गोस्वार्मी तुलसीदार्स क जीवन परिचय

 तुलसीदार्स के शिष्य बार्बार् मार्धव वेणीदार्स कृत ‘मूल गोसार्ई चरित्र‘ तथार् महार्त्मार् रघुवरदार्स रचित ‘तुलसी-चरित’ में गोस्वार्मी तुलसीदार्स क जन्म सं. 1554 की श्रार्वण शुक्लार् सप्तमी दियार् गयार् है। उनके जन्म के संबंध में यह दोहार् मिलतार् है –

पन्द्रह सौ चौवन विषे, ऊसी गंग के तीर।

श्रार्वण शुक्ल सप्तमी, तुलसी धरयौ सरीर।।

आपकी निधन तिथि श्रार्वण शुक्लार् सप्तमी सं. 1680 है। इसके संबंध में भी यह दोहार् प्रचलित है जिसके आधार्र पर उनके स्वर्गार्रोहण की तिथि निश्चित की जार्ती है –

‘सवंत सोलह सौ असी असी गंग के तीर।

सार्वन शुक्ल सप्तमी तुलसी तजौ सरीर।।

इनत तथ्यों के आधार्र पर आपकी आयु 126 वर्ष ठहरती है। आधुनिक विद्धार्नों ने जनश्रुति के आधार्र पर आपक जन्म कुछ बार्द क स्वीकार कियार् है। इनमें पं. रार्म गुलार्म द्विवेदी के अनुसार्र तुलसी क जन्म स. 1589 मार्नार् है। सर जाज ग्रियर्सन और डॉमार्तार्प्रसार्द गुप्त ने भी इसे स्वीकार कियार् है।

गोस्वार्मी तुलसीदार्स जी के जन्म स्थार्न के सम्बन्ध में भी विद्वार्नों में मतभेद है। पं. रार्मगुलार्म द्विवेदी और ठार्. शिवसिंह सेंगर ने तुलसी क जन्म स्थार्न बार्ँदार् जिले के रार्जार्पुर बतलार्यार् गयार् है। आचाय रार्मचन्द्र शुक्ल ने भी इनक जन्मस्थार्न रार्जार्पुर ही मार्नार् है। पं. गौरीशंकर द्विवेदी तथार् रार्मनरेश त्रिपार्ठी ने सोरों को तुलसी क जन्म स्थार्न बतार्यार् है। बार्ँदार् के गजेटियर के अनुसार्र रार्जार्पुर गार्ँव सोरो के संत तुलसीदार्स जी द्वार्रार् बसार्यार् गयार् है। जनश्रुति के आधार्र पर गोस्वार्मी जी के पितार् क नार्म आत्मार्रार्म थार् और वे पत्योंजार् के दुबे थे- ‘‘तुलसी परार्सर गोत, दुबे पति औजार् के।’’ तुलसी की मार्तार् क नार्म हुलसी थार्। गोसार्ई चरित’ और ‘तुलसी चरित’ के आधार्र पर आचाय शुक्ल ने इसे सरयूपार्रीय ब्रार्म्हण मार्नार् है। मिश्रबन्धुओं ने इन्हें कान्यकुब्ज मार्नार् है।

आपके विवार्ह के संबंध में उल्लेख है कि उनक विवार्ह दीनबन्धु पार्ठक की पुत्री रत्नार्वली से हुआ थार्। उनके तार्रक नार्म क पुत्र भी हुआ थार् जिसकी मृत्यु हो गई थी। इसके अतिरिक्त कहार् जार्तार् है कि (तुलसी चरित के अनुसार्र) उनके तीन विवार्ह हुए थे। तीसरार् विवार्ह कंचनपुर के लक्ष्मन उपार्ध्यार्य की पुत्री बुद्धिमती से हुआ थार्। इस विवार्ह में तुलसी के पितार् ने 6000 रूपये लिये थे। मुनियार् नार्म की दार्सी की मृत्यु के पश्चार्त् उसी अवस्थार् में इनके दीक्षार्-गुरू बार्बार् नरहरिदार्स की इन पर दयार्-दृष्टि हुई। इन्हीं से तुलसी ने शूकर क्षेत्र यार् सोरों में रार्म-कथार् सुनी थी। शेष सनार्तन के पार्स काशी में 16-17 वर्ष रहकर वेद, पुरार्ण, उपनिषद्, रार्मार्यण तथार् भार्गवत आदि क गम्भीर अध्ययन कियार् और अन्त में काशी में रहने लगे। काशी में तुलसी क मार्न बढ़तार् गयार्। रार्जार् टोडरमल, रहीम और मार्नसिंह तुलसी के अन्य मित्र थे।

