गुट निरपेक्ष आंदोलन क्यार् है ?
प्रथम विश्व युद्ध में हुर्इ जन-धन की हार्नि के कारण दुनियार् के देश शार्ंति व्यवस्थार् स्थार्पित करने के लिए चिंतित थे। अमेरिक के रार्ष्ट्रपति वुडरो विल्सन के सहयोग से 1920 में रार्ष्ट्रसंघ नार्मक अन्र्तरार्ष्ट्रीय संस्थार् की स्थार्पनार् की गर्इ। शार्ंति व्यवस्थार् बनार्ये रखने के लिए कुछ शर्ते भी रखी गर्इ। परन्तु कुछ स्वार्थ्री देशों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् न होने के कारण यह संस्थार् असफल हो गर्इ और शार्ंति स्थार्पित न हो सकी। 1939 र्इ. तक पुन: ऐसी स्थिति बन चुकी थी कि द्वितीय विश्व युद्ध जैसी आशंक उत्पन्न हो गर्इ। हुआ यही कि 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध प्रार्रंभ हो गयार् और दुनियार् के कर्इ देशों ने अपने आपको इस युद्ध में झौंक दियार्। 1945 में युद्ध समार्प्त होने पर पुन: दुनियार् के देश शार्न्ति स्थार्पित करने के लिए आतुर हो गये। 1945 में रार्ष्ट्रसंघ जैसी पुन: एक संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ नार्मक अन्र्तरार्ष्ट्रीय संस्थार् क निर्मार्ण कियार् गयार्। इस समय तक दुनियार् दो गुटों में बंट चुकी थी प्रथम गुट क नेतृत्व अमेरिक कर रहार् थार् जो पूंजीवार्दी व्यवस्थार् क समर्थक थार्। सोवियत रूस दूसरे गुट क नेतृत्व कर रहार् थार् जो सार्म्यवार्दी समर्थक थार्। अमेरिक ने नार्टो तथार् सीटो (दक्षिण पूर्वी एशियाइ संगठन) क निर्मार्ण जहार्ं रूस ने सार्म्यवार्द के प्रसार्र को रोकने के लिए कियार् वहीं रूस को भी वार्रसार् पैक्ट (जिसमें जर्मनी, पोलेण्ड, हंगरी, चेकोस्लार्वार्कियार्, रूमार्नियार्, बलगेरियार् आदि देश शार्मिल थे) क संगठन अमेरिक की पूंजीवार्दी व्यवस्थार् को रोकने के लिए कियार् । इन गुटों में दुनियार् के अधिकतर विकसित देश थे। भार्रत एक विकासशील देश थार्। तथार् विकासशील होने के कारण भार्रत के समक्ष यह समस्यार् उत्पन्न हो गर्इ थी कि वह किसी एक गुट में शार्मिल हो यार् दोनों गुटों से अलग रहे, इस समय दोनों गुटों के मध्य शीतयुद्ध की स्थिति बनी हुर्इ थी। शीतयुद्ध अस्त्र-शस्त्र की लड़ाइ न होकर वैमनस्य, कटुतार्, तनार्ब, एवं मनोमार्लिन्य क संघर्ष थार्। भार्रत दोनों गुटों की रार्जनीति से अलग अपनार् अस्तित्व चार्हतार् थार्। भार्रत ने युगोस्लार्वियार्, मिश्र आदि देशों के प्रतिनिधियों से मिलकर इस समस्यार् पर विचार्र विमर्श कियार्। भार्रत से जवार्हर लार्ल नेहरू, यूगोस्लार्वियार् से माशल टीटो तथार् मिश्र के रार्ष्ट्रपति नार्सिर ने दोनों गुटों से अलग रहने की नीति क क्रियार्नवयन कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन क सूत्रपार्त कियार्।

गुटनिरपेक्षतार् यार् असंलग्नतार् क उदय

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समार्प्त होने के पश्चार्त् विश्व दो गुटों में बंट गयार् थार्। एक गुट अमेरिक तथार् दूसरार् गुट सोवियत रूस क थार्। इस स्थिति में भार्रत यार् तो किसी एक गुट में शार्मिल हो सकतार् थार्, यार् दोनों गुटों से अलग रह सकतार् थार्। भार्रत के पार्स इस समय दो ही रार्स्ते थे। यहार्ँ इसक मतलब यह नही कि भार्रत तीसरार् गुट बनार्ने की तैयार्री में थार्। हुआ यही कि भार्रत ने दोनों गुटों से अलग रहकर अपनी एक नीति अपनाइ, और यह तीसरार् ही गुट बन गयार् जो निर्गुट यार् गुटनिरपेक्ष कहलार्यार्। इस समय तक एशियार् तथार् अफ्रीक के देश स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में उभरने लगे थे। उनक गुटबंदी में विश्वार्स नही थार् और वे अपने आपको किसी देश के सार्थ संबंध नहीं चार्हते थे। यह अफ्रो-एशियाइ देश तीसरी शक्ति के रूप में उभरे। एशियार् और अफ्रीक देशों के नव जार्गरण के काल में यह गुटनिरपेक्षतार् की नीति प्रमुख विशेषतार् थी। उनक विश्वार्स थार् कि अन्र्तरार्ष्ट्रीय सहयोग में यह तृतीय शक्ति एक सहार्यक सिद्ध होगी।

संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ की बैठक में गुटनिरपेक्ष शब्द क प्रयोग कियार् गयार्। 1953-54 में जब संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ में भार्रत की तटस्थतार् की हंसी उडाइ जार् रही थी तब श्री कृष्ण मेनन के मुख से अचार्नक यह शब्द निकल पड़ार्। इस प्रकार भार्रत की स्वंतंत्रतार् के उपरार्ंत इस शब्द को बार्र-बार्र दुहरार्यार् गयार् तथार् इस नीति क पार्लन शुरू हो गयार्। भार्रत में जवार्हर लार्ल नेहरू, मिश्र के रार्ष्ट्रपति नार्सिर, तथार् युगोस्लार्वियार् के माशल टीटो ने इस नीति की धार्रणार् को काफी मजबूत कियार्। अंतत: यह नीति पूर्ण रूप से सितम्बर 1961 र्इ. में यूगोस्लार्वियार् की रार्जधार्नी वेलग्रेड की ‘नार्न अलार्इंड कांफ्रेस’ मे मार्न्य हो गर्इ।

गुटनिरपेक्षतार् क अर्थ एवं परिभार्षार्

डॉ. कृष्णार् कुदेशियार् ने अपनी पुस्तक ‘ विश्व रार्जनीति में भार्रत ‘ में गुटनिरपेक्षतार् क उल्लेख करते हुए लिखार् है कि ‘‘गुटनिरपेक्षतार् क अर्थ तटस्थतार् नही है क्योंकि भार्रत ने अपने आपको संकुचित सीमार्ओं में बार्ंधकर नही रखार् है और न न्यार्यपूर्ण परिस्थिति में किसी गुट विशेष क समर्थन करने से बचतार् है। उसकी यह गुटनिरपेक्षतार् की नीति उपदेशार्त्मक नकारार्त्मक तटस्थतार् एवं अप्रगतिशील नीति नही है इसक अर्थ यह है कि जो सकारार्त्मक है अर्थार्त सही और न्यार्यसंगत है उसकी सहार्यतार् और समर्थन करनार् तथार् जो अनीतिपूर्ण है उसकी आलोचनार् और निंदार् करनार् है।’’

जॉर्ज श्वाजनवर्गर के मतार्नुसार्र गुटनिरपेक्षतार् को छ: धार्रणार्ओं से भिन्न रखार् जार् सकतार् है-

  1. अलगार्ववार्द: ऐसी नीतियों क समर्थन करनार् जिनसे रार्ष्ट्र विश्व रार्जनीति में कम से कम भार्ग ले तथार् बिल्कुल अलग रहे। 
  2. अप्रतिबद्धतार्: किन्हीं दो अन्य शक्तियों से समार्न संबंध रखते हुए उनमें से किसी एक के सार्थ पूरी तरह से प्रतिबद्ध न होनार्। 
  3. तटस्थतार्: यह वह कानूनी एंव रार्जनीतिक स्थिति है जो युद्ध के दौरार्न दोनों रार्ष्ट्रों में से किसी के भी सार्थ युद्ध में संलग्न होने की अनुमति नही देती। 
  4. एक पक्षवार्द इसक तार्त्पर्य है कि प्रत्येक देश नि:शस्त्रीकरण आदि नीतियों को अपनार्नार् चार्हिए। सार्थ ही यह ध्यार्न रखनार् चार्हिए। कि अन्य देश भी ऐसार् करते है यार् नहीं। 
  5. असंलग्नतार्: विभिन्न परस्पर विरोधी विचार्रधार्रार्ओं के बीच हो रहे संघर्षो से उत्पन्न खतरों से बचने के लिए तथार् अलग रहने के लिए यह नीति अपनाइ जार्ती है। 
  6. तटस्थीकरण देश हमेशार् के लिए तटस्थ है अपनी तटस्थीकृत स्थिति को कभी नही छोड सकतार्। गुटनिरपेक्षतार् इन सभी छ: धार्रणार्ओं से भिन्न है वस्तुत: यह मैत्री संधियों अथवार् गुटों से बार्हर रहने की नीति है।

‘‘यदि स्वतंत्रतार् क हनन होगार् तथार् न्यार्य की हत्यार् होगी, आक्रमण होगार् वहार्ंँ हम न तो तटस्थ है और न रहेंगें।’’ – जवार्हर लार्ल नेहरू

