जार्ति क अर्थ, परिभार्षार् एवं विशेषतार्एं

जार्ति क अर्थ अंग्रेजी भार्षार् क शब्द ‘caste’ स्पेनिश शब्द ‘casta’ से लियार् गयार् है। ‘कास्टार्’ शब्द क अर्थ है ‘नस्ल, प्रजार्ति अथवार् आनुवंशिक तत्वों यार् गुणों क संग्रह’। पुर्तगार्लियों ने इस शब्द क प्रयोग भार्रत के उन लोगों के लिए कियार्, जिन्हें ‘जार्ति’ के नार्म से पुकारार् जार्तार् है। अंग्रेजी शब्द ‘caste’ मौलिक शब्द क ही समंजन है।

जार्ति की परिभार्षार्

  1. रिजले – जार्ति परिवार्रों क संग्रह अथवार् समूह है जो एक ही पूर्वज, जो काल्पनिक मार्नव यार् देवतार् हो, से वंश-परंपरार् बतार्ते हैं और एक ही व्यवसार्य करते हों और उन लोगों के मत में यार् इसके योग्य हों, एक सजार्ति समुदार्य मार्नार् जार्तार् हो।
  2. लुंडबर्ग – जार्ति एक अनमनीय सार्मार्जिक वर्ग है, जिसमें मनुष्यों क जन्म होतार् है और जिसे वे बड़ी कठिनार्ई से ही छोड़ सकते हैं।
  3. ब्लंट – जार्ति एक अन्तर्विवार्ही समूह यार् समूहों क संकलन है, जिसक एक सार्मार्न्य नार्म होतार् है, जिसकी सदस्यतार् पैतृक होती है और जो अपने सदस्यों पर सार्मार्जिक सहवार्स के सम्बन्ध में कुछ प्रतिबन्ध लगार्ती है। जो एक परम्परार्गत सार्मार्न्य पेशे को करती है यार् एक सार्मार्न्यतयार् एक सजार्तीय समुदार्य को बनार्ने वार्ली समझी जार्ती है।
  4. कूले – जब वर्ग पूर्णतयार् आनुवंशिकतार् पर आधरित होतार् है, तो हम उसे जार्ति कहते हैं।
  5. मैकाइवर – जब प्रस्थिति पूर्णतयार् पूर्वनिश्चित हो, तार्कि मनुष्य बिनार् किसी परिवर्तन की आशार् के अपनार् भार्ग्य लेकर उत्पन्न होते हैं, तब वर्ग जार्ति क रूप धरण कर लेतार् है।
  6. केतकर – जार्ति दो विशेषतार्एं रखने वार्लार् एक सार्मार्जिक समूह है (क) सदस्यतार् उन्हीं तक सीमित होती है, (ख) सदस्यों को एक अनुल्लंघनीय सार्मार्जिक नियम द्वार्रार् समूह के बार्हर विवार्ह करने से रोक दियार् जार्तार् है।
  7. माटिन्डेल और मोनोकेसी – जार्ति व्यक्तियों क एक ऐसार् समूह है, जिनके कर्तव्यों तथार् विशेषार्धिकारों क हिस्सार् जन्म से निश्चित होतार् है, जो कि जार्दू यार् ध्र्म दोनों से समर्थित तथार् स्वीकृत होतार् है।
  8. ई. ए. गेट – जार्ति अन्तर्विवार्ही समूह यार् ऐसे समूहों क संकलन है, जिनक एक सार्मार्न्य नार्म होतार् है, जिनक परम्परार्गत व्यवसार्य होतार् है, जो अपने को एक ही मूल से उद्भूत मार्नते हैं और जिन्हें सार्धरणतयार् एक ही सजार्तीय समुदार्य क अंग समझार् जार्तार् है।
  9. ग्रीन- जार्ति स्तरीकरण की ऐसी व्यवस्थार् है, जिसमें प्रस्थिति की सीढ़ी पर उपर यार् नीचे की ओर गतिशीलतार्, कम-से-कम आदर्शार्त्मक रूप में नहीं पार्यी जार्ती।,
  10. एंडरसन – जार्ति सार्मार्जिक वर्गीय संरचनार् क वह कठोर रूप है, जिसमें व्यक्तियों क पद, प्रस्थिति-क्रम में, जन्म अथवार् आनुवंशिकतार् द्वार्रार् निर्धरित होतार् है।

