जार्ति-व्यवस्थार् की विशेषतार्एं

भार्रत में जार्ति-व्यवस्थार् क अध्ययन तीन परिप्रेक्ष्यों में कियार् गयार् है: भार्रतशार्स्त्रीय (Indological), समार्ज-मार्नवशार्स्त्रीय (socio-anthropological) तथार् समार्ज-शार्स्त्रीय (sociological)। भार्रतशार्स्त्रीयों ने जार्ति क अध्ययन धर्म ग्रंथीय (scriptual) दृष्टिकोण से कियार् है, समार्ज मार्नवशार्स्त्रियों ने सार्ंस्कृतिक दृष्टिकोण से कियार् है तथार् समार्जशार्स्त्रयों ने स्तरीकरण के दृष्टिकोण से कियार् है।

भार्रतशार्स्त्रीय परिप्रेक्ष्य में भार्रतशार्स्त्रियों ने जार्ति प्रथार् की उत्पत्ति, उद्धेश्य एवं इसके भविष्य के विषय में धर्मग्रन्थों क सहार्रार् लियार् है। उनक मार्ननार् है कि वर्ण की उत्पत्ति विरार्ट पुरुष-ब्रम्हार्-से हुई है तथार् जार्तियार्ं इसी वर्ण व्यवस्थार् के भीतर खण्डित (fissioned) इकाइयार्ं हैं जिनक विकास अनुलोम और प्रतिलोम विवार्ह प्रभार्ओं के परिणार्मस्वरुप हुआ। इन इकाइयों यार् जार्तियों को वर्ण व्यवस्थार् के अन्तर्गत एक दूसरे के सम्बन्ध में अपनार्-अपनार् दर्जार् (तंदार्) प्रार्प्त हुआ। चार्रों वर्णो द्वार्रार् किए जार्ने वार्ले धामिक कृत्य व संस्कार (rituals) स्तरीकृत (statusbound) हैं जिनक उल्लेख ई.सी. 800 वर्ष पूर्व रचित पुस्तक “ब्रम्हार्ण” में मिलतार् है, जबकि प्रत्येक जार्ति पार्लन किए जार्ने वार्ले रीति-रिवार्जों तथार् नियमों क स्पष्ट उल्लेख “स्मृतियों” में मिलतार् है। कालार्न्तर में जार्ति सम्बन्धों को क्षेत्र, भार्षार् तथार् मतों में अन्तर ने भी प्रभार्वित कियार् है। भार्रतशार्स्त्रियों के अनुसार्र जार्ति की उत्पत्ति क उद्धेश्य श्रम क विभार्जन करनार् थार्। जैसे-जैसे लोगों ने समार्ज में चार्र समूहों अथवार् क्रमों व वर्गो में विभार्जन स्वीकार करनार् प्रार्रम्भ कियार्, वे अधिक कठोर होते गए और जार्ति की सदस्यतार् तथार् व्यवसार्य वंशार्नुगत होते गए। सार्मार्जिक व्यवस्थार् में ब्रम्हार्णों को सर्वश्रेष्ठ स्थार्न दियार् गयार् क्योंकि ऐसार् विश्वार्स कियार् जार्तार् है कि ब्रम्हार्णों को नियमों की व्यार्ख्यार् करने तथार् उन्हें लार्गू करार्ने क दैवी-अधिकार (divine right) प्रार्प्त है। इस प्रकार जार्ति व्यवस्थार् में कठोरतार् क समार्वेश कर्म,/(कृत्य) तथार् धर्म,/(कर्तव्य व दार्यित्व) में विश्वार्स के कारण होतार् गयार् जिससे स्पष्ट है कि जार्ति रुढ़ियों, परम्परार्ओं व नियमों (dogmas) में विश्वार्स के पीछे धर्म ही निश्चित रुप से प्रेरक शक्ति रहार् है। जार्ति के भविष्य के विषय में भार्रतशार्स्त्री मार्नते हैं कि क्योंकि जार्तिंयार् दैवीय रचनार् हैं, अत: इनक अस्तित्व बनार् रहेगार्।