‘‘यह स्वतंत्र विदेश नीति एवं तटस्थतार् एक ही बार्त नही है। अगर कभी कही भी युद्ध होतार् है तो इस नीति की आवश्यकतार् होगी कि वह स्वतंत्रतार् एवं शार्ंति के लिए सहयोग दे। स्वतंत्र विदेश नीति क मतलब यह है कि भार्रत पहले से अपने आपको किसी भी गुट के सार्थ समझौते द्वार्रार् संबंद्ध नही करनार् चार्हतार् और न ही किसी भी दशार् में अपनी स्वतंत्रतार् खोनार् चार्हतार् है।’’ – अप्पार्दोराइ इससे यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि गुटनिरपेक्षतार् शार्ंति तथार् स्वतंत्रतार् की नीति है। इसके द्वार्रार् युद्ध रोके जार् सकते है। युद्ध की स्थिति में भार्रत इस नीति क उपयोग शार्ंति स्थार्पनार् के लिए करतार् है।

गुटनिरपेक्षतार् को दूसरे शब्दों में परिभार्षित करते हुए कहार् जार् सकतार् है कि गुटनिरपेक्ष वे देश मार्ने जार् सकते है जो सैनिक गुटों के सदस्य न हो, युद्ध क समर्थन न करने वार्ले, स्वार्धीनतार् के समर्थक, स्वतंत्र विदेश नीति आदि क पार्लन करते हों।

गुटनिरपेक्ष नीति अपनार्ने के कारण

(1) गुटनिरपेक्षतार् रार्ष्ट्र हितों के अनुरूप-

भार्रत यह नही चार्हतार् थार् कि वह किसी गुट में शार्मिल होकर दूसरे गुट को अपनार् शत्रु बनार् ले। समस्त देश उससे मैत्री की कामनार् करते है तो वह सभी देशों से मैत्री क कामनार् करतार् है। सार्थ ही इस समय किसी गुट में शार्मिल होनार् भार्रत के रार्ष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं थार्।

(2) विश्व शार्न्ति की इच्छार् –

भार्रत की स्वतंत्रतार् के समय दुनियार् दो गुटों में बट चुकी थी। दूसरे विश्व युद्ध को समार्प्त हुए कुछ ही समय (2वर्ष) हुए थे अमेरिक तथार् सोवियत रूस में तनार्व की स्थिति बनी हुर्इ थी। शीत-युद्ध प्रार्रंभ हो गयार् थार्। भार्रत इस तनार्व में नही पडनार् चार्हतार् थार् । वह समार्न रूप से दोनों गुटों से मित्रतार् क वार्तार्वरण बनार्नार् चार्हतार् थार्।

‘‘शार्ंति के बिनार् हमार्रे सभी स्वप्न मिट्टी में मिल जार्ते है।’’ -जवार्हर लार्ल नेहरू

(3) विदेशी सहार्यतार् की आवश्यकतार्-

स्वतंत्रतार् के समय भार्रत पिछड़ार् हुआ देश थार्। अंग्रेजी रार्ज्य के शोषण के कारण भार्रत को आर्थिक पुर्ननिर्मार्ण की भार्री आवश्यकतार् थी। भार्रत की आर्थिक स्थिति सुधार्रने के लिए पंचवष्रीय योजनार्एं बनार्नी पड़ी। इन योजनार्ओं को चलार्ने के लिए भार्रत को अधिक धन की आवश्यकतार् थी, विदेशी सहार्यतार् के बिनार् इनको चलार्नार् असंभव थार्। हार्लार्कि भार्रत की स्थिति सुधरती चली गर्इ और आंतरिक सार्धन जुटार् लिए गये।

(4) भार्रत की भौगोलिक स्थिति

गुटनिरपेक्षतार् को अपनार्ने के लिए वार्ध्य करती है। भार्रत पश्चिमी गुट के सार्थ सैनिक गुटबंदी नही कर सकतार् क्योंकि पश्चिम विरोधी दो प्रमुख शक्ति शार्ली सार्म्यवार्दी देशों की सीमार्यें भार्रत की सीमार्ओं के पार्स है एक तरफ चीन तथार् दूसरी और सोवियत रूस, अगर भार्रत ने पश्चिमी खेमे में शार्मिल होकर रूस की सहार्नुभूति खो दी तो यह निश्चित रूप से अहितकर होगार्।

(5) घटनार्ओं क निष्पक्ष तथार् स्वतंत्र मूल्ल्यार्ंकन-

भार्रत किसी भी गुट क पिछलग्गू बनकर नही रहनार् चार्हतार् थार्। और न ही स्वतंत्र निर्णय की शक्ति को खोनार् चार्हतार् थार्। हमार्री प्रार्चीन परम्परार्नुसार्र हम बड़ी सार्म्रार्ज्य वार्ली शक्तियों क विरोध करते है। और शोषित देशों क सार्थ देनार् तथार् उनकी स्वतंत्रतार् की मार्ंगो क समर्थन करनार् तथार् निष्पक्ष रूप से अन्तर्रार्ष्ट्रीय क्षेत्र में निर्णय लेनार् हमार्रे आदर्श है।

(6) अन्र्तरार्ष्ट्रीय क्षेत्र में स्वतंत्र व्यक्तित्व क विकास हो मार्न-

सम्मार्न बड़े यह भार्रत की इच्छार् रही है। अन्र्तरार्ष्ट्रीय क्षेत्र में गतिरोधों को दूर करने, गुटों के मतभेदों को बढ़ार्ने की बजार्य उनकों दूर करने क भरसक प्रयत्न करनार् तथार् विश्व-शार्न्ति की वृद्धि में योगदार्न आदि कार्य भार्रत ने प्रमुख रूप से किये।

गुट निरपेक्षतार् को प्रोत्सार्हित करने वार्ले कारक

1.स्वतंत्र विदेश नीति क संचार्लन –

आज अधिकतर रार्ष्ट्र गुटनिरपेक्षतार् की नीति को अपनार्ने के लिए बार्ध्य है। क्योंकि रार्ष्ट्र अपने आपको स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखनार् चार्हते है। आज कोर्इ भी रार्ष्ट्र किसी बड़ी शक्ति के उपग्रह के समार्न स्थिति में नही है। और न ही किसी रार्ष्ट्र की अंगुलियों पर नार्चने को बार्ध्य है। आज हर रार्ष्ट्र में स्वतंत्र विदेश नीति क संचार्लन करने की ललक बनी हुर्इ है।

2.सैनिक गुटों से पृथक रहनार्-

द्वितीय विश्व युद्ध समार्प्त होने के पश्चार्त् विश्व दो गुटों में बंट चुक थार्। दोनों गुटों ने अपने-अपने सैनिक गुटों को मार्ध्यम बनार्यार्। अमेरिक तथार् रूस दोनों से अलग अस्तित्व बनार्ये रखने के लिए गुटनिरपेक्ष एक तृतीय शक्ति के रूप में उभरार्। 1945-50 की अवधि में अत्यार्धिक अफ्रो-एशियाइ देश स्वतंत्र हुए थे ये देश आर्थिक स्थिति से कमजोर थे जो संभलने के लिए समय चार्हते थे। और वे इस चक्रव्यूह में नहीं फंसनार् चार्हते थे। वे गुटनिरपेक्षतार् की नीति पर चलकर विश्व-रार्जनीति में अपनार् स्वतंत्र अस्तित्व बनार्नार् चार्हते थे।

3.शीत युद्ध –

1945 के बार्द दुनियार् के दोनों गुटों में (अमेरिक और सोवियत रूस) में मतभेद की स्थिति बन गयी। यह स्थिति तीव्र तनार्व, वैमनस्य, और मनमुटार्व के कारण इतनी गम्भीर हो गर्इ कि वे एक-दूसरे पर कटु बार्ग्वार्णों की वर्षार् करने लगे। यह लड़ाइ कोर्इ अस्त्र-शस्त्र तथार् बार्रूद, गोलों से लड़ी जार्ने वार्ली लड़ाइ नही थी, बल्कि यह अखबार्रों (कागज) से लड़ी जार्ने वार्ली लड़ाइ थी, अखबार्रों में एक दूसरे देश की आलोचनार्, वैमनस्यतार् से पूर्ण बार्तें अखबार्रों में दिन-प्रतिदिन पढ़ने को मिलती थी, इससे एक दूसरे देश के प्रति कटुतार् की भार्वनार् बढ़ती जार्ती थी। जो शीत-युद्ध कहलार्यार्। इस समय स्वतंत्र हुए रार्ष्ट्रों ने किसी क समर्थन न करते हुए पृथक रहने क निर्णय कियार्। शीत युद्ध से अलग रार्ष्ट्रों की जो नीति थी वह असंलग्नतार् की नीति थी अर्थार्त गुटनिरपेक्षतार् की नीति।

4.आर्थिक कारक-

अधिकांश देश इस समय जो गुटनिरपेक्षतार् की नीति पार्लन कर रहे थे वे ज्यार्दार्तर गरीब देश थे। उनके पार्स पूंजी तथार् तकनीकी कौशल की कमी थी। इससे इन देशों के मध्य पूंजी प्रार्प्त करने के लिए कोर्इ रार्स्तार् नहीं थार्। अगर एक गुट में जार्कर मिल जार्ए तथार् पूंजी प्रार्प्त हो जार्ए तो दूसरी तरफ स्वतंत्रतार् छिन जार्ने क डर थार्। चूंकि अधिकांश रार्ष्ट्र अपनार् अलग स्वतंत्र अस्तित्व चार्हते थे। इसलिए उन्होनें गुटनिरपेक्षतार् की रार्ह चुनी।

5.मनोवैज्ञार्निक विवशतार्-

नवोदित रार्ष्ट्रों के गुटनिरपेक्षतार् की नीति अपनार्ने के पीछे उनक कारण भार्वार्त्मक एवं मनोवैज्ञार्निक विवशतार् थी। उन्होनें महसूस कियार् थार् कि विशिष्ट प्रश्न यार् स्थिति के संदर्भ में अपनार् दृष्टिकोण प्रस्तुत करनार् पड़े यार् कार्यवार्ही करनी पड़ जार्ए तो अच्छी तरह से प्रमार्णित कर सकते है।