पं. रार्म गुलार्म द्विवेदी व आचाय शुक्ल ने अपने इतिहार्स गं्रथ में तुलसी के छोट-बड़े बार्रह ग्रन्थों को प्रार्मार्णिकतार् दी है। नार्गरी प्रचार्रणी सभार् ने इन बार्रह ग्रन्थों को ही प्रार्मार्णिक मार्नकर प्रकाशित कियार् है- 1. रार्मचरितमार्नस 2. जार्नकी मंगल 3. पावतीमंगल 4. गीतार्वली 5. कृष्ण गीतार्वली 6. विनय-पत्रिक 7. दोहार्वली 8. बरवै रार्मार्यण 9. कवितार्वली (हनुमार्न बार्हुक समेंत) 10. वैरार्ग्य संदीपनी 11. रार्मार्ज्ञार् प्रश्न 12. रार्मललार् नहछँू। इन ग्रन्थों में प्रबंध काव्य की दृष्टि से रार्मचरितमार्नस और मुक्त काव्य की दृष्टि से विनय पत्रिक सर्वार्धिक महत्पूर्ण है। अधिकांश की भार्षार् अवधि है।

तुलसीदार्स मार्नवीय मूल्यों से ओतप्रोत कलार्कार थे। उनकी अन्तर्दृष्टि जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों से काव्य क तत्व खोज लेती है और उनके पार्स काव्य की समझ और अभिव्यक्ति की अपार्र क्षमतार् विद्यमार्न है। युग और जीवन की गहरी समझ के बिनार् कोई व्यक्ति कलार्कार नहीं हो सकतार्। तुसली निसंदेह एक बड़े कलार्कार थे। उनकी काव्य-कलार् के तत्व विवेचनीय हैं-

तुलसी द्वार्रार् रचित रार्मचरितमार्नस जो कि इनक प्रतिनिधि ग्रंथ है, इसकी विषय वस्तु क आधार्र ‘अध्यार्त्म रार्मार्यण’ तथार् वार्ल्मीकि रार्मार्यण है। कथार्वस्तु के विकास और वर्णन विस्तार्र में भी तुलसी की असार्धार्रण प्रतिभार् और कलार्त्मक विशेषज्ञतार् के दर्शन होते हैं। इसकी विषय वस्तु विन्यार्स की प्रशंसार् में आचाय श्यार्मसुन्दर दार्स ने लिखार् है- ‘इस प्रकार हम देखते हैं कि वार्ल्मीकि रार्मार्यण क आधार्र लेकर तथार् मध्यकालीन धर्म गन्थों के तत्वों क समार्वेश कर सार्थ ही अपनी उदार्र बुद्धि एवं प्रतिभार् से अद्भुत चमत्कार उत्पन्न कर उन्होंने जिस अनमोल सार्हित्य क सृजन कियार् वह उनकी सार्रग्रहणी प्रवृत्ति के सार्थ ही उनकी प्रगार्ढ़ मौलिकतार् क परिचार्यक है।’’

रार्मचरित मार्नस’ के चरित्र पौरार्णिक हैं, पर वे अपने युग की चार्रित्रिक मनोवृत्तियों क प्रतिनिधित्व करते हैं इसमें अनेक चरित्र ऐसे हैं जिनके स्वभार्व और मार्नसिक प्रवृत्तियों की विशेषतार् गोस्वार्मी जी ने कई अवसरों पर प्रदर्शित भार्वों और आचरणों की एकरूपतार् दिखार्कर प्रत्यक्ष की हैं। तुलसी ने अपने ग्रन्थों में पार्त्रों क चरित्र-चित्रण अत्यन्त सतर्कतार्, कोमलतार्, व्यार्पक उदार्रतार् के सार्थ कियार् है। उनके चरित्र मार्नव जीवन की विविध चार्रित्रिक विशेषतार्ओं को अपने में समेटे हुए होते हैं। आदर्श जीवन की प्रतििष्ठार् के लिए आदर्श मूल्यों की स्थार्पनार् क प्रयार्स कियार् है। रार्मचरितमार्नस में भरत क आदर्श चरित्र खड़ार् करने और कैकेई की आत्मग्लार्नि आदि के चित्रण से गोस्वार्मी जी के सूक्ष्म मनोवैज्ञार्निक विश्लेषण की अद्भुत क्षमतार् के दर्शन मिलते हैं।

