (conflict of motives) – अभिप्रेरकों के बीच संघर्ष भी तनार्व क एक महत्वपूर्ण स्रोत है।जब व्यक्ति को दो अभिप्रेरकों में से किसी एक को चुननार् होतार् है तब उसमें संघर्ष उत्पन्न होतार् है। किसी एक अभिप्रेरक को चुनने क यह संघर्ष कर्इ बार्र तनार्व उत्पन्न कर देतार् है। उदार्हरण के लिए समार्ज में प्रतिस्पर्धार् एवं सहयोग दोनों के ही व्यवहार्र को बढ़ार्वार् दियार् जार्तार् है जिसके कारण व्यक्ति के मन में प्रार्य: अभिप्रेरकों क संघर्ष छिड़ जार्तार् है, एक ओर जहार् प्रथम स्थार्न प्रार्प्त करने के लिए प्रतिस्पर्धार् आवश्यक होती है वहीं दूसरों क समर्थन स्नेह व प्यार्र पार्ने के लिए सहयोग जरूरी होतार् है। प्रतिस्पर्धार् में सहयोग बार्धक होतार् है एवं सहयोग करने पर प्रतिस्पर्धार् नहीं की जार् सकती है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक कर्ट लेविन ने तीन प्रकार के अभिप्रेरकों के संघर्ष के बार्रे में वर्णन कियार् है। वे निम्न हैं।
    1. पहुॅंच-पहुॅंच संघर्ष (approach-approach conflict) –जब व्यक्ति के सम्मुख उसकी पसंद के कम से कम दो अवसर होते हैं जिनमें से वह किसी एक को चुन सकतार् है तो ऐसी स्थिति में वह कौन से अवसर क चुनार्व करे इसे लेकर उसके मन में जो संघर्ष उत्पन होतार् है उसे पहुॅंच-पहुॅंच संघर्ष कहार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए यदि किसी व्यक्ति के सम्मुख नौकरी के दो उत्तम प्रस्तार्व आते हैं जिनमें से एक प्रस्तार्व विदेश में आकर्षक वेतनमार्न एवं सुविधार्ओं से संबंधित हो और दूसरार् प्रस्तार्व घर के पार्स अच्छे वेतनमार्न से संबंधित हो तो व्यक्ति के मन में विदेश में रहने व घर में से किसी एक से संबंधित नौकरी को चुनने की समस्यार् खड़ी हो जार्ती है। मन दोनों में से किसी को भी छोड़नार् नहीं चार्हतार् है परन्तु उसे एक को तो चुननार् ही है, अतएव पहुॅंच-पहुॅंच संघर्ष उत्पन्न हो जार्तार् है जिससे प्रकारार्न्तर से उसे तनार्व क अनुभव होतार् है।
    2. परिहार्र-परिहार्र संघर्ष (avoidance-avoidance) – जब व्यक्ति के सम्मुख ऐसी दो स्थितियार्ंॅं उत्पन्न हों जो नकारार्त्मक हों अथवार् जोखिम भरी हों, जिनमें से उसे कोर्इ भी स्थिति पसंद नहीं हो, और उसे किसी एक को चुननार् ही हो तो ऐसी स्थिति में परिहार्र-परिहार्र संघर्ष उत्पन्न हो जार्तार् है। उदार्हरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को मौत की सजार् मिले लेकिन उसे मौत के किन्हीं दो तरीकों जैसे कि जहर खार्ने से मृत्यु अथवार् फार्ंसी में से किसी एक क चयन करनार् हो तो परिहार्र-परिहार्र संघर्ष उत्पन्न हो जार्येगार् क्योंकि व्यक्ति वस्तुत: मरनार् सपंद नहीं करतार् अतएव वह दोनों से ही बचनार् चार्हेगार्। 