हट्टन, रिज़्ार्ले, होबेल, क्रोबर, आदि सार्मार्जिक मार्नवशार्स्त्रियों ने सार्ंस्कृतिक दृष्टिकोण को चार्र दिशार्ओं में स्पष्ट कियार् है: संगठनार्त्मक (Organisation), संरचनार्त्मक (Structual), संस्थार्त्मक (Institutional), तथार् सम्बन्धार्त्मक (Relational)। हट्टन आदि की संगठनार्त्मक एवं संरचनार्त्मक विचार्रधार्रार् के अनुसार्र जार्ति प्रथार् केवल भार्रत में ही पार्ई जार्ने वार्ली अद्वितीय व्यवस्थार् है। दोनों विचार्रों (संगठनार्त्मक व संरचनार्त्मक) में अन्तर केवल इतनार् है कि प्रथम विचार्र जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति पर केन्द्रित है और दूसरार् विचार्र जार्ति व्यवस्थार् के विकास एवं संरचनार् में आने वार्ले परिवर्तन की प्रक्रियार्ओं से सम्बद्ध है। रिजले एवं क्रोबर जैसे विद्वार्नों क संस्थार्त्मक दृष्टिकोण जार्ति को केवल भार्रत के प्रसंग में ही अनुकूल नहीं मार्नतार्, बल्कि प्रार्चीन मिश्र, ममयकालीन यूरोप और वर्तमार्न दक्षिण संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में भी इसे अनुकूल मार्नतार् है। सम्बन्धार्त्मक दृष्टिकोण वार्ले विद्वार्नों क मार्ननार् है कि जार्ति जैसी स्थितियार्ं सेनार्, व्यार्पार्र-प्रबन्ध, फैक्टीं आदि में भी पार्ई जार्ती है तथार् समार्ज में जार्ति व्यवस्थार् की उपस्थिति यार् अनुपस्थिति समूहों में गतिशीलतार् की उपस्थिति यार् अनुपस्थिति से सम्बद्ध होती है। यदि गतिशीलतार् सार्मार्न्य होगी तो जार्ति व्यवस्थार् नहीं होगी किन्तु यदि इसमें रुकावट हो तो जार्ति व्यवस्थार् होती है।

जार्ति-व्यवस्थार् की विशेषतार्एं

जार्ति की संरचनार् क अध्ययन इसकी प्रमुख विशेषतार्ओं के विश्लेषण द्वार्रार् कियार् जार् सकतार् है। बूगल ने जार्ति के तीन तत्व बतार्ये हैं वंशार्नुगत विशेषज्ञतार्, श्रेणीबद्धतार्, एवं आकर्षक व विरोध होकार्ट ने धामिक क्रियार्-कलार्पों की पवित्रतार् और अपवित्रतार् पर बल दियार् है, जबकि रिजले ने अन्तर्विवार्ह (endogamy) तथार् वंशार्नुगत पेशे (occupation) पर बल दियार् है। मार्ुर्ये, केलकर, एन.के.दन, आदि, ने भी इन्हीं विशेषतार्ओं की ओर संकेत कियार् है। इन विशेषतार्ओं को बतार्ते समय इन सब विद्वार्नों ने जार्ति को एक इकाई तथार् एक व्यवस्थार् के रुप में अन्तर नहीं कियार् है। इस अन्तर को ध्यार्न में रखते हुए यह मार्नार् जार् सकतार् है कि एक इकाई के रुप में जार्ति की ये विशेषतार्एं हैं: वंशार्नुगत सदस्यतार्, अन्तर्विवार्ह, निश्चित व्यवसार्य, तथार् जार्ति समितियार्ं, जबकि व्यवस्थार् के रुप में जार्ति की विशेषतार्एं हैं:श्रेणीक्रम, खार्नपार्न पर प्रतिबन्ध, तथार् शार्रीरिक व सार्मार्जिक दूरियों पर प्रतिबन्ध। हम जार्ति की इन व्यवस्थार् व इकाई की विशेषतार्ओं की अलग-अलग विवेचनार् करेंगे।

व्यवस्थार् के रुप में जार्ति की विशेषतार्एं

(अ) जन्म पर आधार्रित श्रेणीक्रम (Hierarchy based on birth)- किन्ही भी दो जार्तियों की एक समार्न प्रस्थिति नहीं होती। एक जार्ति क दूसरी जार्ति से सम्बन्ध क स्तर उंचार् यार् नीचार् होतार् है। जार्ति श्रेणीक्रम व्यवस्थार् में प्रत्येक जार्ति क निश्चित यार् अनुमार्नित स्तर यार् प्रस्थिति क निर्धार्रण करनार् यदि असम्भव नहीं तो मुश्किल अवश्य है। श्रेणीक्रम के निर्धार्रण में दो तरीके अपनार्ये गये हैं: अवलोकन विधि और मत-मूल्यार्ंकन विधि। अवलोकन विधि मे जार्ति की प्रस्थिति निर्धार्रण के लिए यार् तो संकेतनार्त्मक (attributional) विधि यार् अन्त: क्रियार्त्मक (interactional) विधि प्रयोग की गयी है। संकेतनार्त्मक विधि जार्ति की प्रस्थिति क निर्धार्रण उसके व्यवहार्र से करती है उदार्हरणाथ, अपमार्नजनक व्यवसार्य करनार्, इसकी प्रथार्एं, शार्काहार्री होनार्, तथार् मद्यपार्न आदि आदतें। अन्त: क्रियार्त्मक विधि दो जार्तियों के एक दूसरे के सम्बन्ध में प्रस्थिति क मूल्यार्ंकन उनके खार्न-पार्न की अन्त:क्रियार्ओं तथार् विवार्ह सम्बन्धों क अवलोकन द्वार्रार् करती है। यदि अ, जार्ति ब, जार्ति की लड़की से विवार्ह करनार् स्वीकार कर लेती है, लेकिन उस जार्ति में अपनार् लड़की नहीं देती तो अ, क स्तर ब, के स्तर से उंचार् होगार्। यह अनुलोम (hypergamy) विवार्ह नियम के कारण है जिसके अनुसार्र निम्न जार्ति की लड़की उच्च जार्ति में विवार्ह कर सकती है, किन्तु इसके विपरीत नहीं। इसी प्रकार यदि अ, जार्ति के सदस्य ब, जार्ति के सदस्यों क भोजन स्वीकार नहीं करते, लेकिन ब, जार्ति के सदस्य अ, जार्ति से भोजन स्वीकार करते हैं तो यह फ्ब, जार्ति के उपर अ, जार्ति के श्रेष्ठ स्तर को प्रकट करतार् है।