इस प्रकार, विचार्रकों ने जार्ति की परिभार्षार् विभिन्न ढंग से की है। परन्तु जैसार् घुरये (Ghurye) ने लिखार् है, इन विद्वार्नों के परिश्रम के बार्वजूद भी जार्ति की कोई वार्स्तविक सार्मार्न्य परिभार्षार् उपलब्ध नहीं है।,जार्ति के अर्थ को समझने क सर्वोतम ढंग जार्ति-व्यवस्थार् में अन्तभ्रूत विभिन्न तत्वों को जार्न लेनार् है।


मेगस्थनीज, ईसार्पूर्व तीसरी शतार्ब्दी के चीनी यार्त्री, ने जार्ति-व्यवस्थार् के दो लक्षण बतलार्ए थे। वह लिखतार् है, इसे अन्य जार्ति के व्यक्ति के सार्थ विवार्ह करने की अनुमति नहीं होती है, न ही एक व्यवसार्य यार् व्यार्पार्र को छोड़कर दूसरार् व्यवसार्य यार् व्यार्पार्र, तथार् न ही एक व्यक्ति को एक से अधिक व्यवसार्य करने की अनुमति होती है, सिवार्य दाशनिक जार्ति के सदस्य को, जिसे उसकी प्रतिष्ठार् के कारण ऐसार् करने की अनुमति दे दी जार्ती है। इस प्रकार, मेगस्थनीज के अनुसार्र जार्ति-व्यवस्थार् के दो तत्व हैं (क) अन्तर्विवार्ह की मनार्ही, तथार् (ख) व्यवसार्य को नहीं बदलार् जार् सकतार्। मेगस्थनीज क विचार्र यद्यपि जार्ति-व्यवस्थार् के दो प्रमुख लक्षणों की ओर हमार्रार् ध्यार्न आकर्षित करतार् है, तथार्पि यह इस व्यवस्थार् क संपूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करतार्।

जार्ति-व्यवस्थार् की विशेषतार्एं

जार्ति-व्यवस्थार् क सम्पूर्ण विचार्र प्रार्प्त करने के लिए इसकी विशेषतार्ओं क वर्णन कियार् जार् सकतार् है –

