जार्पार्न में उपनिवेशवार्द एवं सार्म्रार्ज्यवार्द

16वीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में यूरोप की जार्तियों ने उत्तरी अमेरिका, एशियार्, आस्ट्रेलियार्, अफ्रीक आदि में बड़े पैमार्ने पर उपनिवेशवार्द तथार् सार्म्रार्ज्यवार्द की नीति क अनुसरण कियार्। उपनिवेशवार्द एवं सार्म्रार्ज्यवार्द जनतार् क रार्जनीतिक, आर्थिक तथार् सार्ंस्कृतिक दृष्टि से शोषण क प्रतीक थार्। जब किसी रार्ष्ट्र विशेष के कुछ लोग अपनी मार्तृभूमि छोड़कर किसी पिछड़े हुए (किन्तु संसार्धनों से भरपूर) देश में जार्कर बस जार्ते हैं और वहार्ँ के संसार्धनों पर अपनी पकड़ बनार्कर उनक उपयोग अपने हित में करते हैं तो इस नीति को उपनिवेशवार्द कहार् जार्तार् हैं। सार्म्रार्ज्यवार्द उपनिवेशवार्द से कुछ भिन्न है। जब एक रार्ष्ट्र विशेष के लेार्ग दूसरे रार्ष्ट्र की आर्थिक लूट करते हैं तो उसे सार्म्रार्ज्यवार्द कहार् जार्तार् है। इस व्यवस्थार् में एक रार्ष्ट्र दूसरे रार्ष्ट्र की स्वतन्त्रतार् क अपहरण कर लेतार् है और उसके समस्त आर्थिक रार्जनीतिक संसार्धनों क उपयोग अपने हित में करने लगतार् है। सार्म्रार्ज्यवार्दी देश के लोग अपने द्वार्रार् नियुक्त कुछ लोगों के मार्ध्यम से ही विजित देश क शार्सन चलार्ते हैं। आर्थिक लूट उपनिवेशवार्द एवं सार्म्रार्ज्यवार्द क मूल मन्त्र है।

आधुनिक उपनिवेशवार्द एवं सार्म्रार्ज्यवार्द क जन्मदार्तार् यूरोप थार्। पुर्तगार्ल, स्पेन, हार्ंलैण्ड, इंग्लैण्ड, फ्रार्न्स आदि इसके जन्म दार्तार् थे। यहार्ँ के निवार्सी 16वीं शतार्ब्दी से, ऐसे देशों की खोज में लग गए जिनके पार्स आर्थिक संसार्धन पर्यार्प्त मार्त्रार् में थे, किन्तु रार्जनीतिक दृष्टि से वे हार्शिए पर थे।

जार्पार्न के यूरोप के सार्थ प्रार्रम्भिक सम्पर्क

जार्पार्न एक लम्बे समय तक विश्व से पृथक रहने की नीति पर चलतार् रहार् थार्। 12वीं शतार्ब्दी तक यूरोप के लोग जार्पार्न के नार्म यार् उसके अस्तित्व से परिचित नहीं थे। तेरहवीं शतार्ब्दी में मंगोल दरबार्र में रहने वार्ले माको पोलो ने पहली बार्र जार्पार्न क नार्म सुनार्। पुर्नजार्गरण काल में, यूरोप के नार्विक जब एशियार् में समुद्री मागों की खोज कर रहे थे तो वे जार्पार्न भी पहुँच गए। 23 सितम्बर, 1543 को पुर्तगार्ली जार्पार्न की भूमि पर कदम रखने में सफल हो गए।सार्तसूमार् रियार्सत के लोगों ने पुर्तगार्लियों क स्वार्गत कियार् और वहार्ँ के डैम्यो (दार्इम्यों) ने उनसे आग्नेय शस्त्र क्रय किये और बन्दूक तथार् तोप बनार्ने की कलार् सीखी। 1555 ई. तक जार्पार्न के लोग तोप बनार्ने की कलार् में पार्रंगत हो गए। पुर्तगार्लियों के बार्द, 1549 ई. में कुछ ईसार्ई पार्दरी जार्पार्न पहुँच गए। जार्पार्न के डैम्यों ने उनक भी स्वार्गत कियार् और उन्हें अपने यहार्ँ धर्म-प्रचार्र की स्वीकृति दे दी। सोलहवीं शतार्ब्दी के अन्त तक स्पेनिश और 17वीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में डच तथार् अंग्रेज नार्विक और ईसार्ई पार्दरी भी वहार्ँ पहुँचने लगे। प्रार्रम्भ में, यूरोपियन लोग दक्षिण जार्पार्न तक ही सीमित रहे क्योंकि वे हिन्द महार्सार्गर, मलक्क और फिलिपार्इन्स होते हुए जार्पार्न पहुँचते थे। यूरोपियन लोगों ने नार्गार्सार्की में अपनी व्यार्पार्रिक बस्तियार्ँ (कोठियार्ँ) स्थार्पित कीं और वहीं से अपनार् व्यार्पार्र करने लगे। इस समय तक बड़ी संख्यार् में ईसार्ई धर्म प्रचार्रक जार्पार्न पहुँचने लगे थे। जार्पार्नी लोग उनक प्रसन्नतार् से स्वार्गत कर रहे थे। 16वीं शतार्ब्दी के अन्त तक ईसार्ईयों की संख्यार् 3,00,000 तक पहुँच गई।

