गठियार् (आर्थरार्इटिस) के कारण, लक्षण एवं वैकल्पिक चिकित्सार्

आर्थरार्इटिस अगे्रजी भार्षार् क शब्द है इस शब्द की ममूल उत्पत्ति ग्रीक भार्षार् से हुर्इ है। आर्थरार्इटिस ग्रीक भार्षार् के दो शब्दों आथ्रो (Arthro) और आइटिस (Itis) से मिलकर बनार् है। ग्रीक भार्षार् में आथ्रो (Arthro) क अर्थ जोड अर्थार्त सन्धियार्ं तथार् आइटिस (Itis) क अर्थ सूजन होतार् है अर्थार्त शार्ब्दिक अर्थ में वह रोग जिसमें जोडों अथवार् सन्धियों में सूजन उत्पन्न होती है, आर्थरार्इटिस (Arthroitis) कहलार्तार् है। आर्थरार्इटिस आधुनिक चिकित्सार् विज्ञार्न में प्रयुक्त होने वार्लार् शब्द है जबकि प्रार्चीन काल से हिन्दी भार्षार् में सन्धि शोथ के नार्म इस रोग को वर्णित कियार् गयार् है। आयुर्वेद शार्स्त्र में आर्थरार्इटिस रोग के लिए आमवार्त शब्द क वर्णन प्रार्प्त होतार् है। आयुर्वेद शार्स्त्र के विभिन्न ग्रन्थों में आमवार्त रोग क सविस्तार्र वर्णन प्रार्प्त होतार् है जो लक्षणों एवं कारणों के स्तर पर आर्थरार्इटिस रोग से मूल समार्नतार् रखतार् है।

इस रोग क प्रार्रम्भ जोडों में सूजन के सार्थ होतार् है, जोडों में सूजन के सार्थ जोड लार्ल होने लगते हैं एवं इन जोडों में सुर्इ सी चुभन उत्पन्न होने लगती है। यही आगे चलकर गठियार् में एवं गठियार् आगे चलकर आर्थरार्इटिस रोग में परिवर्तित हो जार्तार् है। आर्थरार्इटिस रोग के अलग अलग लक्षण प्रकट होते हैं। इन लक्षणों के आधार्र पर आधुनिक चिकित्सार् विज्ञार्न में आर्थरार्इटिस रोग के सौ से भी अधिक प्रकारों को वर्णित कियार् गयार् है। आर्थरार्इटिस रोग के इन प्रकारों में सबसे अधिक व्यार्पक रुमेटोयड आर्थरार्इटिस (आमवार्तिक संधिषोथ) है। इसके अतिरिक्त ऑस्टियो आर्थरार्इटिस, सेप्टिक आर्थरार्इटिस, सोरियार्टिक आर्थरार्इटिस तथार् रिएक्टिव आर्थरार्इटिस भी आर्थरार्इटिस रोग के अन्य प्रकार यार् वर्ग हैं।

अब आपके मन में यह प्रश्न उत्पन्न होनार् भी स्वार्भिक ही है कि आर्थरार्इटिस रोग की उत्पत्ति कैसे होती है अर्थार्त इस रोग की उत्पत्ति के क्यार् क्यार् कारण होते हैं अत: अब आर्थरार्इटिस रोग की उत्पत्ति के कारणों पर विचार्र करते हैं –

आर्थरार्इटिस जोडों से सम्बन्धित रोग है जिसे सार्मार्न्य भार्शार् में गठियार् के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। वर्तमार्न समय में यह रोग बहुत तेजी से समार्ज में बढ रहार् है। दिल्ली में एम्स के एक अनुमार्न के अनुसार्र भार्रत वर्श में हर छह में से एक व्यक्ति आर्थरार्इटिस रोग से ग्रस्त है। आर्थरार्इटिस रोग की व्यार्पकतार् को जार्नने के उपरार्न्त अब आपके मन में यह प्रष्न उपस्थित होनार् स्वार्भार्विक ही है कि किन कारणों से यह रोग उत्पन्न होतार् है एवं कौन कौन से कारक इस रोग को बढार्ते हैं, अत: अब हम आर्थरार्इटिस रोग के कारणों पर विचार्र करते हैं –

