चयन क अर्थ, विशेषतार्एं एवं महत्व

चयन, एक संगठन के अन्तर्गत रिक्त पदों को भरने के लिए अपेक्षित पार्त्रतार्ओं तथार् सार्मथ्र्य से युक्त व्यक्तियों (वे लोग जो आवेदन करते हैं, उनके सम्पूर्ण समूह में से) को चुनने की प्रक्रियार् है। यद्यपि, संगठनों के अन्तर्गत पदोन्नति एवं स्थार्नार्न्तरण के लिए भी कुछ चयन पद्धतियार्ँ अपनार्यी जार् सकती हैं, परन्तु यहार्ँ इस अध्यार्य में हम संगठन के बार्हर से आवेदकों के चयन करने पर ध्यार्न केन्द्रित कर रहे है।

मार्नव संसार्धन प्रबन्धन के अन्तर्गत भर्ती एवं चयन दो निर्णार्यक चरण होते हैं तथार् प्रार्य: इन दोनों शब्दों को एक-दूसरे के लिए प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। परन्तु, दोनों के बीच पर्यार्प्त अन्तर होतार् है। जहार्ँ एक ओर, भर्ती सगंठनों के अन्तर्गत रिक्त पदों के लिए आवेदन करने हेतु भार्वी कर्मचार्रियों की खोज करने तथार् उन्हें प्रोत्सार्हित करने की प्रक्रियार् है, वहीं दूसरी ओर, चयन उन्ही अभ्यर्थियों के समूह में से उपयुक्त अभ्याथियों को चुनने से सम्बन्धित होतार् है। भर्ती को इसके दृष्टिकोण से सकारार्त्मक कहार् जार् सकतार् है, क्योंकि यह जितनार् सम्भव हो सके अधिक से अधिक अभ्याथियों क संगठन में आवेदन करने के लिए आकर्षित करने क प्रयार्स करतार् है, जबकि चयन अपने व्यवहार्र से नकारार्त्मक कहार् जार् सकतार् है, क्योंकि यह उपयुक्त अभ्याथियों को चुनने के उद्देश्य से जितनार् सम्भव हो सके अधिक से अधिक अयोग्य अभ्याथियों को निकाल बार्हर करने क प्रयार्स करते है। इसके अतिरिक्त पहले भर्ती की जार्ती है तथार् उसके पश्चार्त् चयन कियार् जार्तार् है। चयन के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण परिभार्षार्ओं क विवरण निम्नलिखित प्रकार से है:

  1. थॉमस एच. स्टोन के अनुसार्र, ‘‘चयन एक कार्य में सफलतार् की अत्यधिक सम्भार्वनार् से युक्त लोगों की पहचार्न करने ( तथार् पार्रिश्रमिक देकर नियुक्त करने) के उद्देश्य से आवेदकों के मध्य भेद करने की प्रक्रियार् है।’’। 
  2. अरून मोनप्पार् एवं मिर्जार् एस. सैय्यद के अनुसार्र, ‘‘ चयन आवेदन-पत्रों में से एक अथवार् अधिक आवेदकों को रोजगार्र प्रदार्न करने की प्रक्रियार् से सम्बन्धित होतार् है। 

चयन पर अत्यधिक ध्यार्न दियार् जार्नार् अत्यन्त आवश्यक होतार् है, क्योंकि एक ओर इसक अर्थ कार्य की अपेक्षार्ओं के मध्य ‘सर्वार्धिक उपयुक्त’ को तथार् दूसरी ओर अभ्यथ्र्ार्ी की पार्त्रतार्ओं को नियत करनार् होतार् है।’’

चयन प्रक्रियार् की विशेषतार्एं 

उपलिखित विवेचन के अध्ययन से चयन प्रक्रियार् की जो विशेषतार्यें सार्मने आती हैं, उनमें से कुछ प्रमुख क वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है:

