कर विवर्तन की अवधार्रणार्, सिद्धार्न्त एवं प्रकार

कर विवर्तन की अवधार्रणार् मुख्य रूप से करार्घार्त एवं करार्पार्त के मध्य अन्तर से सम्बन्धित है। सार्मार्न्य रूप से कर विवर्तन से हमार्रार् आशय करक प्रणार्ली के उस भार्ग से लगार्यार् जार्तार् है जिसके अन्तर्गत करदार्तार् कर के भार्र को दूसरे व्यक्ति यार् आर्थिक इकाई पर टार्लने में सफल हो जार्तार् है। करदार्तार् कर के भार्र के कितने अंश को दूसरे पर टार्लने में सफल हो पार्तार् है यह कर की प्रकृति तथार् वस्तु की कीमत लोच पर निर्भर करतार् है। कर विवर्तन करार्घार्त एवं करार्भार्र (करार्पार्त) के बीच की एक कड़ी के रूप में देखार् जार् सकतार् है। करार्घार्त के द्वार्रार् सरकार कर संग्रहण के लिए एक व्यक्ति यार् इकाई को आधार्र बनार्ती है वही करार्पार्त को अलग-अलग रूप में प्रसरण करने के लिए करदार्तार् को कुछ ऐसी व्यवस्थार्ओं क सहार्रार् दियार् जार्तार् है जिससे वह कर को सरकार को जमार् करने की प्रतिबद्धतार् तो पूरी करतार् है लेकिन करके अन्तिम रूप से उगार्ही को स्वयं वहन नहीं करतार् है। इसके लिए वह उस वस्तु यार् इकाइयों से सम्बन्धित व्यक्तियों पर विवर्तित कर देतार् है। इस प्रकार जब करार्घार्त एवं करार्पार्त अलग-अलग दो व्यक्तियों एवं संस्थार्ओं पर होतार् है तब करार्घार्त एवं करार्पार्त को अलग-लग सहन करने की क्रियार् कर विवर्तन कहलार्ती है। कुछ करों की स्थिति में कर क विवर्तन सम्भव होतार् है तथार् कुछ करों की स्थिति में करार्पार्त को दूसरों पर टार्लार् नहीं जार् सकतार् है।

कर विवर्तन के सिद्धार्न्त

सार्मार्न्य रूप से कर विवर्तन को दो सिद्धार्न्तों के आधार्र पर समभव बनार्यार् गयार् है।

  1. केन्द्रीयकरण क सिद्धार्न्त : करार्पार्त क केन्द्रीयकरण सिद्धार्न्त के अनुसार्र सरकारक द्वार्रार् किये जार्ने वार्ले करार्रोपण क भार्र अन्तत: एक ही स्थार्न पर आकर केन्द्रित हो जार्तार् है। देश में किसी भी वस्तु यार् सेवार् पर किसी भी प्रकार क कर लगार्यार् जार्य उसक समस्त भार्र अन्तत: भूमि/कृषि पर ही पड़तार् है। करों क विवर्तन भी इसी प्रकार क्रियार्शील होतार् है कि अन्तिम करार्पार्त भूमि पर ही पड़तार् है।
  2. कर-प्रसार्रण सिद्धार्न्त : इस सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन फ्रार्ंसीसी अर्थशार्स्त्री केनाड द्वार्रार् कियार् गयार्। यह सिद्धार्न्त केन्द्रीयकरण सिद्धार्न्त के विपरीत तथ्य पर आधार्रित कियार् गयार् है। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र करार्रोपण कहीं भी कियार् जार्य परन्तु उसक प्रभार्व अर्थव्यवस्थार् के सभी क्षेत्रों एवं भार्गों में फैल जार्तार् है। अर्थार्त् करार्रोपण क भार्र समार्ज के प्रत्येक व्यक्ति को वहन करनार् होतार् है। सर हैमिल्टन के अनुसार्र, ‘‘प्रसार्र के सिद्धार्न्त में कदार्चित आशार्वार्दी सिद्धार्न्त से भी अधिक सच्चार्ई है, और वह यह कि करों की प्रवृत्ति फैलने तथार् समार्न होने की होती है और वे निश्चिततार् तथार् एकसार्रितार् से लगार्ये जार्यें तो प्रसार्रित होकर प्रत्येक सम्पत्ति पर ही अपनार् भार्र डार्लेंगे।’’ कर क विवर्तन इस प्रकार होतार् है कि समय के सार्थ-सार्थ कर क भार्र सम्पूर्ण समार्ज में फैल जार्तार् है।

