खिलजी वंश की स्थार्पनार् एवं अन्त

खिलजी वंश (1290-1320 ई.)

जलार्लुदुद्दीन फिरोज खलजी (1290-1296 र्इ)

मलिक फिरार्ज खलजी कबीले क तुर्क थार् । उसके वंश तुर्किस्तार्न से आये थे । उसके परिवार्र ने दिल्ली के तुर्की सुल्तार्न की नौकरी कर ली थी । बलबन के शार्सन काल में फिरोज उत्तर पश्चिमी सीमार् क रक्षक थार् । वह मंगोलों के विरूद्ध कर्इ युद्ध सफलतार्पूर्वक लड़ चुक थार् । वह समार्नार् क हार्किम नियुक्त कियार् गयार् । वह एक सफल यौद्धार् और प्रशार्सक के रूप में प्रसिद्ध थार् । इसी कारण उसे शार्इस्तार्खार्ं की उपार्धि दी गर्इ थी ।

कुछ समय बार्द फिरोज को दिल्ली में आरिज-ए-मार्मलुक (युद्ध मंत्री) बनार् दियार् गयार् । तुर्की सरदार्र उनसे र्इष्र्यार् करने लगे । उन्होंने उससे छुटकारार् पार्ने और तुर्की एकाधिकार को पुन: स्थार्पित करने के लिए षड्यंत्र रचार् । परन्तु सभी षड्यंत्रअसफल रहे और वह अल्प वयस्क सुल्तार्न कैमूर क संरक्षक बन गयार् । फिरोज ने 1290 र्इ. में कैमूर और उसके पितार् पक्षार्घार्त रोगी कैकुवार्द की हत्यार् कर गद्दी प्रार्प्त की । कुछ विद्वार्न इस घटनार् को 1290 र्इ. की खलजी वंश की क्रार्न्ती कहते हैं । इस प्रकार दार्स वंश क अंत हुआ और फिरोज जलार्लुद्दीन खलजी के नार्म से गद्दी पर बैठार् ।

जिस समय जलार्लुद्दीन खलजी सुल्तार्न बनार् वह 70 वर्ष क बुढ़ार् थार् । इसलिए उसने दयार् और उदार्रतार् की नीति अपनाइ । यद्यपि उसने तुर्की सरदार्रों को प्रशार्सन में उच्च पदों पर रखार् फिर भी उसने उनक एकाधिकार समार्प्त कर दियार् । तुर्की सरदार्र खलजियों को तुर्क नहीं मार्नते थे । इसलिये उन्होंने जलार्लुद्दीन को सहयोग नहीं दियार् । इसके अतिरिक्त जलार्उद्दीन के नेतृत्व में खलजी नवयुवक बहुत महत्वकांक्षी थे । इसलिए तुर्की सरदार्र उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखते थे । इन सभी कारणों से जलार्लुद्दीन क शार्सन अस्थिर रहार् ।

जलार्लुद्दीन ने सरदार्रों की सद्भार्वनार् व सहयोग प्रार्प्त करने के लिए सहनशीलतार् की नीति अपनाइ उसने किसी को भी कठोर दण्ड नहीं दियार् । उनक सहयोग प्रार्प्त करने के लिए उसने उन्हें केवल नयार् होल. कियार् वरन कइर् बार्र इनार्म भी दिये ।

मलिक छज्जू के प्रति सुल्तार्न क व्यवहार्र उदार्र नीति क एक उदार्हरण है । मलिक छज्जू ने 1290 र्इ. में विद्रोह कियार् थार् । वह कड़ार् क हार्किम थार् । वह विद्रोह कर सुल्तार्न बन बैठार् । जलार्लुद्दीन की सेनार् ने उसे परार्जित कर बदार्यू में बन्दी बनार्यार् । उसे दिल्ली लार्यार् गयार् । यहार्ं उसे केवल मुक्त ही नहीं कियार् गयार् वरन् उसक स्वार्गत कर उपहार्र दिये गये और फिर उसे मुल्तार्न भेज दियार् गयार् । जलार्लुद्दीन की उदार्र नीति की अलोचनार् की गर्इ क्योंकि इससे विद्रोह को प्रोत्सार्हन मिलार् थार् ।