अलंकार भार्षार् के आभूषण हैं। इनसे ही प्रार्य: कल्पनार् क रूप होतार् है। तुलसी जी के अलंकार प्रयोग की विशेषतार् यह है कि उसमें कौतुक के स्थार्न पर रमणीयतार् और सहसतार् है। रस सिद्ध कवि तुलसी दार्स केशव के समार्न अलंकारों के पीछे-मार्रे-मार्रे नहीं फिर; बल्कि अलंकार उनके काव्य में सहज रूप से आये हैं। यही कारण है कि अलंकार भार्वगुण, वस्तु और घटनार् के तीव्रतार् अनुभव करार्ने में सहार्यक सिद्ध हुए हैं। कुछ उदार्हरण दृष्टव्य हैं।

‘‘उदित उदय गिरिमंच पर रघुवर बार्ल पतंग।

विकसे संत सरोज सब, हरसैं लोचन भृंग।’’ (सार्ंगरूपक) ‘आगे दीखि जरति रिष भार्री, महनु रोष तरवार्रि उधार्री।’ (उत्प्रेक्षार्)

‘पीपर पार्त सरिस मन डार्लो।’ (उपमार्) प्रथम प्रश्नपत्र
‘‘प्रभु अपने नीचहुं आदरहीं, अगिनिधूम गिरि तुन सिरधरहीं।’’
‘‘सन्त हृदय नीवनत समार्नार्, कहार् कविनपै कहै न जार्नार्,
निज परितार्प द्ववै नवनीतार्, परिदु:ख दवै सुसंत पुनीतार्।’ (व्यतिरेक)

छन्द- 

तुलसी की भार्षार् शैली, अलंकार, छन्दों पर अबार्ध अधिकार थार्। इन्होंने भार्षार् के सम्बन्ध में स्पष्टत: कह दियार् थार्-

‘‘क भार्षार् क संस्कृत भार्ख चार्हिये सार्ँच।

काम जो आवै कामरी क लै कै कमार्ँच।’’

इनकी कामरी ही कमार्ंच से अधिक मूल्यवार्न सिद्ध हुई। इन्होंने अपने समय की प्रचलित सभी शैलियों क बड़ी ही विदग्धैव्यतार्पूर्ण उपयोग कियार् है।

भार्षार् शैली और उक्तिवैचित्रय-

प्रबन्ध वैचित्रय के अनुसार्र शैली वैचित्रय भी तुलसी जी की विशेषतार् है। अपने समय में प्रचलित वीर गार्थार् काल की छप्पय पद्धति विद्यार्पति और सूरदार्स की गीत पद्धति, गंग आदि भार्टों की कवित, सवैयार् पद्धति नीति काव्यों की सूक्ति पद्धथि प्रेमार्ख्यार्नों की दोहार्-चौपार्ई पद्धति, तुलसी की शैली के मौलिक गुण हैं।

तुलसी महार्न शैली-निर्मार्तार् और ज्ञार्तार् थे। डॉ. मार्तार् प्रसार्द गुप्त इनकी शैली के विषय में लिखते हैं- ‘‘तुलसी की शैली के मौलिक गुण हैं, उसकी श्रद्धार्लु, उसकी सरलतार् उसकी सुबोधतार्, उसकी निव्र्य जतार्, उसकी अलंकार प्रियतार्, उसकी चार्रुतार्, उसकी रमणीयतार्, उसक प्रवार्ह, ऐसार् प्रतीत होतार् है कि शैली की ये विशेषतार्एं अपेक्षार्कृत उसके जीवन क एक प्रतिरूप उपस्थित करती हैं। ये वार्स्तव में कवि के सुलझे हुए मस्तिष्क को उसके सार्दे जीवन और उच्च विचार्र के आदर्श को उसकी स्वभार्वगत सरलतार् और आडम्बर विहीनतार् को, उसके ध्यये की एकाग्रतार् को और इन सबसे अधिक अपने विषय में उसकी पूर्ण आत्मविस्मृति और उसके सार्थ पूर्ण तल्लीनतार् को किसी अन्य वस्तु की अपेक्षार् व्यक्त करती है।

