करार्धार्न के सिद्धार्ंत –

करार्धार्न के सिद्धार्ंत

By Bandey

अनुक्रम

वर्तमार्न समय में सरकार के कार्यों में वृद्धि होने के सार्थ ही सार्थ सरकारी खर्च में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। आजकल प्रत्येक सरकार के सार्मने एक महत्त्वपूर्ण समस्यार् यह होती है कि वह अपने खर्चों की वित्तीय व्यवस्थार् के लिए पर्यार्प्त मार्त्रार् में आय केसे प्रार्प्त करें। सरकार अस्थार्यी रूप से तो उधार्र द्वार्रार् भी आय प्रार्प्त कर सकती है, परन्तु कुछ समय बार्द तो उन्हें भी वार्पिस ही करनी होती है। कुछ सरकारी आय सरकारी उद्यमों, प्रशार्सनिक एवं न्यार्यिक कार्यों तथार् ऐसे ही अन्य स्रोतों से भी प्रार्प्त की जार्ती है, परन्तु सरकारी आय क एक बड़ार् भार्ग करार्धार्न (taxation) से ही प्रार्प्त होतार् है।

करार्धार्न क विकास

प्रार्चीन समुदार्यों में लोग सरकार की सहार्यतार् के लिए अपनी ऐच्छिक सेवार्एँ दियार् करते थे। किन्तु रार्ज्य के उदय के सार्थ-सार्थ ही सरकार के संचार्लन के लिए कर यार् उपहार्र तथार् खार्नों व अन्य उद्यमों की आय प्रार्प्त की जार्ने लगी। प्रार्चीन रार्ज्य सम्पत्ति कर, आय कर, वस्तु कर तथार् उत्तरार्धिकार करों क संग्रह कभी-कभी ही करते थे और वह भी थोड़ी मार्त्रार् में और केवल संकटकालीन आय के रूप में। प्रार्चीन रार्ज्यों को लघु व्यय के लिए करार्धार्न की किसी विस्तृत पद्धति की आवश्यकतार् नहीं होती थी।


यदि आधुनिक रार्ज्यों की कर-पद्धतियों के उद्गम क लगार्नार् है तो, जैसे कि प्लेन (Plehn) ने कहार् है, वह प्रार्चीन रार्जकोषीय व्यवस्थार् की बजार्य सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् (feudal system) में अधिक अच्छी तरह ढूंढ़ार् जार् सकतार् है। रोम के पतन के बार्द काफी लम्बे समय तक शार्सक (rulers) अपने खर्चों की पूर्ति अपनी स्वयं की भूमि की आय से तथार् अपनी प्रजार् के अनिवाय अंशदार्नों से कियार् करते थे उस समय सार्मन्तवार्दी बार्जार्रों के शुल्क, सुरक्षार् के शुल्क, सड़कों पुछों व घार्टों के उपयोग क शुल्क, भूमि के किरार्ये आदि की अदार्यगियार्ँ, जो कि वस्तुओं और सेवार्ओं के रूप में की जार्ती थीं, धीरे-धीरे मौद्रिक अदार्यगियों (money payments) में बदल गर्इं और आगे चलकर जब मौद्रिक अर्थव्यवस्थार् (money economy) नें जन्म लियार् तो इन्हीं अदार्यगियों ने करों  क रूप धार्रण कर लियार्।

दस्तकारी के युग में जैसे-जैसे नई-नई वस्तुएँ बनने लगीं और नये-नये प्रकार के उद्योग स्थार्पित होने लगे, वैसे-वैसे ही व्यक्तिगत पदाथों पर भूमि-कर, उत्पार्दन-कर, सीमार् शुल्क, बार्जार्र कर, पथ कर तथार् अन्य कर लगार्ये जार्ने लगे। यह बार्त स्मरणीय है कि प्रार्चीन देय रार्शियों क करों के रूप में परिवर्तन एकदम नहीं, बल्कि व्रफमिक रूप से शनै-शनै: हुआ।

