कोयले की उत्पत्ति, प्रकार एवं सरंक्षण

कोयले की उत्पत्ति-

कोयलार् एक नवीनीकृत अयोग्य जीवार्श्म र्इंधन है। प्रार्चीनकाल में पृथ्वी के विभिन्न भार्गों में सघन दलदली वन थे जो भूगर्भीय हलचलो के कारण भूमि में दब गये। कालार्न्तर में दलदली वनस्पति ही कोयले में परिवर्तित हो गर्इ। क्रमश: ऊपर की मिट्टी, कीचड़ आदि के भार्र से तथार् भूगर्भ के तार्प से उसी दबी हुर्इ वनस्पति ने कोयले की परतों क रूप ले लियार्। करोड़ो वर्षो के बार्द बहुत से क्षे़त्रों में उत्थार्न होने और शैलों के अनार्च्छदित होने के कारण, कोयले की भूमिगत परतें पृथ्वी की ऊपरी सतह पर दिखलाइ देने लगीं ।

वर्तमार्न काल में संसार्र की 40 प्रतिशत औद्योगिक शक्ति कोयले से प्रार्प्त होती है। अब कोयले क प्रयोग कृत्रिम पेट्रोल बनार्ने में तथार् कच्चे मार्लों की तरह भी कियार् जार् रहार् है। यद्यपि पिछली चौथाइ शतार्ब्दी में शक्ति के अन्य संसार्धनों (पेट्रोलियम, प्रार्कृतिक गैस, जल-विद्युत और अणु शक्ति) के प्रयोग में वृद्धि होने के कारण कोयले की खपत कम होती जार् रही है, फिर भी लोहार् इस्पार्त निर्मार्ण तथार् तार्प विद्युत उत्पार्दन में कोयले क कोर्इ विकल्प नहीं है ।

कोयलार् क उपयोग- 

कोयले क उपयोग लिपिस्टिक तथार् सुंगधित तेलों जैसे- प्रसार्धन की वस्तुयें नार्यलोन, डेकोन, जैसे सूक्ष्म धार्गे वार्ले वस्त्र, प्लार्स्टिक टूथ ब्रष, बटन, वार्टर प्रूफ कागज अमोनियार् जैसे वस्तुयें नेफ्थेलिन कोक, कोलतार्र (डार्मर, फिनार्यल, बे्रन्जील) कृ़ित्रम रबर, कृत्रिम पेट्रोलियम, रंग पेंट, सेक्रीन, दूध, दवाइयों, फोटो कलर, कोयले की हार्इड्रोजनीकरण क्रियार् से पेट्रोल प्रार्प्त कियार् जार्तार् हैं। धार्तुओ को गलार्ने तार्प, शक्ति क निर्मार्ण कियार् जार्तार् हैं। भार्प शक्ति आदि के कार्य में इसकी उपयोग कियार् जार्तार् हैं।

कोयले के प्रकार-

कार्बन की मार्त्रार् के अनुसार्र कोयलार् चार्र प्रकार क होतार् है –

  1. एन्थ्रेसेसार्इट :- यह सबसे अच्छार् कोयलार् है । इसमें 90 से 96 प्रतिशत काबर्न होती है। इसके जलने से बहुत अधिक तार्प उत्पन्न होतार् है। 
  2. बिटुमिनस कोयलार् :- इसमें काबर्न की मार्त्रार् 70 से 90 प्रतिशत होती । 
  3. लिग्नार्इट कोयलार् :- इसमें 45 से 70 प्रतिशत काबर्न होतार् है । 
  4. पीट कोयलार् :- इसमें 55 प्रतिशत काबर्न पार्यार् जार्तार् है । 

    कोयले क सरंक्षण- 

    1. कोयलार् खनन की अनुपयुक्त विधियों के द्वार्रार् बहुत सी मार्त्रार् क क्षय होतार् है, उसे यथार्सम्भव कम करनार् चार्हिए। 
    2. जिन कारखार्नों, फैक्ट्रियों, निर्मार्णशार्लार्ओं और इंजन आदि की भट्टियों में कोयलार् जलार्यार् जार्तार् है, उनमें कोयलार् जलार्ने की दक्षतार् को अधिकाधिक बढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए। 
    3. कोयले से कोक क निर्मार्ण करने में भी कोयले की कुछ मार्त्रार् क्षयित हो जार्ती है। इसको यथार्सम्भव दूर कियार् जार्नार् चार्हिए। 
    4. जिन भार्प के इंजनों में और स्टीम टर्बार्इनों में अभी तक भार्प बनार्ने की पुरार्नी प्रणार्लियों क प्रयोग कियार् जार्तार् है, उनकी दक्षतार् में सुधार्र होनार् आवश्यक है ।

    भार्रत के कोयलार् क्षेत्र –

    एशियार् में कोयलार् भण्डार्र और उत्पार्दन में चीन के बार्द दूसरार् स्थार्न भार्रत क ही है। भार्रत विश्व क चौथार् बड़ार् कोयलार् उत्पार्दक देश है। भार्रत क कोयलार् अधिकतर बिटुमिनस किस्म क है, कुछ एन्थ्रेसार्इट हैं और थोड़ी मार्त्रार् में लिग्नार्इट के भण्डार्र भी हैं। भार्रत में लगभग 12,000 करोड़ मीटरी टन, बिटुमिनस कोयलार् है, और लगभग 250 करोड़ टन लिग्नार्इट (भूरार् कोयलार्) है। भू-वैज्ञार्निकों क अनुमार्न है कि 600 मीटर की गहराइ तक भार्रत के कोयलार् भण्डार्र की रार्शि लगभग 11,950 करोड़ मीटरी टन है। भार्रत में कोयलार् पेटियॉं 2 युगों की हैं-

    1. गोंडवार्नार् कोयलार् क्षेत्र (जो परमो- काबोनीफरैस युग के हैं) – बिहार्र, बंगार्ल, उड़ीसार्, मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश में नदियों के बेसिनों में स्थित हैं। इनमें भार्रत क लगभग 98 प्रतिशत कोयलार् भण्डार्र है। यह बिटुमिनस प्रकार क है।
    2. टर्शियरी कोयलार् क्षेत्र- असम, बीकानेर (रार्जस्थार्न), जम्मू-कश्मीर और तमिलनार्डु में है। 
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