गुटनिरपेक्षतार् की उपलब्धियार्ँ

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन क प्रथम शिखर सम्मेलन वेलग्रेड में 1961 र्इ. में हुआ थार्। जिसमें 25 रार्ष्ट्रों ने भार्ग लियार्। 1998 में डरबन में आयोजित 12 वें शिखर सम्मेलन में 115 देशों ने भार्ग लियार् थार्। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में सदस्यों की संख्यार् दिन-प्रतिदिन बढ़ती जार् रही है। अब यह आन्दोलन अन्र्तरार्ष्ट्रीय आन्दोलन बन चुक है एवं कार्य क्षेत्र में भी बढ़ोत्री हुर्इ है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उपलब्धियार्ँ इस प्रकार है।

1. नि:शस्त्रीकरण – 

अस्त्र-शस्त्र को नियंत्रित करने की नीति तथार् नि:शस्त्रीकरण हथियार्रों के प्रयोग पर रोक लगार्ने की नीति अधिकांश देशों ने अपनाइ परंतु उन्हें एकदम सफलतार् तो हार्थ नहीं लगी परन्तु उन देशों को यह नहीं भूलने दियार् कि विश्व-शार्न्ति को बढ़ार्वार् देने के लिए अस्त्र-शस्त्र बढ़ार्ने की वे लगार्म दौड़ कितनी खतरनार्क है। गुटनिरपेक्षतार् की नीति को अपनार्ने वार्ले भार्रत को इस बार्त पर संतोष हुआ कि उसने अप्रैल 1954 में जिन न्युक्लीय शस्त्रों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगार्ने क जो प्रस्तार्व रखार् थार् 1963 में वह आंशिक रूप से संधि के मार्ध्यम से फलीभूत हुए। ‘‘आन्दोलन से शार्न्ति क माग प्रशस्त हुआ ही है सार्थ ही मार्नव प्रतिष्ठार् और समार्नतार् क निर्मार्ण भी हुआ है।’’

2. गुटनिरपेक्षतार् को दोनों गुटों द्वार्रार् मार्न्यतार्-

 गुटनिरपेक्षतार् को प्रार्रंभ में कठिनाइ से जूझनार् पड़ार्, कि देशों को कैसे समझार्यार् जार्ए कि गुटनिरपेक्षतार् क्यार् है अन्र्तरार्ष्ट्रीय स्तर पर इसे कैसे मार्न्यतार् दिलाइ जार्ए दोनों गुट पश्चिमी एवं पूर्वी गुट यह समझते थे कि गुटनिरपेक्षतार् कुछ हद तक ठीक है। दोनों गुटों क गुटनिरपेक्षतार् पर विश्वार्स भी कम थार् परन्तु यह बार्त भी सच है कि कुछ गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्र कहीं न कहीं तथार् किसी न किसी प्रकार से अप्रत्यक्ष रूप से किसी गुट में सम्मिलित है। उनक मार्ननार् थार् कि गुटनिरपेक्षतार् एक दिखार्वार् है और दो गुटों के अलार्वार् तीसरार् रार्स्तार् नही है।

धीरे-धीरे दोनों गुटों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आयार् और गुटनिरपेक्षतार् को मार्न्यतार् मिलनार् शुरू हो गर्इ। 1956 र्इ. में सोवियत संघ में कम्यूनिष्ट पाटी की 20 वीं कांग्रेस ने पहली बार्र यह स्वीकार कियार् कि गुटनिरपेक्ष देश सचमुच स्वतंत्र है और यह भी अनुभव कियार् कि विश्व की समस्यार्ओं के बार्रे में सोवियत संघ तथार् गुटनिरपेक्ष देशों के समार्न विचार्र है। वहीं दूसरी ओर पश्चिमी गुट ने भी गुटनिरपेक्ष नीति को मार्न्यतार् दी और गुटनिरपेक्ष देशों में गुटबद्ध देशों के मन क भ्रम अलग करने के लिए इस नीति के प्रति सद्भार्वनार् और सम्मार्न क वार्तार्वरण पैदार् करने में जो प्रयार्स किये और सफलतार् प्रार्प्त की वह वार्स्तव में सरार्हनीय कार्य है।

3. संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ के स्वरूप को रूपार्ंतरित करनार्-

 गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों ने गुटनिरपेक्षतार् की नीति द्वार्रार् संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ को कुछ दृष्टियों से हमेशार्-हमेशार् के लिए रूपार्ंतरित करने में सहार्यतार् दी है। संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ ने एक तो संख्यार् के आधार्र पर तथार् दूसरे शीत युद्ध में अपनी तटस्थ दृष्टि के कारण छोटे रार्ष्ट्रों के मध्य शार्ंति स्थार्पित करने के लिए ऐसे संगठन बनार्ने में सहार्यतार् दी जिसमें छोटे रार्ष्ट्र बड़े रार्ष्ट्रों पर नियंत्रण रख सके। उन्होनें संयुक्त रार्ष्ट्र संघ की महार्सभार् के महत्व को बड़ार् दियार्, जिसमें सभी सदस्यों क बरार्बर प्रतिनिधित्व होतार् है तथार् सुरक्षार् परिषद क महत्व कम कर दियार्। उसकी मूल संकल्पनार् विश्व संगठन के सबसे महत्वपूर्ण अंग के रूप में की गर्इ।

4. उन्मुक्त वार्तार्वरण क निर्माण – 

नव स्वतंत्र रार्ष्ट्रों को महार्न शक्तिशार्ली रार्ष्ट्र शक्तियों के चंगुल से बचार्ने के लिए तथार् स्वतंत्र वार्तार्वरण क अस्तित्व बनार्ए रखने के लिए गुटनिरपेक्षतार् ने महत्वपूर्ण भूमिक निभाइ। गुटबंदी की विश्व रार्जनीति ने दमघोटु रार्ष्ट्र समार्ज में गुटनिरपेक्षतार् की नीति एक शुद्ध हवार् क झोंक लेकर आयी। यह तार्जी हवार् थी खुले समार्ज के गुणों की, मुक्त एवं खुली चर्चार् के वरदार्न की, तीव्र मतभेद और रोष के समय खुले रार्स्ते रखने के महत्व की शीतयुद्ध के कारण जो अनुदार्रतार्एॅ और विकृतियार्ँ पैदार् हो गर्इ थी गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों ने उन्हें दूर करने क अथक प्रयार्स कियार्। और विश्व समार्ज एक खुलार् समार्ज बन गयार्।

5. शीत युद्ध को शस्त्र युद्ध के रूप में बदलने से रोकनार्- 

गुटनिरपेक्ष देशों ने दोनों गुटों (अमेरिक तथार् सोवियत रूस) के मध्य तार्लमेल बिठार्ने के लिए तथार् दोनों के मतभेदों को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिक निभाइ। द्वितीय विश्व युद्ध के बार्द शीत युद्ध की स्थिति बनी हुर्इ थी। स्थिति कुछ ऐसी ही बनती जार् रही थी कि तृतीय विश्व युद्ध भी हो सकतार् थार्। परन्तु गुटनिरपेक्ष देशों ने दोनों गुटों में सद्भार्वनार् क भार्व पैदार् कर शीत-युद्ध को अस्त्र-शस्त्र के युद्ध से बचार् लियार्।

6. विकासशील रार्ष्ट्रो के बीच आर्थिक सहयोग की बुनियार्द – 

विकासशील रार्ष्ट्रों के मध्य आर्थिक सहयोग की बुनियार्द रखने में गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों को सफलतार् मिली। 20 अगस्त 1976 के कोलम्बो शिखर सम्मेलन में आर्थिक घोषणार् पत्र स्वीकार कियार् गयार् जिसक मुख्य आधार्र यह थार् कि गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों के बीच अधिकाधिक आर्थिक सहयोग हो इस सम्मेलन में तकनीकी, व्यार्पार्र, मुद्रार् प्रणार्ली में आमूल-चूल परिवर्तन आदि पर महत्व दियार् गयार्।

7. रार्ष्ट्रीय प्रकृति के अनुरूप विकास के प्रतिमार्न- 

दोनों गुटों द्वार्रार् गुटनिरपेक्ष देशों पर थोपे जार्ने वार्ले आदर्शो क विरोध कियार् सार्थ ही अपनी रार्ष्ट्रीय प्रकृति के अनुसार्र विकास के अपने रार्ष्ट्रीय सार्ंचो और पद्धतियों क अविष्कार कियार्। इस तरह भार्रत ने अपने समार्ज के समार्जवार्दी ढार्ंचे क अविष्कार कियार्।

8. विश्व रार्जनीति में संघर्षोर् े को टार्लनार्- 

गुटनिरपेक्षतार् के कारण कुछ विकट संघर्ष टल गए। तृतीय विश्व युद्ध की आशंक समार्प्त हो गर्इ, सार्थ ही अन्य संकटों क समार्धार्न भी हो गयार्। न्युक्लीय अस्त्रों क दशक भी इस खतरनार्क संकट से बच गयार् इस प्रकार गुटनिरपेक्षतार् ने अन्र्तरार्ष्ट्रीय शार्न्ति और सुरक्षार् बनार्ए रखने में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार्। दोनों गुटों की जो योजनार्एं थी उनको धीरे-धीरे नष्ट कर विश्व के अन्य देशों को भी दो गुटों में शार्मिल करने से रोक दियार्। विकासशील देशों ने विकसित देशों को शार्ंति, सहयोग, सद्भार्वनार् पूर्ण जीवन बितार्ने क सबक सिखार्यार्। गतिरोध घोर अंधविश्वार्स और दोनों गुटों क सम्पर्क टूट जार्ने की स्थितियों में गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों ने न केवल संयम से काम लेने की सलार्ह दी बल्कि युद्ध विरार्म के अवसरों पर अपने सद्प्रयत्न मध्यस्थतार् और शार्न्ति सेनार्ए भी जैसे कोरियार्, स्वेज, सेनार्एं प्रस्तुत कर दी।

इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने विश्व-शार्न्ति, आर्थिक सहयोग, शीतयुद्ध के समय शार्न्ति बनार्ए रखने, नि:शस्त्रीकरण, आदि में महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रार्प्त की और सफलतार् भी मिली।

गुटनिरपेक्षतार् की सदस्यतार् शर्ते

जून 1961 में काहिरार् में 21 रार्ष्ट्रों की बैठक में गुटनिपेक्षतार् की सदस्यतार् के संबंध में पार्ँच मार्नदण्ड निर्धार्रित किये गये। आपसी परस्पर विरोधी मत व्यक्त किये जार्ने के बार्द मार्नदण्डों में काफी समझौतार् करनार् पड़ार्। 1961 र्इ. के वेलग्रेड सम्मेलन क निमंत्रण भेजने के लिए उन देशों की एक समीति बनाइ जिन्होंने काहिरार् की बैठक में भार्ग लियार् थार् और इसक काम उन्हीं पर सौंप दियार्। ये मार्नदण्ड (शर्ते) निम्न लिखित थी –

  1. किसी भी गुटनिरपेक्ष देश के लिए स्वार्धीन नीति क अनुसरण करनार् आवश्यक नहीं है इस नीति के पक्ष में जितनार् कर सके उतनार् ही ठीक हैं। 
  2. निरन्तर रार्ष्ट्रीय स्वार्धीनतार् के लिए आन्दोलनों क समर्थन प्रदार्न करनार् चार्हिए। किस हद तक और किस रूप में यह निश्चित नहीं है। 
  3. यह मार्नदण्ड सैनिक गुटबन्धनों की सदस्यतार् से सम्बन्धित है। अर्थार्त् गुटनिरपेक्ष बनने के लिए उस देश को सैनिक गुटों क सदस्य नहीं होनार् चार्हिए। 
  4. यदि किसी द्विपक्षीय संधि समझौतार् है तो यह बार्त ध्यार्न में रखनी होगी कि वह जार्नबूझकर बड़ी शक्ति के संदर्भ में नहीं होनी चार्हिए यह चौथार् एवं पार्ंचवार् मार्नदण्ड थार्।

इन सब मार्नदण्डों से निष्कर्ष निकलतार् है कि गुटनिरपेक्षतार् की सदस्यतार् वही देश ग्रहण कर सकते है जो अमेरिकी तथार् सोवियत रूस गुट क सदस्य नही हो। डॉ. वेदप्रतार्प लिखते है ‘‘इस आन्दोलन के समक्ष सबसे बड़ी समस्यार् यह है कि उसके पार्स अपने नार्म की कोर्इ व्यवस्थित परिभार्षार् नहीं है। आज गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को लगभग 45-50 सार्ल हो चुके है, परन्तु आज तक कोर्इ सर्वमार्न्य परिभार्षार् नही है। जब परिभार्षार् की बार्त आती है, तो इतिहार्सकार नेहरू, नार्सिर, माशल टीटो के भार्षणों को ही उद्धत करते रहते है। कोर्इ भी रार्ष्ट्र इसकी परिभार्षार् नही दे पार् रहार् है।

कुछ रार्ष्ट्र तो इसकी परिभार्षार् को पर्दे के पीछे रखनार् चार्हते है क्योंकि उन्हें इसकी सदस्यतार् ग्रहण करने के लिए कोर्इ समस्यार् उत्पन्न न हो इसमें वे रार्ष्ट्र भी शार्मिल हो जार्ए जिन्होंने अपनी जमीन पर सैनिक अड्डे बनार्ने के लिए जगह दी, इसमें वे रार्ष्ट्र भी शार्मिल हो जार्ए जिन्होने दोनों गुटों में से किसी के सार्थ समझौतार् कर रखार् हो, इसमें वे रार्ष्ट्र भी आ जार्ए जो अस्त्र-शस्त्र की दौड़ में लगे है, इसमें वे रार्ष्ट्र भी आ जार्ए जिन्होंने अपनी आर्थिक, रार्जनैतिक स्वार्धीनतार् को शक्ति रार्ष्ट्रों को गिरवी रख दियार् है। यही कारण है कि आज तक परिभार्षार् को स्पष्ट स्वरूप नहीं दियार् गयार्। अतंत: गुटनिरपेक्ष आन्दोलन परिभार्षार् विहीन बनकर चरित्रहीन की व्यूहरचनार् में फंस कर रह गयार् है।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन शिखर सम्मेलन

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के शिखर सम्मेलन प्रत्येक 3 वर्ष बार्द किये जार्ते है इसकी लोकप्रियतार् को बढ़ार्नार् इसक प्रमुख उद्देश्य है। इन सम्मेलनों में रार्ष्ट्रों के रार्ष्ट्रार्ध्यक्ष तथार् शार्सनार्ध्यक्ष भार्ग लेते है। इसक निर्णय सर्वसम्मति से लियार् जार्तार् हैं इसमें चार्र प्रकार के सदस्य शार्मिल होते है, पूर्ण सदस्य, पर्यवेक्षक सदस्य, पर्यवेक्षक गैर-रार्ज्य सदस्य और अतिथि इन सम्मेलनों से प्रमुख लार्भ है – गुटनिरपेक्षतार् की लोकप्रियतार् में वृद्धि होती है। अन्र्तरार्ष्ट्रीय मार्मलों पर गुटनिरपेक्ष देशों की प्रतिक्रियार् स्पष्ट रूप से अभिव्यत हो जार्ती है। गुटनिरपेक्ष देशों में आपस में रार्जनीतिक, आर्थिक तथार् सार्ंस्कृतिक सहयोग की भार्वनार् क विकास होतार् है। अन्र्तरार्ष्ट्रीय मंच पर गुटनिरपेक्ष देशों की एक आवार्ज को बल मिलतार् है। अन्र्तरार्ष्ट्रीय समस्यार्ओं पर गंभीर रूप से विचार्र विमर्श करने हेतु तथार् उनके समार्धार्न के लिए महत्वपूर्ण सुझार्व गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों द्वार्रार् विभिन्न शिखर सम्मेलनों में दिये गए जिसमें इन सुझार्वों क अन्र्तरार्ष्ट्रीय रार्जनीति पर गहरार् प्रभार्व पड़ार् । सम्मेलनों क प्रार्रंभ बेलग्रेड सम्मेलन 1961 र्इ. से हुआ।

1. प्रथम शिखर सम्मेलन (1961 र्इ.)

1961 र्इ. में चेकोस्लार्वियार् की रार्जधार्नी वेलग्रेड में प्रथम शिखर सम्मेलन रार्ष्ट्रपति माशल टीटो के सुझार्वों से आमंत्रित कियार् गयार्। इस सम्मेलन में किन देशों को आमंत्रित कियार् जार्ए तथार् किन देशों को नहीं यह एक बड़ी विडम्बनार् थी। देशों को आमंत्रित करने के लिए पार्ंच सूत्रीय शर्ते थी – (i) जो देश शार्ंतिपूर्ण-सह अस्तित्व के आधार्र पर स्वतंत्र विदेश नीति क अनुसरण करतार् हो। (ii) स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के लिए चल रहे आन्दोलनों क सर्मथन करने वार्ले देश (iii) ऐसे देश जो सैनिक गुटों के सदस्य न हो (iv) ऐसे देश जिन्होंने किसी महार्शक्ति के सार्थ संधि न की हो (v) ऐसे देश जिनकी भूमि पर सैनिक अड्डे न हो।

इस आधार्र पर बेलग्रेड सम्मेलन में 28 देशों को आमंत्रित कियार् गयार् जिनमें से 3 देशों ने अपने पर्यवेक्षक तथार् 25 देशों ने अपने प्रतिनिधि भेजकर सम्मेलन में भार्ग लियार्। 3 पर्यवेक्षक भेजने वार्ले देशों में इक्वेडोर, बोलीवियार् तथार् ब्रार्जील थे। जिन देशों को बेलग्रेड सम्मेलन के लिए आमंत्रित कियार् गयार् थार् वे इस पार्ंच सूत्रीय फामूले पर खरे उतरे थे। यह सम्मेलन 1 से 6 सितम्बर तक चलार्। सम्मेलन में प्रमुख रूप से निम्नलिखित विषयों पर विचार्र कियार् गयार् :-

  1. इस सम्मेलन में दुनियार् क ध्यार्न ऐसी समस्यार्ओं की ओर खींचार् गयार् जिनसे विश्वयुद्ध संभव थार् वे जिनमें बर्लिन की समस्यार्, संयुक्त रार्ष्ट्र में सार्म्यवार्दी चीन की सदस्यतार् क प्रश्न तथार् कांगों की समस्यार्। 
  2. प्रत्येक देश को अपनी इच्छार्नुसार्र शार्सन क स्वरूप निर्धार्रण करने और संचार्र करने की स्वतंत्रतार् हो।
  3. विश्व शार्न्ति स्थार्पित करने के लिए सार्म्रार्ज्यवार्द को हार्निकारक सिद्ध कियार् जार्ए। 
  4. बिनार् किसी भेदभार्व के किसी भी देश की प्रभुसत्तार् क सम्मार्न कियार् जार्नार् चार्हिए सार्थ ही किसी भी देश के आंतरिक मार्मलों के संबंध में हस्तक्षेप की नीति क समर्थन करनार् चार्हिए। 
  5. सम्मेलन में यह भी कहार् गयार् कि शार्न्ति व्यवस्थार् बनार्ए रखने के लिए विकासशील देश आर्थिक, सार्मार्जिक और रार्जनैतिक पिछड़ेपन से मुक्ति दिलार्कर उनकी सार्मार्जिक व्यवस्थार् को उन्नत बनार्यार् जार्नार् चार्हिए। 
  6. इस सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीक की रंगभेद नीति की आलोचनार् की गर्इ। 
  7. शार्न्तिपूर्ण सह अस्तित्व के सिद्धार्न्त में आस्थार् व्यक्त की गर्इ। इस सम्मेलन से शीत-युद्ध को कम कियार् जार् सक और अन्र्तरार्ष्ट्रीय रार्जनीति पर इसक बड़ार् ही हितकारी प्रभार्व पड़ार्। इसके कारण 1963 में अणु परीक्षण निषेध संधि सफलतार् पूर्वक की गर्इ।