1. समार्ज क खंडार्त्मक विभार्जन – जार्ति-व्यवस्थार् के अंतर्गत समार्ज के अनेक जार्तियों में विभक्त होतार् है। प्रत्येक जार्ति क अपनार् जीवन होतार् है, जिसकी सदस्यतार् जन्म के आधार्र पर निर्धरित होती है। व्यक्ति की प्रस्थिति उसके धन पर नहीं, अपितु उस जार्ति के परम्परार्गत महत्व पर निर्भर करती है, जिसमें उसे जन्म लेने क सौभार्ग्य प्रार्प्त हुआ है। जार्ति आनुवंशिक होती है। धन, पश्चार्तार्प अथवार् प्राथनार् की कोई मार्यार् उसकी जार्ति-स्थिति को नहीं बदल सकती। प्रस्थिति क निर्धरण व्यवसार्य से नहीं, अपितु जन्म से होतार् है। मैकाइवर (MacIver) ने लिखार् है, पूर्वी सभ्यतार् में वर्ग एवं प्रस्थिति क मुख्य निर्णार्यक तत्व जन्म हैतो पार्श्चार्त्य सभ्यतार् में धन के निर्धरक तत्व के रूप में समार्न अथवार् अधिक महत्व है तथार् धन जार्ति की अपेक्षार् कम अनमनीय तत्व है। जार्ति के विभिन्न सदस्यों के व्यवहार्र को नियमित एवं नियंत्रित करने हेतु जार्ति-परिषदें होती हैं। यह परिषद् संपूर्ण जार्ति पर शार्सन करती है तथार् सर्वार्धिक शक्तिशार्ली संगठन होती है जो सभी सदस्यों को उनके उचित स्थार्नों पर रखती है। जार्ति की शार्सक संस्थार् को पंचार्यत कहार् जार्तार् है, जिसक शार्ब्दिक अर्थ है पार्ंच सदस्यों की संस्थार्, परन्तु वार्स्तव में इस संस्थार् में अधिक व्यक्ति भी निर्णय के समय इकट्ठे हो सकते थे। यह जार्ति वर्जनार्ओं के विरुद्ध दोषों क निर्णय करती थी। इन वर्जनार्ओं में अधिकांशत: ऐसी बार्तें हुआ करती थीं जो दूसरी जार्ति के सदस्यों के सार्थ, खार्ने, पीने, हुक्क पीने तथार् यौन सम्बन्धी बार्तें, जिनमें जार्ति से बार्हर विवार्ह मनार् थार्, से सम्बिन्ध्त थीं। यह दीवार्नी एवं फौजदार्री मार्मलों क निर्णय करती थी। पंचार्यत इतनी अधिक शक्तिशार्ली होती थी कि यह अंग्रेजी शार्सन-काल में सरकारी न्यार्यार्लयों के द्वार्रार् निण्रीत मुकदमों क पुन: निर्णय कियार् करती थी। इसके द्वार्रार् दिए गए मुख्य दंड (क) जुर्मार्नार्, (ख) अपने सजार्तियों को प्रीतिभोज, (ग) शार्रीरिक दंड, (घ) धर्मिक पवित्रतार्, यथार् गंगार्-स्नार्न आदि एवं (A) जार्ति बहिष्कार आदि हुआ करते थे।

यद्यपि आधुनिक समय में न्यार्यार्लयों के विस्तार्र एवं जार्ति पंचार्यत के स्थार्न पर ग्रार्म पंचार्यत की प्रतिस्थार्पनार् से जार्ति पंचार्यत की सत्तार् कुछ कम हो गई है, तथार्पि अब भी जार्ति अपने सदस्यों के व्यवहार्र क नियंत्रित एवं प्रभार्वित करती है।

2. सार्मार्जिक एवं धर्मिक सोपार्न – जार्ति-व्यवस्थार् क दूसरार् महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि इसमें सार्मार्जिक श्रेष्ठतार् क एक सुनिश्चित क्रम होतार् है। प्रत्येक जार्ति क एक परम्परार्गत नार्म, यथार् वैश्य, ब्रार्म्हण आदि होतार् है, जो इसे दूसरी जार्तियों से विलग कर देतार् है। संपूर्ण समार्ज विभिन्न जार्तियों मं विभार्जित होतार् है, जिनमें उच्च तथार् निम्न क विचार्र होतार् है। इस प्रकार, भार्रत में सार्मार्जिक सोपार्न के उच्चतम शिखर पर ब्रार्म्हणों क स्थार्न है। मनु के अनुसार्र, ब्रार्म्हण सार्री सृष्टि क रार्जन है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति ब्रंम्हार्म्हार् के सबसे पवित्र अंग ‘मुख’ से हुई है। ब्रार्म्हण के रूप में जन्म मार्त्र से कोई भी व्यक्ति सनार्तन नियम क सार्कार रूप समझार् जार्तार् है। ब्रार्म्हणों को भोजन करार्नार् धर्मिक पुण्य प्रार्प्त करने क एक मार्न्य ढंग है। ब्रार्म्हण क सृष्टि की प्रत्येक वस्तु पर अधिकार है। सार्रार् संसार्र इसकी सम्पत्ति है तथार् दूसरे लोग उसकी छपार् पर जीवित हैं। इस संबंध में विष्णु मनु से भी आगे हैं। वह लिखतार् है, फ्देव तो अदृश्य देवतार् है ब्रार्म्हणों के सहार्रे संसार्र खड़ार् है ब्रार्म्हणों की छपार् से ही देव स्वर्ग में निश्चित होकर आरार्म करते हैं ब्रार्म्हण क कोई शब्द कभी गलत सिण् नहीं होतार्। ब्रार्म्हण प्रसन्न होकर जो कुछ कह दें, देव उसक अनुसमर्थन कर देंगे जब दृश्य देव प्रसन्न हैं तो अदृश्य देव भी निश्चित रूप से प्रसन्न होंगे।