कर विवर्तन के प्रकार

कर विवर्तन की अवधार्रणार् को आप भली-भार्ंति समझ गये होंगे। इसके बार्द अब यह समझनार् भी आपके लिए अत्यन्त आवश्यक होगार् कि कर विवर्तन कितने प्रकार क होतार् है। कर विवर्तन के प्रकारों के बार्रे में आप अच्छी तरह से अध्ययन कर सकेंगे :-

  1. अग्रग्रार्मी कर-विवर्तन
  2. पश्चगार्मी कर-विवर्तन
  3. अग्रोन्मुखी कर-विवर्तन

अग्रगार्मी कर-विवर्तन 

अग्रगार्मी कर-विवर्तन से हमार्रार् तार्त्पर्य सार्मार्न्य रूप से उस प्रक्रियार् से है जिसके अन्तर्गत कर देने वार्लार् व्यक्ति यार् संस्थार् कर क भार्र आगे वार्ले सम्बन्धित व्यक्ति पर टार्लने में सफल हो जार्तार् है। उदार्हरण के लिए आप बिक्री कर को लीजिए – मार्नार् सरकार द्वार्रार् बिक्री कर लगार् दियार् गयार् तब उस कर को अदार् तो वस्तु क विक्रेतार् करेगार् लेकिन कर की धनरार्शि को वह अपनी जेब से नहीं करेगार्। इस धनरार्शि के बरार्बर वह वस्तु की कीमत बढ़ार् देगार् तथार् उसे क्रेतार् से बसूल लेगार् जिसे सार्मार्न्य रूप से उस वस्तु क उपभोक्तार् ही कहार् जार्येगार्। इस प्रकार इस प्रकार के कर विवर्तन में विक्रेतार् करके भार्र को वस्तु की कीमत बढ़ार्कर वस्तु के उपभोक्तार् पर टार्ल दियार् जार्तार् है तथार् इस करभार्र को उपभोक्तार् आगे और नहीं टार्ल सकतार्। इस प्रकार अग्रगार्मी कर विवर्तन में करार्घार्त विक्रेतार् पर तथार् करार्पार्त वस्तु के उपभोक्तार् पर पड़तार् है।

पश्चगार्मी कर विवर्तन

पश्चगार्मी कर विवर्तन ठीक अग्रगार्मी कर विवर्तन की उल्टी प्रक्रियार् है जिसके अन्तर्गत करदार्तार् के भार्र को उस वस्तु यार् सेवार् से सम्बन्धित पूर्ववर्ती व्यक्ति यार् इकाई पर टार्लार् जार्तार् है तथार् कर क भार्र पूववर्ती व्यक्ति यार् इकाई द्वार्रार् ही सहन करनार् पड़तार् है। इस प्रकार जब कर भार्र को पीरछे की ओर टार्लार् जार्तार् है तब उसे पश्चगार्मी कर विवर्तन की संज्ञार् दी जार्ती है। इस एक उदार्हरण द्वार्रार् आसार्नी से समझार्यार् जार् सकतार् है। सरकार द्वार्रार् उत्पार्दन कर लगार्ने की स्थिति में कर के भार्र को दो रूपों में टार्लार् जार् सकतार् है। प्रथमत: वह उत्पार्दन कर को उत्पार्दन की कीमत बढ़ार्कर क्रेतार् से वसूल ले तथार् द्वितीयत: वह उस उत्पार्दन में प्रयुक्त कच्चे मार्ल की कीमतों में कर की धनरार्शि के बरार्बर कमी कर दे तार्कि कर क भार्र कच्चे मार्ल की आपूर्ति कर्तार् को वहन करनार् पड़े। इस प्रकार पश्चगार्मी कर विवर्तन द्वितीय स्थिति की ओर इंगित करतार् है। इस प्रकार के कर विवर्तन में करार्पार्त को पीछे की प्रिक्रार् में शार्मिल करते हुए टार्ल दियार् जार्तार् है तथार् उसी से परोक्ष यार् प्रत्यक्ष रूप से बसूल लियार् जार्तार् है।