इस प्रकार उपरोक्त कारणों के कारण शरीर आर्थरार्इटिस रोग से ग्रस्त हो जार्तार् है। अब दस यह कैसे पहचार्नार् जार्ए कि यह रोग आर्थरार्इटिस ही है अथवार् कोर्इ दूसरार् रोग है? इस प्रष्न के उत्तर के लिए हमें आर्थरार्इटिस रोग के लक्षणों को जार्ननार् आवष्यक हो जार्तार् है। यद्यपि जैसार् कि आपने पूर्व में ही जार्न लियार् है कि आर्थरार्इटिस रोग के बहुत सार्रे प्रकार होते हैं जिनके शरीर में अलग अलग लक्षण प्रकट होते हैं किन्तु आर्थरार्इटिस रोग के कुछ सार्मार्न्य लक्षण इस प्रकार हैं –

  1. दर्द एवं सूजन से ग्रस्त जोड क X- ray : शरीर के जिस जोड पर दर्द के सार्थ सूजन है, उस जोड पर X- ray डार्ल कर आर्थरार्इटिस रोग की जॉच की जार्ती है। 
  2. सार्इनोवियल फ्लूड की जॉच : दो अस्थियों के जुडनें के स्थार्न पर सार्इनोवियल फ्लूड (श्लेष द्रव) उपस्थित होतार् है जो गति के समय अस्थियों के सिरों को आपस में टकरार्कर घिसने से बचार्ने क कार्य करतार् है। शरीर के जोडों में सार्इनोवियल फ्लूड (श्लेष द्रव) की कम मार्त्रार् आर्थरार्इटिस रोग की और संकेत करती है। 
  3. मूत्र में यूरिक एसिड की जॉच: शरीर में यूरिक एसिड की मार्त्रार् बढ क जोडों में एकत्र हो जार्ती है। जोडों में ये यूरिक एसिड के क्रिस्टल जमार् होकर दर्द एवं सूजन उत्पन्न करते हैं अत: मूत्र में यूरिक एसिड की बढी मार्त्रार् आर्थरार्इटिस रोग की और संकेत करती है। 

इस प्रकार आर्थरार्इटिस रोग से ग्रस्त होने पर रोगी के शरीर में अकडन और जकडन बढती चली जार्ती है। रोगी के जोडों में दर्द बढतार् जार्तार् है और हार्थों व पैरों की अस्थियों में टेडार्पन आने लगतार् है। रोग से पिडित व्यक्ति को पैदल चलने एवं उठने बैठने में कठिनाइ होने लगती है। रोगी को एलोपैथी चिकित्सक दर्द निवार्रक दवाइयार्ं जैसे ब्रूफेन, पेरार्सिटार्मोल, डिक्लोफेन आदि तथार् सूजन दूर करने के लिए कोरटिकोस्टिरॉइड जैसे बेटनार्सॉल आदि क सेवन करने की सलार्ह देतार् है। इन दवाइयों क रोगी को लार्भ कम हार्नि अधिक होती है। इनक लम्बे समय तक तथार् अधिक मार्त्रार् में सेवन करने से रोगी के लीवर एवं वृक्कों पर बहुत नकारार्त्मक प्रभार्व पडतार् है। इसके अतिरिक्त अग्रेंजी दवाइयों के अधिक सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमतार् बहुत निम्न होने लगती है जबकि इसके विपरित आर्थरार्इटिस रोग में वैकल्पिक चिकित्सार् काफी प्रभार्वी एवं लार्भकारी सिद्ध होती है। आधुनिक चिकित्सक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि आर्थरार्इटिस रोगी क वैकल्पिक चिकित्सार् द्वार्रार् उपचार्र करने से उसे रोग में स्थाइ लार्भ प्रार्प्त होतार् है अत: अब आर्थरार्इटिस रोग की वैकल्पिक चिकित्सार् पर विचार्र करते हैं –

आर्थरार्इटिस रोग की वैकल्पिक चिकित्सार् 

आर्थरार्इटिस रोग की वैकल्पिक चिकित्सार् में योग चिकित्सार्, प्रार्कृतिक चिकित्सार्, आयुर्वेद चिकित्सार्, एक्यूप्रेशर चिकित्सार्, प्रार्ण चिकित्सार् एवं आहार्र चिकित्सार् द्वार्रार् रोग के उपचार्र क वर्णन आतार् है। इस रोग की वैकल्पिक चिकित्सार् इस प्रकार है –

