चुनार्व आयोग क गठन, कार्य एवं प्रक्रियार्

चुनार्व आयोग क गठन 

इसकी शुरुआत उद्देशिक से ही हो जार्ती है भार्रतीय संविधार्न की उद्देशिक यह उद्घोशित करती है कि भार्रत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतन्त्रार्त्मक गणरार्ज्य है। लोकतन्त्र भार्रतीय संविधार्न क एक मूलभूत ढ़ँार्चार् है। किसी भी प्रजार्तार्न्त्रिक व्यवस्थार् वार्ले देश के लिए चुनार्व एक महत्वपूर्ण प्रक्रियार् होती है। चुनार्व द्वार्रार् न केवल जन प्रतिनिधि क निर्धार्रण होतार् है अपितु जनतार् द्वार्रार् जनतार् की सरकार क भी चयन होतार् है। चर्चिल ने लोकतन्त्रार्त्मक गणरार्ज्य के लिए कहार् कि इसमें एक सार्धार्रण व्यक्ति सार्धार्रण से कागज पर क्रार्स लगार्तार् है। लोकतन्त्र के स्थार्यित्व के लिए चुनार्व की महत्तार् को देखते हुए संविधार्न में एक पृथक एवं स्वतन्त्र निर्वार्चन आयोग क प्रार्वधार्न कियार् गयार् है जो रार्ज्य तथार् केन्द्र सरकारों के नियन्त्रण से बार्हर होगार्।

भार्रत क निर्वार्चन आयोग एक स्थार्यी संवैधार्निक निकाय है। संविधार्न के उपबंधों के अनुरूप 25 जनवरी 1950 को इसकी स्थार्पनार् की गयी, अनुच्छेद 324 में प्रार्वधार्न कियार् गयार् है कि-

  1. संविधार्न के अधीन संसद और प्रत्येक रार्ज्य के विधार्नमंडल के लिए करार्ए जार्ने वार्ले सभी निर्वार्चनों के लिए तथार् रार्श्ट्रपति और उपरार्श्ट्रपति के पदों के निर्वार्चनों के लिए निर्वार्चक नार्मार्वली तैयार्र करार्ने क और उन सभी निर्वार्चनों के संचार्लन क अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण, एक आयोग में निहित होगार् (जिसे इस संविधार्न में निर्वार्चन आयोग कहार् गयार् है)।
  2. निर्वार्चन आयोग मुख्य निर्वार्चन आयुक्त और उतने अन्य निर्वार्चन आयुक्तों से, यदि कोर्इ हों, जितने रार्श्ट्रपति समय-समय पर नियत करें, मिलकर बनेगार् तथार् मुख्य निर्वार्चन आयुक्तों और अन्य निर्वार्चन आयुक्तों की नियुक्ति, संसद द्वार्रार् इस निमित्त बनाइ गर्इ विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, रार्श्ट्रपति द्वार्रार् की जार्एगी।
  3. जब कोर्इ अन्य निर्वार्चन आयुक्त इस प्रकार नियुक्त कियार् जार्तार् है तब मुख्य निर्वार्चन आयुक्त निर्वार्चन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगार्।
  4. लोक सभार् और प्रत्येक्ष रार्ज्य की विधार्न सभार् के प्रमुख सार्धार्रण निर्वार्चन से पहले तथार् विधार्न परिशद् वार्ले प्रत्येक रार्ज्य की विधार्न परिशद् के लिए प्रथम सार्धार्रण निर्वार्चन से पहले और उसके पश्चार्त् प्रत्येक द्विवाशिक निर्वार्चन से पहले, रार्श्ट्रपति निर्वार्चन आयोग से परार्मर्श करने के पश्चार्त, खंड(1) द्वार्रार् निर्वार्चित आयोग को सौंपे गए कृत्यों के पार्लन मे आयोग की सहार्यतार् के लिए उतने प्रार्देशिक आयुक्तों की भी नियुक्ति कर सकेगार् जितने वह आवश्यक समझे। 
  5. संसद द्वार्रार् बनाइ गर्इ किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्वार्चन आयुक्तों और प्रार्देशिक आयुक्तों की सेवार् की शर्तें और पदार्विधि ऐसी होंगी जो रार्श्ट्रपति नियम द्वार्रार् अवधार्रित करें। परन्तु मुख्य निर्वार्चन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधार्रों पर ही हटार्यार् जार्एगार्, जिस रीति से और जिन आधार्रों पर उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश को हटार्यार् जार्तार् है अन्यथार् नहीं और मुख्य निर्वार्चन आयुक्त की सेवार् की शतोर्ं में उसकी नियुक्ति के पश्चार्त् उसके लिए लार्भकारी परिवर्तन नहीं कियार् जार्एगार्। किसी अन्य निर्वार्चन आयुक्त यार् प्रार्देशिक आयुक्त को मुख्य आयुक्त की सिफार्रिश पर ही पद से हटार्यार् जार्एगार्, अन्यथार् नहीं। 
  6. जब निर्वार्चन आयोग ऐसार् अनुरोध करें, तब रार्श्ट्रपति यार् किसी रार्ज्य क रार्ज्यपार्ल निर्वार्चन आयोग क प्रार्देशिक आयुक्त को उतने कर्मचार्रीवृंद उपलब्ध करार्एगार् जितने खंड (1) द्वार्रार् निर्वार्चन आयोग को सौंपे गए कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हों। अत: चुनार्व आयोग क गठन निम्न लोगों को मिलकर होगार्। 
    1. मुख्य निर्वार्चन आयुक्त :- अनु0 324 के खण्ड (2) के अनुसार्र एक मुख्य निर्वार्चन आयुक्त होगार् जिसे उपखण्ड (3) के अनुसार्र अध्यक्ष के रूप में जार्नार् जार्येगार्। 
    2. अन्य निर्वार्चन आयुक्त :- अनु0 324 के खण्ड (2) के अनुसार्र उतने अन्य निर्वार्चन आयुक्त होंगे जितने रार्श्ट्रपति समय-समय पर नियत करे। खण्ड (2) के अनुसार्र मुख्य निर्वार्चन आयुक्त तथार् अन्य निर्वार्चन आयुक्तों की नियुक्ति रार्श्ट्रपति संसद द्वार्रार् बनार्यी गयी विधि के अधीन करेगार्। 
    3. प्रार्देशिक निर्वार्चन आयुक्त :-:- अनु0 324 के खण्ड (4) के अनुसार्र लोकसभार्, रार्ज्य की विधार्नसभार् और विधार्न परिशद के निर्वार्चन से पहले रार्श्ट्रपति निर्वार्चन आयोग से सलार्ह लेकर उतने प्रार्देशिक निर्वार्चन आयुक्तों को नियुक्त कर सकेगार् जितने वह उचित समझतार् है। 
    4. कर्मचार्री:-अनु0 324 के खण्ड (5) के अनुसार्र निर्वार्चन आयोग के अनुरोध पर रार्श्ट्रपति यार् रार्ज्य क रार्ज्यपार्ल निर्वार्चन आयोग यार् प्रार्देशिक आयुक्तों को उतने कर्मचार्री उपलब्ध करार्येगार् जितने आवश्यक हो। 

 इस वार्द ने अभिनिण्र्ार्ीत कियार् गयार् की अनु0 324(2) के अधीन निर्वार्चन आयुक्तों की नियुक्ति एवं पदच्युति की शक्ति रार्श्ट्रपति में है और पद समार्प्ति के आदेश को चुनौती नहीं दी जार् सकती है।

चुनार्व आयोग के कार्य

अनुच्छेद 324 के अनुसार्र स्वतन्त्र एवं निश्पक्ष चुनार्व के पश्चार्त एक लोक कल्यार्णकारी सरकार सत्तार् में आये इस हेतु निर्वार्चन आयोग को चुनार्व से सम्बन्धित कुछ कृत्य हमार्रे संविधार्न द्वार्रार् सौंपे गये हैं जो निम्नलिखित हैं।

