गैर सरकारी संगठन-प्रबंधन के मुद्दे

प्रबंधन के मुद्दे की अवधार्रणार् 

सेवार् प्रदार्न करनार् ही किसी गैर सरकारी संगठन के अभिनय को उजार्गर करती है, वो संवार्एँ किस प्रकार की है और कितनी कारगर है? और किसी वक्त किसके लिए की जार् रही है? ये सभी एक अच्छे गैर सरकारी संगठन से मुद्दे है। ज्यार्दार्तर गरीबों तथार् विभिन्न प्रकार के समुदार्यों के लिए ये संस्थार्एँ कार्म करती है। आज के समय में मुख्यत: गरीबी ही एक मुख्य मुद्दार् है इन संगठनों के लिए जो कि दूर करनार् इनक ध्येय है। और गरीबी के कारणों के जार्नने हेतु कर्इ प्रकार के अन्य कारक होते है जो कि इसक कारण बनते है, तो उन्ही समझनार् भी इनक एक मुख्य कार्य ध्येय हो जार्तार् है, जितनी सफलतार्पूर्वक ये संस्थएँ उनहें सुलझार्ती है वो उतनी ही सफल मार्नी जार्ती है यहार्ँ पर हम इन्ही से जुड़े हुए मुद्दे तथार् उनसे सम्बन्धित शोध आदि के बार्रे में जार्नने की कोशिश करेंगे।

विकास के मुद्दे 

संस्थार्ओं की अपने लक्ष्य की पूर्ति करने हेतु विभिन्न प्रकार की उमरती हुर्इ सार्मार्जिक, न्यार्यिक, आर्थिक, पर्यार्वरणी तथार् अन्य प्रकार की चुनोतियो को ध्यार्न में रखनार् होतार् है। और इन्ही चुनौतियों अथवार् मुद्दो को सुलझार्ने हेतु नार् नही सिर्फ संस्थार्ओं को, प्रार्योगिक प्रबंधन कार्यकुशलतार् की आवश्यकतार् होती है बल्कि सम्बन्धित विषयों में उचित जार्नकारी तथार् संवेदनशीलतार् की भी आवश्यकतार् है तथार् ये जरूरी है। आपने कुछ शब्दों क उच्चार्रण अवश्य सुनार् होगार्, जैसे सार्मार्जिक आर्थिक, अथवार् सार्मार्जिक-रार्जनैतिक कारक, और सार्थ ही पर्यार्वरणीय कारक और हम सभी इन्हीं जटिल तथार् मुश्किल वार्तार्वरण में रहते है तथार् इन्हें ही सरल बनार्नार् सभी गैर सरकारी संस्थार्ओं क उद्देश्य होतार् है तथार् उनके लिए महत्वपूर्ण कार्य करने क क्षेत्र भी। गैर सरकारी संस्थार्एँ जो कि सार्मुदार्यिक विकास हेतु विभिन्न समुदार्यों से जुड़कर कार्यरत है वो सिर्फ वहार्ँ रहने वार्ले निवार्सी के सार्थ ही नहीं जुड़ी हुर्इ है बल्कि उनसे सम्बन्धित कर्इ तरह/प्रकार के अन्य कारणों से भी जुड़ी हुर्इ है। स्थार्नीय समुदार्यों के आयार्म, बहुआगार्मी होते है, जिनक अध्ययन, न्यार्यिक तथार् स्थार्नीय सरकारी कारणों को भी सुननार् देखनार् तथार् उसके  पीछे चलनार् भी आवश्यक है।

जैसार् कि सभी को विदित है आज की सार्मार्जिक जरूरत के हिसार्ब से जहार्ँ, मार्नव अधिकार तथार् लैंगिक मुद्दों को सबसे ज्यार्दार् अहमियत दी जार् रही है, वहार्ँ अन्य कारणों के सार्थ इन्हें भी नेतार् तथार् उनके सहयोगी समूह को लोगों की सार्थ कार्य करने की कार्य कुशलतार्, आवश्यक जार्नकारी तथार् उचित सहयोगी स्रोतों की भी जार्नकारी क्षेत्रीय कार्य हेतु आवश्यक होती है। संस्थार् प्रमुख को इतनार् समझदार्र होनार् आवश्यक होतार् है, जिससे कि वो जटिल परिस्थितियों तथार् समस्यार्ओं तथार् मुद्दो को आसार्नी से समझ जार्ए तथार् उनको सुलझार्ने हेतु जल्दी से जल्दी आवश्यक निर्णयों को लेकर कार्य सम्पार्दित कर सकें। संस्थार्ओं के वार्तार्वरण को सुगमतार् से चलार्ने हेतु प्रबंधन की जार्नकारी तथार् निपुणतार् से कार्यो को सम्हार्लने की जबरदस्त आवश्यकतार् है। और यहार्ँ हम खुद ऐसे ही मुद्दो की बार्त करेगें जो कि इस इकार्इ में बतार्ए जार् रहे हैं। 1. गरीबी तथार् विकास 2. प्रबंधन की चुनौतियार्ँ 3. गरीबी तथार् उसक गलत इस्तेमार्ल 4. गरीबी तथार् विनार्शकारी कारक 5. गरीबी तथार् शक्ति कि हीनतार् 6. विकास के सूचकांक