ब्रार्म्हणों की इस उच्च स्थिति के मुकाबले में शूद्रों की स्थिति पूर्णतयार् हीन थी। वे सावजनिक मागो, कूपों, विद्यार्लयों, मंदिरों आदि क उपयोग नहीं कर सकते थे। दार्सतार् शूद्रों की स्थार्यी स्थिति थी। प्रथम तीन जार्तियों के सदस्य को शूद्र के सार्थ यार्त्रार् नहीं करनी चार्हिए। उनके स्पर्श मार्त्र से बिस्तर अथवार् आसन दूषित हो जार्तार् है। कुछ अपरार्धें के लिए शूद्रों को कठोर दंड दियार् जार्तार् थार्। इस प्रकार, कौटिल्य के अनुसार्र, यदि कोई शूद्र ब्रार्म्हण स्त्री की पवित्रतार् को भंग करतार् है तो उसे जीवित जलार् दियार् जार्एगार्। यदि वह किसी ब्रार्म्हण को गार्ली देतार् है अथवार् उस पर आक्रमण करतार् है तो उसे उसके दोषी अंग को काट दियार् जार्एगार्।

3. भोजन एवं सार्मार्जिक समार्गम पर प्रतिबन्ध – जार्ति-व्यवस्थार् क एक अन्य तत्व यह भी है कि उच्च जार्तियार्ं अपनी रस्मी पवित्रतार् की सुरक्षार् हेतु अनेक जटिल वर्जनार्एं लगार् देती हैं। प्रत्येक जार्ति अपनी उपसंस्कृति क विकास कर लेती है। इस प्रकार, भोजन एवं सार्मार्जिक समार्गम पर अनेक प्रतिबन्धार् होते हैं। किस जार्ति के सदस्य से कि प्रकार क भोजन स्वीकार कियार् जार् सकतार् है, इस विषय पर विस्तृत नियम निर्धरित कर दिये जार्ते हैं। उदार्हरणतयार्, ब्रार्म्हण किसी भी जार्ति से घी में पक हुआ भोजन तो स्वीकार कर सकतार् है, परन्तु वह किसी अन्य जार्ति से ‘कच्चार्’ भोजन स्वीकार नहीं कर सकतार्।

उच्च जार्तियों द्वार्रार् प्रतिपार्िकृत ‘दूषण’ क सिद्धार्न्त सार्मार्जिक समार्गम पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगार् देतार् है। इस प्रकार, दूरी के बार्रे में प्रतिबन्ध हैं। केरल में नार्यर को नम्बूदरी ब्रार्म्हण के निकट आने की आज्ञार् तो है, परन्तु वह उसे छू नहीं सकतार् तियार्न (Tiyan) के लिए यह आदेश है थार् कि वह ब्रार्म्हण से छत्तीस कदम दूर रहे, जबकि पुलयार्न (Pulayan) छियार्नवे कदम दूर रहतार् थार्। पुलयार्न को किसी भी हिन्दू जार्ति के निकट नहीं आनार् चार्हिए। यदि निम्न जार्ति के लोग कूपों से पार्नी लेंगे तो कुएं भी दूषित हो जार्एंगे। जार्ति के नियम इतने कठोर थे कि ब्रार्म्हण शूद्र के अहार्ते में स्नार्न भी नहीं कर सकतार् थार्। ब्रार्म्हण वैद्य शूद्र रोगी की नब्ज देखते समय उसक हार्थ नहीं छूतार् थार्, बल्कि वह उसकी कलार्ई पर रेशमी वस्त्र बार्ंधकर नब्ज देखतार् थार्, तार्कि वह उसके चर्म को छूकर दूषित न हो जार्ए।,

