जॉन डीवी क जीवन परिचय एवं शिक्षार् दर्शन

जॉन डीवी क जन्म 1859 में संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में बर्लिंगटन (वर्मोन्ट) में हुआ थार्। विद्यार्लयी शिक्षार् बर्लिंगटन के सरकारी विद्यार्लयों में हुआ। इसके उपरार्ंत उन्होंने वर्मोन्ट विश्वविद्यार्लय में अध्ययन कियार्। जॉन हार्पकिन्स विश्वविद्यार्लय से उन्हें पी-एच0डी0 की उपार्धि मिली। इसके उपरार्ंत उन्होंने मिनीसोटार् विश्वविद्यार्लय (1888-89), मिशीगन विश्वविद्यार्लय (1889-94), शिकागो विश्वविद्यार्लय (1894-1904) में दर्शनशार्स्त्र पढ़ार्यार्। 1904 में वे कोलम्बियार् में दर्शनशार्स्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए और तीस वर्षों तक वे इस पद पर रहें।

जीवन के प्रथम बीस वर्षों में वर्मोन्ट में जॉन डीवी ने ग्रार्मीण सार्दगी को ग्रहण कियार् जो प्रसिद्धि के उपरार्ंत भी उनके व्यक्तित्व क हिस्सार् बनार् रहार्। अगले बीस वर्षों में उन्होंने मध्य पश्चिम अमेरिक क अनुभव प्रार्प्त कियार्। वह अमेरिक की शक्तियों एवं सीमार्ओं से परिचित हुए। जब उन्होंने दर्शन लिखनार् प्रार्रम्भ कियार् तो वे किसी एक प्रार्न्त के न होकर सम्पूर्ण अमेरिक के थे।

शिकागो के ‘स्कूल ऑफ एडुकेशन’ में उनके कार्यों ने लोगो क ध्यार्न अपनी ओर आकर्षित कियार्। इन्हीं वर्षों में उन्होंने अपने कार्यों में प्रयोगवार्दी झुकाव दिखार्यार् जो 1952 में उनकी मृत्यु के समय तक बनार् रहार्। उनक मस्तिष्क अंत तक शिक्षार् में किसी भी नये प्रयोग के लिए खुलार् रहार्। ‘स्कूल्स ऑफ टूमॉरो’ में उनकी रूचि अंत तक बनी रही।

डीवी की महार्नतम रचनार् डेमोक्रेसी एण्ड एडुकेशन (1916) है जिसमें उन्होंने अपने दर्शन के विभिन्न पक्षों को एक केन्द्र बिन्दु तक पहुँचार्यार् तथार् उन सबक एकमार्त्र उद्देश्य उन्होंने ‘बेहतर पीढ़ी क निर्मार्ण करनार्’ रखार् है। प्रत्येक प्रगतिशील अध्यार्पक ने उनक बौद्धिक नेतृत्व स्वीकार कियार्। अमेरिक क शार्यद ही कोर्इ विद्यार्लय हो जो डीवी के विचार्रो से प्रभार्वित न हुआ हो। उनक कार्यक्षेत्र वस्तुत: सम्पूर्ण विश्व थार्। 1919 में उन्होंने जार्पार्न क दौरार् कियार् तथार् अगले दो वर्ष (मर्इ 1919 से जुलाइ 1921) चीन में बितार्ये- जहार्ँ वे अध्यार्पकों एवं छार्त्रों को शिक्षार् में सुधार्र हेतु लगार्तार्र सम्बोधित करते रहे। उन्होंने तुर्की की सरकार को रार्ष्ट्रीय विद्यार्लयों के पुनर्गठन हेतु महत्वपूर्ण सुझार्व दियार्। इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में प्रगतिशील शिक्षार् आन्दोलन को चलार्ने में डीवी की भूमिक महत्वपूर्ण रही।

जॉन डीवी की शिक्षार्-संम्बधी रचनार्यें 

जॉन डीवी ने बड़ी संख्यार् में पुस्तकों, शोध पत्रों एवं निबन्धों की रचनार् की। उनके अनेक कार्य दर्शन से सम्बन्धित है –

  1. 1899 – दि स्कूल एण्ड सोसार्इटी 
  2. 1902 – दि चार्इल्ड एण्ड दि क्यूरीकुलम 
  3. 1910 – हार्उ वी थिन्क 
  4. 1913 – इन्ट्रेस्ट एण्ड एर्फट इन एडुकेशन  
  5. 1915 – स्कूल्स ऑफ टूमॉरो 
  6. 1916 – डेमोक्रेसी एण्ड एडुकेशन 
  7. 1922 – ह्यूमन नेचर एण्ड कन्डक्ट 
  8. 1925 – इक्सपीरियन्स एण्ड नेचर 
  9. 1929 – दि क्वेस्ट फॉर सर्टेन्टि: स्टडी ऑफ रिलेशन ऑफ नॉलेज एण्ड एक्शन 
  10. 1929 – सोर्सेज ऑफ सार्इन्स एडुकेशन 

डीवी की इन रचनार्ओं क पूरे विश्व की शिक्षार् पर व्यार्पक प्रभार्व पड़ार्।

डीवी क दर्शन 

डीवी ने दर्शन के विभिन्न पक्षों पर दूरगार्मी प्रभार्व वार्ले कार्य किए हैं। अत: कुछ ही बिन्दुओं की चर्चार् डीवी के कार्यों के सार्थार् न्यार्य नहीं है। फिर भी सुविधार् की दृष्टि से हम महत्वपूर्ण बिन्दुओं की चर्चार् कर सकते हैं-

1. विमर्शार्त्मक यार् विवेचनार्त्मक जार्ँच 

जॉन डीवी ने समस्यार्ओं को समझने एवं उनके समार्धार्न हेतु विमर्शार्त्मक यार् विवेचनार्त्मक जार्ँच पर सर्वार्धिक जोर दियार्। समस्यार् क समार्धार्न कैसे कियार् जार्य यार् किसी समस्यार् में क्यार् निहित है? यार् आलोचनार्त्मक अन्वेषण क्यार् है? मार्नव-संर्दभों में बुद्धि क प्रयोग कैसे कियार् जार्ये? अपने इन प्रश्नों क उत्तर डीवी ने अपनी पुस्तकों ‘हार्उ टू थिंक’ और ‘लॉजिक: दि थ्योरी ऑफ इन्क्वार्यरी’ में दियार्। उन्होंने विमर्शार्त्मक चिन्तन के सोपार्न बतार्ये –

