कर्मचार्री क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 क्यार् है ?

अस्थार्यी आंशिक अशक्ततार्- अस्थार्यी आंशिक अशक्ततार् वह अषक्कततार् है, जिससे कर्मकार की उस नियोजन में उपाजन क्षमतार् अस्थार्यी अवधि के लिए कम हो जार्ती है, जिसमें वह दुर्घटनार् के समय लगार् हुआ थार्।

स्थार्यी आंशिक अशक्ततार् – स्थार्यी आंशिक अशक्ततार् वह अशक्ततार् है, जिससे कर्मकार की हर ऐसे नियोजन में उपाजन-क्षमतार् स्थार्यी रूप में कम हो जार्ती है, जिसे वह दुर्घटनार् के समय करने में समर्थ थार्। अधिनियम की अनुसूची 1 के भार्ग 2 में उन क्षतियों के इस भार्ग में विभिन्न प्रकार के विच्छेदन तथार् अन्य क्षतियों से होने वार्ली उपाजन-क्षमतार् की प्रतिशत हार्नि क भी उल्लेख कियार् गयार् है।

अस्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् – अस्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् ऐसी अशक्ततार् है, जो कर्मार्र को ऐसे सभी कामों के लिए अस्थार्यी तौर पर असमर्थ कर देती है, जिसे वह दुर्घटनार् के समय करने में समर्थ थार्। 
स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् – स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् वह अशक्ततार् है, जो कर्मकार को ऐसे सभी कामों के लिए स्थार्यी रूप से असमर्थ कर देती है, जिसे वह दुर्घटनार् के समय करने में असमर्थ थार्। अधिनियम की अनुसूची 1 के भार्ग 1 में उल्लखित निम्नलिखित क्षतियों से उत्पन्न अशक्ततार् को स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् समझार् जार्तार् है –

  1. दोनों हार्थों की हार्नि यार् उच्चतर स्थार्नों पर विच्छेदन; 
  2. एक हार्थ और एक पार्ंव की हार्नि; 
  3. टार्ँग यार् जंघार् से दोहरार् विच्छेदन यार् एक टँार्ग यार् जघार् से विच्छेदन और दूसरे पार्ँव की हार्नि; 
  4. आँखों की रोषनी की इस मार्त्रार् तक हार्नि कि कर्मकार ऐसार् कोर्इ काम करने में असमर्थ हो जार्तार् है जिसके लिए आँखों की रोषनी आवश्यक है; 
  5. चेहरे की बहुत गंभीर विद्रूपतार्; यार् 
  6. पूर्ण बधिरतार्। अधिनियम की अनुसूची 1 के भार्ग 2 में उन क्षतियों क उल्लेख कियार् गयार् है, जिनके परिणार्मस्वरूप स्थार्यी आंशिक अशक्ततार् उत्पन्न समझी जार्ती है। अनुसूची के इस भार्ग में विभिन्न प्रकार के विच्छेदनों तथार् अन्य क्षतियों से होने वार्ली उपाजन-क्षमतार् की प्रतिशत हार्नि क भी उल्लेख कियार् गयार् है। अगर किसी दुर्घटनार् के कारण कर्इ प्रकार की आंशिक अशक्तार्एं एक सार्थ उत्पन्न होती है और उनके कारण उपाजन-क्षमतार् की हार्नि 100 प्रतिशत यार् इससे अधिक होती है तो उसे भी स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् क मार्मलार् समझार् जार्तार् है। 

मजदूरी – अधिनियम के प्रयोजन के लिए ‘मजदूरी’ से ऐसी सुविधार् यार् लार्भ क बोध होतार् है, जिसे धन के रूप में प्रार्क्कलित कियार् जार् सकतार् है, लेकिन इसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित नही होते –

  1. यार्त्रार्-भत्तार्; 
  2. यार्त्रार्-संबंधी रियार्यत क मूल्य; 
  3. कर्मकार के लिए नियोजक द्वार्रार् पेंशन यार् भविष्य-निधि में दियार् गयार् अंशदार्न; यार् 
  4. कर्मकार के नियोजन की प्रकृति के कारण उस पर हुए विशेष खर्च के लिए उसे दी गर्इ रार्शि। 

