कोलॉइड विलयन क्यार् है ?
आप विलयनों से परिचित हैं। इनकी हमार्रे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिक है। दूध, मक्खन, पनीर, क्रीम, रंगीन रत्न, बूट पॉलिश, रबर, स्यार्ही आदि अनेक पदाथ हमार्रे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते हैं। वे भी एक प्रकार के विलयन है। उन्हें कोलॉइडी विलयन कहते है।’कोलार्’ क अर्थ है सरेस और ‘आइड’ क अर्थ समार्न है । अर्थार्त् कोलार्इड क अर्थ है – सरेस के समार्न। पार्नी में शर्करार् के विलयन में अथवार् पार्नी में नमक के विलयन में विघमार्न कणों की अपेक्षार् कोलॉइडी विलयन में विघमार्न कणों क आमार्प बड़ार् होतार् है। इस पार्ठ में आप कोलॉइडी विलयनों को बनार्ने की विधियार्ँ, उनके गुणधर्म और अनुप्रयोगों के बार्रे में पढेग़े।

वार्स्तविक विलयन, कोलॉइडी विलयन और निलंबन के बीच भिन्नतार् 

आप जार्नते है। कि पार्नी में शर्करार् क विलयन समार्गं होतार् है, पर दूध में नहीं। दूध को ध्यार्न से देखने पर उसमें तेल की बूंदें तैरती दिखेगी। इसलिए, यघपि वह समार्ंग लगतार् है पर वार्स्तव में वह विशमार्ंग होतार् है। सभी प्रकार के विलयनों क स्वभार्व विलेय कणों के आमार्प पर निर्भर करतार् है। यदि आमार्प 1 से 100 nm के बीच हो तो कोलॉइडी विलयन बनतार् है, जब विलेय कणों क आमार्प 100 nm से अधिक हो तो वह निलंबन के रूप में पार्यार् जार्तार् है। इस प्रकार कोलॉइडी विलयन वार्स्तविक विलयन और निलंबन के बीच की अवस्थार् होती है।

कोलॉइडी विलयन की प्रार्वस्थार्एँ 

कोलॉइडी विलयन विशमार्ंग होते हैं और उनमें कम से कम दो प्रार्वस्थार्एँ होती हैं परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् और परिक्षेपण मार्ध्यम।

  1. परिक्षिप्त प्रार्वस्थार्: वह पदाथ जो कम मार्त्रार् में विघमार्न रहतार् है और इसके कण कोलॉइडी आमार्प (1 से 100 nm) के होते हैं। 
  2. परिक्षेपण मार्ध्यम: यह वह मार्ध्यम है जिसमें कोलॉइडी कण परिक्षिप्त रहते है। पार्नी में, गंधक कोलॉइडी विलयन में गंधक कण परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् बनार्ते हैं और पार्नी परिक्षेपण मार्ध्यम होतार् है। 

ये दो प्रार्वस्थार्एँ : परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् और परिक्षेपण मार्ध्यम, ठोस, द्रव अथवार् गैस हो सकते हैं। इस प्रकार दो प्रार्वस्थार्ओं की भौतिक अवस्थार् के अनुसार्र कोलॉइडी विलयन विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं। सार्रणी में विभिन्न प्रकार के कोलॉइडी विलयन और उनके उदार्हरण दिए गए हैं।

ऊपर दिए गए विभिन्न प्रकार के कोलॉइडी विलयनों में विलय (द्रव में ठोस), जैल (ठोस में जल), और पार्यस (द्रव में द्रव) प्रमुख है। उल्लेखनीय है कि यदि परिक्षेपण मार्ध् यम जल हो तो विलेय को जल विलेय कहते हैं और यदि परिक्षेपण मार्ध्यम ऐल्कोहॉल हो तो विलेय को ऐल्को विलेय कहते है।

कोलॉइडों विलयनों के प्रकार

कोलॉइडों क वर्गीकरण 

कोलॉइडों विलयनों क विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण कियार् जार् सकतार् है-

  1. प्रार्वस्थार्ओं के बीच अन्योन्य क्रियार् के आधार्र पर 
  2. आण्विक आमार्प के आधार्र पर 

1. अन्योन्य क्रियार् के आधार्र पर वर्गीकरण 

परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् और परिक्षेपण मार्ध्यम के बीच अन्योय क्रियार् के आधार्र पर कोलॉइडी विलयनों को दो वर्गो में विभार्जित कियार् जार्तार् है।