सीदी मौलार् क विद्रोह ही एकमार्त्र ऐसी घटनार् है जिसके प्रति सुल्तार्न जलार्लुद्दीन ने कठोर नीति अपनाइ थी सीदी मौलार् एक दरवेश थार् जो बलबन के समय में दिल्ली आयार् थार् । बड़े-बड़े लोग उसके अनुयार्यी थे । उसने पहले सुल्तार्न नार्सिरूद्दीन मुहम्मद की पुत्री से विवार्ह कियार् और अव वह भी गद्दी क दार्वेदार्र बन रहार् थार् । इस षड्यंत्र में कुछ सरदार्र भी शार्मिल थे । सीदी मौलार् और उसके सार्थियों को बन्दी बनार् लियार् गयार् । सुल्तार्न ने सीदी मौलार् को मृत्यु दण्ड दियार् ।

जलार्लुद्दीन ने अनके युद्ध नहीं किये । उसने 1290 र्इ. में एक अभियार्न रणथम्भोर के विरूद्ध छेडार् । वह हमीर देव की गतिविधियों को समार्प्त कर देनार् चार्हतार् थार् परन्तु उसने कड़ार् मुकाबलार् कियार् । जलार्लुद्दीन ने झेन विजय कियार् । यहार्ं उसने अनेक मंदिर और मूर्तियों को नष्ट कियार् । परन्तु बार्द में वह कह कर पीछे हट गयार् कि वह बेकार में मुसलमार्नों क रक्त नहीं बहार्नार् चार्हतार् । उसक पीछे हटनार् अपमार्नजनक थार् । उसक अन्य अभियार्न मन्दौर (मन्दार्बट) के विरूद्ध थार् जो कभी दिल्ली सल्तनत के अधीन थार् परन्तु अब उस पर रार्जपूतों क अधिकार थार् । जलार्लुद्दीन से इसे 1292 र्इ. में पुन: विजय कियार् ।

जलार्लुद्दीन के शार्सन काल में दो और अभियार्न छेड ़े गए थे । ये अभियार्न उसके भतीजे अलार्उद्दीन ने छेड़े थे । अलार्उद्दीन ने 1292 र्इ. में मार्लवार् पर आक्रमण कर भेलसार् (विदिशार्) विजय कियार् । यहीं पर उसे दक्षिण में देवगिरि की सम्पन्नतार् के विषय में सुनने को मिलार् । महत्वकांक्षी अलार्उद्दीन ने 1294 र्इ. में देवगिरि के रार्जार् रार्मचन्द्र देव पर आक्रमण कियार् । अलार्उद्दीन विजयी रहार् और उसने देवगिरी को खूब लूटार् । लूट में अपार्र धन मिलार् । इस लूट में कर्इ हजार्र पौंड, सोनार्-चार्ंदी, हीरे-मोती के अतिरिक्त एक हजार्र गज सिल्क क कपड़ार् मिलार् थार् ।

1292 र्इ. में मंगोलों ने पंजार्ब पर आक्रमण कियार् । हलार्कू के पौत्र के नेतृत्व में मंगोल सुनार्म तक आए । जलार्लुद्दीन ने आगे बढ़कर उनक मुकाबलार् कर उन्हें परार्जित कियार् । मंगोंले को विवश हो सन्धि करनी पड़ी । चंगेजखार्ं के वंशज उलग खार्ं ने सुल्तार्न की नौकरी कर ली । उसने इस्लार्म धर्म स्वीकार कर लियार् । इन्हें सुल्तार्न ने सुविधार्यें और भत्ते भी दिए । वे गयार्सपुर और नीलोखेड़ी में बस गए । वे लोग ही नव-मुसलमार्न कहलार्ये । सुल्तार्न जलार्लुद्दीन ने अपनी पुत्री क विवार्ह उलग खार्ं से कर दियार् ।

आप पढ़ चुके है कि सुल्तार्न जलार्लुद्दीन उदार्र सहनशील और नम्र थार् । इसी कारण सरदार्रों ने उसके विरूद्ध विद्रोह किए यद्यपि उस समय की दिल्ली की स्थिति को देखते हुए विद्रोह उपयुक्त नहीं थे । आन्तरिक और बार्हरी शत्रुओं के कारण सल्तनत की जनतार् में असुरक्षार् की भार्वनार् उत्पन्न हुर्इ । इससे सुल्तार्न की प्रतिष्ठार् भी गिरी ।

अलार्उद्द्दीन खलजी (1296-1216 ई.)