4. अन्तर्विवार्ह (Endogamy) व्यक्ति जिस जार्ति में जन्म लेतार् थार्, वह आजीवन उसी जार्ति में रहतार् थार्। प्रत्येक जार्ति उपजार्तियों में विभक्त थी, और प्रत्येक उपजार्ति क यह विधन थार् कि वह अपने सदस्यों को अपनी उपजार्ति में ही विवार्ह की अनुमति दे। इस प्रकार प्रत्येक उपजार्ति अन्तर्विवार्ही समूह होतार् है, अन्तर्विवार्ह जार्ति-व्यवस्थार् क सार्र है। अन्तर्विवार्ह के नियम केवल कुछेक ही अपवार्द हैं, जो अनुलोम (hypergamy) की प्रथार् के कारण हैं। परन्तु प्रतिलोम विवार्ह (hypergamy) सहन नहीं किए जार्ते थे। अनुलोम के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उपजार्ति में विवार्ह करनार् होतार् है। इस नियम क उल्लंघन करने वार्ले व्यक्ति को जार्ति से निष्काषित कर दियार् जार्तार् है।

5. व्यवसार्य के चयन पर प्रतिबन्ध – जार्ति-विशेष के सदस्यों से उसी जार्ति के व्यवसार्य को अपनार्ने की आशार् की जार्ती है। वे दूसरे व्यवसार्य को नहीं अपनार् सकते थे। वंशार्नुगत व्यवसार्य को त्यार्गनार् ठीक नहीं समझार् जार्तार् थार्। कोई जार्ति अपने सदस्यों को यह अनुमति नहीं देती थी कि वे मदिरार् निकालने अथवार् सफार्ई करने क अपवित्र पेशार् अपनार्एं। ऐसार् प्रतिबन्ध न केवल अपनी जार्ति की ओर से थार्, परन्तु दूसरी जार्ति के लोग भी इसे ठीक नहीं समझते थे कि अन्य जार्ति के लोग उनके पेशे को अपनार्एं। जो व्यक्ति ब्रार्म्हण के घर में उत्पन्न न हुआ हो, उसे पुरोहित क कार्य करने की अनुमति नहीं थी। परन्तु अभिलेखों से पतार् चलतार् है कि ब्रार्म्हण सभी प्रकार के कार्य कियार् करते थे। मरार्ठार् आंदोलन के दौरार्न एवं उसके उपरार्ंत वे सैनिक बने। अकबर के शार्सनकाल में वे व्यार्पार्री तथार् खेतिहर बने। आजकल भी भले ही ब्रार्म्हण विभिन्न प्रकार के व्यवसार्य करते हैं, तथार्पि पुरोहितार्ई केवल ब्रार्म्हणों क ही व्यवसार्य है। इसी प्रकार आजकल क्षत्रिय एवं वैश्य अपने मूल व्यवसार्य के अतिरिक्त भले ही अन्य कई व्यवसार्य करते हैं, तथार्पि वे अधिकांशत: अपने मूल व्यवसार्य में ही संलग्न हैं। थोड़े-बहुत अपवार्दों को छोड़कर प्रत्येक व्यवसार्य प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के लिए खुलार् हुआ है। बेन्ज (Baines) ने लिखार् है, जार्ति क व्यवसार्य परम्परार्गत है, परन्तु इसक अर्थ यह नहीं है कि उस जार्ति के सभी सदस्य अपनी आजीविक उसी व्यवसार्य से कमार्ते हैं।

