केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क्यार् है? –

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क्यार् है?

By Bandey

अनुक्रम

अनिल सील के शोधार् प्रबंध इमरजेंस ऑफ इंडियार् नेशनलिज्म (1968) क निर्देशन केम्ब्रिज के जॉन गेलेधर ने कियार् थार्। इस शोध ग्रंथ में जॉन गेलेधर की अभिधार्रणार् को ही आगे बढ़ार्यार् गयार्। अनिल सील के प्रथम पीढ़ी के छार्त्रों खार्सतौर पर जुडिथ ब्रार्उन, जिन्होंने गार्ंधीजी रार्ईज टू पार्वर (केम्ब्रिज 1972) लिखी, ने भी इस परंपरार् को आगे बढ़ार्यार्। इनके अनुसार्र अंग्रेजी पढ़े-लिखे संभ्रार्ंत वर्ग के लोग सबसे पहले बंगार्ल बंबई और मद्रार्स के अल्पसंख्यक उच्च जार्ति के थे और पिछड़ी जार्तियों और क्षेत्रों की रार्जनीति इस अंग्रेजी शिक्षित रार्ष्ट्रवार्द के खिलार्फ अल्पसंख्यकों क प्रतिरोध थार्। हार्लार्ंकि बार्द में जॉन गेलेधर और उनके विद्याथियों ने अपने विचार्र में तेजी से परिवर्तन कियार् और केम्ब्रिज सम्प्रदार्य इसी बदले हुए विचार्र क प्रतिफलन है। जॉन गेलेधर ने रोनार्ल्ड रॉबिन्सन के सार्थ पहले ‘अफ्रीक एण्ड द विक्टोरियन्स’ (1961) शीर्षक पुस्तक लिखी थी जिसमें 1960 के दशक के आरंभ में सार्म्रार्ज्यी अध्ययन को आलोचनार्त्मक दृष्टि से देखने क काम कियार्।

संक्षेप में गेलेधर और रॉबिन्सन ने यह कहार् थार् कि सार्म्रार्ज्यवार्द यूरोप में नई आर्थिक शक्तियों क प्रतिफलन नहीं थार् बल्कि अफ्रीक और एशियार् में स्थार्नीय कारणों से हुए रार्जनीतिक ह्रार्स क परिणार्म थार्। देशी समार्जों के आंतरिक कलह से पैदार् हुई रार्जनीतिक शून्यतार् को भरने के लिए सार्म्रार्ज्यवार्द को मजबूरन आगे आनार् पड़ार्। गेलेधर के एक कुशार्ग्र युवार् शिष्य अनिल सील ने भार्रत में आधुनिक रार्जनीति के उदय की व्यार्ख्यार् करते हुए भार्रतीय समार्ज के आंतरिक रार्जनीतिक कलह पर प्रकाश डार्लार् और खार्सतौर पर जार्ति तथार् विभिन्न क्षेत्रों, समुदार्यों और जार्तियों के बीच अंग्रेजी शिक्षार् प्रार्प्त करने की होड़ को जार्एज बतार्यार्। 1970 के दशक के आरंभ में जॉन गेलेधर, अनिल सील और गाडन जॉनसन के इर्द-गिर्द शोधाथियों क एक नयार् समूह खड़ार् हुआ। (गाडन जॉनसन मॉर्डन एशियन स्टडीज के संपार्दक थे और ये अनिल सील के छार्त्र थे जिन्होंने महार्रार्ष्ट्र की रार्जनीति पर शोध कियार् थार् इनक शोध अनिल सील और जुडिथ ब्रार्उन से काफी मिलतार् जुलतार् है)। यह समूह केम्ब्रिज सम्प्रदार्य के नार्म से जार्नार् गयार्। इस समूह ने अपने को पहले से चले आ रहे संभ्रार्ंत सिद्धार्ंत से अलग कियार् और जार्री बहस के सवार्लों के नए जवार्ब पेश किए।