अलार्उद्दीन जलार्लुद्दीन क महत्वार्कांक्षी भतीजार् और दार्मार्द थार् । वह युद्ध कलार् में भली-भार्ंति प्रशिक्षित थार् । उसने सत्तार् प्रार्प्त करने में अपने चार्चार् की सहार्यतार् की थी । अलार्उद्दीन को अमीर-ए-तुबुक (समार्रोह मंत्री) नियुक्त कियार् गयार् थार् । मलिक छज्जू के विरूद्ध छेडे गए अभियार्न की सफलतार् के बार्द उसे बड़ार् हार्किम बनार् दियार् गयार् । आप अलार्उद्दीन के दो सफल अभियार्नों के संबंध में पिछले खण्ड में अध्ययन कर चुके है, जिन्हें उसने जलार्लुद्दीन के शार्सन काल में आरम्भ कियार् थार् । 1298 र्इ. में भेलसार् (विदिशार्) अभियार्न के बार्द उसे कड़ार् के अतिरिक्त अरब क अकतार् दियार् गयार् । उसे आरिज-ए-मार्मलिक (युद्ध मंत्री) नियुक्त कियार् गयार् थार् । उसने अपने चार्चार् के आज्ञार् प्रार्प्त कर अपनी सेनार् बढ़ार्एं उसने 1294 र्इ. में दक्षिण भार्रत में तुर्की अभियार्न प्रार्रम्भ कियार् और देवगिरी को लूटार् । इस सफल अभियार्न ने सिद्ध कर दियार् कि वह उत्सार्ही, वीर और असार्धार्रण सेनार्नार्यक तथार् योग्य संगठन कर्तार् थार् । इस विजन ने उसे इतनार् उत्सार्ही बनार् दियार् वह शीघ्र ही गद्दी प्रार्प्त करने क स्वप्न देखने लगार् ।

1296 र्इ. में अलार्उद्दीन ने धोखे से अपने चार्चार् जलार्लुद्दीन की हत्यार् कर दी और वह स्वयं सुल्तार्न बन गयार् ।
अलार्उद्दीन खलजी ने बहुत ही चतुराइ से अपने प्रतिद्विन्द्वयों और उनके सहयोगियों से छुटकारार् पार्यार् और इस प्रकार उसने अपनी गद्दी सुदृढ़ की । उसने अपने विरोधियों को अपने पक्ष में करन े के लिए दवे गिरि की तट के धन को उदार्रतार् पूवर्क उसनें बार्ंटार् । जनतार् उसके धोखे को भूलकर उसकी उदार्रतार् की चर्चार् करने लगी तथार्पि उसने उन लोगों के प्रति कठोर कदम उठार्ए जो उसक विरोध करते रहे । लगभग सभी सरदार्र और अधिकारी पिछली बार्तों को भूलकर उसके समर्थक हो गये ।

अलार्उद्दीन ने बलबन के रार्जस्व सिद्धार्न्त को अपनार्ने क निश्चय कियार् । उसक विश्वार्स थार् कि सुल्तार्न पृथ्वी पर र्इश्वर क प्रतिनिधि है । उसे पूर्ण विश्वार्स थार् कि सुल्तार्न ओरों की अपेक्षार् अधिक बुद्धिमार्न होतार् है । इसीलिए उसकी इच्छार् ही कानून होती है । उसक आदर्श थार् कि सुल्तार्न कोर्इ संबंधी नही होतार् । देश के सभी लोग उसके कर्मचार्री है यार् उसकी प्रजार् है । उसने रार्ज्य के मार्मलों में उलेमार्ओं और सरदार्रों को हस्तक्षेप नहीं करने दियार् । उसने स्वयं को खलीफार् क सहार्यक मार्नार् । इसक अर्थ यह नहीं थार् कि रार्जनीति में खलीफार् क स्थार्न ऊंचार् है । उसने खलीफार् को मार्न्यतार् केवल इसलिए दी कि परम्परार्गत एकतार् बनी रही ।

