क्रीमियार् क युद्ध (1854 र्इ.-1856 र्इ.) के कारण एवं परिणार्म
1848 र्इ. में नेपार्लेयन तृतीय ने फ्रार्सं के गणतंत्र क अंत करके अपने को सम्रार्ट बनार् लियार्। उसक विश्वार्स थार् कि वह अपनी शक्तिशार्ली विदेश नीति क अनुसरण करके किसी महार्न युद्ध में विजयी हो सकतार् थार्। इसक अवसर उसने पूर्वी समस्यार् में देखार् जिसके संबंध में रूस और इंग्लैण्ड में प्रतिद्विन्द्वतार् थी। अत: उसने किसी-न-किसी बहार्ने से पूर्वी समस्यार् को लेकर युद्ध करनार् चार्हार्।

2. नेपोलियन एवं निकोलस क द्वेष- 

रूस क सम्रार्ट् जार्रनिकोलस प्रथम, फ्रार्ंस के नेपोलियन तृतीय को ‘मेरे प्रिय मित्र‘ कर कर संबार्ेि धत कियार् रखतार् थार्। दार्ने ों सम्रार्टों के इस पार्रस्परिक द्वेश ने पूर्वी समस्यार् को जटिल बनार्ने क और अंत में उसके समार्धार्न के लिए युद्ध को आवश्यक कर दियार्। 

3. निकोलस की स्वाथपूर्ण योजनार्- 

बहुत समय पूर्व से ही निकोलस की दृष्टि टर्की सार्म्रार्ज्य पर लगी हुर्इ थी। उसे पूर्ण विश्वार्स थार् कि क्रमश: पतन की ओर अग्रसर होने वार्लार् यह सार्म्रार्ज्य किसी-न-किसी दिन अवश्य समार्प्त हो जार्येगार्। अत: वह चार्हतार् थार् कि ऐसार् होने के पूर्व ही उसके भार्ग्य क निर्णय कर लियार् जार्ये। तुर्की के संबंध में इस प्रकार के विचार्र को व्यक्त करने के बार्द निकोलस ने उसको विभार्जित करने की योजनार् प्रस्तुत की। निकोलस की योजनार् इंग्लैण्ड भेजी गर्इ। किन्तु अंग्रेज मंत्री उस योजनार् से सहमत नहीं हुए। निकोलस ने इस निर्णय से क्रुध होकर युद्ध की तैयार्रियार्ँ प्रार्रंभ कर दीं। 

4. तुर्की की निर्बलतार्-  

तुर्की क विशार्ल सार्म्रार्ज्य उत्तम प्रशार्सन के अभार्व में निरंतर निर्बल होतार् चलार् जार् रहार् थार्। उसकी इस निर्बलतार् क लार्भ उठार्कर सर्बियार्, यूनार्न, मिस्र आदि अधीनस्थ देश विद्रोह करके स्वतंत्रतार् प्रार्प्त कर चुके थे। यदि वे तुर्की की निर्बलतार् क लार्भ उठार् सकते थे, तो अन्य देश भी अपने को लार्भार्ंि वत कर सकते थे। इन देशार्ंे में मुख्य थार् रूस, जो बहुत समय से तुकीर् पर अपनार् आधिपत्य स्थार्पित करके अपने सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र करनार् चार्हतार् थार्। अत: वह किसी-न-किसी बहार्ने से युद्ध प्रार्रंभ करके अपनी इच्छार् को पूर्ण करने के लिए लार्लार्यित थार्।

