कैसर विलियम द्वितीय की विदेश नीति

विलियम प्रथम की मृत्यु के उपरार्न्त उसक पुत्र फैड्रिक तृतीय जर्मनी के रार्ज्य-सिंहार्सन पर 9 माच 1888 र्इ. को आसीन हुआ। किन्तु केवल 100 दिन रार्ज्य करने के बार्द उसकी मृत्यु हो गर्इ। उसकी मृत्यु होने पर उसक पुत्र विलियम द्वितीय रार्ज्य सिंहार्सन पर आसीन हुआ। वह एक नवयुवक थार्। उसमें अनेक गुणार्ं े और दुर्गुणों क सम्मिश्रण थार्। वह कुशार्ग्र बुद्धि, महत्वकांक्षी आत्मविश्वार्सी तथार् असार्धार्रण नवयुवक थार्। वह स्वार्थ्र्ार्ी और घमण्डी थार् तथार् उसक विश्वार्स रार्जार् के दैवी सिद्धार्ंत में थार्। किसी अन्य व्यक्ति के नियंत्रण में रहनार् उसको असह्य थार् जिसके कारण कुछ ही दिनों के उपरार्ंत उसकी अपने चार्ंसलर बिस्माक से अनबन हो गर्इ। परिस्थितियों से बार्ध्य होकर बिस्माक को त्यार्ग-पत्र देनार् पड़ार्। बिस्माक के पतन के उपरार्ंत विलियम ने समस्त सत्तार् को अपने हार्थों में लियार् और उसके मंत्री आज्ञार्कारी सेवक बन गये और वह स्वयं क शार्सन क कर्णधार्र बनार्।

विदेश नीति के उद्देश्य

कैसर विलियम द्वितीय की विश्व नीति के निम्नलिखित तीन मुख्य उद्देश्य थे –

  1. भूमध्य-सार्गर में प्रभार्व-क्षेत्र स्थार्पित करनार् 
  2. औपनिवेशिक मार्मलों में रूचि एवं दृढ़ नीति 
  3. शक्तिशार्ली नौ-सेनार् क निर्मार्ण

उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति करने के अभिप्रार्य से कैसर विलियम।। ने जर्मनी की ‘विदेश नीति’ क संचार्लन करनार् आरंभ कियार्। प्रथम उद्देश्य के कारण आस्ट्रियार् के सार्थ घनिष्ट मेल आवश्यक थार्, क्योंकि वह भी उसी दिशार् में बढ़ कर सैलोनिक के बन्दरगार्ह पर अधिकार करनार् चार्हतार् थार्। इसक अर्थ थार् मध्य यूरोप के कूटनीतिज्ञ गुट को सुदृढ़ बनार्नार्, आस्ट्रियार् और रूस के हितों में संघर्ष होने के कारण इसक अर्थ रूस से अलग हटनार् और अन्त में उसे अपनार् विरोधी बनार् लेनार् भी थार्। दूसरे उद्देश्य की पूर्ति क अर्थ थार् संसार्र में जहार्ं कहीं भी आवश्यक हो, विश्ेार्षकर अफ्रीक में, जर्मनी की शक्ति क प्रदर्शन करनार्।’ इस संबंध में मोरक्को ने फ्रार्ंस को दो बार्र 1905 इर्. और 1911 र्इ. में चुनौती दी। तीसरे उद्देश्य की पूर्ति क स्पष्ट परिणार्म थार् इंगलैंड के सार्थ तीव्र प्रतिस्पर्द्धार् और वैमनस्य। सार्रार्ंश में इस नर्इ नीति क स्वार्भार्विक परिणार्म होनार् थार्, रूस, फ्रार्ंस और इंगलैंड की शत्रुतार् और अंत में इन तीनों क उसके मुकाबले में एकत्रित हो जार्नार्, अर्थार्त् बिस्माक के समस्त कार्य क विनार्श। विलियम।। ने अपनी नीति से उसकी समस्त व्यवस्थार् को नष्ट कर दियार्। तीन वर्ष के अंदर रूस जर्मनी से अलग हो गयार् और बार्द में फ्रार्ंस से संधि करके उसने उसके एकाकीपन क अंत कर दियार्। 6 वर्ष के अंदर इंगलैंड शत्रु बन गयार्। मोरक्को में हस्तक्षेप करने से फ्रार्ंस से शत्रुतार् और बढ़ गर्इ और 1907 र्इ. तक जर्मनी, आस्ट्रियार् तथार् इटली के त्रिगुट के मकु ार्बले में फ्रार्ंस, रूस और इंगलैंड की त्रिरार्ष्ट्र मैत्री स्थार्पित हो गर्इ। इटली क त्रिगुट से संबंध भी शिथिल पड़तार् जार् रहार् थार् किन्तु विलियम।। ने इस दिशार् में कोर्इ प्रयार्स नहीं कियार्।

