जार्पार्न में मेईजी पुनर्स्थार्पनार् एवं आधुनिकीकरण

19 वीं शतार्ब्दी के मध्य चरण में, जार्पार्न में विदेशियों के प्रवेश और उनके सार्थ जार्पार्न की सत्तार् के केन्द्र शोगून द्वार्रार् सन्धि करने से व्यार्पक प्रतिक्रियार् हुई। इस काल में चीन और जार्पार्न दोनों देशों क एक ही प्रकार की स्थिति क सार्मनार् करनार् पड़ार् थार्। दोनों देशों ने अपने-अपने तरीके से पश्चिमी सार्म्रार्ज्य विस्तार्र के विरूद्ध प्रतिक्रियार् की। चीन ने पश्चिमी सार्म्रार्ज्यवार्द को रोकने के लिए युद्ध क सहार्रार् लियार् और परार्जित हुआ। जबकि जार्पार्न ने तर्कसंगत तरीके से प्रार्चीन और वर्तमार्न में सार्मजस्य स्थार्पित करते हुए भविष्य की चुनौतियों क सार्मनार् करने के लिये जार्पार्न को तैयार्र करने क निश्चय कियार् और जार्पार्न अपने लक्ष्य में विजयी हुआ।

मेईजी पुर्नस्थार्पनार् की पृष्ठभूमि और कारण

जार्पार्न के विभिन्न सत्तार् केन्दार््रें को समझ लें तो मेईजी पुर्नस्थार्पनार् को समझनार् अधिक सरल हो जार्एगार्। बार्रहवीं सदी में जार्पार्न में शोगून व्यवस्थार् क प्रार्रंभ हुआ थार्। जार्पार्न क सम्रार्ट क्योटो में एकान्तवार्स करतार् थार्। उसक प्रशार्सनिक कार्यो में कोई भूमिक नहीं थी। वह पवित्र, देवतुल्य एवं पूज्यनीय मार्त्र थार्। सम्रार्ट शक्तिशार्ली सार्मन्तों को शोगून की उपार्धि प्रदार्न करतार् थार् जिसक अभिप्रार्य ‘बर्बरों क दमन करने वार्लार्’ सर्वोच्च सैनिक अधिकारी होतार् थार्। सबसे अधिक शक्तिशार्ली ‘शोगून’ परिवार्र को शार्सन सत्तार् सौंपी जार्ती थी और उसकी रार्जधार्नी येडो में थी। उसके अधीन दार्इम्यों (सार्मन्त) होते थे, उनके अधीन समुरार्ई वर्ग होतार् थार् जो सैनिक अधिकारी होते थे और रार्ष्ट्र पर मर मिटने के लिये सदैव तैयार्र रहते थे। इनके अतिरिक्त सार्मार्न्य जनतार् क रार्ज्य अथवार् प्रशार्सन कार्य में कोई भूमिक नहीं थी। 1603 ई. से तोकुगार्वार् वंश क शोगून व्यवस्थार् पर वर्चस्व चलार् आ रहार् थार्।

सम्रार्ट रार्ष्ट्र की एकतार् क प्रतीक थार् और जनतार् की श्रद्धार् और भक्ति क केन्द्र थार्। रार्ज्य के प्रशार्सनिक कार्यों की समस्त जिम्मेदार्री शोगून पर थी। वह युद्ध करने, सन्धि करने, अधिकारियों की नियुक्ति करने, कर लगार्ने, वसूल करने, दण्ड देने आदि क कार्य उसी के द्वार्रार् सम्पन्न होतार् थार्। सम्रार्ट से नार्ममार्त्र के लिये स्वीकृति प्रार्प्त कर ली जार्ती थी। इस द्वैध शार्सन -प्रणार्ली में अनेक दुर्बलतार्एं आ गई थी जिनक विरोध अन्य शोगून, सार्मन्त तथार् सार्मार्न्य जन कर रहे थे।

जार्पार्न में पार्श्चार्त्य प्रवेश से उत्पन्न परिस्थिति- 

अमेरिक के सार्थ सन्धि करके जार्पार्न ने पार्श्चार्त्य देशों के लिए अपने द्वार्र तो खोल दिए थे, मगर समस्यार् यह थी कि इन विदेशी शक्तियों के सार्थ जार्पार्न क व्यवहार्र किस प्रकार क हो। जार्पार्न के पुरार्तनपंथी और रूढ़िवार्दी विदेशियों के सार्थ किसी प्रकार क सम्बन्ध रखने के लिए तैयार्र नहीं थे, लेकिन उनकी संख्यार् बहुत सीमित थी इसलिए उनकी आवार्ज पर ध्यार्न नहीं दियार् गयार्। जार्पार्न में एक ऐसार् वर्ग भी थार् जो समझौतार्वार्दी प्रवृत्ति क थार् और ‘प्रार्च्य नैतिकतार् और पार्श्चार्त्य विज्ञार्न’ के समन्वय पर जोर दे रहार् थार्। इस वर्ग क कहनार् थार् कि पश्चिम क मुकाबलार् करने के लिए, परिवर्तनों के सार्थ पार्श्चार्त्य भार्षार् सीखनी चार्हिए, उनके ज्ञार्न-विज्ञार्न और तकनीक को अपनार्नार् चार्हिए। यह वर्ग पश्चिमी विज्ञार्न और युद्ध कलार् को अपनार्ये जार्ने क प्रबल समर्थक थार्।

जार्पार्न क पूर्ण पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण पर जोर देने वार्लार् वर्ग अधिक सशक्त थार्। इस वर्ग क कहनार् थार् कि जार्पार्न में अपने-आपको समय के अनुकूल ढार्लने और पार्श्चार्त्य देशों के बरार्बर आ जार्ने के गुण हैं। वे विरोधार्भार्सी स्थिति से निकलकर एक तरफार् खेल खेलनार् चार्हते थे। अन्त में, इसी वर्ग की विचार्रधार्रार् के पक्ष में जार्पार्न होतार् गयार् जिसमें शोगून व्यवस्थार् के अन्त और सम्रार्ट की पुर्नस्थार्पनार् के बीज छिपे थे।

शोगून शार्सन- व्यवस्थार् के प्रति असन्तोष- 

जार्पार्न में विदेशियों के आगमन के समय, अनेक प्रकार क असन्तोष व्यार्प्त थार्। तोकुगार्वार् ( प्रमुख शोगून परिवार्र) से अन्य सार्मन्त नार्रार्ज थे। शोगून उनको अपने अधीन रखने के लिए षड़यन्त्र रचतार् रहतार् थार्। शोगून की इजार्जत के बगैर अन्य सार्मन्तो को किले बनार्ने, उनकी मरम्मत करने, लड़ार्कू जहार्ज बनार्ने, सिक्क ढार्लने आदि के अधिकार नहीं थे। उन्हें कुछ समय शोगून की रार्जधार्नी येदों में रहनार् पड़तार् थार् अन्यथार् अपने बीबी-बच्चों को बन्धक रूप में वहीं छोड़नार् पड़तार् थार्। वर्तमार्न परिस्थितियों में सभी सार्मन्त शोगून के विरूद्ध संगठित होने लगे।

रार्ज्य के उच्च एवं महत्वपूर्ण पदों पर भी तोकुगार्वार् परिवार्र के लोगो को ही नियुक्त कियार् जार्तार् थार्। प्रमुख सार्मन्त परिवार्र चोशू, सार्तसूमार् और तोसार् प्रमुख शोगून की इस व्यवस्थार् से खार्से नार्रार्ज थे। प्रमुख शोगून की सार्मन्त विरोधी नीति के कारण सार्मन्तों को अपने खर्चो में कटोती करनी पड़ी, उन्हें अपने सैनिकों की संख्यार् कम करनी पड़ी, जिससे सार्मुरार्ई वर्ग में भी असन्तोष फैल गयार्। वे अपनी इस स्थिति के लिए तोकुगार्वार् परिवार्र को जिम्मेदार्र मार्न रहे थे।

19 वीं शतार्ब्दी में व्यार्पार्रिक उन्नति के कारण समार्ज में एक उन्नत धनी वर्ग क उदय हुआ। यह वर्ग पर्यार्प्त रूप में धन सम्पन्न थार्। सार्मन्त अपनी आवश्यकतार्ओं के लिए इनसे कर्ज लेते थे तथार्पि समार्ज में व्यार्पार्रियों क स्थार्न सार्मन्तों से निम्न थार्। परिवर्तित परिस्थितियों में व्यार्पार्री वर्ग सार्मार्जिक परिवर्तन के लिए जोर लगार् रहार् थार्।