मत-मूल्यार्ंकन (opinion-assessing) विधि में सार्मूहिक श्रेणीक्रम में विभिन्न जार्तियों की प्रस्थिति के निर्धार्रण में विविमार् जार्तियों के उत्तरदार्तार्ओं के मत पर ध्यार्न दियार् जार्तार् है। मत-मूल्यार्ंकन विधि क अवलोकन विधि की तुलनार् में यह लार्भ है कि पहली विधि में श्रेणीक्रम और अन्त:क्रियार् को दो अलग-अलग चर (variables) मार्ननार् तथार् उनके सम्बन्धों क अध्ययन सम्भव है। ए. सी. मेयर, एम. एन. श्रीनिवार्स, डी. एन. मजूमदार्र, एस. सी. दुबे, पार्लिन महार्र, आदि विद्वार्नों ने जार्ति श्रेणीक्रम में जार्ति की स्थिति के विश्लेषण में अवलोकन विधि क प्रयोग कियार् थार्, जबकि मैकिम मेरियट व स्टैनले प्रफीड ने मत-मूल्यार्ंकन विधि क प्रयोग कियार् है। एस.सी.दुबे ने जार्ति श्रेणीक्रम व्यवस्थार् में तेलंगार्नार् में तीन गार्ंवों में जार्ति प्रस्थिति निर्धार्रण के लिए एक ही आधार्र प्रयोग कियार्, जिसमें उन्होंने बतार्यार् कि कौन-कौन सी जार्तियार्ं किन-किन जार्तियों के सार्थ भोजन कर सकती हैं। मेयर ने दूसरी ओर सहभोज के आधार्र को प्रयोग कियार्, जिसके अन्तर्गत खार्नार्-पार्नी तथार् विभिन्न जार्तियों के बीच हुक्का, प्रयोग क आदार्न-प्रदार्न सम्मिलित है। पार्लिन महार्र ने बहु-अनुमार्प (multiple-scaling) प्रविधि द्वार्रार् जार्तियों की स्थिति निर्धार्रण उनकी धामिक (कर्मकांड) पवित्रतार् तथार् अपवित्रतार् के आधर पर कियार्।