 आश्रित – आश्रित से मृत कर्मकार के निम्नलिखित नार्तेदार्रों में किसी क बोध होतार् है –

  1. विधवार्, नार्बार्लिग धर्मज पुत्र, अविवार्हितार् धर्मज पुत्री यार् विधवार् मार्तार्; 
  2. अठार्रह वर्ष से अधिक उम्र क विकलार्ंग पुत्र यार् पुत्री अगर वह कर्मकार की मृत्यु के समय उसके उपाजनों पर पूरी तरह आश्रित थार् यार् थी; 
  3. कर्मकार की मृत्यु के समय उसके उपाजनों पर पूरी तरह यार् आंशिक रूप से यथार्निर्दिष्ट आश्रित- 1. विधुर, 2. विधवार् मार्तार् को छोड़कर मार्तार्-पितार्, 3. नार्बार्लिग अधर्मज पुत्र, अविवार्हितार् अधर्मज पुत्री, नार्बार्लिग विवार्हितार् धर्मज यार् अधर्मज पुत्री, यार् नार्बार्लिग विधवार् पुत्री चार्हे वह धर्मज हो यार् अधर्मज, 4. नार्बार्लिग भाइ यार् अविवार्हितार् बहन यार् नार्बार्लिग विधवार् बहन, 5. विधवार् पुत्रवधू, 6. पूर्वमृत पुत्र की नार्बार्लिग संतार्न, 7. पूर्वमृत पुत्री की नार्बार्लिग संतार्न अगर उस संतार्न के मार्तार्-पितार् में से कोर्इ भी जीवित नही है, यार् 8. जहार्ं कर्मकार के मार्तार्-पितार् में से कोर्इ भी जीवित नही है, वहार्ँ पितार्मह और पितार्मही। 

    क्षतिपूर्ति के लिए नियोजक क दार्यित्व 

      दार्यित्व के लिए आवश्यक शर्ते – 

      अगर किसी कर्मकार की नियोजन के दौरार्न तथार् नियोजन से उत्पन्न होनेवार्ली दुर्घटनार् से व्यक्तिगत क्षति होती हो, तो उसक नियोजक क्षतिपूर्ति के लिए दार्यी होतार् है। इस तरह, क्षतिपूर्ति के दार्यी होने के लिए निम्नलिखित दशार्ओं क होनार् आवश्यक है –

      1. दुर्घटनार् क नियोजन के दौरार्न होनार्; 
      2. दुर्घटनार् क नियोजन के कारण यार् उससे उत्पन्न होनार्; तथार् 
      3. दुर्घटनार् के फलस्वरूप कर्मकार क व्यक्तिगत रूप से क्षतिग्रस्त होनार्। उपर्युक्त तीनों दशार्ओं के बार्रे में प्रार्य: विवार्द उठ खड़े होते हैं। इस कारण इनकी व्यार्ख्यार् आवश्यक है।

      नियोजन के दौरार्न दुर्घटनार् क होनार् –

      नियोजन के दौरार्न से दुर्घटनार् होने के समय क बोध होतार् है। नियोजक दुर्घटनार् के लिए तभी जिम्मेदार्र होतार् है, जब वह कार्यस्थल में समुचित समय और स्थार्न की सीमार्ओं में हुर्इ हो। सार्धार्रणत:, 166 जब दुर्घटनार् कर्मकार की निर्धार्रित कार्यविधियों के अंदर कार्यस्थल यार् नियोजक के परिसर में हुर्इ हो, तो उसे नियोजन के दौरार्न समझार् जार्तार् है। लेकिन, कुछ स्थितियों में यह सार्बित करनार् कठिन होतार् है कि दुर्घटनार् नियोजन के दौरार्न हुर्इ है। पहलार्, काम में अस्थार्यी व्यतिरेक की अवधियों को नियोजन के दौरार्न तभी सम्मिलित समझार् जार्तार् है, जब व्यतिरेक नियोजक के लिए समुचित रूप से आवश्यक यार् आनुवार्ंगिक हो। अगर कर्मकार अपने व्यक्तिगत काम के लिए काम छोड़तार् है, तो उसे नियोजन के दौरार्न नहीं समझार् जार्तार्। मार्न्यतार् प्रार्प्त अंतरार्लों, जैसे विश्रार्म-अंतरार्ल को नियोजन के दौरार्न समझार् जार्तार् है। उपर्युक्त सभी अवधियों में अगर कर्मकार नियोजक यार् उसके प्रतिनिधि के आदेशार्नुसार्र काम करतार् है, तो उसे नियोजन के दौरार्न समझार् जार्तार् है।