  1. चयन प्रक्रियार्, मार्नव संसार्धन प्रबन्धन के अन्तर्गत एक निर्णार्यक चरण होतार् है। 
  2. चयन प्रक्रियार् के द्वार्रार् वे लोग जो आवेदन करते हैं, उनके सम्पूर्ण समूह में से, किसी कार्य में सफलतार् की अत्यधिक सम्भार्वनार् से युक्त लोगों की पहचार्न की जार्ती है। 
  3. चयन प्रक्रियार् के द्वार्रार् कुल अभ्यर्थियों में से ‘सर्वार्धिक उपयुक्त’ को चुनार् जार्तार् है। 
  4. चयन एक नकारार्त्मक दृष्टिकोण है, क्योंकि इसके द्वार्रार् अयोग्य अभ्याथियों को अस्वीकार कर दियार् जार्तार् है। 
  5. चयन प्रक्रियार् में वे अभ्यथ्र्ार्ी, जो इसके विभिन्न चरणों को पार्र करते हुए अन्त तक पहुँच जार्ते हैं, वे चुन लिये जार्ते हैं तथार् शेष अभ्यथ्र्ार्ी चयन की दौड़ से बार्हर हो जार्ते हैं। 

इस प्रकार, संक्षेप में यह कहार् जार् सकतार् है कि मार्नव संसार्धन प्रबन्धन के अन्तर्गत चयन एक ऐसी प्रक्रियार् है, जिसके द्वार्रार् संगठनों के लिए वार्ंछित योग्यतार्ओं के श्रेष्ठतार् अभ्यर्थियों क चयन करके उन्हें रोजगार्र प्रदार्न कियार् जार्तार् है तथार् शेष अभ्यर्थियों को अस्वीकार कर दियार् जार्तार् है।

चयन क महत्व 

एक संगठन की इसके लक्ष्यों को प्रभार्वपूर्ण रूप से प्रार्प्त करने तथार् एक गतिशील वार्तार्वरण में विकास करने की क्षमतार् इसके चयन कार्यक्रम की प्रभार्वशीलतार् पर अत्यधिक निर्भर करती है। इसके अतिरिक्त, योग्य कर्मचार्रियों के चयन क महत्व निम्नलिखित कारणों से भी बढ़ जार्तार् है:

  1. चयन प्रक्रियार् के मार्ध्यम से योग्य कर्मचार्रियों को चुननार् सम्भव होतार् है, जिससे संगठन की ख्यार्ति एवं प्रतिष्ठार् में वृद्धि होती है। 
  2. चयन प्रक्रियार् के द्वार्रार् यदि उपयुक्त कर्मचार्रियों क चयन कर लियार् जार्तार् है, तो वे संगठन के लिए मूल्यवार्न परिसम्पत्ति बन जार्ते हैं। 
  3. उचित ढंग से किये गये योग्य लोगों के चयन से कर्मचार्री-परिवर्तन में कमी होती है तथार् सार्थ ही कर्मचार्रियों क मनोबल भी बढ़तार् है। 
  4. एक श्रेष्ठ चयन प्रक्रियार् क अनुसरण करने से कर्मचार्रियों की संगठन के प्रति कर्तव्य-निष्ठार्, अपनत्व तथार् सहयोग की भार्वनार् में वृद्धि होती है।
  5. समुचित चयन प्रक्रियार् के अपनार्ये जार्ने से संगठन के अन्तर्गत सेवार्योजक एवं कर्मचार्रियों के मध्य मधुर सम्बन्धों की स्थार्पनार् होती है। 
  6. योग्य कर्मचार्रियों क चयन करने से संगठन की उत्पार्दन लार्गत एवं अपव्यय में कमी होती है तथार् सार्थ ही कार्यों की निष्पार्दन कुशलतार्पूर्वक होतार् है। 

चयन नीति 

चयन नीति संगठन की रोजगार्र नीति क अंग होती है। एक उत्तम चयन नीति में निम्नलिखित तथ्यों क समार्वेश अवश्य ही होनार् चार्हिये:

  1. चयन नीति को रोजगार्र उन्मुख होने के सार्थ-सार्थ व्यार्वसार्यिक मागदर्शन में सहार्यक होनार् चार्हिए। 
  2. चयन नीति, सम्पूर्ण संगठनार्त्मक नीति के अनुरूप होनी चार्हिये। 
  3. चयन नीति में, चयन करते समय देश में प्रचलित विधार्न के अनुपार्लन के विषय में प्रार्वधार्न होनार् चार्हिये। 
  4. चयन नीति सरल, स्पष्ट एवं न्यार्यसंगत होनी चार्हिये। 
  5. चयन नीति कठोर न होकर लोचशील होनी चार्हिये, तार्कि समयार्नुसार्र उसमें परिवर्तन कियार् जार् सके। 
  6. . चयन नीति में प्रत्येक स्तर के पद हेतु चयन करने के लिए प्रार्धिकारी व्यक्तियों क स्पष्ट उल्लेख कियार् जार्नार् चार्हिये। चयन क कार्य अकेले व्यक्ति के स्थार्न पर चयन-मण्डल को सार्ंपै े जार्ने क प्रार्वधार्न कियार् जार्नार् चार्हिये। 
  7. चयन नीति पक्षपार्रहित होनी चार्हिए 
  8. चयन नीति क अनुपार्लन कठोरतार् से कियार् जार्नार् चार्हिए। 

चयन प्रक्रियार् 

चयन हेतु किसी आदर्श प्रक्रियार् क प्रार्वधार्न नहीं है, जिसक सभी क्षेत्रों में सभी संगठनों द्वार्रार् अनुसरण कियार् जार् सके। विभिन्न संगठनों द्वार्रार्, संगठन के आकार, व्यवसार्य की प्रकृति, रिक्त पदों की संख्यार् एवं प्रकार तथार् प्रचलित विधार्नों के अनुपार्लन की स्थिति के आधार्र पर भिन्न-भिन्न चयन अपनी तकनीकों अथवार् पद्धतियों को अपनार्यार् जार् सकतार् है। इस प्रकार प्रत्येक संगठन अपनी सुविधार्नुसार्र तथार् अपने लिए अनुकूल चयन की कोर्इ भी एक पद्धति अथवार् अनेक पद्धतियों के संयोजन क अनुसरण कर सकतार् है।

चयन प्रक्रियार् में रोजगार्र हेतु कोर्इ अभ्यथ्र्ार्ी उपयुक्त है अथवार् नहीं, इसके विषय में निर्णय करने के लिए उसकी पार्त्रतार्ओं, अनुभव, शार्रीरिक एवं मार्नसिक क्षमतार्, स्वभार्व एवं व्यवहार्र ज्ञार्न तथार् अभिरूचि आदि के सम्बन्ध में सूचनार्यें एकत्रित करने की विभिन्न पद्धतियों क प्रयोग कियार् जार्तार् है। अत: चयन प्रक्रियार् एक अकेलार् कार्य नहीं है, बल्कि अनिवाय रूप से पद्धतियों अथवार् चरणों की एक श्रंखलार् है जिसके द्वार्रार् विभिन्न चयन तकनीकों के मार्ध्यम से भिन्न-भिन्न प्रकार की सूचनार्यें एकत्रित करने में सफलतार् प्रार्प्त की जार् सकती है।

प्रत्येक चरण पर तथ्यों के प्रकाश में आने की सम्भार्वनार् होती है जो कि कार्य की अपेक्षार्ओं एवं कर्मचार्री विशिष्टतार्ओं के सार्थ तुलनार् करने के लिए उपयोगी होते हैं। सार्मार्न्यत: एक वैज्ञार्निक चयन प्रक्रियार् के अन्तर्गत निम्नलिखित चरणों क समार्वेश कियार् जार् सकतार् हैं:

1. आवेदन-पत्रों के छँटाइ –

चयन प्रक्रियार् के अन्तर्गत, सर्वप्रथम, भर्ती के मार्ध्यम से रोजगार्र हेतु अत्यधिक संख में आकर्षित अभ्याथियों की ओर सक संठगन द्वार्रार् प्रार्प्त किये गये आवदेन-पत्रों के छँटाइ की जार्ती है। उक्त आवेदन-पत्र चयन प्रक्रियार् क मूल आधार्र होते हैं, क्योंकि इनके द्वार्रार् अभ्याथियों के विषय में सार्मार्न्य जार्नकारी प्रार्प्त की जार्ती है। तथार् उनके चयन हेतु प्रथम दृष्ट्यार् निर्णय लियार् जार्तार् है।