हार्लार्ंकि इनक भी यह मार्ननार् थार् कि रार्ष्ट्रवार्द मूलत: सत्तार् प्रार्प्त करने क एक खेल थार्। इस दौरार्न जो नई दृष्टि विकसित हुई उसमें आधुनिक रार्जनीति के पीछे अंग्रेजी शिक्षार् की उतनी महत्त्वपूर्ण भूमिक नहीं थी और न ही औपनिवेशिक शार्सन के दौरार्न हुए आर्थिक परिवर्तन। बल्कि इसके विपरीत उपमहार्द्वीप में सरकार क बढ़तार् केन्द्रीकरण और इसके ढार्ँचे के तहत प्रतिनिधित्व के बढ़ते तत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिक थी। इसके द्वार्रार् ग्रार्मीण क्षेत्र में सरकार की मौजूदगी महसूस की गई और विधार्ई प्रतिनिधित्व की नई शैली के जरिए दूर-दरार्ज के इलार्कों को केन्द्र से जोड़ार् गयार्। सरकार के हस्तक्षेप से अंग्रेजी रार्ज में आधुनिक रार्जनीति के लिए जगह बनी। दूसरे क्षेत्र यार् रार्ष्ट्र के बजार्ए स्थार्नीय स्थल विशेष को रार्जनीति क वार्स्तविक आधार्र मार्नार् गयार्। रार्जनीति से जुड़े ये ‘वार्स्तविक हित’ स्थार्नीय हित थे न कि ये मिथकीय रार्ष्ट्रीय हित यार् यहार्ँ तक कि क्षेत्रीय-सार्ंस्कृतिक हित भी नहीं थे। स्थार्नीय हित ने सम्पूर्ण देश के रार्ष्ट्रीय हित यार् क्षेत्र के सार्ंस्कृतिक हित को विस्थार्पित कर दियार्। तीसरे, रार्जनीति में जार्ति यार् समुदार्य यार् वर्ग के आधार्र पर नहीं बल्कि स्थार्न विशेष से संरक्षक-आश्रित संबंध के आधार्र पर निर्मित गुटों के रूप में इकाइयार्ँ स्थार्पित हुई। मार्लिक-ग्रार्हक क यह गठजोड़ वर्ग, जार्ति यार् समुदार्य की सीमार्ओं क अतिक्रमण करतार् थार्। स्थार्न के अनुसार्र संरक्षक जिनके हित में गुटबंदी की जार्ती थी वह स्थार्नीय तौर पर बार्हुबली लोग होते थे, वे यार् तो शहर में रहने वार्ले नार्मी-गिरार्मी होते थे यार् गार्ँव में रहने वार्ले प्रभार्वशार्ली लोग थे। स्थार्नीय बार्हुबलियों को अंग्रेजी पढ़े-लिखे पेशेवर शिक्षित संभ्रार्ंतों की अपेक्षार् अधिक शक्तिशार्ली मार्नार् जार्तार् थार्। सरकार में बढ़ती प्रतिनिधिकतार् और सभी स्थलों पर सरकार की बढ़ती मौजूदगी के फलस्वरूप रार्ष्ट्रीय रार्जनीति में स्थार्नीय संरक्षकों क महत्त्व बढ़ गयार्।

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य की विशिष्टतार्एँ

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य में स्थार्नीयतार् और वहार्ँ मौजूद संबंधों पर विशेष बल दियार् गयार् है। सी.ए. बेली ने उन्नीसवीं शतार्ब्दी के मध्य में इलार्हार्बार्द शहर की रार्जनीति क विश्लेषण करते हुए स्थार्नीय रार्जनीति क हवार्लार् दियार् है और बतार्यार् है कि किस प्रकार प्रभार्वशार्ली लोग अपने प्रभार्व में रहने वार्ले लोगों को संतुष्ट करने क प्रयार्स करते हैं। शहर में बड़े-बड़े सेठ सार्हूकार रहार् करते थे जिन्हें रईस यार्नी प्रसिद्ध व्यक्ति क दर्जार् प्रार्प्त थार्। इन सेठ सार्हूकारों और रईसों के विभिन्न प्रकार के प्रभार्व क्षेत्र थे जिनमें कई प्रकार के समूह शार्मिल थे। रईसों के सम्पर्क में सभी जार्तियों और समुदार्यों के लोग थे। बार्द में यही सम्पर्क इलार्हार्बार्द की रार्ष्ट्रीय रार्जनीति में महत्त्वपूर्ण हो गई। बंबई की रार्जनीति क अध्ययन करते हुए गोर्डन जॉनसन ने इससे सहमति व्यक्त की।