  1. समस्यार् क आभार्स: इस चरण में कुछ गलत होने की अनुभूति होती है। हमार्रे किसी विचार्र पर प्रश्न चिन्ह लगतार् अनुभव होतार् है यार् इस पर कार्य करने से द्वन्द्व यार् भ्रम की स्थिति क आभार्स होतार् है।
  2. द्वितीय सोपार्न में समस्यार् क स्पष्टीकरण होतार् है। विश्लेषण और निरीक्षण के द्वार्रार् हम पर्यार्प्त तथ्य संग्रहित करते हैं जिससे समस्यार् को समझार् जार् सकतार् है और परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है। 
  3. समस्यार् को स्पष्ट करने के बार्द समार्धार्न हेतु परिकल्पनार्ओं क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है।
  4. चतुर्थ चरण में निगनार्त्मक विवेचनार् द्वार्रार् विभिन्न परिकल्पनार्ओं के निहिताथ को समझने क प्रयार्स करते हैं और उस परिकल्पनार् तक पहुँचते हैं जो सबसे उपयुक्त हो तथार् जिसक वार्स्तव में परीक्षण कियार् जार्ये। 
  5. पार्ँचवार् पद जार्ँच क है जब परिकल्पनार् के स्वीकार किए जार्ने की संभार्वनार् क निरीक्षण यार् प्रयोग द्वार्रार् निर्धार्रण होतार् है। अब परिस्थिति यार् असमंजस की जगह- समार्धार्न यार् स्पष्टतार् मिल जार्ती है। 

2. अनुभव 

डीवी के विचार्रों के केन्द्र में अनुभव है जो कि बार्र-बार्र उसके लेखन में दिखतार् है। उसने अपने कार्यों इक्सपिअरेन्स एण्ड नेचर, आर्ट इज इक्सपिअरेन्स यार् इक्सपिअरेन्स एण्ड एडुकेशन जैसे अपने कार्यों में अनुभव पर अत्यधिक जोर दियार्। उनके लिए मार्नव क ब्रह्मार्ण्ड से सम्बन्ध यार् व्यवहार्र क हर पक्ष अनुभव है। प्रकृति एवं वस्तुओं की अन्तर्क्रियार् को महसूस करनार् अनुभव है।

रूढ़िवार्दी दृष्टिकोण अनुभव को ज्ञार्न से सम्बन्धित मार्नतार् है पर डीवी इसे जीवित प्रार्णी एवं उसके सार्मार्जिक एवं प्रार्कृतिक वार्तार्वरण के मध्य की अन्तर्क्रियार् मार्नते हैं। रूढ़िवार्दी इसे आत्मनिष्ठ, आन्तरिक तत्व मार्नते हैं जो वस्तुनिष्ठ वार्स्तविकतार् से भिन्न है। पर डीवी ने वस्तुनिष्ठ विश्व को महत्व दियार् है जो मार्नव की क्रियार् एवं पीड़ार् में प्रवेश करतार् है और मार्नव के द्वार्रार् वह परिवर्तित भी कियार् जार् सकतार् है। डीवी दिए हुए तथ्य यार् परिस्थिति में परिवर्तन क पक्षधर है तार्कि मार्नव के उद्देश्य पूरे हो सकें। डीवी अनुभव को भविष्य से जोड़तार् है। अगर हम परिवर्तन चार्हते हैं तो हमें भविष्य की ओर उन्मुख होनार् होगार् अत: अनुस्मरण की जगह प्रार्ज्ञार्न यार् पूर्वार्भार्स पर जोर देनार् चार्हिए। अत: डीवी ने अनुमार्न पर जोर दियार् है।

3. ज्ञार्न 

डीवी परम्परार्गत ज्ञार्नशार्स्त्र, जिसमें जार्नने वार्ले को संसार्र से बार्हर मार्नकर सम्भार्वनार्यें, विस्तार्र तथार् ज्ञार्न की वैद्यतार् के बार्रे में पूछार् जार्तार् है, को अस्वीकार करतार् है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि जार्ननेवार्लार् तथ्यों के सही विवरण देतार् है यार् नहीं वरन् महत्वपूर्ण यह है कि वह अनुभवों के एक समूह क अन्य परिस्थितियों में कैसे प्रयोग करतार् है।

डीवी की दृष्टि में ज्ञार्न को समस्यार्गत यार् अनिश्चित परिस्थितियों तथार् चिन्तनशील अन्वेषण के संदर्भ में रखार् जार्नार् चार्हिए। तथ्यों क संकलन से ज्ञार्न अधिक है। ज्ञार्न हमेशार् अनुमार्न सिद्ध होतार् है तथार् समस्यार् यह होती है कि किसी तरह अनुमार्न की प्रक्रियार् को विश्वसनीय यार् सही निष्कर्ष प्रार्प्त करने हेतु निर्देशित कियार् जार्ये। इसमें नियंत्रित निरीक्षण, परीक्षण तथार् प्रयोग किये जार्ते हैं। यह अन्वेषण की उपज है। डीवी ने बेकन के विचार्र ‘ज्ञार्न शक्ति है’ को मार्नार् और उसके अनुसार्र इसकी जार्ँच सार्मार्जिक प्रगति क मूल्यार्ंकन कर कियार् जार् सकतार् है।

4. दर्शन 

‘दि नीड फॅार्र ए रिकवरी ऑफ फिलार्सफी’ में डीवी दर्शन को दर्शन की समस्यार्ओं के अध्ययन क शार्स्त्र के रूप में उपयोग करने की जगह मार्नव की समस्यार्ओं के अध्ययन की विधि बनार्ने पर जोर देतार् है। डीवी के अनुसार्र मार्नव की समस्यार्यें लगभग सभी परम्परार्गत समस्यार्ओं एवं अनेक उभरती समस्यार्ओं को समार्हित करतार् है।

‘रिकंसट्रक्सन ऑफ फिलार्सफी’ में डीवी दर्शन के सार्मार्जिक कार्यों पर बल देतार् है। दर्शन क कार्य सार्मार्जिक एवं नैतिक प्रश्नो पर मार्नव की समझ बढ़ार्नार् है, नैतिक शक्तियों क विकास करनार् है तथार् मार्नव की आकांक्षार्ओं को पूरार् करने में योगदार्न कर अधिक व्यवस्थित मार्नसिक प्रसन्नतार् प्रार्प्त करनार् है।