रूस के प्रति नीति

1890 र्इ. में पुनरार्श्वार्सन संधि की पुनरार्वृत्ति होने वार्ली थी जो बिस्माक द्वार्रार् जर्मनी और रूस में हुर्इ थी। जबकि विलियम रूस की अपेक्षार् आस्ट्रियार् से सुदृढ़ संबंध स्थार्पित करनार् चार्हतार् थार् जिससे वह बार्लकन में होकर पूर्वी भमू ध्यसार्गर को अपने प्रभार्व क्षत्रे में लार्ने में सफल हो सक।े रूस ने भी इस पुनरार्श्वार्सन संधि की पुनरार्वृत्ति को यह कहकर मनार् कर दियार् कि ‘सन्धि बड़ी पेचीदार् है और इसमें आस्ट्रियार् के लिये धमकी मौजूद है जिसके बड़े अनिष्टकारी परिणार्म हो सकते हैं।’’

नीति क परिणार्म

पुनरार्श्वार्सन सन्धि की पुनरार्वृत्ति के न होने क स्पष्ट परिणार्म यह हुआ कि रूस अकेलार् रह गयार्। उसको अपने एकाकीपन को दूर करने के लिये एक मित्र की खोज करनी अनिवाय हो गर्इ। अब उसके सार्मने उसके शत्रु इंगलैंड और फ्रार्ंस ही थे। किन्तु अपनी परिस्थिति से बार्ध्य होकर वह फ्रार्ंस से मित्रतार् करने की ओर आकर्षित हुआ और उससे मित्रतार् करने क प्रयत्न करने लगार्। अन्त में, 1895 र्इमें दोनों देशों में संधि हुर्इ जो द्विगुट संधि के नार्म से प्रसिद्ध है। इस संधि से फ्रार्ंस को अत्यधिक लार्भ हुआ और उसक अकेलार्पन समार्प्त हो गयार्।

जर्मनी को विश्व भार्क्त बनार्नार्

विलियम बड़ार् महत्वकांक्षी थार्। वह जर्मनी को यूरोप क भार्ग्य-निर्मार्तार् ही नहीं, वरन् विश्व क भार्ग्य-निर्मार्तार् बनार्नार् चार्हतार् थार्। बिस्माक विश्व के झगड़ों से जर्मनी को अलग रखनार् चार्हतार् थार्, किन्तु विलियम ने यूरोप के बार्हर के झगड़ों में हस्तक्षपे करनार् आरंभ कर दियार्। वह केवल बार्लकन प्रार्यद्वीप में ही जर्मन-प्रभार्व से संतुष्ट नहीं थार्, वरन् वह तो उसको विश्व-शक्ति के रूप में देखनार् चार्हतार् थार्। इसी उद्देश्य के लिए 1890 र्इ. के उपरार्ंत जर्मनी की वैदेशिक नीति में विश्व-व्यार्पी नीति क समार्वश्े ार् हुआ। विलियम के अनेक भार्षण्ज्ञों से उसके इन विचार्रों क दिग्दशर्न होतार् है। उसने इन प्रदश्े ार्ों को अपने अधिकार में कियार् – (1) 1895 र्इ. में जब जार्पार्न ने चीन को परार्स्त कर उससे लियार्ओतुंग प्रार्यद्वीप तथार् पोर्ट आर्थर पर अधिकार करनार् चार्हार् तो जर्मनी ने रूस और फ्रार्ंस से मिलकर उस पर दबार्व डार्लार् कि वह इनको अपने अधिकार में न करे।ं (2) 1897 र्इ. जर्मनी ने कियार्ओचार्ऊ पर अधिकार कियार्। (3) अगले वर्ष उसने चीन को बार्ध्य कर कियार्ओचार्ऊ तथार् शार्न्तुंग के एक भार्ग क 99 वर्ष के लिए पट्टार् लिखवार्यार्। (4) 1899 र्इ. में बार्क्े सरों क दमन करने के लिए जो सेनार् यूरोपीय देशों से भेजी गर्इ उसक सेनार्पतित्व करने क गौरव एक जर्मन को प्रार्प्त हुआ। (5) 1899 र्इ. में उसने स्पने से करोजिन द्वीप क्रय कियार्। (6) 1900 र्इ. में संयुक्त रार्ज्य और इंगलैंड से समझौतार् कर उसने सेमार्अे ार् द्वीप समूह के कुछ द्वीपों पर अधिकार कियार्।

