ज्ञार्न की अवधार्रणार्, प्रकार एवं स्त्रोत

मनुष्य एक ऐसार् प्रार्णी है जो अपनी योग्यतार् एवं सूझ-बूझ से इस पृथ्वी पर कार्य करतार् है तथार् उस कार्य को इस तरह से करतार् है कि उचित परिणार्म प्रार्प्त होते है। इसमें हम अपनार् योगदार्न किस तरह से देते है कैसे हम अपनार् कार्य करते है, कैसे हम उसे सुचार्रू रूप से आगे चलार्ते है यह सब हमार्री सूझबूझ क ही परिणार्म होतार् है और उसी के आधार्र पर हम समार्ज में अपनार् स्थार्न सुनिश्चित कर पार्ते है। सार्मार्जिक ऐसे कार्य जो कि प्रत्येक व्यक्ति सभी के हित को ध्यार्न में रखते हुए करतार् है तथार् उसी के अनुसार्र कार्य करने की नियति को बनार्तार् है। यह कार्य करने क तरीक एवं आधार्र सुनिश्चित करनार् है जिससे हम उसी प्रकार से कार्य करने के ढंग को सीखते है और आगे बढ़ते जार्ते है।

ज्ञार्न क्यार् है?

मनुष्य जब सबसे पहले अवतरित हुआ इस धरती पर तब उसमें रहने तथार् खार्ने पीने क तरीक एवं आधार्र गलत थार् इसके बार्द वह धीरे-धीरे अपने कार्य संग में आगे बढ़तार् गयार् और अपनार् कार्य करने लगार् एवं निरन्तर विकास की प्रक्रियार् चलती रही उसी के आधार्र पर उसने अपने जीवन को नए तथार् आधुनिक तरीके से विकसित करनार् उचित समझार् उसी के आधार्र पर वह प्रार्रम्भिक अवस्थार् को छोड़कर निरन्तर नए परिणार्मों को प्रार्प्त करतार् हुआ आगे बढ़ने लगार् एवं अपनार् कार्य करने लगार्। जिससे उसक विकास हुआ उसके सोचने समझने एवं बोलने तथार् व्यवहार्र करने की स्थितियों में परिवर्तन आयार् और वह सदैव अच्छे कार्यों के बार्रे में सोचते हुए आगे बढ़ने लगार् तथार् उसके मस्तिष्क में आई नवीन चेतनार् तथार् विचार्रों क विकास स्वयं तथार् देखकर होने लगार् इस प्रकार से वह अपने वैचार्रिक क्षमतार् अर्थार्त् ज्ञार्न के आधार्र पर अपने नवीन कार्यों को करने लगार् एवं सीखने लगार् कि किस प्रकार से कोई भी काम को आसार्न तरीके से कियार् जार्य और उसे किस प्रकार से असम्भव बनार्यार् जार्य। इसी सोच विचार्रों की क्षमतार् यार् शक्ति को हम ज्ञार्न कहते है, जिसके आधार्र पर हम सभी प्रकार के कार्यों को करते है एवं निरन्तर आगे बढ़ते है अर्थार्त उन्नति करते है, यह उन्नति तरक्की और आगे बढ़ने की शक्ति ही व्यक्ति को और आगे बढ़ार्ने और अच्छे कार्य करने की प्रेरणार् देती है जिससे वह सदैव सत्कर्म एवं निरन्तर उचित कार्य करतार् है और आगे बढ़तार् रहतार् है इस प्रकार से सरल एवं सुव्यवस्थित जीवन को चलार्ने की प्रक्रियार् ही हमें ज्ञार्न से अवगत करार्ती है। किसी की निश्चित समय में किसी भी व्यक्ति यार् सम्पर्क में आने वार्ली कोई भी वस्तु जो कि जीवन को चलार्ने के लिए उपयोग में आती है उसके प्रति जार्गरूकतार् तथार् सार्झेदार्री ही ज्ञार्न कहलार्ती है। अर्थार्त् कैसे हम अपने जीवन को पूर्ण रूप से चलार् सके प्रार्प्त कर सके एवं ज्ञार्न क बोधकर प्रार्प्त कर सके ज्ञार्न कहलार्ती है ज्ञार्न हमें अनुभव के द्वार्रार् तथार् सीख कर एवं देखकर तथार् अवलोकन के मार्ध्यम से प्रार्प्त होतार् है कैसे प्रत्येक व्यक्ति अपनार् कार्य आसार्नी से करते है वे अपने अनुभवों के आधार्र पर क्रियार्शील होकर ज्ञार्न प्रार्प्त करते है और अपने तरह से प्रत्येक कार्य को पूर्ण करते है।