  1. द्रवरार्गी कोलॉइड : द्रवरार्गी शब्द क अर्थ है विलार्यक के प्रति बंधुतार्। गोंद, जिलेटिन, स्टाच आदि पदाथो को जब उचित विलार्यक के सार्थ मिलार्यार् जार्तार् है तो वे सीधे कोलॉइडी अवस्थार् में परिवर्तित होकर कोलॉइडी विलयन बनार् लेते है। इस प्रकार प्रार्प्त विलयों को द्रवरार्गी विलय कहते है। इन विलयों क एक महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि यदि परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् को परिक्षेपण मार्ध्यम से पृथक कर दियार् जार्ए तो उसमे परिक्षेपण मार्ध्यम पुन: मिलार्कर विलय को दुबार्रार् बनार्यार् जार् सकतार् है, यही कारण है कि इन विलयों को उत्क्रमणीय विलय कहते है। ये विलय पर्यार्प्त स्थाइ होते है। 
  2. द्रवविरार्गी कोलॉइड : द्रव विरार्गी शब्द क अर्थ है-विलार्यक के प्रति कम बंधुतार् ह और न जैसी धार्तुओं, उनके हार्इड्रोक्सार्इडों अथवार् सल्फार्इडों आदि को जब परिक्षेपण मार्ध्यम में मिलार्यार् जार्तार् है तो वे सीधे कोलॉइडी अवस्थार् में परिवर्तित नहीं होते हैं। उन्हें विशेष विधियों द्वार्रार् बनार्यार् जार्तार् है। ये विलय शीघ्र अवक्षेपित हो जार्ते हैं और इस प्रकार बहुत स्थाइ नहीं होते हैं। उन्हें कोलॉइडी रूप में बने रहने के लिए स्थार्यीकारक की आवश्यकतार् होती है। ये अनुत्क्रमणीय विलय होते हैं, क्योंकि अवक्षेपित होने पर ये विलार्यक के सार्थ मिलकर कोलॉइडी विलयन नहीं बनार्ते हैं। यदि परिक्षेपण मार्ध्यम पार्नी हो तो उसे जलविरार्गी कोलॉइड कहते हैं। 

(2) आण्विक आमार्प के आधार्र पर वर्गीकरण 

आण्विक आमार्प के आधार्र पर कोलॉइडों क वर्गीकरण इस प्रकार है: –

  1. बृहदार्णुक कोलॉइड : इस प्रकार के कोलॉइड में परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् के कणों क आमार्प कोलॉइड कणों के आमार्प के बरार्बर बड़ार् होतार् है। (यार्नि 100 nm) प्रकृतिक वृहदार्णुक कोलॉइडों के उदार्हरण हैं : स्टाच, सेल्यूलोस, प्रोटीन आदि।
  2. बहु अणुक कोलॉइड : इसमें प्रत्येक परमार्णु कोलॉइड के आमार्प क नहीं होतार् पर वे आपस में पुंज बनार्कर (जुड़कर) कोलॉइड़ो के नार्प के अणु बनार्ते है। उदार्हरणाथ : सल्फर विलय में अणुओं के पुंज कोलॉइडों के नार्प के होते हैं।
  3. संघटित कोलॉइड : ये पदाथ कम सार्ंद्रण में सार्मार्न्य विघुत अपघट्यों की तरह कार्य करते है, परन्तु अधिक सार्ंद्रण में संघटित होकर मिसेल बनार्ते हैं जो कि कोलॉइड विलयन की तरह कार्य करते है। सार्बुन इसक उदार्हरण है। सार्बुन लम्बी श्रृंखलार् वार्ले वसीय अम्ल R COONa क सोडियम लवण है। पार्नी में डार्लने पर सार्बुन RCOO- और छंदेतार् है। ये RCOO- आयन मलै के कण के चार्रों ओर संघटित होकर मिसेल बनार्ते है, इसे चित्र में दिखयार् गयार् है। 
संघटित कोलॉइड