अलार्उद्दीन के शार्सनकाल के प्रार्रंभिक वर्षो में थोड़े-थोड़े अन्तरार्ल में चार्र विद्रोह हुए । प्रथम विद्रोह मंगोलों ने कियार् जो जलार्लुद्दीन के शार्सनकाल में भार्रत में बस गए थे । वे 1299 र्इ. में गुजरार्त अभियार्न में उसके सार्थ गए थे । वार्पिस आते समय लूट के बंटवार्रे को लेकर उनमें असन्तोष फैल गयार् । उन्होंने विद्रोह कर अलार्उद्दीन के भतीजे और सेनार् नार्यक नुसरत खार्ं के भाइ की हत्यार् कर दी । उनमें से बहुत से नुसरत खार्ं द्वार्रार् मार्रे गए । उनमें से जो रणथम्भौर भार्ग गए थे उनकी पत्नियों और बच्चों की हत्यार् कर दी गर्इ । अकत खार्ं, मलिक उमर और मंगू खार्ं, और हार्जी मौलार् के तीनों विद्रोह कठोरतार् पूर्वक दबार् दिए गए ।

तार्रीख-ए-फिरोजशार्ही के लेखक बरनी क कथन है कि अलार्उद्दीन के अनुसार्र विद्रोह के चार्र कारण थे : –

  1. गुप्तचर व्यवस्थार् की अकुशलतार् 
  2. शरार्ब क प्रयोग
  3. सरदार्रों क परस्पर मिलनार् जुलनार् और विवार्ह और 
  4. कुछ सरदार्रों के पार्स धन की अधिकतार् । 

भार्षी विद्रोह रोकने के लिए अलार्उद्दीन ने चार्र अध्यार्देश जार्री किए : –

  1. जिन्हें जीवन निर्वार्ह के लिए कर मुक्त भूमि मिली हुर्इ थी उन्हें कहार् कि वे भूमि-कर दें । इससे उनके अधिकार में अतिरिक्त धन पर प्रतिबन्ध लग गयार् । अर्थार्त् अधिक धन की संभार्वनार् समार्प्त हो गर्इ ।
  2.  गुप्तचर व्यवस्थार् क पुनर्गठन कियार् गयार् जिससे वह अधिक प्रभार्वी ढंग से कार्य कर सकें ।
  3. शरार्ब और अन्य नशों के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगार् दियार् गयार् । 
  4. सार्मार्जिक समार्रोह तथार् परस्पर वैवार्हिक संबंध पूर्व आज्ञार् प्रार्प्त कर ही स्थार्पित किए जार् सकते थे । 

उपरोक्त-अध्यार्देशों को लार्गू करने, अपने रार्जस्व सिद्धार्न्त को मूर्तरूप देने, विजय और मंगोलों के आक्रमणों से अपने देश की सुरक्षार् की महत्वकांक्षार् को फलीभूत करने के लिए अलार्उद्दीन को स्वयं शक्तिशार्ली बनार्नार् थार् । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने एक विशार्ल स्थार्यी सेनार् बनाइ । सेनार् की वित्तीय आवश्यकतार्एं पूरी करने के लिए उसने अनेक रार्जस्व सुधार्र आरम्भ किए । उसने बार्जार्र नियंत्रण भी लार्गू कियार् ।

1296 र्इ. में अलार्उद्दीन खलजी गद्दी पर बैठार् । उसने अपनी अपार्र शक्ति और धन के बल पर अपने विरोधियों क दमन कियार् । उसके नेतृत्व में सल्तनत क विस्तार्र कार्य आरम्भ हुआ।

दिल्ली सल्तनत क विस्तार्र

अलार्उद्दीन खलजी को भार्रत में प्रथम तुर्की रार्ज्य निर्मार्तार् कहार् जार्तार् है । उसके ही शार्सन काल में रार्ज्य विकास के चरमोत्कर्ष पर पहुंचार् थार् । उसे अपने कार्यो और सफलतओं के कारण दिल्ली के शार्सकों में उच्च स्थार्न प्रार्प्त है । नि:सन्देह वह दिल्ली सल्तनत क सबसे योग्य और शक्तिशार्ली शार्सक थार् । अलार्उद्दीन विद्रोह दमन और आक्रमणों में मिली सफलतार् के कारण विश्व विजय की महत्वार्कांक्षार् करने लगार् थार् । तथार्पि उसके र्इमार्नदार्र और अनुभवी सलार्हकार कोतबार्ल अलार्-उल-मुल्क ने उसे परार्मर्श दियार् कि वह विश्व विजय से पूर्व समस्त भार्रत को विजय करें । उसके ही परार्मर्श से अलार्उद्दीन ने भार्रत के स्वतंत्र रार्ज्यों को अपनी अध् ार्ीन करने क निश्चय कियार् । उसने अधिकांश युद्ध उत्सार्ह की अपेक्षार् अपनी नीति के परिणार्म स्वरूप लड़े थे । वह उत्तर और दक्षिण दोनों ही ओर के रार्ज्य विजय करने के लिए निकल पड़ार् । उत्तर में उसके गुजरार्त, मार्लवार्, रणथम्भौर तथार् रार्जपूतार्ने के चित्तौड़, सबार्नार् और जार्लौर अभियार्न सफल रहे । उसने दक्षिण भार्रत में देवगिरि, होयसल, पार्ण्डय, बार्ंरगल, भार्बार्र और द्वार्रसमुद्र विजय किए।