प्रत्येक भार्रतीय रार्जनीतिज्ञ की एक खार्स विशिष्टतार् यह थी कि प्रत्येक रार्जनीतिज्ञ को भार्रतीय समार्ज के सभी स्तरों से जुड़े विविध और एक-दूसरे के विपरीत हितों की देखभार्ल करनी पड़ती थी और ऐसार् करते हुए वे वर्ग, जार्ति, क्षेत्र और धाम क अतिक्रमण करते थे। अनिल सील ने अपनी पुस्तक लोकेलिटी, प्रोविन्स और नेशन्स की प्रस्तार्वनार् लेख ‘इम्पेरियलिज्म एण्ड नेशनलिज्म इन इंडियार्’ में इसी बार्त पर विशेष बल दियार् थार्। इनके अनुसार्र रार्जनीतिक मूलत: एक स्थार्नीय मार्मलार् थार्। वहार्ँ प्रभार्व, हैसियत और संसार्धनों के लिए होड़ मची हुई थी। इस होड़ में संरक्षक अपने मार्तहतों को अलग-अलग गुटों में बार्ँटकर मदद करतार् थार्। इस प्रकार उसके मार्तहतों में किसी प्रकार क तार्लमेल यार् सार्ँठगार्ंठ नहीं हुआ करती थी। इसकी बजार्ए वह बड़े लोगों और उनके अनुयार्यियों के संघ हुआ करते थे। दूसरे शब्दों में ये गुट एक-दूसरे से जुड़े तो थे परन्तु इनक संबंध खड़ी रेखार् (अर्थार्त् उफपर से नीचे) में थार् न कि पड़ी रेखार् (अर्थार्त् अगल-बगल) का। स्थार्नीय टकरार्व कि स्थिति की विरल ही जमींदार्र और जमींदार्र का, शिक्षित और शिक्षित का, मुसलमार्न के सार्थ काम करते थे। ब्रार्ह्मण गैर-ब्रार्ह्मणों के सार्थ गुट बनार्यार् करते थे। केम्ब्रिज व्यार्ख्यार् के अनुसार्र, रार्जनीति की जड़ स्थार्नीयतार् अर्थार्त् जिलार्, नगरपार्लिका, गार्ँव में निहित होती थी। शहर के प्रभार्वी लोग और गार्ँव के बार्हुबली तथार्कथित कमजोर सार्म्रार्ज्यी सरकार द्वार्रार् बिनार् किसी हस्तक्षेप के संसार्धनों क वितरण कियार् करते थे। परन्तु उन्नीसवीं शतार्ब्दी के अंत और बीसवीं शतार्ब्दी के आरंभ में स्थिति बदलने लगी। डेविड वार्शब्रक के अनुसार्र प्रगति करने, अधिक धन कमार्ने और अधिक जनकल्यार्ण और अच्छे कार्य करने के लिए सार्म्रार्ज्यी शार्सन ने कर्इ नौकरशार्ही और संवैधार्निक सुधार्र किए जिसने ज्यार्दार् से ज्यार्दार् स्थार्नीय रार्जनीतिज्ञों को स्थार्नीय रार्जनीति छोड़कर केन्द्र की ओर बढ़ने के लिए बार्ध्य कियार्।