जर्मनी और टर्की

विलियम टर्की को अपने प्रभार्व-क्षेत्र के अंतर्गत लार्नार् चार्हतार् थार् और यह उसकी विश्व नीति क एक प्रमुख अंग थार्। इंगलैंड भी इस ओर प्रयत्नशील थार्। वह किसी यूरोपीय रार्ष्ट्र क प्रभुत्व टर्की में स्थार्पित नहीं होने देनार् चार्हतार् थार्, क्योंकि एसे ार् होने से उसके भार्रतीय सार्म्रार्ज्य को भय उत्पन्न हो सकतार् थार्। 1878 र्इ. की बर्लिन-कांग्रेस तक टर्की पर इंगलैंड क प्रभुत्व रहार् और जब कभी भी किसी यूरोपीय रार्ष्ट्र ने उस ओर प्रगति करने क विचार्र कियार् तो इंगलैंड ने उसक डटकर विरोध कियार्, परन्तु सार्इप्रस के समझौते के उपरार्ंत उसक प्रभार्व टर्की पर से कम होने लगार्। जब इंगलैंड क 1882 र्इ. में मिस्र पर अधिकार हुआ तो इंगलैंड और टर्की के मध्य जो रही-सही सद्भार्वनार् विद्यमार्न थी उसक भी अंत होनार् आरंभ हो गयार्। अब विलियम द्वितीय ने इस परिस्थिति क लार्भ उठार्कर टर्की को अपने प्रभार्व-क्षत्रे में लार्ने क पय्र त्न कियार्। इस संबधं में उसने निम्न उपार्यों किये- (1) 1889 र्इ. में विलियम कुस्तुन्तुनियार् पहुंचार् और उसने टर्की के सुल्तार्न अब्दुल हमीद से भंटे की और उससे मित्रतार् क हार्थ बढ़ार्यार्। (2) 1898 र्इ. में वह दूसरी बार्र कुन्तुन्तुनियार् गयार् और टर्की के सुल्तार्न से भंटे करने के उपरार्ंत जैरूसलम गयार् और वहार्ं से दमिश्क गयार्। दमिश्क के एक भार्षण में उसने मुसलमार्नों को यह आश्वार्सन दियार् कि जर्मन सम्रार्ट सदार् उनक मित्र रहेगार्। उसके भार्षण ने समस्त यूरोपीय रार्ष्ट्रों को चिन्तार् में डार्ल दियार्, क्योंकि संसार्र के अधिकांश मुसलमार्न विभिन्न यूरोपीय देशों की प्रजार् के रूप में रहते थे। (3) 1902 र्इ. में जर्मनी क एक समझौतार् टर्की से हुआ जिसके अनुसार्र जर्मनी की एक कम्पनी को कुस्तुन्तुनियार् से बगदार्द तक रेल बनार्ने की आज्ञार् प्रार्प्त हुर्इ। जर्मनी क उद्देश्य बर्लिन से कुस्तुन्तुनियार् तक रेल बनार्ने क भी थार्। इस माग के खुल जार्ने से जर्मनी क सम्पर्क फार्रस की खार्ड़ी तक हो जार्तार् जो इंगलैंड के भार्रतीय सार्म्रार्ज्य के लिए विशेष चिन्तार् क विषय बन जार्तार्। विलियम टर्की को अपनी ओर आकर्षित करने में अवश्य सफल हुआ, किन्तु उसने अपनी इस नीति से रूस, फ्रार्ंस और इंगलैंड को अपनार् शत्रु बनार् लियार् जबकि टर्की की शक्ति इन तीनों बड़े रार्ष्ट्रों के सार्मने नगण्य थी। विलियम की इस नीति को सफल नीति नहीं कहार् जार् सकतार्। उसने तीनों रार्ष्ट्रों को एक सार्थ अप्रसन्न कियार् जिसक परिणार्म यह हुआ कि त्रिदलीय गुट क निर्मार्ण संभव हो गयार्।