इस प्रकार तुलसी क व्यक्तित्व उनकी शैली में भली-भार्ंति है। तुलसी जी की उक्तियों में उनक उक्ति वैचित्रय भी दर्शनीय है। उनकी उक्तियार्ँ बड़ी ही मामिक और प्रभार्वशार्ली हैं। रार्म की निरूत्तर कर देने वार्ली सीतार् की यह उक्ति दर्शनीय है-

‘‘मैं सुकुमार्रि नार्य बन जोगू, तुमहि उचित तप मो कहं भोगू।’’

रार्म जनकपुरी तो स्वयं देखनार् चार्हते हैं, किन्तु लक्ष्मण से कहते हैं-

‘‘नार्थ लखनपुर देखने चहहों प्रभु संकोच डर प्रकट न कहीं।’’

‘‘मनहुं उमंग अंग-अंग कवि छलकै।’’ (लक्षणार्)

गोस्वार्मीजी की उक्तियों वैचित्रय के सार्थ उनकी निश्छलतार् और अनूठार्पन भी अपनार् महत्व रखतार् है। कौशल्यार् के चार्हने पर भी प्रार्ण न छोड़ सकने से संबंधित एक उक्ति दर्शनीय है-

‘‘लार्गि रहत मेरे नैयननि आगे रार्म लषन अरू सीतार्।’

और उसी से-

‘‘दु:ख न रहहि रघुपतिहिं विलोक मनु न रहैं बिनु देखे।’

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इसी काव्य में कलार्-पक्ष और भार्व पक्ष अपने अत्यन्त प्रौढ़ रूप में है जो उन्हें एक अप्रतिम, प्रतिभार्शार्ली, क्रार्न्त दर्शी कवि सिद्ध करते हैं।

डॉ. विजयेन्द्र स्नार्तक के शब्दों में- ‘‘तुलसी हिन्दी कवितार् कानन के सबसे बड़े वृक्ष हैं। उस वृक्ष की शार्खार्-प्रशार्खार्ओं के काव्य कौशल की चार्रुतार् और रमणीयतार् चार्रों और बिखरी पड़ी है। यह सच है कि तुलसी कलार् के द्वार्रार् उपकृत नहीं हुए प्रत्युत कलार् उनसे उपकृत हुई है – ‘‘कवितार् करके तुलसी न लसे, पै कवितार् लसी पार् तुलसी की कलार्।’’

गोस्वार्मी तुलसीदार्स  के दाशनिक विचार्र

तुलसीदार्स न केवल महार्न भक्त थे बल्कि वे एक चिन्तक और दाशनिक भी थे। उन्होनें जीव और ब्रह्म, जगत और मार्यार् जैसे तत्वमीमार्ंसीय विषयों पर भी अपने विचार्र प्रस्तुत किये हैं। तुलसी के दाशनिक विचार्रों क अध्ययन इन शीर्षकों में कियार् जार् सकतार् है –

ब्रह्म क स्वरूप – 

दाशनिक विषयों में सबसे पहले हम ब्रह्म पर विचार्र करते हैं। तुलसी ने भी ब्रह्म को निर्गुण, निरार्कार, निर्विकार, सर्वव्यार्पी, सच्चिदार्नन्द, अनार्दि, विश्वरूप कहार् है। उन्होंने रार्म को ही ब्रह्म कहार् है। वे रार्म और ब्रह्म की एकतार् निरूपित करते हुए कहते है: अमल अनवद्य अद्धैत निगुण सगुन ब्रह्म सुभिरार्म नरभूप रूपी।  वे ब्रह्म को व्यार्पक एवं सर्वार्न्तरयार्मी मार्नते हुए कहते हैं: व्यार्पक एक ब्रह्म अविनार्सी। सत चेतन घन आनन्दरार्सी।।

तुलसी के आरार्ध्य रार्म दरअसल निर्गुण और निरार्कार ब्रह्म के ही सगुण सार्कार अवतार्र है: अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपार्। अकथ अगार्ध अनार्दि अनूपार्।।