गरीबी तथार् विकास 

गरीबी क नार्म जब भी हमार्रे सार्मने आतार् है यार् ये शब्द जब भी हम सुनते है तो हमार्रार् अंदार्ज तथार् अनुमार्न रूपयार् पैसार्, जमीन जार्यदार्द तथार् शार्यद व्यक्ति विशेष की (डिग्री) शिक्षार् होतार् है और इन्हीं से हम ,व्यक्ति गरीब है यार् अमीर इसे परिभार्शित भी करते है। परन्तु हम यहार्ँ गरीबी के कुछ अन्य पहलुओं तथार् विभिन्न प्रकार के आयार्मों पर भी नजर डार्लेगें, जिससे हमे ‘‘गरीबी’’ शब्द की परिभार्षार् तथार् अर्थ समझने में आसार्नी हो सके।

1960 में मुख्य रूप से जब भी ‘गरीबी’ पर विचार्र विमर्ष हुआ तो मुख्यत: ,व्यक्ति तथार् परिवार्र की आय के पैमार्ने को महत्व दियार् जार्तार् रहार् है, और गरीबी को हमेशार् ‘‘रूपयें पैसे की औकात’’ के तर्ज पर आँक जार्तार् थार् हार्ँ आज भी वल्र्ड बैंक गरीबी को हरेक दिन की एक व्यक्ति की ‘आय’ रूप में ही ऑकतार् है। गरीबी किसी एक व्यक्ति की आय के स्तर को नार्प कर जार्नी जार्य यार् फिर उसके पूरे परिवार्र की महीने की आय को ? यह एक ज्वलंत प्रश्न आज भी है। क्षेत्रीय कार्यकर्तार्ओं ने इसे किसी व्यक्ति यार् परिवार्र की आय ही नार् मार्न कर सावभौमिक रूप में देखार् व स्वीकार कियार्।

इस सच्चाइ से मुहँ नहीं मोड़ार् जार् सकतार् कि किसी न किसी रूप में ‘‘पैसार्’’ गरीबी से जुड़ार् हुआ है, क्योंकि इसकी कमी से व्यक्ति कुछ भी करने को तैयार्र हो जार्तार् है, और बहुत से ऐसे कार्य है जो वो नहीं कर पार्तार् है, जो कि पैसेवार्ले (अमीर) आसार्नी से कर लेते है, जैसे कुछ ऐसी सुविधार्एँ जो जीवन को आनंदित करती है वो ‘‘पैसे की कमी’’ से इंसार्न नहीं कर पार्तार् वही पर्यार्प्त धन वार्ले उन सुख-सविधार्ओं क संपूर्ण उपयोग करते है। कर्इ बार्र पैसे से कमजोर लोग धनवार्न बॉस द्वार्रार् प्रतार्ड़ित तथार् गलत तरीके से इस्तेमार्ल(शोषित) में लिए जार्ते है। और धनविहीन को यही कमी शक्तिहीन भी बनार्ती है। इस प्रकार आप देख सकते है ज्यार्दार् धनविहीन होनार् ही ‘गरीब’ क कारण नहीं है बल्कि ‘गरीबी’ क तार्त्पर्य है अन्य सार्मार्जिक सुविधार्ओं को भोगने में नार् कामयार्बी, असफलतार् तथार् अन्य रार्जनैतिक, संस्कृतिक सार्मार्जिक कारकों से भी है जो व्यक्ति तथार् समार्ज पर असर डार्लते है।