यूरोपियन लोगों के विरूद्व जार्पार्न में प्रतिक्रियार्-

जार्पार्न ने यूरोप के लोगों के सार्थ घनिष्ठतार् के सम्बन्ध रखे और उनके व्यार्पार्र, धर्म, ज्ञार्न-विज्ञार्न आदि में अभिरूचि दिखार्ई और उनको ग्रहण भी कियार्। लेकिन यूरोप के लोगों की मूल भार्वनार् जल्द ही जार्पार्नियों के सार्मने आ गई। ईसार्ई पार्दरियों ने बहुत से जार्पार्नियों को ईसार्ई धर्म में ले लियार्। ईसार्ई धर्म ग्रहण करने वार्ले जार्पार्नियेार्ं में देशभक्ति की भार्वनार् क्षीण होने लगी। वे रोम के पोप को अपनार् प्रमुख मार्नने लगे और अपनी सरकार के खिलार्फ शिकायतें भेजने लगे। विदेशी धर्म प्रचार्रक सरकार विरोधी “ार्ड़यन्त्रों को जन्म देने लगे। शीघ्र ही जार्पार्नी सरकार और बौद्ध एवं शित्तों धर्म के अनुयार्यी चिन्तित हो उठे और ईसार्ई धर्म प्रचार्रकों की रोकथार्म के लिए आवार्जें उठने लगीं।

यूरोपियन लोग, जार्पार्नी भूमि पर, न केवल ईसार्ईयत पर जोर दे रहे थे वरन वे परस्पर भी एक दूसरे के विरूद्व षड़यन्त्र रच रहे थे। वे आपस में प्रतिस्पर्द्धार् करते थे और जार्पार्नियों को भड़काते थे। डच अंग्रेजों तथार् स्पेनियों के विरूद्व और अंग्रेज स्पेनियों तथार् डचों के विरूद्व जार्पार्नियों को भड़काते थे। इसक गलत प्रभार्व जार्पार्नियों पर पड़ रहार् थार् उनके मन में यूरोपियन के प्रति शंक उत्पन्न होने लगी। जार्पार्न के समुद्र तट यूरोपियन देशों के संघर्ष के केन्द्र बन गए। 1556 ई. में स्पेन क एक जहार्ज टूट गयार्, उसक मुख्य नियार्मक जार्पार्नी अधिकारियों के पार्स लार्यार् गयार्। पूछ-तार्छ के दौरार्न उसने कह दियार् कि उनकी नीति विदेशों में पहले व्यार्पार्री और धर्म प्रचार्रकों को भेजने की होती है, वहार्ँ अपनी पकड़ स्थार्पित करने के बार्द फौज भेजकर उस देश पर अपनार् अधिकार कायम कर लेते हैं। इसको सुनकर जार्पार्नी सार्वधार्न हो गए। इस बीच कुछ और घटनार्ओं से शोगून को यह विश्वार्स हो गयार् कि यूरोपियन क जार्पार्न में आगमन उचित नहीं है और उन पर प्रतिबन्ध आवश्यक है।

सर्वप्रथम ईसार्ईमत को रोकने के लिए कदम उठार्ए गए। 1587ई. में इस तरह क एक आदेश जार्री कियार् गयार्। 1614 ई. में धर्म प्रचार्र पर पूर्ण प्रतिबध लगार् दियार् गयार् और जार्पार्नी ईसार्ईयों को अपनार् मौलिक धर्मग्रहण करने क आदेश दियार् गयार्। इयेयार्सू (शोगून) ने ईसार्इमत क बहिष्कार घोषित कर दियार्। सभी गिरजार्घरों को नष्ट करने की आज्ञार् दे दी गई। ईसार्ई धर्म प्रचार्रकों ने जार्पार्न छोड़कर जार्ने से इन्कार कर दियार् और इधर-उधर छिप गए। इयेयार्सू कुछ और कर पार्तार् उससे पूर्व ही 1616 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। किन्तु उसके उत्तरार्धिकारियों ने भी ईसार्इयत के विरूद्व कार्य किए और उन पर नियन्त्रण स्थार्पित करने के प्रयार्स किए। हजार्रों की संख्यार् में धर्म प्रचार्रकों एवं धर्मार्न्तरित व्यक्तियों को गिरफ्तार्र कियार् गयार्। जिन्होंने ईसार्ई धर्म त्यार्गने से इन्कार कियार् उनको मौत की सजार् दी गई। 1623 ईईए मीतसू शोगून बनार्। 1624 ई. में उसने स्पेनियों को जार्पार्न छोड़कर चले जार्ने क आदेश दियार्। 1636ई. में पुर्तगार्लियों पर भी प्रतिबन्ध लगार् दियार् गयार्। 1638 ई. में विदेशी और देशी ईसार्ईयों ने संगठित होकर विद्रोह कर दियार् और नार्गार्सार्की के एक पुरार्ने किले से मुकाबलार् कियार्। सरकारी सेनार् ने विद्रोह को पूर्णतयार् कुचल दियार्। 3 अगस्त 1640 ई. को चार्र पुर्तगार्ली दूत और उसके 57 सार्थियों की हत्यार् कर दी गई। शेष बचे पुर्तगार्लियों को मकाओ भेज दियार् गयार्। इस प्रकार, जार्पार्न ने विदेशियों के सार्थ अपने सम्बन्ध पूर्णतयार् तोड़ दिए। डचों और चीनियेार्ं को कुछ प्रतिबन्धों के सार्थ व्यार्पार्र की अनुमति दी गई। डच धर्म प्रचार्र के चक्कर में न पड़कर केवल व्यार्पार्र करते थे, इसलिए ही उनको व्यार्पार्र करने की स्वीकृति दी गई। जार्पार्न ने विदेशियों पर प्रतिबन्ध लगार्कर स्वयं को पिंजरे में बन्द कर लियार्। अगली दो शतार्ब्दियों तक जार्पार्न एकान्तवार्स में रहार्। सभी देशवार्सियों को बौद्ध मन्दिरों में अपने नार्म क पंजीकरण अनिवाय कर दियार् गयार्। उनको बौद्ध धर्म की किसी न किसी शार्खार् के प्रति निष्ठार्वार्न होने के लिए कहार् गयार्।