यह हमें सीख कर खोजकर तथार् शिक्षार् लेकर हमें ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् होतार् है, परन्तु जो हम व्यवहार्र में करके देखते है अथवार् सीखते है वह हमेशार् हमें यार्द रहतार् है और हम उसे वह व्यक्ति अथवार् बार्लक सदैव यार्द रखतार् है तथार् उसे वह सदैव ग्रहण करतार् है अपने जीवन में उतार्रतार् है तथार् सदैव सचेत रहतार् है आगे से ऐसार् कोई कार्य न करें जिससे कि उसे परेशार्नी हो इस प्रकार से व्यक्ति के व्यक्तित्व पर उसके सीखने की क्षमतार् क प्रभार्व पड़तार् है और वह सदैव ज्ञार्न को स्थार्यी बनार्ए रखतार् है। सैद्धार्न्तिक ज्ञार्न जिसे हम पुस्तकों से प्रार्प्त करते है और उसे उतनार् ही ग्रहण कर पार्ते है तथार् समय बीत जार्ने पर हम उसे यार्द नहीं कर पार्ते है अत: प्रत्येक व्यक्ति अपनी वैचार्रिक क्षमतार् के अनुसार्र प्रत्येक विषय वस्तु को यार्द रखतार् है तथार् उसक उपयोग समयार्नुसार्र करतार् है। ज्ञार्न शब्द अवबोध करनार्, अनुभव करनार्, प्रोत्सार्हित करनार्, वार्स्तविकतार् धार्रण करनार्, तुलनार्त्मक रूप से देखनार्, आत्मसार्त करनार् जोकि हमार्रे मस्तिष्क में पहले से धार्रित है यार् उसको हम देखकर यार् करके सीख रहे है वह अनुभव के आधार्र पर सीखनार् एवं समझनार् ज्ञार्न की श्रेणी में आतार् है। जैसे कि आकृति और सार्मग्री के आधार्र पर हम देखते है सीखते है और समझते है जार्नते है एवं किसी भी कार्य को करते है ज्ञार्न अर्थार्त क्यार् हम जार्नते है समझते है और उसको हम आत्मसार्त करते है इस प्रकार से ज्ञार्न हमार्रे एक कार्य करने की सुनियोजित योजनार् है जिसके मार्ध्यम से प्रत्येक सफल व्यक्ति कार्य करतार् है और जीवन पथ पर आगे बढ़तार् जार्तार् है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन मस्तिष्क से अपनी शैक्षिक योग्यतार् से तथार् सार्मार्न्य बुद्धि से आगे बढ़तार् जार्तार् है और उसी प्रकार उस कार्य को करतार् जार्तार् है जिससे उसके अनैतिक क्रियार्-कलार्प पूर्ण होते है और वह निरन्तर आगे बढ़तार् है तथार् अपने से छोटे व आने वार्ली पीढ़ियों को उसी ज्ञार्न के आधार्र पर अपनी क्रियार्ओं को आगे बढ़ार्तार् जार्तार् है ज्ञार्न जो एक अनुभव के द्वार्रार् आतार् है जिसे हम अपने आत्मज्ञार्न के द्वार्रार् समझते है जार्नते है और उन्हीं अनुभवों के द्वार्रार् हम सदैव आगे जीवन से संबंधित कार्यों को करते है और उसी के आधार्र पर प्रतिदिन अनुभवों के द्वार्रार् अपने जीवन के क्रियार्कलार्पों को करते है तथार् अच्छे सभी के हित में कार्य हो ऐसार् सोचते है और करने क निर्णय लेते है

प्रत्यक्ष एवं परोक्ष आधार्र पर हम ज्ञार्न को बार्ंट सकते है। भार्रतीय दर्शन में ज्ञार्न को ब्रम्ह सत्य मार्नार् जार्तार् है तथार् ज्ञार्न को भी श्री मार्ंसार् शार्स्त्र से जोड़ार् गयार् है दोनों एक दूसरे के अभिन्न अंग है। ज्ञार्न है जो कि हमार्रे ऋषि मुनियों तथार् अन्य लोगों ने इसे अपने आधार्र पर समार्ज में विस्तार्र कियार् है और उसी के आधार्र पर प्रत्येक व्यक्ति अपनी सकारार्त्मकतार् एवं सोच के आधार्र पर अपने वैधार्निक क्षमतार् के आधार्र पर ज्ञार्न प्रदार्न करतार् थार् और उसी क हम अनुसरण करके अपनार् अनुभव बढ़ार्ते थे करके सीखते थे और उसी आधार्र पर हम जीवन के तरीको को जार्नते थे और समझते थे। प्रार्चीन समय में जो हमार्रे पूर्वज थे उन्होंने शिक्षार् ली हो ऐसार् कोई आवश्यक नही थार् ज्ञार्न केवल आधार्रित थार् जरूरी नही कि वह शिक्षित भी हो इस तरह से प्रत्येक व्यक्ति ज्ञार्न को महत्वपूर्ण मार्नकर अपनार् कार्य करतार् थार्। शिक्षार् ज्ञार्न प्रार्प्त करने क एक प्रयार्स है और प्रयार्स से कोई आवश्यक नही कि उसे ज्ञार्न प्रार्प्त हों। ज्ञार्न आंतरिक मन में जो वैचार्रिक प्रार्कट्य है वही ज्ञार्न है। कबीरदार्स, रैदार्स, सूरदार्स मीरार् बार्ई ऐसे कई उदार्हरण हमार्रे समक्ष है जिन्होंने अपने आंतरिक ज्ञार्न से सबको ज्ञार्न दियार् है अर्थार्त् दिशार् निर्देश दियार् है जीने क समझने क और जार्नने क जिससे हम अपनार् जीवन आसार्न बनार् सके और सभी के द्वार्रार् समार्ज क हित कर सके, सकारार्त्मक विचार्रधार्रार् एवं अच्छी विचार्रधार्रार् क प्रार्दुर्भार्व प्रत्येक मनुष्य में हो इस ज्ञार्न की आवश्यकतार् होती है। प्रचीनकाल में अर्थार्त् वैदिक युग में प्रत्येक विद्याथी मलू भूत आध्यार्त्मिक प्रश्नों को स्वयं से पूछे और इनके उत्तर स्वयं खोजने क प्रयार्स करे जैसे –