  1. संसद और रार्ज्य विधार्नमण्डलों के निर्वार्चनों के लिए निर्वार्चक नार्मार्वली तैयार्र करार्नार् एवं निर्वार्चन करार्नार्। 
  2. रार्श्ट्रपति उपरार्श्ट्रपति के पदों के निर्वार्चनों क अधीक्षण निदेशन और नियन्त्रण करनार् और निर्वार्चन करार्नार्। 
  3. संसद तथार् रार्ज्य विधार्नमण्डलों के निर्वार्चन सम्बन्धी सन्देहो और विवार्दों के निर्णय के लिए निर्वार्चन अधिकरण नियुक्त करनार्।
  4. मूल संविधार्न के अनुसार्र निर्वार्चन आयोग चुनार्व सम्बन्धी विवार्दों को भी सुनतार् थार् परन्तु 1966 में संविधार्न में 19 वें संशोधन द्वार्रार् संशोधन करके चुनार्व यार्चिकाओं को निण्र्ार्ीत करने क अधिकार उच्च न्यार्यार्लय को दियार् गयार् है। 
  5. निर्वार्चन आयोग विभिन्न रार्जनीतिक दलों को रार्श्ट्रीय दल यार् क्षेत्रीय दल यार् अमार्न्यतार् प्रार्प्त पंजीकृत दल के रूप मार्न्यतार् प्रदार्न करतार् है और इस प्रकार मार्न्यतार् प्रार्प्त करने के आधार्र भी विनिश्चत करतार् है। 
  6. मार्न्यतार् प्रार्प्त रार्जनीति दलों को आरक्षित चुनार्व चिन्ह प्रदार्न करनार् और इस पर विभिन्न रार्जनीतिक दलों के मध्य विवार्दों क निपटार्रार् आयोग ही करतार् है। 
  7. चुनार्व क्षेत्रों क परिसीमार्कंन परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 के आधार्र पर चुनार्व आयोग करतार् है। 
  8. चुनार्व आयोग चुनार्व से सम्बन्धित आचार्र संहितार् लार्गू करवार्तार् है और आयोग द्वार्रार् लार्गू आचार्र संहितार् क पार्लन न करने वार्ले प्रत्यार्शियों तथार् रार्जनीतिक दलों के विरूद्ध आयोग कार्य भी कर सकतार् है। 
  9. चुनार्व आयोग चुनार्व यार्चिकाओं के सम्बन्ध में सरकार को आवश्यक परार्मर्श देतार् है।
  10. रार्श्ट्रपति और रार्ज्यपार्ल क्रमश: संसद और विधार्नमण्डलों के सदस्यों की अयोग्यतार्ओं के सम्बन्ध में चुनार्व आयोग से परार्मर्श कर सकते हैं।  
  11. चुनार्व आयोग अपने कार्यों के सम्बन्ध में प्रतिवेदन समय-समय पर सरकार को देतार् है।
  12. चुनार्व आयोग को किसी निर्वार्चन स्थार्न को रद्द करने की भी शक्ति प्रार्प्त है। 

 इन समस्त कार्यों हेतु चुनार्व आयोग को निम्नलिखित विधिक अधिनियमों से शक्ति प्रार्प्त होती है।

  1. लोक प्रतिनिधत्व अधि0-1950 :- इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रार्वधार्नों क अनुसरण कियार् जार्येगार् उनक उल्लेख है। 
  2. लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1951 :- इस अधिनियम के अन्तर्गत चुनार्व हेतु मतदार्न हो जार्ने के बार्द किन प्रार्वधार्नों क अनुसरण कियार् जार्येगार् इसके सम्बन्ध में प्रार्वधार्न कियार् गयार् है।
  3. परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 :- इस अधिनियम के अन्तर्गत चुनार्व क्षेत्रों के सीमार्ंकन से सम्बन्धित प्रार्वधार्न हैं। 

 कैप्टन चार्वलार् सिंह बनार्म भार्रत क निर्वार्चन आयोग, 1992 के बार्द में न्यार्यार्लय ने धार्रित कियार् कि निर्वार्चन व्ययों क ऐसार् लेखार् आयोग द्वार्रार् निर्धार्रित यार् विहित रीति में ही प्रस्तुत कियार् जार्नार् आवश्यक है। अभ्यथ्र्ार्ी उसे किसी भी रूप में नहीं पेश कर सकतार् है। धार्रार् 146 में निर्वार्चन आयोग को जार्ंच के विशय में सिविल न्यार्यार्लय की निम्नार्ंकित शक्तियार्ं प्रदत्त की गयी हैं-

  1. किसी व्यक्ति को सार्क्ष्य हेतु समन करनार्,
  2. कोर्इ दस्तार्वेज यार् अभिलेख मँगवार्नार्,
  3. उसक शपथ पर परीक्षण करनार्,
  4. शपथ पत्र पर सार्क्ष्य प्रार्प्त करनार्, 
  5. सार्क्षियों यार् दस्तार्वेजों की परीक्षार् के लिये कमीशन निकालनार्, आदि।

नन्दलार्ल शर्मार् बनार्म निर्वार्चन आयोग (1984) के वार्द में न्यार्यार्लय ने कहार् कि जार्ँच में निर्वार्चन आयोग क कर्त्तव्य होतार् है कि वह पक्षकारों को सुनवार्यी व दस्तार्वेज प्रस्तुत करने क अवसर प्रदार्न करे। यदि आयोग द्वार्रार् ऐसार् अवसर प्रदार्न कर दियार् जार्तार् है, तो फिर जार्ँच में उच्च न्यार्यार्लय के हस्तक्षेप की आवश्यकतार् नहीं रह जार्ती है।

चुनार्व की प्रक्रियार्

चुनार्व की प्रक्रियार् हेतु निम्नलिखित आवश्यकतार्ऐं जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के द्वार्रार् परिणीत की गयी हैं जो निम्नलिखित हैं।

1. निर्वार्चन मशीनरी

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के भार्ग 4 में निर्वार्चन के संचार्लन के लिये मशीनरी क प्रार्वधार्न कियार् गयार् है। निर्वार्चन को सफल बनार्ने के लिए एक मशीनरी की आवश्यक होती है। जिसक अधीक्षण, निर्देशन व नियन्त्रण निर्वार्चन आयोग में भार्रतीय संविधार्न के अनुच्छेद 324(1) के अनुसार्र निहित होगार्। निर्वार्चन आयोग एक स्वतन्त्र निकाय है। उच्चतम न्यार्यार्लय की तरह सरकारी कार्यकारिणी तंत्र के बिनार् हस्तक्षेप में यह अपनी गतिविधियों को निर्बार्ध रूप से संचार्लित करतार् है। इस मशीनरी में मुख्य रूप से निम्न व्यक्ति जुड़े होते हैं-

  1. मुख्य निर्वार्चन अधिकारी/आयुक्त 
  2. जिलार् निर्वार्चन अधिकारी/आयुक्त 
  3. रिटनिर्ंग आफीसर 
  4. पीठार्सीन आफीसर
  5. पोलिंग आफीसर आदि। 

अनुच्छेद 324(2) के अनुसार्र निर्वार्चन आयोग, मुख्य निर्वार्चन आयुक्त और उतने अन्य निर्वार्चन आयुक्तों से, जितने रार्श्ट्रपति समय-समय पर संसद द्वार्रार् बनाइ गयी विधि के अधीन नियुक्त किये जार्येंगे, बनेगार्।
जो बहुत प्रमुख व हमेशार् व्यवहार्र में आने वार्ले अधिकारी हैं उनको 3 श्रेणियों मेंं बार्ँटार् जार् सकतार् है।
प्रथम श्रेणी :-

  1. इलेक्शन कमीशनर 
  2. चीफ इलेक्टोरल आफीशर
  3. डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफीसर। 

 द्वितीय श्रेणी –

  1. एजेंट/ पुलिस फोर्स

1 . इलेक्शन कमीशन :- इलेक्शन कमीशन देश क सबसे बड़ार् अधिकारी है। देश के चुनार्व से सम्बन्धित सभी कार्यवार्ही इसके द्वार्रार् संपार्दित किये जार्ते हैं। सरकारी हस्तक्षेप इसमें अपेक्षित नहीं है, परन्तु इसके द्वार्रार् केवल कानूनी व्यार्ख्यार् के मार्मले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों क आदर कियार् जार्तार् है।

2  . चीफ इलेक्टोरल ऑफीसर:- चीफ इलेक्टोरल ऑफीसर हर स्टेट के चुनार्व क प्रमुख है तथार् दिशार्-निर्देश व्यवस्थार् और नियन्त्रण पर इसी क आदेश प्रभार्वी होतार् है। मुख्य निर्वार्चन आयुक्त के अतिरिक्त अन्य निर्वार्चन आयुक्तों की नियुक्ति के संदर्भ में सुप्रीमकोर्ट ने एस0एस0 धमोआ बनार्म भार्रत संघ, (1991) सु0को0 में अवधार्रित कियार् कि अनुच्छेद 324(2) में निर्वार्चन आयुक्तों की नियुक्ति एवं पदच्युति की शक्ति रार्श्ट्रपति में निहित है। रार्श्ट्रपति जितनार्, उचित समझे उतने आयुक्त नियुक्त कर सकतार् है और यदि कार्य समार्प्त हो जार्तार् है तो पद को समार्प्त भी कर सकतार् है। पद समार्प्ति के आदेश को चुनौती नहीं दी जार् सकती है।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धार्रार् 20 में मुख्य निर्वार्चन अधिकारी के सार्धार्रण कर्त्तव्यों क उल्लेख कियार् गयार् है इसके अनुसार्र मुख्य निर्वार्चन अधिकारी क कर्त्तव्य है कि निर्वार्चन आयोग के अधीक्षण निर्देशन व नियन्त्रण के अधीन रहते हुए निर्वार्चनों के संचार्लन क पर्यवेक्षण (superview) करें।

3. डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफीसर :- आर0 पी0 एक्ट 1951 की धार्रार् 20क के अनुसार्र जिलार् निर्वार्चन अधिकारी क कर्त्तव्य मुख्य निर्वार्चन अधिकारी के अधीक्षण निर्देशन व नियन्त्रण के अधीन रहते निर्वार्चन में जुड़े सब कार्यों क समन्वय व पर्यवेक्षण करनार् है। इसक कार्य चुनार्व की व्यवस्थार् करनार् है। उसके प्रति निर्देश देनार्, और चुनार्व को नियन्त्रित करनार् है। यह जिलार् भर क चुनार्व संचार्लक है।

4. चुनार्व अधिकारी :- -जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धार्रार् 21 प्रार्वधार्न करती है कि एक रिटर्निंग आफीसर भी होगार्। यह सरकार क यार् स्थार्नीय अधिकारी (प्रार्धिकारी) क आफीसर, रार्ज्य सरकार के परार्मर्श से होगार्। पशुपति नार्थ सुकुल बनार्म नेमचन्द्र जैन (1984) सु0को0 में उच्चतम न्यार्यार्लय ने अवधार्रित कियार् कि ‘सरकारी आफीसर’ क मतलब केवल कार्यकारी अधिकारी भर से नहीं है, चुनार्व प्रक्रियार् में यह सरकारी आफीसर, कार्यवार्ही विधार्यिक व न्यार्यिक तीनों प्रकार की अधिकारितार् को ग्रहण करतार् है।

धार्रार् 22 के अनुसार्र निर्वार्चन आयोग किसी रिटनिर्ंग आफीसर की उसको कृत्यों के पार्लन में सहार्यतार् करने के लिए एक यार् अधिक व्यक्तियों को सहार्यक रिटनिर्ंग आफीसर के रूप में नियुक्त कियार् जार् सकेगार्, परन्तु सहार्यक रिटनिर्ंग आफीसर के पद के लिए वही व्यक्ति योग्य होगार् जो सरकार क स्थार्नीय प्रार्धिकारी क आफीसर होगार्।

हर सहार्यक रिटनिर्ंग आफीसर, रिटनिर्ंग आफीसर के अधीन रहते हुए उनके सभी कार्यों को यार् उनमें से किसी कार्य को करने के लिये सक्षम होगार्, परन्तु रिटनिर्ंग आफीसर के जो कार्य नार्म निर्देशन की संवीक्षार् से सम्बन्धित है उनमें से किसी को कोर्इ सहार्यक रिटनिर्ंग आफीसर तब तक न कर सकेगार् जब तक कि रिटनिर्ंग आफीसर उक्त कार्य को करने में सक्षम न हो जार्ये। धार्रार् 24 के अनुसार्र चुनार्व अधिकारी क काम यह होगार् कि चुनार्व प्रभार्वपूर्ण ढंग से ऐसार् हो कि सभी कानूनी प्रार्वधार्नों क विधिवत पार्लन कियार् गयार् हो।

5. पीठार्सीन अधिकारी :-आर0पी0 एक्ट 1951 की धार्रार् 26 मे पीठार्सीन व मतदार्न अधिकारी की नियुक्ति के बार्रे में प्रार्वधार्न है। मतदार्न केन्द्रों पर मतदार्न के कार्य को सम्पार्दन करार्ने के लिये जिलार् निर्वार्चन अधिकारी द्वार्रार् पर्यार्प्त संख्यार् में पीठार्सीन अधिकारियों, मतदार्न अधिकारियों व अन्य कर्मचार्रियों की नियुक्ति की जार्येगी।

पीठार्सीन अधिकारी के किसी कारणवश अनुपस्थित रहने पर उसके कृत्यों क निर्वहन मतदार्न अधिकारी द्वार्रार् कियार् जार् सकेगार्। एस0वी0आर्इ0 स्टार्फ एसो0 बनार्म इलेक्शन कमीशन 1994 में यह निर्धार्रित कियार् गयार् कि जिलार् निर्वार्चन अधिकारी की यह शक्तियार्ँ मनमार्नी नहीं हो सकती हैं। ऐसी नियुक्तियों के विरूद्ध जिलार् निर्वार्चन अधिकारी को निर्देशित कियार् जार्नार् आवश्यक है। जिलार् निर्वार्चन अधिकारी एक ही पीठार्सीन अधिकारी को एक यार् इससे अधिक पोलिंग क कार्य सौंप सकतार् है। अत: मुख्य पीठार्सीन अधिकारी के निम्नलिखित कार्य हैं :-

  1. शार्ंन्ति व्यवस्थार् को बनार्ये रखनार्, 
  2. चुनार्व कानून क उचित रूप में पार्लन हो।

5. मतदार्न अधिकारी :-इसक काम पीठार्सीन अधिकारी की मदद करनार् है। (धार्रार् 28)

5. एजेंट :- यद्यपि यह अधिकारी नहीं है, परन्तु मतदार्तार्ओं से कुछ अधिक है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धार्रार् 40 के तहत कोर्इ भी अभ्यथ्र्ार्ी निर्वार्चन में अपने से भिन्न किसी व्यक्ति को अपनार् अभिकर्तार्/एजेन्ट विहित रीति में नियुक्त कर सकेगार् और ऐसी नियुक्ति की सूचनार् रिटनिर्ंग आफीसर को विहित रीति में अभ्यथ्र्ार्ी प्रदार्न करेगार्।

धार्रार् 41 के अनुसार्र कोर्इ भी व्यक्ति जो संसद के दोनों सदनों में से किसी क यार् किसी रार्ज्य के विधार्न मण्डल के सदन क यार् दोनों सदनों में से किसी क सदस्य होने यार् निर्वार्चन में मत देने के लिये निहित है तो वह किसी भी निर्वार्चन में अभिकर्तार् होने के लिये अर्ह होगार्। अधिकारों के तहत एक निर्वार्चन अभिकर्तार् को निर्वार्चन से सम्बन्धित कुछ कार्य प्रदार्न किये जार्ते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  1. धार्रार् 36(1) के तहत नार्म निदेशनों की जार्ँच व संविक्षार् तथार् परीक्षण के लिये रिटर्निंग आफीसर के आदेशार्नुसार्र हार्जिर होंगे। 
  2. अभ्यथ्र्ार्ी की अभ्यथ्र्ार्ीतार् को वार्पस लेने के लिये अभ्यथ्र्ार्ी द्वार्रार् लिखित सूचनार् को रिटनिर्ंग आफीसर को प्रदत्त करनार् (धार्रार् 37(1))। 
  3. विहित रीति में अभिकर्तार्ओं व अवमुक्ति अभिकर्तार्ओं की नियुक्ति करनार् (धार्रार्-46) 
  4.  मतदार्न केन्द्रों में उपस्थित व मतदार्न अभिकर्तार् यार् गठन अभिकर्तार् के कृत्यों क पार्लन करनार् (धार्रार्-58) 
  5. मतगणनार् के समय उपस्थित रहने वार्ले गठन अभिकर्तार् की नियुक्ति करनार् (धार्रार्-47)
  6. गठन के समय उपस्थित रहनार् और यदि आवश्यक हो तो गठन अभिकर्तार् के कृत्यों को पूर्ण करनार्। 
  7. चुनार्व के व्ययों क शुद्ध व अलग लेखार् करनार् जो कि उसके द्वार्रार् किये गये हैं।

सार्मार्न्यत: अभिकर्तार् 3 प्रकार के होते हैं –

  1. निर्वार्चन
  2. मतदार्न
  3. गठन 

अभ्यर्थी कभी भी अभिकर्तार् की नियुक्ति क प्रतिसंहरण कर सकेगार्। अभिकर्तार् की मृत्यु हो जार्ने पर अभ्यर्थी उसके स्थार्न पर नयार् अभिकर्तार् नियुक्त कर सकेगार्।

धार्रार् 46 के अनुसार्र मतदार्न केन्द्रों पर अभिकर्तार् के रूप में कार्य करने के लिये अभ्यर्थी द्वार्रार् मतदार्न अभिकर्तार् की नियुक्ति की जार् सकेगी। अभिकर्तार् की नियुक्ति क पत्र अभ्यर्थी द्वार्रार् हस्तार्क्षरित होनार् चार्हिये, परन्तु ऐसार् नियुक्ति पत्र यार् प्रार्रूप अविधिमार्न्य होगार् जो अभ्यर्थी द्वार्रार् हस्तार्क्षरित भी हो और दार्खिल भी उसके द्वार्रार् कियार् गयार् हो, परन्तु उसमें अभिकर्तार् के नार्म किसी अन्य द्वार्रार् लिखे गये हों।