      दुर्घटनार् क नियोजन से उत्पन्न होनार् – 

      अगर कोर्इ दुर्घटनार् नियोजन की प्रकृति, दशार्ओं, दार्यित्वों यार् घटनार्ओं में निहित किसी खतरे के कारण होती है, तो उसे नियोजन से उत्पन्न समझार् जार्तार् है। सार्धार्रणत:, अगर यह सार्बित हो जार्तार् है कि दुर्घटनार् नियोजन के दौरार्न उत्पन्न होतार् हुर्इ है, तो उसे नियोजन से उत्पन्न भी समझार् जार्तार् है। निम्नलिखित स्थितियों में दुर्घटनार् नियोजन से उत्पन्न नही समझी जार्ती – पद्ध अगर कर्मकार उसे सुपुर्द किए हुए काम छोड़कर कोर्इ दूसरार् काम करतार् है, तो उसे नियोजन से उत्पन्न नही समझार् जार्तार्। लेकिन, अगर वह नियोजक के आदेश से दूसरे कामगार्र क काम करतार् है, तो उसे नियोजन से उत्पन्न समझार् जार्तार् है;

      1. अगर कर्मकार अपने नियोजन से प्रत्यक्ष यार् परोक्ष रूप से संबद्ध कार्यो को छोड़कर अपनार् व्यक्तिगत काम करतार् हो; 
      2. अगर कर्मकार अपनार् काम असार्वधार्नी से ही नही, बल्कि उतार्वलेपन से करतार् हो; 
      3. अगर कर्मकार को अन्य कामगार्रों के सार्थ बार्हरी खतरों क सार्मनार् करनार् पड़ार् हो; जैसे – बिजली गिरनार् भूकंप आदि; 
      4. अगर कर्मकार को अपनी शार्रीरिक दशार्, जैसे मिरगी के आक्रमण के कारण दुर्घटनार् क सार्मनार् करनार् पड़ार् हो; 
      5. घार्तक दुर्घटनार्ओं को छोड़कर अन्य दुर्घटनार्ओं की स्थिति में अगर कर्मकार को उसकी मतार्वस्थार् के कारण दुर्घटनार् क सार्मनार् करनार् पड़ार् हो; 
      6. अगर कर्मकार को ऐसी जगह दुर्घटनार् क सार्मनार् करनार् पड़ार् हो, जहार्ँ उसकी उपस्थिति आवश्यक नही थी; यार् 
      7. अगर काम पर लगार् कर्मकार दूसरे के पहले से दुर्घटनार्ग्रस्त हो जार्तार् हो। 

      दुर्घटनार् से कर्मकार क व्यक्तिगत रूप से क्षतिगस्त होनार् – 

      दुर्घटनार् के फलस्वरूप कर्मकार क व्यक्तिगत रूप से क्षतिग्रस्त होनार् आवश्यक है। अगर दुर्घटनार् से उसे किसी तरह की व्यक्तिगत क्षति नहीं पहुंचती हो तो वह क्षतिपूर्ति होनार् आवश्यक है। अगर दुर्घटनार् से उसे किसी तरह की व्यक्तिगत क्षति नहीं पहंचु ती हो तो वह क्षतिपूर्ति के लिए दार्वेदार्र नही हो सकतार्। अधिनियम के अंतर्गत क्षतिपूर्ति कर्मकार की मृत्यु, उसकी अस्थार्यी आंशिक और पूर्ण अशक्ततार् तथार् स्थार्यी आंशिक और पूर्ण अशक्ततार् की स्थितियों में ही देय होती है।