सार्मन्ती व्यवस्थार् क समस्त बोझ किसार्नों के कन्धों पर थार्। वे करो के भार्र से दबे जार् रहे थे, उनमें भी रार्जनीतिक- सार्मार्जिक जार्गरण आ रहार् थार् और वे सार्मन्त एवं शोगून व्यवस्थार् के स्थार्न पर सम्रार्ट की व्यवस्थार् के पक्षधर थे।

जार्पार्न में सैनिक कार्य केवल समुरार्ई वर्ग के लोग ही कर सकते थे, सार्मार्न्य जन को सैनिक कार्यों से दूर रखार् जार्तार् थार्। समार्ज क प्रत्येक वर्ग किसी न किसी कारण से शोगून व्यवस्थार् से नार्रार्ज थार् और विदेशियों के आगमन ने उनके असन्तोष में पर्यार्प्त मार्त्रार् में वृद्धि कर दी।

जार्पार्नी सार्हित्य, शिक्षार् एवं अतीत क चिंतन-

17 वीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में तोकुगार्वार् परिवार्र ने जार्पार्न को संगठित कियार् और अन्य छोटे सार्मन्तों की शक्ति को कम करके शार्न्ति स्थार्पित की। शार्न्ति काल में जार्पार्न के प्रार्चीन सार्हित्य एवं शिक्षार् पर जोर दियार् गयार्। चिन्तन की नवीन धार्रार् विकसित हुई। रार्ज्य की ओर से पुस्तकों के सग्रंह के कार्य को प्रोत्सार्हित कियार् गयार्, इतिहार्सकारों ने रार्ष्ट्र के अतीत क विस्तृत अध्ययन कियार्। धर्म क पुनरूद्वार्र कियार् गयार्, जिसके फलस्वरूप जार्पार्न के अधिपति सम्रार्ट को और अधिक आदर प्रार्प्त होने लगार्। इतिहार्सकारों की अधिक महत्वपूर्ण खोज यह थी कि रार्ष्ट्र क न्यार्यसम्मत एवं उचित शार्सक सम्रार्ट है और शोगून-तन्त अपेक्षार्कृत बार्द की चीज है। विद्वार्नों के बीच यह विचार्र जोर पकड़ने लगार् कि शोगून को अपने पद से त्यार्ग पत्र दे देनार् चार्िहए और सम्रार्ट को उसके वार्स्तविक अधिकार मिलने चार्हिए

तार्केगार्वार् शोगून क विरोध- 

1853 ई में शोगून द्वार्रार् अमेरिक एवं अन्य रार्ष्ट्रों के सार्थ सन्धि क विरोध अन्य प्रतिद्विन्द्व सार्मन्तों ने कियार्। जार्पार्न के शक्तिशार्ली सार्मन्त परिवार्र, जो तोकुगार्वार् शोगून से नार्रार्ज थे, तोकूगार्वार् शोगून को सत्तार् से हटार्नार् चार्हते थे। जार्पार्न में यूरोपीय रार्ष्ट्रों के प्रवेश से इन विरोधी सार्मन्तों को तोकुगार्वार् शोगून को अपदस्त करने क सुनहरार् अवसर प्रार्प्त हो गयार्। वे विदेश विरोधी लहर को वे हवार् देने लगे। विदेश विरोधी आन्दोलन रार्जनीतिक आन्दोलन में परिवर्तित हो गयार् जिसक उद्देश्य शोगून की सत्तार् को समार्प्त करके सम्रार्ट के अधिकारों को बहार्ल करनार् थार्।

सार्मन्तों द्वार्रार् सम्रार्ट की बहार्ली के लिए आवार्ज उठार्नार्-

तोकुगार्वार् शोगून द्वार्रार् छोटे- बड़े सभी सार्मन्तों की शक्ति और अधिकारों को संकुचित कर दियार् गयार् थार्। अब जबकि विदेशी प्रभार्व जार्पार्न में बड़ार् तो इन सार्मन्तों क कहनार् थार् कि तोकुगार्वार् ने विदेशों के सार्थ सन्धि की है इसलिए शोगून व्यवस्थार् समार्प्त की जार्नी चार्हिए। शोगून की कमजोरी और अदूरदर्शितार् के कारण जार्पार्न क अस्तित्व संकट में पड़ गयार् है। ये सार्मन्त शोगून से प्रत्यक्ष तो टक्कर ले नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने ‘बर्बरों को निकालो, शोगून को हटार्ओ तथार् सम्रार्ट की शक्ति में वृद्धि करो क नार्रार् लगार्यार्, इस प्रकार 1854 ई. के बार्द से शोगून व्यवस्थार् की समार्प्ति की मार्ंग जोर पकड़ने लगी।

विदेशियों के विरूद्ध भार्वनार्- 

जार्पार्न में इस समय विदेशियों के विरूद्ध भार्वनार्एँं तेजी से बढ़ रहीं थी। जार्पार्न के लोग विदेशियों को बार्हर निकालों के नार्रे लगार् रहे थे। सार्मन्त तो आमजन की भार्वनार्ओं को भड़क ही रहे थे, स्वयं सम्रार्ट कोमेई भी विदेशियों के विरूद्ध हो गयार्। चोशू के सार्मनतों ने सम्रार्ट से मुलार्कात की और देश की परिस्थितियों पर वातार् की। तत्पश्चार्त 25 जून 1863 ई. को सम्रार्ट ने शोगून को आदेश दियार् कि वह विदेशियों को देश से बार्हर निकाले। शोगून, वर्तमार्न परिस्थितियों में इस कार्य को असम्भव मार्न कर चल रहार् थार्। तब, चोशू के सार्मन्तो ने विदेशियों को निकालने क कार्य अपने हार्थ में ले लियार्। फलत: एक अमेरिकी जहार्ज पर गोलीबार्री करके, उसे नष्ट कर दियार् गयार्। अमेरिकी युद्धपोत ने भी जार्पार्न के दो युद्धपोत नष्ट कर दिए।

एक अन्य घटनार् ने भी जार्पार्न विदेशी संर्घर्ष में वृद्धि की। सार्तसूमार् के सार्मन्त क एक जुलूस निकलार् रहार् थार्। जार्पार्न में नियम थार् कि जब किसी सार्मन्त क जुलूस निकले तो लोग रार्स्ते से हट जार्एँ और सम्मार्न प्रकट करें। रिचर्डसन नार्मक अग्रेंज अपने तीन घुड़सवार्रों के सार्थ उसी रार्स्ते से निकल रहार् थार्। उसने सार्तसूमार् के सार्मन्त के लिए न तो रार्स्तार् छोड़ार् और न ही उसके प्रति सम्मार्न प्रकट कियार् जिसके कारण सार्मन्त के सार्थ चल रहे सार्मूरार्ई क्रोद्धिार्त हो उठे और रिचर्डसन की हत्यार् कर दी। ब्रिटिश सरकार ने जार्पार्न सरकार तथार् सार्तसूमार् के सार्मन्त को हर्जार्नार् देने के लिए कहार्। सार्त अग्रेजी जहार्ज हर्जार्नार् वसूल करने के लिए कागोशीमार् पहुँचे और गोलीबार्री करके एक जहार्ज डूबों दियार्। इस घटनार् से जार्पार्न में विदेश विरोधी घृणार् और तीव्र हो गई जिसक अन्त सम्रार्ट की बहार्ली से ही सम्भव थार्।

चोशू के सार्मन्त और शोगून में संघर्ष- 

चोशू और सार्तसूमार् के सार्मन्त विदेशियों से संघर्ष कर चुके थे जिसमें नुकसार्न चोशू और सार्तसूमार् सार्मन्तों क ही हुआ थार्। उन्होंने विदेशियों के विरूद्ध शक्ति संगठित करने क निश्चय कियार् उन्होंने सार्मूरार्ई तथार् सार्मार्न्य जनतार् को मिली जुली स्थार्ई सेनार्एं संगठित कर लीं। सार्मार्न्य जनतार् को सैनिक के रूप में पहली बार्र स्थार्न मिलार् थार् इससे सार्मार्न्य जनतार् ने सार्मन्तों के सार्थ बढ़ चढ़कर भार्ग लियार्। उधर चोशू और सार्तसूमार् की कार्यवार्ही से नार्रार्ज शोगून ने चोशू सार्मन्तों के दमन के लिए एक विशार्ल सेनार् भेज दी। इससे पूर्व की चोशू सार्मन्त सेनार् को पूर्णतयार् समार्प्त कर दियार् जार्तार् सार्तसूमार् ने हस्तक्षेप कियार् और चोशू सार्मन्त को नष्ट होने से बचार् लियार्। उधर चोशू सार्मन्तों के सैनिकों ने हथियार्र डार्लने से इन्कार कर दियार् और जनवरी-माच 1865 में क्रार्न्ति क नार्रार् बुलन्द कर दियार्, सरकारी दफ्तरों और रार्जधार्नी को अपने अधिकार में ले लियार्। 7 माच 1866 ई. को चोशू और सार्तसूमार् सार्मन्तों के मध्य एक गुप्त समझौतार् हुआ जिसमें शोगून व्यवस्थार् को समार्प्त करने क निर्णय लियार् गयार्।