अब हम यहार्ँ संक्षेप में इस बार्त को समझने की कोशिश करेंगे कि किस प्रकार से गरीबी पिछले कुछ दशकों में उभरकर सार्मने आर्इ है। सन् 1970 में गरीबी, विश्व बैंक (world Bank) क एक महत्वपूर्ण मदद् ार् बन गइर् जिस कारण से विश्व बैंक क मुख्य जोर गरीबी तथार् इससे सम्बन्धित ‘‘वंचित क्षेत्रों पर थार् जो कि गरीबी को पुन: परिभार्शित करने में सहार्यक बनें। सिर्फ न्यूनतम पोशण तथार् जीविकोपाजन, हेतु जीवन-स्तर में प्रार्प्त असफलतार् को भी स्वीकार कियार् (गरीबी के रूप में) तथार् इसमें जीवन के स्तरों में स्वीकारीय अन्तर पार्यार् गयार्। आय पर आधार्रित गरीबी की धार्रणार् ‘‘न्युनतम आवश्यकतार्’’ में बदल गर्इ। इस प्रकार गरीबी सिर्फ आय की कमी ही न रहकर स्वार्स्थ्य, शिक्षार् और अन्य प्रकार की सार्मार्जिक सेवार्ओं की कमी के रूप में उभरकर सार्मने आर्इ।

सन् 1980 में कुछ नर्इ धार्रणार्एँ जुड़ी जो निम्न प्रकार है- 

  • दृव्य रहित समार्ज सम्बन्धी पहलू।
  • वो सभी स्थितियार्ँ जो कि प्रार्कृतिक आपदार् के रूप में व्यक्ति के सार्मने एक कष्ट पहुचार्ने वार्ली स्थिति के रूप में आती है, जैसे-तुफार्न, बार्ढ़, सूखार् तथार् अन्य प्रार्कृतिक खतरे। 
  • जीविक के स्तर को बढ़ार्ने के लिए विस्तृत अवधार्रणार्, जो कि जल्दी ही सहार्रार् देने वार्ली जीविक के रूप में तब्दील हो गयी।
  • और 1980 में ही एक दूसरार् पहलू भी उभर कर सार्मने आयार्, वो थार् लौगिंक अध्ययन को बढ़ार्वार् देनार् । और विभिन्न सरकारी नीतियों में महिलार् सशक्तिकरण को विकास क प्रमुख मुद्दार् मार्नार् जार्ने लगार्। 

सन् 1990 में और भी विकास की अवस्थार्एँ तथार् अवधार्रणार्एँ उभर कर सार्मने आयी। धनविहीन लोग किस तरह से अपने आप को देखते तथार् परिभार्शित करते है यार् उनकी रार्य में ‘‘गरीबी’’ क क्यार् अर्थ है इस बार्त को ज्यार्दार् महत्व दियार् गयार् और एक सर्वसुविधार् सम्पन्नतार् क नार् होनार् ही गरीबी के रूप में पर्यार्य मार्नार् गयार्। उसी समय अमत्र्यसेन की अवधार्रणार्, जो कि ‘‘मार्नव विकास’’ को अहमियत देती थी, उसे ही संयुक्त रार्ष्ट्र संघ क विकास कार्यक्रम के तहत भी मुख्य ध्येय बनी। और उन्होंने मार्नवीय विकास को निम्न रूप से परिभार्शित कियार्-’’मन पसंद पर्यार्प्त अवसरों क नार् होनार्……….. जिसके कारण एक स्वस्थ, रचनार्त्मक जीवन को अथवार् एक उचित जीवनयार्पन को नार् जी पार्नार्/ भोगनार्, जो कि आजार्दी, प्रतिष्ठार् तथार् स्वंय के सार्थ ही दूसरों क सम्मार्न करनार् भी सिखार्ती हो। अतएव इसके उपरार्न्त निम्न भार्षार् क प्रयोग ‘‘गरीबी’’ को समझने हेतु कियार् गयार्।

  • (क) आय की कमी अथवार् धनविहीनतार्
  • (ख) उपयुक्त मार्नव विकास न होनार्
  • (ग) सार्मार्जिक निश्कासन
  • (घ) कार्य करने की क्षमतार् में कमी आनार्
  • (ड़) कष्टकारी अवस्थार्एँ
  • (च) जीवन यार्पन सुचार्रू रूप से नार् चलनार्
  • (छ) मूल (प्रार्थमिक) आवश्यकतार्ओ की पूर्ति न होनार्
  • (ज) तथार् अन्य सम्बन्धित पृथक्करण/अथवार् वंचित सुविधार्एँ