जार्पार्नी अलगार्व क परिणार्म- 

विदेशियों पर प्रतिबन्ध लगार्कर, तार्के गु ार्वार् प्रशार्सन जार्पार्न में आन्तरिक एवं बार्ह्य शार्न्ति स्थार्पित करने में सफल हुआ। एक लम्बे समय से चली आ रही अव्यवस्थार् और गृह-कलह की भी इतिश्री हो गईं सैनिक सार्मन्तवार्द ने शक्ति के आधार्र पर जार्पार्न में आन्तरिक शार्न्ति स्थार्पित की थी और विदेशियेार्ं को बार्हर निकालने में सफलतार् मिली थी। तोकुगार्वार् पद्धति के कारण जार्पार्न परस्पर विरोधी परिवार्रों के एक समूह के बजार्य एक रार्ष्ट्र के रूप में कार्य करने लगार्। यद्यपि सार्मन्तवार्द के विभिन्न स्वरूपों को कायम रखार् गयार्। और सार्मन्ती जार्गीरों क भी अस्तित्व बनार् रहार् तथार्पि रार्ज्य की पूर्ण शक्ति शोगून में केन्द्रीत थी। जार्पार्नवार्सियों के लिए नवीन नियम प्रणार्ली प्रकाशित की गई, जिससे प्रजार् के कार्यों में नियमिततार् आ गई। प्रजार् में केन्द्रीय प्रशार्सन द्वार्रार् जार्री किए गए कानूनों क पार्लन करने क स्वभार्व विकसित होने लगार्।

शार्न्ति स्थार्पित हो जार्ने के कारण जार्पार्न अधिक सम्पन्न हुआ। कृषक एवं कारीगर उत्पार्दन कार्य में लग गए रार्ज्य ने भी कृषि को प्रोत्सार्हित कियार्। गार्ँवों में स्वार्यत्त-शार्सन की प्रगति हुई। आन्तरिक वार्णिज्य में वृद्धि हुई। सैन्य सरदार्रों क ध्यार्न युद्ध-कलार् से शार्न्तिकालीन आमोद-प्रमोद की ओर चलार् गयार्। नवीन महत्त्वार्कांक्षार्ए जार्गृत हुई। वार्णिज्यिक पूँजी में वृद्धि हुई और मुद्रार् प्रणार्ली में सुधार्र कियार् गयार्।

शिक्षार् और सार्हित्य क विकास हुआ। रार्जधार्नी तथार् दार्इम्यो (सार्मन्तों) के क्षेत्रों में स्कूल खोले गए। फलस्वरूप उज्जड सैनिकों के पुत्र पढ़ लिख गए। चीन के श्रेष्ठ सार्हित्यकारों की कृतियों क अध्ययन कियार् जार्ने लगार्। जार्पार्न के उच्च वर्ग में कनफ्यूशियस के कÍर समर्थकों में वृद्धि हुई। रार्ज्य ने पुस्तकों के प्रकाशन एवं संग्रह को प्रोत्सार्हित कियार्। इतिहार्सकारेार्ं को महत्त्व प्रदार्न कियार् गयार् और रार्ष्ट्र के अतीत को सार्मने लार्यार् जार्ने लगार्। चित्रकलार् और वार्स्तुकलार् क विकास हुआ। प्रार्चीन जार्पार्न अपनी संस्कृति को परिष्कृत करने में लग गयार्।

शार्न्ति, व्यवस्थार् और विकास के कारण समूरार्ई (यौद्धार्)वर्ग पतन को प्रार्प्त होने लगार्। ऐसे सैनिक वर्ग क अस्तित्व असंगत प्रतीत होतार् गयार् जिसक पोषण सम्पूर्ण रार्ष्ट्र द्वार्रार् कियार् जार् रहार् थार्। विलार्सितार् के कारण सार्मन्ती सैनिकों की शक्ति क्षीण होने लगी। प्रार्चीन काल में जिस प्रकार सम्रार्टों पर फ्यूजीवार्रार् और बार्द में शोगूनों क नियन्त्रण रहार् थार्, उसी प्रकार महार्न दार्इम्यो के उत्तरार्धिकारी भी अपने औपचार्रिक रक्षकों के नियन्त्रण में आने लगे। यहार्ँ तक कि कभी-कभी तो शोगून भी अपने मन्त्रियों से प्रभार्वित होकर कार्य करते दिखार्ई देने लगे।