जॉन गेलेधर क मार्ननार् थार् कि इसी सरकारी हस्तक्षेप से भार्रतीय रार्जनीति क काम करने क ढंग बदल गयार्। उन्होंने गलतफहमी दूर करते हुए कहार् कि ‘इसक मतलब यह नहीं है कि भार्रतीय रार्जनीति को सार्मार्जिक समूहों की आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र कार्यक्रमों के सार्थ दलों से जोड़ दियार् गयार्। अभी भी संरक्षक और आश्रितों के संबंधों की प्रमुखतार् थी इसके अलार्वार् स्थार्नीय जगहों पर पैफले सम्पर्कों और विभिन्न गुटों के बीच संधि की उलट-पेफर अभी भी प्रमुख तत्व थे। इस प्रकार ये विभिन्न प्रकार की सतही एकतार्ओं के उफपर स्थित थे। इसके बार्वजूद एक परिवर्तन यह हुआ कि अधिक से अधिक इलार्कों क गठबंधन हुआ और इन्हें रार्जनीति के बड़े क्षेत्रों से जोड़ार् गयार्। इन चुनार्वी पद्धतियों के फलस्वरूप प्रशार्सनिक परिवर्तन भी करने पड़े।’ (जॉन गेलेधर, कांग्रेस इन डेकलार्इन : बंगार्ल 1930 टू 1939 लोकेलिटि, प्रोविन्स और नेशन में)। अपनी पुस्तक की प्रस्तार्वनार् में अनिल सील ने भी यही बार्त कही है। केन्द्रीकृत और प्रतिनिधिक सरकार बनने से अब भार्रतवार्सियों के लिए रार्जनीतिक लार्भ केवल स्थार्नीय इलार्कों तक ही सीमित ही नहीं रह गयार्। सरकार के लिए केन्द्र से ज्यार्दार् से ज्यार्दार् मोल-भार्व करने में बढ़ती शक्ति से प्रार्न्तीय और अखिल भार्रतीय रार्जनीति क निर्मार्ण हुआ। गार्ँव जिलार् और छोटे शहरों की रार्जनीति बढ़कर केन्द्र तक पहुँचने लगी। परन्तु मद्रार्स नेटिव एसोसिएशन यार् भार्रतीय रार्ष्ट्रीय कांग्रेस जैसे रार्जनीतिक संगठन प्रार्ंतों और केन्द्र में रार्जनीति क नयार् खेल खेलने लगे। ‘सरकार के औपचार्रिक ढार्ँचार् ने रार्जनीति क ढार्ँचार् निर्मित कियार् और इसी ढार्ँचे के तहत काम करते हुए भार्रतवार्सी सत्तार् और संरक्षण के वितरन क निर्धार्रण कर सकते थे।’ (अनिल सील, इम्पेरियिल्ज्म एण्ड नेशनलिज्म, लोकेलिटि, प्रोविन्स एण्ड नेशन) सी.जे. बेकर के अनुसार्र अभी तक स्थार्नीय प्रभार्वशार्ली व्यक्ति अपनी सत्तार् क उपयोग मनमर्जी से करतार् थार्।

अब उसे ब्रिटिश रार्ज के नए प्रशार्सनिक और प्रतिनिधिक ढार्ँचे के अनुसार्र बदलनार् पड़ार्। बड़ी चौहदियों के आधार्र पर बने संगठनों पर आधार्रित रार्ष्ट्रीय रार्जनीतिक ढार्ँचे के अनुसार्र उन्हें बदलनार् पड़ार्। जस्टिस पाटी, हिन्दू महार्सभार्, अखिल भार्रतीय मुस्लिम लीग और भार्रतीय रार्ष्ट्रीय कांग्रेस कुछ ऐसे ही बड़े संगठन थे। केम्ब्रिज सम्प्रदार्य से जुड़े विद्वार्नों क मार्ननार् थार् कि गार्ंधी के आने के बार्द रार्जनीतिक बदलार्व तो आयार् परन्तु यह भी संभ्रार्ंत लोगों के हार्थ में थार्, यह जब आंदोलन नहीं बनार्। उनके अनुसार्र प्रत्येक चरण में किए जार्ने वार्ले संवैधार्निक सुधार्र अखिल भार्रतीय रार्जनीति को स्पूफर्ति प्रदार्न करते रहे। मौटफोर्ड सुधार्रों ने असहयोग आंदोलन के लिए, सार्इमन कमीशन ने नार्गरिक अवज्ञार् आंदोलन और क्रिप्स मिशन ने भार्रत छोड़ो आंदोलन क माग प्रशस्त कियार्। जब भी सरकार केन्द्र में नयार् सुधार्र लार्गू करने क प्रस्तार्व करती थी जो स्थार्नीय इलार्कों में संरक्षण के बँटवार्रे को प्रभार्वित करती थी, उसी समय रार्जनीतिज्ञ नए रार्जनीति आंदोलन छेड़ने को उठ खड़े होते थे। गोर्डन जॉनसन के अनुसार्र भार्रत में रार्ष्ट्रवार्द क विकास कालार्नुक्रम नहीं दिखतार् है।