1. आर्थरार्इटिस रोग की योग चिकित्सार्

आर्थरार्इटिस रोग में यौगिक क्रियार्ओं जैसे आसन, मुद्रार्-बंध एवं प्रार्णार्यार्म क अभ्यार्स रोग दूर करने में अत्यन्त प्रभार्वी सिद्ध होती है। इन क्रियार्ओं क अभ्यार्स करार्ने से रोगी को तुरन्त लार्भ मिलने लगतार् है तथार् लम्बे समय तक इन क्रियार्ओं क नियमित अभ्यार्स करार्ने से रोग के रोग पर नियंत्रण प्रार्प्त होने लगतार् है। आर्थरार्इटिस रोग की योग चिकित्सार् इस प्रकार है –

  1. षट्कर्म क प्रभव : षट्कर्मों की छह क्रियार्ओं धौति, बस्ति, नेति, नौली, त्रार्टक एवं कपार्लभार्ति क रोग की स्थिति एवं रोगी की क्षमतार्नुसार्र अभ्यार्स करार्ने से रोगी के शरीर क शोधन होतार् है। जिसके परिणार्म स्वरुप शरीर में यूरिक एसिड की मार्त्रार् कम होती है और दर्द में आरार्म मिलतार् है। इसके अतिरिक्त शरीर शोधन के परिणार्म स्वरुप शरीर के अन्य तंत्र जैसे पेशीय तंत्र एवं अस्थि तंत्र भी स्वस्थ बनते है। जिससे रोग ठीक होतार् है एवं रोगी को आरार्म मिलतार् है। 
  2. आसन क प्रभार्व : आर्थरार्इटिस रोग के उपचार्र में आसनों क अभ्यार्स अत्यन्त लार्भकारी होतार् है। यद्यपि रोगी रोग की त्रीव अवस्थार् में आसनों क अभ्यार्स करने में असक्ष्म होतार् है तथार् रोगी को बलपूर्वक आसन करार्ने से रोगी क दर्द तेजी से बढ जार्तार् है अत: रोगी को अत्यन्त सार्वधार्नीपूर्वक हल्के हल्के आसनों और विशेष रुप से संधि संचार्लन के सुक्ष्म अभ्यार्सों को करार्नार् चार्हिए। रोगी को पैर की उगुलियों, पजों, घुटनों, कुल्हे, हार्थ की उगुलियों, कलाइ, कोहनी, कन्धों एवं गर्दन को गतिशील बनार्ने वार्ले अभ्यार्सों को बार्र बार्र सुबह और शार्म दोनों समय अभ्यार्स करार्नार् से रोग में लार्भ मिलतार् है। उपरोक्त सुक्ष्म अभ्यार्सों के रोग की त्रीवतार् कम होने पर रोगी को आसनों के क्रम पर लार्ते हुए धीरे धीरे एवं सार्वधार्नीपूर्वक आसनों क अभ्यार्स करार्नार् चार्हिए। आर्थरार्इटिस रोगी को सर्पार्सन, भुजँगार्सन, मकारार्सन, पवनमुक्तार्सन, उत्तार्नपार्दार्सन, मत्स्यार्सन, नौकासन, मरकटार्सन, गोमुखार्सन, उष्ट्रार्सन, वक्रार्सन, अर्द्धचन्द्रार्सन, गरुडार्सन, वार्तार्यन आसन एवं शवार्सन आदि आसनों क अभ्यार्स करार्नार् चार्हिए। इस रोग में आसनों के महत्व को देखते हुए वर्तमार्न समय में आर्थरार्इटिस रोगी की फिजियोथैरेपी क प्रचलन भी बढतार् जार् रहार् है जिसमें चिकित्सक सहार्यतार् देकर रोगी के जोडों को गतिशीलतार् प्रदार्न करतार् है। 