उन्होंने 13 बिन्दु वार्ली एक प्रश्नार्वली जार्री की जिसमें धामिक (कर्मकांड सम्बन्ध पवित्रतार् और अपवित्रतार् से सम्बद्ध विषय पर जार्तियों के बीच सभी प्रकार की अन्त:क्रियार् के सम्बन्ध में प्रश्न थे। एम. एन. श्रीनिवार्स (1955) डी. एन. मजूमदार्र (1959) ने जार्ति श्रेणीक्रम की अपनी अलग तस्वीर बनार्ई। श्रीनिवार्स इस बार्त से सहमत हैं कि इस प्रकार के मूल्यार्ंकन (श्रेणीक्रम की अपनी तस्वीर बनार्नार्) कुछ-कुछ व्यक्तिपरक होते हैं। मैकिम मेरियट तथार् प्रफीड दोनों ने ही जार्ति श्रेणीक्रम में प्रत्येक जार्ति की प्रस्थिति के निर्धार्रण में मार्मय पद (median rank) निश्चित करने के लिए कार्ड व्यवस्थार् (card system) क प्रयोग कियार्। दोनों ने ही पनों (cards) क एक सैट (set) प्रस्तुत कियार् तथार् प्रत्येक पने/कार्ड पर एक जार्ति क नार्म लिख दियार् गयार्। उत्तरदार्तार्ओं में से प्रत्येक से निवेदन कियार् गयार् कि वह इन पनों को पद-स्थिति में व्यवथित कर दे। दोनों के तरीकों में इतनार् ही अन्तर थार् कि मैकिम मेरियट ने कार्ड एक-एक करके दिए जबकि प्रफीड ने उन्हें एक सार्थ ही दे दिए। श्रीनिवार्स और मेयर क कहनार् है कि व्यक्ति की स्वयं की जार्ति में सदस्यतार् जार्ति श्रेण्ीक्रम के बार्रे में उसके विचार्र को प्रभार्वित कर सकती है यार् कम से कम श्रेणीक्रम में उसकी अपनी जार्ति की स्थिति को तो अवश्य करेगी। परन्तु प्रफीड ने ऐसार् नहीं पार्यार्। उसने दिल्ली के निकट शार्न्ति नगर गार्ंव में सन् 1957-58 में 12 जार्तियों में से छार्ंटे गए 25 उत्तरदार्तार्ओं के अध्ययन से पतार् लगार्यार् कि अधिकतर ने अपनी जार्ति की प्रस्थिति क निर्धार्रण उसी स्थिति के आस-पार्स कियार् जो दूसरों ने उन्हें दी। इसी प्रकार उन्होंने यह निष्कर्ष निकालार् कि किसी व्यक्ति के जार्ति श्रेणीक्रम के विषय पर समस्त दृष्टिकोण क जार्ति सदस्यतार् क थोड़ार् ही प्रभार्व होतार् है।

हार्ल के वर्षो में जार्ति व्यवस्थार् के कुछ लक्षणों में परिवर्तन आयार् है लेकिन श्रेणीक्रम विशेषतार् में कोई परिर्वतन नहीं आयार् है।

(ब) सहभोज पर प्रतिबन्ध (Commensal restrictions)-एक व्यक्ति के विभिन्न जार्तियों के सदस्यों के सार्थ खार्न-पार्न सम्बन्धी अनेक व विस्तृत नियम प्रचलन में हैं। इस विषय पर ब्लन्ट (Blunt) के अनुसार्र सार्त महन्वपूर्ण निषेध (taboos) प्रचलित हैं: (i) सहभोज निषेध, जो व्यक्ति के अन्य व्यक्तियों के सार्थ भोजन खार्ने के नियम निर्धार्रित करतार् है (ii) रसोई निषेध, जिसमें रसोई बनार्ने सम्बन्धी नियम हैं कि कौन-कौन व्यक्ति किन-किन व्यक्तियों के खार्ने योग्य के निषेध, जिसमें भोजन के समय अपनार्ए जार्ने वार्ले धामिक कृत्यों के विवरण एवं नियम है (iv) पीने के निषेध, जो दूसरे व्यक्तियों के हार्थ से पीने क पार्नी लेने के नियम बतार्ते हैं (v) भोजन निषेध, जो यह बतार्तार् है कि किस प्रकार क भोजन (कच्चार्, पक्का, हरी सब्जी, आदि) एक जार्ति क सदस्य दूसरी जार्ति के सदस्यों के सार्थ खार् सकतार् है (vi) तम्बार्कू यार् धूम्रपार्न संबंधी निषेध, जो यह बतार्तार् है कि किस व्यक्ति क हुक्क किस जार्ति क व्यक्ति प्रयोग कर सकतार् है (vii) बर्तन निषेध, जो यह बतार्तार् है कि किस प्रकार के बर्तन व्यक्ति को अपवित्रतार् से बचने के लिए प्रयोग करनार् यार् बचनार् चार्हिए।