इंगलैंड और जर्मनी

1890 र्इ. तक जर्मनी और इंगलैंड के संबंध अच्छे थे, किन्तु जब विलियम द्वितीय के शार्सनकाल में जर्मनी ने विश्व-व्यार्पी नीति को अपनार्नार् आरंभ कियार् तो जर्मनी और इंगलैंड के संबंध कटु होने आरंभ हो गये। बिस्माक के पद त्यार्ग करने के उपरार्ंत विलियम ने जर्मनी की नौ-सेनार् में विस्तार्र करनार् आरंभ कियार् तो इंगलैंड जर्मनी की बढ़ती हुर्इ शक्ति से सशंकित होने लगार् थार्। कुछ समय तक दोनों में मैत्री क हार्थ बढ़ार्, किन्तु 1896 र्इ. के उपरार्ंत दोनों के संबंध कटु होने आरंभ होते गये। जब विलियम ने ट्रार्न्सवार्ल के रार्ष्ट्रपति क्रुजर को जेम्स के आक्रमण पर विजय प्रार्प्त करने के उपलक्ष में बधाइ क तार्र भेजार्। इस तार्र से इंगलैंड की जनतार् में बड़ार् क्षेार्भ उत्पन्न हुआ। महार्रार्नी विक्टोरियार् ने भी अपने पौत्र विलियम द्वितीय के इस कार्य की बड़ी निन्दार् की। इस समय इंगलैंड ने जर्मनी से संबंध बिगार्ड़नार् उचित नहीं समझार्, क्योंकि ऐसार् करने पर वह अकेलार् रह जार्तार्। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने जर्मनी से अच्छे संबंध स्थार्पित करने क प्रयत्न कियार्। 1898 र्इ. में अफ्रीक के संबंध में तथार् 1899 र्इ. में सेनार्ओं के संबधं में दोनों देशों के समझौते भी हुए। उसी वर्ष इंगलैंड के उपनिवेश मंत्री जोसेफ चेम्बरलेन ने इंगलैंड, जर्मनी और संयुक्त रार्ज्य के एक त्रिगुट के निर्मार्ण क प्रस्तार्व कियार्, किन्तु 1899 र्इ. में ब्यूलो ने जो इस समय जर्मनी क प्रधार्नमंत्री थार्, इस प्रस्तार्व को स्वीकार नहीं कियार्। उसक इस प्रस्तार्व के अस्वीकार करने क कारण यह थार् कि इसके द्वार्रार् इंगलैंड क आशय यह है कि आगार्मी युद्धों में जर्मनी, इंगलैंड क पक्ष ले और उसके समर्थक के रूप में युद्ध में भार्ग ले और इंगलैंड यूरोपीय महार्द्वीप से निश्ंिचत होकर एशियार् तथार् अफ्रीक में अपने सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र करतार् रहे। ब्यूलो क यह विचार्र थार् कि ‘जर्मनी की औपनिवेशिक, व्यार्पार्रिक तथार् नार्विक उन्नति से इंगलैंड को असुविधार् होनार् अनिवाय थी और कभी भी दोनों में युद्ध छिड़ सकतार् है। अत: जर्मनी की नीतियों द्वार्रार् इंगलैंड भली प्रकार समझ गयार् कि जर्मनी पर अधिक विश्वार्स करनार् इंगलैंड के लिए घार्तक सिद्ध होगार् और वार्स्तव में एक दिन ऐसार् अवश्य आएगार् जब इंगलैंड और जर्मनी क युद्ध होगार्।