  3. मुद्रार् एवं बन्ध क प्रभार्व : आर्थरार्इटिस रोग क सम्बन्ध वार्त दोष की विकृति से भी है। शरीर में वार्त दोष को सम बनार्ने के लिए मुद्रार्ओं एवं बन्धों क अभ्यार्स लार्भकारी प्रभार्व रखतार् है। रोगी को उसकी क्षमतार्नुसार्र काकी, शार्म्भवी व महार्मुद्रार्ओं आदि मुद्रार्ओं क अभ्यार्स करार्नार् चार्हिए। इसके सार्थ सार्थ मूल, उड्डियार्न एवं जार्लंधर बन्धों क अभ्यार्स भी रोगी को करार्नार् चार्हिए। 
  4. प्रत्यार्हार्र क प्रभार्व : आर्थरार्इटिस रोग को दूर करने में प्रत्यार्हार्र अर्थार्त इन्द्रिय संयम अपनी एक विशेष भूमिक क वहन करतार् है। प्रत्यार्हार्र के अन्र्तगत रोगी द्वार्रार् दिनचर्यार्, रार्त्रिचर्यार् एवं ऋतुचर्यार् क अनुशार्सन से पार्लन करने से रोग समूल नष्ट होतार् है। इसके सार्थ खार्नपार्न सम्बधीं बुरी आदतों पर नियंत्रण करने से रोग की त्रीवतार् पर सीधार् प्रभार्व पडतार् है एवं रोग स्वत: ही ठीक होने लगतार् है।
  5. प्रार्णार्यार्म क प्रभार्व : आर्थरार्इटिस रोगी को नार्डी शोधन, अनुलोम विलोम, सूर्यभेदी, उज्जार्यी एवं भ्रार्मरी आदि प्रार्णार्यार्मों क नियमित अभ्यार्स करार्ने से लार्भ मिलतार् है। रोगी को सार्फ स्वच्छ वार्तार्वरण में स्थिर मन के सार्थ प्रार्णार्यार्मों क अभ्यार्स करनार् चार्हिए। रोगी को प्रार्णार्यार्मों क अभ्यार्स नियमित रुप से एवं लम्बी अवधि तक करनार् चार्हिए। प्रार्णार्यार्म क अभ्यार्स रोग पर प्रत्यक्ष प्रभार्व रखतार् हुआ रोग को शीघ्र ठीक करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है।
  6. ध्यार्न एवं समार्धि क प्रभार्व : ध्यार्न एवं समार्धि के अन्र्तगत रोगी नकारार्त्मक भार्वों एवं रोग की नकारार्त्मकतार् से हटकर सकारार्त्मक विचार्रों एवं भार्वों क चिन्तन करतार् है। वह अपने मन एवं मस्तिष्क में सकारार्त्मक चिन्तन को स्थार्न देतार् है जिससे उसके शरीर में हामोन्स सन्तुलित होते हैं। ध्यार्न एवं समार्धि में स्थित होने से आन्तरिक रोग प्रतिरोधक क्षमतार् एवं जीवनी शक्ति तेजी से विकसित होती है जिससे रोग समूल नष्ट होतार् है। इस प्रकार योग चिकित्सार् के द्वार्रार् आर्थरार्इटिस रोगी के रोग पर नियंत्रण प्रार्प्त होतार् है। रोगी को दर्द एवं सूजन में आरार्म मिलतार् है। योग चिकित्सार् के सार्थ सार्थ प्रार्कृतिक चिकित्सार् द्वार्रार् भी आर्थरार्इटिस रोग में शीघ्र एवं स्थाइ लार्भ प्रार्प्त होतार् है। 