प्रबंधन की चुनौतियार्ँ 

क्रमश: धीरे-धीरे सभी संस्थार्ओं क मुख्य उद्देश्य सार्मार्जिक सेवार् से सार्मार्जिक विकास में तब्दील हो गयार्। और सभी गैर जार्नकारी संस्थार्ओं ने अपनी परिपक्वतार् क परिचय देते हुए विकास के मुद्दों पर ध्यार्न देनार् शुरू कियार्। अत: विकास के पहलू जो कि एक नर्इ चुनौती के रूप में उभर कर सार्मने आए वही इन्हीं विकास के मुद्दों तथार् पहलुओं क सुचार्रू रूप से आगे बढ़नार् जिसे मुख्य चुनौती मार्नार् गयार्, सार्मने आयार्। अब विकास को क्रमबद्ध तरीके से आगे बढ़ार्नार् ही मुख्य चुनौती के रूप में स्वीकारार् गयार्।

यह धार्रणार् सयुक्त रार्ष्ट्र संघ के एक प्रतिदर्शन में छपने (रिपोर्ट) के बार्द ही सार्मार्न्य जनसार्धार्रण के प्रयोग में आयी, जो कि 1987 में Brundtland Commission_ की थी (Report of Budtland Commission 1987) जो कि (WCED) (World Commission on Environment and Development) ‘‘पर्यार्वरणीय विकास के विश्व आयोग’’ के द्वार्रार् लार्यी गयी।

धीर-धीरे सुचार्रू रूप से चलने वार्लार् क्रमिक विकास पूरे विश्व के लिए एक उत्सुकतार् जगार्ने वार्ले शब्द में तब्दील हो गयार्। सभी विश्व के नेतार्ओ ने उन सभी पक्षोंं व पहलुओं पर देखनार् तथार् विचार्र विमर्श शुरू कर दियार् जो कि कर्इ वर्षो से दबे हुए थे। रार्ष्ट्रीय स्तरों पर क्रमिक विकास के विभिन्न मार्नको की खेज शुरू गयी और यही गैर सरकारी संगठनों के लिए उनके प्रबंधन की बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सार्मने आयी।

पर्यार्वरणीय विकास के विश्व आयोग (WCED) ने क्रमिक विकास तथार् सुचार्रूप से चलने वार्ले विकास की अवधार्रणार् को स्पष्ट करते हुए कहार्ँ, ‘‘विकास क अर्थ उन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति है जो वर्तमार्न में योग्यतार् सम्बन्धी समझौते, जो कि आने वार्ली पीढ़ी की आवश्यकतार् पूर्ति में बगैर हार्नि यार् अवरोध पहुँचार्ए हो।’’ दुसरे शब्दों में कह सकते है कि आज के समार्ज को पृथ्वी पर मौजूद सभी स्रोतो क उपयोग उचित प्रकार से करें, नार् कि कभी खत्म न होने वार्ली सुविधार्ओं के रूप में। क्यँूकि आने वार्ली पीढ़ी को भी उन्हीं बार्तों को सोचनार् होगार् जो वर्तमार्न में है। इस तरह के विकास क स्वरूप एक स्वस्थ रिश्तों को बनार्ने में सहार्यक होगार्, आज तथार् कल की आने वार्ली पीढ़ी के मद्द में, और सार्थ ही व्यक्ति द्वार्रार् की जार्ने वार्ली क्रियार्ओं, प्रार्कृतिक संपदार्ओं तथार् स्रोतो हेतु मद्द की जार्ने वार्ली प्रक्रियार्ओं के सार्ंमजस्य हेतु इन्ही नैसर्गिक सम्बन्धों द्वार्रार् हम उम्मीद करेगें कि जिन सुविधार्ओं क आज हम उपभोग कर रहे है वही विकास के रूप में आने वार्ली पीढ़ी को उनक जीवन और बेहतर करने में सहार्यक हो तार्कि उनके जीवन क स्तर और ऊँचार् उठ सके और वो उन सुविधओं की महत्तार् को अनुभव करने के सार्थ ही उपभोग में लार् सकें। इससे सबसे प्रमुख बार्त उभर कर जो स्वयं सेवी संस्थार्ओं के सार्मने चुनौती बन कर उभरी वो यह है कि किस तरह से पर्यार्वरणीय विकास होतार् रहे और प्रार्कृतिक आपदार्ओं से किस प्रकार प्रकृति की सुरक्षार् के आयार्म बढ़ार्एँ जार्एँ और कारगर उपार्यों पर कार्य करके उन्हें अपनी संस्थार्ओं के मुख्य उद्देश्यों तथार् लक्ष्यों के रूप में स्वीकार कियार् जार्य। सुचार्रू रूप से होने वार्ले विकास से तार्त्पर्य एक उपयुक्त तथार् बहुत ही ‘‘मजबूत सार्मंजस्य’’ से है जो कि मार्नवीय आवश्यकतार्ओं तथार् अपनी जीवन शैली को बनार्एँ रखने हेतु आवश्यक है, तथार् वही प्रार्कृतिक स्रोतों तथार् सुविधार्ओं के संक्षरण के बीच होतार् है। क्यूँकि इन्हीं पर हमार्री आने वार्ली पीढ़ियों क विकास भी निर्भर है। इन्हीं बार्तों को ध्यार्ार्न में रखकर संस्थार्ओं के सार्मने विकास की चुनौतियों में इजार्फार् हुआ है जो कि इनक प्रमुख ध्येय बन गयी तथार् आर्थिक विकास को अर्जित करने क मार्ध्यम भी बनी । इस बार्त को भी मद्देनजर रखार् कि इस प्रयार्स में रार्ष्ट्र को किसी भी तरह की प्रार्कृतिक सुविधार् तथार् स्रोतो में कमी नार् आने पार्ए।