डीवी की दृष्टि में दर्शन मार्नव संस्कृति की उपज है। सार्थ ही वह एक सार्धन है मार्नव संस्कृति की आलोचनार् और विश्लेषण कर उसे एक दिशार् और रूप देने का। ‘इक्सपीरियन्स एण्ड नेचर’ में वह दर्शन को ‘आलोचनार् की आलोचनार्’ कहतार् है- यह आलोचनार् के एक सिद्धार्न्त क रूप ले लेती है- मूल्यों एवं विश्वार्सों के मूल्यार्ंकन क अनेक मार्ध्यम प्रदार्न करती है। हम आलोचनार् करते हैं कि तार्कि बेहतर मूल्यों क विकास कर सकें। दर्शन की सभी शार्खार्यें इस उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए अपनी विशिष्ट भूमिक निभार्ती हैं।

जीव विज्ञार्नी दृष्टिकोण – डीवी ने आनुवंशिक (जेनेटिक) दृष्टिकोण पर बल दियार्। दूसरार्, उनक मार्ननार् थार् कि जार्ँच क एक जीव विज्ञार्नी सार्ँचार् यार् मैट्रिक्स होतार् है। डाविन और जेम्स के अध्ययन से डीवी को यह स्पष्ट हुआ कि जीवित प्रार्णियों क पर्यार्वरण से अनुकूलन यार् समार्योजन अत्यन्त महत्वपूर्ण है तथार् बुद्धि व्यवहार्र क विशेष प्रकार है। यह भविष्य की आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने हेतु उपयुक्त सार्धन से सम्बन्धित है। मस्तिष्क पर्यार्वरण (वार्तार्वरण) को नियन्त्रित करने क सार्धन जीवन प्रक्रियार् के उद्देश्यों के संदर्भ में है। डाविन क दर्शन पर प्रभार्व को दर्शार्ते हुए डीवी कहते है कि दर्शन वस्तुत: समार्धार्न के लिए उपार्यों को प्रक्षेपित (प्रोजेक्ट) करनार् है।

5. प्रयोगवार्द 

यह डीवी के प्रक्षेपित जार्ँच से सम्बन्धित है- जिसके लिए परिकल्पनार्, प्रयोग तथार् भविष्यवार्णी केन्द्रीय है। प्रयोग कार्य की योजनार् है जो परिणार्म को निर्धार्रित करती है। बुद्धि को परिणार्म में शार्मिल करने की यह एक विधि है। सार्मार्जिक योजनार् यार् शिक्षार् में भी डीवी प्रयोग की जरूरत बतार्ते हैं।

6. उपकरणवार्द (इन्स्ट्रुमेन्टलिज्म) 

विचार्र बार्ह्य वस्तु की प्रतिकृति नहीं है वरन् उपकरण यार् सार्धन है। यह किसी जीव के व्यवहार्र को सुगम बनार्ने क सार्धन है। तार्त्विक यार् अन्तरस्थ एवं कारक (इन्स्ट्रमेन्टलिज्म) क अन्तर करनार् नैतिक यार् तार्त्विक अच्छार्इयों को दिन प्रतिदिन के जीवन से और दूर करनार् है।

7. सार्पेक्षवार्द 

डीवी क सार्पेक्षवार्द निरपेक्षवार्द के विपरीत है तथार् यह एक संदर्भ, परिस्थिति एवं सम्बंध के महत्व पर जोर देतार् है किसी वस्तु यार् तथ्य को संदर्भ से हटार्कर देखनार् उसे उसके मूल्य यार् अर्थ से अलग कर देनार् है। निरपेक्ष यार् असीम को उन्होंने कोर्द स्थार्न नहीं दियार् है तथार् अबार्धित सार्मार्न्यीकरण गलत दिशार् में ले जार् सकतार् है। एक विशेष परिस्थिति में एक आर्थिक नीति यार् योजनार् अच्छी हो सकती है- जो इसे वार्ंछनीय बनार्तार् है पर दूसरी परिस्थिति में हो सकतार् है वह अवार्ंछनीय हो जार्य। एक चार्कू पेन्सिल को छीलने हेतु अच्छार् हो सकतार् है पर रस्सी काटने के लिए बुरार् हो सकतार् है। लेकिन उसे बिनार् प्रतिबन्ध अच्छार् यार् बुरार् कहनार् अनुचित होगार्।

8. सुधार्रवार्द 

डीवी ‘रिकंसट्रक्सन इन फिलार्सफी’ में कहते हैं कि पूर्ण अच्छार् यार् बुरार् की जगह जोर वर्तमार्न परिस्थिति में सुधार्र यार् प्रगति पर होनार् चार्हिए।

9. मार्नवतार्वार्द 

डीवी के दर्शन में अलौकिकतार् एवं धामिक रूढ़िवार्दितार् क कोर्इ स्थार्न नहीं है। ए कॉमन फेथ में डीवी कहते है कि सभ्यतार् में सर्वार्धिक मूल्यवार्न चीजें निरन्तर चलार् आ रहार् मार्नव समुदार्य है जिसकी हम एक कड़ी हैं तथार् हमार्रार् यह कर्तव्य है कि हम अपने मूल्यों की परम्परार् को सुरक्षित रखें, हस्तार्न्तरित करें, सुधार्र करें और इसको विस्तृत भी करें तार्कि हमार्रे उपरार्ंत जो पीढ़ी आती है वह इसे अधिक उदार्रतार् तथार् विश्वार्स भार्व से अपनार् सके। हमार्रार् सार्मूहिक विश्वार्स इसी उत्तरदार्यित्व पर आधार्रित है।

डीवी क मार्नवतार्वार्द उसके प्रजार्तार्ंत्रिक दृष्टिकोण से भी स्पष्ट होतार् है। जीवन जीने के तरीके के रूप में प्रजार्तंत्र मार्नव स्वभार्व की सम्भार्वनार्ओं पर आधार्रित है। डीवी ने विमर्श, आग्रह, परार्मर्श सम्मेलन एवं शिक्षार् को मतभेद समार्प्त करने क सार्धन मार्नार् जो कि प्रजार्तंत्र और मार्नवतार्वार्द दोनों के लिए समार्चीन है। उसने शक्ति और दंड के आधार्र पर किसी मत को थोपने क हर संभव विरोध कियार्।