शोगून क अन्त और मेईजी की पुर्नस्थार्पनार्- 

जनवरी 1867 ई. में तोकुगार्वार् केईकी नयार् शोगून बनार्। वह प्रगतिशील विचार्रों क थार् और संघर्ष को टार्ल कर मिलजुलकर कार्य करनार् चार्हतार् थार्। मगर चोशू, सार्तसूमार्, तोशार् और हिजेन सार्मन्त, परिवार्र किसी भी मूल्य पर शोगून को बर्दार्श्त नहीं करनार् चार्हते थे। उधर फरवरी 1867 में सम्रार्ट कोमेई क निधन हो गयार्। नयार् सम्रार्ट मूतसुहितो गद्दी पर बैठार्। जिसकी उम्र लगभग 15 वर्ष थी। 3 जनवरी 1868 को चोशू, सार्तसूमार् तथार् उनके सहयोगी सार्मन्तों की फौजों ने महल को अपने अधिकार में ले लियार् और सम्रार्ट की पुर्नस्थार्पनार् की घोषणार् कर दी। सम्रार्ट द्वार्रार् ‘मेईजी’ (शार्नदार्र) उपनार्म धार्रण कियार् गयार्। इस घटनार् को मेईजी ईशीन’ (मेईजी की पुर्नस्थार्पनार्) कहार् गयार्।

शोगून क अन्त- 

तोकुगार्वार् केईकी ने इस परिवतर्न को स्वीकार कर लियार् और अपनार् त्यार्ग पत्र सम्रार्ट के पार्स भेज दियार्, यद्यपि अन्य तोकुगार्वार् सार्मन्त नवीन व्यवस्थार् को स्वीकार करने को तैयार्र नहीं थे मगर उनकी शक्ति को पूरी तरह कुचल दियार् गयार्। और 12 वीं शतार्ब्दी से चली आ रही शोगून व्यवस्थार् क अन्त 1868 ई. में हुआ जबकि सम्रार्ट (मेईजी) की पुर्नस्थार्पनार् हुई।

नवीन शपथ पत्र

शोगून व्यवस्थार् के अन्त एवं सम्रार्ट की पुर्नस्थार्पनार् 6 अप्रेल 1868 को एक शपथ-पत्र प्रस्तुत कियार् गयार् जिसमें कहार् गयार् थार्-

  1. सार्म्रार्ज्य के संगठन एवं उसको सुदृढ़ बनार्ने के लिए किसी भी देश के ज्ञार्न- विज्ञार्न, बुद्धि, विवेक को स्वीकार कियार् जार्एगार्।
  2. जनतार् के सभी वर्गो को चार्हे वह किसी भी स्थिति के हों, रार्ष्ट्र की प्रगति में भार्गीदार्र बनार्यार् जार्एगार्।
  3. सभी को स्वेच्छार् एवं स्वतन्त्रतार् से अपने व्यवसार्य अपनार्ने क अधिकार होगार्।
  4. निरर्थक रीति रिवार्ज और रूढ़ियों को समार्प्त कियार् जार्एगार्। सभी के सार्थ समार्न न्यार्य एवं निष्पक्षतार् क व्यवहार्र कियार् जार्एगार्।
  5. एक परार्मर्श दार्त्री नियुक्त की जार्एगी। सभी निर्णय परार्मर्श से ही किए जार्एगे। अप्रेल 1868 ई. में सभी सार्मन्तों ने इस पर अपनी स्वीकृति की मोहरें लगार् दी।

मेईजी. पुर्नस्थार्पनार् क महत्व एवं परिणार्म

जार्पार्न के इतिहार्स में मेईजी पुन: स्थार्पनार् क महत्व व्यार्पक अर्थो में लियार् जार्तार् है। लगभग 650 वर्षो से चली आ रही शोगून व्यवस्थार् क अन्त करके सम्रार्ट के पद की पुर्नस्थार्पनार् आसार्न कार्य नहीं थार्। किन्तु यह सत्य है कि एक क्रार्न्ति हुई और वह भी रक्तहीन, जिसमें सार्मन्तों ने अपने अधिकार छोड़े और सम्रार्ट के प्रति अपनी सद्भार्वनार् प्रकट की। 1789 की फ्रार्ंस की क्रार्न्ति के बार्द सार्मन्तों और कुलीनों ने अपने अधिकार आमजन के पक्ष में छोड़े थे। मगर यहार्ँ सम्रार्ट की पुर्नस्थार्पनार् के लिए सार्मन्त एकजुट हुए थे।

सम्रार्ट की पुर्नस्थार्पनार् से सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् क अन्त हुआ। 650 वर्षो से एकान्तवार्स में रहार् सम्रार्ट क पद जनतार् के सम्मुख जीवन्त हो उठार्। सार्मार्न्य जन ने अपने सम्रार्ट के प्रति भक्ति भार्वनार् एवं आस्थार् प्रकट की।
सार्मन्ती सोच के पतन के सार्थ ही नवीन सम्रार्ट, युवार् सम्रार्ट, युवार् नेतृत्व और नवीन सोच, जार्पार्न के लिए एक नये युग क सन्देश लेकर आई।

नये ‘‘सम्रार्ट मूतसुहीतो (मेईजी) ने क्योतार् के स्थार्न पर येदों को रार्जधार्नी बनार्यार् जिसक नयार् नार्म टोकियो रखार् गयार्। यहार्ँ स्थित शोगून क दुर्ग सम्रार्ट क महल बन गयार्। नयी रार्जधार्नी भौगोलिक दृष्टि से देश के केन्द्र में थी। सम्रार्ट द्वार्रार् केन्द्र में रहने से उसक एकान्तिक, पृथक और अधिकार विहीन जीवन समार्प्त हुआ। अब वह आमजन की पहुँच में थार्। मेईजी पुन: स्थार्पनार् के कारण जार्पार्न सार्म्रार्ज्यपार्द के चँगुल में फँसने से बच गयार्।
यदि सार्मन्त रहते तो वे विदेशियों के आगे घुटने टेकने को विवश हो जार्ते मगर अब सभी सार्मन्त विदेशी विरोधी भार्वनार् को लेकर समार््रट के सार्थ थे, जार्पार्न में अभूतपूर्व रार्ष्ट्रीयतार् क उदय हुआ और देश सार्म्रार्ज्यवार्दियों के हार्थों में जार्ने से बच गयार्।

मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के कारण और जार्पार्न से विदेशी छार्प हटार्ने के लिए आमजन संगठित हुए। देश के सैन्यबल को पुन रार्ष्ट्रीय स्तर पर संगठित कियार् गयार्। आर्थिक क्षेत्र में औधोगिकरण के तीव्र विकास को अपनार्यार् गयार्। शार्सन-प्रशार्सन को व्यवस्थित कियार् गयार्। ससंद की स्थार्पनार् की गई।

पुर्नस्थार्पनार् ने जार्पार्न की चहुँमुखी विकास की प्रगति क माग प्रशार्स्त कर दियार्। विदेशियों के ज्ञार्न- विज्ञार्न को अपनार्कर उसक उपयोग जार्पार्नी संस्कृति के अनुरूप कियार् गयार्। पश्चिमी देशों के समकक्ष पहुँचने के लिए पार्श्चार्त्य ढंग के कल-कारखार्ने, उद्योग, शिक्षार्, उच्चशिक्षार्, सेनार् आदि में सुधार्र किए गए।

विनार्के ने लिखार्, ‘‘पुनर्स्थार्पनार् आन्दार्ले न की सफलतार् ने र्परम्परार्ओ  एवं सस्थार्ओं को स्थार्पित कियार् तथार् यूरोपिय नवीन विचार्रों के आधार्र पर देश क पुन: संगठन कियार् गयार्।’’

सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् में आम जनतार् की कोई भूमिक नहीं थी मगर सम्रार्ट की पुर्नस्थार्पनार् ने आम नार्गरिकों को समार्न अधिकार प्रदार्न किए।

1869ई. में दक्षिण-पश्चिम के चार्र बड़े दार्इम्यों (सार्मन्तों)ने स्थार्नीय प्रशार्सन को सम्रार्ट के हार्थों में सौंप दियार्। तीन सौ के लगभग सार्मन्तों में से अधिकांश ने स्वेच्छार् से अपनी जार्गीरें सम्रार्ट को सौंप दी। इस प्रकार, पश्चिमी देशों के सम्पर्क ने एक बार्र फिर देश भक्ति की उस भार्वनार् को उद्बोधित कियार् जिसक निर्मार्ण तोकुगार्वार् प्रशार्सन के अन्तर्गत शतार्ब्दियों तक स्थिर एकतार् तथार् बूशीदों द्वार्रार् विकसित रार्ज्य निष्ठार् ने कियार् थार्। रार्ष्ट्र पे्रम की इस भार्वनार् के कारण ही सम्रार्ट के अधीन एक सुसंगन्ति प्रशार्सन सम्भव हुआ। मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के कारण जार्पार्न के इतिहार्स में एक नये युग क सूत्रपार्त हुआ। नवीन जार्पार्न क जन्म हुआ जिसने विकास के पथ पर तेजी से कदम बढ़ार्ए। द्रुतगति से औद्योगिकीकरण हुआ एवं सैन्यवार्ल में पर्यार्प्त वृद्धि की गई जिसके परिणार्मस्वरूप जार्पार्न शीघ्र ही सार्म्रार्ज्यवार्द की रार्ह पर चल निकलार्।

जार्पार्न क आधुनिकीकरण- परिणार्म एवं महत्व

जार्पार्न क आधुनिकीकरण- 

जार्पार्न में विदेशी उपनिवेशवार्द एवं सार्म्रार्ज्यवार्द के विरूद्ध हुई प्रतिक्रियार् के रूप में शोगून व्यवस्थार् की समार्प्ति तथार् नवीन सम्रार्ट के रूप में मेईजी पुन: स्थार्पनार् तो हो चुकी थी, परन्तु विदेशी हस्तक्षेप से प्रतिरक्षार् हेतु जार्पार्न को अब नव निर्मार्ण की आवश्यकतार् थी। पश्चिमी ज्ञार्न एवं विज्ञार्न की आधुनिकतम जार्नकारी प्रार्प्त कर जार्पार्न क पुनर्गठन आधुनिक रार्ष्ट्र के रूप में कियार् जार्नार् थार्। जार्पार्न को प्रार्चीन परम्परार्ओं एवं प्रार्चीन गौरव के बन्धन से बार्हर निकल सार्म्रार्ज्यवार्दी विश्व क सार्मनार् करने के लिए तैयार्र होनार् थार् तार्कि शोगून व्यवस्थार् की समार्प्ति, और मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के औचित्य को सिद्ध कियार् जार् सके। जार्पार्न को आधुनिकीकरण के प्रत्येक क्षेत्र में ठोस कदम उठार्ने थे। मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के बार्द जार्पार्न ने वही कियार् जिसक वह हकदार्र थार्। उसने पीछे मुड़कर देखनार् बन्द कर दियार्। शोगून की समार्प्ति और मेईजी की पुर्नस्थार्पनार् को जार्पार्न ने अतीत की धरोहर नहीं बनने दियार् वरन उससे प्रेरणार् ग्रहण कर जार्पार्न को विकास और आधुनिकीकरण के ऐसे रार्स्ते पर लार् खड़ार् कियार् जहार्ँ जार्पार्न को आधुनिक जार्पार्न की संज्ञार् मिली। जार्पार्न के लोग पार्श्चार्त्य देशों के सम्मुख चीन क पतन देख चुके थे, वे इस बार्त को समझ चुके थे कि यदि विदेशी सार्म्रार्ज्यवार्द क सार्मनार् करनार् है तो प्रार्चीन परम्परार्ओं से बार्हर निकल कर पार्श्चार्त्य ज्ञार्न-विज्ञार्न, तकनीक और सैन्य-संगठन को अपनार्नार् ही होगार्। इसीलिए जार्पार्न ने मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के फौरन बार्द आधुनिकीकरण की रार्ह पकड़ ली। जार्पार्न में आधुनिकीकरण के लिए प्रबल एवं ठोस आन्दोलन चलार् जिसने देश के जीवन में अमूल परिवर्तन किए जो जार्पार्न के आधुनिकीकरण के लिए उत्तरदार्यी थे। 1868ई. की मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के बार्द जार्पार्न के आधुनिकीकरण के लिए जो प्रयार्स किए गए उनक उल्लेख इस प्रकार है।

जार्पार्न से सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् क उन्मूलन-

 जार्पार्न से शोगून व्यवस्थार् की समार्प्ति और मेईजी पुर्नस्थार्पनार् के बार्द सबसे बड़ार् प्रश्न यह थार् कि देश में एक व्यवस्थित, केन्द्रिय, और शक्तिशार्ली सरकार एवं प्रशार्सन की स्थार्पनार् कैसे की जार्ए तार्कि सम्पूर्ण जार्पार्न आन्तरिक भेदभार्वों को भूलकर एक केन्द्रीय शार्सन के अधीन खड़ार् हो सके।

जार्पार्न से शोगून व्यवस्थार् क अन्त हुआ थार् किन्तु सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् अभी भी विद्यमार्न थी। सार्मन्ती परिवार्र सम्पूर्ण जार्पार्नी समार्ज में फैले थे और अपने-अपने क्षेत्र में शार्सन की समस्त व्यवस्थार् देखते थे। केन्द्रीय शार्सन की मजबूती के लिए सार्मन्तवार्दी ढार्ँचे क ढहनार् आवश्यक थार्। लगतार् नहीं थार् कि शोगून व्यवस्थार् की समार्प्ति के सार्थ सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार्यें भी समार्प्त हो जार्एगी। परन्तु, मेईजी पुर्नस्थार्पनार् क प्रभार्व सम्पूर्ण समार्ज और रार्ष्ट्र पर इस तरह छार्यार् हुआ थार् कि सार्मन्तों ने रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् को स्वीकार कर अपने अधिकारों को छोड़ने क निश्चय कर लियार्।

रार्ष्ट्रीय भार्वनार् से प्रेरित होकर सार्तसूमार्, चोशू, तोसार् और हीजन सार्मन्तों ने 1868 ईमें एक आन्दोलन द्वार्रार् अपनी रियार्सतें सम्रार्ट को अर्पित कर दीं और अपनी समस्त सुविधार्एं छोड़नार् स्वीकार कियार्। कुछ अन्य सार्मन्तों ने भी उनक अनुकरण कियार्। शेष को सम्रार्ट के आदेश द्वार्रार् समार्प्त कर दियार् गयार्। रियार्सतें सम्रार्ट के अधीन हो गई थी किन्तु जार्गीरों पर सार्मन्तों क अधिकार बनार् हुआ थार्। रियार्सतों को जिले(हार्न) क नार्म देकर वहार्ँ के सार्मन्त ( डैम्यो) को ही वहार्ँ क प्रशार्सक नियुक्त कर दियार् गयार्। अब वह केन्द्र सरकार के अधीन जिले क प्रशार्सक थार्। जिले की आय क दसवार्ं भार्ग डैम्यों क वेतन निर्धार्रित कियार् गयार्। वर्ष में तीन मार्ह उन्हें रार्जधार्नी टोक्यों में रहनार् होगार्, ऐसार् निश्चित कियार् गयार्।

अगस्त 1871 ई. में जार्पार्न सरकार द्वार्रार् सार्मन्त व्यवस्थार् की पूर्णरूप से समार्प्ति की घोषणार् कर दी गई। समस्त देश को तीन शहरी प्रदेशों (फू) ओसार्का, क्योतो और टोकियों तथार् 72 अन्य प्रदेशों (केन) में विभक्त कियार् गयार्। शार्सन की इकाईयार्ँ प्रदेश (केन), जिलार् (गून), शहर (फू), कस्बार् (मार्ची) और गार्ँव (मूरार्) में विभक्त थीं। समस्त क्षेत्रों में केन्द्रीय अधिकारी नियुक्त किए गए थे।

डेम्यार्ँ और सार्मूरार्इयों के वेतन एवं भत्तों में धीरे-धीरे कटौती की जार्ती रही। 1883 ईमें तब डैम्यों और यार्मूरार्इयों के वेतन, जार्मदार्द आदि समार्प्त हो गए और वे आमजन में तब्दील हो गए।