एल्जीसिरार्ज क सम्मेलन

जनवरी 1906 र्इ. में स्पेन के एल्जीसिरार्ज में मोरक्को के प्रश्न पर एक अन्तर्रार्ष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। तीन महीने के वार्द-विवार्द के उपरार्ंत एल्जीसिरार्ज अधिनियम बनार् जिसके द्वार्रार् निम्न बार्तें निश्चित हुर्इ – (1) मोरक्को को स्वतंत्र रार्ज्य स्वीकार करनार्। (2) मोरक्को के सुल्तार्न को स्वतंत्र घोषित कियार् गयार्। (3) समस्त विदेशी रार्ज्यों को व्यार्पार्र करने के समार्न अधिकार प्रदार्न किए गए। (4) एक अन्तर्रार्ष्ट्रीय बैंक की व्यवस्थार् की गर्इ। (5) फ्रार्ंस और स्पेन को मोरक्को की सुरक्षार् के लिये पुलिस-व्यवस्थार् स्थार्पित करने क अधिकार प्रार्प्त हो गयार्।
एल्जीसिरार्ज-सम्मेलन क परिणार्म इस सम्मेलन में जर्मनी की आंशिक सफलतार् और असफलतार् दोनों हुर्इ। इसी कारण ब्यूलो ने कहार् कि हम न विजयी हुये और न परार्जित। फ्रार्ंस को भी कुछ लार्भ और हार्नि हुर्इ। फ्रार्ंस को लार्भ इस दशार् में हुआ कि मोरक्को की सुरक्षार् क भार्र उस पर सौंपार् गयार् और इसके द्वार्रार् वह मोरक्को में अपनार् प्रभार्व-क्षेत्र विस्तृत करने में सफल हो सकेगार्। जर्मनी को सबसे बड़ी हार्नि यह हुर्इ कि उसने जो अपनार् व्यवहार्र सम्मेलन में प्रदर्शित कियार् उससे सब रार्ष्ट्रों की सहार्नुभूति फ्रार्ंस के सार्थ हो गर्इ। जर्मनी की इच्छार् थी कि फ्रार्ंस और इंगलैंड की मैत्री क अंत कर दे, किन्तु उसको अपने इस उद्देश्य में सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ। अब तक जो स्थाइ मैत्री दोनों देशों के बीच नहीं हो पार्यी थी उसके लिए अब अवसर प्रार्प्त हो गयार्, क्योंकि अब इंगलैंड जर्मनी की महत्वकांक्षार्ओं से चिन्तित हो गयार्।

पूर्वी समस्यार् में रूचि

फ्रार्ंस और रूस के मध्य मित्रतार् की स्थार्पनार् हो चुकी थी, अब फ्रार्ंस द्वार्रार् रूस और इंगलैंड की मित्रतार् क कार्य आरंभ हुआ। 1907 र्इ. में फ्रार्ंस के प्रयत्न से रूस और इंगलैंड क गुट तैयार्र हो गयार्। यह गुट रक्षार्त्मक थार् किन्तु जर्मन सम्रार्ट विलियम।। को इसके निर्मार्ण से बड़ी चिन्तार् हुर्इ। अब उसने अपनार् ध्यार्न इस गुट के अंत करने की ओर विशेष रूप से आकर्षित कियार्। इसी समय जर्मनी को पूर्वी समस्यार् में हस्तक्षपे करने तथार् रूस को अपमार्नित करने क अवसर प्रार्प्त हुआ। 1908 र्इ. टर्की में एक आन्दोलन हुआ जो युवार् तुर्क आन्दोलन के नार्म से प्रसिद्ध है। शीघ्र ही आस्ट्रियार् ने बॉस्नियार् तथार् हर्जेगोविनार् अधिकार कर लियार्। सर्बियार् यह सहन नहीं कर सक और उसने युद्ध की तैयार्री करनार् आरंभ कर दियार्। उसको यह आशार् थी कि आस्ट्रियार् तथार् जर्मनी के विरूद्ध रूस और इंगलैंड उसकी सहार्यतार् करने की उद्यत हो जार्येगं ,े किन्तु रूस की अभी ऐसी स्थिति नहीं थी। आस्ट्रियार् ने सर्बियार् के सार्थ बड़ार् कठोर व्यवहार्र कियार् जिसके कारण युद्ध क होनार् अनिवाय सार् दिखने लगार्, किन्तु जब जर्मनी ने स्पष्ट घोषणार् कर दी कि यदि रूस सर्बियार् की किसी प्रकार से सहार्यतार् करेगार्, तो वह युद्ध में आस्ट्रियार् की पूर्ण रूप से सहार्यतार् करने को तैयार्र है। इस प्रकार युद्ध टल गयार्। इस समय रूस में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह जर्मनी और आस्ट्रियार् की सम्मिलित सेवार्ओं क सफलतार्पूर्वक सार्मनार् कर सकतार्। रूस को बार्ध्य होकर दब जार्नार् पड़ार् और जमर्न रार्जनीति बार्लकन प्रार्यद्वीप में सफल हुर्इ।