2. आर्थरार्इटिस रोग की प्रार्कृतिक चिकित्सार् 

आर्थरार्इटिस रोगी को मिट्टी, जल, अग्नि, वार्यु और आकाश तत्वों द्वार्रार् इस प्रकार चिकित्सार् देने से लार्भ प्रार्प्त होतार् है –

  1. मिट्टी तत्व चिकित्सार् : आर्थरार्इटिस रोगी को जोडों पर गर्म मिट्टी की पट्टी देने शीघ्र अतिशीघ्र लार्भ प्रार्प्त होतार् है। गीली मिट्टी को ऑच पर गर्म करने के उपरार्न्त सहनीय तार्पक्रम पर रोगी के प्रभार्वित जोडों पर देने से दर्द एवं सूजन में लार्भ मिलतार् है। 
  2. जल तत्व चिकित्सार् : आर्थरार्इटिस रोगी की जल चिकित्सार् में यह सार्वधार्नी विशेष रुप से रखनी चार्हिए कि रोगी पर ठण्डे जल क प्रयोग कदार्पि नही करनार् चार्हिए। आर्थरार्इटिस रोगी को सम्पूर्ण शरीर क भार्प स्नार्न देने से लार्भ रोग में विशेष लार्भ प्रार्प्त होतार् है। सम्पूर्ण शरीर पर भार्प के अतिरिक्त नियमित रुप से जोडों पर स्थार्नीय भार्प देने से भी लार्भ प्रार्प्त होतार् है। इस रोग में गर्म कटि स्नार्न, गर्म रीढ स्नार्न, गर्म पैर स्नार्न, गर्म बॉह स्नार्न एवं सम्पूर्ण शरीर क गर्म स्नार्न भी लार्भकारी प्रभार्व रखतार् है। रोगी को वार्त दोष क शमन करने वार्ले औषध गुणों से युक्त द्रव्यों से एनीमार् देने से भी रोग में लार्भ मिलतार् है। 
  3. अग्नि तत्व चिकित्सार् : आर्थरार्इटिस रोगी को सूर्य स्नार्न देने से रोग में विशेष लार्भ मिलतार् है। इसके सार्थ सार्थ नार्रंगी रंग की बोतल में आवेशित जल क सेवन रोगी को करार्ने एवं लार्ल अथवार् नार्रंगी रंग क प्रकाश जोडों पर डार्लने से रोग ठीक होतार् है। 
  4. वार्यु तत्व चिकित्सार् : आर्थरार्इटिस रोगी की जोडों पर अत्यन्त सार्वधार्नीपूर्वक हल्के हार्थों से धूप में मार्लिश करने से आरार्म मिलतार् है। सरसों के तेल में लहसुन की चार्र से छह कलियार् पकाकर गुनगुने तेल से हल्के हल्के हार्थों से जोडों पर मार्लिश करने से रोगी को अत्यन्त लार्भ मिलतार् है। रोगी को हल्के हार्थों से एवं वैज्ञार्निक ढंग से मार्लिश करने से रक्त संचार्र त्रीव होतार् है एवं दर्द व सूजन में आरार्म मिलतार् है।
  5. आकाश तत्व चिकित्सार् : आर्थरार्इटिस रोगी की छोटे उपवार्स अथवार् कल्प करार्ने से रोग में लार्भ मिलतार् है। रोगी को उपवार्स काल में पर्यार्प्त मार्त्रार् में जल क सेवन करनार् चार्हिए, उपवार्स काल में गुनगुने जल में नींबू क रस एवं शहद मिलार्कर भी सेवन कियार् जार् सकतार् है। 

योग चिकित्सार् एवं प्रार्कृतिक चिकित्सार् के अध्ययन के उपरार्न्त अब आर्थरार्इटिस रोगी की आयुर्वेद चिकित्सार् पर विचार्र करते हैं –

3. आर्थरार्इटिस रोग की आयुर्वेद चिकित्सार् 

आयुर्वेद शार्स्त्र में आर्थरार्इटिस रोग को आमवार्त के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। वहार्ं पर आम शब्द को विषार्क्त तत्व के संदर्भ में एवं वार्त को वार्यु के अर्थ में लियार् गयार् है अर्थार्त जब विषार्क्त अथवार् दूषित वार्यु जोडों में एकत्र होकर दर्द एवं सूजन उत्पन्न करती है, तब वह रोगार्वस्थार् “आमवार्त” कहलार्ती है। आमवार्त को ही आधुनिक चिकित्सार् विज्ञार्न आर्थरार्इटिस रोग कहतार् है।

आयुर्वेद शार्स्त्र में विषार्क्त दूषित वार्यु को शरीर से निष्कासन ही इस रोग की मूल चिकित्सार् के रुप में वर्णित कियार् गयार् है। इसके लिए रोगी की पंचकर्म चिकित्सार् अत्यन्त प्रभार्वी चिकित्सार् है। पंचकर्म के सार्थ सार्थ रोगी को निम्न औषध द्रव्यों क सेवन करार्ने से रोग में आरार्म मिलतार् है –

एक से तीन ग्रार्म गुग्मुल गर्म पार्नी के सार्थ रोगी को सेवन करार्ने से रोग में लार्भ मिलतार् है। रोगी को 1 से 3 ग्रार्म की मार्त्रार् में पीसी हल्दी क चूर्ण एवं सौंठ समार्न मार्त्रार् में मिलार्कर सुबह-शार्म नियमित सेवन करार्ने से दर्द एवं सूजन में लार्भ प्रार्प्त होतार् है।

5 से 10 ग्रार्म मैथी दार्ने क चूर्ण सुबह गर्म जल के सार्थ सेवन करार्ने से रोगी को रोग में लार्भ प्रार्प्त होतार् है।

चार्र से पार्ंच लहसुन की कलियों को दूध में उबार्लकर रोगी को पिलार्ने से रोग में लार्भ प्रार्प्त होतार् है। लहसुन क रस कपूर में मिलार्कर प्रभार्वित जोडों की मार्लिश करने से रोगी को आरार्म मिलतार् है।