ब्लन्ट क विश्वार्स है कि भोजन आदि के प्रतिबन्ध, विवार्ह प्रतिबन्धों क फल हैं, लेकिन हट्टन क दार्वार् है कि ये दोनों ही ओर से सम्भव है। भोजन निषेधों के आधार्र पर ब्लन्ट ने जार्तियों को पार्ंच भार्गों में वर्गीकृत कियार् है: (i) वे जार्तियों जो कच्चार् भोजन (पार्नी से पकायार्) तथार् पक्क भोजन (घी से पकायार्) केवल अपने ही अन्तर्विवार्ही समूहों के सदस्यों के द्वार्रार् पकायार् हुआ लेती हैं (ii) वे जार्तियार्ं जो अपनी ही जार्ति के सदस्यों द्वार्रार् ब्रम्हार्णों द्वार्रार् बनार्यार् भोजन लेती है (iii) वे जार्तियार्ं जो अपनी जार्ति के सदस्यों यार् ब्रम्हार्णों यार् रार्जपूतों द्वार्रार् बनार्यार् भोजन लेती हैं (iv) वे जार्तियार्ं जो अपनी जार्ति, ब्रम्हार्णों व रार्जपूतों के अलार्वार् उन निम्न जार्ति के लोगों द्वार्रार् बनार्यार् भोजन लेती है जिन्हें वे कम से कम अपने स्तर क समझती है और (v) वे जार्तियार्ं जो किसी के द्वार्रार् भी बनार्यार् गयार् भोजन लेती हैं। लेकिन हट्टन (1963:75) ने इस वर्गीकरण की आलोचनार् इस आधार्र पर की है कि कच्चे और पक्के भोजन पर प्रतिबन्ध अलग-अलग लगार्ये गये हैं। कुछ जार्तियार्ं ऐसी हैं जिनको कच्चे भोजन के आधार्र पर एक समूह में रखार् जार्तार् है लेकिन जब पक्के भोजन पर प्रतिबन्ध लार्गू करने की बार्त आती है, जिसके बार्रे में वे कठोर नहीं होती, तो उन्हें दूसरे समूह में रखार् जार्तार् है। उदार्हरणाथ, कुछ ब्रार्हम्ण जार्तियार्ं, काघी (सब्जी बेचने वार्ली) व कुम्हार्र जार्तियार्ं समूह एक में आएंगी, लेकिन कुछ जार्तियार्ं जैसे कलार्ल (शरार्ब बेचने वार्ले) कच्चे भोजन के लिए समूह एक में गिनी जार्येंगी और पक्के भोजन के लिए समह तीन में। इसी प्रकार हलवार्ई जार्ति कच्चे भोजन के लिए समूह एक में और पक्के के लिए समूह चार्र में आयेगीऋ कायस्थ दोनों प्रकार के प्रतिबन्ध के आधार्र पर समूह दो मे आयेंगे। इन उदार्हरणों से स्पष्ट होतार् है कि प्रत्येक जार्ति के अपने लिए अपने ही नियम होते हैं। विभिन्न जार्तियार्ं एक से समूहों मे नहीं आती। कुछ पिछले दशकों से यह देखार् जार् रहार् है कि खार्नपार्न के प्रतिबन्ध कठोरतार् से नहीं मार्ने जार् रहे हैं। दूसरे शब्दों में, जार्ति प्रथार् की इस लक्षण में परिवर्तन होते जार् रहे हैं।

(स) सार्मार्जिक भार्गीदार्री पर धामिक मार्न्यतार्ओं की बार्ध्यतार् (Compelling religious sanctions on social participation)- सार्मार्जिक अन्तविर््रफयार् कलार्पों पर प्रतिबन्ध लगार्ने क कारण यह विश्वार्स है कि शार्रीरिक सम्पक्र से अपवित्रतार् (pollution) क सम्प्रेषण होतार् है। इसी प्रकार के विश्वार्सों के कारण ही जो निम्न जार्ति के लोग निकृष्ट मार्न्धों मे लगे होते हैं, उन्हें उच्च जार्ति के लोग अपने से दूर ही रखते हैं। इसी प्रकार गोमार्ंस खार्ने वार्ले अनेक निम्न जार्ति के लोग तथार् चमार्र, धोबी, डोम, आदि सार्मार्न्यतयार् अस्पृश्य मार्ने जार्ते हैं, और उन्हें लोगों द्वार्रार् पृथक ही रखार् जार्तार् है। इसी प्रकार उच्च जार्ति तथार् ममय जार्ति के लोगों के सार्थ अन्त:क्रियार् के लिए, आदर-सत्कार के लिए, दैनिक व्यवहार्र के लिए, तथार् धामिक क्रियार्-कलार्पों से सम्बिन्मार्त निश्चित व भिन्न-भिन्न नियम बने हुए हैं।

(द) जार्तिबार्ंहार् अथवार् अस्पृश्य उपस्तर (The Out Cast substratum)- जो जार्तियार्ं निकृष्ट व मलिनतार् फैलार्ने वार्ले पेशों में लगी होती हैं, उन्हें अस्पृश्य मार्नार् जार्तार् है। उन्हें बार्ं जार्तियार्ं (दलित वर्ग), यार् अनुसूचित जार्तियार्ं भी कहार् जार्तार् है। इन जार्तियों के विषय मे मार्नार् जार्तार् है कि वे आर्यो के आगमन से पूर्व भार्रत मे रहने वार्ली प्रजार्तियों से अवतीर्ण हुई। बार्द में उन्होंने हिन्दू समार्ज के निम्नतम स्थितियों को स्वीकार कर लियार्। इन जार्तियों के सदस्य आमतौर पर गार्ंव यार् बस्ती के बार्हर की ओर रहते हैं और मैलार् सार्फ करने, जूतार् बनार्ने, चमड़ार् शोमार्न, आदि कार्यो से जीविक चलार्ते हैं। उन्हें उन कुओं से पार्नी लेने की अनुमति नहीं होती जिनसे उच्च जार्तियों के लोग पार्नी लेते हैं। उन्हें जन-सड़कों, स्कूलों, मन्दिरों, शवदार्ह स्थलों, होटलों तथार् चार्य की दुकानों, आदि के प्रयोग से भी वन्चित रखार् जार्तार् है। वे उन दैत्यों को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि भी देते हैं जो उनके जीवन पर अधिकार रखते हैं। उनकी उपस्थिति व स्पर्श भी दूसरों को दूषित/अपवित्र कर देंगे, ऐसार् मार्नार् जार्तार् है।