फ्रार्ंस और रूस में समझौतार्

यद्यपि जर्मन-सम्रार्ट विलियम बार्लकन प्रदेश में रूस को नीचार् दिखलार्ने में सफल हुआ और वह अपने मित्र आस्ट्रियार् की शक्ति क विस्तार्र तथार् प्रभार्व में वृद्धि करवार् सका, किन्तु फिर भी वह फ्रार्ंस, रूस और इंगलैंड के गुट से भयभीत बनार् रहार्। उसने फ्रार्ंस और रूस से मित्रतार् करने की ओर हार्थ बढ़ार्नार् आरंभ कियार्। 8 फरवरी 1909 र्इ. को उसने फ्रार्ंस से एक समझौतार् कियार् जिसके अनुसार्र फ्रार्ंस ने मोरक्को की स्वतंत्रतार् एवं अखण्डतार् के सिद्धार्ंत को स्वीकार कर लियार्। जर्मनी ने मोरक्को की आन्तरिक सुरक्षार् के संबंध में फ्रार्ंस की असार्धार्रण स्थिति मार्न ली। इधर निश्चित होकर जर्मनी ने अपनार् ध्यार्न रूस से समझार्तै ार् करने की और आकषिर्त कियार्। जर्मनी ने रूस से नवम्बर 1910 में मेसोपोटार्मियार् और फार्रस में अपने हितों के संबंध में समझौतार् कियार्, जिसके द्वार्रार् ‘रूस ने जर्मनी को बर्लिन बगदार्द रेलवे की योजनार् क विरोध न करने क वचन दियार् और विलियम ने फार्रस में रूस के हितों की स्वीकृति प्रदार्न की।’’