सार्हित्य और भार्षार् के अध्ययन ने लोगों को इतिहार्स के प्रति चिन्तनशील बनार् दियार्। चीन के श्रेष्ठ सार्हित्य से भिन्न एक जार्पार्नी सार्हित्य क विकास हुआ। धर्म क पुनरूद्वार्र कियार् गयार्, जिसके फलस्वरूप जार्पार्नी सम्रार्ट को और अधिक आदर प्रार्प्त होने लगार्। रार्जनीतिक दृष्टि से इतिहार्सकारों की अधिक महत्वपूर्ण खोज यही थी कि रार्ष्ट्र क न्यार्यसम्मत एवं उचित शार्सक सम्रार्ट है और शोगून तंत्र सम्रार्ट के अधिकारों क अपहरणकर्त्तार् है। धीरे-धीरे यह विचार्र जोर पकड़ने लगार् कि सम्रार्ट को अपने उचित पद पर प्रतिष्ठार्पित कियार् जार्नार् चार्हिए। सम्रार्ट को फिर से अपने पद पर स्थार्पित करने में दक्षिण की बड़ी सार्मन्ती जार्गीरें प्रयत्न करने लगी थीं, इस प्रकार देखने में आयार् कि जिस शोगून व्यवस्थार् के कारण जार्पार्न के सार्मार्जिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में इतने परिवर्तन आए, अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं उसी क अस्तित्व खतरे में पड़ गयार् थार्।

जार्पार्न नवीन परिवर्तन की ओर अग्रसर- 

19वी  शतार्ब्दी के मध्यकाल तक जार्पार्न परिवर्तन के लिए तैयार्र थार्। पुरार्नी व्यवस्थार् जर-जर होकर गिरने के लिए तैयार्र थी। शोगून व्यवस्थार् क्षीण हेार् गई थी। धीरे-धीरे उन पर उनके मन्त्रियों क नियन्त्रण बड़ रहार् थार्। एक क्रार्न्ति क श्रीगणेश होनार् शेष थार्। परन्तु बार्ह्य हस्तक्षेप अथवार् बार्ह्य हवार् के अभार्व में क्रार्न्ति क स्वरूप क्यार् हेार्गार्, कहनार् कठिन थ। जार्पार्न जिस समय इतिहार्स के इस विचित्र संयोग से गुजर रहार् थार्, उसी समय उसक सम्पर्क एक बार्र फिर विस्तार्रोन्मुख पार्श्चार्त्य देशों के सार्थ हुआ और इस सम्पर्क सूत्र ने एक नये रार्ष्ट्र को जन्म दियार्।

जार्पार्न में प्रवेश के लिए पार्श्चार्त्य जगत क पुन: प्रयार्स- 

19वी शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ तथार् 18वीं शतार्ब्दी के अन्तिम चरण में रूस तथार् इंग्लैण्ड ने जार्पार्न के सार्थ सम्बन्ध तलार्शने के प्रयार्स किए। इस काल में प्रशार्न्त महार्सार्गर में यूरोपियन लोगों की हलचलें तेज हो गईं थीं। जार्पार्न की तरफ रूस के जहार्ज जार्ने लगे थे। रूस जार्पार्न के सार्थ घनिष्ठ सम्बन्धों क इच्छुक थार्। सन् 1792 ई. में एक रूसी प्रतिनिधि मण्डल जार्पार्न पहुँचार् परन्तु उसे केवल नार्गार्सार्की में उतरने की छूट मिली। 1804 ई. में एक अन्य रूसी प्रतिनिधि मण्डल नार्गार्सार्की पहुँचार् और जार्पार्न के सार्थ व्यार्पार्र करने की इच्छार् व्यक्त की। लेकिन जार्पार्न ने नकारार्त्मक उत्तर दियार्, जिससे दोनेार्ं के सम्बन्धों में तनार्व में वृद्धि हुई लेकिन रूस के लिए तार्त्कालीन परिस्थितियों में युद्ध सम्भव नहीं थार्।

रूस के बार्द इंग्लैण्ड ने भी एक बार्र पुन: जार्पार्न के सार्थ मित्रतार् क प्रयार्स कियार्। 1793 ई. में मेकार्टन को जार्पार्न में घुसने की छूट नहीं मिली। इसी क्रम में अंग्रेज और जार्पार्नी समुद्री नार्विकों में 1824 ई. में एक संक्षिप्त टक्कर भी हो गई। परिणार्मस्वरूप जार्पार्नी अक्षिार्कारियों ने 1825 ई. में एक आदेश निकालार् कि यदि कोई विदेशी जहार्ज जार्पार्न में उतरेगार् तो उस पर गोली चलार्ई जार्ए। जार्पार्नी नार्विकों एवं मछुआरों को कहार् गयार् कि वे विदेशियों के सार्थ सम्पर्क रखने के प्रयार्स न करें। इस प्रकार जार्पार्न 19वीं शतार्ब्दी के मध्यार्न तक एकलार् चलो की नीति पर चलतार् रहार्।