2. द्वितीय शिखर सम्मेलन 1964

द्वितीय शिखर सम्मेलन 5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक 1964 र्इ. में काहिरार् में कियार् गयार्। जिसमें 48 देशों के प्रतिनिधि शार्मिल थे तथार् 11 पर्यवेक्षक देश थे। इस सम्मेलन क उद्देश्य गुटनिरपेक्षतार् के क्षेत्र को विस्तृत करनार् थार्। तथार् उसके मार्ध्यम से तनार्व को कम करनार् थार्। काहिरार् सम्मेलन में प्रतिनिधि रार्ष्ट्रों के बीच मतभेद की स्थिति उत्पन्न हो गर्इ और ऐसार् लगने लगार् कि सम्मेलन विफल हो जार्येगार्। इस सम्मेलन में आर्थिक सहयोग की बार्त कही गर्इ। इस सम्मेलन में निम्नलिखित बिन्दुओं पर चर्चार् की गर्इ।

  1. शार्ंतिपूर्ण वातार् के मार्ध्यम से अन्र्तरार्ष्ट्रीय विवार्दों क निपटार्रार् कियार् जार्ए। 
  2. परमार्णु परीक्षण पर रोक लगाइ जार्ए सार्थ ही नि:शस्त्रीकरण की नीति अपनाइ जार्ए। 
  3. दक्षिण रोडेशियार् की अल्पमत गोरी सरकार को मार्न्यतार् नही दी जार्नी चार्हिए। 
  4. उपनिवेशवार्द क अंत कियार् जार्य। कम्बोडियार् तथार् वियतनार्म में विदेशी हस्तक्षेप क अंत हो 
  5. चीन को संयुक्त रार्ष्ट्र संघ क सदस्य बनार्यार् जार्ए।
  6. सभी रार्ष्ट्रों से आºवार्न कियार् गयार् कि दक्षिण अफ्रीक से कूटनीतिक सम्बन्ध विच्छेद कर ले। सार्थ ही दक्षिण अफ्रीक की रंग भेद की नीति की कड़ी आलोचनार् की गर्इ। काहिरार् सम्मेलन को शार्न्तिपूर्ण वातार् द्वार्रार् विवार्दों क निपटार्रार्, उपनिवेशवार्द क अंत, रंगभेद की नीति के विरोध आदि के लिए महत्वूपर्ण है।

3. तृतीय शिखर सम्मेलन, (1970 र्इ.)

सिम्बर 1970 में जार्म्बियार् की रार्जधार्नी लुसार्क में तृतीय सम्मेलन क आयोजन कियार् गयार्। इस सम्मेलन में 65 रार्ज्यों ने भार्ग लियार् जिनमें 53 पूर्ण सदस्य तथार् 12 प्रेक्षक देश थे। इस सम्मेलन में पश्चिमी एशियार् के बार्रे में एक निश्चित मत प्रकट कियार् गयार्। पश्चिमी एशियार् के बार्रे में रखे गये प्रस्तार्व में केवल अरबों के पक्ष क सर्मथन ही नही अपितु हमलार्वर इजरार्इल की आवश्यकतार् पड़ने पर बार्यकाट करने तथार् नार्केबंदी तक करने की बार्त कही गर्इं अमरीकी फौजों तथार् अन्य फौजों को वियतनार्म से हटार्ने की सिफार्रिस की गर्इ। दक्षिण अफ्रीक से उपनिवेश के सन्दर्भ में बार्त की गर्इ और दक्षिण अफ्रीक से अनुरोध कियार् गयार् कि वह अपने ऊपर से हवाइ जहार्ज जार्ने दे। सन् 1970 के दशक के लिए गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों के बीच एक योजनार् स्वीकार की गर्इ इस सम्मेलन में यह सुझार्व आयार् थार् कि गुटनिरपेक्ष देशों क एक स्थार्यी संगठन बनार्यार् जार्ए जिसक एक सचिवार्लय भी हो। इस सुझार्व को नार्मंजूर कर दियार् गयार्। क्योंकि गुट निरपेक्ष देश गुटबंदी के खिलार्फ थे और इस प्रकार संगठित होने क अर्थ होतार् है – तृतीय विश्व गुट क गठन।

4. चतुर्थ शिखर सम्मेलन 1973

गुटनिरपेक्ष देशों क चतुर्थ सम्मेलन 1973 में अल्जीरियार् की रार्जधार्नी अल्जीयर्स में 9-10 सितम्बर में हुआ इस सम्मेलन में 75 देशों के पूर्ण सदस्य और 9 देशों ने पर्यवेक्षक के रूप में भार्ग लियार्। निर्गुट देशों में व्यार्प्त मत भेदों क खुलार् प्रदर्शन हुआ सार्थ ही अभूतपूर्व आत्मविश्वार्स और एकतार् क दर्शन भी हुआ। इस सम्मेलन में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार्र कियार् गयार्।

  1. महार्शक्तियेार्ं के बीच तनार्व-शैथिल्य क स्वार्गत कियार् गयार्। 
  2. गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों को अपनी असंलग्नतार् की परिभार्षार् बदल कर अन्र्तरार्ष्ट्रीय स्थिति के संदर्भ में करने पर जोर दियार् गयार्। 
  3. निर्गुट देशों के बीच आर्थिक, व्यार्पार्रिक और तकनीकी तार्लमेल होनार् चार्हिए। 
  4. जार्तीय विद्वेश, उपनिवेशवार्द, सार्म्रार्ज्यवार्द के उन्मूलन पर जोर दियार् जार्ए। 
  5. आर्थिक दृष्टि से यह निश्चित कियार् गयार् कि गुटनिरपेक्ष देशों को अपने आर्थिक सार्धनों क पूर्ण उपयोग करने क अधिकार है। 
  6. इस सम्मेलन के अपने घोषणार् पत्र में यह कहार् गयार् कि रार्जनीतिक और आर्थिक नीतियों के गठन में विकासशील देशों की आवार्ज सुनी जार्ए तथार् निर्गुट रार्ष्ट्र सम्मलित रूप से विकसित देशों पर दबार्व डार्लें।

5. पंचम शिखर सम्मेलन (1976 र्इ.)

गुटनिरपेक्ष देशों क पार्ंचवार् शिखर सम्मेलन 16 से 20 अगस्त 1976 र्इ. में कोलम्बों में हुआ। इस सम्मेलन में कुल 116 देशों ने भार्ग लियार् जिनमें 86 देश पूर्ण सदस्य, 13 पर्यवेक्षक गैर-रार्ज्य तथार् 7 ने अतिथि सदस्य के रूप में भार्ग लियार्। पुर्तगार्ल, रूमार्नियार्, पार्किस्तार्न, टर्की और र्इरार्न, फिलिपीन्स आदि प्रमुख थे जो सदस्यतार् ग्रहण करने के इच्छुक थे। इस सम्मेलन में नयी अन्र्तरार्ष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्थार् विकसित करने क आग्रह कियार् गयार्, तथार् एक आर्थिक घोषणार्-पत्र प्रस्तुत कियार् गयार् जिसमें निम्नलिखित बार्तों पर चर्चार् की गर्इ।

(अ) अन्र्तरार्ष्ट्रीय व्यार्पार्र को इस तरह पुर्नगठित कियार् जार्ए कि विकासशील देशों को बेहतर शर्तो पर व्यार्पार्र क मौक मिले और उनको अपने निर्यार्त क उचित मूल्य प्रार्प्त हो।

  1. अन्र्तरार्ष्ट्रीय विभार्जन के आधार्र पर उत्पार्दन को नये सिरे से पुर्नगठित कियार् जार्ए। 
  2. मुद्रार् संबंधी सुधार्रों में विकासशील देशों की रार्य को वही आदर मिलनार् चार्हिए जो विकसित रार्ष्ट्रों को मिलतार् है सार्थ ही मुद्रार् प्रणार्ली में आमूल-चूल परिवर्तन होनार् चार्हिए। 
  3. अनार्ज उत्पार्दन बढ़ार्ने हेतु प्रबल सार्धन तथार् तकनीकी क प्रयोग कियार् जार्ए। 
  4. विकासशील देशों को यथेष्ट मार्त्रार् में नियमित रूप से आर्थिक सार्धन हस्तार्न्तरित किये जार्ए और उनकी स्वार्धीनतार् क सम्मार्न कियार् जार्ए।

इस सम्मेलन की रार्जनीतिक घोषणार् में निम्न लिखित बार्तें कही गयी थी :-

  1. समतार् के आधार्र पर नयी रार्जनीतिक व्यवस्थार् बनार्यी जार्ए और ‘प्रभार्व क्षेत्र‘ जैसे सिद्धार्न्तों को शार्ंति विरोधी बतार्यार् गयार्। 
  2. सम्मेलन में मुक्त आन्दोलनों क समर्थन कियार् गयार् सार्थ ही पश्चिमी एशियार्, सार्इप्रस, फिलीस्तीन समस्यार्, दोनों कोरियार्ओं (उत्तरी कोरियार्, दक्षिणी कोरियार्) क एकीकरण आदि की समस्यार्ओं पर विचार्र कियार् गयार्। 
  3. सम्मेलन में हिन्द महार्सार्गर में विदेशी अड्डों के प्रश्न को भी उठार्यार् गयार् और इसे तनार्व मुक्त क्षेत्र बनार्ने की आवश्यकतार् पर बल दियार् गयार्।