6. सिविल एवं धर्मिक अक्षमतार्एं – सार्धरणतयार् अशुद्ध जार्तियों को नगर की बार्हरी सीमार् पर रखार् जार्तार् है। दक्षिणी भार्रत में नगर अथवार् ग्रार्म के कुछेक भार्गों में छोटी जार्तियों के लोग नहीं रह सकते। ऐसार् उल्लिखित है कि मरार्ठों और पेशवार्ओं के शार्सन-काल में पूनार् नगर के अन्दर तीन बजे दोपहर से नौ बजे प्रार्त:काल तक महार्र और मंग जार्तियों के सदस्यों को आने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि उक्त समय में उनकी परछार्ई इतनी बड़ी होती थी कि दूर बैठार् उच्च जार्ति क व्यक्ति भी अपवित्र हो सकतार् थार्। सार्रे भार्रत में शूद्र जार्ति के लोगों को उन कुओं से पार्नी भरने की आज्ञार् नहीं थी, जहार्ं से उच्च जार्ति वार्ले लोग पार्नी भरते थे। पब्लिक स्कूलों में चमार्र एवं महार्र जार्ति के बच्चों को प्रवेश नहीं मिलतार् थार्। शूद्र लोग वेदार्दि क अध्ययन नहीं कर सकते थे। स्वार्मी मार्ध्वरार्व के काल में पेशवार् सरकार ने यह नियम बनार्यार् थार् कि चूंकि महार्र अतिशूद्र हैं, अतएव ब्रार्म्हण उनके विवार्ह संस्कार सम्पन्न न करवार्एं। शूद्र मन्दिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे। ब्रार्म्हण को मृत्यु-दण्ड नहीं दियार् जार् सकतार् थार्। केद की स्थिति में उसके सार्थ दूसरों की अपेक्षार् उदार्र व्यवहार्र कियार् जार्तार् थार्।

वर्ग एवं जार्ति में अन्तर

उपर हमने जार्ति-व्यवस्थार् के लक्षणों क वर्णन कियार् है, जो सार्धरणतयार् वर्ग की अवधार्रणार् में नहीं पार्ए जार्ते। जार्ति तथार् वर्ग के बीच अन्तर को स्पष्ट करते हुए मैकाइवर (MacIver) ने लिखार् है, जबकि पूर्वी सभ्यतार्ओं के वर्ग एवं प्रस्थिति क मुख्य निर्धरक जन थार्, पार्श्चार्त्य सभ्यतार्ओं में धन समार्न अथवार् अधिक महत्वपूर्ण वर्ग-निर्धार्रक तत्व है। धन जन्म की अपेक्षार् कम अनमनीय निर्धरक है यह अधिक स्थूल है, अत: इसके दार्वों को अधिक सुगमतार् से चपार्पुनौती दी जार्ती है। यह ‘मार्त्रार्’ क विषय है। इसमें ‘प्रकार’ के अन्तर उत्पन्न नहीं होते। ये अन्तर पृथक्करणीय, हस्तार्ंतरणीय एवं उपाजनीय होते हैं। इसमें भेद की ऐसी स्थार्यी रेखार् नहीं होती जैसी जन्म क तत्व खींच देतार् है। वर्ग क जार्ति से अन्तर स्पष्ट करते हुए आगबर्न एवं निमकाफ ने लिखार् है, कुछ समार्जों में व्यक्तियों के लिए सार्मार्जिक नृखलार् में उपर यार् नीचे जार्नार् असार्मार्न्य नहीं है। जहार्ं ऐसार् सम्भव है, वह समार्ज ‘उन्मुक्त’ (open) वर्गो क समार्ज होतार् है। दूसरे समार्जों में ऐसार् उतार्र-चढ़ार्व कम होतार् है, व्यक्ति उसी वर्ग में आजीवन रहते हैं जिनमें उनक जन्म होतार् है। ऐसे वर्ग ‘बन्द’ (closed) वर्ग होते हैं और यदि इनके बीच अति विभेद कियार् जार्ए तो जार्ति-व्यवस्थार् क निर्मार्ण हो जार्तार् है। जब वर्ग आनुवंशिक बन जार्तार् है तो उसे, कूले के अनुसार्र, जार्ति कहते हैं। वर्ग तथार् जार्ति में अन्तर की प्रमुख बार्तें हैं