रार्त्रिकाल में सोने से पूर्व प्रभार्वित जोडों पर गर्म सिरके से मार्लिश करने से दर्द एवं जकडन में आरार्म मिलतार् है। रोगी को गर्म जल अथवार् गुनगुने दूध के सार्थ त्रिफलार् चूर्ण क सेवन करार्ने से भी रोग में लार्भ मिलतार् है।

 11.6.7 आर्थरार्इटिस रोग की आहार्र चिकित्सार् 

आर्थरार्इटिस रोगी को निम्न लिखित पथ्य और अपथ्य आहार्र पर ध्यार्न देनार् चार्हिए –

  1. पथ्य आहार्र – सेब, सन्तरार्, अंगूर, पपीतार्, नार्रियल, तरबूज, खरबूजार्, लौकी, कद्दू, गार्जर, ककडी, खीरार्, चनार्, मैथी आदि हरी पत्तेदार्र सब्जियार्ं, अदरक, लहसुन, हरी धनियार्, चौकरयुक्त आटार्, मौसमी फल, सलार्द एवं पोषक तत्वों से युक्त पौष्टिक आहार्र रोगी के लिए पथ्य है। इसके सार्थ सार्थ रोगी के लिए सब्जियों क सूप एवं फलों के जूस भी पथ्य है। 
  2. अपथ्य आहार्र – नमक, चीनी, चार्य, कॉफी, सोफ्ट व कोल्ड डिंक्स जैसे पैप्सी व कोक, एल्कोहल, बार्जार्र की मिठाइयार्ं, चार्कलेट, तलार् भुनार् चार्यनीज फूड, फार्स्ट फूड, जंक फूड, चार्वल, फूलगोभी, पत्तार्गोभी, पार्लक, खट्टी दही, वार्तवर्धक बार्सी, रुखार् एवं पोषक तत्व विहीन भोजन रोगी के लिए अपथ्य है। धूम्रपार्न एवं एल्कोहल के सेवन से रोगी को पूर्णतयार् बचार्नार् चार्हिए। इस प्रकार उपरोक्त पथ्य एवं अपथ्य आहार्र के अनुसार्र रोगी को आहार्र करार्ने से रोग में शीघ्र लार्भ प्रार्प्त होतार् है। 

आर्थरार्इटिस रोगी के लिए सार्वधार्नियार्ं एवं सुझार्व

  1.  आर्थरार्इटिस रोग को बढने नही देनार् चार्हिए अपितु रोग की प्रार्रम्भिक अवस्थार् में लक्षण प्रकट होते ही रोग पर ध्यार्न देते हुए आहार्र विहार्र संयम एवं वैकल्पिक चिकित्सार् द्वार्रार् तुरन्त रोग क प्रबन्धन करार्नार् चार्हिए।
  2. रोगी को एक स्थार्न पर एवं एक स्थिति में लम्बे समय तक बैठकर कार्य नही करनार् चार्हिए। 
  3. रोगी को अपने कार्य सही मुद्रार् में ही करने चार्हिए।
  4. रोगी को प्रार्त:कालीन भ्रमण करनार् चार्हिए एवं पैदल चलने की आदत बनार्नी चार्हिए।
  5. रोगी को नियमित रुप से प्रार्त:काल धूप स्नार्न लेनार् चार्हिए। 
  6. रोगी को दर्द निवार्रक दवाइयों क लम्बे समय तक सेवन नही करनार् चार्हिए। 
  7. रोगी को आहार्र में फलों एवं सब्जियों क अधिक सेवन करनार् चार्हिए तथार् वार्तवर्धक खार्द्य पदाथो के सेवन से बचनार् चार्हिए। 
  8. रोगी को फ्रीज के ठंडे पार्नी क सेवन पूर्ण रुप से बंद कर देनार् चार्हिए एवं उबले हुए गुनगुने पार्नी क ही सेवन करनार् चार्हिए।
  9. रोगी को नियमित आसन प्रार्णार्यार्म आदि यौगिक क्रियार्ओं क अभ्यार्स करनार् चार्हिए। 
  10. सभी प्रकार के र्दुव्यसनों को पूर्ण रुप से छोड देनार् चार्हिए। इस प्रकार उपरोक्त सार्वधार्नियों को ध्यार्न में रखने से रोग जल्दी ठीक होतार् है।

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