पेशवार् काल में पूनार् नगर में डोम जार्ति के लोगों को शार्म छ: बजे से प्रार्त: नौ बजे तक नगर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी क्योंकि यह मार्न्यतार् थी कि उन्की छार्यार् भी (जो इस काल में सूरज डूबने व उगने के कारण लम्बी हो जार्ती है) उच्च जार्ति के लोगों को दूषित कर सकती है। इसी कारण से दक्षिण भार्रत में डार्क्टर लोग अपने शूद्र रोगियों की नब्ज देखने से पूर्व अपने हार्थों को रेशमी कपड़े से ढ़क लियार् करते थे। इसी प्रकार, टोकरी बनार्ने वार्ले फ्पार्नम, तोड़ी के पेड़ से तोड़ी निकालने वार्ले तियार्न, फलयार्न, शार्नन, आदि दक्षिण भार्रत की निम्न जार्ति के लोगों को उच्च जार्ति के लोगों के सार्मने एक निश्चित दूरी तक आने की अनुमति नहीं थी। उच्च जार्ति के लोगों से उन्हें अपनी स्थिति के अनुसार्र कदमों की दूरी बनार्ये रखनी ही पड़ती थी। जार्ति रुढ़ियों ने इन अस्पृश्य लोगों को सदैव अज्ञार्न और पतन के अन्मोरे में मार्केलार् है क्योंकि मार्न्यतार् के अनुसार्र वे अपने पूर्व जन्म के पार्पों को भोग रहे हैं। लेकिन वर्तमार्न में इन जार्तिवार्दी लोगों द्वार्रार् थोंपे गए निषेध काफी कम हो गए हैं। यद्यपि ये निषेध वैधार्निक रुप से हटार् दिए गये हैं और अधिकतर उच्च जार्तियों के हिन्दुओं द्वार्रार् अपवित्रतार् के डर को भी सार्मार्जिक रुप से नहीं मार्नार् जार् रहार् है, फिर भी कुछ धामिक क्रियार्-कलार्पों में प्रतिबन्ध जार्री हैं, यद्यपि लौकिक दैनिक जीवन में इन्हें लार्गू नहीं कियार् जार्तार् है।

इकाई के रुप में जार्ति की विशेषतार्एं

(अ) प्रदन प्रस्थिति (Ascribed Status)- जार्ति में व्यक्ति की सदस्यतार् उसके जन्म से निर्धार्रित होती है। प्रत्येक जार्ति क अन्य जार्तियों की तुलनार् में क्योंकि एक निश्चित दर्जार् (rank) होतार् है, अत:व्यक्ति की उच्च व निम्न प्रस्थिति इस पर निर्भर करती है कि जिस जार्ति में उसक जन्म हुआ है उसकी कर्मकांडीय प्रस्थिति क्यार् है। वार्स्तव में, एक परम्परार्निष्ठ हिन्दू के जीवन क प्रत्येक पहलू उसके जन्म पर अठक होतार् है। उसके घरेलू संस्कार व रीति-रिवार्ज, उसकी मन्दिर आदि में पूजार्, उसकी मित्र मण्डली, और उसक व्यवसार्य, सभी कुछ उस जार्ति के स्तर पर आधार्रित होते हैं जिसमें उसने जन्म लियार् है।

(ब) अन्तर्विवार्ह (Endogamy)- प्रत्येक जार्ति के सदस्यों को अपनी ही जार्ति यार् उपजार्ति में विवार्ह करनार् होतार् है। इस प्रकार अन्तर्विवार्ह जार्ति समूहों के बीच एक स्थार्यी बार्ध्य स्थिति है।