10. रार्जनीतिक दर्शन 

डीवी के अनुसार्र सर्वार्धिक ‘विकास’ महत्वपूर्ण है। सर्वार्ंग उत्तम उद्देश्य नहीं है। ‘‘संपूर्णतार् अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि संपूर्णतार् की ओर अग्रसर समझदार्री और बेहतरी जीवन क लक्ष्य है।’’ अच्छार् होने क यह अर्थ नहीं है कि आज्ञार्कारी और हार्नि न पँहुचार्ने वार्लार् हो; बिनार् योग्यतार् के अच्छाइ विकलार्ंग है। बुद्धि नहीं हो तो संसार्र की कोर्इ शक्ति हमें नहीं बचार् सकती है। अज्ञार्नतार् सुखद नहीं है, यह मूढ़तार् तथार् दार्सतार् है; केवल बुद्धि ही हमें अपने भार्ग्य के निर्मार्ण में कर्तार् बनार् सकतार् है। हमार्रार् जोर विचार्रों पर होनार् चार्हिए न कि भार्वनार्ओं पर।

डीवी ने प्रजार्तार्ंत्रिक पद्धति को स्वीकार कियार्, यद्यपि वह इसकी कमियों से अवगत थे। रार्जनीतिक व्यवस्थार् क उद्देश्य व्यक्ति को अधिकतम विकास में सहार्यतार् पँहुचार्नार् है। यह तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी योग्यतार् के अनुसार्र, अपने समूह की नीति को निश्चित करने तथार् भविष्य को निर्धार्रित करने में भूमिक निभार्ये। अभिजार्त तंत्र तथार् रार्जतंत्र अधिक कार्यकुशल है पर सार्थ ही अधिक खतरनार्क भी है। डीवी को रार्ज्य पर संदेह थार्। वह एक सार्मूहिक व्यवस्थार् पर विश्वार्स करतार् थार् जिसमें जितनार् अधिक संभव हो कार्य स्वयंसेवी संस्थार्ओं द्वार्रार् की जार्नी चार्हिए। उन्होंने संस्थार्ओं, दलों, श्रम संगठनों आदि की बहुलतार् में व्यक्तिवार्द क समन्वय कियार्।

डीवी की दृष्टि में रार्जनीतिक पुनर्संरचनार् तभी संभव है जब हम सार्मार्जिक समस्यार्ओं के समार्धार्न में भी प्रयोगवार्दी विधि तथार् मनोवश्त्ति क प्रयोग करे जो कि प्रार्कृतिक विज्ञार्नों में बहुत हद तक सफल रहार् है। हमलोग अभी भी रार्जनीतिक दर्शन के आध्यार्त्मिक स्तर पर ही हैं।

हमलोग सार्मार्जिक बीमार्रियों को बड़े-बड़े विचार्रों, शार्नदार्र सार्मार्न्यीकरणों जैसे व्यक्तिवार्द यार् समार्जवार्द, प्रजार्तंत्र यार् अधिनार्यकवार्द यार् सार्मन्तवार्द आदि से समार्प्त नहीं कर सकते। हमलोग को प्रत्येक समस्यार् को विशिष्ट परिकल्पनार् से समार्धार्न करने क प्रयार्स करनार् चार्हिए न कि शार्श्वत सिद्धार्न्तों से। सिद्धार्न्त जार्ल है जबकि उपयोगी प्रगतिशील जीवन को त्रुटि एवं सुधार्र पर निर्भर करनार् चार्हिए।

डीवी क शिक्षार् दर्शन 

विमर्शक अन्वेषण यार् खोज डीवी के सम्पूर्ण विचार्र क्षेत्र क महत्वपूर्ण पक्ष है। डीवी के अनुसार्र शिक्षार् समस्यार् समार्धार्न की प्रक्रियार् है। हम कर के सीखते हैं। वार्स्तविक जीवन परिस्थितियों में क्रियार् यार् प्रतिक्रियार् करने क अवसर प्रार्प्त है। खोज शिक्षार् में केन्द्रीय स्थार्न रखतार् है। केवल तथ्यों क संग्रह नहीं वरन् समस्यार् समार्धार्न में बुद्धि क प्रयोग सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है। शिक्षार् को प्रार्योगिक होनार् चार्हिए न कि केवल आशुभार्षण यार् व्यार्ख्यार्न।

डीवी के अनुसार्र शिक्षार् में पुनर्रचनार्त्मक उद्देश्य उतनार् ही महत्वपूर्ण है जितनार् अनुभव में कहीं भी। डीवी ने डेमोक्रेसी एण्ड एजुकेशन में कहार् है ‘‘शिक्षार् लगार्तार्र अनुभव की पहचार्न तथार् पुनर्रचनार् है।’’ वर्तमार्न अनुभव इस तरह से निर्देशित हो कि भार्वी अनुभव अधिक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी हो। शिक्षार् में यदि भूतकाल के मूल्य एवं ज्ञार्न दिए जार्ते हैं तो इस तरह से दिए जार्ने चार्हिए कि वे विस्तृत, गहरे तथार् बेहतर हो सके। शिक्षार् में आलोचनार्, न कि निष्क्रिय स्वीकृति आवश्यक है। डीवी ने शिक्षार् एवं विकास को समार्न मार्नार् है। अध्यार्पक के रूप में हम बच्चे के सार्थ वहार्ँ से शुरू करते है जहार्ँ वह अभी है, उसकी रूचि एवं ज्ञार्न में विस्तार्र कर हम उसे समुदार्य एवं समार्ज में योग्य व्यक्ति बनार्ते है। वह अपने विकास के लिए उत्तरदार्यित्व के सार्थ कार्य करनार् सीखतार् है तथार् समार्ज के सभी सदस्यों के विकास में सहयोग प्रदार्न करतार् है। शिक्षार् किसी और चीज क सार्धन नहीं होनार् चार्हिए। यह केवल भविष्य की तैयार्री नहीं होनी चार्हिए। विकास की प्रक्रियार् आनन्दप्रद तथार् आंतरिक रूप से सुखद होनी चार्हिए, तार्कि शिक्षार् के लिए मार्नव को अभिप्रेरित करें। डीवी क शिक्षार् दर्शन शिक्षार् की सार्मार्जिक प्रकृति पर जोर देतार् है, प्रजार्तंत्र से इसक घनिष्ठ एवं बहुआयार्मी सम्बन्ध है।