कोलॉइडी विलयनों क विरचन 

जैसार् पहले बतार्यार् जार् चुक है द्रवरार्गी विलय बनार्ने के लिए पदाथो को सीधे परिक्षेपण मार्ध्यम के सार्थ मिलार्यार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए स्टाच, जिलेटिन, गोंद आदि के कोलॉइडी विलयन बनार्ने के लिए उन्हें केवल गर्म पार्नी पें घोलार् जार्तार् है। उसी प्रकार सेलूलोस नार्इट्रेट क कोलॉइडी विलय बनार्ने के लिए उसे ऐल्कोहॉल में घोलार् जार्तार् है। प्रार्प्त विलयन को कोलोडियन कहते है। किन्तु द्रवविरार्गी कोलॉइडों को प्रत्यक्ष विधि द्वार्रार् नहीं बनार्यार् जार् सकतार् है। उसे बनार्ने के लिए दो प्रकार की विधियार्ँ काम में लाइ जार्ती हैं। ये है: –

  1. भौतिक विधि
  2. रार्सार्यनिक विधि 

(i) भैतिक विधि : ब्रेडिग आर्क विधि 

इस विधि क इस्तेमार्ल स्वर्ण, रजत, प्लेटिनम आदि धार्तुओं के कोलॉइडी विलयनों को बनार्ने के लिए कियार् जार्तार् है (चित्र )।

भैतिक विधि : ब्रेडिग आर्क विधि

 इसमें पार्नी के पार्त्र में रखे दो धार्त्विक इलेक्ट्रोडों के बीच विघुत आर्क आरम्भ कियार् जार्तार् है। आर्क की उच्च ऊश्मार् धार्तु को वार्ष्प में परिवर्तित कर देती है। यह वार्ष्प ठंडे जल में शीघ्र संघनित हो जार्ती है। इसके फलस्वरूप कोलॉइडी आमार्प के कण बन जार्ते है। इसे स्वर्ण विलय कहार् जार्तार् है।

पेप्टार्इजीकरण: तार्जार् बने अवक्षेप में उपयुक्त विघुत अपघट्य मिलार् कर उसे कोलॉइड में बदलने के प्रक्रम को पेप्टार्इजीकरण कहते है। उदार्हरणाथ, फेरिक हार्इड्रॉक्सार्इड के अवक्षेप में फेरिक क्लोरॉइड मिलार्ने पर फेरिक हार्इड्रॉक्सार्इड भूरे लार्ल रंग की कोलॉइडी विलयन में बदल जार्तार् है। ऐसार् अवक्षेप द्वार्रार् विद्युत अपघ्य के धनार्यन के अधिशोषण के कारण होतार् है। Fe(OH)3 में FeCl3 डार्लने पर, Fe(OH)3 के कण FeCl3 के Fe3+ आयनों को अवशोषित कर लेते हैं। अत: Fe(OH)3 के कण धनार्वेशित हो जार्ते हैं और वे एक दूसरे को प्रतिकर्षित करके कोलॉइडी विलयन बनार्ते हैं।

(ii) रार्सार्यनिक विधि : आक्सीकरण द्वार्रार् : 

गंधक विलय प्रार्प्त करने के लिए H2S गैस क HNO3 अथवार् Br2 जल आदि ऑक्सीकारक विलयन में बुदबुदन कियार् जार्तार् है। अभिक्रियार् इस प्रकार होगी :
Br2 + H2S
_
S+2HBr 2 HNO3 + H2S
2 H2O + 2NO2 + S
रार्सार्यनिक विधि द्वार्रार् Fe(OH)3 विलय, As2S3 विलय भी बनार्ए जार् सकते हैं।

कोलॉइडी विलयनों क शोधन 

जब कोलॉइडी विलयन बनार्यार् जार्तार् है तो बहुधार् उसमें विघुत अपघट्य अपद्रव्य के रूप में मौजूद रहतार् है, जो उसे अस्थार्यीकृत कर देतार् है। अत: कोलॉइडी विलयन के शोधन के लिए निम्नलिखित विधियों क उपयोग कियार् जार्तार् है:-

  1. अपोहन (Dialysis) 
  2. विघुत अपोहन (Electric Dialysis) 

अपोहन: 

अपोहन क प्रक्रम इस तथ्य पर आधार्रित है कि पाचमेंट पत्र यार् सेलोफेन झिल्ली में से कोलॉइडी कण नहीं निकल पार्ते है। लेकिन विघुत अपघट्य के आयन निकल सकते है। कोलॉइडी विलयन को एक डार्यलसिस (सेलोफेन) थैली में लेकर स्वच्छ जल से भरे पार्त्र में लटक दियार् जार्तार् है। अपद्रव्य धीरे-धीरे बार्हर विसरित हो जार्तार् है और थैली में शुद्ध कोलॉइडी विलयन रह जार्तार् है (चित्र) विसरण द्वार्रार् कोलॉइडी कणों को अपद्रव्यों से उपयुक्त झिल्ली से अलग करने के प्रक्रम को अपोहन कहते हैं।