भार्रत में मुख्यत: क्रमिक एवं सुचार्रू रूप से होने वार्ले विकास के अन्र्तगत सिर्फ पर्यार्वरणीय विकास को ही महत्व नहीं दियार् गयार् बल्कि आर्थिक, पर्यार्वरणीय तथार् सार्मार्जिक नीतियों को भी ध्यार्न में रखार् गयार्। इन तीन के अलार्वार् संस्कृतिक विभिन्नतार् को भी चौथी नीति के अन्र्तगत रखार् गयार्। अतएव हम कह सकते है कि ‘विकास’ शब्द क अर्थ सिर्फ आर्थिक विकास नार् होकर एक भार्वनार्त्मक, बौद्धिक, नैतिक तथार् र्इष्वरीय महत्तार् को समझने के विकास से भी है। और मे एक बहुआयार्मी तथार् संपूर्ण विकास से सम्बन्धित है।

इस देश भार्रत में ज्यार्दार्तर कम धनवार्न जनतार् गार्ँवो में निवार्स करती है और मुख्य रूप से नैसर्गिक उपार्यों (प्रार्कृतिक स्रोतो) पर अपने जीवनयार्पन हेतु निर्भर रहती है। हमार्रे भार्रत में ज्यार्दार्तर निर्धनतार् गार्ँवों में पार्यी जार्ती है और उनक जीवन यार्पन नैसर्गिक सुविधार्ओं तथार् स्रोतों पर ही आधार्रित रहतार् है। देश की 60 प्रतिशत आबार्दी यार् कहार् जार्य मजदूर, खेती-बार्ड़ी ,मछली पार्लन, तथार् जंगलो के भरोसे अपने जीवन यार्पन को बार्ध्य है। और इन्ही स्रोतों क क्रमश: कम होते जार्नार् गरीबी को और बढ़ार्ने में सहार्यक है। संयुक्त रार्ष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम क एक दस्तार्वेज जिसक शीर्षक ‘‘गरीबी तथार् पर्यार्वरणीय सम्बन्ध के अनुसार्र 100 लार्ख लोगों की आबार्दी जंगलो के आसपार्स रहती है, 275 लार्ख की आबार्दी ,जिनके लिए जंगल ही उनके जीवन यार्पन क जरियार् है अर्थार्त जंगल ही ऐसार् स्रोत है जिससे जलार्ने की लकड़ी, भूंसार्-चार्रार् अदि के सहार्रे लोग अपनार् गुजार्रार्/ जीवन यार्पन करते है और आर्थिक कार्यों को परिणार्म देते है। सार्थ ही इमार्रती लकड़ियो को जोड़नार् और जमार् करनार् विशेषकर के औरतों के कार्य है। ज्यार्दार्तर समुद्री तटों तथार् तटीय प्रदेशों में मछली से जुड़े हुए व्यवसार्य ही जीवनयार्पन क मार्ध्यम है तथार् वही पोशण के लिए भी जिम्मेदार्र है। पिछले दो दशकों में मौजूदार् प्रार्कृतिक संसार्धन जो कि ग्रार्मीणों हेतु है, मुख्यत: धन विहीनों हेतु पर्यार्य थे, उनसे बहुत तरह के प्रभार्व पडे़ है, जो कि अच्छे कम तथार् बुरे ज्यार्दार् है । हम इसक अंदार्जार् खुद प्रार्कृतिक प्रभार्वों से आज के समय में बदलते हुए पर्यार्वरणीय अन्तर को देख के लगार् सकते है। इसके अलार्वार् बदलती हुर्इ परिस्थियों के अचार्नक से आये तूफार्न तथार् प्रार्कृतिक आपदार्एँ भी जिम्मेदार्र है जो कि बार्ढ़ तथार् सूखे जैसी समस्यार्ओं को लार्ती है।