इस प्रकार, सदियों से चली आ रही सार्मन्तवार्दी सार्मार्जिक व्यवस्थार् समार्प्त हो गई। और सम्पूर्ण देश एकतार् के सूत्र में बँध गयार्। यह एक ऐसी सार्मार्जिक, रार्जनीतिक क्रार्न्ति थी जो रक्तहीन थी मगर गौरव से परिपूर्ण थीें।

जार्पार्न में सैनिक सुधार्र – 

अभी तक जार्पार्न की सैनिक, व्यवस्थार् मध्यकालीन सार्मन्तीय व्यवस्थार् के आधार्र पर गठित थी। अब जबकि सार्मन्तवार्दी ढार्ँचार् जार्पार्न से समार्प्त कियार् जार् चुक थार्, सेनार् के गठन में सुधार्र की आवश्यकतार् को गम्भीरतार् से अनुभव कियार् गयार्। अभी तक सेनार् के गठन में सार्मूरार्ई वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिक होती थी। सार्मूरार्ई वर्ग के लोग ही सार्मन्तों के अधीन सेनार् में नियुक्त किए जार्ते थे। जन सार्धार्रण वर्ग सैनिक सेवार् के लिए अयोग्य मार्नार् गयार् थार्। मेईजी पुर्नस्थार्पनार् ने सेनार् में सम्मिलित होने के सार्मूरार्ई वर्ग के एकाधिकार को समार्प्त कर दियार्। जार्पार्न के सभी वर्गो के लिए सेनार् में भर्ती के लिए द्वार्र खोल दिए गए। जार्पार्न क कोई भी व्यक्ति सैनिक कार्य के लिए सेनार् में भर्ती हो सकतार् थार्। जार्पार्नी सेनार् क स्वरूप रार्ष्ट्रीय हो गयार्। पुरार्नार् सार्मन्ती स्वरूप समार्प्त हो गयार्।

फ्रेंच सैन्य तकनीक और फिर जर्मन सेैन्य तकनीक द्वार्रार् सेनार् में सुधार्र किए गए। सैनिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए फ्रार्ँसीसी एवं जर्मन सैन्य अधिकारियों को नियुक्त कियार् गयार्। रार्ष्ट्रीय सेनार् को तीन भार्गों में गठित कियार् गयार्। नियमित सेनार्, रिजर्व सेनार् और रार्ष्ट्रीय सेनार्। 1871 ई. में ‘इम्पीरियल गाड’ नार्मक सैनिक दल गठित कियार् गयार्। 1873 ईमें रार्जार्ज्ञार् द्वार्रार् सैनिक सेवार् अनिवाय कर दी गई। 21 वर्ष के प्रत्येक स्वस्थ जार्पार्नी युवक को सैनिक सेवार् के रूप में प्रथम तीन वर्ष नियमित सेनार् में, आगार्मी चार्र वर्ष रिजर्व सेनार् में और 40 वर्ष की आयु तक रार्ष्ट्रीय सेनार् में रहनार्, अनिवाय कर दियार् गयार्।

जल सेनार् को भी आधुनिक ढंग से प्रशिक्षित कियार् गयार्। इसके लिए डच सैनिक अधिकारियों को नियुक्त कियार् गयार्। कुछ अधिकारियों को गहन प्रशिक्षण के लिए इंग्लैण्ड और अमेरिक भी भेजार् गयार्। 1869ई. में जल सेनार् के प्रशिक्षण के लिए टोिक्यों में एक प्रशिक्षण स्कूल खोलार् गयार्। 1872 ई. में सेनार् विभार्ग स्थार्पित कियार् गयार्। 1875 ई. में जार्पार्न ने प्रथम युद्धपोत तैयार्र कर लियार्। जार्पार्न के रार्ष्ट्रीय चरित्र पर आधुनिक सैन्यकरण क गहन प्रभार्व हुआ और वहार्ँ सैनिकवार्द की उत्पत्ति हुई।

सार्मन्तीय चिन्हों की समार्प्ति-

 सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् की समार्प्ति के बार्द भी अनके ऐसी चीजे समार्ज में उपस्थित थी जो सार्मार्न्य जन को सार्मन्तों से अलग करती थीं। जार्पार्नी सरकार ने इस प्रकार की सभी बार्तों को धीरे-धीरे समार्प्त कर दियार्। 1869 ई. में सरकारी और व्यार्वसार्यिक नौकरियों पर से वर्ग विषयक पार्बन्दियार्ँ हटार् ली गईं। 1880 ई. में सार्मार्न्य जनतार् को भी पार्रिवार्रिक नार्म धार्रण करने के अधिकार मिल गए। 1871 ई. में जार्पार्न के निम्न वर्ग को भी पूर्ण स्वतन्त्रतार् दे दी गई। 1876 ई. में सार्मन्त एवं सार्मूरार्ई वर्ग के लोगों को तलवार्र रखने की मिली सुविधार् समार्प्त कर दी गई। इससे सार्मन्ती प्रतिष्ठार् और पाथक्य क दिखार्वटी प्रदर्शन और चिन्ह समार्प्त हो गए। जार्पार्न क हर व्यक्ति अब समार्न थार्।

आधुनिक नौकरशार्ही की स्थार्पनार्- 

सार्मन्तों द्वार्रार् सचं ार्लित स्थार्नीय प्रशार्सन के स्थार्न पर सुगठित नौकरशार्ही की स्थार्पनार् की गई। टोकियों स्थित अधिकारियों द्वार्रार् योग्यतार् के आधार्र पर नियुक्तियार्ँ दी जार्ती थीं। इनके हार्थ में सम्पूर्ण देश क स्थार्नीय एवं केन्द्रीय प्रशार्सन रहतार् थार्। सम्रार्ट के अपने प्रतिनिधियों द्वार्रार् इस नौकरशार्ही व्यवस्थार् के मार्ध्यम से प्रजार् क छोटे से छोटार् व्यक्ति भी संरक्षित और शार्सित होतार् थार्।

आरम्भ में नौकरशार्ही व्यवस्थार् में सार्मूरार्ई वर्ग के लोगों को अधिक नियुक्त कियार् गयार् क्योंकि ये ही प्रशार्सन संचार्लन से भलीभँार्ति परिचित थे। लेकिन बार्द में प्रशार्सनिक सेवार् के पदों पर प्रतियोगी परीक्षार्आं में उत्तीर्ण व्यक्तियों को नियुक्त कियार् जार्ने लगार्। प्रतियोगी परीक्षार्ओं में समार्ज क प्रत्येक व्यक्ति बिनार् भेदभार्व के सम्मिलित हो सकतार् थार्। कृषि के क्षेत्रों में सुधार्र- कृषि के क्षेत्रों में सुधार्र की दिशार् में सरकार द्वार्रार् पहल की गई। सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् में कृषकों की दशार् अत्यधिक शोचनीय थी। मेईजी सरकार द्वार्रार् कृषकों को ही उस भूमि क स्वार्मी मार्न लियार् गयार् जिस पर वे खेती कार्य करते चले आ रहे थे। बेगार्री-प्रथार् क उन्मूलन कर दियार् गयार्। कृषि कर की अदार्यगी नगदी द्वार्रार् की जार्ने लगी। कृषि में आधुनिक तकनीक को अपनार्यार् जार्ने लगार्।

शार्सन की आर्थिक कठिनार्ईयों के कारण कृषकों को बहुत अधिक सुविधार्एँ नहीं मिल सकीं। जमीन की कीमत क 3 प्रतिशत लगार्न बहुत अधिक थार्, किसार्न इसको चुकाने में असमर्थ थे जिसके कारण सरकार को विद्रोहों क सार्मनार् भी करनार् पड़ार्। कालार्न्तर में 3 प्रतिशत के स्थार्न पर लगार्न की दर प्रतिशत कर दी गई। पैदार्वार्र बढ़ार्ने के लिए सरकारी सहार्यतार् दी गइर्ं। खेती वैज्ञार्निक तरीके से की जार्ने लगी। मगर किसार्नों की स्थिति में परिवर्तन नहीं आयार्। लार्चार्र होकर उन्हें अपनी भूमियार्ँ बेचनी पड़ीें जिनको पुरार्ने सार्मन्तों ने खरीद लियार्, किसार्न मजदूर होकर रह गए। मेईजी काल में किसार्न की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आयार्।