6. षष्टम् शिखर सम्मेलन – 1979

छठार् शिखर सम्मेलन हवार्नार् (क्यूवार्) में 3 सितम्बर 1979 में क्यूबार् के रार्ष्ट्रपति डॉ. फिदेल कास्त्रों ने अमरीकी विरोधी भार्षण के सार्थ प्रार्रंभ कियार्। लगभग इसमें 95 देशों ने भार्ग लियार्। यह प्रथम सम्मेलन थार् जिसमें भार्रतीय प्रधार्नमंत्री क स्थार्न रिक्त रहार्।

इस सम्मेलन में विचित्र भार्षण डॉ फिदेल द्वार्रार् दियार् गयार् जो अन्र्तविरोधी से भरार् हुआ थार्। उन्होंने कहार् हमार्रार् देश माक्सवार्दी सिद्धार्न्तों में विश्वार्स करतार् है पर कभी भी अपने विचार्र और नीतियार्ं गुटनिरपेक्ष देशों पर थोपने क प्रयत्न नही करेगार्। उन्होंने फूट डार्लने और शार्सन करने वार्ली नीतियों से दूर रहने की सलार्ह दी। उन्होंने इस बार्त पर प्रसन्तार् व्यक्त की कि पार्किस्तार्न भी गुटनिरपेक्ष देशों की लार्इन में आ गयार्।
हवार्नार् सम्मेलन के घोषणार्-पत्र में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार्र कियार् गयार्। ‘ निर्गुट रार्ष्ट्रों से अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति एवं एकतार् के लिए एकजुट रहने को कहार्। ‘ तेल निर्यार्तक देशों से अपील की गर्इ की वे दक्षिण अफ्रीक को तेल निर्यार्त न करें। ‘ सभी गुटनिरपेक्ष देशों से अपील की गर्इ की वे दक्षिण अफ्रीक के अश्वेत छार्पार्मार्र युद्ध क समर्थन करें ‘ मिश्र को निलंबित करने के लिए कर्इ घंटो बहस चली सार्थ ही मिश्र और इजरार्इल के बीच हुए कैम्प डेविड समझौते की निंदार् की गर्इ। ‘ नस्लवार्द, उपनिवेशवार्द, सार्म्रार्ज्यवार्द, विदेशी प्रभुत्व, विदेशी कब्जे और हस्तक्षेप एवं चौधरार्हट के विरूद्ध संघर्ष से स्वार्भार्विक सम्बन्ध है। इस सम्मेलन में विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थार् को लेकर भी विचार्र विमर्श हुआ। विशेषकर तेल निर्यार्त करने वार्ले विकासशील देशों की ऊर्जार् सम्बन्धी समस्यार्ओं पर बहुत गंम्भीरतार् पूर्वक विचार्र हुआ।

7. सार्तवार्ं शिखर सम्मेलन – (1983 र्इ.)

क्यूवार् के रार्ष्ट्रपति डॉ. फिदेल कास्त्रों द्वार्रार् 31 अगस्त 1982 को सार्तवें शिखर सम्मेलन की अनुमति प्रार्प्त हो गयी । रार्ष्टार्ध्यक्षों को सूचित कियार् गयार् कि र्इरार्न तथार् र्इरार्क युद्ध के कारण र्इरार्क में सम्मेलन स्थिगित करनार् पड़ार्। गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलनों क सार्तवार्ं शिखर सम्मेलन भार्रत की रार्जधार्नी नर्इ दिल्ली में 6 से 12 माच 1983 में कियार् गयार्। इस सम्मेलन ने अन्य छ: सम्मेलनों से अलग अपने नये कीर्तिमार्न स्थार्पित किये। इस समय विश्व रार्जनीति क जो मार्हौल बनार् हुआ थार् वह 1959-60 के मार्हौल से कम खतरनार्क नहीं थार्। गम्भीर चुनौतियार्ँ, तनार्व, अविश्वार्स, और संघर्ष क जहर घोलने वार्ली इन सभी समस्यार्ओं क सूत्रपार्त हवार्नार्, अल्जीयर्म कोलम्बो, आदि सम्मेलन के समय से दिखनार् प्रार्रंभ हो गयार् थार्।

हवार्नार् सम्मेलन 1979 में सम्पन्न हुआ तीन मार्ह बार्द सोवियत फौजें अफगार्निस्तार्न में घुस आर्इ इससे पार्किस्तार्न, र्इरार्न, अफगार्निस्तार्न आदि के सम्बन्ध बिगड़ गए और विश्व रार्जनीति में फिर एक बार्र विश्वयुद्ध जैसी स्थिति बन गर्इ। दोनों महार्शक्तियों के बीच चल रही शस्त्रार्अस्त्र परीसीमन की वातार् असफल हो गर्इ, पश्चिमी रार्ष्ट्रों ने सोवियत संघ पर अनेक आर्थिक और रार्जनैतिक प्रतिबंध लगार्ने की कोशिश की और खार्ड़ी देशों, हिन्दमहार्सार्गर तथार् पार्किस्तार्न आदि में अपनी सैनिक उपस्थिति बढ़ार्नार् शुरू कर दियार्।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में फूट क प्रमुख कारण थार् अफगार्निस्तार्न क मार्मलार्, जहार्ँ एक ओर वियतनार्म, सीरियार्, यमन, इथोपियार् आदि देशों ने रूसी कार्यवार्ही क दमन कियार् वहीं दूसरी ओर सिंगार्पुर, जार्यरे, मोरक्को, पार्क आदि देशों ने इसक विरोध कियार्। तथार् भार्रत जैसे रार्ष्ट्र ने सोवियत संघ की भत्र्सनार् करने के वजार्य यह मार्नार् कि अफगार्निस्तार्न से सोवियत सेनार् की वार्पसी तथार् बार्हरी हस्तक्षेप की समार्प्ति एक सार्थ होनी चार्हिए। इस प्रकार सप्तम सम्मेलन बहुत ही नार्जुक परिस्थितियों में हुआ थार्।

सम्मेलन क प्रार्रभिक स्वरूप

गुटनिरपेक्ष देशों क यह सार्तवार्ं शिखर सम्मेलन रार्ष्ट्रार्ध्यक्षों तथार् शार्सनार्ध्यक्षों की उपस्थ्ति में श्रीमती इन्दिरार्गार्ंधी की अपील के सार्थ प्रार्रंभ हुआ। श्रीमती इन्दिरार् गार्ंधी ने कहार् कि विश्व की महार्शक्तियार्ं आणविक हथियार्रों के इस्तेमार्ल की धमकी न दे वे अपने स्वाथ की चिंतार् छोड़कर मार्नवतार् की भलाइ के कार्य करें। सम्मेलन में 101 सदस्य देशों में से 93 देशों ने इसमें भार्ग लियार् जिनमें 68 रार्ष्ट्रार्ध्यक्ष 26 प्रधार्नमंत्री तथार् उपरार्ष्ट्रपति शार्मिल थे। डॉ फिदेल कास्त्रो ने श्रीमती इन्दिरार् गार्ंधी के हार्थों में अध्यक्ष पद की कमार्न सौपी, तथार् महार्सचिव नटवरसिंह को चुनार् गयार्। यह सम्मेलन पार्ंच दिन तक चलनार् थार् परन्तु र्इरार्न-र्इरार्क युद्ध के कारण यह दो दिन तक चलार्। रार्ष्ट्रार्ध्यक्षों ने अपने-अपने भार्षण दिये परन्तु पार्क रार्ष्ट्रपति क भार्षण उल्लेखनीय रहार् उसमें श्रीमती इन्दिरार् गार्ंधी को मुबार्रकबार्द दी गर्इ और पार्ंच सूत्रीय कार्यक्रम भी पेश कियार्। सार्तवें शिखर सम्मेलन के प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चार् की गर्इ –

  1. विश्वशक्तियों से परमार्णु हथियार्र प्रयोग न करने की अपील की गर्इ। 
  2. अन्र्तरार्ष्ट्रीय मुद्रार् एवं वित्तीय प्रणार्ली के व्यार्पक पुनर्गठन की आवश्यकतार् पर भी बल दियार् गयार्। 
  3. दक्षिण अफ्रीक के अश्वेत लोगों के शोषण उनके प्रति असमार्नतार् के व्यवहार्र व उनके अधिकारों के हनन की भत्र्सनार् करते हुए उनके संघर्ष में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन द्वार्रार् पूरार् सहयोग दिये जार्ने की बार्त कही गर्इ।
  4. यूरोप में बढ़ती हथियार्रों की होड तनार्व व विभिन्न गुटों के बीच टकरार्व की नीति पर चिंतार् व्यक्त की गर्इ।
  5. आर्थिक घोषणार्-पत्र में विकसित रार्ष्ट्रों द्वार्रार् विकासशील रार्ष्ट्रों पर लगार्ये गये व्यार्पार्रिक प्रतिबंध को समार्प्त करने के लिए तथार् संरक्षणार्वार्दी रवैयार् अपनार्ने को कहार् गयार्। 
  6. सम्मेलन में खार्द्य, ऊर्जार् एवं परमार्णु शक्ति के बार्रे में भी विचार्र कियार् गयार् और इनक हल ढ़ूढ़नार् नितार्ंत आवश्यक थार्। 