1. उन्मुक्त बनार्म-बन्द (Open vs. closed) वर्ग जार्ति की अपेक्षार् अधिक उन्मुक्त होतार् है। हिलर (Hiller) ने लिखार् है, वर्ग व्यवस्थार् उन्मुक्त व्यवस्थार् होती है। यदि संस्तरीकरण में उदग्र गतिशीलतार् (vertical mobility) बंद होती है तो यह वर्ग-व्यवस्थार् न रहकर जार्ति-व्यवस्थार् बन जार्ती है। चूंकि वर्ग उन्मुक्त और नमनीय होतार् है सार्मार्जिक गतिशीलतार् सुगम होती है। मार्नव अपने उद्यम एवं परिश्रम से अपनार् वर्ग बदल सकतार् है तथार् उच्च सार्मार्जिक प्रस्थिति प्रार्प्त कर सकतार् है। यदि कोई मनुष्य मजदूर वर्ग में जन्म लेतार् है तो उसके लिए आजीवन उस वर्ग में रहनार् तथार् उसी में मृत्यु को पार् जार्नार् आवश्यक नहीं है। वह जीवन में सफलतार् एवं धन के लिए प्रयार्स करतार् है, तथार् सम्पत्ति से अपनी प्रस्थिति को बदल सकतार् है। जार्ति-व्यवस्थार् में अपनी जार्ति-प्रस्थिति को बदलनार् असम्भव है। एक बार्र मनुष्य क जन्म जिस जार्ति में हो जार्तार् है, वह आजीवन उसी में रहतार् है तथार् उसके बच्चों क भार्ग्य भी यही होतार् है।

इस प्रकार, जार्ति एक बन्द वर्ग है। व्यक्ति क सार्मार्जिक पद उसकी जार्ति के पद से निर्धार्रित होतार् है, उसकी अपनी उपलिब्मार् क इस पद पर कोई प्रभार्व नहीं पड़तार्। दूसरी ओर, वर्ग की सदस्यतार् वंशार्नुगत आधार्र पर निर्भर नहीं होती, अपितु व्यक्ति की सार्ंसार्रिक उपलिब्मार्यों पर निर्भर करती है। इस प्रकार, वर्ग-व्यवस्थार् उन्मुक्त एवं नमनीय व्यवस्थार् होती है, जबकि जार्ति-व्यवस्थार् बन्द एवं अनमनीय होती है।