मतदार्न अभिकर्तार् क मुख्य कार्य मतदार्न से पूर्व बैलेट बार्क्स क परीक्षण करनार् और यह देखनार् कि वे मतदार्न के लिये उचित कार्यवार्हक आदेश में तैयार्र किये गये हैं तथार् यह देखनार् कि बैलेट बॉक्स उस स्थार्न पर रखे जार्यें जहार्ँ मतदार्न की गुप्ततार् बनी रहे, तथार् हृदयवेशी को चुनौती देनार् तथार् रजिस्टर यार् निर्वार्चक नार्मार्वली की अपने पते में उन व्यक्तियों के नार्म चढ़ार्नार् जो कि आये व मतदार्न दियार् तथार् मतदार्न के बार्द यह देखनार् कि सार्दे बैलेट पेपर, टेंडर बैलेट पेपर, वार्पसी गतपत्र (Return ballat papers) तथार् टेंडर गत की सूची और आपत्ति गत (Challenged Votes) उचित रूप से सीलबन्द पैकेटों में रख दिये गये हैं। (नियम 32, 33, 36, 44, 45 व 46 के 1961)

धार्रार् 47 के अनुसार्र मतगणनार् के समय उपस्थित रहने के लिये अभ्यथ्र्ार्ी द्वार्रार् गणन अभिकर्तार् की नियुक्ति की जार् सकती है ऐसी नियुक्ति की सूचनार् भी रिटनिर्ंग आफीसर को देनार् आवश्यक होगार्। गणन अभिकर्तार् क मुख्य कार्य मतों की गणनार् के समय उपस्थित रहनार् है और यह देखनार् है कि गणनार् सही ढंग से पूर्ण हो रही है। 

8. पुलिस फोर्स:- यह सहज व्यवस्थार् के लिये अलग से लगार्ये जार्ते हैं। इनक सीधार् सम्बन्ध चुनार्व प्रक्रियार् से न होकर शार्न्ति व व्यवस्थार् बनार्ये रखनार् है।

2. रार्जनैतिक दलों क रजिस्ट्रीकरण

संसदीय शार्सन पद्धति में रार्जनैतिक दलों क महत्वपूर्ण स्थार्न होतार् है। जहार्ँ तक दलीय व्यवस्थार् क प्रश्न है यह मुख्यतयार् दो प्रकार की हो सकती है। द्विदलीय व्यवस्थार् तथार् बहुदलीय व्यवस्थार्। भार्रत में बहुदलीय व्यवस्थार् को अंगीकृत कियार् गयार् है। भार्रत में नार्गरिकों क कोर्इ भी संगम यार् निकाय (Body) रार्जनैतिक दल के रूप में गठित हो सकतार् है, परन्तु उसे अस्तित्व में तभी मार्नार् जार्तार् है जब वह निर्वार्चन आयोग द्वार्रार् पंजीकृत कर लियार् जार्ये।

आर0 पी0 एक्ट 1951 की धार्रार्-29क (भार्ग-4क) के तहत दलों के रजिस्ट्रीकरण के बार्रे में उपबन्ध कियार् गयार् है। उपरोक्त धार्रार् के अनुसार्र कोर्इ भी नार्गरिक कोर्इ भी संगम यार् निकाय, जो स्वयं को रार्जनैतिक दल कहतार् है और जो इस भार्ग के उपबन्धों क लार्भ उठार्नार् चार्हतार् है, उसे रार्जनैतिक दल के रूप में रजिस्ट्रीकरण करार्ने के लिये निर्वार्चन आयोग को आवेदन करेगार्। ऐसार् प्रत्येक आवेदन संगम यार् निकाय बनार्ये जार्ने की तार्रीख के ठीक आगार्मी 30 दिन के भीतर कियार् जार्येगार्। इसमें निम्नलिखित तत्व शार्मिल होंगे।

  1. संगम यार् निकाय क नार्म,
  2. वह रार्ज्य जिसमें उसक प्रधार्न कार्यार्लय स्थित है, 
  3. वह पतार् जिस पर उसके लिये आशार्यित पत्र और अन्य संसूचनार्यं भेजी जार्यें, 
  4. उसके अध्ययक्ष सचिव, कोशार्ध्यक्ष और अन्य पदार्धिकारियों के नार्म,
  5. उसके सदस्यों की संख्यार् और यदि उसके सदस्यों के प्रवर्ग हैं, तो प्रत्येक प्रवर्ग की संख्यार्, 
  6. क्यार् उसके कोर्इ स्थार्नीय एकक हैं? यदि हैं तो किन स्तरों पर हैं, सदस्य यार् किन्हीं सदस्यों द्वार्रार् उसक प्रतिनिधित्व कियार् जार्तार् है, यदि कियार् जार्तार् है तो ऐसे सदस्यों की संख्यार्। 

आयोग ऐसे संगम यार् निकाय के प्रतिनिधियों को सुनवाइ क अवसर प्रदार्न कर रजिस्ट्रीकरण के आवेदन को-

  1.  स्वीकार कर सकतार् है यार्
  2. अस्वीकार कर सकतार् है।

यद्यपि इस सम्बन्ध में आयोग क विनिश्चय अंन्तिम होतार् है, लेकिन इसे उच्च न्यार्यार्लय में चुनौती दी जार् सकती है। जब तक कि आयोग द्वार्रार् विनिश्चय न कर दियार् जार्ये। सोशलिस्ट पाटी बनार्म इलेक्शन कमीशन ऑफ इण्डियार् (1993) के वार्द में न्यार्यार्लय ने कहार् कि उच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् परमार्देश रिट (Write of Mandomus) तभी जार्री की जार् सकती है। जब निर्वार्चन आयोग द्वार्रार् आवेदन पत्र निरस्त कर दियार् जार्ये।

3. चुनार्व खर्च

आर0पी एक्ट 1951 की धार्रार् 77 व Conduct of Election Rules 1961 नियम (86-90) में निर्वार्चन व्यय क वर्णन कियार् गयार् है। धार्रार् 76 के अनुसार्र निर्वार्चन व्यय से तार्त्पर्य केवल लोकसभार् व रार्ज्यसभार् के निर्वार्चनों के व्यय है।

धार्रार् 77 के अनुसार्र निर्वार्चन में प्रत्येक अभ्यथ्र्ार्ी (प्रत्यार्शी) यार् उसक निर्वार्चन अभिकर्तार्, नार्मार्ंकन की तार्रीख से परिणार्मों की घोशणार् की तार्रीख तक (दोनों दिन लेते हुए) के प्रत्येक व्यय क चार्हे वह प्रत्यार्शी द्वार्रार् किये गये हो यार् अभिकर्तार् द्वार्रार्, प्रथक और सही लेखार् यार् तो प्रत्यार्शी स्वयं करेगार् यार् अपने निर्वार्चन अभिकर्तार् द्वार्रार् रखवार्येगार्। नियम 86 के अनुसार्र अभ्यथ्र्ार्ी यार् उसके निर्वार्चन अभिकर्तार् द्वार्रार् जो निर्वार्चन व्ययों क लेखार् दिन-प्रतिदिन के व्यय की हर एक मद के लिये निम्न प्रकार से करेगार्-

  1. वह तिथि जिसको व्यय उपगत यार् प्रार्धिकृत कियार् गयार् थार् 
  2. व्यय की प्रकृति (उदार्हरणाथ यार्त्रार्, डार्क यार् छपाइ आदि) 
  3. व्यय की रकम (A) भुगतार्न की हुर्इ रकम (B) अदत की हुर्इ रकम
  4. भुगतार्न की तिथि 
  5. भुगतार्न पार्ने वार्ले क नार्म व पतार्, 
  6. भुगतार्न की गर्इ रकम की स्थिति में वार्उचरों (Entry) की क्रम संख्यार्, 
  7. अदत (परार्देय, Out standing) रकम की स्थिति में विपत्रों की यदि कोर्इ हो क्रम संख्यार्,
  8. उस व्यक्ति क नार्म व पतार् जिसे अदत रकम देनार् है।

व्यय की प्रत्येक मद के लिये वार्उचर अभिप्रार्प्त कियार् जार्येगार् सिवार्य उन मार्मलों के जिनमें व्यय डार्क व्यय यार् रेल द्वार्रार् यार्त्रार् यार् ऐसे मार्मलों में कियार् गयार् है। जिनमें वार्उचर अभिप्रार्प्त करनार् सम्भव नहीं है। समस्त वार्उचर प्रत्यार्शी यार् उसके निर्वार्चन अभिकर्तार् द्वार्रार् भुगतार्न की तार्रीख के क्रम से और क्रम संख्यार्कित करके निर्वार्चन व्ययों के लेखों के सार्थ दार्खिल किये जार्येगें और ऐसे वार्उचर भुगतार्न की गयी रकम की स्थिति में वार्उचरों के क्रम संख्यार्क के अन्तर्गत दर्ज किये जार्येगें।