इस आवेदन-पत्र के द्वार्रार् अभ्यर्थियों की आयु, शैक्षिक योग्यतार्, प्रशिक्षण, अनुभव, पृष्ठभूमि तथार् अपेक्षित वेतन आदि की जार्नकारी प्रार्प्त होती है। यहार्ँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कुछ संगठनों द्वार्रार् स्वयं तैयार्र कियार् गयार् आवेदन-पत्र क प्रार्रूप ही स्वीकृत कियार् जार्तार् है, जबकि अनेक संगठन यह अभ्यर्थियों पर ही छोड़ देते हैं। कि वे जिस रूप से चार्हें अपनार् आवेदन कर सकतेहैं इस हेतु प्रार्य: आवेदन-पत्र के रूप में एक सह-पत्र के सार्थ बार्योडेटार् अथवार् रिज्यूम क उपयोग कियार् जार्तार् है।

आवेदन पत्रों की छँटाइ क उद्देश्य प्रार्रम्भिक चरण में ही जो अभ्यार्थर्ीे निर्धार्रित पद के लिए स्पष्ट रूप से अयोग्य होते हैं उन्हैं। चयन प्रक्रियार् से अलग करनार् होतार् हैं। आवेदन-पत्रों की प्रभार्वी तरीके से छँटाइ करने से समय एवं धन की काफी बचत होती है। परन्तु इस विषय में आश्वस्त होने के लिए सार्वधार्नी रखनार् अनिवाय होतार् है। कि अच्छे योग्य अभ्यार्थ्र्ार्ी छूटने न पार्ये तथार् महिलार्ओं एवं अल्पसंख्यकों को निष्पक्ष रूप से महत्व प्रदार्न कियार् जार्ये तथार् बिनार् औचित्य स्पष्ट किये उन्हें अस्वीकार न कियार् जार्ये यह भी ध्यार्न देने योग्य है कि आवेदन-पत्रों की छँटाइ के लिए प्रयोग की जार्ने वार्ली तकनीकें अभ्यर्थियों की प्रार्प्ति के स्त्रोतों तथार् भर्ती की पद्धतियों के आधार्र पर भिन्न-भिन्न हो सकती है। आवेदन-पत्रों की छँटाइ के दौरार्न जिन अभ्यर्थियों में संगठन द्वार्रार् निर्धार्रित न्यूनतम अपेक्षित योग्यतार् से कम योग्यतार् होती है, उन्हें अस्वीकार कर दियार् जार्ार्तार् है तथार् केवल योग्य अभ्यर्थियों को ही अगले चरण के लिए प्रवेश दियार् जार्तार् है।

2. प्रार्रम्भिक सार्क्षार्त्कार –

आवेदन-पत्रों की छँटाइ के द्वार्रार् जिन अभ्याथियों को चुनार् जार्तार् हैं, उन्हैं। प्रार्रम्भिक सार्क्षार्त्कार के लिए बुलार्यार् जार्तार् है। प्रार्रम्भिक सार्क्षार्त्कार अत्यन्त संक्षिप्त होतार् है। इसक उद्देश्य आवेदन-पत्रों के मार्ध्यम से अभ्याथियों की जो अयोग्यतार्यें प्रकट नहीं हो पार्ती हैं, उनको प्रत्यक्ष रूप से ज्ञार्त करके अनुपयुक्त अभ्याथियों को चयन प्रक्रियार् से हटार् देनार् होतार् है।

प्रार्रम्भिक सार्क्षार्त्कार के अन्र्तगत अभ्याथियों को कार्य की प्रकृति, कार्य के घंटों, कार्य-दशार्ओं तथार् वेतन आदि की जार्नकाी प्रदार्न की जार्ती है। सार्थ हीे, उनकी शैक्षिक योग्यतार्ओं, प्रशिक्षणों, अनुभवों, वर्तमार्न कार्यों तथार् रूचियों आदि की जार्नकारी प्रार्प्त की जार्ती है। इसके अतिरिक्त उनसे अपेक्षित वेतन तथार् वर्तमार्न कार्य को छोड़ने के विषय में कारणों की भी जार्नकारी प्रार्प्त की जार्ती है। इस प्रकार अभ्यर्थियों की वार्क्-पटुतार्, मस्तिष्क की दशार् तथार् उनके विषय में एक सार्मार्न्य जार्नकारी प्रार्प्त की जार्ती है। इससे उनके विषय में यह निर्णय लेने में सहार्यतार् प्रार्प्त होती है कि उनके चयन किये जार्ने की कुछ सम्भार्वनार्यें हैं अथवार् नहीं। इस प्रकार प्रार्रम्भिक सार्क्षार्त्कार के ज्ञार्त अयोग्य अभ्यर्थियों को छार्ँट दियार् जार्तार् है तथार् केवल योग्य अभ्यर्थियों को ही चयन प्रक्रियार् के आगार्मी चरण के लिए आमन्त्रित कियार् जार्तार् है।