मोरक्को क प्रश्न

उपरोक्त कार्यो द्वार्रार् विलियम।। रूस, फ्रार्ंस और इंगलैंड के गुट को निर्बल करने में सफल हुआ, किन्तु यह स्थिति अधिक काल तक स्थार्यी नहीं रह सकी। मोरक्को के प्रश्न क समार्धार्न करने क प्रयत्न फ्रार्ंस और जर्मनी द्वार्रार् कियार् गयार् थार्, किन्तु दोनों समझौते की स्थिति से संतुष्ट नहीं थे। ‘मोरक्को की स्वतंत्रतार्’ तथार् फ्रार्ंस की पुलिस सत्तार् में स्वार्भार्विक विरोध थार् जिसके कारण भविष्य में झगड़ार् होनार् निश्चित थार्। फ्रार्ंस मोरक्को को पूर्णतयार् अपने अधिकार में लार्ने पर तुलार् हुआ थार् और जर्मनी उसे रार्के ने यार् उसके बदले में उपयुक्त पुरस्कार प्रार्प्त करने पर कटिबद्ध थार्। 1911 र्इ. में मोरक्को में एक ऐसी घटनार् घटी जिसने यूरोप के प्रमुख रार्ष्ट्रों क ध्यार्न उस ओर आकर्षित कियार्। मोरक्को में गृह-युद्ध की अग्नि प्रज्जवलित हुर्इ और मोरक्को क सुल्तार्न इस विद्रोह क दमन करने में असफल रहार्। इस परिस्थिति के उत्पन्न होने पर फ्रार्ंस ने आंतरिक सुरक्षार् के लिए अपने उत्तरदार्यित्व क बहार्नार् लेकर एक सेनार् भेजी, जिसने 21 मर्इ 1910 र्इ. को मोरक्को में विद्रोह क दमन करनार् आरंभ कर दियार्। जर्मनी फ्रार्ंस के इस प्रकार के हस्तक्षेप को सहन नहीं कर सक और जर्मनी के विदेशमंत्री ने घोषणार् की कि ‘‘यदि फ्रार्ंस को मोरक्को में रहनार् आवश्यक प्रतीत हुआ तो मोरक्को की पूर्ण समस्यार् पर पनु : विचार्र कियार् जार्यगे ार् और एल्जीसिरार्ज के एक्ट पर हस्तार्क्षर करने वार्ली समस्त सत्तार्ओं को अपनी इच्छार्नुसार्र कार्य करने की स्वतंत्रतार् पुन: प्रार्प्त हो जार्येगी।’’ विद्रोहियों के दमन के उपरार्ंत फ्रार्ंस की सेनार्यें वार्पिस लौटने लगी, किन्तु इस पर भी जर्मनी ने अपने कड़ े व्यवहार्र में किसी प्रकार परिवर्तन करनार् उचित नहीं समझार्। जुलाइ 1910 र्इ. को जर्मनी ने घोषणार् की कि उसने जर्मन हितों तथार् जर्मन निवार्सियों की रक्षार् के अभिप्रार्य से एक जंगी जहार्ज दक्षिणी मोरक्को के एजेडिर नार्मक बन्दरगार्ह पर भेज दियार्। जर्मनी के इस व्यवहार्र ने बड़ी संकटमय परिस्थिति उत्पन्न कर दी और यह संभार्वनार् स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगी कि शीघ्र ही यूरोप के रार्ष्ट्रों के मध्य युद्ध क होनार् अनिवाय है।

अंत में फ्रार्ंस और जर्मन के मध्य संधि हो गर्इ जो कि 4 नवम्बर 1911 को सम्पन्न हुर्इ, जिसके अनुसार्र यह निश्चय हुआ कि मोरक्को पर फ्रार्ंस क संरक्षण पूर्ववत् बनार् रहे और जर्मनी को फ्रेंच कांगों क आधार् प्रदेश प्रार्प्त हुआ। मोरक्को के प्रश्न पर जर्मनी को मुंह की खार्नी पड़ी, क्योंकि रूस, फ्रार्ंस और इंगलैंड क त्रिरार्ष्ट्रीय गुट पहले की अपेक्षार् अब अधिक दृढ़ तथार् स्थाइ हो गयार् थार् तथार् जर्मनी और इंगलैंड के संबंध दिन-प्रतिदिन खरार्ब होने आरंभ हो गए।

बार्ल्कन युद्धों के प्रभार्व

बार्ल्कन युद्ध यूरोपीय इतिहार्स में अपनार् विशिष्ट स्थार्न रखते हैं, क्योंकि बार्ल्कन प्रदेश के कारण ही यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध की ज्वार्लार् प्रज्वलित हुर्इ। यद्यपि 1907 र्इ. तक समस्त यूरोप दो परस्पर विरोधी गुटों में विभक्त हो गयार् थार्। इन युद्धों के दार्रै ार्न रूस और आस्ट्रियार् क तनार्व काफी बढ़ गयार् थार्। दोनों में सर्बियार् विजयी रहार् थार् और द्वितीय युद्ध में बल्गार्रियार् का,े जिसक समर्थन आस्ट्रियार् कर रहार् थार्, बड़ी क्षति उठार्नी पड़ी थी। इस प्रकार बार्ल्कन युद्धों से रूस तथार् आस्ट्रियार् के बीच तनार्व बहुत बढ़ गयार् जिसक प्रत्यक्ष प्रभार्व उनके मित्र रार्ष्ट्रों पर भी पड़नार् स्वार्भार्विक ही थार्।

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