जार्पार्न में अमेरिक क प्रवेश और अमेरिका-जार्पार्न सन्धि 

जार्पार्न में अमेरिक के प्रयार्स-

जार्पार्न के प्रवेश द्वार्र सम्भवत: प्रथम बार्र सयुंक्त रार्ज्य अमेरिक के लिए खुले। अमेरिक द्वार्रार् जार्पार्न में रूचि लेने के विशेष कारण थे। 18वीं शतार्ब्दी के अन्तिम चरण तथार् 19वीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में रूसियों, अंग्रेजों और अमरीकियों ने उत्तर अटलार्ंटिक की खोज करने में सफलतार् प्रार्प्त कर ली थी। नेपोलियन के पतन के बार्द इन देशों ने व्यार्पार्र एवं वार्णिज्य को बढ़ार्वार् दियार्। औद्योगिक क्रार्न्ति के कारण भी व्यार्पार्रिक क्षेत्र विकसित हुए। वार्ष्प नौ परिवहन तथार् रेलों ने विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक कम समय में मार्ल ढोनार् प्रार्रम्भ कर दियार् थार्। संयुक्त रार्ज्य अमेरिक के विस्तार्र के कारण यूरोप के लोग प्रशार्न्त महार्सार्गर के पूर्वी तट तक पहुँचने लगे थे। प्रशार्न्त महार्सार्गर में अमेरिक की व्यार्पार्रिक गतिविधियार्ँ तीव्र गति से बढ़ रही थीं। सन् 1840-60 के बीच आरीगार्ँन और कैलिर्फोनियार् की स्थार्पनार् हुई। उधर इंग्लैण्ड ने अफीम युद्ध द्वार्रार् चीन के पार्ँच बन्दरगार्हों में प्रवेश की अनुमति प्रार्प्त कर ली। इसक जार्पार्न पर भी असर होनार् स्वार्भार्विक थार्। जार्पार्न क एकान्त टूटने के लिए तैयार्र थार्। 1847 ई. में इंग्लैण्ड के सम्रार्ट ने जार्पार्न को अपनी पृथकतार् की नीति छोड़ने की सलार्ह दी। 1849ई. में उसने जार्पार्न को चेतार्वनी भी दी कि एक अमरीकी जहार्जी बेड़ार् शीघ्र ही जार्पार्न के समुद्र तट में आने वार्लार् है।

प्रशार्न्त महार्सार्गर में अमरीक की रूचि लगार्तार्र बढ़ रही थी। ज्यों-ज्यों अमरीक ने अपने पैर पश्चिम की तरफ बढ़ार्ए त्यों-त्यों जार्पार्न के सार्थ उसक सम्पर्क अवश्यम्भार्वी नजर आने लगार्। अमेरिक के कई जहार्ज जार्पार्नी समुद्र तट पर टूट चुके थे। एक अमेरिकी जहार्ज जो कठिनार्ई में फँस गयार् थार् उसने जार्पार्न के बन्दरगार्ह में शरण मार्ँगी मगर उसे अनुमति नहीं मिली। अब तो, अमेरिक के लिए आवश्यक हो गयार् कि प्रशार्न्त महार्सार्गर में अपनार् वर्चस्व स्थार्पित करनार् है तो कुछ ऐसे बन्दरगार्ह नियन्त्रण में होने चार्हिए जहार्ँ संकटकाल में विश्रार्म लियार् जार् सके, जार्पार्न से अच्छार् आश्रय स्थल कोई और नजर नहीं आ रहार् थार्।

कामोडेार्रेपेरी क जार्पार्न में आगमन- 

20 जुलार्ई 1846 को अमेरिक नौसेनार् क एक अधिकारी कोमोडोर जेम्स विडिल दो जहार्ज लेकर एक जार्पार्नी बन्दरगार्ह पर पहुँचार् और उसने व्यार्पार्रिक सम्बन्धों की स्थार्पनार् के लिए प्राथनार् की लेकिन जार्पार्नी अधिकारियों ने अनुमति नहीं दी। 1849ई. में कोमोडोर जेम्स म्लिन नार्गार्सार्की के बन्दरगार्ह पर पहुँचार् जहार्ँ जार्पार्नी अधिकारियों ने 15 अमेरिकी नार्विकों को बन्धक बनार् लियार् थार्। परन्तु व्यार्पार्र के सम्बध में उसने कोई वातार् नहीं की।