2. दैविक-बनार्म-धर्मनिरपेक्ष (Divine vs. secular) दूसरे, जार्ति-व्यवस्थार् को दैविक क्रिधार्न समझार् जार्तार् है। मैकाइवर ने लिखार् है, यदि कठोर धामिक आग्रह नहीं होते तो जार्ति के निश्चित सीमार्ंकन क निर्वार्ह नहीं कियार् जार् सकतार् थार्। जार्ति को अपनी अलौकिक उत्पत्ति की व्यार्ख्यार् के सार्थ धामिक विश्वार्स जार्ति-व्यवस्थार् की स्थिति के लिए अपरिहाय है। विजय के पार्रिणार्मिक रूप में दार्सतार् अथवार् अधीनतार् से हिन्दू जार्ति-रचनार् उद्भूत हुई होगी और शार्यद अन्तर्विवार्ही समुदार्य को दूसरे समुदार्य के अधीन करने के द्वार्रार् प्रजार्ति की शक्ति, प्रतिष्ठार् तथार् गर्व द्वार्रार् समूहों के सार्मार्जिक पृथक्करण के सार्थ जार्ति-प्रथार् उत्पन्न हुई होगी। वार्स्तव में ये समूह स्पष्ट सार्मार्जिक चिमें से अलग नहीं किए गए हैं, परन्तु उनक पृथक्करण परिणार्मिक स्थिति के बुद्धिकरण से हुआ है और धामिक सदस्यों से वे ‘अमर’ बनार्ए गए हैं। प्रत्येक व्यक्ति क यह धामिक दार्यित्व है कि वह अपने मामार्नुसार्र अपने जार्ति-सम्बन्धार्ी कर्तव्यों को पूरार् करे। भगवद्गीतार् में ईश्वर ने चार्रों जार्तियों के कार्यो एवं कर्तव्यों को निर्धार्रित कर दियार् है। व्यक्ति को अपनी जार्ति के कर्तव्यों को पूरार् करनार् चार्हिए, अन्यथार् उसक पुनर्जन्म निम्न जार्ति में होगार्, तथार् उसे मोक्ष-प्रार्प्ति नहीं होगी। निम्न जार्ति के लोग यदि अपने कर्तव्यों को पूरार् करते हैं तो उनक अगलार् जन्म उच्च जार्ति में होगार्। यदि धर्म ने जार्ति-व्यवस्थार् को पवित्र एवं अनुल्लंघनीय न बनार् दियार् होतार् तो भार्रत में यह इतनी शतार्ब्दियों तक जीवित न रहती। दूसरी ओर, समार्ज के वर्गीय स्तरीकरण में दैवीय उत्पत्ति क कोई प्रश्न नहीं है। वर्गो की उत्पत्ति धर्मनिरपेक्ष है। उनक आधार्र धामिक विश्वार्स नहीं है।

3. अन्तर्विवार्ही (Endogamous) तीसरे, जार्ति-व्यवस्थार् में विवार्ह-सार्थियों क चयन जार्ति के अन्दर ही होतार् है। सदस्यों को अपनी जार्ति के अन्दर ही विवार्ह करनार् होतार् है। जार्ति से बार्हर विवार्ह करने वार्ले व्यक्ति को जार्ति से बहिष्कृत कर दियार् जार्तार् है। वर्ग-व्यवस्थार् में ऐसे कोई प्रतिबन्मार् नहीं होते। मार्नी व्यक्ति निर्मार्न कन्यार् से बिनार् जार्ति बहिष्कृत हुए विवार्ह कर सकतार् है। शिक्षित कन्यार् अशिक्षित व्यक्ति से शिक्षकों के वर्ग से बार्हर निकाले गए बिनार् विवार्ह कर सकती है।

4. वर्ग चेतनार् (Class consciousness) चतुर्थ, वर्ग क निर्मार्ण करने हेतु वर्ग-चेतनार् आवश्यक तत्व है, परन्तु जार्ति के सदस्यों में ऐसी किसी आत्मपरक चेतनार् की अनिवायतार् नहीं है।

5. प्रतिष्ठार् (Prestige) पार्ंचक्रें, विभिन्न जार्तियों की सार्पेक्ष सार्मार्जिक प्रतिष्ठार् सुनिर्धार्रित है, परन्तु वर्ग-व्यवस्थार् में प्रतिष्ठार् क कोई अनमनीय निर्धार्रित क्रम नहीं होतार्। अभी हार्ल ही में सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने मंडल विवार्द में अपनार् निर्णय देते हुये जार्ति को पिछड़े वर्ग क निर्धार्रक घोषित कियार् है एवं तथार्कथित अग्रिम जार्तियों के व्यक्तियों चार्हे वह शैक्षिक अथवार् आर्थिक रूप में कितने ही पिछड़े हुये हों, को पिछड़े वर्गो की परिभार्षार् में सम्मिलित नहीं कियार् है। इस प्रकार, न्यार्यार्लय के निर्णय अनुसार्र, जार्ति एवं वर्ग समार्नाथक हो गये हैं।

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