(स) निश्चित व्यवसार्य (Fixed Occupation)- प्रत्येक जार्ति क निश्चित वंशार्नुगत पेशार् होतार् है। एक फरार्नी कहार्वत है कि ब्रम्हार्ण सदैव ब्रम्हार्ण होतार् है और चमार्र सदैव चमार्र होतार् है। कुछ व्यवसार्य गन्दे (unclean) समझे जार्ते हैं जिस कारण जो व्यक्ति इनमें लगे होते हैं वे अस्पृश्य हो जार्ते हैं और यदि कोई अन्य इन व्यवसार्यों को अपनार्तार् है, तो उसे जार्ति से बहिष्कृत कर दियार् जार्तार् है तार्कि वह जार्ति को दूषित न कर सके। लेकिन इसक यह अर्थ भी नहीं है कि ब्रम्हार्ण जार्ति में सभी ब्रम्हार्णों को पंडितार्ई व्यवसार्य में ही सदैव लगार् रहनार् है यार् फिर सभी रार्जपूतों को रक्षार् कार्य में लगने के कारण सेनार् में ही शार्मिल होनार् है। कुछ परिस्थितियों वश एक जार्ति के सदस्य को दूसरार् व्यवसार्य करने की अनुमति मिल जार्ती थी। इसी प्रकार एक ही जार्ति की विभिन्न उपजार्तियार्ं विविमार् व्यवसार्य अपनार् लेती है। उदार्हरणाथ, खटिक (कसार्ई) जार्ति की चार्र उन-जार्तियार्ं उत्तर प्रदेश में कसार्ई, (बेकनवार्लार्), रार्जगीर (रार्जगर), रस्सी बनार्ने वार्ले (सोमबट्ट) तथार् फल बेचने के व्यवसार्य में मेवार्फरोष लगे हैं। इसी प्रकार बंगार्ल में तेली जार्ति के दो भार्ग है: फ्तिली, और तेली,। तिली, तेल निकालने तथार् तेली, तेल बेचने के काम में लगे हैं। तेल निकालने क काम हेयदृष्टि से देखार् जार्तार् है क्योंकि इसमें बीज से तेल निकलतार् है, अत: उसमें जीवन (बीज) की हार्नि होती है। इस कारण फ्तिली, लोगों को अस्पृश्य मार्नार् जार्तार् है, जबकि तेली, अस्पृश्य नही मार्ने जार्ते। यदि तेली, जार्ति में से कोई तेल निकालने क काम करने लगे तो उसे जार्ति से बहिष्कृत कर दियार् जार्तार् है। व्यवसार्य परिवर्तन से जार्ति परिवर्तन आवश्यक नहीं होतार् थार् जब तक कि स्थिति में परिवर्तन न हो। ब्लन्ट के अनुसार्र जब प्रस्थिति में इस प्रकार क परिवर्तन होतार् है तब वह तीन रूप धार्रण कर लेती है: (i) एक नई जार्ति में पृथक होनार् (ii) नये समूह क पहले से अस्तित्व वार्ली जार्ति में विलय (iii) मौलिक जार्ति के भीतर ही एक अन्तर्विवार्ही उपजार्ति की रचनार्।

जार्ति द्वार्रार् थोपे गए व्यवसार्यिक प्रतिबन्धों के पीछे सार्मार्न्यत: धामिक उद्धेश्य होतार् है, लेकिन कभी-कभी उनक विशुद्ध आर्थिक उद्धेश्य भी होतार् है। उदार्हरण के लिए, ओमैले ने ममयप्रदेश के एक जिले के सुनार्रों के सन्दर्भ में कहार् है कि वे लोग एक दार्वत क आयोजन करते हैं जिसमें वे कसम खार्ते हैं व उन लोगों को जार्ति से बार्हर निकालने क डर दिखार्ते हैं जो यह रहस्य खोलेंगे कि सोने में कितनी अन्य धार्तुएं किस मार्त्रार् में मिलार्ई जार्ती हैं।