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क संशयवार्द

ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ द ब्रिटिश एम्पार्यर, खण्ड पार्ँच हिस्टोरियोग्रार्फी (1999) में कहार् गयार् है कि केम्ब्रिज सम्प्रदार्य कांग्रेस आंदोलन के रार्ष्ट्रवार्दी दार्वे पर सवार्ल खड़ी करती है और भार्रतीय रार्ष्ट्रवार्द को संदेह की दृष्टि से देखती है। इस संदेह के पीछे रार्जनीति के बार्रे में एक विशिष्ट धार्रणार् है। वह यह कि व्यक्ति सत्तार् संरक्षण और संसार्धनों की प्रार्प्ति के लिए रार्जनीति करतार् है। इसके पीछे कोई सार्मार्जिक भार्वनार् यार् आर्थिक दृष्टि नहीं होती बल्कि रार्जनीति के अपने नियम और कानून होते हैं। डी. ए. वार्शब्रक ने इस मार्न्यतार् को खार्रिज करते हुए कि किसी रार्जनीतिक संगठन को वर्ग समुदार्य यार् जार्ति क आधार्र प्रार्प्त होतार् है, यह कहार् है कि कुछ लोग सत्तार् प्रार्प्त करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सत्तार् व्यक्ति अपने स्वाथ के लिए चार्हतार् है, सत्तार् पद और स्थार्न रार्जनीतिज्ञों क मूल लक्ष्य होतार् है न कि समार्ज को सुधार्रनार्। मद्रार्स प्रेसिडेन्सी जैसे समार्ज के बार्रे में खार्सतौर पर यह बार्त कही जार् सकती है। जहार्ँ धन कुछ लोगों के पार्स ही थार् और कोई भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति स्थिति में परिवर्तन नहीं चार्हतार् थार्।

सत्तार् प्रार्प्त करने के लिए रार्जनीतिज्ञों को विभिन्न हितों, वर्गों और समुदार्यों की सहार्यतार् की जरूरत होती थी। सार्क्ष्य लक्ष्य यार्नी सत्तार् प्रार्प्त करने के लिए व्यार्पार्री, जमींदार्र, वकील, ब्रार्ह्मण, अछूत हिन्दू-मुस्लिम सभी तबके के लोग कंधे से कंधार् मिलार्कर चलने को तैयार्र थे। इस दृष्टिकोण पर संदेहवार्द इतनार् हार्वी है कि इसमें किसी भी आधार्रभूत सार्मार्जिक यार् आर्थिक टकरार्व के स्थार्न की गुंजार्इश नहीं है। इसके अलार्वार् केम्ब्रिज सम्प्रदार्य सार्म्रार्ज्यी शार्सन और उसकी देसी प्रजार् के बीच किसी भी प्रकार के गहरे अन्तर्विरोध से इनकार करतार् है। इस विचार्रधार्रार् के अनुसार्र सार्म्रार्ज्यवार्द ने वस्तुत: बृहद और वैविध्यपूर्ण उपमहार्द्वीप और उसकी प्रजार् को कभी नियंत्रित नहीं कियार्, जिनक ज्यार्दार्तर स्थार्नीय मुद्दों से ही सरोकार थार् और उन्होंने इसक विरोध भी नहीं कियार्। अनिल सील द इमरजेंस ऑफ इंडियन नेशनलिज्म में पहले ही यह कह चुके थे कि अंग्रेज शार्सकों से हार्थ मिलार्ने के लिए भार्रतवार्सियों में होड़ मची हुई थी। लोकेलिटी, प्रोविन्स और नेशन की प्रस्तार्वनार् में वे एक कदम और आगे बढ़ गए और कहार् कि यह कोई रार्ष्ट्रीय आंदोलन थार् ही नहीं और न ही इसक कोई सार्झार् लक्ष्य थार्।