  1. मैं कौन हूँ
  2. मैं कहार्ँ से आयार् हूँ
  3. मैं कहार्ँ जार्ऊँगार्, मनुष्य में यह सब ज्ञार्न से ही प्रार्प्त होती है।

ज्ञार्न की अवधार्रणार्

जब हम शिक्षण देते है तो हम ज्ञार्न प्रदार्न करते है इसलिए हमें जार्ननार् आवश्यक होतार् है कि हम ज्ञार्न के किस स्वरूप क उपयोग कर रहे है, कैसे हम विद्याथी को यथाथ ज्ञार्न से परिचय प्रदार्न करें। क्यार् हम जो ज्ञार्न उसे दे रहे है वह पूर्ण यथाथ ज्ञार्न है सत्यतार् से पूर्ण है यह सब हम जार्नते है एवं समझते है क्यार् इन सिद्धार्न्तों की जार्नकारी शिक्षक को होनार् अति आवश्यक है। शिक्षार् क प्रमुख उद्देश्य ज्ञार्न प्रदार्न करनार् है, तथार् जो भी तथ्य हम पढ़ार्ते है तो वह सत्य पर आधार्रित है सत्य और ज्ञार्न दोनो एक दूसरे से जुडे़ है दोनों में कोई अंतर नहीं है। शार्श्वत सत्य ही ज्ञार्न है। समार्ज के लिए ज्ञार्न ही शिक्षार् है। सभी प्रार्चीन ऋषि मुनियों तथार् मुस्लिम संतों क े प्रथम ज्ञार्न हुआ तब उन्होंने उसक प्रचार्र: प्रसार्र कियार् इस प्रकार से ज्ञार्न की उपयोगितार् शिक्षार् ही सिद्ध करती है। ज्ञार्न की दूसरी अवधार्रणार् है कि ज्ञार्न सूक्ष्म है यार् स्थूल है यह बार्त हम अध्यार्पक के द्वार्रार् विद्याथियों को अध्ययन करार्ते समय शिक्षक एवं विद्यार्थ्र्ार्ी के मन में ज्ञार्न सूक्ष्म रूप से विद्यमार्न रहतार् है। दूसरी ओर पुस्तकों में जो भार्षार् लिखी है वह ज्ञार्न स्थूल है। एक उदार्हरण के द्वार्रार् हम समझ सकते है जैसे पार्नी में नमक डार्लने पर जो नमक के छोटे कण है वे घुल जार्ते है और जो बडे़ डैले होते है वे दिखार्ई देते रहते है ठीक उसी प्रकार से यह ज्ञार्न पुस्तकीय ज्ञार्न होतार् है ज्ञार्न के दो पक्ष है – प्रत्यक्ष ज्ञार्न और परोक्ष ज्ञार्न।

प्रत्यक्ष ज्ञार्न मनुष्य अपनी ज्ञार्नेन्द्रियों से अनुभव के द्वार्रार् प्रार्प्त करतार् है। परोक्ष ज्ञार्न हमे दूसरों  से कथनो यार् पुस्तकों द्वार्रार् प्रार्प्त होतार् है। शिक्षार् में दोनों प्रकार के ज्ञार्न क महत्व है। ज्ञार्न केवल अनुभूति भार्ग है यह हम एक गेंद के द्वार्रार् समझ सकते है। यदि हम गेंद को देखते है तो हमें उसक रंग, रूप, आकार दिखार्ई देतार् है और यदि हम इसी गेंद को ब्रहृमार्ण्ड के रूप में देखते है तो वह हमें इस पृथ्वी क आकार तथार् सतह एवं उसके पूर्ण रूप को दर्शार्ती है। इस प्रकार से हम ज्ञार्न के कई स्तरों को पार्ते है और विभिन्न प्रकार से मन मैं कई प्रकार से सक्रिय होतार् है उसे हमें अनुभव तथार् तर्क चिन्तन के मार्ध्यम से प्रार्प्त करते है।

ज्ञार्न के प्रकार

आगमनार्त्मक ज्ञार्न हम अपने जीवन के अनुभवों के मार्ध्यम से तथार् निरीक्षण के मार्ध्यम से प्रार्प्त करते है जो कि हमार्रे समक्ष घटित होती है घटनार् के आधार्र पर प्रार्प्त करते है। इसमें अलौकिक सत्तार् क कोई स्थार्न नहीं है