3. चयन परीक्षण –

प्रार्रम्भिक सार्क्षार्त्कार के द्वार्रार् चुने गये अभ्यर्थियों को चयन परीक्षण से गुजरनार् होतार् है। यह चयन प्रक्रियार् क महत्वपूर्ण भार्ग होतार् है। सार्मार्न्यत: चयन परीक्षण मनोवैज्ञार्निक प्रकृति क होतार् है। जिसके द्वार्रार् अभ्यर्थियों की योग्यतार्ओं चार्तुर्य, कार्य अभिरूचियों तथार् व्यवहार्रों आदि क मूल्यार्कंन कियार् जार्तार् है तथार् सार्थ ही अभ्यर्थियों की कार्य क्षमतार्ओं एवं निपुणतार्ओं को भी परखार् जार्तार् है चयन परीक्षण के द्वार्रार् उचित पद के लिए उचित व्यक्ति को चुननार् अत्यन्त सरल हो जार्तार् है। चयन परीक्षण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित है:

  1. योग्यतार् परीक्षण: इन परीक्षणों के मार्ध्यम से अभ्यर्थियों की छिपी हुर्इ विशिष्टतार् योग्यतार्ओं तथार् रूझार्नों को ज्ञार्त करने क प्रत्यन कियार् जार्तार् है। इसके द्वार्रार् यह अनुमार्न लगार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् हैं कि यदि किसी अभ्यथ्र्ार्ी को चयन कर लियार् जार्य तो भविष्य में वह अपने कार्य में सफल हो पार्येगार् अथवार् नहीं। इसके सार्थ ही, परीक्षणों से किसी विशिष्ट कार्य को सीखने के लिए अभ्यथ्र्ार्ी के रूझार्न को भी ज्ञार्त कियार् जार् सकतार् है। योग्यतार् परीक्षण निम्नलिखित प्रकार के हो सकते है:
    1. बुद्धि परीक्षण: इन परीक्षणों के मार्ध्यम से अभ्यर्थियों की ग्रहण शक्ति, गणितीय प्रवृत्ति, स्मरण-शक्ति तथार् तर्क-शक्ति की जार्ँच की जार्ती है। इन परीक्षणों के पीछे आधार्रभूत मार्न्यतार् यह है कि कुशार्ग्र बुद्धि वार्लार् व्यक्ति किसी भी कार्य को शीघ्रतार् एवं सरलतार् से सीख सकतार् है। 
    2. यार्न्त्रिक योग्यतार् परीक्षण: इन परीक्षणों के मार्ध्यम से अभ्यर्थियों की यन्त्रों को पहचार्नने तथार् उन्हें सुचार्रू रूप से प्रयोग करने की क्षमतार् क मार्पन कियार् जार्तार् है। यन्त्रों पर कार्य करने वार्ले कुशल एवं तकनीकी कर्मचार्रियों के चयन हेतु इन्हीं परीक्षणें क प्रयोग कियार् जार्तार् है। 
    3. लिपिकीय योग्यतार् परीक्षण: इन परीक्षणों के मार्ध्यम से कार्यलय की क्रियार्ओं की निष्पार्दन क्षमतार् क मार्पन कियार् जार्तार् है इन परीक्षणों में वर्ण विन्यार्स गणनार् करनार्, बोध शक्ति, प्रतिलिपि बनार्नार् तथार् शब्द मार्पन आदि सम्मिलित होते है। 
  2. उपलब्धि अथवार् निष्पार्दन परीक्षण: इन परीक्षणों क प्रयोग उस समय कियार् जार्तार् है, जबकि अभ्यर्थियों द्वार्रार् विशिष्ट प्रशिक्षण प्रार्प्त किये जार्ने क दार्वार् कियार् जार्तार् है। इनके मार्ध्यम से यह ज्ञार्त करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है कि अभ्यर्थियों द्वार्रार् प्रार्प्त प्रशिक्षणों में से कितनी बार्तें वे सीख पार्य है। ये परीक्षण दो प्रकार से किये जार् सकते है:
    1. कार्य ज्ञार्न : इस परीक्षण के अन्तर्गत एक कार्य विशेष के सम्बन्ध से अभ्यर्थियों के ज्ञार्न क पतार् लगार्यार् जार्तार् है। यह मौखिक अथवार् लिखित दोनों ही प्रकार क हो सकतार् है। 
    2. कार्य-नमूनार् परीक्षण: इस परीक्षण के अन्तर्गत अभ्यर्थियों को एक वार्स्तविक कार्य के भार्ग को सम्पन्न करने के लिए कहार् जार्तार् है तथार् उनके निष्पार्दन के स्तर के आधार्र पर उनके विषय में निर्णय कियार् जार्तार् है। 
  3. स्थितिपरक परीक्षण: इस परीक्षण के मार्ध्यम से अभ्यर्थियों क वार्स्तविक जीवन से मिलती-जुलती एक परिस्थिति में मूल्यार्ंकन कियार् जार्तार् है। इस परीक्षण में अभ्यर्थियों को यार् तो किसी परिस्थिति क सार्मनार् करने के लिए, यार् फिर कार्य के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण परिस्थितियों को समार्धार्न करने के लिए कहार् जार्तार् है। तत्पश्चार्त यह देखार् जार्तार् है कि अभ्यथ्र्ार्ी किस प्रकार से तनार्वपूर्ण परिस्थिति में प्रतिक्रियार् करते है।
  4. रूचि परीक्षण: इस परीक्षण के मार्ध्यम से अभ्यर्थियों की कार्य,पद, व्यवसार्य, शौक तथार् मनोरंजनार्त्मक क्रियार्ओं के सम्बन्ध में उनकी पसन्द एवं नार्पसन्द को ज्ञार्त करने क प्रयत्न कियार् जार्तार् हैं इस परीक्षण क उद्देश्य इस बार्त क पतार् लगार्नार् होतार् है कि कोर्इ अभ्यथ्र्ार्ी जिस कार्य के लिए उसने आवेदन कियार् है, उसमें रूचि रखतार् है अथवार् नहीं तथार् सार्थ ही यह भी ज्ञार्त करनार् होतार् है कि कार्य के किस विशेष क्षेत्र कमे वह अभ्यथ्र्ार्ी रूचि रखतार् है। इस परीक्षण की आधार्रभूत मार्न्यतार् यह है कि एक कार्य के प्रति अभ्यथ्र्ार्ी की रूचि तथार् कार्य की सफलतार् के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होतार् है।

4. समूह परिचर्चार्-

समूह परिचर्चार् की तकनीक क प्रयोग, कार्य के लिए अभ्यर्थियों की उपयुक्ततार् के सम्बन्ध में अतिरिक्त सूचनार्यें प्रार्प्त करने के उद्देश्य से कियार् जार्तार् है। समूह परिचर्चार् में अभ्यर्थियों को समूह में विभार्जित करके उन्हें कोर्इ चर्चित अथवार् सार्मयिक विषय दे दियार् जार्तार् है, जिस पर उन्हें तर्क-वितर्क करनार् होतार् है। इस परिचर्चार् में अभ्यर्थियों के ज्ञार्न की गहनतार्, विचार्रों की गुणवत्तार्, स्तर एवं मौलिकतार्, कम शब्दों में अपनी बार्त समझार्ने की योग्यतार् तथार् उच्चार्रण पर विशेष ध्यार्न दियार् जार्तार् है। कोर्इ अभ्यथ्र्ार्ी अपने समूह में कितनी पहल करतार् है तथार् दूसरे सदस्यों को किस हद तक प्रभार्वित कर पार्तार् है, इसक विशेष महत्व होतार् हे। समूह में चर्चार् के समय अभ्यर्थियों की सहनशीलतार् एवं दूसरे की बार्त सुनने की क्षमतार् को भी ध्यार्नपूर्वक मार्पार् जार्तार् है। अनेक व्यार्वसार्यिक संगठनों द्वार्रार् आज कल समूह परिचर्चार् के बार्द समूह कार्य भी करवार्यार् जार्तार् है।