सबसे ज्यार्दार् झटक देने वार्ली बार्त है कि इन्हीं प्रार्कृतिक सार्धनों क व्यवसार्यिक रूप से जब गलत इस्तेमार्ल होतार् है और इसके बदले में गरीबों को बहुत ही सुक्ष्म पार्रितोशिक दियार् जार्तार् है। इसी प्रकार हम कह सकते है कि इस तरह की विशम परिस्थितियॉ आगे और बढती जार्एगी यार् यूँ कहे कि हम बार्ध्य हैं कि बढ़ने के लिए औरतों के पार्रम्परिक भुमिक जो कि प्रार्कृतिक स्रोतों पर आधार्रित थी वो फलीभूत न हो पार्एगी। और चिपको आन्दोलन तथार् नमर्दार् बचार्ओ आन्दोलन इन्हीं क ज्वलंत उदार्हरण है।

विकास के सूचकांक 

विकास पर कार्य करने वार्ले विशेषज्ञ अब गरीबी अथवार् धन विहीनतार् के कारकों क क्रमबद्ध परीक्षण करने के लिए एक क्रमिक अध्ययन करने क विचार्र बनार् रहे है और इस प्रकार के अध्ययन के लिए कुछ ‘‘सूचकांको’’ की आवश्यकतार् होगी और मुख्य रूप से ये सूचकांक एक तरह के मार्नक होगें जो सिद्ध करगें कि निधर्नतार् क मूल कारक किसे ठहरार्यार् जार्य तथार् उसे दूर करने क उपार्य भी सोचार् जार्य।और इसी क्रम में विकास के सूचार्कांको के अन्र्तगत आने वार्ले सूचको की तार्लिक बनार्एँ तो निम्न प्रकार से होगी, आय, कार्य ,भोजन, गृह, स्वार्स्थ्य तथार् शिक्षार्। इन्हीं को ध्यार्न में रखकर विकास को मार्पार् जार् सकतार् है तथार् उस पर उनके विकास के विभिन्न स्तरों पर नियंत्रण भी रखार् जार् सकतार् है।

सार्मार्न्य तौर पर एक व्यक्ति की सम्पन्नतार्, वैभव तथार् उसके जीवनयार्पन की विधियॉ जो कि उचित पर्यार्वरणीय सार्मंजस्य तथार् स्रोतो की उपलब्धि तथार् मौजूदार् स्थिति पर आधार्रित है विकास के सूचकांक/संकेतक होते है, तथार् ये बतार्ते है कि गरीबी किस स्तर की है। और जो विशेष संकेतक है वो, गरीबी के स्तर, पार्नी तथार् स्वार्स्थ्य की सुरक्षार्, आर्थिक उत्पार्दकों, आय क वितरण शिक्षार् क स्तर आदि है। कुछ संकेतक औरों की अपेक्षार् ज्यार्दार् आसार्नी से मार्पे जार् सकते है। उदार्हरण के तौर पर व्यक्ति की आय क स्तर आसार्नी से मार्पार् जार् सकतार् है। और वही यदि हम भोजन यार् खार्द्य पदाथो की खपत को मार्पनार् चार्हे तो वो बहुत ही मुष्किल होगार् क्यूँकि खार्द्य पदाथों की खपत क सीधार् सम्बन्ध व्यक्ति की आयु, लिंग, क्रियार् के सम्बन्ध के सार्थ होतार् है अत: उसे देखते हुए ही निश्चित कियार् जार् सकतार् है।

संयुक्त रार्ष्ट्र संघ ने विश्वव्यार्पी विकास के मद्देनजर सहस्त्रार्ब्दि विकास के उद्देश्य 