नियम 87 के अन्तर्गत लेखार् पेश होने पर निर्वार्चन अधिकारी 2 दिन में उसकी सूचनार् एक सूचनार् फलक पर लगवार्येगार्। जिनमें- (i) लेखार् दार्खिल करने की तिथि, (ii) अभ्यथ्र्ार्ी क नार्म (iii) लेखों के परीक्षण क समय व स्थार्न क उल्लेख होगार्। नियम 88 के अन्तर्गत कोर्इ भी व्यक्ति निर्धार्रित शुल्क क संदार्य करके ऐसे लेखों क निरीक्षण कर सकेगार् तथार् उनकी अनुप्रमार्णित प्रतियार्ँ प्रार्प्त कर सकेगार्।

नियम 90 में अधिकतम निर्वार्चन व्यय रार्शि क उल्लेख होगार्। नियम 88 के अंतर्गत कोर्इ भी व्यक्ति निर्धार्रित शुल्क क संदार्य करके ऐसे लेखों क निरीक्षण कर सकेगार् तथार् उनकी अनुप्रमार्णित प्रतियार्ँ प्रार्प्त कर सकेगार्।
नियम 90 में अधिकतम निर्वार्चन व्यय रार्शि क उल्लेख कियार् गयार् है जो हर रार्ज्यों मे अलग-अलग है। उत्तर प्रदेश में संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिये 15 लार्ख है व विधार्न सभार् निर्वार्चन क्षेत्र के लिये 6 लार्ख हैं। धार्रार् 77 के स्पश्टीकरण के अनुसार्र यदि अभ्यथ्र्ार्ी क यह कथन है कि कोर्इ व्यय किसी रार्जनैतिक दल यार् अर्थ संगठन निकाय स्वयं के द्वार्रार् कियार् गयार् व्यय नहीं हैं। महार्रार्ज पार्टोलियार् बनार्म आर0 के. बिड़लार्, 1971, के बार्द में सर्वोच्च न्यार्यलय ने कहार् कि निर्धार्रित सीमार् से अधिक व्यय करनार् भ्रश्ट आचरण मार्नार् जार्तार् है लेकिन यदि कोर्इ व्यक्ति स्वेच्छार् से किसी प्रत्यार्शी के लिये धन व्यय करतार् है और इस कार्य में अभ्यथ्र्ार्ी यार् उसके अभिकर्तार् की पूर्व सहमति नहीं होती है तो इसे धार्रार् 77 (1) के अंतर्गत प्रत्यार्शी द्वार्रार् कियार् गयार् व्यय नहीं मार्नार् जार् सकतार् है। धार्रार् 78 के अन्तर्गत हर प्रत्यार्शी निर्वार्चित प्रत्यार्शी के निर्वार्चन की तार्रीख से यार् यदि निर्वार्चन में एक से अधिक अभ्यथ्र्ार्ी है और उनके निर्वार्चन की तार्रीख से 30 दिन के अन्दर अपने निर्वार्चन व्ययों क लेखार् जो उस लेखे की सही प्रति (मूल प्रति) होग, जिलार् निर्वार्चन ऑफीसर के पार्स दार्खिल करेगार्।

4. प्रत्यार्शी

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 की धार्रार् 79 के खण्ड (ख) के अनुसार्र प्रत्यार्शी क तार्त्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो किसी निर्वार्चन में अपने को प्रत्यार्शी के रूप में प्रस्तुत करतार् है। संसद के सदस्यों के लिए अर्हतार्ए- अनुच्छेद 84 के अनुसार्र कोर्इ व्यक्ति संसद के किसी स्थार्न को भरने के लिए चुने जार्ने के लिए तभी अर्हित होगार् जब-

(i) वह भार्रत क नार्गरिक हो और निर्वार्चन आयोग द्वार्रार् इस विभिन्न प्रार्धिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रार्रूप के अनुसार्र शपथ लेतार् है यार् प्रतिज्ञार्न करतार् है और उस पर अपने हस्तार्क्षर करतार् है।

व्यक्ति भार्रत क नार्गरिक जन्म से हो सकतार् है और रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति भी नार्गरिक हो सकतार् है। एवं इस व्यक्ति को जब शपथ दिलार्यी जार्ती है तो वह नार्मार्ंकन से पूर्व होती है। एवं भार्रतीय संविधार्न की तीसरी अनुसूची में निर्वार्चन अधिकरी यार् ऐसे व्यक्ति जिसे निर्वार्चन आयोग ने प्रधिकृत कियार् है के समक्ष शपथ लेतार् है। अगर व्यक्ति शपथ लेने से इंकार कर देतार् है तो उसक नार्म निरस्त कर दियार् जार्तार् है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति आज्ञार्त्मक प्रकृति के प्रार्वधार्नों को मार्नने के लिए बार्ध्य है।

(ii) वह रार्ज्यसभार् में स्थार्न के लिए कम से कम 30 वर्श की आयु क और लोक सभार् में कम से कम 25 वर्श की आयु क होनार् चार्हिए। अगर कोर्इ व्यक्ति अपनी आयु के बार्रे में कोर्इ व्यौरार् नार्म निर्देशन पत्र में नहीं देतार् है तो उसक नार्म निर्देशन पत्र खार्रित कर दियार् जार्येगार्। परन्तु लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 की धार्रार् 36 (4) के अनुसार्र रिटर्निंग आफीसर किसी नार्म निर्देशन पत्र को ऐसी किसी त्रुटि के आधार्र पर जो सार्रवार्न रूप की नहीं है, निरस्त नहीं करेगार्।

ब्रजेन्द्र गुप्तार् बनार्म ज्वार्लार् प्रसार्द (1987) इस वार्द में प्रत्यार्शी ने अपनी आयु क जिक्र नार्म निर्देशन पत्र में नहीं कियार् थार् तो उसक नार्म निर्देशन पत्र रिटर्निंग आफीसर ने खार्रिज कर दियार् जब मार्मलार् निर्वार्चन आयोग के समक्ष गयार् तो भी निर्वार्चन आयोग ने रिटर्निंग आफीसर के निर्णय को मार्न्य रखार्। परन्तु जब हाइ कोर्ट में वार्द दार्यर कियार् गयार् तो हाइकोर्ट ने व्यक्ति के पक्ष में फैसलार् करते हुए कहार् कि आयु क विवरण देनार् जरूरी नहीं है और उसक नार्म निर्देशन पत्र खार्रिज नहीं कियार् जार्नार् चार्हिए। परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय को पुन: पलटते हुए कहार् कि नार्म निर्देशन पत्र में आयु क विवरण देनार् आवश्यक है अन्यथार् पत्र खार्रिज कर दियार् जार्येगार्।

(iii) उसके पार्स अन्य योग्यतार्एं होनी चार्हिए, जो संसद द्वार्रार् बनाइ गयी विधि द्वार्रार् विहित की गयी हो।

1. रार्ज्य सभार् की सदस्यतार् के लिए अर्हतार्ये

लोक प्रति0 अधि0 1951 की धार्रार् 3 के अनुसार्र सन् 2003 के संशोधन के पश्चार्त् रार्ज्य सभार् क सदस्य होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्यार्शी देश (भार्रतवर्श) यार् उसके किसी भार्ग में के किसी संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिये निर्वार्चक हो।

परन्तु सन् 2003 के संशोधन के पहले रार्ज्यसभार् क सदस्य होने के लिए प्रत्यार्शी को सम्बन्धित रार्ज्य के किसी क्षेत्र के किसी संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक होनार् होतार् थार्। परन्तु यदि किसी व्यक्ति क नार्म निर्वार्चक नार्मवली में नहीं है तो वह रार्ज्य सभार् किसी सदस्यतार् के लिए प्रत्यार्शी नहीं हो सकतार् है।

2. लोकसभार् सदस्यतार् के लिए अर्हतार्ये

लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1951 की धार्रार् 4 के अनुसार्र लोकसभार् की सदस्यतार् के लिए निम्नार्ंकित बार्ते आवश्यक हैं।

  1. यदि कोर्इ व्यक्ति किसी रार्ज्य में अनुसूचित जार्ति के लिए आरक्षित स्थार्न हेतु चुनार्व लड़नार् चार्हतार् है तो यह आवश्यक है कि 
    1. वह उस रार्ज्य की अनुसूचित जार्तियों में से किसी एक क सदस्य हो, तथार् 
    2. उस रार्ज्य के संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक हो।
  2. यदि कोर्इ व्यक्ति किसी रार्ज्य में (आसार्म के स्वशार्सी जिलों को छोड़कर) अनुसूचित जनजार्ति के लिए आरक्षित स्थार्न हेतु चुनार्व लड़नार् चार्हतार् है तो यह आवश्यक है कि-
    1. वह उस रार्ज्य की अनुसूचित जनजार्तियों में से किसी एक क सदस्य हो, 
    2. उस रार्ज्य के संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक हो।
  3. यदि कोर्इ व्यक्ति आसार्म के स्वार्शार्सी जिलों में की अनुसूचित जन जार्तियों के लिए आरक्षित स्थार्न हेतु चुनार्व लड़नार् चार्हतार् है तो यह आवश्यक है कि- 
    1. वह उन अनुसूचित जन जार्तियों में से किसी एक क सदस्य हो तथार् 
    2. ऐसे स्वार्शार्सी जिले को सम्मलित करने वार्ले संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक हो। 
  4. यदि कोर्इ व्यक्ति लक्षद्वीप के संघ रार्ज्य क्षेत्र में अनुसूचित जन जार्तियों के लिए आरक्षित स्थार्न हेतु चुनार्व लड़नार् चार्हतार् है तो यह आवश्यक हैं कि 
    1. वह उन अनुसूचित जन जार्तियों में से किसी व्यक्ति क सदस्य हो तथार् 
    2. वह उस रार्ज्य क्षेत्र के संसदीय निर्वार्चन के लिए निर्वार्चक हो।