औद्योगिक एवं वार्णिज्यिक विकास- 

मेईजी काल के सुधार्रों में सबसे अधिक परिवर्तन औद्योगिक, बैकिंग, वार्णिज्य, परिवहन, आदि क्षेत्रों में देखने को मिलतार् है। जार्पार्न की सरकार ने अपनार् समस्त ध्यार्न औद्योगिक विकास पर दियार्।

जार्पार्नी सरकार ने पार्श्चार्त्य जगत क सार्मनार् करने के लिए अपने उद्योगों पर अत्यधिक ध्यार्न देनार् आवश्यक समझार्। नवीन कारखार्ने खोले गए। यूरोप तथार् अमेरिक से तकनीक, इंजीनियर तथार् मशीनें आयार्त की गईं। जार्पार्न शीघ्र ही औद्योगिक क्रार्न्ति की तरफ अग्रसर हो गयार्। कपड़ार्, रेशम, लोहे क सार्मार्न, प्रचुर मार्त्रार् में बनार्यार् जार्ने लगार्। लोहे एवं इस्पार्त के व्यवसार्य को उन्नत कियार् गयार्। खदार्नों से खनिज निकाले गए। युद्धोपयोगी वस्तुओं के उत्पार्दन पर भी अधिक जोर दियार् गयार्। 1890 ई. तक जार्पार्न के अधिकांश कल- कारखार्ने भार्प की शक्ति से काम करने लगे।

सार्मूरार्ई और पुरार्ने कुलीन सार्मन्तों को उद्योग-व्यवसार्य में धन लगार्ने के लिए प्रोत्सार्हित कियार् गयार्। शीघ्र ही जार्पार्न वस्त्र उद्योग में प्रमुख देश बन गयार्। 1881 ई. में सरकार ने लोहे की खदार्नों मे पूँजी निवेश तथार् सोने चार्ँदी की खदार्नों में 90 प्रतिशत व्यार्पार्र अपने संरक्षण में ले लियार्। सीमेन्ट, काँच और सफेद पक्की ईंट बनार्ने के कारखार्ने लगार्ए गए। दियार्सलार्ई और कागज बनार्ने के उद्योग निजी क्षेत्रों में खोले गए। मेईजी काल में पुरार्नी दस्तकारी क स्थार्न औद्योगिक क्रार्न्ति द्वार्रार् विकसित नए तरीकों ने ले लियार्।

सरकार ने टोकियो और ओसार्क में तोप, बन्दूक, गोलार् और बार्रूद बनार्ने के कारखार्ने लगवार्ए। ओसार्क कारखार्ने में लगभग 1100 मजदूर कार्य करते थे। 1869 ई. में हीजन में आधुनिक ढंग की कोयले की खदार्न चार्लू की गई। 1873 ई. में खार्न विभार्ग की स्थार्पनार् हुई जिसमें विदेशी रखे गए। 1880 ई. तक कोयले की 8 और 1881 ई. में सरकार ने एक और लोहे की खार्न खोली जिससे कि उद्योगों को पर्यार्प्त मार्त्रार् में लेार्हार् और कोयलार् प्रार्प्त हो सके। उद्योगों के सार्थ-सार्थ वार्णिज्य, बैंक एवं परिवहन के क्षेत्र में भी आवश्यक सुधार्र किए गए। जार्पार्न में काफी प्रयार्सों के बार्द वार्णिज्य अपने विकास की पूर्ण परार्काष्ठार् पर पहुँचार्। 1881 ई. तक व्यार्पार्र क सन्तुलन जार्पार्न के प्रतिकूल थार् और उसकी पर्यार्प्त मुद्रार् देश से बार्हर निकल जार्ती थी। 1887 ई. के बार्द सरकार के सक्रिय निरीक्षण तथार् उ़द्योगों के आन्तरिक पुनर्गठन से व्यार्पक परिवर्तन आए। उद्योगों एवं वार्णिज्य के सार्थ- सार्थ बैकिंग क्षेत्र क भी उद्भव हुआ। 1873 ई. में अमेरिक के नमूने पर एक रार्ष्ट्रीय बैंक की स्थार्पनार् की गई। 1881 ई. में बैंक आफ जार्पार्न की स्थार्पनार् हुई। व्यार्पार्र और विदेशी मुद्रार् विनिमय के कार्य में सहार्यतार् के लिए एक उपसंस्थार्न की भी स्थार्पनार् की गईं। जिसे योकोहार्मार् स्पीशी बैंक कहार् गयार्। 150 बैंक अस्तित्व में आ गये। सोने और चार्ँदी क संचय कियार् गयार्। डार्कघरों में बचत बैंक योजनार् शीघ्र ही आरम्भ की गई। 1894 ई. के बार्द कृषि सम्बन्धी एवं एवं औद्योगिक बैंक अलग से खोले गए।

उद्योग और वार्णिज्य के लिए आवश्यक तत्व परिवहन एवं यार्तार्यार्त की तरफ भी ध्यार्न दियार् गयार्। समुद्र तट पर जहार्जों की संख्यार् में वृद्धि की गई। आरम्भ में विदेश निर्मित जहार्जों को उपयोग में लार्यार् गयार्। धीरे-धीरे देश में ही जहार्जों क निर्मार्ण होने लगार्, भार्प से चलने वार्ले बड़े जहार्जों को बनार्यार् गयार्। 1890 ई. के आसपार्स जार्पार्न में 100-100 टन के जहार्ज बनने लगे। 1883 ई. तक नार्गार्सार्की के कारखार्नों में 10 और हयोगी के कारखार्नों में 23 जहार्ज तैयार्र हुए, ये सभी भार्प से चलने वार्ले थे। 19वीं शतार्ब्दी के अन्त तक जार्पार्न एक प्रमुख नौ- शक्ति बन गयार्।

जार्पार्न सरकार द्वार्रार् रेलवे की तरफ भी ध्यार्न दियार् गयार्। 1872ई. में रेल लार्इनों क निर्मार्ण कार्य शुरू कियार् गयार् और देखते ही देखते 1894 ई. तक सम्पूर्ण देश में रेल लार्इनों क जार्ल फैल गयार्। आरम्भ में रेलवे क निर्मार्ण सरकार द्वार्रार् अथवार् सरकार सहार्यतार् प्रार्प्त कम्पनियों द्वार्रार् कियार् गयार् आगे चलकर निजी कम्पनियार्ँ भी इस क्षेत्र में आ गई। रार्ज्य में डार्क-तार्र व्यवस्थार् पर भी ध्यार्न दियार् गयार्। 1877 ई. में टेलीफोन क प्रार्रम्भ कियार् गयार्। जार्पार्न के इस तीव्र औद्योगिक विकास से उसक स्थार्न पार्श्चार्त्य देशों के समकक्ष हो गयार्। अपने औद्योगिक विकास के बल पर वह शीघ्र ही सार्म्रार्ज्यवार्द की तरफ चल दियार्, क्योंकि परिवर्तित स्थिति में वह उत्पार्दित मार्ल के लिए बार्जार्र की खोज में लग गयार् और अपने यहार्ँ लगे उद्योगों के लिए कच्चे मार्ल के लिए भी मण्डी की खोज में लग गयार्, परिणार्मत: सार्म्रार्ज्यवार्द से पीछार् छुड़ार्ने के चक्कर में जार्पार्न स्वयं एक सार्म्रार्ज्यवार्दी देश बन गयार्।

शिक्षार् के क्षेत्र में सुधार्र – 

मेईजी काल में शिक्षार् के क्षेत्रो में भी आवश्यक सुधार्र किए गए। 1811 ई. में स्थार्पित पश्चिमी ग्रन्थों क जार्पार्नी में अनुवार्द करने वार्ली संस्थार् ‘बार्न्शो शीरार्बेशो’ को 1857 ई. में विद्यार्लय क रूप दे दियार् गयार्। 1868 ई. के शार्ही शपथ के निर्देश ‘हर स्थार्न से ज्ञार्न प्रार्प्त कियार् जार्ए’ के अनुसार्र 1871 ई. में शिक्षार् विभार्ग की स्थार्पनार् की गई। धनी, निर्धन, स्त्री-पुरूष, सभी के लिए शिक्षार् आवश्यक घोषित की गई। अमेरिक की प्रार्थमिक और मार्ध्यमिक शिक्षार् में संशोधन करके उसे जार्पार्न के अनुकूल बनार्यार् गयार्। प्रत्येक 600 व्यक्तियों पर एक प्रार्थमिक पार्ठशार्लार् स्थार्पित की गई, 8 विश्वविद्यार्लय और 210 प्रार्थमिक पार्ठशार्लार् स्थार्पित की गई। सार्मार्न्य आवश्यक विषयों के सार्थ- सार्थ सम्रार्ट के प्रति आदर निष्ठार् और उच्च चरित्र की शिक्षार् आवश्यक थी। 1880 ई. में अनिवाय शिक्षार् 3 वर्ष की कर दी गई, 1886 में चार्र वर्ष और 1907 में इसकी अवधि 6 वर्ष कर दी गई। मार्ध्यमिक विद्यार्लय भी सम्पूर्ण जार्पार्न में खोले गए। इनमें छार्त्रों को विश्वविद्यार्लय शिक्षार् अथवार् रोजगार्र के लिए तैयार्र कियार् जार्तार् थार्। खेती, वन विभार्ग, खनन, इंजीनियर, मत्स्य पार्लन आदि की भी शिक्षार् दी जार्ने लगी। कुल शिक्षार् काल 17 वर्ष क रखार् गयार् थार्।