स्पेन्सर की मार्ंग ‘शिक्षार् में अधिक विज्ञार्न और कम सार्हित्य’ से आगे बढ़कर डीवी ने कहार् विज्ञार्न कितार्ब पढ़कर नहीं सीखनार् चार्हिए वरन् उपयोगी व्यवसार्य/कार्य करते हुए आनार् चार्हिए।’ डीवी के मन में उदार्र शिक्षार् के प्रति बहुत सम्मार्न नहीं थार् इसक उपयोग एक स्वतंत्र व्यक्ति की संस्कृति क द्योतक है- एक आदमी जिसने कभी काम नहीं कियार् हो इस तरह की शिक्षार् एक अभिजार्त्य तंत्र में सुविधार् प्रार्प्त सम्पन्न वर्ग के लिए तो उपयोगी है पर औद्योगिक एवं प्रजार्तार्ंत्रिक जीवन के लिए नहीं। डीवी के अनुसार्र अब हमें वह शिक्षार् चार्हिए जो व्यवसार्य/पेशे से मिलती है न कि कितार्बों से। विद्वत संस्कृति अहंकार को बढ़ार्तार् है पर व्यवसार्य/कार्य में सार्थ में मिलकर काम करने से प्रजार्तार्ंत्रिक मूल्यों क विकास होतार् है। एक औद्योगिक समार्ज में विद्यार्लय एक लघु कार्यशार्लार् और एक लघु समुदार्य होनार् चार्हिए- जो कार्य यार् व्यवहार्र तथार् प्रयार्स एवं भूल (भूल एवं सुधार्र) द्वार्रार् सिखार्ये। कलार् एवं अनुशार्सन जो कि सार्मार्जिक एवं आर्थिक व्यवस्थार् के लिए आवश्यक है, की शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। विद्यार्लय केवल मार्नसिक वृद्धि क सार्धन प्रदार्न कर सकतार् है, शेष चीजें हमार्रे द्वार्रार् अनुभव को ग्रहण एवं व्यार्ख्यार् करने पर निर्भर करतार् है। वार्स्तविक शिक्षार् विद्यार्लय छोड़ने पर प्रार्रम्भ होती है- तथार् कोर्इ कारण नहीं है कि ये मृत्यु के पूर्व रूक जार्ये।

शिक्षार् क उद्देश्य 

डीवी शिक्षार् के पूर्व निर्धार्रित उद्देश्य के पक्ष में नहीं हैं। पर उनके कार्यों में शिक्षार् के उद्देश्य स्पष्टत: दिखते हैं-

बच्चे क विकास- शिक्षार् क प्रमुख उद्देश्य है बच्चे की शक्ति एवं क्षमतार् क विकास। प्रत्येक बच्चे की अपनी विशेष क्षमतार् होती है अत: एक ही प्रकार के विकास क सिद्धार्न्त लार्गू करनार् व्यर्थ है क्योंकि एक बच्चे क विकास दूसरे से अलग होतार् है। बच्चे की क्षमतार् के अनुरूप अध्यार्पक को विकास को दिशार् देनी चार्हिए। डीवी शिक्षार् के उद्देश्य को अनुत्तरित रखनार् चार्हते हैं। अगर शिक्षार् के लिए एक निश्चित उद्देश्य तय कियार् जार्तार् है तो यह अत्यधिक हार्निप्रद हो सकतार् है। बिनार् आंतरिक क्षमतार्ओं को ध्यार्न दिये अध्यार्पक विवश होगार् एक विशेष दिशार् में छार्त्रों को ले जार्ने के लिए। सार्मार्न्यत: शिक्षार् क उद्देश्य ऐसे वार्तार्वरण क निर्मार्ण करनार् है जिसमें बच्चे को क्रियार्शील होने क अवसर मिलतार् है। सार्थ ही दूसरार् महत्वपूर्ण उद्देश्य है मार्नव जार्ति की सार्मार्जिक जार्गरूकतार् को बढ़ार्नार् प्रयोजनवार्दी दृष्टिकोण से शिक्षार् बच्चे में सार्मार्जिक क्षमतार् क विकास करतार् है। मार्नव एक सार्मार्जिक प्रार्णी है जिसक विकास समार्ज के मध्य ही होनार् चार्हिए, समार्ज के बार्हर उसक विकास नहीं हो सकतार् है अत: शिक्षार् को सार्मार्जिक क्षमतार् एवं कौशल क विकास करनार् चार्हिए।

प्रजार्तार्ंत्रिक व्यक्ति एवं समार्ज क सृजन- प्रयोजनवार्दी शिक्षार् क लक्ष्य है व्यक्ति में प्रजार्तार्ंत्रिक मूल्य एवं आदर्श को भरनार्, प्रजार्तार्ंत्रिक समार्ज की रचनार् करनार् जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्नतार् न हो। प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र हो तथार् एक दूसरे क सहयोग करने को तत्पर रहे। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छार् पूरी करने तथार् क्षमतार् क विकास करने क अवसर मिले। व्यक्तियों के मध्य समार्नतार् होनी चार्हिए। डीवी के अनुसार्र व्यक्ति एवं समूह के मध्य हितों में कोर्इ अंतर नहीं होतार् है अत: शिक्षार् क उद्देश्य है प्रजार्तार्ंत्रिक समार्ज के व्यक्तियों के मध्य सहयोग एवं सद्भव को बढ़ार्नार्। अत: नैतिक शिक्षार् और विकास आवश्यक है। नैतिकतार् क विकास विद्याथियों द्वार्रार् विद्यार्लय की विभिन्न गतिविधियों में भार्ग लेने से होतार् है जिससे उनमें जिम्मेदार्री उठार्ने की भार्वनार् क विकास हो सके। इससे बच्चे क चरित्र विकसित होतार् है तथार् सार्मार्जिक कुशलतार् बढ़ती है। अवसर की समार्नतार् विद्याथियों को अपनी रूचि एवं रूझार्न के अनुरूप विकास क अवसर देतार् है।

भार्वी जीवन की तैयार्री- प्रयोजनवार्दी शिक्षार् वस्तुत: इस अर्थ में उपयोगी है कि यह व्यक्ति को भार्वी जीवन हेतु तैयार्र करतार् है तार्कि वह अपनी आवश्यकतार्ओं को पूरार् कर आत्मसंतोष प्रार्प्त कर सके। भार्वी जीवन की शिक्षार् व्यक्तिगत और सार्मार्जिक जीवन हेतु तैयार्री करती है। डीवी परम्परार्गत शिक्षार् पद्धति के विरोध में है। अत: उन्होंने प्रगतिशील शिक्षार् की योजनार् बनार्यी तथार् प्रगतिशील स्कूल की स्थार्पनार् की- तार्कि बच्चे के व्यक्तित्व एवं प्रजार्तार्ंत्रिक मूल्यों क विकास हो सके।

पार्ठ्यचर्चार् 

डीवी के अनुसार्र शिक्षार् प्रक्रियार् के दो पक्ष हैं- मनोवैज्ञार्निक एवं सार्मार्जिक।