      क्षतिपूर्ति के लिए नियोजक के दार्यी नहीं होने की दशार्एं-

      नियोजक दशार्ओं में क्षतिपूर्ति के लिए दार्यी नही होतार् –

      1. ऐसी क्षति की स्थिति में, जिसके परिणार्मस्वरूप कर्मकार की अशक्ततार् पूर्ण यार् आंशिक रूप से तीन दिनों से अधिक अवधि के लिए नही होती; 
      2. कर्मकार की मृत्यु यार् उसकी स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् की स्थिति को छोड़कर दुर्घटनार् द्वार्रार् ऐसी क्षति के लिए, जो कर्मकार पर मदिरार् यार् औशधियों के असर के कारण हुर्इ हो; 
      3.  कर्मकार की मृत्यु यार् उसकी स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् की स्थिति को छोड़कर दुर्घटनार् द्वार्रार् ऐसी क्षति के लिए, जो कर्मकार पर मदिरार् यार् औशधियों के असर के कारण हुर्इ हो; 
      4. कर्मकार की मृत्यु यार् उसकी स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् की स्थिति को छोड़कर दुर्घटनार् द्वार्रार् ऐसी क्षति के लिए जो कर्मकार को सुरक्षार् के लिए उपार्य यार् युक्ति को उसके द्वार्रार् जार्न-बूझकर हटार्ए जार्ने यार् उसकी अवहेलनार् के कारण हुर्इ हो। 

      व्यार्वसार्यिक रोगों के लिए क्षतिपूर्ति क दार्यित्व –

      अधिनियम की अनुसूची III में कर्इ ऐसे व्यार्वसार्यिक रोगों क उल्लेख कियार् गयार् है, जिन्हें नियोजन के दौरार्न और नियोजन से उत्पन्न दुर्घटनार् के फलस्वरूप हुर्इ क्षति समझार् जार्तार् है और नियोजक के लिए इन रोगों के शिकार कर्मकारों को क्षतिपूर्ति देनार् आवश्यक है। अधिनियम में इन व्यार्वसार्यिक रोगों को तीन श्रेणियों में रखार् गयार् है –

      1. अनुसूची ‘III’ के भार्ग ‘A’ में कुछ विशेष प्रकार के नियोजनों में हो सकने वार्ले व्यार्वसार्यिक रोगों क उल्लेख कियार् गयार् है। अगर कोर्इ कर्मकार ऐसे किसी नियोजन में काम करते रहने के फलस्वरूप उससे संबद्ध व्यार्वसार्यिक रोग से ग्रस्त हो जार्तार् है, तो उसे नियोजन के दौरार्न और नियोजन से उत्पन्न दुर्घटनार् से होने वार्ली क्षति समझार् जार्तार् है, और नियोजक के लिए इन रोगों से ग्रस्त कर्मकारों को क्षतिपूर्ति देनार् आवश्यक है।
      2. अनुसूची ‘III’ के भार्ग ‘B’ में कुछ ऐसे व्यार्वसार्यिक रोगों क उल्लेख कियार् गयार् है, जो कुछ विशेष नियोजनों में कर्मकार के लगार्तार्र 6 महीने से अधिक अवधि तक काम करते रहने के कारण हो सकते है। अगर कर्मकार ऐसे किसी नियोजन में लगार्तार्र 6 महीने से अधिक अवधि तक काम करने के बार्द उससे संबद्ध व्यार्वसार्यिक रोग से ग्रस्त हो जार्तार् है, तो उसे भी नियोजन के दौरार्न और नियोजन से उत्पन्न दुर्घटनार् के फलस्वरूप होने वार्ली क्षति समझार् जार्तार् है और उसके लिए क्षतिपूर्ण देय होती है। 
      3. अनुसूची ‘III’ के भार्ग ‘C’ में ऐसे व्यार्वसार्यिक रोगों क उल्लेख कियार् गयार् है, जिनसे कर्मकार एक यार् अधिक नियोजकों के यहार्ं केन्द्र सरकार द्वार्रार् विहित अवधि तक उल्लिखित नियोजनों में काम कर चुकने के बार्द ग्रस्त हो सकते हैं। केन्द्र सरकार द्वार्रार् निर्धार्रित अवधि से कम अवधि तक काम करने पर भी कर्मकार क्षतिपूर्ति क दार्वेदार्र हो सकतार् है, यदि यह सिद्ध हो जार्ए कि रोग नियोजन के दौरार्न और नियोजन से उत्पन्न हुआ है। केन्द्र एवं रार्ज्य सरकारों को अनुसूची अनुसूची ‘III’ में अन्य व्यार्वसार्यिक रोगों को जोड़ने यार् शार्मिल करने की शक्ति प्रार्प्त है।