3. विधार्न सभार् की सदस्यतार् के लिए अर्हतार्ये

लोक प्रतिनि0 अधि0 1951 की धार्रार् 5 अनुसार्र विधार्न सभार् की सदस्यतार् के लिए निम्नार्ंकित बार्ते आवश्यक है। (i) कोर्इ व्यक्ति जिस रार्ज्य में जार्ति यार् अनुसूचित जन जार्ति के लिए आरक्षित स्थार्न हेतु चुनार्व लड़नार् चार्हतार् है तो यह आवश्यक है कि –

  1. वह उस रार्ज्य की अनुसूचित जार्ति यार् जनजार्ति क सदस्य हो। तथार् 
    1. उस रार्ज्य के किसी विधार्न सभार् निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक हो। 
  2. आसार्म के स्वार्शार्सी जिले के अनुसूचित जनजार्ति के लिए आरक्षित स्थार्न हेतु चुनार्व लड़नार् चार्हतार् हो तो यह आवश्यक है कि 
    1. वह स्वार्शार्सी जिले की अनुसूचित जनजार्तियों में से किसी एक क सदस्य हो तथार् 
    2. ऐसे स्वार्शार्सी जिले को सम्मिलित करने वार्ले सभार् निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक क्षेत्र के लिए निर्वार्चक हो। 
  3. किसी अन्य रार्ज्य में स्थार्न की दशार् में वह उस रार्ज्य में के किसी सभार् निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक हो।

4. विधार्न परिशद की सदस्यतार् के लिए अर्हतार्यें

लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1951 की धार्रार् 6 के अनुसार्र विधार्न परिशद की सदस्यतार् के लिए निम्नार्ंकित बार्ते आवश्यक हैं।

  1. रार्ज्यों की विधार्न परिशदों की सदस्यतार् के लिये उस रार्ज्य के किसी विधार्न सभार् निर्वार्चन क्षेत्र क निर्वार्चक होनार् आवश्यक है। 
  2. यदि कोर्इ स्थार्न विधार्न परिशद में रार्ज्यपार्ल द्वार्रार् नार्म निर्देशन से भरार् जार्नार् है तो ऐसे व्यक्ति को उस रार्ज्य क मार्मूली तौर से निवार्सी होनार् आवश्यक है।

5. निर्वार्चक नार्मार्वली

संसदीय निर्वार्चन तथार् विधार्न सभार् निर्वार्चन के लिए निर्वार्चक नार्मार्वलियार्ँ तैयार्र की जार्ती है। इन नार्मवलियों में निर्वार्चन में मतदार्न के लिये अहर्य व्यक्तियों क उल्लेख रहतार् है। सार्मार्न्य तौर पर निर्वार्चक नार्मवली से तार्त्पर्य उस नार्मार्वली से है जिसमें किसी व्यक्ति क नार्म रजिस्टर्ड होने पर वह निर्वार्चन में मत डार्लने क अधिकारी होगार्। संिधार्न के अनुच्छेद 325 के अनुसार्र किसी भी निर्वार्चक नार्मार्वली को धर्म, मूलवंश जार्ति, लिंग यार् इनमें से किसी आधार्र पर तैयार्र नहीं कियार् जार्येगार् एवं इन आधार्रों पर किसी व्यक्ति को मत देने से वंचित भी नहीं कियार् जार्येगार्।

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 23 की उपधार्रार् 3 के अनुसार्र किसी भी व्यक्ति क नार्म निर्वार्चन नार्मार्वली में नार्म निर्देशन की तार्रीख तक शार्मिल कर लियार् जार्नार् चार्हिए उसके बार्द किसी भी व्यक्ति क नार्म शार्मिल नही कियार् जार्एगार्।

इस प्रकार निर्वार्चन नार्मार्वली से तार्त्पर्य उस नार्मार्वली से है जिसमें प्रति योग्य व्यक्ति क नार्म होगार् जो मत देने क अधिकारी है। संसदीय निर्वार्चन क्षेत्रों के लिये निर्वार्चक नार्मार्वलियार्ँ लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम की धार्रार् 13 (घ) के अनुसार्र जम्मू कश्मीर रार्ज्य और ऐसे संघ रार्ज्य क्षेत्रों जिनमें विधार्नसभार् नहीं है को छोड़कर सभी संसदीय क्षेत्रों के लिए निर्वार्चक नार्मार्वलियार्ँ अलग से तैयार्र नहीं की जार्एगी बल्कि संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के लिए उतने विधार्नसभार् निवाचन क्षेत्रों की निर्वार्चक नार्मार्वलियार्ं प्रयुक्त हो जार्येगी जितने विधार्न सभार् निर्वार्चन क्षेत्र एवं संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र में आते हैं।

परन्तु अनुच्छेद 371 (क) के खंड (2) में बतार्यी गयी समयार्विधि के लिए नार्गार्लैण्ड के संसदीय निर्वार्चन क्षेत्र के उस भार्ग के लिए जो टयूनसार्ंग जिले में समार्विश्ट है, निर्वार्चक नार्मार्वली पृथक रूप से तैयार्र की जार्येगी और पुनरीक्षित होगी।

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम की धार्रार् 14 (क) के अनुसार्र निर्वार्चन क्षेत्र से तार्त्पर्य सभार् निर्वार्चन क्षेत्र से तार्त्पर्य सभार् निर्वार्चन क्षेत्र (विधार्न सभार् निर्वार्चक क्षेत्र) से है। धार्रार् 14(ख) के अनुसार्र अर्हतार् की तार्रीख से तार्त्पर्य हर निर्वार्चक नार्मार्वली में उस तार्रीख से है जो विधि द्वार्रार् विहित की गयी है।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 15 के अनुसार्र प्रत्येक निर्वार्चन क्षेत्र के लिए एक निर्वार्चक नार्मार्वली होगी जो कि निर्वार्चन आयोग के अधीक्षण एवं निर्देशन में तैयार्र की जार्येगी।

यहार्ँ पर निर्वार्चन क्षेत्र से तार्त्पर्य विधार्नसभार् निर्वार्चन क्षेत्र से है। संविधार्न के अनुच्छेद 327 के अनुसार्र संसद समय-समय पर विधि द्वार्रार् संसद यार् किसी रार्ज्य विधार्नमण्डल के निर्वार्चन क्षेत्र के लिए निर्वार्चक नार्मार्वली तैयार्र करार्ने से सम्बन्धित विधि बनार्एगी।

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 16 के अनुसार्र निम्नव्यक्तियों क नार्म निर्वार्चक नार्मार्वली में शार्मिल नहीं कियार् जार्येगार्।

  1. वे व्यक्ति जो भार्रत के नार्गरिक नहीं है। 
  2. वे व्यक्ति जिन्हें सक्षम न्यार्यार्लय द्वार्रार् विकृतचित्त्ार् घोशित कर दियार् गयार् है। 
  3. वे व्यक्ति जो भ्रश्ट आचरण अथवार् अन्य अपरार्धों से जुड़ होने के कारण विधिनुसार्र निर्वार्चक नार्मार्वली में अपनार् नार्म सम्मिलित करार्ने के पार्त्र नहीं है।

परन्तु यदि कोर्इ व्यक्ति जिसक नार्म निर्वार्चक नार्मार्वली में रजिस्ट्रीकृत हो गयार् है और उसके उपरार्न्त भ्रश्ट आचरण अथवार् अन्य किसी अपरार्ध के कारण मतदार्न के लिए अयोग्य हो जार्तार् है तो भी उसक नार्म निर्वार्चक नार्मार्वली से हटार् दियार् जार्येगार्। परन्तु इसके उपरार्न्त आरोप खत्म हो जार्ने पर उसक नार्म पुन: निर्वार्चक नार्मार्वली में सम्मिलित कर लियार् जार्येगार्।