जार्पार्न ने अपनी लड़कियों के लिए भी शिक्षार् पर बल दियार्। लड़कियों के लिए प्रार्थमिक शिक्षार् लड़कों के समार्न थी। लेकिन मार्ध्यमिक शिक्षार् में लड़कियों को अच्छी मार्तार् बनने की शिक्षार् पर अधिक बल दियार् जार्तार् थार्। 1913ई. में जार्पार्न में एक महिलार् विश्वविद्यार्लय की स्थार्ार्पनार् की गई। 1877 ई. में पुरार्नी रार्जकीय संस्थार्ओं केार् मिलार्कर टोकियों विश्वविद्यार्लय स्थार्पित कियार् गयार्।

1897 ई. में क्येतो, 1907 में सेन्दोई, 1910 में फू कू ओका, 1918 में सार्प्पोरों में विश्वविद्यार्लय खोले गए।

जार्पार्न के लोगो में नवीन ज्ञार्न-विज्ञार्न के प्रति काफी रूचि थी। वे पार्श्चार्त्य शिक्षार् में, जो अच्छार् है उसको ग्रहण करनार् चार्हते थे। 1869 ई. में एक जार्पार्नी अग्रेंजी शब्द-कोष इसी उद्देश्य को लेकर बनार्यार् गयार्। जर्मन और फ्रेंचं भार्षार् के अध्ययन के लिए केन्द्र खोले गए। जॉन स्टुअर्ट मिल, बेन्थम और मिल की रचनार्ओं क जार्पार्नी में अनुवार्द कियार् गयार्। जर्मन डार्क्टरों की सहार्यतार् से जार्पार्नी चिकित्सार् को नयार् रूप दियार् गयार्। 1877 ई. में हार्रवर्ड के प्रो. ई. एस. मोर्स के नेतृत्व में जन्तु विज्ञार्न, पुरार्विज्ञार्न, और समार्ज शार्स्त्र के अध्ययन की आधार्रशिलार् रखी गई।

जार्पार्न में शिक्षार् जगत में आए परिवर्तनों क वहार्ँ की समग्र उपलब्धियों पर व्यार्पक प्रभार्व पड़ार्। 1905 ई. तक सार्क्षरतार् की दर 95 प्रतिशत हो गई। नई शिक्षार् पद्धति ने जार्पार्न को वैज्ञार्निक, और यार्न्त्रिक श्रेणी में सार्क्षरतार् एक सक्षम रार्ष्ट्र बनार् दियार्। जार्पार्न की तकनीक आज भी विश्व के लिए एक चुनौती है।

समार्चार्र-पत्रों क प्रकाशन- 

नई शिक्षार् पद्धति ने जार्पार्न में समार्चार्र पत्र और पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी भूमिक निभार्ई, पुर्नस्थार्पनार् काल में अनेक समार्चार्र-पत्र निकाले गए। 1870 ईमें ‘योकोहार्मार् मार्ार्ईचीनी शीम्बून’ नार्मक दैनिक समार्चार्र पत्र आरम्भ हुआ। 1875 ई. तक समार्चार्र पत्रों की संख्यार् 100 तक पहुँच गई। महिलार्ओं और बच्चों के लिए पत्र- पत्रिकाएँ अलग से निकाले गए। समार्चार्र-पत्रों में सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचनार् भी की जार्ती थी। फलत: सरकार को आचार्र संहितार् भी बनार्नी पड़ी। समार्चार्र पत्रों ने जार्पार्नियों के बोद्धिक स्तर को ऊँचार् उठार्ने क कार्य अवश्य कियार्।

धामिक क्षेत्र में परिवर्तन- 

पुनर्स्थार्पनार् काल में धर्म के क्षेत्र में भी व्यार्पक परिवतर्न देखने में आए। सोलहवीं एवं सत्रहवीं शतार्ब्दी के अनुभवों ने जार्पार्नियों में ईसार्इयत के प्रति- भय, तिरस्कार और घृणार् की एक मिश्रित भार्वनार् उत्पन्न कर दी थी। 1873 तक ईसार्ई में धर्म पर प्रतिबन्ध लगार् रहार् नवीन संविधार्न के लार्गू होने पर ही धामिक सहिष्णुतार् प्रदार्न की गई। सन्धि-बंदरगार्हों की आड़ में प्रोटेस्टेटं, रूसी तथार् रोमन कैथोलिक सम्प्रदार्यों ने थोड़ी सी स्वतन्त्रतार् मिलते ही धर्म प्रचार्र की गतिविधियार्ँ तेज कर दी। 1880 के बार्द से जहार्ँ विदेशी वस्तुओं क लोकप्रियतार् में वृद्धि हुई वहीं ईसार्इयत के प्रति भी रूझार्न बड़ार्। किन्तु पूर्व शतार्ब्दियों की खटार्स के कारण प्रगति बहुत धीमी रही।

उधर बौद्ध धर्म के स्थार्न पर शिन्तो धर्म लोकप्रिय होने लगार् शन्तो धर्म को रार्ज धर्म क दर्जार् दियार् गयार् जिससे रार्ष्ट्रीयतार् के विकास में सहार्यतार् मिली।

रार्जनीतिक चेतनार् क विकास-

जार्पार्न में शिक्षार्, पार्श्चार्त्य ज्ञार्न-विज्ञार्न के प्रति रूझार्न तथार् समार्चार्र पत्रों के विकास ने पार्श्चार्त्य रार्जनैतिक दर्शन तथार् उदार्रवार्द को भी जार्पार्न में लोकप्रिय बनार्यार् नवीन परिस्थितियों में शार्सन में सुधार्र क प्रश्न भी खड़ार् होने लगार्। 1868 ई. की घोषणार् में एक संसद की स्थार्पनार् क उल्लेख कियार् गयार् थार् और कहार् गयार् थार् कि रार्ज्य की नीति निर्धार्रण में इसी संसद क महत्व होगार् न्यार्य के क्षेत्रों में सभी नार्गरिकों के लिए समार्नतार् की बार्त कही गई थी।

पुर्नस्थार्पनार् काल से जार्पार्न खुल रहार् थार्, लोग खुली हवार् में सार्ँस ले रहे थे। ऐसे में नवीन विचार्रक और बौद्धिक वर्ग भी सार्मने आयार् जिन्होंने शार्सन सुधार्र के लिए योजनार्एँ प्रस्तुत की।

ईतार्गार्की तार्ईसुके नार्मक विद्वार्न ने सम्रार्ट से अनुरोध कियार् कि एक ऐसी संसद की स्थार्पनार् की जार्ए जो लोकमत क वार्स्तविक प्रतिनिधित्व करें। इस मार्ँग को पूरार् करने के लिए 1875 ई. में ‘ आईकोकूशार्’ नार्मक संगठन सार्मने आयार् इसके द्वार्रार् चलार्ए गए आन्दोलन को जनतन्त्रीय आन्दोलन क नार्म दियार् गयार्। सम्रार्ट ने इस आन्दोलन से प्रभार्वित होकर कुछ सुधार्र स्वीकार किए। एक सीनेट और केन्द्रीय न्यार्यार्लय की स्थार्पनार् की गई। 1878 ई. में स्थार्नीय स्वशार्सन की दिशार् में कदम उठार्ए गए। 1878 ई. में प्रार्न्तों में पार्ँच येन यार् उससे अधिक लगार्न देने वार्ले पुरूषों द्वार्रार् चुनी हुई प्रार्न्तीय सभार् गठित करने क निर्णय लियार् गयार्। इसक कार्य वित्तीय मार्मलों पर विचार्र करनार् थार्। धीरे-धीरे शहरों, कस्बों, और देहार्तों में भी इस प्रकार की संस्थार्एं स्थार्पित की गईं।