  1. प्रयोगमूलक ज्ञार्न – प्रयोजनवार्दी मार्नते है कि ज्ञार्न प्रयार्गे द्वार्रार् प्रार्प्त होतार् है। हम विधियों क प्रयोग करके तथार् किसी भी तथ्य को प्रयोग द्वार्रार् समझते है व आत्मसार्त करते है।
  2. प्रार्गनुभव ज्ञार्न – स्वयं प्रत्यक्ष की भॉति ज्ञार्न को समझार् जार्तार् है जैसे गणित क ज्ञार्न प्रार्गनुभव ज्ञार्न है जो की सत्य है वह अनुभव के आधार्र पर होते है तथार्-स्वयं में स्पष्ट एवं निश्चित ज्ञार्न प्रार्गनुभव ज्ञार्न होतार् है।
  3. ज्ञार्न के स्त्रोत – सदैव हम ज्ञार्न को एक दूसरे को देखकर तथार् उनकी बार्तों को सुनकर प्रार्प्त करते है, कभी भी हम स्वयं अपने ज्ञार्न से परिपूर्ण नहीं हो पार्ते है। कोई भी व्यक्ति सदैव अपने बृद्धि बल पर आगे नही बढ़ सकतार् है जब तक की वह दूसरों के द्वार्रार् किए गए कार्यो क अनुभव न प्रार्प्त कर ले क्योंकि हम मनुष्य जीवन में सदैव एक दूसरे से देखकर सीखते है- चार्हे वह प्रत्यक्ष रूप यार् अप्रत्यक्ष रूप प्रत्यके व्यक्ति अपनी मार्नसिक एवं शार्रीरिक योग्यतार्-नुसार्र सीखतार् है देखतार् है और अपनार् व्यवहार्र करतार् है अर्थार्त् जो कार्य उसको करने की लार्लसार् तथार् महत्वार्कांक्षार् है उसी के आधार्र पर वह आगे बढ़तार् है और निरन्तर कार्य सीखतार् जार्तार् है। इस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति देखकर बार्ले कर सुनकर तथार् किसी भी कार्य को करके सीखतार् है जो कि सदैव अनुभव के आधार्र पर सीखतार् जार्तार् है तथार् उसी आधार्र पर सदैव भार्ग ज्ञार्नाजन कर अपने जीवन को सरल एवं सुगम बनार्तार् जार्तार् है जीवन में मनुष्य सभी से सीखतार् है उसके आस-पार्स वार्तार्वरण तथार् परिवार्र एवं अपने अनुभवों के मार्ध्यम से वह जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखतार् रहतार् है। 

ज्ञार्न के स्त्रोत 

मनुष्य सदैव स्त्रोतों के मार्ध्यम से सीखतार् है ये स्रोत है।

प्रकृति – 

प्रकृति ज्ञार्न क प्रमुख स्त्रोत है एवं प्रथम स्रोत है प्रत्येक मनुष्य ज्ञार्न प्रार्प्त करतार् है जन्म से पूर्व एवं जन्म के पश्चार्त जैसे अभिमन्यु ने चक्र व्यहू तोड़कर अन्दर जार्नार् अपनी मार्तार् के गर्भ से ही सीखार् थार् और हम आगे किस प्रकार से प्रत्यके व्यक्ति अपनी योग्यतार्नुसार्र प्रकृति से सीखतार् है जैसे- फलदार्र वृक्ष सदैव झुक रहतार् है कभी भी वह पतझड  की तरह नहीं रहतार् हमेशार् पंिछयों को छार्यार् देतार् रहतार् है। सूर्य ब्रहृमार्ण्ड क चक्कर लगार्तार् है पृथ्वी सूर्य क चक्कर लगार्ती है चन्द्रमार् पृथ्वी की परिक्रमार् करतार् है यह क्रियार् सब अपने आप होती है और उसी से दिन रार्त क होनार् और मौसम क बननार् तथार् इस प्रकार से प्रकृति अपने नियमों क पार्लन करती है और उनसे हम सीखते है कि किस प्रकार से अपनार् जीवन ठीक से चलार् सकेगें। हमार्रे आस-पार्स के सभी पेड़ पौधे, नदी, तार्लार्ब तथार् पर्वत पठार्र मैदार्न सभी से हम दिन रार्त सीखते रहते है वह प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष दोनों रूप हो सकते है। और इन्ही से हम अपनार् ज्ञार्नाजन करते रहते है इस प्रकार से प्रकृति हमें सीखार्ती है और हम सीखते है।

पुस्तकें –

कितार्बे ज्ञार्न क प्रमुख स्त्रोत है प्रार्चीन समय मैं जब कागज क निर्मार्ण नही  हुआ थार् तब हमार्रे पूर्वज तार्म्रपत्र, पत्थर तथार् भोज पत्रों पर आवश्यक बार्ते लिखते थे और उन्ही के आधार्र पर चलते थे अर्थार्त् नियमों क अनुसरण करते थे इस प्रकार से प्रत्येक पीढ़ियार्ँ समयार्नुसार्र उनक उपयोग करती थी और सदैव अनुपार्लन करती थी।

वर्तमार्न युग आधुनिकतार् क युग है आज के समय में सभी लोग पार्ठ्य पुस्तकों के द्वार्रार् तथार् प्रमुख पुस्तकों के मार्ध्यम से अपनार् अध्ययन करते है इनके द्वार्रार् हम ज्ञार्न वृद्धि कर चौगुनी तरक्की कर सकते है। आज के युग में प्रत्येक विषय पर हमें कितार्बे मिल सकती है यह ज्ञार्न क भण्डार्र होती है आज के समय में हम जिस विषय में चार्हे उस विषय की पुस्तक खरीद सकते है और अपने ज्ञार्न क अर्जन कर-सकते है। ऑनलार्इन भी ई-लार्इब्रेरी के द्वार्रार् अध्ययन कर सकते है।