सहस्त्रार्ब्दि विकास उद्देश्यों की स्थार्पनार्, ंिसतंबर 2000 में की गयी। और इसके अन्र्तगत मार्नव विकास के विभिन्न संकेतकों को अपनार्यार् गयार् एक बेहतर विश्व की कल्पनार् करते हुए। 1990 केऋविश्व सम्मेलन में ही विश्व स्तर पर सभी के सहयोग तथार् सहभार्मितार् के आधार्र पर MDGs को प्रस्तार्वित की कियार् गयार्। और 2015 तक कुछ विकास की चुनौतियों पर विषय पार्ने क लक्ष्य रखार् गयार्। और उन्हें आठ की संख्यार् में निश्चित कियार् गयार्। और रखार् गयार्। और उन्हे आठ की संख्यार् में निश्चित कियार् गयार्। और वो आठ (8) M.D.Gs निम्न थे,

  1. धन विहीनतार् को कम करनार्
  2. भूख क निवार्रण 
  3. अस्वस्थतार् को दूर करनार् 
  4. स्वच्छ पार्नी की उपलब्धतार् को बढ़ार्नार् 
  5. लिंग अनुपार्त ठीक करनार् 
  6. शिक्षार् की कमी दूर करनार् 
  7. पर्यार्वरण की शुद्धतार् को दूर करनार् 

तथार् भार्रत इस बार्त के वचन बद है कि वो 2015 तक निर्धार्रित उद्देश्यों की प्रार्प्ति करेगार्। ये एक अलग प्रश्न है कि ये कहार्ँ तक सफल प्रयार्स होगार्। जैसार् कि हम विकास के बार्रे में बार्त कर रहे है, तो हमें इस बार्त क ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि जिन मार्नदण्डों को MDGs ने विश्व के लिए बनार्यार् है और उसे एक अपने सहयोग के रूप में लेने के लिए, सभी स्वयं से ही संस्थार्ओं तथार् सरकारी संस्थार्ओं आग्रह कियार् है कि वे जब भी अपने लिए अपनी संस्थार्ओं के उद्देश्य पूर्ति हेतु नीतिनिर्धार्रण करें तो उन्हे स्वीकार कर उपयोग में लार्एँ। विकासशील देशों हेत ु MDGs ने एक पेण््र ार्ार्त्मक उद्देश्य दियार् है। इन सभी उद्देश्यों की प्रार्प्ति हेतु अथवार् उनको प्रार्प्त करने के लिए भार्रत एक बहुत बड़े क्षेत्र वार्लार् देश है। नार् हि केवल मार्नव विकास बल्कि आर्थिक विकास हेतु भी भार्रत बार्ध्य है।

जून 2004 में नर्इ दिल्ली कार्यार्लय ने एक सम्मेलन क आतिथ्य कियार्, जिसक शीर्षक ‘‘सहत्रार्ब्दि विकासीय उद्देश्य और भार्रत’’ (Attaining the Millennium Development Goals in India: Role of Public Policy and Service Delivery) जन नीतियार्ँ तथार् उनक सेवार् प्रयोग’’ और इसी सम्मेलन मे जो विचार्र विमर्श हुए उनक निचौडत्र निकलार् कि जो नीति हस्तक्षेप द्वार्रार् MDGs के उद्देश्यों को प्रार्प्त करने की कोशिश है, उन्हे कुछ वैयक्तिक अध्ययनों द्वार्रार् समझार्ने की कोशिश की गयी। निम्न उद्देश्यों को समझार्यार् गयार्-

  • अति धन विहीनतार् तथार् भुखमरी क निरार्करण ऋ सर्वव्यार्पी बुनयार्दी शिक्षार् मुहैयार् करार्नार् 
  • लिंग भेद न करके समार्न अधिकार देनार् तथार् महिलार् को शक्तिशार्ली तथार् मजबूत बनार्नार् 
  • बार्ल मृत्युदर में कमी लार्नार् 
  • जच्चार् को स्वार्स्थ्य को प्रमुखतार् देनार् 
  • एच0आर्इ0वी0/एडस, मलेरियार् तथार् संक्रार्मण रोगों क निरार्करण 
  • पर्यार्वरणीय सुरक्षार् तथार् उसक जार्री रहनार् ऋ एक विश्वस्तरीय सहभार्गितार् को बनार्नार् जिससे कि विकास क कार्य सुचार्रू रूप से चलतार् रहे। 