  1. मनोवैज्ञार्निक पक्ष- बच्चे की रूचि एवं क्षमतार् के अनुसार्र पार्ठ्यचर्यार् एवं शिक्षण विधि निर्धार्रित किए जार्ने चार्हिए। बच्चे की रूचि को जार्नने के उपरार्ंत शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। तथार् इनक उपयोग विभिन्न स्तरों पर शिक्षार् की पार्ठ्यचर्चार् के निर्धार्रण में कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  2. सार्मार्जिक पक्ष- शिक्षार् की शुरूआत व्यक्ति द्वार्रार् जार्ति की सार्मूहिक चेतनार् में भार्ग लेने से होती है। अत: विद्यार्लय क ऐसार् वार्तार्वरण होनार् चार्हिए कि बच्चार् समूह की सार्मार्जिक चेतनार् में भार्ग ले सके। यह उसके व्यवहार्र में सुधार्र लार्तार् है और व्यक्तित्व तथार् क्षमतार् में विकास कर उसकी सार्मार्जिक कुशलतार् बढ़ार्तार् है। 

पार्ठ्यचर्चार् के सिद्धार्न्त- डीवी ने पार्ठ्यचर्चार् की संरचनार् के लिए चार्र सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन कियार्:

  1. उपयोगितार्- पार्ठ्यक्रम को उपयोगितार् पर आधार्रित होनी चार्हिए- अर्थार्त् पार्ठ्यचर्चार् बच्चे के विकास के विभिन्न सोपार्नों में उसकी रूचि एवं रूझार्न पर आधार्रित होनार् चार्हिए। बच्चों में चार्र प्रमुख रूचि देखी जार् सकती हैं- बार्त करने की इच्छार् तथार् विचार्रों क आदार्न-प्रदार्न, खोज, रचनार् तथार् कलार्त्मक अभिव्यक्ति। पार्ठ्यचर्चार् इन चार्र तत्वों द्वार्रार् निर्धार्रित होने चार्हिए तथार् पढ़नार्, लिखनार्, गिननार्, मार्नवीय कौशल, संगीत एवं अन्य कलार्ओं क अध्यार्पन करनार् चार्हिए। सार्रे विषयों को एक सार्थ नहीं वरन् जब मार्नसिक विकास के विशेष स्तर पर इसकी आवश्यकतार् एवं इच्छार् जार्हिर हो तब पढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए। 
  2. नमनीयतार्- अनम्य यार् पूर्वनिर्धार्रित की जगह पार्ठ्यचर्चार् लचीली होनी चार्हिए। तार्कि बच्चे की रूचि यार् रूझार्न में परिवर्तन को समार्योजित कियार् जार् सके। 
  3. प्रार्योगिक कार्य- पार्ठ्यचर्चार् को बच्चे के तत्कालिक अनुभवों से जुड़ार् होनार् चार्हिए। समस्यार् के रूप में विभिन्न तरह की गतिविधियों को उपस्थित कर इनके अनुभव को बढ़ार्यार् जार् सकतार् है और मजबूत कियार् जार् सकतार् है। इस प्रकार अनुभवों के प्रकार को बढ़ार्यार् जार् सकतार् है। यथार्संभव विषयों क अध्यार्पन बच्चे के अनुभव पर आधार्रित होनार् चार्हिए। 
  4. सार्मीप्य- जहार्ँ तक संभव हो पार्ठ्यचर्चार् में उन्हीं विषयों को रखार् जार्ये जो बच्चे के तत्कालीन विकास की स्थिति में उसके जीवन की प्रक्रियार् से जुड़ार् है। इससे उसको दिए जार् रहे ज्ञार्न में ऐक्य हो सकेगार्। जिससे इतिहार्स, भूगोल, गणित, भार्षार् में समन्वय स्थार्पित हो सके। डीवी वर्तमार्न में ज्ञार्न को विभिन्न विषयों में बार्ँटकर पढ़ार्ये जार्ने की विधि के कटु आलोचक थे क्योंकि उनकी दृष्टि में ऐसार् विभार्जन अप्रार्कृतिक है। जहार्ँ तक संभव हो पार्ठ्यचर्चार् के सभी विषय सम्बन्धित यार् एकीकश्त हो। 

शिक्षण-विधि 

आधुनिक शिक्षण विधि के विकास में जॉन डीवी की भूमिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी शिक्षण विधि में निम्न पक्षों पर जोर दियार्।

  1. कर के सीखनार्- डीवी ने अपनी दो पुस्तकों हार्उ वी थिन्क एवं इन्ट्रेस्ट एण्ड एर्फोटस इन एजुकेशन में अनेक नवीन एवं उपयोगी शिक्षण विधियों क प्रतिपार्दन कियार् है। इनमें सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है अगर बच्चार् स्वयं कर के कोर्इ विषय सीखतार् है तो वह सीखनार् अधिक प्रभार्वशार्ली होतार् है। अध्यार्पक को यह नहीं चार्हिए कि जीवन भर जितनी सूचनार्ओं को उसने संग्रहित कियार् है वह छार्त्र के मस्तिष्क में जबरन डार्ले। वरन् अध्यार्पक ऐसी परिस्थिति क निर्मार्ण करे कि छार्त्र स्वयं प्रार्कृतिक क्षमतार् एवं गुणों क विकास करने में समर्थ हो। छार्त्रों को तथ्यों की जार्नकारी तब दी जार्य जब वह उन तथ्यों से सम्बन्धित कार्य कर रहे हों। सार्थ ही बच्चे को वार्स्तविक समस्यार्ओं एवं कठिनार्इयों से जूझने क अवसर मिलनार् चार्हिए तार्कि वह उन समस्यार्ओं/कठिनार्इयों को सुलझार्ने क प्रयार्स करे। समस्यार् समार्धार्न एक अच्छी पद्धति है जो कि बच्चे के अनुभव में वृद्धि करतार् है। 
  2. एकीकरण- बच्चे के जीवन, उसकी क्रियार्ओं एवं पढ़े जार्ने वार्ले विषयों (विषय वस्तु) में ऐक्य हो। सभी विषयों को उसकी क्रियार्ओं के इर्द-गिर्द- जिससे कि बच्चे अभ्यस्त हैं पढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए। महार्त्मार् गार्ँधी के सिद्धार्न्तों में इसकी झलक दिखती है। 
  3. बार्ल केन्द्रित पद्धति- बच्चे की रूचि के अनुसार्र शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। डीवी रूचि एवं प्रयार्स को शिक्षार् में सर्वोच्च मार्नते हैं। शिक्षक को छार्त्र की रूचि क्रियार्कलार्पों की योजनार् बनार्ने के पूर्व, अवश्य समझनी चार्हिए। अगर बच्चों को स्वयं कार्यक्रम बनार्ने क अवसर दियार् जार्य तो वह रूचि के अनुसार्र बनार्येंगे। बेहतर यह होगार् कि उसे कोर्इ भय यार् दबार्व के अन्दर कार्य करनार् न पड़े तार्कि वह स्वतंत्रतार् पूर्वक कार्यक्रम बनार् सके। अगर यह हो जार्ये तो विद्यार्लय के सार्रे क्रियार्कलार्प स्वेच्छार् से लिए गए क्रियार्कलार्प होंगे। यद्यपि यह सिद्धार्न्त शिक्षार्-मनोविज्ञार्न के अनुरूप है पर इसकी कमी यह है कि बच्चे बहुत से विषयों के ज्ञार्न से वंचित रह जार्येंगे तथार् जो भी ज्ञार्न मिलेगार् वह अनियोजित होगार्। 
  4. योजनार् पद्धति- डीवी के विचार्रों के आधार्र पर बार्द में योजनार् पद्धति क विकास हुआ जिससे छार्त्रों में उत्सार्ह, आत्मविश्वार्स, आत्मनिर्भरतार्, सहयोग तथार् सार्मार्जिक भार्व क विकास क होतार् है।