इंद्रिय अनुभव –

इंद्रिय अर्थार्त् शार्रीरिक अंग जोकि मनुष्य को उसकी जीविततार् क आभार्स करार्ते है। वह सदैव उन्ही के द्वार्रार् अनुभव करतार् जार्तार् है, और संवेदनार् जार्गृत करतार् जार्तार् है, यह संवेदनार् ही ज्ञार्न प्रदार्न करती है अनुभव के आधार्र पर वह प्रत्येक व्यक्ति अपनी कार्यशैली और प्रत्यक्षी करण करार्ती है, अर्थार्त् प्रत्येक पदाथों से जो कि हमार्रे जीवन को चलार्ने में संचार्लित करते है उनके सहार्रे ही हम आगे बढते है तथार् अपने जीवन में निरन्तर आगे बढ़ार्ते है।

सार्क्ष्य – 

सार्क्ष्य के द्वार्रार् हम दूसरों के अनुभवों एवं आधार्रित ज्ञार्न को मार्नते है जो हम अपने अनुभवों के द्वार्रार् ज्ञार्न प्रार्प्त करते है। सार्क्ष्य में व्यक्ति स्वयं निरीक्षण नही करतार् है दूसरों के निरीक्षण पर ही तथ्यों क ज्ञार्न लेतार् है। इस प्रकार से हम कह सकते है कि हम किसी अन्य के अनुभवों के द्वार्रार् ही हम सीखते है। किसी अन्य के द्वार्रार् किसी भी वस्तु क ज्ञार्न देनार् और समझार्नार् तथार् बतार्नार् और उसी बार्त को समझनार् ही सार्क्ष्य है। हमार्रार् भौतिक वार्तार्वरण जो हमें प्रकृति के सार्थ रखकर कार्य करतार् है जीवन को सुचार्रू रूप से चलार्ने के लिए उद्यत करतार् है, यार् प्रेरणार् देतार् है वही सार्क्ष्य है।

तर्क बुद्धि 

प्रतिदिन जीवन में होने वार्ले अनुभवों से हमें ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है तथार् यही ज्ञार्न हमार्रार् तर्क में परिवर्तित हो जार्तार् है, जब हम इसे प्रमार्ण के सार्थ स्पष्ट कर स्वीकार करते है अर्थार्त् तर्क द्वार्रार् हम संगठित करके हम ज्ञार्न क निर्मार्ण करते है। यह एक मार्नसिक प्रक्रियार् है।

अन्त: प्रज्ञार् 

इसको अंग्रेजी में इन्टुयूशन कहते है। इसक तार्त्पर्य है किसी तथ्य को पार् जार्नार्। इसके लिए किसी भी तर्क की आवश्यकतार् नहीं होती है, हमार्रार् उस ज्ञार्न में पूर्ण विश्वार्स हो जार्तार् है।

अन्त:दृष्टि द्वार्रार् ज्ञार्न 

यह ज्ञार्न प्रतिभार्शार्ली लोगों को अकस्मार्त कुछ बोध होकर प्रार्प्त होतार् है, जैसे महार्त्मार् बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे बैठने से ज्ञार्न प्रार्प्त हुआ और भी संत तथार् महार्त्मार् हुए है जिन्हें विभिन्न स्थार्नों पर बैठने से ज्ञार्न प्रार्प्त हुआ। कई मनार्ेि वज्ञार्निकों द्वार्रार् पशुओं पर किए गए प्रयोगों से सिद्ध हुआ कि समस्यार् से जुझते हुए जार्नवर अकस्मार्त समस्यार् क हल प्रार्प्त हो जार्तार् है, ऐसार् तब होतार् है जब वह समस्यार् की संपूर्ण जार्नकारी प्रार्प्त कर लेतार् है। शिक्षार् में बार्लकों की सृजनार्त्मक शक्ति के विकास में इससे सहार्यतार् प्रार्प्त होती है।

अनुकरणीय ज्ञार्न

मार्नव समार्ज में सभी मनुष्य विभिन्न मार्नसिक शक्तियों के है कुछ बहुत ही तीव्र बुद्धि वार्ले कुछ निम्न बुद्धि वार्ले होते है। इनमें जो प्रतिभार्शार्ली होते है। वह प्रत्येक कार्य को इस प्रकार करते है कि वह सैद्धार्न्तिक बन जार्तार् है। अत: उनके द्वार्रार् कियार् गयार् किसी भी संग में कार्य जिसको हम स्वीकार करते है अनुकरणीय हो जार्तार् है।

अनुकरण के द्वार्रार् ही हम सार्मार्जिक कुरीतियों को दूर कर सकते है इसी के मार्ध्यम से हम समार्ज को नई दिशार् प्रदार्न कर सकते है।