इसक नेतृत्व करने वार्ले लोगों की पृष्ठभूमियार्ँ अलग-अलग थीं और इनके हित और समूह भी अलग-अलग थे। उनके अनुसार्र यह पूरार् आंदोलन जर्जर प्रतीत होतार् थार्। इसकी एकतार् एक गप्प से ज्यार्दार् कुछ नहीं थी इसकी शक्ति उतनी ही काल्पनिक थी जितनी कि सार्म्रार्ज्यवार्द की जिसे वह चुनौती देने क दार्वार् करतार् थार्। इसक इतिहार्स अतीत भार्रतवार्सियों के आपसी दुश्मनी क इतिहार्स अतीत है। सार्म्रार्ज्यवार्द के सार्थ इनके संबंध दो कमजोर व्यक्तियों के सहयोग के रूप में व्यार्ख्यार्यित कियार् जार् सकतार् है। इसलिए सार्म्रार्ज्यवार्द और रार्ष्ट्रवार्द की फरार्नी धार्रणार्ओं के आधार्र पर आधुनिक भार्रतीय इतिहार्स अतीत को निर्मित करनार् असंभव प्रतीत होतार् है। (अनिल सील, इम्पेरियलिज्म नेशनलिज्म, लोकेलिटी, प्रोविन्स एण्ड नेशन) सार्मार्न्य तौर पर यह संपूर्ण रार्जनीति और खार्सतौर पर भार्रतीय रार्ष्ट्रवार्द के प्रति संदेहवार्दी दृष्टि है। अर्थशार्स्त्र यार् समार्जशार्स्त्र जैसे तत्व को नकारते हुए केम्ब्रिज सम्प्रदार्य ने भार्रतीय रार्जनीति के अध्ययन के लिए शुद्ध रार्जनीतिक दृष्टिकोण अपनार्यार्। इस दृष्टिकोण के अनुसार्र रार्जनीति और बार्जार्र में व्यक्ति एक जैसी ही हरकत करतार् है। एक को सत्तार् प्रार्प्त होती है दूसरे को मुनार्फार् और दोनों ही स्वाथ से बंधे होते हैं।