शिक्षक क दार्यित्व 

विद्यार्लय में ऐसे वार्तार्वरण क निर्मार्ण करे जिससे बच्चे क सार्मार्जिक व्यक्तित्व विकसित हो सके तार्कि वह एक उत्तरदार्यी, प्रजार्तार्ंत्रिक नार्गरिक बन सके। डीवी अध्यार्पक को इतनार् महत्वपूर्ण मार्नतार् है कि वह अध्यार्पक को पृथ्वी पर र्इश्वर क प्रतिनिधि कहतार् है।

प्रजार्तार्ंत्रिक निदेशक- शिक्षक क व्यक्तित्व एवं कार्य प्रजार्तार्ंत्रिक सिद्धार्न्तों एवं शिक्षार् मनोविज्ञार्न पर आधार्रित होनार् चार्हिए। विद्यार्लय में समार्नतार् एवं स्वतंत्रतार् क महत्व समझार्ने हेतु अध्यार्पक को, अपने को विद्याथियों से श्रेष्ठ नहीं मार्ननार् चार्हिए। उसे अपने विचार्रों, रूचियों एवं प्रकृतियों को विद्याथियों पर नहीं लार्दनार् चार्हिए। उसे बच्चों की रूचियों एवं व्यक्तित्व की विशेषतार्ओं को देखते हुए पार्ठ्यचर्चार् क निर्धार्रण करनार् चार्हिए। अत: अध्यार्पक को लगार्तार्र बच्चों की भिन्नतार् क ध्यार्न रखनार् चार्हिए। अध्यार्पक बच्चों को ऐसे कार्यों मे लगार्ए जो उसे सोचने और निदार्न ढ़ूँढ़ने के लिए प्रेरित करे।

अनुशार्सन 

  1. समार्जीकरण द्वार्रार् अनुशार्सन- अगर बच्चें ऊपर वर्णित योजनार् के अनुसार्र कार्य करे तो विद्यार्लय में अनुशार्सन बनी रहती है। कठिनाइ तब होती है जब बार्ह्य शक्तियों द्वार्रार् बच्चों को अपनी प्रार्कृतिक इच्छार्ओं को प्रकट करने से रोक जार्य। डीवी के अनुसार्र अनुशार्सन बच्चे के अपने व्यक्तित्व और उसके सार्मार्जिक पर्यार्वरण पर निर्भर करतार् है। वार्स्तविक अनुशार्सन सार्मार्जिक नियंत्रण क रूप लेती है- जब बच्चार् विद्यार्लय के सार्मूहिक क्रियार्कलार्पों में भार्ग लेतार् है। अत: विद्यार्लय क वार्तार्वरण ऐसार् हो कि बच्चे को पार्रस्परिक सद्भार्व एवं सहयोग के सार्थ जीने को प्रेरित करे। बच्चे में अनुशार्सन एवं नियमबद्धतार् क विकास इससे हो सकतार् है कि वे समूह में एक उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए कार्य करे। 
  2. विद्यार्लय कार्यक्रम के द्वार्रार् आत्मअनुशार्सन- विद्यार्लय के कार्यक्रम बच्चों के चरित्र निर्मार्ण में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते हैं। अत: बच्चों को ऐसार् सार्मार्जिक वार्तार्वरण दियार् जार्नार् चार्हिए जिससे उसमें आत्मअनुशार्सन की भार्वनार् क विकास हो सके तार्कि वार्स्तव में वह एक सार्मार्जिक प्रार्णी बन सके। शार्ंत वार्तार्वरण अच्छे और शीघ्र कार्य के लिए आवश्यक है, पर शार्ंति एक सार्धन है, सार्ध्य नहीं। बच्चे आपस में झगड़े नहीं पर इसके लिए बच्चों को डार्ँटनार् यार् दंडित करनार् उचित नहीं है वरन् दार्यित्व की भार्वनार् क विकास कर उसमें अनुशार्सन क विकास हो सके। इसके लिए अध्यार्पक को स्वयं उत्तरदार्यित्व पूर्ण व्यवहार्र करनार् होगार्। 
  3. सार्मार्जिक कार्यों में सहभार्गितार्- सार्मार्जिक कार्यों में सहभार्गितार् शैक्षिक प्रशिक्षण क एक अनिवाय हिस्सार् है। विद्यार्लय स्वयं एक लघु समार्ज है। अगर बच्चार् विद्यार्लय के सार्मार्जिक कार्यों में भार्ग लेतार् है तो भविष्य में वह सार्मार्जिक जीवन के विभिन्न पक्षों में भार्ग लेने के लिए प्रशिक्षित हो जार्येगार्। इस तरह से एक प्रौढ़ के रूप में वह एक अनुशार्सित जीवन जीने क अभ्यस्त हो जार्येगार्। 

समार्लोचनार् 

यद्यपि डीवी के विचार्रों को शिक्षार् जगत में उत्सार्ह के सार्थ स्वीकार कियार् गयार् परन्तु सार्थ ही सार्थ उसकी आलोचनार् भी की गर्इ। आलोचनार् के निम्नलिखित आधार्र थे-