तेन्यार् देवी बनार्म तार्को देवी (1989) के वार्द में न्यार्यार्लय ने अभिनिर्धार्रित कियार् कि जब एक बार्र निर्वार्चक नार्मार्वली अंतिम रूप से तैयार्र और प्रकाशित हो जार्ती है तथार् उस निर्वार्चक नार्मार्वली के आधार्र पर निर्वार्चन भी सम्पन्न हो जार्तार् है तो कालार्न्तर में ऐसे निर्वार्चन की वैधतार् को त्रुटिपूर्ण निर्वार्चक नार्मार्वली के आधार्र पर चुनौती नहीं दी जार्ती जार् सकती। लोकप्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 17 के अनुसार्र किसी भी व्यक्ति क नार्म एक से अधिक निर्वार्चन क्षेत्रों की निर्वार्चक नार्मार्वलियों में रजिस्ट्रीकृत नहीं कियार् जार् सकतार् है। बार्बूरार्म बनार्म मणिक रार्व (1999) इस वार्द में न्यार्यार्लय ने अभिनिर्धार्रित कियार् कि यदि किसी व्यक्ति क नार्म एक से अधिक निर्वार्चन क्षेत्रों की निर्वार्चक नार्मार्वलियों में दर्ज हो गयार् है तो उसे इस आधार्र पर विधार्नसभार् के चुनार्व में खड़ार् होने के लिए अयोग्य घोशित नहीं कियार् जार् सकतार् है।

आर्इ. वी. सेनार् बनार्म होकिशे सेनार् (1999) इस वार्द में न्यार्यार्लय ने अभिनिर्धार्रित कियार् कि यदि किसी व्यक्ति क नार्म एक से अधिक निर्वार्चक नार्मार्वलियों नार्मार्वलियों मे विद्यमार्न है तो उसे उनमें से किसी एक क चुनार्व करतार् होगार् और उसे उसी निर्वार्चन क्षेत्र में मतदार्न करनार् होतार् है। यदि वह सभी निर्वार्चन क्षेत्रों में मतदार्न करतार् है तो वह शून्य मार्नार् जार्येगार्। लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 19 के अनुसार्र निर्वार्चक नार्मार्वली में नार्म रजिस्ट्रीकृत करार्ने की शर्तें निम्नलिखित है-

  1. व्यक्ति की आयु 18 वर्श होनी चार्हिए। 
  2. निर्वार्चक निर्वार्चन क्षेत्र की जिस निर्वार्चन नार्मार्वली में है उस निर्वार्चन क्षेत्र क मार्मूली तौर से निवार्सी हो। सन् 1989 के संशोधन के पूर्व निर्वार्चक नार्मवली में नार्म रजिस्ट्रीकृत करार्ने की आयु 21 वर्श थी परन्तु इसके उपरार्न्त इसे घटार्कर 18 वर्श कर दियार् गयार्। 
  3. मार्मूली तौर से निवार्सी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 20 मार्मूली तौर से निवार्सी के अर्थ को बतार्ती है। मार्मूली तौर पर निवार्स तार्त्पर्य ऐसार् अधिवार्स है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति किसी निश्चित स्थार्न पर सार्मार्न्य रूप से रह रहार् हो।

1. निर्वार्चक नार्मार्वली की तैयार्री और पुनिरीक्षण

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धार्रार् 21 की उपधार्रार् (1) के अनुसार्र प्रत्येक निर्वार्चन के क्षेत्र के लिए नार्मार्वली
अर्हतार् की तार्रीख के प्रति निर्देश से (ii) विहित रीति से तैयार्र की जार्एगी।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 21 की उपधार्रार् (2) अनुसार्र निर्वार्चन नार्मार्वली क परीक्षण लोक सभार् यार् किसी रार्ज्य की विधार्न सभार् के हर एक सार्धार्रण निर्वार्चन से पहले तथार् निर्वार्चन क्षेत्र आंतरित स्थार्न में आकस्मिकरिक्ति भरने के लिए हर एक उपनिर्वार्चन से पहले अहर्तार् की तार्रीख के प्रति निर्देश से कियार् जार्एगार्।

उपधार्रार् (3) के अनुसार्र उपधार्रार् (2) में किसी बार्त के होते हुए भी निर्वार्चन आयोग किसी भी निर्वार्चन क्षेत्र यार् निर्वार्चन-क्षेत्र के भार्ग के लिए निर्वार्चक नार्मार्वली के ऐसी रीति से जिसे वह ठीक समझे पुरीक्षण के लिए किसी भी समय आदेश दे सकतार् है। मार्त्र उपधार्रार् 3 में से ऐसार् किये जार्ने के कारणों को अभिलिखित करनार् आवश्यक होगार्।

2. निर्वार्चक नार्मार्वली की प्रवश्टियों क शुद्धीकरण

लोक प्रधिनिधत्व अधिनियम 1950 की धार्रार् (22) निर्वार्चक नार्मार्वलियों की प्रविश्टियों के शुद्धिकरण के बार्रे में प्रार्वधार्न करती है। धार्रार् 22 के अनुसार्र किसी निर्वार्चन क्षेत्र के निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को यदि जार्ँच के पश्चार्त् यह समार्धार्न हो जार्तार् है कि उस निर्वार्चन क्षेत्र की निर्वार्चक नार्मार्वली में –

  1. कोर्इ प्रविश्टि गलत यार् त्रुटिपूर्ण है, अथवार् 
  2. किसी निर्र्वार्चक ने अपनार् मार्मूली निवार्स स्थार्न बदल दियार् है। अथवार्
  3. निर्वार्चक की मृत्यु हो गयी है।

तो निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण आफीसर, ऐसे किन्हीं सार्धार्रण यार् विशेश देशों के (जैसे-निर्वार्चन आयोग इनसे सम्बन्धित कोर्इ निर्देश दे) अधीन रहते हुए इन प्रविश्टियों को संशोधित कर सकेगार्, अन्यत रख सकेगार् यार् निकाल भी सकेगार्। परन्तु कोर्इ कार्यवार्ही करने से पूर्व निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण आफिसर सम्बद्ध व्यक्ति को सुनवाइ क अवसर प्रदार्न करेगार्।

3. निर्वार्चक नार्मार्वलीयों में नार्मों क सम्मिलित कियार् जार्नार्

लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1950 की धार्रार् 23 की उपधार्रार् (1) के अनुसार्र कोर्इ व्यक्ति जिसक नार्म उसके निर्वार्चन क्षेत्र के निर्वार्चक नार्मार्वली में सम्मिलित नहीं है। उस नार्मार्वली में अपनार् नार्म सम्मिलित करार्ने के लिए निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को आवेदन करेगार्। उपधार्रार् (2) के अनुसार्र यदि रजिस्ट्रीकरण आफिसर को यह समार्धार्न हो जार्तार् है कि आवेदक नार्मार्वली में रजिस्ट्रीकृत किये जार्ने क हकदार्र है तो उसक नार्म सम्मिलित कियार् जार्येगार्। परन्तु यहार्ँ पर यदि आवेदक क नार्म पहले किसी अन्य निर्वार्चित क्षेत्र की निर्वार्चक नार्मार्वली में सम्मिलित है तो निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण आफीसर उस अन्य निर्वार्चन क्षेत्र के निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण आफीसर को इस बार्त की जार्नकारी उपलब्ध करार्येगार् और ऐसी जार्नकारी प्रार्प्त होने के पश्चार्त् वह उस नार्मार्वली से आवेदक के नार्म को हटार् देगार्।

परन्तु उपधार्री (3) के अनुसार्र यदि किसी निर्वार्चक नार्मार्वली में किसी व्यक्ति क नार्म सम्मलित कियार् जार्नार् हो तो वह नार्मार्ंकन पत्र दार्खिल करने की अन्तिम तार्रीख से पूर्व ही सम्मलित कर लियार् जार्नार् चार्हिए। नार्मार्ंकन पत्र दखिल करने की अंितमतिथि के पश्चार्त् ऐसार् कोर्इ नार्म सम्मलित नहीं कियार् जार्एगार्।

4. निर्वार्चक नार्मार्वली के सम्बन्ध में मिथ्यार् घोशणार्एँ करनार्

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धार्रार् 31 दण्डार्त्मक व्यवस्थार् के बार्रे में प्रार्वधार्न करती है इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कृत्यों को दण्डनीय अपरार्ध मार्नार् गयार् है।

  1. किसी निर्वार्चन नार्मार्वली की तैयार्री ; पुरीक्षण यार् शुद्धि के संबंध में मिथ्यार् कथन यार् घोशणार् करनार्।
  2. निर्वार्चक नार्मार्वली में किसी प्रविश्टि को सम्मिलित यार् आपवर्जित करने के सम्बन्ध में मिथ्यार् कथन यार् घोशणार् करनार्। परन्तु धार्रार् 31 वही लार्गू हो जहार्ँ किसी कथन अथवार् घोशणार् क (i) मिथ्यार् होनार्, यार् (ii) मिथ्यार् होने क ज्ञार्न होनार् यार् (iii) मिथ्यार् होने क विश्वार्स होनार् यार् (iv) उसके सत्य नहीं होने क विश्वार्स होनार् पर्यार्प्त है।