मार्नव प्रयार्सों के रूप में ज्ञार्न

जिज्ञार्सार् –

जार्नने की इच्छार्, समझने की इच्छार् किसी भी विषय यार् प्रकरण को अर्थार्त शीर्षक को समझने की उत्सुकतार् ही जिज्ञार्सार् है। जिज्ञार्सार् मनुष्य के अन्र्तमन की एक ऐसी क्रियार् है जो सदैव जार्नने, समझने हेतु प्रोत्सार्हित करती है, जब तक कि उसको पूर्णत: उत्तर नहीं मिल जार्तार् और वह संतुष्ट न हो जार्तार् है। संतुष्टि उसको तभी प्रार्प्त होती है, जब वह पूर्ण रूप से मन की जिज्ञार्सार् को शार्ंत नहीं कर लेतार् हैं। इस प्रकार से वह ज्ञार्न एकत्रित करतार् है तथार् उसक सदैव उपयोग करतार् है। जिज्ञार्सार् पूर्ण होने पर प्रत्येक व्यक्ति खोज, आविष्कार एवं अवलोकन तथार् सीखने के मार्ध्यम क उपयोग कर उसे दैनिक व्यवहार्र में लार्तार् है और अपने अनुभवों को सार्ंझार् करतार् है जिससे अन्य लोगों में किसी भी कार्य को करने व आगे बढ़ने की उत्सुकतार् बढ़ती है।

अभ्यार्स –

अभ्यार्स के मार्ध्यम से ज्ञार्न क प्रार्दुर्भार्व होतार् है। प्रत्येक मनुष्य अपने अनुभवों के मार्ध्यम से सीखतार् है, प्रतिदिन वह नए अनुभवों को ग्रहण करतार् है और उसी को प्रमार्ण मार्नकर आगे कार्य रूप देकर उसे अपने जीवन में उतार्रतार् है तथार् उसी के आधार्र पर प्रत्येक कार्य को करतार् है और आगे आने वार्ले सभी लोगों को इसी के अनुसार्र ज्ञार्न प्रदार्न करतार् जार्तार् है। अभ्यार्स के मार्ध्यम से ही विभिन्न आविस्कार हुए तथार् हम आधुनिकतार् के इस युग में प्रत्येक कार्य को परिणार्म तक पहुँचार् सके है। यदि हमार्रार् अभ्यार्स पूर्ण नहीं है तो हम परिणार्म नहीं प्रार्प्त कर सकते है। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरीय देन है कि, वह अपनी बौद्धिक क्षमतार् के अनुसार्र प्रत्येक क्षेत्र जिसमें उसको रूचि हो अभ्यार्स के द्वार्रार् अच्छे कार्य करके उनक प्रदर्शन कर सकतार् है और समार्ज को एक नई दिशार् प्रदार्न कर सकतार् है चार्हे वह विज्ञार्न, समार्ज तथार् शिक्षार् यार् अन्य किसी भी क्षेत्र में हो उसी आधार्र पर वह अपने व्यक्तित्व अनुभवों को सदैव आविष्कारिक रूप में आगे बढ़ार्तार् रहतार् है।

संवार्द –

संवार्द ज्ञार्न को प्रसार्रित तथार् बढ़ार्ने क एक मार्ध्यम है जिसके द्वार्रार् हम ज्ञार्न प्रार्प्त करते है एवं इसको आत्मसार्त करते है, जैसे कि लोकोक्तियार्ँ  एवं मुहार्वरो के द्वार्रार् तथार् अनेकों दाशनिको: समार्ज सुधार्रकों एवं विद्वजनो द्वार्रार् प्रेरित अनुभवों के आधार्र पर संवार्द के मार्ध्यम से ज्ञार्न क प्रसार्रण करते है जो कि प्रत्येक मनुष्य को लार्भार्न्वित करतार् है। संवार्द के उदार्हरण – ‘‘स्वच्छ भार्रत स्वस्थ भार्रत।’’ ‘‘पार्नी पीयो छार्नकर, गुरू करो जार्नकर।’’ पढे़गार् इंडियार्, बढे़गार् इंडियार्’’ आदि।

इस प्रकार से कई संवार्द प्रत्येक मनुष्य प्रार्णी के मन पर प्रभार्व डार्लते है, जिससे ज्ञार्न क अर्विभार्व होतार् है तथार् वह प्रत्यके मनुष्य के मन मस्तिष्क पर अत्यधिक प्रभार्व डार्लतार् है।

मार्नवीय ज्ञार्न एवं सार्मार्जिक व्यवहार्र –

मनुष्य को ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है उसके अनुभवों तथार् संस्कारों से जैसे उसक वार्तार्वरण होगार् वह वैसार् ही व्यवहार्र करेगार् और उसी के आधार्र पर उसकी वैचार्रिक क्षमतार् तथार् मार्नसिक योग्यतार् निर्भर करती है उसके प्रदर्शन तथार् उसके व्यवहार्र पर यदि वह किसी भी प्रार्णी को उसके सम्पर्क में आतार् है, उसकी बार्त समझतार् है, उसके सार्थ उचित व्यवहार्र करतार् है और यह मार्नतार् है, कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी समस्यार् है और वह किस प्रकार से अपनार् कार्य कर रहार् है कैसे वह अपनी दैनिक आवश्यकतार्ओं को पूर्ण कर रहार् है तो वह उसके सार्थ उचित व्यवहार्र करतार् है तथार् उसकी समस्यार्ओं को समझ कर उनक समार्धार्न करतार् है। यही मार्नवीय व्यवहार्र तथार् सार्मार्जिक व्यवहार्र कहलार्तार् है।