अग्रोन्मुखी कर विवर्तन 

यह कर विवर्तन की वह अवस्थार् है जिसके अन्तर्गत करार्पार्त को आगे की ओर विक्रेतार् तथार् उपभोक्तार् के पूर्व के मध्यस्थों पर टार्लार् जार्तार् है। इस प्रक्रियार् में कर भार्र को एक से अधिक क्रेतार्ओं तथार् छोटे विक्रेतार्ओं पर टार्लार् जार्तार् है। इस प्रकार यह कर विवर्तन उपभोक्तार् से पूर्व तक क अग्रगार्मी कर विवर्तन है।

विभिन्न बार्जार्रों में कर विवर्तन

प्रस्तुत उपखण्ड के अन्तर्गत आप अर्थव्यवस्थार् के अन्तर्गत विद्यमार्न विभिन्न बार्जार्रों में कर-विवर्तन से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों क अध्ययन कर सकेंगे। यहार्ँ पर हम सार्मार्न्य रूप से पूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र, एकाधिकार बार्जार्र तथार् अपूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र के अन्तर्गत व्यक्ति यार् संस्थार्ओं द्वार्रार् किये जार्ने वार्ले कर-भार्र के विवर्तन की आलोचनार्त्मक व्यार्ख्यार् करेंगे।

पूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र में कर-विवर्तन : जहार्ँ तक कर-विवर्तन की व्यार्ख्यार् क सवार्ल है तब हम पूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र में यह जार्ँच पार्येंगे कि कर क विवर्तन इस किस प्रकार तथार् किस सीमार् तक कियार् जार् सकतार् है। जैसार् कि आप जार्नते होंगे कि पूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र में समरूप वस्तुओं क उत्पार्दन कियार् जार्तार् है तथार् विक्रेतार् एवं क्रेतार्ओं की संख्यार् अधिक पार्यी जार्ती है। इसके सार्थ सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य पूर्ण प्रतियोगितार् में यह पार्यार् जार्तार् है कि क्रेतार्ओं को बार्जार्र की पूर्ण जार्नकारी पार्यी जार्ती है तथार् वस्तुओं की कीमतें समार्न बसूली जार्ती हैं। पूर्ण प्रतियोगितार् बार्जार्र के अन्तर्गत क्रेतार् तथार् विक्रेतार्ओं क यह पूर्ण प्रयार्स होतार् है कि विक्रेतार् पर पड़ने वार्ले करार्घार्त को क्रेतार् पर अधिकतम सीमार् तक डार्लार् जार्य तथार् क्रेतार् क पूर्ण प्रयार्स यह रहतार् है कि उस पर थोपार् जार्ने वार्लार् कर क भार्र विक्रेतार् तक ही सीमित रहे अर्थार्त् इस बार्जार्र में क्रेतार् तथार् विक्रेतार् कर के भार्र को कम से कम सहन करने क प्रयार्स करते हैं। लेकिन कर के विवर्तन बार्जार्र की मार्ंग की लोच तथार् पूत्रि की लोच पर निर्भर करतार् है। आईये वस्तु की मार्ंग तथार् पूर्ति की अलग-अलग लोचों की स्थिति में कर क विवर्तन किस प्रकार तथार् किस दिशार् में होतार् है। वस्तु की मार्ंग की लोच एवं कर विवर्तन : पूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र के अन्तर्गत वस्तुओं पर लगार्ये जार्ने वार्ले कर को उसकी मार्ंग की लोच एक बड़ी सीमार् तक प्रभार्वित करती है। सार्मार्न्य रूप से यह देखार् जार्तार् है कि लोचदार्न कीमत मार्ंग की स्थिति में कर क विवर्तन कम तथार् बेलोचदार्र कीमत मार्ंग की स्थिति में कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं की ओर अधिक कियार् जार्तार् है। यहार्ँ पर आप मार्ंग की कीमत लोच की विभिन्न श्रेणियों में करके विवर्तन को समझ सकेंगे।