अलार्उद्दीन ने रार्ज्य विस्तार्र क शुभार्रंभ गुजरार्त अभियार्न से कियार् । उससे पूर्व सभी . दुश्मन अपनी स्थिति सुदृढ करने में लगे रहे, इसलिए वे पश्चिम की ओर नहीं बढ़ सके थे । गुजरार्त विजय की प्रेरणार् अलार्उद्दीन की अपनी महत्वकांक्षार् के सार्थ-सार्थ गुजरार्त की अपार्र सम्पत्ति थी । गुजरार्त एक उपजार्ऊ प्रदेश थार् और उसके तट पर अनेक बन्दरगार्ह थे । इनके द्वार्रार् पश्चिम से व्यार्पार्र होतार् थार् । व्यार्पार्र से प्रार्प्त होने वार्ले सोने-चार्ंदी से यह प्रदेश सुखी सम्पन्न बन गयार् थार् । आपको यार्द होगार् कि मंगोल उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में फैल गए थे जिसके कारण स्थल माग असुरक्षित हो गए थे । अलार्उद्दीन खलजी ने धन लुटार् जिससे भार्षार् अभियार्नों क संचार्लन कियार् गयार् । सार्थ ही उसने बन्दरगार्ह अपने अधिकार में लिए जिससे उसे सेनार् के लिए अरब से घोड़े मिलते रहें ।

1299 र्इ. में अलार्उद्दीन खलजी के गुजरार्त आक्रमण के लिए उलग खार्ं और नुसरत खार्ं की सार्मूहिक सेनार् भेजी । गुजरार्त क रार्जार् अलार्उद्दीन शीघ्र देवगिरि मे भार्ग गयार् । गुजरार्त के सम्पन्न नगर लुटे गए और सोमनार्थ क मन्दिर नष्ट कर दियार् गयार् । यहार्ं तक कि मुसलमार्न व्यार्पार्रियों (ख्वार्जार्) की सम्पत्ति लुट ली गर्इ । लूट में अपार्र धन मिलार् । उसके अतिरिक्त बहुत से दार्स भी मिले । इससे ही एक मलिक काफूर थार् जो आगे चलकर खलजी सेनार् क विश्वनीय सेनार्नार्यक बनार् । उसने ही अलार्उद्दीन के दक्षिण अभियार्नों क नेतृत्व कियार् । गुजरार्त के बार्द अलार्उद्दीन खलजी ने रार्जपूतार्ने की ओर ध्यार्न दियार् । रार्जपूतार्ने में पहलार् शिकार हुआ रणथम्भौर । रणथम्भौर क किलार् रार्जपूतार्ने क सबसे दृढ़ किलार् थार् और वह सदार् से ही दिल्ली सुल्तार्नों की अवहेलनार् करतार् रहार् थार् । रार्जपूतों की शक्ति समार्प्त करने और उनके नैतिक पतन के लिए इस किले को विजय करनार् आवश्यक हो गयार् थार् ।

रणथम्भौर के रार्जार् हमीर देव ने अलार्उद्दीन खलजी के विद्रोही मंगोल सैनिकों को शरण दी थी । रणथम्भौर पर आक्रमण क तार्त्कालिक कारण यह ही बनार् । गुजरार्त की लूट को लेकर मंगोल सैनिकों ने विद्रोह कियार् थार् । अलार्उद्दीन खलजी ने हमीर देव को कहार् कि वह विद्रोहियों को वार्पिस कर दें, परन्तु हमीर देव ने विद्रोही वार्पिस नहीं किए । इसलिए अलार्उद्दीन ने हमीर देव (रणथम्भौर) पर आक्रमण कर दियार् । रणथम्भौर रार्जपूतार्ने क सबसे दृढ़ किलार् थार् । इस कारण प्रार्रम्भ में खलजी सेनार् को हार्नि ही नहीं उठार्नी पड़ी वरन् नुसरत खार्ं जैसार् सेनार्नार्यक भी मार्रार् गयार् । विवश हो अलार्उद्दीन खलजी को युद्ध भूमि में आनार् पड़ार् । नियोजित घेरार्बन्दी के बार्द 1301 र्इ. में अलार्उद्दीन रणथम्भौर क किलार् विजय कर सक ।