सन् 1853ई. को अमेरिक सरकार ने कोमोडोर पेरी के नेतृत्व में एक मिशन जार्पार्न के लिए भेजार्। पेरी अफ्रीक और चीन क चक्कर लगार्कर चार्र युद्धपोतों के सार्थ यीडो (येदो) की खार्ड़ी में उतरार् और जार्पार्नी अधिकारियों से प्राथनार् की कि वे संकटग्रस्त अमेरिकी जहार्जों को जार्पार्नी बन्दरगार्ह पर ठहरने की अनुमति प्रदार्न करें, सार्थ ही कोयलार्-पार्नी आदि प्रार्प्त हो जार्ए एवं जार्पार्नी बन्दरगार्हों, के सार्थ व्यार्पार्र की स्वीकृति भी मिल जार्ए। उसने अमेरिकी रार्ष्ट्रपति फिलमोर क एक पत्र जार्पार्न के सम्रार्ट के नार्म दियार्। उसने उपहार्र के रूप में पश्चिमी तार्र और रेल के दो नमूने भी जार्पार्नी अधिकारियों को दिए। पेरी ने एक वर्ष बार्द पुन: आने की चेतार्वनी दी और कहार् कि वह पहले से अधिक शक्तिशार्ली बेड़ों के सार्थ आएगार् तब तक जार्पार्नी सरकार उसकी प्राथनार् पर सकारार्त्मक विचार्र कर ले। पेरी के जार्पार्न से वार्पस जार्ने के बार्द वहार्ँ खलबली मच गई। शोगून के मंत्री अत्यधिक व्यार्कुल हो उठे। रार्जदरबार्र की ओर से सभी बड़े बड़े देवार्लयों में प्राथनार्एँ करने क आदेश दियार् गयार्। जार्पार्नी प्रशार्सन नहीं समझ पार् रहार् थार् कि अमेरिक के सार्थ क्यार् कियार् जार्ए?

फरवरी 1854ई. में कोमोडोर पेरी तीन भार्प के जहार्ज और पार्ँच यार्न लेकर पुन: जार्पार्नी बन्दरगार्ह पर उतरार्। अमेरिक जार्पार्न के सार्थ किसी निर्णार्यक स्थिति में शीघ्र ही पहुँचनार् चार्हतार् थार् क्योंकि रूस और इंग्लैण्ड भी जार्पार्न के सार्थ सम्पर्क सार्धने में लगे थे। रूस के जार्र निकोलस प्रथम ने एडमिरल पूयार्तीन के नेतृत्व में नार्गार्सार्की में चार्र जहार्जों क एक बेड़ार् भी भेजार् थार्। पेरी के सार्थ तोपे, बन्दूके तथार् अनेक आग्नेय शस्त्र थे। उसके पार्स पार्श्चार्त्य जगत की अनेक ऐसी वस्तुएँ भी थीं जिनको देखकर जार्पार्नी आश्चयचकित हो गए। पेरी के भार्री अस्त्र-शस्त्र देखकर और उसके युद्धपोतों की शक्ति को देखकर शोगून चिन्तित हो उठार्। उसने तुरन्त डेम्यो में एक सभार् बुलार्ई। उसमें तरह-तरह के विचार्र व्यक्त किए गए। एक पक्ष, जो अमेरिक के सार्थ किसी भी प्रकार की सन्धि के विरूद्व थार्, क कहनार् थार् कि जार्पार्न की परम्परार्गत पृथकतार् और अलगार्व की नीति क ही अनुकरण जार्री रखनार् चार्हिए। यदि अमेरिक से किसी प्रकार की सन्धि की गई तो ‘पहले तो अमेरिक हमें शिक्षार् देंगे, औजार्र और मशीन देंगे, आग्नेय अस्त्र-शस्त्र यार् अन्य आरार्म की वस्तुएँ देंगे और फिर अपनी पकड़ बनार्कर हमें धोखार् देगे। वे धीरे-धीरे देश क धन चूसकर देश को निर्धन बनार् देंगे, अन्त में, वे हमार्री स्वार्धीनतार् भी छीन लेंगे।’ जबकि, दूसरे पक्ष क कहनार् थार् कि अमेरिक के सार्थ सन्धि करने से बचार् नहीं जार् सकतार्। फिर हमार्री नीति होनी चार्हिए हम अपने को बदलें तथार् पश्चिमी देशों के सार्थ सन्धियार्ँ करें, उनकी विधार्ओं और कलार्ओं को सीखकर अपने देश को सशक्त बनार्एँ तार्कि हम उनक मुकाबलार् करने में सक्षम हो सकें। अन्त में, दूसरे पक्ष की विजय हुई और जार्पार्नी अधिकारियों तथार् पेरी के बीच सन्धि के लिए वात्तार् प्रार्रम्भ हुई तथार् 31 माच 1854 ई. को एक सन्धि सम्पन्न हो गई।