अन्य विवार्दस्पद मुद्द्दे 

  1. सम्मेलन में कम्पूचियार् के भार्ग न लेने क विवार्द प्रमुख थार् इस प्रश्न पर सदस्य देश एकमत नहीं है। कुछ देश रार्जकुमार्र सिंहनुक को आमंत्रित करने के पक्ष में थे तो कुछ हेंग सैमरिन की सरकार को आमंत्रित करने के, तो कुछ उसक स्थार्न खार्ली छोड़ने के पछ में थे। हवार्नार् सम्मेलन की तरह भार्रत जैसी स्थिति बनी हुर्इ थी अतत: उसक स्थार्न खार्ली छोड़ दियार् गयार्।
  2. र्इरार्न-र्इरार्क के युद्ध के बार्रे में सम्मेलन की अवधि बढ़ार्ये जार्ने क कोर्इ ठोस हल नहीं निकालार् जार् सका। 
  3. आठवें शिखर सम्मेलन कहार्ं बुलार्यार् जार्ए र्इरार्क चार्हतार् थार् कि बगदार्द में बुलार्यार् जार्ए र्इरार्न, चार्हतार् थार् कि, लीबियार् में यह सम्मेलन बुलार्यार् जार्ए इस आदि विरोध के कारण इसक कोर्इ हल नहीं निकालार् जार् सका।

सार्तवे शिखर सम्मेलन की समीक्षार्

सही मार्यनों में देखार् जार्ए तो यह गुटनिरपेक्ष आन्दोलन केवल एक मंच हैं और उसके होने वार्ले सम्मेलन एक क्लब की तरह है। इसके द्वार्रार् निकाले गये ज्यार्दार्तर घोषण पत्र बिल्कुल अर्थहीन है। ‘‘यहार्ं जैसार् चार्हे वैसार् व्यवहार्र करों ‘‘ की कहार्वत सिद्ध हो जार्ती है। सार्तवे गुटनिरपेक्ष सम्मेलन की आर्थिक घोषणार् में गरीब देशों की खार्द्ध की कमी को दूर करने पर बल दियार् गयार्, कृषि में सहार्यतार् आदि की बार्त कही गयी, पर सवार्ल इस बार्त क है कि क्यार् मार्त्र घोषणार् करने यार् विकसित रार्ष्ट्रों से अपील करने से ये समस्यार्यें हल हो जार्ती है विकसित रार्ष्ट्र तो अपने स्वाथ के लिए विकासशील देशों क इस्तेमार्ल करते आए है और करते रहेगें।

सार्थ ही इस सम्मेलन में कर्इ सवार्लों पर चर्चार् की गर्इ, जैसे हैंग सैमरिन सरकार को प्रजार्तार्ंत्रिक रूप से परिवर्तित करनार्, दक्षिण अफ्रीक द्वार्रार् नार्मीवियार् क शोषण कम करने आदि महत्वपूर्ण, सवार्लों पर सम्मेलन में जो कुछ भी हुआ वह नयार् नहीं थार्। ऐसे मुद्दों पर बहस आदि के सिवार्य कुछ भी नहीं कियार् जार् सकतार्।

सार्तवे शिखर सम्मेलन की उपलब्धियार्ं

यह बार्त तो मार्ननार् ही पड़ेगी कि इस शिखर सम्मेलन ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को एक नर्इ शक्ति और दिशार् दी है। कुछ लोगों क मार्ननार् है कि यह सम्मेलन एक तरह के शिविर के रूप में सार्मने आयार्। जो एक तरह से नये सघर्ष की शुरूआत क माग दिखार्तार् है। इस सम्मेलन में नये शिरे से सदस्य रार्ष्ट्रों की एकतार् क बोध करार्यार् गयार्। सशस्त्र संघर्ष की निरर्थकतार् क अहसार्स और मतभेदों को शार्न्तिपूर्ण तरीके से हल करने की उपयुक्ततार् अधिक अर्थपूर्ण लगी। अन्र्तरार्ष्ट्रीय व्यवस्थार् पर औद्योगिक देशों से बार्तचीत चलार्ने के प्रस्तार्व क एक परिणार्म यह हुआ कि सदस्य देशों ने विकास कार्यक्रमों में सहयोग की आवश्यकतार् क महत्व समझार्। उन्हें यह भी लगार् कि वे अपने संसार्धनों और क्षमतार्ओं क विकास कार्यक्रमों में उपयोग अपने प्रयत्न से कर सकते है। इस सम्मेलन क दृष्टिकोण ज्यार्दार्तर समस्यार्ओं को हल न करके उन्हें टार्ल देने क थार्।

8. आठवार्ं गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन – 1986 र्इ.

1 से 7 सितम्बर 1986 र्इ. में जिम्बार्ब्वे की रार्जधार्नी हरार्रे में आठवार्ं शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ। जिम्बार्ब्बे के प्रधार्नमंत्री राबट मुगार्वे को अध्यक्ष चुनार् गयार्। इस सम्मेलन में 101 देशों ने भार्ग लियार्। यूनार्न, आस्ट्रेलियार्, मंगोलियार् आदि देशों को पर्यवेक्षक क विशेष दर्जार् दियार् गयार्। हरार्रे सम्मेलन में निम्नलिखित बिन्दुओं पर चर्चार् की गर्इ –

  1. दक्षिण अफ्रीक की रंग भेद की नीति के विरूद्ध कुछ उपार्य अपनार्ये जार्ए जिससे वह यह नीति समार्प्त करने के लिए बार्ध्य हो। जिनमें अफ्रीक को प्रोद्योगिकी के हस्तार्ंतरण पर प्रतिबंध, निर्यार्त की समार्प्ति, तेल की बिक्री पर रोक, तथार् हवाइ संपर्क आदि भी शार्मिल हो। 
  2. सम्मेलन में तय कियार् गयार् कि एक कोष स्थार्पित कियार् जार्ए। 
  3. इस कोष से दक्षिण अफ्रीक पर आर्थिक निर्भरतार् को कम करने के लिए सहार्यतार् की जार्ए। 
  4. इस सम्मेलन में नार्मीबियार् की आजार्दी सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त रार्ष्ट्र महार्सभार् क एक विशेष अधिवेशन बुलार्ये जार्ने की मार्ंग की । 
  5. सार्म्रार्ज्यवार्द, उपनिवेशवार्द की कड़ी आलोचनार् की गर्इ। निर्गुट रार्ष्ट्र तथार् विकासशील देश एक दूसरे क आर्थिक सहयोग बढ़ार्ने के लिए तत्पर हो गये यह इस सम्मेलन की एक महार्न उपलब्धि थी। सार्थ ही एक आयोग गठित करने क निर्णय लियार् गयार्, यह आयोग दोनों गुटनिरपेक्ष तथार् विकासशील देशों में ही सहयोग बढ़ार्ने क कार्य करेगार्, सार्थ ही निरक्षरतार् क उन्मूलन, निर्धनतार्, भुखमरी तथार् अन्य आर्थिक समस्यार्ओं के निरार्करण के उपार्य तथार् सुझार्व देगार्।

गुटनिरपेक्षतार् के समक्ष चुनौतियार्ँ

गुटनिरपेक्षतार् की प्रभार्वशीलतार् दिन-प्रतिदिन बड़ती जार् रही हैं प्रार्रंभ में बेलग्रेड सम्मेलन में 25 सदस्य रार्ष्ट्र थे परन्तु आठवें शिखर सम्मेलन तक इनकी सदस्य संख्यार् बढ़कर 101 हो गर्इ। आज गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य रार्ष्ट्रसंघ के दो तिहाइ सदस्य है और यह 4 महार्द्वीपों के देशों क प्रतिनिधित्व करतार् है। एशियार्, अफ्रीका, यूरोप और लेटिन अमेरिक आदि को आज भी अनेक चुनौतियों से गुजरनार् पड़ रहार् है। वे चुनौतियार्ं है –

  1. आर्थिक पिछड़ाऱ्पन :- गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्र आर्थिक दृंिष्ट से पिछड़े हुए है आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए इन रार्ष्ट्रों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधार्रने के लिए बड़े-बड़े रार्ष्ट्रों पर निर्भर रहनार् पड़तार् है। और ये महार्शक्तियार्ं छोटे रार्ष्ट्रों को लार्लच देकर इनक शोषण करती है और अपने गुटों में सम्मलित करने क लार्लच देती है। 
  2. सैनिक दबार्व :- विश्व-शक्तियार्ं गुटनिरपेक्ष देशों पर दबार्व डार्लती है। वे अपने प्रभार्व क्षेत्र को बढ़ार्ने के लिए गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों को सैनिक गुटों के मार्ध्यम से घेरने क कार्य करती है और उन्हें अपने गुटों में मिलार् लेती है। 
  3. गुटनिरपेक्ष देशों में अस्थिरतार् :- महार्शक्तियार्ं गुप्तचरों के मार्ध्यम से इन रार्ष्ट्रों में अस्थिरतार् लार्ने क प्रयार्स करती है। अमेरिक सरकार ने क्यूबार् रार्ष्ट्र में सी.आर्इ.ए. के मार्ध्यम से फिदेल सरकार को गिरार्ने की बार्र-बार्र कोशिश की चिली के रार्ष्ट्रपति एलेण्डे की हत्यार् क मार्मलार् भी सी.आर्इ.ए. के हार्थ थार्।
  4. गुटनिरपेक्ष विरोधी रार्ष्टार््रों की संख्यार् में वृद्धि :- गुट निरपेक्षतार् के समक्ष यह भी एक समस्यार् उत्पन्न हो रही है कि एक तरफ कुछ देश गुट निरपेक्ष है वही दूसरी ओर अपने सैनिक गुट बनार्ने में तथार् दोनों गुटों में से किसी न किसी गुट क समर्थन करने में लगे हुए है। इससे स्पष्ट होतार् है कि गुटनिरपेक्ष विरोधी तत्व मौजूद है। 
  5. नैतिकतार् – यह आन्दोलन एक नैतिक आन्दोलन है न कि शस्त्रों द्वार्रार् शार्ंति स्थार्पित करने क आन्दोलन। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एक अपील जैसार् लगतार् है यह आक्रमण प्रतिरोध नहीं कर सकतार्। गुटनिरपेक्ष देशो में केवल 57 देशों ने संयुक्त रार्ष्ट्र महार्सभार् के 14 जनवरी 1980 के उस प्रस्तार्व में मतदार्न कियार् जिसमें अफगार्निस्तार्न से सोवियत सेनार्ओं की वार्पसी की मार्ंग की गयी थी 9 गुटनिरपेक्ष देशों ने प्रस्तार्व क विरोध कियार् और 24 ने मतदार्न में हिस्सार् नहीं लियार्। 
  6. पार्रस्परिक वैमनस्य – गुटनिरपेक्ष देशों में आपसी वैमनस्य की भार्वनार् बड़ती जार् रही है। इसक प्रमुख कारण है कि संगठित न होनार्। उदार्हरण के लिए भार्रत और बार्ग्लार्देश एक और तो गुटनिरपेक्ष देश है परन्तु कोलंबो में गंगार् जल के बटवार्रे को लेकर दोनों ने यह सार्बित कर दियार् कि उनमें आपसी वैमनस्य की भार्वनार् तथार् तनार्व उत्पन्न हो रहे है। इस प्रकार हम कह सकते है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के समक्ष अनेक चुनौतियार्ं है ।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की आलोचनार्