5. पवित्र स्थार्नों के लिए झगड़े- 

पवित्र स्थार्नों से अभिप्रार्य थार् बेथलेहम क गिरजार्, जो र्इसार् मसीह के जन्म लेने के स्थार्न पर बनार् हुआ थार्। इस गिरजे को यूनार्नी पार्दरियों और रोमन कैथार्ेि लकों दार्ने ों के द्वार्रार् पय्र ार्गे कियार् जार्तार् थार्। 1740 र्इ. की एक संधि के अनुसार्र फ्रार्ंस को रोमन कैथोलिकों क संरक्षण प्रार्प्त हो गयार् थार्। अत: फ्रार्सं के प्रभार्व के कारण गिरजे के मुख्य द्वार्र की चार्बी उनको मिल गयी थी। यूनार्नी पार्दरियों को एक छोटे द्वार्र की चार्बी दे दी गर्इ, जिससे वे गिरजार् क एक बगल क द्वार्र खार्ले कर उसमें प्रवेश कर सकते थे। फ्रार्ंस की क्रार्ंति से लार्भ उठार्कर यूनार्नियों ने बगल के छोटे दरवार्जे कीे चार्बी रोमन कैथोलिकों को दे दी और मुख्य द्वार्र की चार्बी स्वयं ले ली। जब नेपोलियन तृतीय फ्रार्ंस क सम्रार्ट बनार्, तब उसने पोप और रोमन कैथोलिकों को प्रसé करने के लिए अपने पक्ष में करने क विचार्र कियार्। इस उद्देश्य से उसने 1850 र्इ. में पवित्र स्थार्नों पर अपने संरक्षण की मार्ँग की; जिससे कि रोमन कैथोलिकों की गिरजे के मुख्य द्वार्र की चार्बी फिर मिल जार्य। जार्र निकोलस ने यूनार्नी पार्दरियों क समर्थक होने के कारण इस मार्ँग क विरोध कियार्। सार्थ ही, उसने यह भी मार्ँग की कि पवित्र स्थार्नों पर उसक संरक्षण स्वीकार कियार् जार्य। फ्रार्सं की मार्ँग क इंग्लैण्ड, स्पेन, आस्ट्रियार् और अन्य रोमन कैथार्ेि लक देशार्ंे ने विरोध कियार्। अत: तुकीर् के सुल्तार्न ने फ्रार्ंस की मार्ँग स्वीकार कर ली। इससे क्रुध होकर निकोलस ने तुर्की के विरूद्ध युद्ध प्रार्रंभ करके क्रीमियार् के युद्ध क सूत्रपार्त कियार्। 

6. रूस के संरक्षण की अस्वी ति- 

पवित्र स्थार्नों क संरक्षण नहीं मिलने के कारण निकोलस ने तुर्की से एक अन्य मार्ँग की कि उसे तुर्की के सब यूनार्नी र्इसार्इयों क संरक्षक मार्नार् जार्ये। किन्तु तुर्की के सुल्तार्न पर अंग्रेजी रार्जदूत स्टे्रटफोर्ड क इतनार् अधिक प्रभार्व थार् कि उसने निकोलस की मार्ँग अस्वीकार कर दी। निकोलस की क्रोधार्ग्नि को पूर्ण रूप से प्रज्जवलित करने के लिये यह काफी थार् और यही क्रीमियार् के युद्ध क तार्त्कालिक कारण बनार्।

7. रूस क मॉलडेवियार् व वैलेसियार् पर अधिकार- 

इतिहार्सकार मोबट ने लिखार् है कि रूस के जार्र ने युद्ध की सब तैयार्रियार्ँ पहले ही कर ली थीं। सुल्तार्न द्वार्रार् यूनार्नी र्इसार्इयों पर अपनार् संरक्षण अस्वीकार किये जार्ने पर उसने जुलाइ, 1853 र्इमें अपनी सेनार्ओं को भेजकर तुर्की के दो प्रदेशार्ंे मॉलडेवियार् और वैलेि सयार् पर अधिकार कर लियार्।

8. तुर्की द्वार्रार् मॉलडेवियार् व बैलेसियार् की मार्ँग- 

4 अक्टूबर, 1853 र्इ. को तुर्की के सुल्तार्न ने रूस से अपने दार्ने ों प्रदेशार्ंे मॉलडेवियार् और वैलेसियार् को खार्ली करने की मार्ँग थी। रूस द्वार्रार् इस मार्ँग के अस्वीकार किये जार्ने पर तुर्की ने 23 अक्टूर, 1853 को उसके विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी।

युद्ध की प्रमुख घटनार्यें

क्रीमियार् के युद्ध की घटनार्ओं को दो भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है -1. 1853 से 1854 र्इ. तक, जब युद्ध में केवल रूस और तुर्की थे। 2. 1854 र्इ. से 1856 र्इ. तक, जब युद्ध में अन्य देश भी सम्मिलित हो गये।

1. प्रथम भार्ग (1853 से 1854 र्इ. तक) 

23 अक्टूबर, 1853 से 28 माच, 1854 र्इ. तक केवल तुर्की और रूस में युद्ध हुआ। युद्ध की घोषणार् करने के बार्द तुर्की ने डेन्यूब नदी के तट पर स्थित रूसी सेनार्ओं पर आक्रमण कर दियार्। 30 नवम्बर, 1853 र्इ. को तुर्की क एक जहार्जी बेड़ार् बार्तूम की ओर जार् रहार् थार् तब रूस के एक जहार्जी बडे ने उससे युद्ध करके उसके सब मनुष्यों क पूर्ण विनार्श कर दियार्।