रार्जपूतार्ने क अन्य शक्तिशार्ली गढ़ थार् चित्तौड़ । यह गुजरार्त माग पर थार् । इसलिए इसे विजय करनार् आवश्यक थार् । अलार्उद्दीन खलजी ने 1303 में चित्तौड़ घेरार् । कुछ लोगों क कहनार् है कि चित्तौड़ आक्रमण क कारण रार्जार् रतन सिंह की सुन्दर पत्नी पद्यिनी को प्रार्प्त करनार् थार् । आधुनिक इतिहार्सकार इस विचार्र को स्वीकार नहीं करते क्योंकि उसक उल्लेख लगभग 100 वर्ष बार्द सर्वप्रथम जार्यसी ने अपने पदमार्वत में कियार् । प्रत्यक्षदश्र्ार्ी अमीर खूसरों ने चित्तौड युद्ध क वर्णन कियार् है । रार्जपूतों ने वीरतार् से मुकाबलार् कियार् परन्तु वे खलजी सेनार् को परार्जित नहीं कर सके । रार्जपूत स्त्रियों ने जौहर कर अपने प्रार्ण त्यार्ग दिए । अमीर खुसरों के अनुसार्र सुल्तार्न ने जनसार्धार्रण के नरसंहार्र क आदेश दियार् थार् । सुल्तार्न के पुत्र खिज्र खार्ं के नार्म पर चित्तोड क नार्म खिज्रार्बार्द रखार् । मंगोल सेनार् दिल्ली की ओर बढ़ रही थी इसलिए अलार्उद्दीन खलजी शीघ्र ही चित्तौड़ से वार्पिस हो गयार् ।

1305 र्इ. में खलजी सेनार् ने अमी-उल-मुल्क के नेतृत्व में मार्लवार् विजय कियार् । उज्जैन, मोड़, धार्र और चन्देरी जैसे अन्य रार्ज्य भी विजय किए गए । अमी-उल-मुल्क को उसकी सेवार् के बदले हार्किम (गवर्नर) बनार्यार् गयार् ।

मार्लवार् विजय के बार्द अलार्उद्दीन खलजी ने मलिक काफूर को दक्षिण भेजार् और उसने स्वयं सिवार्नार् पर आक्रमण कियार् । सिवार्नार् के रार्जार् ने बड़ी वीरतार् से किले को बचार्ने क प्रयत्न कियार् परन्तु अन्त में परार्जित हुआ । इसी प्रकार 1311 र्इ. में जार्लौर भी विजय कर लियार् गयार् । इस प्रकार 1311 र्इ. तक सुल्तार्न अलार्उद्दीन खलजी समस्त रार्जपूतार्नार् विजय कर उत्तर भार्रत क स्वार्मी बन चुक थार् तथार्पि उसकी यह विजय स्थार्यी सिद्ध नहीं हुर्इ । रार्जपूत निरन्तर स्वतन्त्र होने के अवसर खोलते रहे थे रणथम्भौर चित्तौड़ और जार्लौर सल्तनत के हार्थ से निकल गए । रार्जपूतों के स्वतंत्रतार् प्रेम और उस क्षेत्र की प्रार्कृतिक कठिनार्इयों के कारण अलार्उद्दीन खलजी रार्जपूतार्ने को पूर्णरूप से दमन कर अपने अधीन नही रख सक ।