      वे स्थितियार्ँ जिनमें कर्मकार को दार्वे क अधिकार नही होतार्- यदि कर्मकार ने नियोजक यार् किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध किसी सिविल न्यार्यार्लय में किसी क्षति के लिए नुकसार्नी क कोर्इ वार्द चलार् दियार् है, तो उसे इस अधिनियम क अंतर्गत क्षतिपूर्ति पार्ने क अधिकार नहीं होतार्। इसी तरह, अगर किसी क्षति के बार्रे में क्षतिपूर्ति क कोर्इ दार्वार् कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त के समक्ष रखार् गयार् हो यार् इस अधिनियम के अनुसार्र क्षतिपूर्ति के लिए कर्मकार और नियोजक के बीच कोर्इ समझौतार् हो चुक हो, तो कर्मकार द्वार्रार् नुकसार्नी के लिए किसी न्यार्यार्लय में वार्द नही चलार्यार् जार् सकतार्। 

      क्षतिपूर्ति की रकम –

      अधिनियम में अलग-अलग प्रकार की क्षतियों के लिए क्षतिपूर्ति की अलग-अलग रकम और दरें निर्धार्रित की गर्इ है। पहले, विभिन्न मजदूरी-श्रेणियों के लिए मृत्यु, स्थार्यी एवं अशक्ततार् तथार् अस्थार्यी अशक्ततार् के लिए क्षतिपूर्ति की वार्स्तविक रार्शि अधिनियम में ही विहित कर दी गर्इ थी। लेकिन 1984 के एक संशोधन के अनुसार्र क्षतिपूर्ति की गणनार् के तरीकों क नए ढंग से उल्लेख कियार् गयार् है। विभिन्न प्रकार की क्षतियों के लिए क्षतिपूर्ति की रार्शि और उसके निर्धार्रण के तरीके निम्नार्ंकित प्रकार है –

      1. मृत्यु की स्थिति में क्षतिपूर्ति की रकम- दुर्घटनार् के फलस्वरूप होने वार्ले मृत्यु की स्थिति में क्षतिपूर्ति की रकम मृत कर्मकार की मजदूरी के 50 प्रतिशत को तार्लिक 5 में दिए गए सुसंगत कारक से गुणार् करने पर आने वार्ली रार्शि यार् 80000 रुपये, जो भी अधिक है, होती है, अगर किसी कर्मकार की मजदूरी 4000 रुपये प्रतिमार्ह से अधिक है, तो क्षतिपूर्ति की रार्शि की गणनार् 4000 रुपये की मजदूरी पर ही की जार्एगी। 
      2. स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् की स्थिति में क्षतिपूर्ति की रकम- दुर्घटनार् के फलस्वरूप होने वार्ली स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् की स्थिति में क्षतिपूर्ति की रकम कर्मकार की मजदूरी के 60 प्रतिशत को तार्लिक 5 में दिए गए सुसंगत कारक से गुणार् करने पर आने वार्ली रार्शि यार् 90000 रुपये, जो भी अधिक है, होती है। अगर किसी कर्मकार की मजदूरी 4000 रुपये प्रतिमार्ह से अधिक है तो क्षतिपूर्ति की गणनार् 4000 रुपये की मजदूरी पर ही की जार्एगी। 
      3. स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् की स्थिति में क्षतिपूर्ति की रकम – स्थार्यी आंशिक अशक्ततार् की स्थिति में क्षतिपूर्ति की रार्शि स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् के लिए देय रार्शि क वह अनुपार्त होती है, जिस अनुपार्त में कर्मकार की उपाजन क्षमतार् की हार्नि होती है। उदार्हरणाथ, अगर किसी कर्मकार को देय स्थार्यी पूर्ण अशक्ततार् के लिए क्षतिपूर्ति की रार्शि 30000 रुपये है और स्थार्यी आंशिक अशक्ततार् से उसकी उपाजन-क्षमतार् में 50 प्रतिशत की हार्नि हुर्इ है, तो स्थार्यी आंशिक अशक्ततार् के लिए क्षतिपूर्ति की रार्शि 15000 रुपये होगी। 
      4. अस्थार्यी आंशिक यार् पूर्ण अशक्ततार् के लिए क्षतिपूर्ति की रकम – अस्थार्यी आंशिक यार् पूर्ण अशक्ततार् के लिए क्षतिपूर्ति की अधिकतम रार्शि कर्मकार की मजदूरी क 25 प्रतिशत अर्द्धमार्सिक भुगतार्न के रूप में दी जार्ने वार्ली रार्शि होती है। जहार्ँ अशक्ततार् 28 दिनों से अधिक अवधि के लिए होती है, वहार्ँ अस्थार्यी अशक्ततार् के लिए अर्द्धमार्सिक भुगतार्न दुर्घटनार् के दिन के सोलहवें दिन प्रार्रंभ हो जार्तार् है। जहार्ं अशक्ततार् 28 दिनों से कम अवधि के लिए होती है, वहार्ँ अर्द्धमार्सिक भुगतार्न 3 दिनों की प्रतीक्षार्-अवधि की समार्प्ति के बार्द सोलहवें दिन प्रार्रंभ होतार् है। अर्द्धमार्सिक भुगतार्न अशक्ततार् की अवधि तक यार् पार्ँच वर्षो के लिए, जो भी अधिक हो, कियार् जार्तार् है। 