तुलसी क मार्ननार् है कि जब-जब संसार्र में अर्धम बढ़तार् है तथार् असुर एवं अभिमार्नी बढ़ जार्ते है, तब-तब ब्रह्म अवतार्र लेते हैं :जब-जब होई धरम की हार्नी। बार्ढ़हिं असुर अभिमार्नी। तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरार्। हरहिं कृपार्निधि सज्जन पीरार्।।

वे कहते हैं कि जो निर्गुण एवं निरार्कार ब्रह्म है, वही भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर सगुण सार्कार रूप धार्रण कर लेतार् है: अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदार्। गार्वहिं मुनि पुरार्न बधु वेदार्। अगुन अरूप अलख अज सोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।

इस तरह हम देखते हैं कि तुलसी क ब्रह्म स्वतन्त्र एवं सच्चिदार्नन्द घन है, वह सर्वज्ञ, अनवद्य, निरार्कर, नित्य, निरंजन, अविनार्शी, अमोध शक्ति सम्पन्न है। वही ब्रह्म के रूप में अवतरित हुआ है और नार्नार् प्रकार की मार्नवीय लीलार्एँ कर रहार् है। उसकी ये लीलार्एँ विचित्र है और मुनियों को भी भ्रमित कर देती है। अवतार्रवार्द ब्रह्म के स्वरूप क प्रथम प्रश्नपत्र ही विस्तार्र है। अवतार्र चार्हे रार्म के रूप में हो कृष्ण के रूप में।

जीव क स्वरूप – 

भार्रतीय दाशनिक परंपरार् में जीव को प्रकृति के पार्ंच तत्वों से निर्मित मार्नार् है। इसके अतिरिक्त जीव को ब्रह्म क अंश भी मार्नार् जार्तार् है। तुलसी ने इस परपंरार् क निर्वार्ह करते हुए जीव के स्वरूप क प्रतिपार्दन कियार् और जीव को पार्ंच तत्वों से निर्मित बतार्यार् है छिति जल पार्वक गगन समीरार्। पंच तत्व मिलि बनेउ सरीरार्।।

वे यह भी कहते हैं कि यह जीव मन, प्रार्ण अैर बुद्धि से विलक्षण है। यह ईश्वर क ही अंश है अत: ईश्वर के समार्न चेतन, अमूल, अविनार्शी एवं सहज सुख क भण्डार्र है, किन्तु मार्यार् के वशीभूत होने के कारण यह अपने मूल स्वरूप को भूल चुक है : ईश्वर अंस जीवन अविनार्सी। चेतन अमल सहज सुखरार्सी।। सो मार्यार् बस परसो गोसार्ईं। बंध्यो कीर मरकट की नार्ई।।

संपूर्ण दाशनिक परंपरार् जीव और मार्यार् के संबंध से संसार्र क निर्मार्ण मार्नती है। तुलसी भी यह कहते हैं कि मार्यार् क प्रभार्व जीव पर होतार् है, ईश्वर पर नहीं। मार्यार् तो ईश्वर के अधीन है रार्म सर्वज्ञ, मार्यार्पति, सर्वशक्तिमार्न हैं जबकि जीव अल्पज्ञ, परतन्त्र मार्यार् के वशीभूत है। जीव अज्ञार्नी एवं अंहकारी है। वह मार्यार् के वशीभूत होने कारण कर्मबन्धन में फंसार् रहतार् है और नार्नार् प्रकार के कष्ट सहतार् है। रार्म की कृपार् से ही उसक उद्धार्र सम्भव है। जीव मार्यार् के कारण ही अमल रूप से अलग होकर मलिन हो जार्तार् है और सुख को त्यार्ग कर दु:ख को ग्रहण करतार् है। जीव क यह स्वरूप परंपरार्गत है। तुलसी इसी स्वरूप को ग्रहण करते हैं और उसमें कोई नई बार्त नहीं जोड़ते हैं। जीव कर्म करने में स्वतंत्र है, किन्तु फल भोगने में परतंत्र है। मार्यार् के वशीभूत होकर यह जीव सार्ंसार्रिक कर्म जार्ल में फंसार् रहतार् हैं। मार्यार् के बन्धन से मुक्ति कैसे मिल सकती है इस विषय में तुलसी क स्पष्ट मत है कि मार्यार्पति ईश्वर की कृपार् से ही यह संभव है। स्पष्ट है कि तुलसी ने जीव को ईश्वर क अंश मार्नते हुए भी उसे ईश्वर से पृथक मार्नार् है। जीव की मुक्ति के लिए रार्म की कृपार् और दार्सभार्व की भक्ति की अनिवायतार् पर बल देते हैं। रार्म ही कृपार् करें तो यह जीवन मार्यार् के बंधनों से मुक्त हो सकतार् है।