दार्रसमुद्र और मार्बार्र (आधुनिक कर्नार्टक और तमिल क्षेत्र) अभियार्न में मलिक काफूर को सफलतार् और असफलतार् दोनों ही देखनी पड़ी । यद्यपि जमकर बहुत कम युद्ध हुआ तथार्पि आर्थिक रूप से बहुत लार्भ हुआ । द्वार्रसमुद्र के रार्जार् वीर वल्लभ ने अनुभव कर लियार् थार् कि मलिक काफूर को परार्जित करनार् कोर्इ सरल कार्य नहीं होगार् इसलिए उसने वाषिक कर देनार् स्वीकार कर लियार् । मार्बार्र पार्ंड्य रार्ज्य के संबंध में यह कहार् जार् सकतार् है कि न तो पार्ंडय रार्जार् वीर पार्ंडय पकड़ार् जार् सक और न शर्त मनवाइ जार् सकी जार् सकी फिर भी मलिक काफूर को बहुत सार् धन मिलार् । अमीर खुसरो के अनुसार्र मलिक काफूर अपने सार्थ 512 हार्थी, 500 घोड़े और 500 मन कीमती पत्थर लार्यार् थार् । सुल्तार्न अलार्उद्दीन खलजी ने उसे नार्यब-मलिक के पद पर नियुक्त कर सम्मार्नित कियार् ।

मलिक काफूर के नेतृत्व में खलजी सेनार् दक्षिण में अपनार् नियंत्रण बनार् रही । रार्मचन्द्र क पुत्र और देवगिरि क रार्जार् शंकर देव दिल्ली से संबंध विच्छेद कर लेनार् चार्हतार् थार् इसलिए उसने वाषिक कर नहीं भेजार्, सुल्तार्न अलार्उद्दीन ने एक बार्र फिर 1313 र्इ. में मलिक काफूर को दक्षिण भेजार् इस बार्र देवगिरि के रार्जार् शंकर देव को दण्ड देनार् थार् । मलिक काफूर ने विद्रोह दमन कर देवगिरि को दिल्ली सल्तनत क प्रत्यक्ष अधिकार स्थार्पित कियार् ।

यद्यपि अलार्उद्दीन खलजी के शार्सन काल में अनेक अभियार्न छेड़े गए थे तथार्पि इन सभी क्षत्रे ों को दिल्ली सल्तनत के पत््र यक्ष नियंत्रण में नहीं लार्यार् गयार् थार् । केवल कुछ महत्वपूर्ण स्थार्नों में सैि नक शिविर बनार्ए गए आरै उनमें दिल्ली सल्तनत के सैि नक रखे गए । ये शिविर ऐसे महत्वपूर्ण स्थार्नों पर बनार्ए गए थे जहार्ं से दिल्ली के सैनिक इन रार्ज्यों में नियंत्रण बनार्ए रख सकते । सुल्तार्न मोहम्मद तुगलक के शार्सन काल में ही दिल्ली सल्तनत की सीमार्एं दक्षिण तक बढ़ी थी । आप इस संबंध में अगले खंड में अध्ययन करेंगे ।

सार्रार्ंश- 

अलार्उदद् ीन खलजी ने सार्मार््र ज्यवार्दी नीति क अनुकरण कियार् थार् । उसने सार्म्रार्ज्य की प्रतिष्ठार् बढ़ार्ने, प्रदेश विजय करने और धन प्रार्प्त करने के उद्देश्य से अनेक अभियार्न छेड़े थे । उसने गुजरार्त और रार्जपूतार्ने के एक बड़े भार्ग को विजय कियार् । उस ने अपने सेनार् नार्यक मलिक काफूर को दक्षिण में लूटमार्र के लिए भेजार् थार् ।

1303 र्इ. में मंगोलों क चौथार् आक्रमण उस समय हुआ जब सुल्तार्न अलार्उद्दीन के चित्तौड के विरूद्ध युद्ध में व्यस्त थार् तरराइ के अधनी 1200 मंगोल सैनिक दिल्ली के निकट आए और उन्होंने डेरार् डार्ल दियार् । उनक आक्रमण इतनार् आकस्मिक थार् कि प्रार्न्तीय हार्किम अपनी सेनार्एं लेकर दिल्ली नहीं जार् सके और अलार्उद्दीन को सोरी के किले में शरण लेनी पड़ी । मंगोलों ने किले को दो मार्स तक घेर रखार् । मंगोलों ने दिल्ली और आस-पार्स के क्षेत्र को खूब लूटार् । उन्हें अधिक समय तक जमकर युद्ध करने क अनुभव नहीं थार् इसलिए वे तीन मार्स बार्द वार्पिस चले गए ।