सार्मार्जिक व्यवहार्र व्यक्ति तभी करतार् है जब वह स्वयं को समार्ज क अभिन्न अंग मार्नकर उसके हित कल्यार्ण की बार्त सोचतार् तथार् समझतार् है कल्यार्ण की बार्त अर्थार्त् सभी सार्थियो ं की परेशार्नियार्ं े को समझनार्, उनकी समस्यार्ओं को सुलझार्नार्, उन्हें सही रार्ह दिखार्नार्, उनके वयक्तित्व में विकास करनार्, सहयोग करनार् उचित मागदर्शन देनार्, समार्ज के कल्यार्ण की बार्त करनार्, नई योजनार्ओं से परिचित करवार्नार् नई एवं सर्व कल्यार्ण के हित की नीतियार्ँ बनार्नार् जैसे :- स्वार्स्थ्य, शिक्षार्, पार्लन पोषण, अज्ञार्नतार् को दूर करने के लिए युवार् वर्ग द्वार्रार् सार्क्षरतार् क प्रसार्रण करनार् प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो एवं आगे बढे़ समझकर, लिंग भेद को दूर करनार् सबसे बड़ी समस्यार् है, वर्तमार्न समय में कितनार् भी आधुनिक युग हो, परन्तु अभी भी अधिकतर जनतार् के विचार्र आज भी वही संकुचित विचार्र धार्रणार् है जो कि बेटार् और बेटी में अन्तर स्थार्पित करती है। इस प्रकार की मार्नसिकतार् को दूर करनार् शिक्षार्, के मार्ध्यम से प्रत्येक व्यक्ति क अपनार् महत्व है और उसी प्रकार से उस समार्ज के सभी सदस्यों को समझार्नार् तथार् उनकी मार्नसिक विचार्रधार्रार् को परिवर्तित करनार् एवं इस प्रकार की अन्य सार्मार्जिक कुरीतियों को दूर करनार्। शिक्षित एवं सभ्य नार्गरिक क कर्तव्य है कि वह समार्ज की बुरार्इयार्ं े को दूर करे एवं समार्ज में एक अच्छार् वार्तार्वरण तैयार्र कर स्वस्थ समार्ज की व्यवस्थार् करे जिससे जमार्खोरी, अंधविश्वार्स, कुरीतियार्ं े तथार् सभी प्रकार की सार्मार्जिक बुरार्इयार्ं े क अंत हो सके। समार्ज एक आदर्श रूप में स्थार्पित हार् े सके और देश की उन्नति में सहार्यक हो सके। इस प्रकार से हमार्रार् कर्तव्य है कि यदि हम शिक्षित हार्ंगे े तो समार्ज शिक्षित होगार् समार्ज शिक्षित होगार् तो समुचार् देश शिक्षित होगार् और सभी की उन्नति होगी तथार् सभी के विकास के सार्थ-सार्थ देश क विकास होगार्।

अत: सार्मार्जिक व्यवहार्र हेतु ज्ञार्न अति आवश्यक है। यदि मनुष्य को ज्ञार्न होगार् तो कोई भी किसी भी प्रकार से उसे कमजोर नही बनार् सकेगार् अर्थार्त उसक शोषण नहीं कर पार्यगे ार्, इस प्रकार से शिक्षार् मनुष्य को मनुष्य बनार्ती है तथार् सार्मार्जिक विकास में सहयोग प्रदार्न करती है। इस प्रकार से सक्रिय ज्ञार्न के मार्ध्यम से हम अपने विचार्रों को जार्ग्रत रखते है तथार् परस्पर उन पर ध्यार्न तथार् विचार्र विमर्श करते है और उनक पार्लन करते है। इस प्रकार से ज्ञार्न के द्वार्रार् हमें सही मागदर्शन प्रार्प्त होतार् है जो हमार्रे जीवन को सरल तथार् सफल बनार्तार् है।

ज्ञार्न जो हमें प्रत्यक्ष तथार् अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से प्रार्प्त होतार् रहतार् है, इसके लिए आवश्यक नहीं कि हम अपने से उम्र में बड़ों के द्वार्रार् ही सीखे अर्थार्त् यदि कोई उम्र में छोटार् भी है तो वह यदि ज्ञार्न रखतार् है तो उससे हम ज्ञार्न प्रार्प्त कर सकते है उसके विचार्रार् ें तथार् क्रियार्कलार्प के मार्ध्यम से और उसकी गतिविधियों के मार्ध्यम से इस प्रकार से ज्ञार्न के मार्ध्यम से सार्मार्जिक व्यवहार्र को हम पूर्ण कर सकते है और समार्ज को सही मागदर्शन दे सकते है। सत्य और ज्ञार्न में कोई भेद नहीं है जो सत्य है वही ज्ञार्न है जैसे सूर्य क उदय होनार् हमें प्रकाशित करतार् है, चन्द्रमार् हमें दिखार्ई देतार् है और ठंडक प्रदार्न करतार् है ऋतुओं के अनुसार्र मौसम में परिवर्तन होतार् है और समय के अनुसार्र सभी प्रार्णियो एवं सजीवो में अंतर आतार् है तथार् वे अपने समार्न दूसरार् जीव इस धरती पर लार्ते है जो कि वार्स्तविकतार् है इसी ज्ञार्न के आधार्र पर हम प्रत्येक होने वार्ली दुर्घटनार्ओ क पूर्वार्भार्स करके सचेत होते है तथार् उससे बचने के उपार्य प्रार्रम्भ कर देते है, जो हमार्रे ज्ञार्न को दर्शार्तार् है और सदैव सचेत रहने की प्रेरणार् प्रदार्न करतार् है।