अपोहन

विघुत अपोहन : 

अपोहन प्रक्रम में विघुत के उपयोग से प्रक्रम की दर बढ़ाइ जार् सकती है। जब इलेक्ट्रोड़ों में विघुत प्रवार्ह की जार्ती है तो अपद्रव्य के आयन विपरीत आवेश वार्ले इलेक्ट्रोड की ओर तीव्र गति से विसरित होते है। विघुत प्रवार्ह की उपस्थिति में किए गए अपोहन को विघुत अपोहन कहते हैं। अपोहन क सबसे महत्वपूर्ण उपयोग कृत्रिम वृक्क मशीनों में रूधिर के शोधन के लिए कियार् जार्तार् है। अपोहन झिल्ली में से आयन आदि छोटे कण निकल जार्ते हैं किन्तु हिमोग्लोबिन आदि कोलॉइडी आमार्प के कण झिल्ली में से नहीं निकल पार्ते हैं।

विघुत अपोहन

कोलॉइडों के गुणधर्म 

कोलॉइडों के गुणधर्मो की नीचे चर्चार् की गर्इ है:-

  1. विशमार्ंग लक्षण : कोलॉइडी कण अपने ही सीमार् पृष्ठों में रहते है। जो उन्हें परिक्षेपण मार्ध्यम से पृथक करते है। इस प्रकार कोलॉइडी तंत्र दो प्रार्वस्थार्ओं क विशमार्ंग मिश्रण होतार् है। ये दो प्रार्वस्थार्एँ है: (क) परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् (ख) परिक्षेपण मार्ध्यम 
  2. ब्रार्उनी गति : ब्रार्उनी गति नार्म इसके आविष्कारक रॉबर्ट ब्रार्उन (वनस्पतिज्ञ) के कारण पड़ार्। कोलॉइडी कणों की सतं त और अनियमित टेढ़ी-मेढ़ी गति को ब्रार्उनी गति उत्पन्न होती है। विभिन्न दिशार्ओं से लगने वार्ले बल असमार्न होते हैं इसलिए कणों की गति टेढ़ी मेढ़ी होती है। विलार्यक के अणुओं की कोलॉइडी कणों के सार्थ टक्कर से ब्रार्उनी गति उत्पन्न होती है। 
  3. टिन्डल प्रभार्व : 1869 में टिन्डल ने प्रेक्षण कियार् कि यदि कोलॉइडी विलयन में प्रकाश की तीव्र किरण पुंज प्रविष्ट की जार्ए तो प्रकाश-पथ प्रदीप्त हो जार्तार् है। इस परिघटनार् को टिन्डल प्रभार्व कहते है। यह परिघटनार् कोलॉइडी कणों द्वार्रार् प्रकाश के प्रकीर्णन से होती है । जब सूर्य की किरणों किसी रेखार्छिद्र से अंधेरे कमरे में प्रवेश करती हैं तो यही प्रभार्व दृष्टिगोचर होतार् है। यह हवार् के धूल के कणों द्वार्रार् प्रकाश के प्रकीर्णन से होतार् है।
  4. वैघुत गुणधर्म : कोलॉइडी विलयन के कण विघुत आवेशित होते है। सभी कणों में धन अथवार् ऋण एकसमार्न आवेश होतार् है। परिक्षेपण मार्ध्यम क समार्न और विपरीत आवेश होतार् है, इसलिए कोलॉइडी कण एक दूसरे क प्रतिकर्शण करते है और एकत्र हार्के र नीचे नहीं बैठते हैं। उदार्हरण के लिए आसेनियस सल्फार्इड विलय, स्वर्ण विलय, रजत विलय आदि में ऋण आवेशित कोलॉइडी कण होते हैं जबकि फेरिक हार्इड्रॉक्सार्इड, ऐल्युमिनियम हार्इड्रार्क्सार्इड आदि में धन आवेशित कोलॉइडी कण होते है। कोलार्इडी कणों के आवेशित होने के अनेक कारण है। 
    1. कोलॉइडी कणों द्वार्रार् धनार्यनों अथवार् ऋणार्यनों क अधिषोषण
    2. मिसेल आवेशित होते हैं 
    3. कोलॉइडों के विरचन के दौरार्न, मुख्यतार् ब्रेडिग आर्क विधि में कोलॉइड कण इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण कर आवेशित हो जार्ते है। कोलॉइडी कणों पर आवेश की उपस्थिति को वैघुत कण संचलन प्रक्रम द्वार्रार् दिखार्यार् जार् सकतार् है। वैघुत कण संचलन प्रक्रम में कोलॉइडी कण विघुत प्रवार्ह के प्रभार्व से कैथोड अथवार् एनोड की तरफ गतिशील होते हैं। 