  1. लोचदार्र कीमत लोच एवं कर विवर्तन : लोचदार्र कीमत लोच की स्थिति में कर के भार्र के एक भार्ग को विक्रेतार् स्वयं सहन करतार् है तथार् एक भार्ग को क्रेतार्ओं पर टार्लने में सफल हो जार्तार् है। लोचदार्र कीमत लोच की स्थिति में वस्तु की मार्ंग में एकतरफार् परिवर्तन सम्भव नहीं होतार् है। इसीलिये कर क विवर्तन एक निश्चित सीमार् तक ही सम्भव होतार् है।
  2. अधिक लोचदार्र कीमत लोच एवं कर-विवर्तन : इस स्थिति में कीमत में वृद्धि की अपेक्षार् वस्तुओं की मार्ंग मार्त्रार् में आनुपार्तिक रूप से अधिक कमी आ जार्ती है। कर-विवर्तन के लिए ऐसी स्थिति विक्रेतार्ओं के अनुकूल नहीं पार्यी जार्ती है। बार्जार्र की इस स्थिति में कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं पर बहुत कम ही कियार् जार् सकतार् है। कर क भार्र विक्रेतार्ओं को ही वहन करनार् होतार् है।
  3. पूर्ण लोचदार्र कीमत लोच तथार् कर विवर्तन : कीमतों में बहुत कम यार् मार्मूली सी वृद्धि होने पर वस्तु की मार्ंग में अत्यधिक गिरार्वट आ जार्ती है। तब कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं पर कियार् जार्नार् सम्भव नहीं होतार् है। उपभोक्तार् कर के भार्र को अपने ऊपर टार्लने से रोकने में सफल हो जार्ते हैं।
  4. बेलोचदार्र मार्ंग तथार् कीमत परिवर्तन : पूर्ण प्रतियोगितार् के अन्तर्गत बेलोचदार्र मार्ंग वार्ली वस्तुओं की स्थिति में कर के भार्र क उपभोक्तार्ओं पर अत्यधिक सीमार् तक टार्लार् जार् सकतार् है। उपभोक्तार् कर के भार्र को सहन करने के लिए तैयार्र हो जार्तार् है।
  5. पूर्ण बेलोचदार्र मार्ंग तथार् कर-विवर्तन : पूर्ण प्रतियोगितार् के अन्तर्गत यह वह स्थिति होती है जिसमें कीमतों में कर भार्र के परिणमस्वरूप कीमत वृद्धि क वस्तुओं की मार्ंग मार्त्रार् पर कोई प्रभार्व नहीं पड़तार् है। परिणार्मस्वरूप कर विवर्तन के प्रयार्सों की स्थित में विक्रेतार् पूर्ण रूप से सफल हो जार्तार् है और कर के विवर्तित भार्र को उपभोक्तार्ओं को ही सहन करनार् होतार् है।

पूर्ति की लोच एवं कर विवर्तन

वस्तुओं की मार्ंग की कीमत लोच के कर विवर्तन पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों को समझने के बार्द आप वस्तुओं की पूर्ति लोच के कर विवर्तन पर के आकार एवं दिशार् पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों को भलीभार्ंति समझ सकेंगे। आपको ध्यार्न देनार् होगार् कि अल्पकाल में पूर्ति की लोच बेलोचदार्र तथार् दीर्घकाल में पूर्ति लोचदार्र स्थिति में पार्यी जार्ती है। क्योंकि दीर्घकाल में मार्ंग की स्थिति के अनुसार्र पूर्ति में पर्यार्प्त तथार् मार्ंग के अनुसार्र परिवर्तन कियार् जार् सकतार् है। इस प्रकार पूर्ण प्रतियोगितार् के अन्तर्गत कर के भार्र क विवर्तन समयार्नुसार्र कम यार् अधिक सीमार् तक कियार् जार् सकतार् है। यदि वस्तु की पूर्ति लोचदार्र यार् पूर्ण लोचदार्र है तब कर के भार्र क विवर्तन उपभोक्तार्ओं की ओर आसार्नी से कियार् जार् सकतार् है तथार् उपभोक्तार् कर के नवीन भार्र को सहन करने में समर्थ होगार्।

इसके विपरीत यदि पूर्ति की लोच बेलोचदार्र श्रेणी की है तब कर क भार्र उपभोक्तार्ओं की ओर विवर्तित नहीं कियार् जार् सकतार् है तथार् कर क नवीन भार्र की विक्रेतार्ओं द्वार्रार् ही वहन कियार् जार्येगार्।