      अगर कोर्इ दुर्घटनार्ग्रस्त कामगार्र अस्थार्यी अशक्ततार् की अवधि में कुछ अर्जित करतार् है, तो अर्द्धमार्सिक भुगतार्न की रकम उसके द्वार्रार् दुर्घटनार् के पहले और बार्द में उस अवधि के लिए अर्जित मजदूरी के अंतर से अधिक नहीं हो सकती। उदार्हरणाथ, अगर कामगार्र के अर्द्धमार्सिक भुगतार्न की रकम 1000 रुपये है और वह दुर्घटनार् के बार्द 400 रुपये अर्द्धमार्सिक मजदूरी अर्जित कर लेतार् है, तो उसे क्षतिपूर्ति के रूप में 60 रू0 अर्द्धमार्सिक से अधिक क भुगतार्न नहीं कियार् जार्एगार्। अगर कामगार्र नियोजक से क्षतिपूर्ति के रूप में कोर्इ भुगतार्न यार् भत्तार् प्रार्प्त करतार् है, तो उस रार्शि को अधिनियम के अंतर्गत देय क्षतिपूर्ति की रकम से काट लियार् जार्एगार्। अगर अर्द्धमार्सिक भुगतार्न की किसी अवधि के पूरार् होने के पहले ही दुर्घटनार्ग्रस्त कामगार्र की अशक्ततार् समार्प्त हो जार्ती है, तो क्षतिपूर्ति की रार्शि उसी अनुपार्त में कम कर दी जार्एगी।
      जब किसी कर्मकार की दुर्घटनार् भार्रत के बार्हर हुर्इ हो, तो कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त क्षतिपूर्ति की रार्शि निर्धार्रित करते समय उस देश के कानून के अंतर्गत उसे मिली हुर्इ क्षतिपूर्ति की रार्शि को ध्यार्न में रखेगार् और इस अधिनियम के अधीन उसे मिलने वार्ली रार्शि में विदेश में मिली रार्शि को घटार् देगार्।

      क्षतिपूर्ति क भुगतार्न और वितरण 

      क्षतिपूर्ति के भुगतार्न क समय – 

      नियोजक के लिए क्षतिपूर्ति क भुगतार्न उस समय करनार् आवश्यक है, जिस समय वह देय हो जार्ती है। अगर नियोजक क्षतिपूर्ति की पूरी रार्शि क दार्यित्व स्वीकार नही करतार्, तो वह कामगार्र को उस रकम क भुगतार्न कर देगार्, जिसक दार्यित्व वह स्वीकार करतार् है। इस रकम को कामगार्र को दे दियार् जार् सकतार् है यार् उसे कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त के पार्स जमार् कियार् जार् सकतार् है। अगर नियोजक क्षतिपूर्ति की रार्शि क भुगतार्न उसके बकाए होने के एक महीने के अन्दर नहीं करतार्, तो आयुक्त बकाए की रार्शि को 12 प्रतिशत के सार्धार्रण ब्यार्ज के सार्थ देने क आदेश दे सकतार् है। अगर आयुक्त नियोजक द्वार्रार् क्षतिपूर्ति की रार्शि देने में देरी को अनुचित समझतार् है, तो वह उस रार्शि क 50 प्रतिशत जुर्मार्ने के रूप में 170 जमार् करने क आदेश दे सकतार् है। ब्यार्ज यार् जुर्मार्ने की रार्शि कर्मकार यार् उसके आश्रित को देय होती है।