जगत क स्वरूप – 

जैसार् कि हमने ऊपर कहार् है कि तुलसी के दाशनिक विचार्र परंपरार् से आये विचार्रों के अनुरूप ही हैं। अत: जगत के संबंध में भी तुलसी मार्नते हैं कि रार्म यार्नि ब्रह्म ही जगत के निमित्त और उपार्दार्न कारण है। जब रार्म (ब्रह्म) सत्य हैं तो जगत को भी सत्य होनार् चार्हिए। विनय-पत्रिक के कई पदों में तुलसी ने जगत की भयंकरतार्, विषमतार् तथार् भ्रमार्त्मक सत्तार् पर आश्चर्य प्रकट कियार् है। संसार्र में व्यार्प्त पार्खण्ड, काम, क्रोध, मोह, तृष्णार्, दंभ, कपट, आदि सदार् जीव को भ्रमित करते रहते हैं। जगत के इस स्वरूप के अलार्वार् तुलसी ने इसे ‘सियार्रार्ममय’ भी स्वीकार कियार् है : सियार्रार्ममय सब जग जार्नी। करहुं प्रणार्म जोरि जुग पार्नी।।

इस पंक्ति पर प्रश्न उठार्यार् जार् सकतार् है कि जब जगत सियार्रार्ममय है तो मिथ्यार् कैसे हो सकतार् है? वस्तुत: जगत रार्मरूप ही है, परन्तु मार्यार् के कारण ही वह रार्म से भिन्न प्रतीत होतार् है। परपंरार् के अनुसार्र जगत् क दृश्यमार्न रूप मिथ्यार् है, क्योंकि वह परिवर्तनशील है। रार्म की कृपार् से जब उसे अपने वार्स्तविक रूप क ज्ञार्न हो जार्तार् है तब वह इस जगत को सियार्रममय पार्तार् है। कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोऊ मार्नै।
तुलसीदार्स परिहरै तीन भ्रम, सो आपुन पहिचार्नै।।

श्यह कहकर तुलसी ने संसार्र की सत्यतार्, मिथ्यार्त्व, सत्यार्सत्यतार् तीनों बार्तो को ही मिथ्यार् ठहरार्यार् है। तीनों भ्रमार्त्मक रूपों को छोड़कर भक्ति को अपनार्ने क आग्रह तुलसी ने कियार् है। इस प्रकार जगत के निरूपण में शंकर क तथार् अन्त में भक्ति के प्रतिपार्दन में रार्मनन्द क अनुसरण कर तुलसी ने अपने जगत सम्बन्धी विचार्रों को प्रस्तुत कियार् है।

मार्यार् क स्वरूप – 

दाशनिक विचार्रों में मार्यार् क स्थार्न बहुत महत्वूपर्ण है क्योंकि यही वह तत्व है जो संसार्र के निर्मार्ण में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है। मार्यार् रार्म की अभिन्न शक्ति है। इसी शक्ति के द्वार्रार् रार्म सृष्टि क कार्य सम्पन्न करते है। मार्यार् सीतार् है और रार्म के सार्थ ही वह सदार् अवतार्र लेती है। तुलसी कहते हैं कि – आदि सक्ति जेहि जब उपजार्यार्। सोउ अवतरिहि मोरि यह मार्यार्।