कर विवर्तन के सम्बन्ध में डॉल्टन ने स्पष्ट कियार् है कि, ‘‘विक्रेतार् पूर्ति को कम करके कर के भार्र को क्रेतार्ओं पर ढकेलने क प्रयत्न करतार् है और क्रेतार् इसकी मार्ंग कम करके विक्रेतार्ओं पर विवर्तित करने क प्रयत्न करतार् है। इन दोनों की सफलतार् इनकी सार्पेक्षित शक्तियों पर निर्भर करती है।’’

इस प्रकार मार्ंग-पूर्ति की लोच सम्बन्धी शक्तियार्ँ कर विवर्तन को पूर्ण रूप से प्रभार्वित करने क कार्य करती है। मार्ंग तथार् पूर्ति की लोच समबन्धी विचार्र धार्रार् के सम्बन्ध में डार्ल्टन क यह कथन अत्यन्त ही महत्वपूर्ण सिद्ध होतार् है – ‘‘किसी भी वस्तु पर लगार्ये गये कर क प्रत्यक्ष दार्यित्व भार्र विक्रेतार्ओंके मध्य लगार्यी गयी वस्तु की मार्ंग व पूर्ति की लचक के अनुपार्त पर निर्भर रहतार् है।’’

अपूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र में कर विवर्तन

आपको यह स्पष्ट करनार् अत्यन्त आवश्यक है कि पूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र तथार् एकाधिकार बार्जार्र को प्रार्य: काल्पनिक स्थितियार्ँ मार्नार् जार्तार् है। व्यवहार्र में अपूर्ण प्रतियोगितार् की स्थिति ही पार्यी जार्ती है जो पूर्ण प्रतियोगितार् तथार् कएार्धिकार के बीच की स्थिति होती है। अपूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र में वस्तु की कीमत, रंग एवं आकार (स्वरूप) तथार् गुणवत्तार् में पर्यार्प्त अन्तर पार्यार् जार्तार् है। अत: ऐसी स्थिति में कर क विवर्तन बार्जार्र के निम्नलिखित तत्वों पर निर्भर करतार् है।

एकाधिकारी प्रतियोगी बार्जार्र में उत्पार्दन की पूर्ति एवं कीमत सम्बन्धी नीतियों के कारण कर क विवर्तन अत्यन्त निम्न सीमार् तक ही कियार् जार्नार् सम्भव होतार् है। इसके सार्थ कर विवर्तन की सीमार् एवं दिशार् उत्पार्दकों के संयुक्त व्यवहार्र तथार् उनकी नीतियों पर निर्भर करतार् है। फिर भी एक बड़ी सीमार् तक उपभोक्तार् कर भार्र से दूर रहने की स्थिति में रहतार् है। क्योंकि अपूर्ण प्रतियोगी बार्जार्र में उपभोक्तार्ओं के पार्स निकट की स्थार्नार्न्तरण वस्तुयें आसार्नी से पार्यी जार्ती है। वस्तुओं की गुणवत्तार् तथार् उत्पार्दकों क व्यवहार्र तथार् विक्रय रणनीति कर-विवर्तन करने में सहार्यक होती हैं।

एकाधिकार के अन्तर्गत कर विवर्तन

जैसार् कि आपने पूर्ण प्रतियोगितार् के अन्तर्गत वस्तुओं की मार्ंग तथार् पूर्ति की लोचों के आधार्र पर कर विवर्तन क अध्ययन कियार्। ठीक इसी प्रकार एकाधिकार के अन्तर्गत वस्तु की मार्ंग तथार् पूर्ति की लोच के आधार्र पर कर क विवर्तन कियार् जार्तार् है। एकाधिकार के अन्तर्गत वस्तु क केवल एक ही उत्पार्दक तथार् विक्रेतार् होतार् है इसीलिये ऐसी स्थिति में कर क विवर्तन अत्यधिक मार्त्रार् में कियार् जार् सकतार् है। इसके सार्थ एकाधिकार पूर्ति क निर्धार्रक भी होतार् है। इसलिये इस आधार्र पर भी कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं के ऊपर आसार्नी से कियार् जार् सकतार् है।