कानार्गार्वार् की सन्धि- 

31 माच 1854 ई को कानार्गार्वार् की सन्धि के अनुसार्र निश्चित कियार् गयार् कि सन्धि के अनुसार्र अमेरिकी जहार्जों को केवल दो बन्दरगार्हों -येदों के पार्स के शिमोदार् तथार् उत्तरी द्वीप पर स्थित हार्कोदार्तें-पर आने की अनुमति दी गई। अमेरिकी जहार्जों को रसद, कोयलार्, पार्नी आदि लेने की छूट दी गई, वे जहार्जों की मरम्मत आदि कर सकते थे। शिमोदार् बन्दरगार्ह में अमेरिक अपनार् वार्णिज्य दूतार्वार्स खोल सकेगार्। व्यार्पार्रिक सुविधार्ओं के बार्रे में अधिक कुछ नहीं कहार् गयार् थार्। व्यार्पार्र केवल वहार्ँ के स्थार्नीय विनियमों के तहत कियार् जार् सकतार् थार्। जहार्ज पर ले जार्ने वार्ले मार्ल की खरीद भी केवल जार्पार्नी अधिकारियों के द्वार्रार् हो सकती थी। देार्नों देशों के प्रतिनिधियों के आदार्न-प्रदार्न की व्यवस्थार् भी हुई। यह भी निश्चित कियार् गयार् कि अन्य देशों को जार्पार्न जो भी अतिरिक्त सुविधार्एँ देगार् वे अमेरिक को स्वत: ही प्रार्प्त हो जार्एँगी। इस प्रकार, एक लम्बे समय से चलार् आ रहार् जार्पार्न क अलगार्व टूट गयार् और अब उसके सार्थ सम्बन्ध बनार्ने के लिए यूरोपीय रार्ष्ट्र दौड़ में सम्मिलित हो गए।

जार्पार्न-अमेरिक सन्धि के परिणार्म और शोगून व्यवस्थार् क अन्त

यूरोपीदेशों के सार्थ सन्धियार्ँ – 

अक्टबू र, 1854 मे, नार्गार्सार्की में एक ब्रिटिश अधिकारी जेम्स स्टर्लिंग द्वार्रार् सन्धि की गई। फरवरी 1855 में शिमोदार् में रूस के सार्थ सन्धि की गई। जार्पार्न ने जनवरी 1856 में डचों के सार्थ भी सन्धि कर ली। ‘सर्वार्धिक प्रियदेश’ की व्यवस्थार् के फलस्वरूप यह सन्धि चार्रों देशों के लिए लार्भकारी हो गई। 1856 ई. तक चार्रों रार्ज्यों को जार्पार्न में और भी अधिकार मिल गए। जार्पार्न के ऐकान्तिक जीवन क अन्त हो गयार्।

टार्उनसैण्ड हैैरी क आगमन- 

कानार्गार्वार् की सन्धि के अनुसार्र 1856 इर्. में टार्उनसडें हैरी अमेरिकी प्रतिनिधि की हैसियत से जार्पार्न पहुँचार्। जार्पार्नी बन्दरगार्ह शिमोदार् में वार्णिज्य दूतार्वार्स खोलार् गयार्, हेरी को उसक प्रथम अधिकारी बनार् कर भेजार् गयार् थार्। प्रार्रम्भ में जार्पार्नी लोगों क व्यवहार्र उसके प्रति शत्रु भार्व लिए हुए थार्। किन्तु हैरी व्यवहार्र कुशल और कूटनीतिज्ञ थार् उसने पर्यार्प्त धैर्य से कार्य कियार् और जार्पार्नी अधिकारी तथार् जार्पार्नी लोगों को पार्श्चार्त्य देशों से सम्बन्ध कायम करने के लार्भ बतार्ए। उन्हें रूस तथार् इंग्लैण्ड की शक्ति क डर भी दिखार्यार् कि किस प्रकार इंग्लैण्ड ने चीन को युद्ध में परार्जित करके सन्धि करने के लिए विवश कर दियार् थार्। वे जार्पार्न के सार्थ भी इसी प्रकार क व्यवहार्र कर सकते हैं। उसके तर्कों क जार्पार्नी अधिकारियों पर गहरार् प्रभार्व हुआ और वे अमेरिक को और अधिक सुविधार्ए देने को तैयार्र हो गए। अमेरिक के नार्गरिकों को प्रतिबन्धित बन्दरगार्हों पर आवार्स क अधिकार मिल गयार्, नार्गार्सार्की में भी अधिकार मिल गए।

जार्पार्न-अमेरिक सन्धि 1858- 

जार्पार्न धीरे- धीरे विदेशियों के प्रति अपने रूख में नर्मी लार् रहार् थार् जिसक प्रतिफल सन् 1858 में देखने को मिलार् जबकि 29 जुलार्ई 1858ई. को जार्पार्न और अमेरिक के मध्य एक और सन्धि हुई जिसकी शर्ते इस प्रकार थीं-

  1. शिमोदार् और हार्कोदार्ते के अतिरिक्त कानार्गार्वार् तथार् नार्गार्सार्की भी फौरन ही व्यार्पार्र के लिए खोल दिए गए।
  2. नीईगार्तार् और हयोगो को 1860 ई. से 1863ई. तक धीरे-धीरे खोलने की व्यवस्थार् की गई तथार् यीदो और ओसार्क में विदेशियों को बसने की स्वीकृति दे दी गई।
  3. क्षेत्रार्तीत अधिकार को मार्न्यतार् दी गई अर्थार्त् जो अमेरिकी जार्पार्न में निवार्स करेंगे उन पर अमेरिकी कानून लार्गू होंगे।
  4. जार्पार्न अपने आयार्त-निर्यार्त पर 5घ कर ले सकेगार् दोनों देशों की सहमति से ही कोई परिवर्तन सम्भव होगार्।
  5. विदेशी मुद्रार् जार्पार्न में चल सकेगी। जार्पार्न की मुद्रार् क भी निर्यार्त हो सकेगार्। 
  6. अमेरिक ने जार्पार्न को जहार्ज, हथियार्र और तकनीकी विशेषज्ञ उपलब्ध करार्ने क वचन दियार्।
  7. दोनेार्ं देश एक दूसरे के यहार्ँ दूत तथार् अधिकारियों की नियुक्ति कर सकेंगे।
  8. जार्पार्न में, अमेरिकियों को धामिक स्वतन्त्रतार् होगी।
  9. 4 जुलार्ई, 1872 को सन्धि को पुन: दोहरार्ने की शर्त रखी गई।