मार्यार् जीव के मोह एवं भवबन्धन क कारण है। इसे ही मार्यार् क अविद्यार् रूप कहार् गयार् है। मार्यार् क दूसरार् रूप विद्यार् है। वह ब्रह्म की शक्ति है जो विश्व क सृजन, सिंचन एवं संहार्र करने वार्ली है। यही जीव के मोक्ष क हेतु है ‘‘स्रुति सेतुपार्लक रार्म तुम्ह जगदीश मार्यार् जार्नकी। सो सृजति जग पार्लति हरति रूख पार्ई कृपार्निधार्न की।।’’ जीव के विकारी भार्व – काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णार्, कामिनी इस मार्यार् के सहार्यक है। यह मार्यार् भक्तों को नहीं व्यार्पती, ऐसार् कहकर तुलसी ने भक्ति की महत्तार् बतार्ई है। इस प्रकार तुलसी ने जहार्ँ जीव और ब्रह्म को एक मार्नार् है वहार्ँ मार्यार् और ब्रह्म को भी एक स्वीकार कियार् है। जहार्ँ वे जीव और ब्रह्म की एकतार् स्वीकार करते है वहार्ँ वे रार्मार्नुज के आधार्र पर मुक्ति की अवस्थार् में जीव और ब्रह्म में द्धैत स्वीकार करते। इस तरह हम तुलसी के दाशनिक विचार्रों क परिचय पार् सकते हैं।

गोस्वार्मी तुलसीदार्स की भार्षार्

तुलसी की भार्षार् अवधि है और उनक ब्रज पर अधिकार थार्। चूँकि भार्षार् अभिव्यक्ति क सशक्त मार्ध्यम है। तुलसीदार्स की कव्य भार्षार् में उचित शब्द प्रयोग, कथ्य के अनुकूल वार्क्य-विन्यार्स, शब्दों क उपर्युक्त चयन, अर्थ को अधिक प्रेषणीय बनार्ने के लिये लोकोक्तियों और मुहार्वरों क समुचित प्रयोग, नार्द सौन्दर्य और चित्रार्त्मकतार् तुलसी की भार्षार् की प्रमुख विशेषतार्एँ हैं। उनकी सम्पूर्ण रचनार्ओं में से श्रीकृष्ण गीतार्वली, कवितार्वली, विनय पत्रिका, दोहार्वली, गीतार्वली तथार् वैरार्ग्य संदीवनी ग्रंथ ब्रज भार्षार् में लिखे गये हैं तथार् रार्मचरितमार्नस, रार्मललार् नहछू, बरवै रार्मार्यण, पावती मंगल, जार्नकी मंगल ओर रार्मार्ज्ञार् प्रश्न अवधी के श्रृंगार्र हैं। तुलसी की इन दोनों भार्षार्ओं के शब्द भण्डार्र क प्रयोग कियार् है- संस्कृत शब्दार्वली, पार्लि, प्रार्कृत, अपभ्रंश शब्दार्वली, विदेशी, शब्दार्वली, तत्कालीन प्रार्ंतीय शब्दार्वली और हिन्दी की अन्य बोलियों की शब्दार्वली

भार्वपक्ष

तुलसी जी के भक्ति भार्वनार् सीधी सरल एवं सार्ध्य है। सभी रचनार्ओं में भार्वों की विविधतार् तुलसी की सबसे बड़ी विशेषतार् है। वे सभी रसों के प्रयोग में सिद्धहस्त थे। अवधी व ब्रजभार्षार् पर उनक समार्न अधिकार थार् ।

कलार्पक्ष

तुलसी दार्स जी ने अपने युग में प्रचलित सभी काव्य शैलियों क सफलतार् पूर्वक प्रयोग कियार् है। जैसे-दोहार्, चौपार्ई, कवितार् सवैयार्, छप्पय आदि। अलंकार उनके काव्य में सुन्दर व स्वार्भार्विक रूप से प्रयुक्त हुए हैं । रार्म चरित मार्नस अवधी भार्षार् क सर्वोत्तम ग्रन्थ है।

सार्हित्य मेंं स्थार्न

तुलसीदार्स जी हिन्दी सार्हित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। हिन्दी सार्हित्य उनकी काव्य प्रतिभार् के अक्षय प्रकाश से सदैव प्रकाशित रहेगार्।

केन्द्रीय भार्व

संत शिरोमणि गोस्वार्मी तुलसीदार्स ने अपने दोहो के मार्ध्यम से मार्नव समार्ज को नीति की रार्ह में चलने क उपदेश दियार् है। जीवन को सफल बनार्ने के क्यार् तरीके हो सकते हैं? मीठे बचन बोलने से क्यार् लार्भ होतार् है तथार् काम, क्रोध, लोभ और मोह के वशीभूत व्यक्ति को क्यार् नुकसार्न होतार् है आदि उपदेशार्त्मक नीति वचनों के मार्ध्यम से समार्ज के विकास में उन्होंने अपूर्व सहयोग प्रदार्न कियार् है।

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