सन् 1500 के पश्चार्त् जब आधुनिक रार्ज्य क उदय हुआ, तो शनै: शनै: करार्धार्न (Taxation) ने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थार्न प्रार्प्त कर लियार्। सरकारी खर्च की वृद्धि के सार्थ ही आय के नये-नये स्रोत ढूँढ़ने आवश्यक हो गये और वे ढूँढे़ गये नई-नई सम्पत्तियों पर, नई-नई व्यार्वसार्यिक क्रियार्ओं पर तथार् उपभोग की नई-नई वस्तुओं पर कर लगार्कर 19वीं और 20वीं शतार्ब्दी में आय कर तथार् उत्तरार्धिकार कर क महत्त्व बढ़ार्। प्रथम विश्वयुद्ध तो अपने सार्थ मार्नो भार्री खर्चों की बार्ढ़ ही ले आयार् जिसकी पूर्ति के लिए भार्री कष्टदार्यी करार्धार्न की व्यवस्थार् की गई। युद्ध में फंसे रार्ष्ट्रों ने अपने पुरार्ने करों को चरम सीमार् तक बढ़ार् दियार् और नये-नये सार्मार्न्य बिव्रफी कर तथार् अनार्वर्ती पूँजी कर (capital levies) लार्गू कर दिये। युद्धकाल के बार्द क समय तो उँचे करार्धार्न दृष्टि से और भी उल्लेखनीय रहार्। सन् 1929 के अन्त में आरम्भ होने वार्ली और लम्बी अवधि तक ¯खचने वार्ली मन्दी (depression) ने कुछ प्रचलित करों की उपयोगितार् को समार्प्त कर दियार् और सार्मार्जिक सहार्यतार् पर सरकारी व्यय में होने वार्ली वृद्धि ने नये-नये करों की मार्ँग उत्पन्न कर दी। पर इसके बार्वजूद, मन्दी अवधि में करार्धार्न सम्पूर्ण अर्थव्यवस्थार् के लिए कोई अधिक लार्भकारी सिद्ध नहीं हुआ। आजकल तो बदलती हुई आर्थिक, रार्जनैतिक और सार्मार्जिक दशार्ओं के कारण पुनर्निर्मार्ण की प्रक्रियार् में रार्जकोषीय कार्यवार्हियार्ँ ही सहार्यक होती हैं। अत: इस बार्त को समझनार् बहुत आवश्यक है कि एक अच्छी कर पद्धति के निर्धार्रक तत्व क्यार् हैं, जिससे कि वह पद्धति विभिन्न परिस्थितियों में अर्थव्यवस्थार् की आवश्यकतार्ओं को पूरार् कर सके।

अत: इस प्रश्न पर जब सम्पूर्ण रूप में एवं व्यार्पक दृष्टिकोण से विचार्र कियार् जार्तार् है तो प्रश्न उठतार् है कि अच्छी कर-पद्धति में कौन-कौन-सी विशेषतार्एँ होनी चार्हिए। सर्वप्रथम तो, उसमें अच्छे करों क समार्वेश होनार् चार्हिए क्योंकि करों से ही कर-पद्धति क निर्मार्ण होतार् है। एडम स्मिथ सम्भवत: सबसे पहले अर्थशार्स्त्री थे जिन्होंने करार्धार्न के सिद्धार्ंतो क अथवार् करार्धार्न के नियमों क प्रतिपार्दन कियार्। तत्पश्चार्त् अन्य अर्थशार्स्त्रियों जिनमें पिफण्डले शिरार्ज, बेस्टेबिल प्रमुख हैं, ने करार्रोपण के अन्य सिद्धार्ंतो क प्रतिपार्दन कियार्।

एडम स्मिथ के करार्धार्न सिद्धार्ंत

एडम स्मिथ द्वार्रार् प्रस्तुत करार्धार्न के सिद्धार्ंत यार् नियम हैं-

समार्नतार् क सिद्धार्ंत

समार्नतार् यार् समन्यार्य क सिद्धार्ंत (Canon of equality or equity) एडम स्मिथ द्वार्रार् प्रतिपार्दित सबसे पहलार् सिद्धार्ंत है। इसके अनुसार्र, फ्प्रत्येक रार्ज्य के नार्गरिकों को यथार्सम्भव अपनी-अपनी योग्यतार् के अनुपार्त में सरकार की सहार्यतार् के लिए अंशदार्न करनार् चार्हिए, अर्थार्त् उस आय के अनुपार्त में जिसक आनन्द वे रार्ज्य के संरक्षण में प्रार्प्त करते हैं…। इस सिद्धार्ंत क अनुकरण करने से करार्धार्न की समार्नतार् प्रार्प्त की जार् सकती है और इसकी उपेक्षार् करने से करार्धार्न की असमार्नतार् यह सिद्धार्ंत यह स्पष्ट बतार्तार् है कि सरकार को अपने व्यय की पूर्ति के लिए प्रत्येक नार्गरिक से उसकी योग्यतार्नुसार्र कर वसूल करनार् चार्हिए।