2. अन्य देशों क युद्ध में प्रवेश

सिनोप में तुर्की बेड़े के विनार्श के समय इंग्लैण्ड और फ्रार्ंस क सम्मिलित बेड़ार् कुस्तुनतुनियार् में थार्। रूस द्वार्रार् तुर्की बेड़े क विनार्श फ्रार्सं ओर इंग्लैण्ड को युद्ध की चनु ार्तै ी जार्न पड़ी। इन दोनों देशों में सिनीप में की गर्इ तुर्कियों की सार्मूि हक हत्यार् से बड़ार् रार्ष्े ार् फैलार्। अत: दार्ने ों देशार्ंे के सम्मिलित बडे को कालार् सार्गर में प्रवेश करने की आज्ञार् दी गर्इ। आस्ट्रियार् ने उनको सभी प्रकार की सहार्यतार् देने क आश्वार्सन दियार्। फलस्वरूप फ्रार्ंस और इंग्लैण्ड ने 27 फरवरी, 1854 र्इ. को रूस से मॉलडेबियार् और वैलेसियार् खार्ली करने के लिए कहार्। रूस द्वार्रार् इस मार्ँग को अस्वीकार किये जार्ने पर 27 और 28 माच; 1854 को इन देशार्ंे ने रूस के विरूद्ध घार्ेि “ार्त कर दियार्।

3. द्वितीय भार्ग (1854-1856 र्इ. तक)

अपने विरूद्ध यूरोप के शक्तिशार्ली देशों को युद्ध के लिये तैयार्र देखकर रूस ने मॉलडेवियार् और बैलेसियार् के प्रदेशों को खार्ली कर दियार्। इस प्रकार युद्ध और उसकी घोषणार् क उद्देश्य पूर्ण हो गयार्, पर फिर भी युद्ध हुआ। ब्रिटिश सेनार्, लाड रेगलन और फ्रार्ंसीसी सेनार्, माशल सन्े ट एरेनॉड की अधीनतार् में 14 सितम्बर, 1854 की क्रीमियार् पहुँची दोनों देशों की सम्मिलित सेनार्ओं ने ‘आल्मार् के युद्ध’ में रूसी सेनार् को परार्स्त कियार्। इसके बार्द बेलार्क्लार्वार् में रूस के विरूद्ध युद्ध हुआ। शीत ऋतु होने के बार्द कारण मित्र रार्ष्ट्रों के सैनिकों को अकथनीय कष्ट झेलने पड़े। उनमें 9 हजार्र शीत के कारण और 13 हजार्र विभिé रोगों से मर गये। अंतत: मित्र रार्ष्ट्रों ने रूस पर विजय प्रार्प्त की। उनकी इस विजय ने रूस को बिल्कुल नि:शक्त कर दियार्। अत: उसने 20 माच, 1856 र्इ. को ‘पेरिस की संधि’ स्वीकार कर ली।

4. पेरिस की संधि

1856 की पेरिस की संधि की प्रमुख धार्रार्यें निम्नार्ंकित थीं –

  1. रूस और तुर्की द्वार्रार् एक दूसरे के जीते गये प्रदेशों को वार्पिस कर दियार् जार्य। 
  2. रूस के सेबस्टोपोल के दुर्ग को पुन: निर्मार्ण करने की आज्ञार्न दी जार्य। 
  3. डार्रडेनेल्स में तुर्की के अलार्वार् और किसी देश के युद्ध पोतों को प्रवेश करने की आज्ञार् न दी जार्य। इसके विपरीत, सब रार्ष्ट्रों के व्यार्पार्रिक जहार्जों को उसमें प्रवेश करने क अधिकार दियार् जार्य। 
  4. रूस और तुर्की को कालार् सार्गर में जहार्जी बेड़ार् रखने की आज्ञार् न दी जार्य। 
  5. मॉलडेवियार्, वैलेसियार् और सर्बियार् को तुर्की के सुल्तार्न के नार्म मार्त्र के संरक्षण में पूर्ण रूप से स्वतंत्र कर दियार् जार्य। 
  6. डेन्यबू नदी में सभी देशों के जहार्जों की चलने की अनुमति दी जार्य। 
  7. तुर्की और आस्ट्रियार् को श्ब्वदबमतज व िम्नतवचमश् क सदस्य बनार्यार् जार्य। 
  8. फ्रार्ंस और इंग्लैण्ड द्वार्रार् भविष्य में नावे और स्वीडन की रूस के आक्रमण से रक्षार् की जार्य। 
  9. रूस को तुर्क के यूनार्नी र्इसार्इयों पर किसी प्रकार क संरक्षण न दियार् जार्य। 10. तुर्की के सुल्तार्न द्वार्रार् अपनी र्इसाइ प्रजार् की दशार् में सुधार्र कियार् जार्य।