  1. सत्य को स्थार्यी न मार्नने में कठिनाइ- डीवी सत्य को समय एवं स्थार्न के सार्पेक्ष परिवर्तनशील मार्नते हैं। डीवी के अनुसार्र कोर्इ भी दर्शन सर्वदार् सही यार् सत्य नहीं हो सकतार्। कुछ विशेष स्थितियों में ही इसकी उपयोगितार् होती है। उपयोगितार् ही सत्य की अंतिम कसौटी है। अत: आदर्शवार्दियों ने डीवी की आलोचनार् की। 
  2. भौतिकवार्दी आग्रह- आदर्शवार्दी दर्शन के विरोध में विकसित होने के कारण आदर्शवदियों आध्यार्त्मिक आग्रह के विपरीत इनमें भौतिकतार् के प्रति आग्रह है। 
  3. शिक्षार् के किसी भी उद्देश्य की कमी- शिक्षार् के द्वार्रार् प्रजार्तार्ंत्रिक आदर्श की प्रार्प्ति क उद्देश्य डीवी के शिक्षार् सिद्धार्न्त में अन्तर्निहित है पर वह शिक्षार् क कोर्इ स्पष्ट उद्देश्य नहीं बतार्तार् है। उसके लिए शिक्षार् स्वयं जीवन है तथार् इसके लिए कोर्इ उद्देश्य निर्धार्रित करनार् संभव नहीं है। अधिकांश विद्वार्न इससे असहमत है। उनके मत में शिक्षार् क विकास तभी हो सकतार् है जब उसक कुछ निश्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य हो। बच्चे को विद्यार्लय भेजने क कुछ निश्चित उद्देश्य होतार् है। यद्यपि विद्यार्लय कर्इ अर्थों मे समार्ज के मध्य इसक एक अलग अस्तित्व है। 
  4. व्यक्तिगत भिन्नतार् पर अत्यधिक जोर- आधुनिक दृष्टिकोण बच्चे की भिन्नतार् को शिक्षार् देने में अत्यधिक महत्वपूर्ण मार्नतार् है। बच्चे को उसकी रूचि एवं झुकाव के अनुसार्र शिक्षार् देनी चार्हिए। पार्ठ्यक्रम तथार् विधियार्ँ इसे ध्यार्न में रखकर तय की जार्ये। सिद्धार्न्तत: यह बार्त बिल्कुल सही प्रतीत होती है पर वार्स्तविक स्थिति में इसे लार्गू करने पर कर्इ कठिनाइयार्ँ सार्मने आती है। यह लगभग असंभव है कि हर बच्चे के लिए अलग-अगल शिक्षार् योजनार् बनाइ जार्ये। किसी विषय में किसी बच्चे की रूचि बिल्कुल नहीं हो सकती है, फिर भी अध्यार्पक को पढ़ार्नार् पड़तार् है। 

डीवी क आधुनिक शिक्षार् पर प्रभार्व 

डीवी के विचार्रों क आधुनिक शिक्षार् पर व्यार्पक प्रभार्व है। आधुनिक शिक्षार् पर डीवी के प्रभार्व को निम्न प्रकार से समझार् जार् सकतार् है –

  1. शिक्षार् के उद्देश्य पर प्रभार्व- प्रजार्तार्ंत्रिक मूल्यों क विकास आधुनिक शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। सार्मार्जिक गुणों क विकास भी डीवी के कारण शिक्षार् में महत्वपूर्ण मार्नार् जार्ने लगार्।
  2.  शिक्षण विधि पर प्रभार्व- आधुनिक शिक्षण विधि पर डीवी के विचार्रों क व्यार्पक प्रभार्व पड़ार्। शिक्षार् बच्चे के अनुभव पर आधार्रित होनी चार्हिए। बच्चे की क्षमतार्, रूचि एवं रूझार्न के अनुसार्र शिक्षण विधि बदलनी चार्हिए। इन विचार्रों ने आधुनिक शिक्षण विधि को प्रभार्वित कियार्। ‘एक्टीविटी स्कूल’ इसी क परिणार्म है। प्रोजेक्ट विधि भी डीवी के विचार्रों क ही फल है। दूसरे विद्यार्लयों में भी बच्चे के मनोविज्ञार्न पर ध्यार्न दियार् जार्ने लगार्। सार्थ ही बच्चों में सार्मार्जिक चेतनार् के विकास क भी प्रयार्स कियार् जार्तार् है। 
  3. पार्ठ्यचर्चार् पर प्रभार्व- डीवी क अनुसार्र मार्नव श्रम को पार्ठ्यचर्चार् में स्थार्न दियार् जार्नार् चार्हिए। यह शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण पक्ष बन गयार्। विभिन्न तरह के खेलों, वस्तुओं, विभिन्न उपकरणों के उपयोग पर आज अधिक जोर दियार् जार्तार् है। पढ़ार्ये जार्ने हेतु विषयों के चलन में भी बच्चे की रूचि एवं क्षमतार् पर अधिक ध्यार्न दियार् जार्तार् है। 
  4. अनुशार्सन पर प्रभार्व- आज बच्चों को विद्यार्लय में अधिक से अधिक जिम्मेदार्रियार्ँ सौपी जार्ती हैं तार्कि उनमें आत्म नियंत्रण और प्रजार्तार्ंत्रिक नार्गरिकतार् के गुणों क विकास हो सके। जिम्मेदार्री बच्चे को सही ढ़ंग से सोचने एवं कार्य करने की प्रवृत्ति को बढ़ार्तार् है। 
  5. सावजनीन शिक्षार्- डीवी के आदर्शों एवं विचार्रों ने सावजनिक एवं अनिवाय शिक्षार् की मार्ँग को बल प्रदार्न कियार्। हर व्यक्ति को शिक्षार् के द्वार्रार् अपने व्यक्तित्व के विकास क अवसर मिलनार् चार्हिए। इस सिद्धार्न्त को सर्वत्र मार्न्यतार् मिल गयी। वर्तमार्न वैज्ञार्निक एवं सार्मार्जिक रूझार्न की जड़ें डीवी के विचार्रों मेंं है। उन्होंने शिक्षार् को सार्मार्जिक आवश्यकतार् बतार्यार्। यह जीने की तैयार्री नहीं स्वयं जीवन है। यह व्यक्ति एवं समार्ज दोनों क विकास करतार् है। इससे व्यक्ति क समग्र विकास होतार् है।

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