आलोचनार् (Criticism)-इसक अर्थ यह है कि व्यक्ति रार्ज्य की सुरक्षार् में जो आय प्रार्प्त करतार् है, उस पर अनुपार्ती दरों से कर लगार्यार् जार्नार् चार्हिए। यद्यपि एक स्थार्न पर स्मिथ ने यह भी कहार् कि धनी लोगों को अपने धन के अनुपार्त में नहीं बल्कि उससे भी अधिक कर अदार् करनार् चार्हिए, जिसक अर्थ है आरोही करार्धार्न (progressive taxation)। किन्तु आधुनिक अर्थशार्स्त्री एडम स्मिथ की इस बार्त से सहमत नहीं हैं कि अनुपार्त कर (proportional taxes) समन्यार्यपूर्ण होते हैं। अत: समार्नतार् के सिद्धार्ंत को लार्गू करने के लिए उन्होंने आरोही करार्धार्न की वकालत की। इस प्रकार आधुनिक अर्थशार्स्त्रियों क एडम स्मिथ के करार्धार्न के सार्धनों अर्थार्त् करार्धार्न की दरों के बार्रे में ही मतभेद है, करार्धार्न के लक्ष्यों के बार्रे में नहीं।

निश्चिततार् क सिद्धार्ंत

एडम स्मिथ क दूसरार् सिद्धार्ंत निश्चिततार् क सिद्धार्ंत है। इसके अनुसार्र, फ्प्रत्येक व्यक्ति को जो कर देतार् है, वह निश्चित होनार् चार्हिए, मनमार्नार् नहीं। कर के भुगतार्न क समय, भुगतार्न की विधि तथार् भुगतार्न की रार्शि आदि करदार्तार् तथार् प्रत्येक अन्य व्यक्ति को स्पष्ट होनी चार्हिए। कर के मार्मले में, किसी व्यक्ति को जो रकम अदार् करती है उसकी निश्चिततार् (certainty) इतने महत्त्व की बार्त है कि समस्त देशों के अनुभव के आधार्र पर मेरार् विचार्र है कि काफी मार्त्रार् की असमार्नतार् भी इतनी भयार्नक नहीं है जितनी कि बहुत थोड़ी मार्त्रार् की अनिश्चिततार्। हैडले ने इस सिद्धार्ंत क समर्थन कियार् है। उसक कहनार् है कि इससे व्यक्ति तथार् सरकार दोनों को लार्भ है क्योंकि व्यक्ति को अनिश्चिततार् रहती है कि उसे कितनार् कर और किस समय देनार् है। इसके विपरीत सरकार को अपने बजट संतुलित करने में सहार्यतार् मिलती है।

आलोचनार् (Criticism)-यह कहार् जार्तार् है कि कर क भुगतार्न अनिवाय होतार् है अत: वह एक प्रकार से निश्चित-सार् ही होतार् है। इस स्थिति में इस सिद्धार्ंत क कोई महत्त्व नहीं है। परन्तु यह बार्त सैद्धार्न्तिक रूप से ही सत्य हो सकती है। जहार्ँ तक व्यवहार्र क प्रश्न है, इस सिद्धार्ंत की उपयोगितार् किसी प्रकार भी कम नहीं होती। उदार्हरण के लिए, आयकर क भुगतार्न, भुगतार्न की दर तथार् भुगतार्न क समय आदि सभी बार्तें करदार्तार्ओं व कर-अधिकारियों को अच्छी तरह मार्लूम होती हैं परन्तु पिफर भी उन के बीच विवार्द उत्पन्न होते हैं और वे अदार्लतों में जार्ते हैं। ऐसे अनेक मार्मले देखने को मिलते हैं जिनमें कर-अधिकारियों द्वार्रार् करदार्तार्ओं को परेशार्न कियार् जार्तार् है। वार्स्तव में बार्त यह है कि कर क निर्धार्रण करने में अनेक व्यार्वहार्रिक कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है और निश्चिततार् के सिद्धार्ंत क उद्देश्य इन्हीं कठिनार्इयों को दूर करनार् है तार्कि सरकार को प्रार्प्त होने वार्ली आय निश्चित हो जार्ए।

सुविधार् क सिद्धार्ंत

एडम स्मिथ क तीसरार् सिद्धार्ंत सुविधार् क सिद्धार्ंत है। इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र, फ्प्रत्येक कर ऐसे समय तथार् ऐसी रीति से वसूल कियार् जार्नार् चार्हिए कि उसको अदार् करनार् करदार्तार् के लिए सबसे अधिक सुविधार्जनक हो। इसक अर्थ है कि कर ऐसे तरी के से लगार्यार् जार्नार् चार्हिए और ऐसे समय लगार्यार् जार्नार् चार्हिए जबकि करदार्तार् उसक अत्यन्त सुविधार् के सार्थ भुगतार्न कर सके। उदार्हरण के लिए, भू-रार्जस्व यार् मार्लगुजार्री ;संदक तमअमदनमद्ध को वसूल करने क सर्वोत्तम समय वह होतार् है जबकि फसल काटी जार्ती है। इसी प्रकार, मकानों के किरार्ये पर लगार्यार् जार्ने वार्लार् कर उस समय वसूल कियार् जार्नार् चार्हिए जबकि करदार्तार् को उसे देने में सबसे अधिक सुविधार् हो। परोक्ष कर इतने सुविधार्जनक होते हैं कि व्यक्ति कर के भुगतार्न की तुलनार् में वस्तुओं की कीमतों के रूप में अधिक सुविधार्जनक मार्नते हैं। उपयोगी वस्तुओं की तुलनार् में विलार्सितार्ओं की वस्तुओं पर लगार्ये गये कर अधिक सुविधार्जनक होते हैं।