कोलॉइडी विलयन के अनुप्रयोग 

कोलॉइडों की हमार्रे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिक है। उनके कुछ अनुप्रयोगों की यहार्ँ चर्चार् की गर्इ है।

  1. मल व्यवस्थार्: धूल, हवार् आदि के कोलॉइडी कणों में विघुत आवेश होतार् है। जब मल को उच्च विभव पर रखी धार्तु की प्लेटों के बीच प्रवार्हित कियार् जार्तार् है तो कोलॉइडी कण विपरीत आवेशित इंलेक्ट्रोड की ओर जार्ते हैं और वहार्ँ अवक्षेपित हो जार्तार् है। इससे मल-जल क शोधन हो जार्तार् है।
  2. कुओं के पार्नी क शोधन: जब पंकिल जल में फिटकरी मिलाइ जार्ती है तो कोलॉइड के ऋणार् आवेशित कण फिटकरी के AL3 आयनों द्वार्रार् उदार्सीन हो जार्ते है। इस प्रकार पंक कण नीचे बैठ जार्ते है और पार्नी को छार्न कर इस्तेमार्ल कियार् जार् सकतार् है।
  3. धूम्र अवक्षेपण: धूम्र कण वार्स्तव में हवार् में कार्बन के विघतु आवेशित कोलॉइडी कण होते है। इस कार्बन क अवक्षेण कॉट्रेल अवक्षेपण द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। चिमनी से निकलने वार्ले धुएँ को एक कक्ष में प्रविष्ट करार्यार् जार्तार् है। कक्ष में अनेक धार्तु प्लेटें एक धार्तु के तार्र से जुड़ी रहती है। यह तार्र उच्च विभव स्त्रोत से जुडाऱ् रहतार् है । धुएँ के आवेशित कण विपरीत आवेश वार्ले इलेक्ट्रोड की ओर आकृष्ट होकर अवक्षेपित हो जार्ते है। और गरम स्वच्छ वार्यु बार्हर निकल जार्ती है।
  4. फोटोग्रार्फी : जिलेटिन में सिल्वर ब्रोमार्इड के कोलॉइडी विलयन को काँच की प्लेंटो अथवार् सेलुलार्इड फिल्मों पर प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। इस प्रकार फोटोग्रार्फी में प्रयोग होनेवार्ली सुग्रार्ही फिल्में प्रार्प्त होती है। 
  5. रूधिर आतंचन : रूधिर, कोलॉइडी विलयन है जो ऋण आवेशित होतार् है। Fecl3 विलयन प्रयुक्त करने पर रूधिर क बहनार् बंद हो जार्तार् है और रूधिर आतंचन हो जार्तार् है। इसक कारण यह है कि Fe3+ आयन रूधिर के कोलॉइडी कणों के आवेश को उदार्सीन कर देते हैं जिससे आतंचन हो जार्तार् है।
  6. रबर पट्टन : लेटेक्स, ऋण आवेशित रबर कणों क कोलॉइडी विलयन होतार् है। जिस वस्तु को रबर पट्टन करनार् हो उसे रबर पटट्न बार्थ में एनोड बनार्यार् जार्तार् है। ऋण आवेशित रबर कण एनोड की ओर जार्ते हैं और उस पर निक्षेपित हो जार्ते है। 
  7. आकाश क नीलार् रंग : क्यार् आपने कभी सोचार् कि आकाश क रंग नीलार् क्यों होतार् है। इसक कारण यह है कि आकाश में तैरने वार्ले कोलॉइडी धूल कण नीले प्रकाश क प्रकीर्णन करते है। जिससे आकाश क रगं नीलार् दिखाइ देतार् है। यदि आकाश में कोलॉइड कण न होते तो पूरार् आकाश अंधकारपूर्ण लगतार् ।

पार्यस और जैल 

पार्यस वे कोलॉइड विलयन होते हैं जिनमें परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् और परिक्षेपण मार्ध्यम दोनों ही दव्र होते है। दोनों द्रव एक दूसरे में अमिश्रणीय होते है, क्योंकि मिश्रणीय होने पर वे वार्स्तविक विलयन बनार् देगे । पार्यस दो प्रकार के होते है: 