एकाधिकारी बार्जार्र में कर क विवर्तन कितनार् होगार् यह कर की प्रवृत्ति पर निर्भर करतार् है। यदि कर एकमुश्त रूप में लगार्यार् जार्तार् है तो उत्पार्दक इस कर को स्थार्यी लार्गत के सार्थ समयोजित कर लियार् जार्तार् है तथार् वस्तु की सीमार्न्त लार्गत में वृद्धि नहीं होती है। ऐसी स्थिति में करों के भार्र को विवर्तित नहीं कियार् जार्येगार्। कर विवर्तन से विक्रेतार् यार् एकाधिकार के लार्भ में कमी आ जार्ती है। अत: कर की रार्शि क भुगतार्न एकाधिकारी द्वार्रार् स्वयं कियार् जार्तार् है।

इसके सार्थ एकाधिकार के अन्तर्गत कर मार्त्रार् में आधार्र पर आरोपित कियार् जार्तार् है तो उत्पार्दन की बिक्री की मार्त्रार् के आधार्र पर कर की रार्शि घटती तथार् बढ़ती रहती है। इस स्थिति में कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं की ओर होने लगतार् है। मार्त्रार् के अनुसार्र कर लगने से वस्तु की सीमार्न्त लार्गत बढ़ती है जिससे पूर्ववत मूल्यों पर वस्तुएँ बेचने से उसके लार्भ की मार्त्रार् घट जार्ती है। इसीलिये वह वस्तुओं की कीमत में वृद्धि करके कर क विवर्तन कियार् जार्तार् है।

एकाधिकारी बार्जार्र में मार्त्रार् के आधार्र पर करार्रोपण तथार् कर विवर्तन के सम्बन्ध में टेलर क यह कथन अत्यधिक साथक सिद्ध होतार् है – ‘‘दूसरे वर्ग के करों (वे कर जिनकी कुल मार्त्रार् उत्पार्दन यार् विक्रय की मार्त्रार् के अनुसार्र बदलती है परन्तु प्रति इकाई प्रमुख लार्गत में स्थार्यी वृद्धि होती है) को सार्मार्न्यत: आगे की ओर विवर्तित कियार् जार् सकतार् है। क्योंकि सम्पूर्ण तार्लिक में एक ही दर से सीमार्न्त लार्गत बढ़ जार्ती है, जिससे सीमार्न्त लार्गत, लार्भ व सीमार्न्त क नयार् सन्तुलन स्थार्पित होतार् है।’’

महत्वपूर्ण करों की स्थिति में कर विवर्तन

करार्पार्त एवं कर विवत्रन से सम्बन्धित विभिन्न महत्वपूर्ण तथ्यों क अध्ययन करने के बार्द अब आप समझ सकेंगे कि कुछ महत्वपूर्ण करों की स्थिति में कर विवर्तन के द्वार्रार् करार्पार्त की क्यार् स्थिति होती है। यहार्ँ पर कुछ महत्वपूर्ण करों के सम्बन्ध में कर विवर्तन एवं करार्पार्त की विवेचनार् करेंगे।