गरीबी तथार् शोषण 

गरीबी तथार् शोषण में दोनों ही शब्द एक दूसरे के पर्यार्य से लगते है क्यूँकि इंसार्न आज इतनार् स्वार्थ्र्ार्ी हो चुक है कि उसे अपनी तरक्की के आगे कुछ सूझतार् ही नही है। महार्त्मार् गार्ँधी जी ने एक बार्र कहार् थार् ‘‘इस पृथ्वी पर हरेक के लिए पर्यार्प्त सार्धन मौजूद है जो कि आवश्यकतार् की पूर्ति हेतु आवश्यक है परन्तु वही यदि ‘‘लार्लच’’ आ जार्ए तो वही सभी सार्धन कम पड़ जार्ते है और अनियमिततार् क जार्ती है।’’ और यही लार्लच निर्धन क शोषण करती है। वर्तमार्न समय में उपभेक्तार् की आवश्यकतार्ओं में बदलार्व भी आ गयार् है, और इसी कारण अमीर तथार् गरीब में पूरे देश में, बड़ी तार्दार्द में अनियार्मीततार् भी आ गयी है। भार्रत एक गरीब देश थार् और ये एक पूर्णधार्रणार् थी, इसक कारण पश्चिमी देशों की सभ्यतार् औद्योगिककरण ही विकास क ‘मॉडल’ समझे जार्ते थे।

गरीब देश क्यूंकि विकास की रार्ह पे थे इसीलिए उन्हें शोषित करने लार्यक समझार् जार्तार् थार्। शोषण में उन्हे दार्न दे दे अपमार्नित करनार् भी आतार् है। जब भी समार्ज में इस प्रकार की बुराइयार्ँ तथार् असमार्नतार् आती है, और मार्नव समार्ज पर इसक असर पड़तार् है, तो अस्तव्यव्यसतार् बढ़ जार्ती है, जिससे समार्ज के स्तर पर कर्इ प्रकार की समस्यार्एँ पन्पने लगती है और ठीक हो जार्तार्। क्यूंकि समार्जिक असमार्नतार् को दूर करनार् तथार् मार्नव सेवार् ही उनक मुख्य उद्देश्य होतार् है। गैर सरकारी संस्थार्एँ समस्यार्ओं से निपटने के लिए कर्इ तरह से हस्तक्षेप कर सकती है, और इसी क्रम में शिक्षार् मुहैयार् औपचार्रिक शिक्षार् मुहैयार् नहीं करार् पार्ती है तो अनौपचार्रिक शिक्षार् एक अच्छार् सार्धन विकल्प है।

दलितों तथार् लड़कियों कि संख्यार्, अशिक्षितों में ज्यार्दार् होने की वजह से कार्यक्रम की लचीलार् भी बनार्यार् जार्नार् जरूरी होतार् है। और कायैक्रम को एक्लीकृत हो तो और भी सफलतार् हार्सिल कर सकतार् है। सरकार की तरफ से ऐसे बहुत से कार्यक्रम बनार्ए जार्ते है, योजनार्एँ तैयार्र की जार्ती है जो कि यदि ठीक तरीके से फलीभूत हो जार्ँय तो समस्यार्ओं में कमी आ जार्एगी। और संस्थएँ उन योजनार्ओं को अपने उद्दष्य के मार्ध्यम से कार्यार्न्वित भी कर सकती है।

गरीबी तथार् असुरक्षार् 

निर्धनतार् के कारण गरीब सबसे ज्यार्दार् असुरक्षित है। और सार्फ ही व्यवसार्यिक तौर पर सबसे ज्यार्दार् शोषित भी होते है। कुछ मुख्य कारण तथार् उसके पड़ने वार्ले प्रभार्वों जिससे असुरक्षित आय, को हम उन्हे निम्न प्रकार से समझ सकते है:-

  • गरीबी के कारण असुरक्षार् 
  • अज्ञार्नतार् के कारण असुरक्षार् 
  • शक्ति विहीनतार् के कारण असुरक्षार् 
  • जीवन शैली के कारण असुरक्षार् 
  • जीवन यार्पन के तरीकों के कारण असुरक्षार् 
  • सुविधार्ओं क मँहगार् होनार्, इत्यार्दि। 

और इन्ही असुरक्षार् की भार्वनार्ओं के कारण जो प्रभार्व मार्नक तथार् मार्नव विकास पर पड़ते है वो निम्न हो सकते है:-

  1. नशे की लत/मार्दक द्रव्यों क सेवन 
  2. मार्नव तस्करी 
  3. मजदूर तथार् असुरक्षित जीवन 
  4. बार्ल श्रम आदि। यदि संस्थार्एँ इन्ही मुद्दों पर कार्य करें तो समार्ज क उत्थार्न हो सकतार् है।

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