      अर्द्धमार्सिक भुगतार्न क पुनर्विलोन और रूपार्न्तरण-

      अधिनियम के अंतर्गत किसी भी अर्द्धमार्सिक भुगतार्नको,  चार्हे वह किसी समझौते के अनुसार्र हो यार् आयुक्त के निदेशार्नुसार्र, नियोजक यार् कर्मकार के आवेदन पत्र आयुक्त द्वार्रार् पुनर्विलोकित कियार् जार् सकतार् है। पुनर्विलोकन के बार्द अर्द्धमार्सिक भुगतार्न को चार्लू रखार् जार् सकतार् है यार् उसे बढ़ार्यार्, घटार्यार् यार् समार्प्त कियार् जार् सकतार् है। अगर कर्मकार की अस्थार्यी अशक्ततार् स्थार्यी अशक्ततार् में बदल गर्इ हो, तो अर्द्धमार्सिक भुगतार्न को एकमुश्त रार्शि से बदल दियार् जार् सकतार् है, लेकिन इस एकमुश्त रार्शि से अर्द्धमार्सिक भुगतार्न के रूप में दी गर्इ रार्शि को काट लियार् जार्एगार्। अर्द्धमार्सिक भुगतार्न की रार्शि को पक्षकारों के बीच समझौते यार् आयुक्त के आदेश से एकमुश्त रार्शि में बदलार् जार् सकतार् है। अर्द्धमार्सिक भुगतार्न को एकमुश्त रार्शि में तभी बदलार् जार् सकतार् है, जब उसक भुगतार्न कम-से-कम 6 महीने तक हो चुक हो। इस रूपार्न्तरण के लिए दोनों पक्षकारों में किसी एक द्वार्रार् आवेदन देनार् आवश्यक है। 

      क्षतिपूर्ति क वितरण- 

      दुर्घटनार् के फलस्वरूप कर्मकार की मृत्यु की स्थिति में तथार् किसी स्त्री यार् विधिक निर्योग्यतार् वार्ले व्यक्ति को देय एकमुश्त रार्शि को कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त के पार्स जमार् करनार् आवश्यक है। इन स्थितियों में नियोजक द्वार्रार् सीधे भुगतार्न की जार्ने वार्ली रार्शि को क्षतिपूर्ति नही समझार् जार्एगार्। केवल कर्मकार की मृत्यु की स्थिति में नियोजक उसके किसी आश्रित को अधिकतम तीन महीने की मजदूरी (देय क्षतिपूर्ति की रार्शि से अधिक नही) अग्रिम दे सकतार् है, लेकिन अंतिम भुगतार्न करते समय इस रार्शि को आयुक्त के आदेश पर काट दियार् जार्एगार्। अगर भुगतार्न पार्ने वार्लार् व्यक्ति क्षतिपूर्ति क अधिकारी नही है, तो उसे अग्रिम की रार्शि लौटार्नी पड़ेगी। अगर मृत कामगार्र क कोर्इ आश्रित नही है, तो आयुक्त के आदेश से क्षतिपूर्ति के रूप में जमार् की गर्इ रार्शि नियोजक को लौटार् दी जार्एगी। अन्य स्थितियों में आयुक्त क्षतिपूर्ति की रार्शि को आश्रितों के बीच यार् केवल एक ही आश्रित को अपने विवके से वितरित कर सकतार् है। इस अधिनियम के अधीन देय किसी एकमुश्त रार्शि यार् अर्द्धमार्सिक भुगतार्न को कर्मकार को छोड़कर अन्य व्यक्ति को सार्ंपै ार् यार् हस्तार्ंतरित नही कियार् जार् सकतार् और न ही उसकी कुर्की की जार् सकती है।

      कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त –

      रार्ज्य सरकार कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्तों को नियुक्ति कर सकती है। जहार्ं एक से अधिक आयुक्तों की नियुक्ति की गर्इ है, वहार्ं उनके कार्यो क वितरण करनार् आवश्यक है। आयुक्त भार्रतीय दंडसंहितार् के अर्थ में लोकसेवक होतार् है। उसे सिविल प्रक्रियार्-संहितार् के अंतर्गत गवार्ही लेने, गवार्हों को हार्जिर करने, दस्तार्वेजों और वस्तुओं को पेश करने के लिए विवश करने के संबंध में सिविल न्यार्यार्लय की शक्ति प्रार्प्त रहती है। उसे दंड प्रक्रियार् संहितार् के अंतर्गत सिविल न्यार्यार्लय की शक्तियार्ं भी प्रार्प्त है। आयुक्त क्षतिपूर्ति से संबद्ध किसी कानून के प्रश्न को विनिश्चित करने के लिए उच्च न्यार्यार्लय में भेज सकतार् है। अगर आयुक्त के निर्णय के विरुद्ध कोर्इ अपील उच्च न्यार्यार्लय में की गर्इ हो, तो वह अपने पार्स जमार् की गर्इ रार्शि को उच्च न्यार्यार्लय के निर्णय होने तक रोक रख सकतार् है। आयुक्त अधिनियम यार् उसके अधीन किए गए किसी समझौते के अनुसार्र देय क्षतिपूर्ति की रार्शि को भू-रार्जस्व के बकाए के रूप से वसूल कर सकतार् है।

      संविदार्एं और समझौते 

        1. संविदार् करनार्- अगर कोर्इ दुर्घटनार्ग्रस्त कामगार्र क्षतिपूर्ति के लिए विधिक रूप से दार्यी व्यक्ति की जगह किसी अन्य व्यक्ति से क्षतिपूर्ति प्रार्प्त करतार् है, तो क्षतिपूर्ति देने वार्ले व्यक्ति को उसके विधिक रूप से दार्यी व्यक्ति से क्षतिपूर्ति की रार्शि वसूल करने क अधिकार होतार् है। 
        2. संविदार् द्वार्रार् त्यार्ग – इस अधिनियम के प्रार्रंभ होने के पहले यार् बार्द में कियार् गयार् कोर्इ भी करार्र यार् समझौतार्, जिसके अनुसार्र दुर्घटनार् के फलस्वरूप होने वार्ली व्यक्तिगत क्षति के लिए नियोजक से मिलने वार्ली क्षतिपूर्ति क अधिकार त्यार्ग देतार् है यार् जिससे अधिनियम के अधीन क्षतिपूर्ति क दार्यित्व हटार्यार् जार्तार् है यार् कम कियार् जार्तार् है, तो वह वार्लित यार् शून्य यार् प्रभार्वहीन होतार् है। 
        3. समझौतों क पंजीकरण – अगर क्षतिपूर्ति के रूप में देय किसी एकमुश्त रकम यार् अर्द्धमार्सिक भुगतार्न के बार्रे में कोर्इ समझौतार् हुआ हो, तो नियोजक उसके ज्ञार्पन को आयुक्त के पार्स पंजीकरण के लिए भेजेगार्। अगर आयुक्त इस बार्त से संतुश्ठ है कि समझौतार् असली है, तो वह उसे विहित तरीके से पंजीकृत कर देगार्। जहार्ँ आयुक्त समझतार् है कि किसी स्त्री यार् विधिक निर्योग्यतार् के अधीन किसी व्यक्ति को देय रकम अपर्यार्प्त है यार् समझौतार् कपट, दबार्व यार् अन्य अनुचित तरीके से करार्यार् गयार् है, तो वह उसे पंजीकृत करने से इन्कार कर देगार्। पंजीकृत समझौतार् अधिनियम के अंतर्गत कानूनी रूप से मार्न्य समझार् जार्तार् है। 

          जहार्ँ नियोजक किसी समझौते के ज्ञार्पन को आयुक्त के पार्स नही भेजतार् है, वहार्ँ नियोजक अधिनियम के अधीन निर्धार्रित क्षतिपूर्ति की पूरी रकम के भुगतार्न क दार्यी होतार् है।

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