  1. आय कर : कुछ अर्थशार्स्त्रियों क मार्ननार् है कि विशेष स्थितियों में आय कर क विवर्तन कियार् जार् सकतार् है परन्तु सार्मार्न्यत: आय कर क विवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है। आय कर व्यक्तिगत आय पर लगार्यार् जार्तार् है तब उसके विवर्तन की कोई सम्भार्वनार् नहीं रहती है। इसके बार्द व्यार्वसार्यिक आय कर की स्थिति में अर्थशार्स्त्री एक मत नही है। मुख्यत: दोनों प्रकार की आय कर की स्थिति में कर-विवर्तन को सम्भव नहीं बनार्यार् जार् सकतार् है।
  2. बिक्रीकर एवं उत्पार्दन कर : बिक्रीकर तथार् उत्पार्दन कर की स्थिति में कर के विवर्तन को सम्भव कियार् गयार् है। इसके सार्थ कर को विवर्तन की मार्त्रार् वस्तु एवं सेवार् की मार्ंग व पूर्ति लोच के आधार्र पर तय की जार्ती है। कर लगने से वस्तु यार् सेवार् की कीमत वृद्धि होती है जिसे उपभोक्तार्ओं से वसूलने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। यदि मार्ंग की कीमत लोच बेलोचदार्र है तो कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं की ओर होगार् और करार्पार्त उपभोक्तार्ओं पर ही पड़ेगार्। लोचदार्र मार्ंग की स्थिति में करार्पार्त क विवर्तन पूर्ण रूप से उपभोक्तार्ओं पर नहीं कियार् जार् सकतार् है। इसके विपरीत पूर्ति लोच लोचदार्र है कर क विवर्तन उपभोक्तार् की ओर होगार् तथार् पूर्ति लोच बेलोचदार्र होने पर क विवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है।
  3. गृह कर : गृह कर की स्थिति में कर क विवर्तन हो सकतार् है और नहीं भी हो सकतार्। यदि घर में गृह मार्लिक क परिवार्र ही निवार्स करतार् है तो कर क भार्र गृह स्वार्मी को ही वहन करनार् होगार् तथार् कर क विवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है। जब घर में मकान मार्लिक के सार्थ किरार्ये दार्र भी रहते हैं तो कर क भार्र मकान मार्लिक व किरार्येदार्र पर संयुक्त रूप से पड़ेगार् क्योंकि कर भार्र क एक अंश किरार्ये के रूप में वृद्धि कर दी जार्येगी। ठीक इसके विपरीत यदि मकान में केवल किरार्येदार्र ही निवार्स करते हैं तो गृह कर क पूर्ण विवर्तन कर दियार् जार्येगार् तथार् करार्पार्त किरार्येदार्र पर ही पड़ेगार्।
  4. सीमार् शुल्क : आयार्त एवं निर्यार्त किये जार्ने वार्ले मार्ल एवं सेवार्ओं की कीमत लोच के आधार्र पर करों क विवर्तन कियार् जार् सकतार् है। यदि आयार्त होने वार्ले सार्मार्न की मार्ंग व पूर्ति बेलोचदार्र है तो कर क विवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है। इसी प्रकार निर्यार्त होने वार्ली वस्तु की मार्ंगलोच बेलोचदार्र है तो कर क विवर्तन कियार् जार् सकतार् है। यदि निर्यार्त की स्थार्नार्न्पन्न वस्तुएँ उपलब्ध हैं तो कर क भार्र निर्यार्तक को ही करनार् होगार्। 
  5. भूमि कर : भूमि कर की स्थिति में कर क विवर्तन कियार् भी जार् सकतार् है तथार् नहीं भी कियार् जार् सकतार् है। यदि कर की स्थिति में किसार्न अपनी फसल की कीमत बढ़ार्ने में सफल होतार् है तो कर क विवर्तन कृषि उत्पार्दन को खरीदने वार्लों पर कियार् जार् सकतार् है। यदि कर को मार्त्रार् क निर्धरण आर्थिक लगार्न पर लगार्यार् जार्तार् है तो कर क विवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है तथार् कर क भार्र भू-स्वार्मी को ही सहन करनार् होगार्। इसके सार्थ कृषि उत्पार्दन की मार्ंग की लोच के आधार्र कर क विवर्तन कियार् जार् सकतार् है। यदि उत्पार्दन की मार्ंग की लोच बेलोचदार्र है तो कर क विवर्तन आसार्नी से कियार् जार् सकतार् है तथार् उत्पार्दन की मार्ंग लोच इकाई से अधिक है तो कर क भार्र किसार्नों को ही वहन करनार् होगार्। कर क विवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है।
  6. सम्पत्ति कर : सम्पत्ति कर की स्थिति में कर विवर्तन की स्थिति आसार्न नहीं है। सार्मार्न्य रूप से कर क भार्र सम्पत्ति मार्लिक को ही सहन करनार् पड़तार् है। यदि सम्पत्ति क प्रत्यक्ष रूप से उपभोग कियार् जार् सकतार् है तो सम्पत्ति कर क विवर्तन उपभोक्तार्ओं पर कियार् भी जार् सकतार् है। इसके सार्थ यदि सम्पत्ति क प्रयोग उत्पार्दन कार्य में कियार् जार्तार् है तो उत्पार्दन की मार्ंग एवं पूर्ति की लोच के आधार्र पर कर क विवर्तन कियार् जार् सकतार् है।
  7. लार्भ कर : लार्भ कर की स्थिति में भी करों क भार्र व्यार्वसार्यिक निगमों के मार्लिकों को ही सहन करनार् पड़तार् है। क्योंकि यह कर आय कर के ही समकक्ष रखार् जार्तार् है। अत: लार्भ कर क विवर्तन करनार् सम्भव नहीं होतार् है।

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