5. निर्वार्चक नार्मार्वलीयों की तैयार्री आदि से संशक्त पदीय कर्तव्यों क भंग 

अधिनियम की धार्रार् 32 के अनुसार्र निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी सहार्यक निर्वार्चक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तथार् अन्य व्यक्तियों क यह कर्तव्य है कि वे

  1.  निर्वार्चक नार्मार्वलियार्ँ तैयार्र करने, 
  2.  उनक पुनरीक्षण करने 
  3.  उनमें शुद्धि करने 
  4.  किसी प्रविश्टि को निर्वार्चक नार्मार्वली में सम्मिलित करने, अथवार् 
  5. अपवर्जित करने, के अपने पदीय कृत्यों क समुचित पार्लन एवं निर्वहन करे। 

यदि कोर्इ अधिकारी यार् व्यक्ति बिनार् किसी युक्तियुक्त हेतु के अपने उक्त पदीय कृत्यों क निर्वहन नहीं करतार् है तो उसे न्यूनतम तीन मार्ह एंव अधिकतम दो वर्श तक के अवधि के कारार्वार्स एवं जुर्मार्ने से दण्डित कियार् जार्येगार्। 1 अगस्त 1996 के संशोधन से पहले इसके लिए केवल पार्ँच सौ रू0 तक जुर्मार्ने क प्रार्वधार्न थार्। लेकिन लोक प्र0 (संशोधन) अधि0 द्वार्रार् इसे न्यूनतम तीन मार्ह एवं अधिकतम दो वर्श तक की अवधि के कारार्वार्स एवं जुर्मार्ने से दंडनीय बनार् दियार् गयार् है।

6. मतदार्तार् क मतार्धिकार

संविधार्न के अनु0 326 के अनुसार्र संसद और रार्ज्य विधार्न मण्डलों के लिए निर्वार्चन वयस्क मतार्धिकार के आधार्र पर होगार्। प्रत्येक वह व्यक्ति जो भार्रत क नार्गरिक है तथार् 18 वर्श की आयु पूरी कर चुक है तथार् अनिवार्स, चित्त, विकृति, अपरार्ध यार् भ्रश्ट आचरण के कारण विधि द्वार्रार् अयोग्य घोशित न कियार् गयार्, मत देने क अधिकार रखतार् है।

पहले मत देने क अधिकार 21 वर्श की आयु के व्यक्तियों को थार् परन्तु संविधार्न के 61वें संशोंधन अधिनियम 1988 द्वार्रार् यह आयु 21 वर्श से घटार्कर 18 वर्श कर दी गयी। धार्रार् 62 मत देने के अधिकार से सम्बन्धित प्रार्वधार्न करती है धार्रार् 62 की उपधार्रार् (1) के अनुसार्र निर्वार्चन में मत देने क अधिकार उसी व्यक्ति को प्रार्प्त होगार् जिसक नार्म उस क्षेत्र की निर्वार्चक नार्मार्वली में उपस्थित है जिसक नार्म निर्वार्चक नार्मार्वली में उपस्थित नहीं है वह मत देने क अधिकारी नहीं है।

लक्ष्मी चरन सेन बनार्म ए0 के0 एम0 हुसैन (1999) के वार्द में निण्र्ार्ीत हुआ कि मत देने के अधिकार को भी एक अपरिहाय आवश्यकतार् के रूप में मार्नार् जार्नार् चार्हिए। संग्रार्म सिंह बनार्म भार्रत संघ के वार्द में न्यार्यार्लय ने स्पश्ट रूप में कहार् कि मत देने क अधिकार मूल अधिकार न होकर एक संविधिक अधिकार है।

धार्रार् 62 की उपधार्रार् (2) के अनुसार्र ऐसार् कोर्इ भी व्यक्ति मत देने क अधिकार नहीं रखतार् है जिसे अधिनियम 1950 की धार्रार् 16 के अधीन अयोग्य घोशित कर दियार् गयार्।

धार्रार् 62 की उपधार्रार् (3) के अनुसार्र कोर्इ भी व्यक्ति सार्धार्रण निर्वार्चन में एक से अधिक बार्र मत नहीं देगार् भले ही उसक नार्म एक से अधिक निर्वार्चन क्षेत्रों में उपस्थित हो। और यदि वो ऐसार् करतार् है तो उसके मत शून्य होंगें। धार्रार् 62 की उपधार्रार् (4) के अनुसार्र कोर्इ भी व्यक्ति एक ही निर्वार्चन क्षेत्र में एक से अधिक बार्र मत नहीं देगार् भले ही उसक नार्म एक ही निर्वार्चन क्षेत्र की निर्वार्चक नार्मार्वली में एक से अधिक बार्र उपस्थित हो। यदि वो ऐसार् करतार् है तो उसके सभी मत शून्य होंगें।

धार्रार् 62 की उपधार्रार् (5) के अनुसार्र निम्नलिखित व्यक्ति किसी निर्वार्चन में मतदार्न नहीं करेगार्।

  1. वह व्यक्ति जो कारार्वार्स में परिरूद्ध है। यार् 
  2. अन्यथार् कारार्वार्स में परिरूद्ध है। यार् 
  3. पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षार् में है।

परन्तु यदि कोर्इ व्यक्ति निवार्रक निरूद्धि के अन्र्तगत है तो वह मतदार्न कर सकेगार्।

अकुल चन्द्र प्रधार्न बनार्म भार्रत संघ (2001) इस वार्द में कहार् गयार् कि कोर्इ व्यक्ति जिसे जेल में यार् पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षार् में होने के कारण मत देने के अधिकार से वंचित कर दियार् गयार् है वह यह नहीं कह सकतार् कि अनुच्छेद 14 और 19 क उल्लंघन हुआ है। धार्रार् 62(5) क उद्देश्य स्वतन्त्र एवं निश्पक्ष चुनार्व को बढ़ार्वार् देनार् है जो कि संविधार्न क आधार्रभूत ढार्ंचार् है। मत देने क अधिकार एक कानूनी अधिकार है जो कानून की सीमार्ओं के अन्तर्गत है। कोर्इ भी कैदी सार्मार्न्य व्यक्ति की तरह इन अधिकार क दार्वार् नहीं कर सकतार् है।

धार्रार् 62 की उपधार्रार् (6) के अनुसार्र- एक व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन रहते हुए प्रतिनिधि के तौर पर दो मत डार्ल सकतार् है और यह उपधार्रार् (3) तथार् उपधार्रार् (4) क उल्लंघन नहीं होगार्।

उदार्हरणाथ एक व्यक्ति जिसकी निर्वार्चन में ड्यूटी लगती है तो वह एक प्रपत्र भरकर (जो कि निर्वार्चन आयोग द्वार्रार् विहित हो) अपनार् मत डार्लने क अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को दे सकतार् है, परन्तु यहार्ँ पर यह आवश्यक है कि दोनों व्यक्ति एक ही निर्वार्चन क्षेत्र के होने चार्हिए।

इसी अधिनियम की धार्रार् 11(क) के अनुसार्र किसी व्यक्ति को मत देने के अधिकार से वंचित कियार् जार् सकतार् है यदि उसने निम्न में से कोर्इ अपरार्ध कियार् है।

  1. भार्0द0सं0 1860 की धार्रार् 171(ड़) के अधीन रिश्वत लेने के लिए दण्डित कियार् गयार् हो। 
  2. भार्0द0सं0 1860 की धार्रार् 171(च) के अधीन निर्वार्चन मं असम्यक असर डार्लने यार् प्रतिरूपण के लिए दण्डित कियार् गयार् हो। 
  3. लो0प्र0 अधिनियम 1951 की धार्रार् 125 के अधीन निर्वार्चन के सम्बन्ध में विभिन्न वर्गों के बीच में यार् भार्रत के नार्गरिकों के बीच में घृणार् की भार्वनार्एं यार् शत्रुतार् की भार्वनार्एं फैलार्यी हों। 
  4. लोक प्रति0 अधिनियम 1951 की धार्रार् 135 के अधीन मतदार्न केन्द्रों से मत पत्र हटार्ने क अपरार्ध कियार् हो। 
  5. लो0प्र0 अधिनियम 1951 की धार्रार् 136(2)(क) अधीन निर्वार्चन अपरार्ध के लिए दण्डित कियार् गयार् हो।

इस धार्रार् के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को 6 वर्श के लिए मतदार्न देने से वंचित कियार् जार् सकतार् है।
इस प्रकार मत देने क अधिकार एक विधिक अधिकार है। जिसकी मार्ंग मूल अधिकार के रूप में नही की जार् सकती है, परन्तु सार्धार्रण परिस्थितियों में इसे किसी व्यक्ति से नहीं छीनार् जार् सकतार् है।

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