5. चिकित्सकीय परीक्षण-

मुख्य सेवार्योजन सार्क्षार्त्कार में योग्य पार्ये गये अभ्यर्थियों क चिकित्सकीय परीक्षण कियार् जार्तार् है। विभिन्न संगठनों में अनेक कार्य ऐसे होते हैं, जिनके लिए कुछ निश्चित शार्रीरिक योग्यतार्ओं, जैसे- स्पष्ट दृष्टि, स्पष्ट सुनने की शक्ति, असार्धार्रण शार्रीरिक शक्ति, कठोर कार्य-दशार्ओं के लिए सहन-शक्ति तथार् स्पष्ट आवार्ज आदि क होनार् नितार्न्त आवश्यक होतार् हैं। चिकित्सकीय परीक्षण के द्वार्रार् इस बार्त की जार्ँच की जार्ती है कि अभ्यर्थियों में ये शार्रीरिक योग्यतार्यें हैं। अथवार् नहीं। इसके अन्तर्गत अभ्यर्थियों के शरीर के विभिन्न अंगों एवं प्रत्यंगों की चिकित्सकों द्वार्रार् गहन जार्ँच की जार्ती है।

6. सन्दर्भों की जार्ँच-

 मुख्य सेवार्योजन सार्क्षार्त्कार तथार् चिकित्सकीय परीक्षण की समार्प्ति के पश्चार्त् मार्नव संसार्धन विभार्ग द्वार्रार् सन्दर्भों की जार्ँ की जार्ती है। विभिन्न संगठनों द्वार्रार् अभ्यर्थियों से उनके आवेदन-पत्रों में दो अथवार् दो से अधिक व्यक्तियों के नार्म व पते सन्दर्भ के रूप में दिये जार्ने की अपेक्षार् की जार्ती है। ये सन्दर्भ उन व्यक्तियों के हो सकते हैं, जो कि अभ्यर्थियों को अच्छी तरह से जार्नते हो अथवार् वे अभ्यर्थियें के पूर्ववर्ती सेवार्योजक हों तथार् जो अभ्यर्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों एवं उनके पूर्व के कार्य-निष्पार्दन के विषय में भली प्रकार से परिचित हों।

7. नियुक्ति आदेश-

 इस प्रकार अन्तिम चयन निर्णय कर लिये जार्ने के पश्चार्त् संगठन को सफल अभ्यर्थियों को इस निर्ण के विषय में सूचित करनार् होतार् हैं। इसके लिए संगठन द्वार्रार् सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति आदेश भेजार् जार्तार् है। नियुक्ति आदेश पर नियुक्ति प्रार्धिकारी क हस्तार्क्षर होनार् अनिवाय होतार् है।

चयन में आधुनिक प्रवृत्तियार्ँ 

चयन प्रक्रियार् के सार्थ-सार्थ मार्नव संसार्धन प्रबन्धन के अन्य क्षेत्रों में नवीन प्रवृत्तियार्ँ उभर कर सार्मने आयी हैं। चयन सम्बन्धी कुछ प्रमुख आधुनिक प्रवृत्तियार्ँ निम्नलिखित प्रकार से हैं:

  1. निमन्त्रण द्वार्रार् चयन: विभिन्न संगठनों के प्रबन्धनों द्वार्रार् प्रतिस्पध्र्ार्ी संगठनों के महत्वपूर्ण अधिशार्सियों एवं प्रबन्धकों के कार्य-निष्पार्दन क निरन्तर अवलोकन कियार् जार्तार् है। यदि इन अधिशार्सियों एवं प्रबन्धकों क कार्य-निष्पार्दन उत्कृष्ट होतार् है, तो प्रबन्धन आकर्षक वेतन एवं हित-लार्भों की पेशकश करने के द्वार्रार् ऐसे अधिशार्सियों एवं प्रबन्धकों को अपने संगठन में कार्य करने के लिए आमन्त्रित करते है। 
  2. ठेक करनार्: वर्तमार्न में संगठनों के लिए अति कुशलतार् के कार्यों को जार्री रखने के लिए विशेषज्ञों को नियुक्त करनार् आवश्यक होतार् है। वस्तुत: प्रौद्योगिकी में परिवर्तनों क होनार् अति-कुशल कर्मचार्रियों की मार्ँग में वृद्धि करतार् है। यह छोटे संगठनों के लिए अत्यन्त कठिन होगार् कि वे अति-कुशल कर्मचार्रियों को नियुक्त करें, क्योंकि वे उच्च वेतन की मार्ँग करते हैं। ये परार्मर्शदार्त्री संगठन प्रधार्न सेवार्योजक होते हैं तथार् अवश्यकतार्ग्रस्त संगठन, कर्मचार्रियों के समूह में से स्वयं के लिए अपेक्षित कर्मचार्रियों को ठेके पर प्रार्प्त करते है। तथार् परार्मर्शदार्त्री संगठनों को आपसी सहमति पर आधार्रित धनरार्शि क भुगतार्न करते हैं परार्मर्शदार्त्री संगठन ही कर्मचार्रियों को वेतन क भुगतार्न करते हैं। 
  3.  3600 चयन कार्यक्रम: सार्मार्न्यत संगठनों के अन्तर्गत वरिष्ठों के द्वार्रार् ही चयन परीक्षणों एवं सार्क्षार्त्कारों क प्रशार्सन कियार् जार्तार् है। वे पद एवं अभ्यथ्र्ार्ी के बीच उपयुक्ततार् क निर्णय करते हैं। परन्तु इन भार्वी कर्मचार्रियों क ज्ञार्न, निपुणतार्यें एवं कार्य-निष्पार्दन केवल वरिष्ठों कोही नहीं, बल्कि उनके अधीनस्थों एवं समार्न स्तर के कर्मचार्रियों को भी प्रभार्वित करते हैं। अत:, विभिन्न संगठनों ने अधीनस्थों एवं समार्न स्तर के कर्मचार्रियों को चयन परीक्षणों एवं सार्क्षार्त्कारों के प्रशार्सन में सम्मिलित करनार् प्रार्रम्भ कर दियार्। इस प्रकार क चयन कार्यक्रम, ‘3600 चयन कार्यक्रम’ कहलार्तार् है। 

कार्य पर नियुक्ति 

चयन प्रक्रियार् के मार्ध्यम से जब किसी अभ्यथ्र्ार्ी क अन्तिम रूप से चयन कर लियार् जार्तार् है तथार् उसे नियुक्ति आदेश दे दियार् जार्तार् है तो आगार्मी चरण उसकी ‘कार्य पर नियुक्ति’ क होतार् है जब नव-नियुक्त कर्मचार्री कार्य करने के लिए उपस्थित होतार् है तो संगठन को उसे उस कार्य पर, जिसके लिए उसक चयन कियार् गयार् है, नियुक्त करनार् होतार् हैं। अत:, सही कार्यों पर नव-नियुक्त कर्मचार्रियों को स्थार्पित करनार् ही कार्य पर नियुक्ति कहलार्ती है। जैसार् की पॉल पिगर्स एवं चार्ल्र्स ए. मेयर्स क कथन है कि ‘‘ कार्य पर नियुिक्त् से आशय चयनित अभ्यथ्र्ार्ी को सार्ंपै े जार्ने वार्ले कार्य पर निधार ण करनार् तथार् वह कार्य उसे सार्ंपैनार् है।’’

कार्य पर नियुक्ति क उत्तरदार्यित्व उस विभार्गार्ध्यक्ष क होतार् है, जिसके विभार्ग में नये कर्मचार्री की नियुक्ति की जार्नी है प्रार्रम्भ में नये कर्मचार्री की कार्य पर नियुक्ति छ: महीने से एक वर्ष की परिवीक्षार्-अवधि पर की जार्ती हैं यदि कर्मचार्री क कार्य उक्त अवधि में सन्तोषजनक पार्यार् जार्तार् हैं तो इस परिवीक्षार्-अवधि की समार्प्ति के पश्चार्त् उसे स्थार्यी रूप से नियुक्त कर दियार् जार्तार् है। बहुत ही कम स्थितियों में किसी कर्मचार्री को इस अवधि के पश्चार्त् कार्य से निकालार् जार्तार् है।

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