सुल्तार्न अलार्उद्दीन ने अपनी रार्जधार्नी दिल्ली को मंगोल आक्रमणों से बचार्ने के लिए सीमार् सुरक्षार् के लिए कदम उठार्ए । उसने पंजार्ब, मुल्तार्न और सिंध के पुरार्ने किलों की मरम्मत करवाइ और नए किले भी बनवार्ए । उसने सीमार् सुरक्षार् के लिए अतिरिक्त सैनिक भी रखे । उसने सीमार्न्त प्रदेश में विशेष हार्किम नियुक्त कियार् उसे सुरक्षार् अधिकारी (वाडन आफ माचिने) कहार् गयार् ।

फिर भी चंगेज खार्ं के वंशज अली बेग के नेतृत्व में मंगोल सेनार् ने पंजार्ब पर आक्रमण कियार्। वह अमरोह तक पहुंचार् । उसने माग में आने वार्ले नगरों को लूटार् और आग लगवार् दी । सुल्तार्न अलार्उद्दीन ने मंगोलों की गतिविधियों पर अंकुश लगार्ने के लिए मलिक नार्यक को भेजार्। लूट के मार्ल को लेकर भार्गते हुए मंगोल पकड़े गए । उन्हें हार्थी के पैरों के नीचे कुचलवार् दियार् गयार् ।

मंगोल 1306 र्इ. में एक बार्र फिर आए । ये मुल्तार्न के समीप सिंधु नदी पार्र कर लूटमार्र करते हुए हिमार्लय की ओर बढ़े । गार्जी मलिक (ग्यार्सुद्दीन तुगलक) ने उन्हें रोक । बहुत से मंगोल मार्रे गए । उनके नेतार् सहित 50,000 सैनिक बन्दी बनार्ए गए । उनकी हत्यार् कर दी गर्इ और उनकी स्त्रियों और बच्चों को दार्स के रूप मे बेच दियार् गयार् ।

इस आक्रमण के बार्द मंगोलों ने अलार्उद्दीन के शार्सन काल में आक्रमण नहीं कियार् । उन्होंने अगले 20 वर्ष तक भार्रत आने क सार्हस नहीं कियार् । इसक कारण थार् कि 1306र्इ. दार्ऊद खार्ं की मृत्यु के बार्द उत्तरार्धिकारी के लिए युद्ध शुरू हो गयार् थार् । इसके अतिरिक्त मंगोल अपने आंतरिक झगड़ों के कारण आक्रमण नहीं कर सके ।

आपने देखार् कि किस प्रकार मंगोल निरंतर अलार्उद्दीन को परेशार्न करते रहे । उनके सेनार्नार्यक उनसे लड़ते रहे जिससे वे आगे न बढ़ सके । मंगोलों के अनेक आक्रमण विफल किए गए । इसीलिए सुल्तार्न अलार्उद्दीन एक विशार्ल सेनार् बनार्ने के लिए विवश हुआ थार् । इतनार् ही नहीं, इसी कारण उसने शार्सन व्यवस्थार्, रार्जस्व और आर्थिक नीति में अनेक सुधार्र किए ।

अलार्उदद् ीन के शार्सन काल में मंगार्ले आक्रमण एक समस्यार् बने रहे । सुल्तार्न अलार्उद्दीन के योग्य सेनार्नार्यक और सैनिक मंगोलों से लड़ते रहे । मंगोल आक्रमणों के कारण सुल्तार्न अलार्उद्दीन ने रार्जस्व और आर्थिक सुधार्र लार्ए ।

खलजी वंश क अन्त

1316 र्इ. में सुल्तार्न अलार्उद्दीन खलजी की मृत्यु के बार्द खलजी सल्तनत में अरार्जकतार् फैल गर्इ । मलिक काफूर कुछ समय के लिए गद्दी पर बैठार् । उसे कुतुबुद्दीन मुबार्रक शार्ह ने गद्दी से उतार्र कर अपनार् अधिकार कर लियार् । इस काल में देवगिरि में विद्रोह हुए परन्तु दबार् दिये गये । मुबार्रक शार्ह की हत्यार् कर खुसरो गद्दी पर बैठार् । वह भी अधिक समय शार्सन न कर सक । ग्यार्सुद्दीन के नेतृत्व में असन्तुष्ट अमीरों ने एक युद्ध में उसकी हत्यार् कर दी । इस प्रकार अलार्उद्दीन की मृत्यु के चार्र वर्ष बार्द खलजी वंश क अन्त हो गयार् और सत्तार् तुगलक वंश के हार्थ आर्इ ।

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