    3. पहुॅंच-परिहार्र संघर्ष (approach-avoidance) – जब व्यक्ति को एक ही पसंद में वार्ंछनीय एवं अवार्ंछनीय दोनों ही अभिप्रेरकों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है तब पहुॅंच-परिहार्र संघर्ष प्रार्रम्भ हो जार्तार् है। उदार्हरण के लिए यदि कोर्इ व्यक्ति अपनी पत्नी से तलार्क लेनार् चार्हतार् है परन्तु उसे तलार्क के उपरार्न्त गुजार्रार् भत्तार् नहीं देनार् चार्हतार् तो ऐसी परिस्थति में उसमें पहुॅंच-परिहार्र संघर्ष से तनार्व उत्पन्न हो जार्तार् है। मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र उपरोक्त तीनों प्रकार के संघर्षों में पहुॅंच-परिहार्र संघर्ष तनार्व उत्पत्ति क सर्वार्धिक प्रमुख स्रोत है।
  5. कार्य संबंधी स्रोत (work-related sources) – यहॉं कार्य से तार्त्पर्य जीविक हेतु किये जार्ने वार्ले नौकरी अथवार् पेशे से है। कार्य से संबंधित कर्इ प्रकार के विभिन्न कारक होते हैं जो कि व्यक्ति में तनार्व उत्पन्न कर सकते हैं। उदार्हरण के लिए दिये गये कार्य की प्रकृति क रूचिपूर्ण न होनार्, परिणार्मस्वरूप ऐसे कार्य को प्रार्रम्भ में तो व्यक्ति आरार्म से संपार्दित करतार् है परन्तु बार्द में उसमें उसके प्रति ऊब क भार्व विकसित हो जार्तार् है, जो लम्बे समय तक जार्री रहने पर तनार्व उत्पन्न करतार् है। यदि कार्यस्थल पर व्यक्ति को यह महसूस होतार् है कि कार्यस्थल क भौतिक वार्तार्वरण जैसे कि पार्नी, हवार्, रोशनी, तार्पमार्न आदि उचित परिमार्ण में नहीं है अथवार् अनुपयुक्त है तो इससे उसमें तनार्व उत्पन्न हो जार्तार् है। इसके अलार्वार् यदि किसी व्यक्ति को उसकी क्षमतार् से अधिक कार्य दे दियार् जार्तार् है जिसे वह समय पर पूरार् नहीं कर पार्तार्, अथवार् कर्इ भूमिकायें एक सार्थ निर्वहन हेतु दे दी जार्ती हैं जिनमें सार्मंजस्य रख पार्नार् उसके लिए कठिन हो जार्तार् है तब इन कारणों से उसमें तनार्व उत्पन्न हो जार्तार् है। कार्य में अपनी भूमिक स्पष्ट नहीं होने पर, योग्यतार् अनुरूप कार्य नहीं मिलने पर, बॉस एवं अन्य सहयोगियों की अधिक प्रत्यार्शार्यें होने पर भी व्यक्ति तनार्व क अनुभव करतार् है।
  6. प्रर्यार्वरण संबंधी स्रोत (environmental sources) – पर्यार्वरण भी तनार्व उत्पत्ति क एक प्रमुख स्रोत है। पर्यार्वरण पर्यार्वरणीय बदलार्वों के रूप में व्यक्ति को तनार्वग्रस्त करने की सार्मथ्र्य रखतार् है। पर्यार्वरण में घटने वार्ली प्रार्कृतिक घटनार्यें जैसे कि, भूस्खलन, भूकंप, बार्ढ़, हिमस्खलन, तीव्र आंधी, तूफार्न, चक्रवार्त, भार्री वर्षार् व्यक्ति में तनार्व उत्पन्न कर देते हैं। जब लोग ऐसे वार्तार्वरण में निवार्स करते हैं जहॉं भूकंप बार्र-बार्र आते रहते हैं अथवार् भूस्खलन, बार्ढ़, तूफार्न अथवार् चक्रवार्त जैसी घटनार्यें बार्र-बार्र घटती रहती हैं तों उनसे प्रभार्वित होने की संभार्वनार् के कारण व्यक्ति तनार्वग्रस्त हो जार्तार् है। केवल स्वार्भार्विक घटनार्यें ही नहीं बल्कि मनुष्य निर्मित पर्यार्वरणीय कारक भी व्यक्ति में तनार्व उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते हैं। जैसे रिहार्यशी इलार्कों में शोरगुल प्रदूषण, परमार्णु परीक्षण, औद्योगिक कचरार् प्रदूषण, वार्यु प्रदूषण, जल प्रदूषण आदि।

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