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य की प्रमुख कृतियार्ँ

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क उदय 1960 के दशक में रॉबिन्सन और गेलेधर के अप्रफीक एण्ड द विक्टोरियन्स और सील के इमरजेन्स ऑफ इंडियन नेशनलिज्म से मार्नार् जार् सकतार् है परन्तु 1970 के दशक में लोकेलिटी, प्रोविन्स एण्ड नेशन्स के प्रकाशन के सार्थ केम्ब्रिज सम्प्रदार्य ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। कई लेखों और पुस्तकों के मार्ध्यम से केम्ब्रिज सम्प्रदार्य को अभिव्यक्त कियार् गयार्, इनमें प्रमुख हैं : जॉन गेलेधर गोर्डन जॉनसन और अनिल सील (संपार्) लोकेलिटी, प्रोविन्स एण्ड नेशन्स (1973) गोर्डन जॉनसन, प्रोविन्सियल पोलिटिक्स एण्ड इंडियन नेशनार्लिज्म : बम्बई एण्ड इंडियार् नेशनल कांग्रेस 1890 से 1905 (1973) : सी.ए. बेली द लोकल रूटस ऑफ इंडियन पोलिटिक्स : इलार्हार्बार्द 1880-1920 (1975) डी.ए. वार्शबु्रक, द इमरजेन्स ऑफ प्रोविन्सियल पोलिटिक्स : मद्रार्स प्रेसिडेन्सी 1870-1920 ;1976द्ध सी.जे. बेकर, द पोलिटिक्स ऑफ इंडियार् 1920-1937 (1976) बी.आर. टॉमलिन्सन द इंडियन नेशनल कांग्रेस एण्ड द रार्ज, 1929-1942 (1976) और सी.जे. बेकर गोर्डन जॉनसन और अनिल सील (संपार्), पार्वर, प्रोफिट एण्ड पोलिटिक्स (1981) पहलार् और अंतिम केम्ब्रिज सम्प्रदार्य के सदस्यों के लेखों क संकलन है। शेष अनिल सील और गोर्डन जॉनसन के निर्देशन में केम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड के शोधग्रंथ हैं। इन पुस्तकों में कुछ हद तक अभिव्यक्ति और अभिप्रार्य की दृष्टि से विभिन्नतार् हो सकती है परन्तु इनमें कई समार्नतार्एँ भी हैं। टार्स्क ‘अंग्रेज शार्सकों से हार्थ मिलार्ने के लिए भार्रतवार्सियों में होड़ मची हुई थी।’ किसने कहार्?

एक सार्थ मिलकर केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क प्रतिनिधित्व करते हैं। अनिल सील के निदेशन में किए गए सभी केम्ब्रिज शोधग्रंथ एक ही विशिष्टतार् से युक्त नहीं है। उदार्हरण के लिए मुश्किल हसन क नेशनलिज्म एण्ड कम्यूनल पोलिटिक्स इन इंडियार् 1916-1928 (1979) और रजत काल रार्य क सोशल कनप्लिक्ट एण्ड पोलिटिक्स अनरेस्ट इन बंगार्ल 1875-1927 (1984) में सत्तार् के खेल पर बल नहीं दियार् गयार् है बल्कि इसके विपरीत विचार्रार्त्मक और आर्थिक कारकों को हवार्लार् दियार् गयार्। अनिल सील के निर्देशन के होने के बार्वजूद ये केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। केम्ब्रिज सम्प्रदार्य में मुख्य रूप से व्यक्ति और गुटों द्वार्रार् सत्तार् की खोज पर बल दियार् गयार् है। वे अपनी खोज को रार्ष्ट्र (मार्क्र्सवार्दियों द्वार्रार् जिसे सम्पूर्ण मार्नार् गयार्) और क्षेत्र (संभ्रार्ंत सिद्धार्ंतकारों ने इसे अलग मार्नार् है) को बेधते हुए स्थार्नीयतार् तक पहुँचते हैं और इस स्थार्नीयतार् में भी उनक ध्यार्न वर्गों यार् जार्तियों, सार्मार्जिक समूहों पर नहीं बल्कि उनके सार्मार्जिक कोटियों के संबंधों पर है। उनके विश्लेषण में इन स्थार्नीय गुटों और सम्पर्कों के धीरे-धीरे आपस में जुड़ने और अखिल भार्रतीय ढार्ँचे के रूप में बदलने पर बल दियार् गयार् है। जिसके फलस्वरूप दूरदरार्ज के इलार्कों में भी केन्द्र की सत्तार् क हस्तक्षेप हुआ। सरकार के लगार्तार्र हो रहे केन्द्रीकरण के सार्थ-सार्थ केन्द्रीकृत ढार्ँचे में प्रतिनिधिक तत्व की गुंजार्इश बढ़ी। स्थार्नीय रार्जनीति को सार्मने लार्यार् गयार् और यह रार्ष्ट्रीय रार्जनीति में समार्हित हो गयार्। इस दृष्टि से रार्ष्ट्रवार्द और सार्म्रार्ज्यवार्द ने चुपके-चुपके हार्थ मिलार्यार् थार्।

केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क अंत

जॉन गेलेधर, केम्ब्रिज विश्वविद्यार्लय में इम्पेरियल एण्ड नेवल हिस्ट्री के वेरे हार्म्र्सवर्थ प्रोपेफसर थे। 1980 में उनकी मृत्यु हो गर्इ। उनकी यार्द में केम्ब्रिज समूह ने लेखों क संग्रह निकालार् जिसे प्रिफस्टोफर बेकर, गोर्डन जॉनसन और अनिल सील ने संपार्दित कियार्, जिसक नार्म थार् पार्वर, प्रौफिट एण्ड पोलिटिक्स : एस्सेज ऑन इम्पेरियलीज्म, नेशनलिज्म एण्ड चेंज इन ट्वोंटिएथ सेंचुरी पोलिटिक्स (केम्ब्रिज 1981)। इन लेखकों में आयशार् जलार्ल और अनिल सील क एक संयुक्त लेख (अलटरनेटिव टू पाटिशन : मुस्लिम पोलिटिक्स बिट्वीन वास) शार्मिल थार् जिसने विभार्जन के बार्रे में विचार्र को फिर से जीवित कर दियार्। बार्द में आयशार् जलार्ल ने एक और महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी जिसक शीर्षक थार् द सोल स्पोक्समैन : जिन्नार्, द मुस्लिम लीग एण्ड द डिमार्ंड फॉर पार्किस्तार्न (केम्ब्रिज 1985)।

इसमें उन्होंने तर्क दियार् है कि मुसलमार्नों की स्वीकृति से एक महार्संघ क निर्मार्ण संभव थार् और विभार्जन क विकल्प मौजूद थार्। परन्तु पार्वर, प्रॉफिट एण्ड पोलिटिक्स केम्ब्रिज सम्प्रदार्य क अन्तिम सार्मूहिक वक्तव्य थार्। इसके बार्द भरम टूट गयार् और लेखक अपने-अपने रार्स्ते चले गए। अनिल सील के निर्देशन में आयशार् जलार्ल ने द सोल स्पोक्समैन नार्मक पुस्तक लिखी और जोयार् चटर्जी ने बंगार्ल डिवार्इडेड : हिन्दू कम्यूनलिज्म एण्ड पाटिशन 1932-47 (केम्ब्रिज, 1994) लिखी। परन्तु यह किसी सार्मूहिक प्रयार्स क हिस्सार् नहीं थार् बल्कि इनक व्यक्तिगत प्रयार्स थार्। 1982 में इतिहार्स अतीत को देखने, परखने के एक और नजरिए की तरफ लोगों क ध्यार्न आकृष्ट हुआ। इसे सबल्टान स्टडीज कहार् गयार्। इसमें इसने केम्ब्रिज सम्प्रदार्य की आलोचनार् की परन्तु कुछ मार्मलों में दोनों में समार्नतार् भी है। सबल्टार्नीस्ट भी रार्जनीतिक में वर्ग विभार्जन के महत्त्व से इनकार करते हैं और वर्ग संबंधों की अपेक्षार् सत्तार् संबंधों को महत्त्व देते हैं। वे संभ्रार्ंत वर्ग से सबल्टार्न्र्स को अलग करके देखते हैं और रार्ष्ट्रवार्दी संभ्रार्ंतों पर सार्म्रार्ज्यवार्दियों के सार्थ मिलकर काम करने क आरोप लगार्ते हैं। वे भी सबल्टान रार्जनीति की जड़ों की खोज करते हुए स्थार्नीयतार् की ओर ही लौटते हैं। इसमें केम्ब्रिज सम्प्रदार्य की छार्प दिखार्ई पड़ती है। कुल मिलार्कर केम्ब्रिज सम्प्रदार्य ने भार्रतीय इतिहार्स अतीत-लेखन पर अपनी छार्प छोड़ी है।

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