  1. अवसरवार्दितार् की नीति – पश्चिमी आलोचकों ने इसे अवसरवार्दी तथार् काम निकालने वार्ली नीति कहार् है। गुटनिरपेक्ष देश दोहरी कसौटी क प्रयोग करते है वे सार्म्यवार्दी और गैर सार्म्यवार्दी गुटों से अधिक से अधिक लार्भ प्रार्प्त करने क और जिसक पलड़ार् भार्री हो उसकी ओर मिल जार्ने क रार्स्तार् बनार् लेते है। 
  2. अव्यवहार्रिकतार् – आलोचक इस नीति को सिद्धार्न्त में जितनार् उपयुक्त मार्नते है। व्यवहार्र में उतनी ही भिन्न है। इसमें सैद्धार्न्तिक गुण कितने भी क्यों न हो व्यवहार्रिक न होने से यह असफल हो जार्ती है। अत: कहार् जार्तार् है कि जहार्ं सिद्धार्न्त के धरार्तल पर इस नीति ने स्वार्धीनतार् प्रार्प्त की है वही व्यवहार्र के धरार्तल पर नीति ने उसको निभार्यार् नहीं है। 
  3. बार्ह्य्य निर्भरतार् – गुटनिरपेक्ष देशों की एक विफलतार् यह बतार्यी जार्ती है कि वे बार्हरी आर्थिक और रक्षार् सहार्यतार् पर बेहद निर्भर है। ये रार्ष्ट्र दोनों गुटों से सहार्यतार् प्रार्प्त करने की स्थिति में थे । इसलिए उन्होंने इतनी भार्री आर्थिक और रक्षार् सहार्यतार् लेने क रार्स्तार् निकाल लियार् कि वे आज सहज सार्मार्न्य कार्य-निर्वार्ह के लिए भी इस सहार्यतार् पर आश्रित हो गये है। 
  4. संकुचित नीति – गुटनिरपेक्ष नीति क दार्यरार् बहुत ही सीमित है। यह नीति गुटों के आसपार्स घूमती है। गुटों से बार्हर क्रियार्शील होने की कल्पनार् इस अवधार्रणार् में है ही नहीं। महार्शक्ति गुटों की रार्जनीति पर प्रतिक्रियार् करते रहनार् ही इस नीति क मुख्य लक्ष्य बन जार्तार् है यार् तो गुटों के आपसी झगड़ों में पंच बनने की कोशिश करनार् यार् दोनों से अलग रहते हुए एक के केवल इतने समीप जार्ने क प्रयत्न करनार् कि दूसरार् बुरार् न मार्ने यदि दूसरे के बुरार् मार्नने क डर हो तो पहले से नार्पतौल कर दूर हटनार् यार् बार्री-बार्री से पार्स जार्नार् यही गुटनिरपेक्षतार् की शैली रही है। 
  5. दिशार् हीन आन्दोलन – आलोचकों क कहनार् है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में सद्भार्वनार् पूर्ण वार्तार्वरण पैदार् कर पार्नार् तो दूर की बार्त है यह अपने आप में विखरतार् जार् रहार् है। 1979 के हवार्नार् आन्दोलन से स्पष्ट हो गयार् थार् कि यह आंदोलन तीन खेमों में बंट गयार् थार्। एक में क्यूबार्, अफगार्निस्तार्न, वियतनार्म, इथोपियार्, यमन जैसे रूस परस्त देश हैं तो दूसरे खेमें में सोमार्लियार्, सिंगार्पुर, जार्यरे, फिलीपीन्स, मोरक्को, मिश्र आदि अमरीकी परस्त देश हैं। तीसरे खेमें में भार्रत, यूगोस्लार्वियार् और श्रीलंक जैसे देश हैं। इस बार्त से सार्बित होतार् है कि आन्दोलन की अपनी कोर्इ दिशार् नहीं रह गर्इ है। 
  6. बुनियार्दी एकतार् क अभार्व : आलोचकों क मत है कि गुट निरपेक्ष रार्ष्ट्रों में बुनियार्दी एकतार् नहीं पार्यी जार्ती और वे एक-दूसरे की सहार्यतार् करने की भी कोर्इ ठोस योजनार् नहीं बनार् सके हैं। गुट निरपेक्ष देश एक दूसरे क शोषण करने में बार्ज नहीं आते। अपनी जीवन पद्धतियों की रक्षार् के लिये गुटनिरपेक्ष देश कोर्इ संयुक्त रणनीति नहीं बनार् पार्ये हैं। 
  7. रार्जनीतिक नीति : आलोचक इसे ऊध्र्वमूल नीति कहते हैं। ऐसी नीति जिसकी जड़े ऊपर हैं नीचे नहीं। रार्ष्ट्रहित उसके केन्द्र में नहीं है उसमें रार्ष्ट्रहित हो जार्ए यह अलग बार्त है। उसमें नेतार्गिरी की भार्वनार् है। इसकी नेतार्गिरी दुनियार् के मंचों पर चमकनी चार्हिये। 
  8. असुरक्षित नीति : आलोचकों क मार्ननार् है कि हम गुटनिरपेक्षतार् को सुरक्षित नीति मार्नते हैं। यदि वे विशार्ल रक्षार् व्यवस्थार् की बार्त करते हैं तो उनकी गुटनिरपेक्षतार् सुरक्षित नहीं रह जार्येगी, और यदि वे बार्हर किसी देश यार् गुट से सहार्यतार् मार्ंगते हैं तो उनकी यह सुरक्षार् व्यवस्थार् शुद्ध नहीं होगी। 1962 के चीन आक्रमण ने भार्रत के लोगों को यह आभार्स करार् दियार् है कि वर्तमार्न रार्ष्ट्र समार्ज में जो सर्वथार् आदर्श नहीं है।कोर्इ भी चीज किसी देश की सुरक्षार् को प्रमार्ण नहीं हो सकती। 
  9. मूल्य रहित नीति : गुटनिरपेक्षतार् कोर्इ विचार्रधार्रार् तथार् सिद्धार्ंत नहीं है। आलोचकों क ऐसार् मार्ननार् है गुटनिरपेक्ष देशों में एक ओर जहार्ं लोकतंत्रार्त्मक देश है वहीं दूसरी ओर रार्जतंत्रार्त्मक देश भी है। कम्यूनिष्ट तथार् सैनिक गुटों वार्ले देश भी इसमें रहे हैं आज कर्इ रार्ष्ट्रों में आपसी तनार्व ने युद्ध क स्वरूप धार्रण कर लियार् है। नेहरू के नेतृत्व में गुटनिरपेक्षतार् पर जो नैतिक मूल्य आरोपित करने की कोशिश भार्रत ने की थी वह एक मृदमरीचिक के अलार्वार् कुछ नहीं थी। इस तथार्कथित मूल्यों पंचशील, निरस्त्रीकरण, आदि क गुटनिरपेक्ष रार्ष्ट्रों ने समय-समय पर उल्लंघन करके यह सिद्ध कियार् कि गुटनिरपेक्षतार् एक सार्धार्रण नीति मार्त्र है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थार्पनार् के प्रति विश्व के रार्ष्ट्रों क दृष्टिकोण

1. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन पर अमेरिक क दृष्टिकोण

‘‘मैं निर्गुट आन्दोलन क प्रशंसक नहीं हूं क्योंकि यह सही मार्यने में निर्गुट आन्दोलन नहीं है।’’ अन्र्तरार्ष्ट्रीय स्तर पर उसे जितनी परेशार्नियार्ं सोवियत संघ यार् चीन से नहीं हुर्इ उतनी उसे अपने ही निर्गुट रार्ष्ट्रों से हुर्इ है। इसमें अधिकांश देश समार्जवार्दी तथार् विकासशील देश हैं जो अमेरिक के खिलार्फ एकजुट हैं। अधिकांश निर्गुट रार्ष्ट्र 80 प्रतिशत मसलों पर अमेरिक के खिलार्फ मतदार्न करते हैं।इस आन्दोलन को व्यवस्थित तथार् सही मार्यने में निर्गुट बनार्ने में अभी बहुत समय लग जार्येगार्।

2. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एवं सोवियत संघ

रूस सदार् तृतीय विश्व के देशों क समर्थक रहार् है। कास्त्रों जो 1979 में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के अध्यक्ष थे उन्होंने एक अवधार्रणार् में तो यह तक कह दियार् कि ‘‘सोवियत रूस की गुटनिरपेक्ष आन्दोलन से स्वार्भार्विक सम्बद्धतार् है’’ अत: इस आन्दोलन को सार्म्रार्ज्यवार्दी पश्चिमी गुट तथार् सार्म्रार्ज्य विरोधी सोवियत गुट के समार्न दूरी के बनार्वटीपन से मुक्त होकर सोवियत रूस की आन्दोलन के सार्थ स्वार्भार्विक सम्बद्धतार् को स्वीकार करनार् चार्हिये।

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