(द) जार्ति पंचार्यत (Cast Panchayats)- प्रत्येक जार्ति की अपनी समिति होती है जिसे जार्ति पंचार्यत कहते हैं। हार्ल ही के समय तक इन पंचार्यतों क अपने सदस्यों पर काफी प्रभार्व थार्। यद्यपि आज कुछ जार्ति पंचार्यतों की समूचे देश में शार्खार्एं भी हैं क्योंकि संचार्र मार्मयमों क समुचित विकास हुआ है, परन्तु कुछ दशार्ब्दियों पूर्व तक इन (शार्खार्ओंद्ध क कार्यक्षेत्र इतनार् सीमित थार् कि सदस्य आसार्नी इकट्ठे हो सके और एक दूसरे के प्रति जार्नकारी रख सके। संचार्र सुविधार् तथार् अन्य स्थार्नीय दशार्ंए इन पंचार्यतों क कार्य क्षेत्र निर्धार्रित करती हैं। इस प्रकार क्योंकि समूची जार्ति यार् उप-जार्ति के लिए एक ही पंचार्यत होने के आदर्श को प्रार्प्त करनार् असम्भव है, अत: एक जार्ति यार् उप-जार्ति के सदस्य एक संबंधित समूह क निर्मार्ण करते हैं जिसे बिरार्दरी, (नार्तेदार्रों की समिति) कहार् जार्तार् है। यह बिरार्दरी एक बहिर्विवार्ही (exogamous) इकाई के रुप में अन्तर्विवार्ही जार्ति यार् उप-जार्ति की तरह कार्य करती हैं। यह समूह (बिरार्दरी) जार्ति यार् उपजार्ति के लिए कार्य करतार् है तथार् अपने सदस्यों को अपनी कार्य परिधि के भीतर ही मार्न्यतार्ओं को मनवार्ने के लिए बार्मय करतार् है। कुछ समय पूर्व तक इन पंचार्यतों ने जो अपरार्ध के मार्मले अपने कार्य-क्षेत्र में लिए थे उनमें से प्रमुख थे दूसरी जार्ति व उपजार्ति में भोजन के मार्मले, जिनके सार्थ निषेध थार्, दूसरी जार्ति की स्त्री को रखैल के रुप में रखनार्, विवार्हित महिलार् के सार्थ अवैमार् सम्बन्ध रखनार्, विवार्ह के वार्यदे को तोड़नार्, अदार्यगी से इनकार करनार्, छोटे-मोटे झगड़े, रीति-रिवार्जों क उल्लंघन आदि। ऐसार् करने पर जो दण्ड क विधार्न अपनार्यार् जार्तार् थार् उसमें जार्ति से निकालनार्, अर्थदण्ड, जार्ति के लोगों को दार्वत देनार्, यार् शार्रीरिक दण्ड आदि प्रमुख थे। जार्ति के सभी सदस्य पंचार्यत के निर्णय को मार्नने के लिए बार्मय होते थे। ब्रिटिश काल में भी ये पंचार्यतें इतनी शक्तिशार्ली होती थीं कि न्यार्यार्लय द्वार्रार् निर्णय किए गए मार्मलों को भी फनर्विचार्र के लिए ले लेती थीं। इस प्रकार जार्ति पंचार्यत एक अर्मार्-प्रभुतार् सम्पन्न (semi sovereign) संस्थार् थी। पंचार्यत के कार्यकारी पदार्धिकारी यार् तो वंशार्नुक्रम से होते थे यार् उनक नार्मार्ंकन होतार् थार् यार् चुनार्व। ब्लन्ट, स्लीमेन, ओमैले, और हट्टन ने बतार्यार् है कि सार्मार्जिक मार्नदण्ड में जार्ति जितनी छोटी होती थी उतनार् ही मजबूत उनक संगठन होतार् थार्। मुकदमे के लिए अपनार्यार् गयार् तरीक बहुत सरल व अनौपचार्रिक होतार् थार्।

इन जार्ति पंचार्यतों के अधिकारों के सन्दर्भ में कापड़ियार् ने सन् 1962, 1912 तथार् 1861 तक के कुछ उदार्हरण दियार् है जिन्होंने एक विमार्वार् से विवार्ह कियार्, किन्तु उनकी जार्ति पंचार्यत ने उनको बहुत अपमार्नित कियार् और अन्तत: पति-पत्नी दोनों को ही आत्महत्यार् करनी पड़ी। उदार्हरण एक ऐसे व्यक्ति क है जो लन्दन जार्ने के कारण जार्ति से बहिष्कृत कर दियार् गयार् और वार्पस आने पर 1500 रु. क दण्ड देकर जार्ति मे सम्मिलित हुआ। 50 वर्ष बार्द 1912 के आस-पार्स के समय के सन्दर्भ में कापड़ियार् ने एक रमन भार्ई नार्मक व्यक्ति क उदार्हरण दियार् है जिसको अपने से निम्न जार्ति में खार्नार् खार्ने के कारण जार्ति से निकाल दियार् गयार् थार् और दूसरार् उदार्हरण जयसुखलार्ल मेहतार् क दियार् है जिसे अपनी विमार्वार् बहिन की शार्दी करार्ने के कारण बहिष्कृत कर दियार् गयार् थार्। 1962 की समय अवधि क सन्दर्भ देते हुए कापड़ियार् ने यह मार्नार् है कि जब पंचार्यत को कानूनी आधार्र पर जार्ति-निष्कासन द्वार्रार् अपने सदस्यों पर परम्परार्गत आदर्शो के अनुसार्र चलने के अधिकार प्रयोग से वंचित कर दियार् गयार्, तब भी ये (जार्ति पंचार्यत) उनके मन व मस्तिष्क तथार् व्यवहार्र को नियमित किए रहती हैं। 1994-95 में गार्ंवों में जार्ति पंचार्यतों क कुछ प्रभार्व हो सकतार् है, किन्तु नगर क्षेत्रों में उनक कोई प्रभार्व नजर नहीं आतार्।

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