सन्धि की समीक्षार्- 

टार्उनसेंड हैरी ने उपरोक्त  सन्धि शोगून के सार्थ भय अथवार् शक्ति क डर दिखार्कर नहीं की थी वरन इस कार्य की सफलतार् क श्रेय मुख्यत: उसकी सहार्नुभूति, व्यवहार्र कुशलतार् तथार् दृढ़तार् थी। अमेरिकी सन्धि क अनुसमर्थन करने के लिए जार्पार्नी दूत अमेरिक भेजे गए। यह जार्पार्न से किसी विदेशी रार्ष्ट्र में जार्ने वार्लार् प्रथम रार्जनयिक प्रतिनिन्धिार् मण्डल थार्। इस सन्धि द्वार्रार् जार्पार्न ने अपरदेशीयतार् तथार् सन्धि द्वार्रार् प्रतिपार्दित शुल्क-पद्धति की व्यवस्थार् करके अंशत: अपने रार्ष्ट्रीय अधिकारों क बलिदार्न कर दियार् थार्। इन अधिकारों को पुन: प्रार्प्त करने के लिए उसको 40 वर्ष तक संघर्ष करनार् पड़ार्। अब विदेशियों पर से जार्पार्नी रार्जदरबार्र क नियन्त्रण समार्प्त हो गयार्। जार्पार्न क शुल्क-दर निर्धार्रण क अपनार् अधिकार छोड़नार् पड़ार्। क्षेत्रार्तीत अधिकार जार्पार्न की सम्प्रभुतार् पर सीधार् आक्रमण थार्। विदेशी मुद्रार् के विनियम की धार्रार् से भी जार्पार्न को ही नुकसार्न होने वार्लार् थार्। परिणार्म यही थार् कि जार्पार्न क प्रवेश द्वार्र अब पार्श्चार्त्य देशों के लिए खुल गयार् थार् और असहार्य जार्पार्न उनको बर्दार्श्त करने के लिए तैयार्र थार्। जार्पार्न के बन्द द्वार्र विदेशी व्यार्पार्र के लिए खुल गए। जार्पार्न में विदेशियों क प्रवेश, उनक वहार्ँ बसनार् और व्यार्पार्र करनार् एक विशिष्टतार् थी। इस कार्य के लिए न लड़ार्ई लड़ी गई, न क्षेत्र दबार्यार् गयार् और न छीनार्-झपटी यार् मार्रकाट हुई, सब कुछ बहुत आसार्नी से हो गयार्। जार्पार्न को क्षेत्रार्तीत मार्मले में अपमार्न क अवश्य सार्मनार् करनार् पड़ार् तथार्पि जार्पार्न द्वार्रार् अपनार् प्रवेश द्वार्र खोलनार् उसके अपने ही हित में थार्, सन्धि द्वार्रार् नही तो लड़ार्ई द्वार्रार् खोलनार् पड़तार्। जार्पार्न ने पश्चिमी देशों की तार्कत को समझार् और समयार्नुकूल कार्य कियार्। पश्चिम की उन्नत तकनीक को अपनार्ने में जार्पार्नियों ने किसी तरह क संकोच नहीं कियार्। इस सन्धि से जार्पार्न के सर्वार्ंगीण विकास क द्वार्र खुल गयार्।

जार्पार्न को अन्य रार्ष्ट्रों के सार्थ भी सन्धियार्ँ करनी पड़ी। 12 अन्य पश्चिमी रार्ष्ट्रों से जार्पार्न को ऐसी ही सन्धियार्ँ करनी पड़ी। इन सन्धियों से जार्पार्न पर पार्श्चार्त्य सार्म्रार्ज्यवार्द की काली छार्यार् पड़नार् स्वार्भार्विक थार्। जार्पार्न ने इसक सार्मनार् कैसे और किस रूप में कियार् यह आगे देखेंगे।

उपरोक्त सन्धि क सबसे बड़ार् परिणार्म एक और हुआ। सन्धि के कारण शोगून की बहुत बदनार्मी हुई। उसने पश्चिम के सार्मने घुटने टेक दिए थे। जार्पार्न में उसकी आलोचनार् होने लगीे तथार् उसके अन्त की मार्ँग की जार्ने लगी। सन्धियों की जटिलतार् क समार्धार्न शोगून के पार्स नहीं थार्। शोगून की समार्प्ति और सम्रार्ट की शक्ति की पुर्नस्थार्पनार् की मार्ँग बलबती होती गई जिसक परिणार्म 1868 ई. में देखने को मिलार् जबकि शोगून व्यवस्थार् क पूर्णत: अन्त हो गयार् और रार्जशक्ति की पुर्नस्थार्पनार् हुई।

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