चावार्क दर्शन क्यार् है? –

चावार्क दर्शन क्यार् है?

By Bandey

अनुक्रम

लोक में अन्यन्त प्रिय लोकायत- दर्शन ही चावार्क-दर्शन कहलार्तार् है। देवतार्ओं के गुरू बृहस्पति द्वार्रार् प्रणीत होने के कारण इसक नार्म बाहस्पत्य-दर्शन है। ईश्वर और वेद के प्रार्मार्ण्य क सर्वथार् खण्डन करने के कारण यह ‘नार्स्तिक दर्शन’ है। भार्रतीय दर्शन में बौद्ध-जैन इत्यार्दि अन्य दर्शनों को भी नार्स्तिक की संज्ञार् दी जार्ती है, परन्तु नार्स्तिकों में अग्रणी होने के कारण चावार्क-दर्शन ‘नार्स्तिक-शिरोमणि’ दर्शन समझार् जार्तार् है। इस दर्शन में पृथ्वी, जल, तेज और वार्यु आदि जड़-तत्वों की ही सत्तार् स्वीकार की गयी है, अत: यह दर्शन जड़वार्दी यार् भौतिकवार्दी कहार् गयार् है। पृथ्वी आदि भौतिक तत्वों के संयोग से स्वभार्वत: सृष्टि होती है, अत: इन दर्शनों क तत्व-मीमार्ंसार् सम्बन्धी विचार्र स्वभार्ववार्दी (naturalistic) मार्नार् गयार् है। जीवन में केवल सुख को ही पुरुषाथ मार्ननेवार्ले चावार्क क आचार्र-शार्स्त्र सम्बन्धी दृश्टिकोण सुखवार्दी (hedonistic) मार्नार् गयार् है।

वार्ल्मीकि रार्मार्यण में लोकायत ब्रार्ह्मणों क उल्लेख कियार् गयार् है। ‘‘क्वचिन्न लार्कायतिकान् ब्रार्ह्मणार्ंस्तार्त सेवते’’ शंकारार्चाय के अनुसार्र देह से भिन्न आत्मार् की सत्तार् नहीं मार्नने वार्ले लोकायत है। हरिभद्र सूरि के षड्दर्शन समुच्चय में चावार्क के लिए लोकायत शब्द क ही प्रयोग कियार् गयार् है। श्री वार्चस्पति मिश्र ने अनुमार्न केार् अप्रमार्ण मार्ननेवार्लों को ‘लोकायतिक’ कहार् गयार् है। ‘‘अनुमार्नप्रमार्णमिति लोकायतिका:’’ वार्त्स्यार्न ने भी चावार्क के लिए लोकायत शब्द क ही प्रयोग कियार् है। इन उद्धरणों से यह सिद्ध है कि चावार्क दर्शन क दूसरार् नार्म लोकायत है तथार् इस दर्शन के मार्ननेवार्लों को लोकायतिक कहते हैं। लोकायत और चावार्क इन्हीं दो नार्मों से यह दर्शन प्रसिद्ध है। प्रत्यक्ष, परिदृश्यमार्न इस लोक में सर्वार्धिक प्रसार्र के कारण ही इस दर्शन क नार्म सम्भवत: लोकायत (लोक आयत) पड़ार्। विद्वार्नो क मार्ननार् है कि वेद, उपनिशद, रार्मार्यण, महार्भार्रत, स्मृति, पुरार्ण आदि सभी कालों में यह मत प्रचलित थार् और यही इन दर्शन की लोकप्रियतार् भी है तथार् लोकायत नार्म को साथक बनार्तार् है। चावार्क-व्यक्ति-विशेष और सार्म्प्रदार्य-विशेष दोनों क नार्म है।


अस्तु ऐतिहार्सिक दृष्टि से कहार् जार् सकतार् है कि लोकप्रख्यार्ति के कारण ‘लोकायत कहलार्नेवार्ले दर्शन के सर्वप्रथम आचाय चावार्क हुए।’ ये वृहस्पति के शिष्य थे । इन्होंने बाहस्पत्य दर्शन क समार्ज में बहुत जोरों से प्रचार्र कियार् । अत: चावार्क नार्मक व्यक्ति विशेष के द्वार्रार् प्रचार्रित होने के कारण यह दर्शन चावार्क कहलार्ने लगार्। व्यक्ति विशेष के अतिरिक्त चावार्क सम्प्रदार्य-विशेष को भी नार्म है। चार्रू और वार्क् के योग से चावार्क शब्द बनतार् है। जिसक अर्थ है सुन्दर (चार्रु) वचन (वार्क्) वार्ले। चावार्क-दर्शन के उपदेश बड़े मीठे हैं। यथार्-

यार्वत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वार् धृतं पिबेत्।

भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरार्गमनंकुत:।।

अर्थार्त् जब तक जीओ, सुखपूर्वक जीओ, कर्ज लेकर भी घी पीओ, मरने के बार्द शरीर जलकर भस्म हो जार्यगार्, फिर संसार्र में आनार् कहार्ँ, इत्यार्दि सुनने में बड़े मीठे वचन हैं। कुछ लोगों क कहनार् है कि चावार्क शब्द सर्व धार्तु से बनार् है जिसक अर्थ है भोजन करनार् । इसक व्यंग्याथ है चर्वित कर जार्नार् यार् चबार् जार्नार्। दोनों अर्थों में चर्व धार्तु क प्रयोग यहार्ँ है। प्रथम भोजन अर्थ में, चावार्क ने भोज, पार्न, भोग इत्यार्दि क पूरार् उपदेश दियार् है। दूसरार् व्यंग्याथ में – चावार्क के अनुयार्यी पार्प, पुण्य, परोक्ष परलोक आदि को चबार् जार्ते हैं, अर्थार्त नहीं मार्नते, इसी कारण वे चाबार्क कहलार्ते हैं। यथार्-

चर्वन्ति भक्ष्यन्ति तत्वतो न मन्यते पुण्यपार्पार्दिकं परोक्षजार्तमिति चावार्का:।।

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