युद्ध के परिणार्म

क्रीमियार् के युद्ध के परिणार्म एवं प्रभार्व निम्नलिखित हैं।

1. फ्रार्ंस एवं इंग्लैण्ड की भिéतार् 

इस युद्ध क एक महत्वपूर्ण परिणार्म यह निकलार् कि इंग्लैण्ड और फ्रार्ंस में मित्रतार् स्थार्पित हो गयी। नेपोलियन तृतीय महत्वकांक्षी होने के कारण युद्ध की खोज कर रहार् थार् और इंग्लैण्ड नेपोलियन बार्ने ार्पाट के समय जसै ार् युद्ध नहीं चार्हतार् थार्। अत: दार्ने ों देशार्ंे में मित्रतार् हो जार्ने से स्पष्ट रूप से नेपोलियन तृतीय की महत्वार्काक्षार् पर अंकुश लग गयार् और यूरोप उस शक्तिशार्ली सम्रार्ट के युद्धों द्वार्रार् किये जार्ने वार्ले विनार्श से बच गयार्।

नेपोलियन तृतीय जार्नतार् थार् कि इंग्लैण्ड और तुर्की को एक सार्थ ही अपनार् शत्रु बनार् लेनार् उसके लिये हितकर नहीं होगार्। अत: वह इंग्लैण्ड की मित्रतार् क अत्यधिक इच्छुक थार्। पार्मस्र्टन भी समझतार् थार् कि फ्रार्ंस से मित्रतार् करके रूस की सार्म्रार्ज्य प्रसार्र की इच्छार् को रोक जार् सकतार् थार्। इन परिस्थितियों के कारण फ्रार्ंस और इंग्लैण्ड-दोनों ने एक-दूसरे की ओर मित्रतार् क हार्थ बढ़ार्यार् और वे मैत्री के अटूट संबंध में आबद्ध हुए।

2. सैनिक संगठन की कमियार्ँ 

क्रीमियार् के युद्ध ने ब्रिटिश सेनार् के संबंध में दो तथ्यों को स्पष्ट कियार्। प्रथम तथ्य यह थार् कि उसके सैनिक वीर, सार्हसी एवं कर्त्तव्य परार्ण थे। दूसरी यह कि उसके सेनार्पति पूर्णरूप से अयोग्य थे, उनमें सैनिक संगठन और संचार्लन की क्षमतार् नहीं थी और वे सैनिकों के लिये भोजन तथार् औषधि क प्रबंध नहीं कर सकते थे। ऐसार् न कर सकने के कारण अंग्रेज सैनिक भूख और बीमार्री से मर गये। इन मरने वार्ले यार्ग्े य सैनिकों के स्थार्न पर इंग्लैण्ड से भजे े जार्ने वार्ले अनुभवहीन सैनिक, ‘रेडार्न के युद्ध’ में विजय प्रार्प्त नहीं कर सके, जिससे इंग्लैण्ड के सैनिक सम्मार्न को बहुत ठेस पहुँची और जो यश उसने ऐल्मार् और इंकरमेन की विजयों द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् थार्, नष्ट हो गयार्।

3. सेनार् सुधार्र 

क्रीमियार् के युद्ध की अव्यवस्थार् ने इंग्लैण्ड के सभी नार्गरिकों और प्रशसं कों क ध्यार्न सेनार् सुधार्र की ओर आकषिर्त कियार्। वार्टरलू के युद्ध के बार्द उन्होने अपनी सेनार् को पूर्णत: विस्मतृ कर दियार् थार् और उनक प्रयार्स केवल यह थार् कि सेनार् पर कम व्यय कियार् जार्ये। सेनार् के प्रति अपनी उदार्सीनतार् क परिणार्म उन्होंने क्रीमियार् युद्ध में देखार्। उन्होंने देखार् कि वैलिंगटन की जिस सेनार् ने नेपोलियन महार्न को परार्स्त कियार् थार्, उसमें पहले जैसी यार्ग्े यतार् नहीं थी। अत: देश के काने े-काने े से सेनार्पतियों की आलार्चे नार् की गर्इ तथार् सैनिक सुधार्र की मार्ँग की गर्इ।

Share:

Leave a Comment

Your email address will not be published.

TOP