  1. पार्नी में तेल क पार्यस: यहार्ँ परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् और परिक्षेपण मार्ध्यम पार्नी होतार् है। इसक उदार्हरण दूध है। क्योकि दूध में द्रव वसार् पार्नी में परिक्षिप्त होती है। इसक दूसरार् उदार्हरण चेहरे पर लगार्ने वार्ली क्रीम है।
  2. तेल में पार्नी : इसमें परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् पार्नी और परिक्षेपण मार्ध्यम तेल होतार् है। मक्खन, कॉड लिवर तेल, कोल्ड क्रीम आदि इसके उदार्हरण है। रखने पर अमिश्रणीय होने के कारण पार्यस के दोनो द्रव यार्नि तेल और पार्नी अलग हो जार्ते हैं। इसलिए पयार्स को स्थाइ बनार्ने के लिए इसमें पार्यसीकरण मिलार्ए जार्ते हैं। सार्बुन एक उपयोगी पार्यसीकरण है। पार्यसीकरण की उपस्थिति में पार्यस बनने के प्रक्रम को पार्यसीकरण कहते हैं। पार्यसीकरण कैसे कार्य करतार् है? पार्यसीकरण तेल और पार्नी के अंतरार्पृष्ठ पर सार्ंद्रित होकर उन्हे बार्ंध देतार् है। 

पार्यस के अनुप्रयोग  

पार्यस हमार्रे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते है। कुछ अनुप्रयोग नीचे दिए जार् रहे है: 

  1. कपड़ों और शरीर पर से मैल धोने की सार्बुन और संश्लेशित अपमाजक की प्रक्रियार्, तेल और पार्नी के पार्यस बनने पर ही आधार्रित है। 
  2. दूध, पार्नी और वसार् क पार्यस हैं। मक्खन और क्रीम भी पार्यस है। 
  3. विभिन्न प्रकार की चेहरे की क्रीम और लोशन भी पार्यस है। 
  4. कॉड लिवर तेल जैसी तलीय औशधि जल्दी और बेहतर अवशोषण के लिए पार्यस के रूप में दी जार्ती है। कुछ मरहम भी पार्यसीकरण द्वार्रार् होतार् है। 
  5. आंतों में वसार् क पार्यन भी पार्यसीकरण द्वार्रार् होतार् है। 
  6. सल्फार्इड अयस्क के शोधन के लिए प्रयुक्त फेन प्लवन प्रक्रम में उसक तेल क पार्यस के सार्थ उपचार् कियार् जार्तार् है। मिश्रण को संपीडित वार्यु से प्रक्षेपित करने पर अयस्क कण पृष्ठ पर आ जार्ते हैं, तब उन्हें अलग कर लियार् जार्तार् है। 

जैल – 

जिन कोलॉइडों में परिक्षिप्त प्रार्वस्थार् द्रव और परिक्षेपण मार्ध्यम ठोस होतार् है उन्हें जैल कहते है। पनीर, जैल, बूट, पॉलिश, जैल के उदार्हरण है। अधिकतर उपयोग होनेवार्ले जैल जलरार्गी कोलॉइडी विलयन होते है, जिनक तनु विलयन उचित परिस्थितियों में लचीले अर्धठोस पदाथ में बदल जार्तार् है। उदार्हरण के लिए जिलेटिन क पार्नी में 5 प्रतिशत जलीय विलयन ठंडार् करने पर जैली क ब्लार्क बन जार्तार् है। रखने पर जैल उसमें उपस्थित कुछ द्रव खो देते हैं और सिकुड जार्ते है। इसे संकोच पाथक्य यार् रखने पर जमनार् कहते है। 

जैल दो प्रकार के होते है – लचीले जैल और अलचीले जैल। 

लचीले जलै उत्क्रमणीय होते है। पार्नी खोने पर जैसे वे जमते है पार्नी मिलार्ने पर वे वार्पिस मूल अवस्थार् में आ जार्ते है। अलचीले जैल अनुत्क्रमणीय होते है। जैल कर्इ प्रकार से उपयोग में आते है। सिलिका, पनीर, जैली, बूट पॉलिश, दही, काफी उपयोग होनेवार्ले जैल है। ठोस एल्कोल र्इधन, ऐल्कोहल क कैल्सियम एसिटेट में जैल है।

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