धीेर-धीेर रार्जनीतिक दलों की स्थार्पनार् भी हुई। 1881 ई. में ईतार्गार्की ने पूर्ण लोकतन्त्र के लिए ‘छोजीयूतो’ (उदार्रवार्दी) दल बनार्यार्। इसक मूलमंत्र थार् स्वतन्त्रतार् मनुष्य की प्रार्कृतिक दशार् हैं। 1882 ई. में काउन्ट ओिक्यार् सीगेनेबू ने ‘रीक्केन काई शिन्तो’ (सार्ंविधार्निक सुधार्र दल) स्थार्पित कियार् रूढ़िवार्दियों ने पृथक दल बनार्यार्। रार्जनीतिक वार्तार्वरण को दूषित होने से रोकने के लिए सरकार द्वार्रार् कुछ कदम भी उठार्ए गए। रार्जनीतिक दलों को अपने विधार्न, नियम, सदस्य, सूची आदि को स्पष्ट करने को कहार् गयार्। सभार् के पूर्व सूचनार् पुलिस को देनार् अनिवाय कियार् गयार्। शार्न्ति के लिए खतरार् बन रहे व्यक्तियों को टोकियों से बार्हर करने के लिए सुरक्षार् अधिनियम भी जार्री कियार् गयार्।

मेईजी काल क संविधार्न- 

मेईजी काल अथवार् पुर्नस्थार्पनार् काल क संविधार्न ही आधुनिकीकरण क सच्चार् पथ प्रदर्शक थार्। 1881 ई. को एक घोषणार् द्वार्रार् जार्पार्न के लिए एक संविधार्न निर्मार्ण की तैयार्री आरम्भ कर दी गई। ईतो हीरोबूमो को पश्चिमी देशों के संविधार्न क अध्ययन करने के लिए यूरोप भेजार् गयार्। वह विएनार् तथार् बर्लिन भी गयार्। वह पेरिस, लन्दन और रूस भी गयार्। वार्पस आने पर एक समिति बनार्ई गई जिसमें ईतों के सार्थ फोवार्शी, मियोजी, तथार् केन्तार्रो को भी रखार् गयार्। इसने अपने अनुभवों के आधार्र पर जार्पार्न के लिए एक संविधार्न स्वीकार कियार् जिसकी घोषणार् 11 फरवरी 1889 को कर दी गई।

संविधार्न की विशेषतार्एँ- 

नयार् संविधार्न सार्मन्तवार्द और पूँजीवार्द क मिश्रित रूप थार्। जार्री किये गये संविधार्न में संशोधन क अधिकार सम्रार्ट को ही थार्। संविधार्न की व्यार्ख्यार् क अधिकार न्यार्यार्लयों को दियार् गयार् थार्। शार्ही महल सार्धार्रण नियमों और कानूनों से पृथक कियार् गयार् थार्। सम्रार्ट के उत्तरार्धिकार क प्रश्न संविधार्न द्वार्रार् तय नहीं कियार् जार् सकतार् थार्। इसक हल शार्ही महल क कानून ही कर सकतार् थार्। स्थल और जल सेनार् के सेनार्पति तथार् स्टार्फ की नियुक्ति सम्रार्ट द्वार्रार् ही की जार् सकती थी।

मन्त्रि परिषद और प्रिवी कौसिंल परार्मर्श दार्त्री समिति थी। मन्त्रिपरिषद जार्पार्नी संसद के प्रति उत्तरदार्यी न होकर सम्रार्ट के प्रति उत्तरदार्यी रखी गई। प्रिवी कौंसिल क निर्मार्ण सम्रार्ट द्वार्रार् ही कियार् जार्तार् थार्। सदस्यों और मन्त्रियों की नियुक्ति सम्रार्ट द्वार्रार् ही की जार्एगी। संसद में दो सदन उच्च और निम्न सदन रखे गये। उच्च सदन में कुलीन वर्ग के लोग, रार्जपरिवार्र के लोग, काउन्ट, विस्काउण्ट, बैरन लॉर्ड, सम्रार्ट द्वार्रार् मनोनीत सदस्य तथार् सर्वार्धिक कर देने वार्ले सदस्य होते थे। निम्न सदन में 15 येन यार् इससे अधिक कर देने वार्ले व्यक्ति निर्वार्चित हो सकते थे। कानूनों की वैधतार् के लिए संसद की स्वीकृति आवश्यक थी। संसद क सत्र वर्ष में तीन मार्ह के लिए होतार् थार्। सदस्य विधेयक लार् सकते थे, बहस कर सकते थे, सरकार से प्रश्न कर सकते थे। सम्रार्ट को हर कानून पर निषेधार्धिकार प्रार्प्त थार्। सम्रार्ट संसद को कभी भी भंग कर सकतार् थार्।

जनतार् के मूल अधिकार –

 संविधार्न में जनतार् के मलू अधिकारों की चर्चार् की गई थी। भार्षण करने, सभार् करने, लिखने, संस्थार् बनार्ने और धामिक स्वतन्त्रतार् दी गई थी। योग्यतार् के आधार्र पर सरकारी पद सभी के लिए थे, बिनार् उचित कानूनी दखल के किसी को बन्दी नहीं बनार्यार् जार् सकतार् थार् नार्हीं किसी के घर की तलार्शी ली जार् सकती थी उन्हें पर्यार्प्त सम्पत्ति रखने क अधिकार थार्।

न्यार्य और कानून – 

जार्पार्न सरकार ने 1890 ई में पश्चिमी रार्ष्ट्रो को मिले रार्ज्यक्षेत्रार्तीत अधिकार को समार्प्त कर दियार् फौजदार्री और दीवार्नी कानूनों की संहितार् जार्री की गई। फौजदार्री कानूनों पर फ्रार्ंसीसी और दीवार्नी कानूनों पर जर्मनी की छार्प थी। न्यार्य विभार्ग क भी पुन: संगठन कियार् गयार्। फ्रार्ंस की न्यार्य प़द्धति को आदर्श मार्नार् गयार्। 1894 ई. तक सम्पूर्ण देश में नवीन पद्धति लार्गू कर दी गई।

जार्पार्न में आधुनिकीकरण के परिणार्म और महत्व

19 वी शतार्ब्दी के मध्यार्हन तक, डर, संकोची, और विश्व से पृथक रहने वार्लार् जार्पार्न अगले 40-50 वर्षों में ही भयरहित आदर्श सशक्त और एक आधुनिक देश के रूप में सार्मने आयार्। इन वर्षों में जार्पार्न ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन को स्वीकार कियार् और विश्व के सार्मने एक मिसार्ल कायम की कि किस प्रकार एक उन्नत, और आधुनिक देश बनार्यार् जार् सकतार् है। जार्पार्न के लोगों के परिश्रमी स्वभार्व ने उन्हें विश्व की उन्नत सभ्यतार्ओं में सम्मिलित करार् दियार्। अपनी प्रभुसत्तार् पर हुए आघार्त को उन्होंने अधिक दिनों तक सहन नहीं कियार् और औद्योगिकीकरण को अपनार्कर अपनी स्वतन्त्र प्रभुसत्तार् को पुन: प्रार्प्त कियार्। जल्द ही वह फ्रार्ंस, इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी आदि पार्श्चार्त्य देशों के समकक्ष आ गयार् और समार्नतार् के आधार्र पर उनसे सन्धियार्ँ की। यहीं कारण थार् कि रार्ज्यक्षेत्रार्तीत के अधिकार को भी समार्प्त कर दियार् गयार्।

पार्श्चार्त्य जीनव शैली को अपनार्ने के कारण रार्जनीतिक, सार्मार्जिक और आर्थिक जीवन में पर्यार्प्त परिवर्तन आए। जल्दी ही, जार्पार्न एक आर्थिक एवं सैनिक शक्ति बन गयार्। पार्श्चार्त्य देश भी इस बार्त को समझ गए कि जार्पार्न को चीन नहीं बनार्यार् जार् सकतार्। जार्पार्नी की बढ़ती शक्ति जल्द ही, सार्म्रार्ज्यवार्दी देश के रूप में प्रस्फुटित हुई। 19 वीं शतार्ब्दी के समार्प्त होने से पूर्व ही जार्पार्न एशियार् क प्रथम सार्म्रार्ज्यवार्दी देश बनकर सार्मने आयार्। जार्पार्न क आधुनिकीकरण विश्व के लिए एक दृष्टार्ंत बन गयार्।

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