ज्ञार्न ही एक ऐसार् मार्ध्यम है जो मनुष्य को मनुष्यत्व सीखार्तार् है तथार् हमार्रे ग्रंथों में लिखार् है कि ज्ञार्न से बड़कर कोई पवित्र वस्तु नही है। ज्ञार्न सदैव मागदर्शन करतार् है सम्पर्क करने की प्रेरणार् देतार् है तथार् अच्छे कर्म करने को उत्सार्हित करतार् है। ज्ञार्न यदि मनुष्य में है तो वह सदैव अपने अस्तित्व को परमार्त्मार् की देन समझ कर समार्ज तथार् सम्पर्क में आने वार्ले सभी से उचित व्यवहार्र कर प्ररे णार् स्त्रोत बनेगार्।

ज्ञार्न न कि उडेलनार् है वरन् व्यक्ति चयनित रूप से वार्तार्वरण की प्रक्रियार् पर ध्यार्न देकर वह अपने अनुभवों के आधार्र पर सूचनार् एकत्रित करतार् है और ज्ञार्न प्रार्प्त करतार् है। खोज के द्वार्रार् सीखनार् महत्वपूर्ण है परन्तु कुशल तथार् पूर्ण अनुभव के द्वार्रार् सीखनार् ही ज्ञार्न है। यह हमें जीवन में पूर्णतार् प्रदार्न करतार् है जैसे – धन, शक्ति, नार्म, शोहरत, सफलतार् और पद देतार् है। ज्ञार्न के द्वार्रार् ही व्यक्ति समझने विश्लेषण करने और बुद्धिमार्नी विचार्रों को विकसित करने की क्षमतार् देतार् है। यह हमें अच्छार्ई की भार्वनार् रखनार् सीखार्तार् है तथार् हमार्रे आसपार्स के लोगों के जीवन को सुधार्रने में मदद करतार् है।

ज्ञार्न जीवन में अधिक अवसरों को प्रार्प्त करने क सार्धन है। ज्ञार्न के द्वार्रार् मनुष्य ‘‘प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति कर सकतार् है वह सदैव प्रत्येक विषय पर अपनार् नियन्त्रण रखतार् है और प्रत्येक क्षेत्र में अनुभव के आधार्र पर अपनार् वर्चस्व रखतार् है ज्ञार्न के मार्ध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपनी किसी भी समस्यार् क हल आसार्नी से कर सकतार् है। वह सभी प्रकार से पूर्ण व्यक्तित्व प्रार्प्त कर लेतार् है। ज्ञार्न एक ऐसार् तत्व है जो सदैव रहतार् है धन नष्ट हो जार्तार् है तन जर्जर हो जार्तार् है हमार्रे सार्थी और परिवार्र के लोग छूट जार्ते है पर ज्ञार्न सदैव हमार्रे सार्थ रहतार् है वह कभी भी हमार्रार् सार्थ नहीं छोड़तार् है। ज्ञार्न यह हमें सीखने की प्रक्रियार् से आतार् है। जितनार् हम सीखते जार्ते है ज्ञार्न हमें प्रार्प्त होतार् जार्तार् है। हमार्रे धर्म ग्रंथो में भी ज्ञार्न को प्रकृति और पुरूष के स्वरूप को समझकर गुणों के सहित प्रकृति से सदैव जुडे रहनार् है।

मार्नवीय ज्ञार्न जो कि ईश्वर की अनुपम कृति है जिसे ईश्वर ने प्रदत्त की है इसके बिनार् मनुष्य पुशओ के समार्न व्यवहार्र करतार् है न वह ठीक से व्यवहार्र करतार् है न किसी की भार्वनार् को समझ पार्तार् है और न ही वह मार्नवतार् सीखार् पार्तार् है तो वह व्यवहार्र असार्मार्जिक व्यवहार्र हो जार्तार् है जो कि मनुष्य को पशुत्व क व्यवहार्र सीखार्तार् है तथार् उसके आधार्र पर वह असार्मार्जिक कार्य करने लगतार् है यह असार्मार्जिक कार्य ही आतंक तथार् देशद्रोह क कार्य करते है जिनके कुकृत्य करने से सभी सार्मार्जिक प्रार्णियों को परेशार्नियो क सार्मनार् करनार् पड़तार् है जिससे समार्ज की सभी व्यवस्थार्एँ गड़बड़ार् जार्ती है और उपद्रव तथार् अशार्ंति क वार्तार्वरण बन जार्तार् है, जिससे सभी सार्मार्जिक, क्रियार्कलार्पों पर प्रभार्व पड़तार् है तथार् उससे सभी प्रकार की गतिविधियॉ प्रभार्वित होती है और वह सब प्रगति में सहार्यक न होकर पिछड़तार् चलार् जार्तार् है।

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