आलोचनार् (Criticism)-स्मिथ ने उन करों क भी कारणों सहित उल्लेख कियार् जिनको कि बड़ी सुविधार् के सार्थ एकत्र कियार् जार् सकतार् है। यह हैं विलार्सितार् की वस्तुओं पर कर। फ्उपभोगी वस्तुओं ;बवदेनउंइसम हववकेद्ध जैसे कि विलार्सितार् की व ऐश की वस्तुओं पर लगार्ये गये कर बहुत सुविधार्पूर्ण होते हैं क्योंकि उपभोक्तार्ओं को जिस रूप में उन्हें देनार् पडतार् है वह बहुत सुविधार्जनक होतार् है। इन करों क भुगतार्न उपभोक्तार् के लिए सुिधार्जनक होतार् है क्योंकि वह धीरे-धीरे जब-जब वस्तुएँ खरीदतार् है तो वैसे-वैसे ही वह थोड़ार्-थोड़ार् कर अदार् करतार् रहतार् है और वह जब चार्हतार् है तभी अदार् करतार् है, क्योंकि उन वस्तुओं को सर्वार्धिक सुविधार्जनक समय पर खरीदनार् यार् बिल्कुल न खरीदनार् उसकी इच्छार् पर निर्भर होतार् है।

मितव्ययितार् क सिद्धार्ंत

स्मिथ क चौथार् और अन्तिम सिद्धार्ंत है मितव्ययितार् यार् किपफार्यत क सिद्धार्ंत। इसके अनुसार्र, फ्प्रत्येक कर इस प्रकार लगार्यार् तथार् वसूल कियार् जार्नार् चार्हिए कि उसके द्वार्रार् रार्ज्य के कोष में जितनार् धन आये, लोगों की जेब से उसके अलार्वार् फार्लतू धन कम से कम मार्त्रार् में निकले। इस सिद्धार्ंत क उद्देश्य है कि कर-वसूली की प्रशार्सनिक लार्गत कम से कम रखी जार्ये, अर्थार्त् लोगों की जेब से बार्हर आने वार्ले धन तथार् रार्जकोष में जमार् किये जार्ने वार्ले धन में कम से कम अन्तर हो। एडम स्मिथ ने यह भी कहार् कि जनतार् द्वार्रार् दिये जार्ने वार्ले कर क सहकारी कोष से आने वार्ली रकम में आधिक्य चार्र दशार्ओं में हो सकतार् है-

(i) सर्वप्रथम, कर लगार्ने तथार् वसूल करने के लिए भार्री संख्यार् में अधिकारियों की जरूरत पड़ सकती है जिनक वेतन ही इतनार् होगार् कि कर के रूप में प्रार्प्त धनरार्शि क काफी बड़ार् भार्ग तो उसमें तो खर्च हो जार्येगार् और पिफर रार्ज्य-कार्य के लिए करदार्तार्ओं को पहले से अधिक कर देनार् पड़ेगार्। अत: यह आवश्यक है कि कर वसूल करने की प्रशार्सनिक लार्गत कम से कम होनी चार्हिए।

(ii) दूसरे, कर लोगों के उद्योग व व्यार्पार्र में बार्धार् डार्ल सकते हैं और लोगों को व्यवसार्य की कुछ ऐसी शार्खार्एँ चार्लू करने के विषय में हतोत्सार्हित कर सकते हैं जो बहुसंख्यक लोगों के लिए जीविक तथार् निर्वार्ह क सार्धन बन सकती थीं।

(iii) तीसरे, कुछ दुर्भार्ग्यशार्ली व्यत्तिफ करों से बचने क असफल प्रयार्स करते हैं और पकड़े जार्ने पर जब उन पर जुर्मार्नार् होतार् है अथवार् उनकी सम्पत्ति आदि जब्त की जार्ती है तो उससे उनक व्यार्पार्र भी चौपट हो जार्तार् है और ऐसार् होने से समुदार्य को उस व्यवसार्य से मिलने वार्ले लार्भ भी समार्प्त हो जार्ते हैं। इसके अतिरित्तफ, एक अविवेकी कर अधिकारी करों की चोरी व तस्करी के लिए स्वयं ही एक बड़ार् आकर्षण बनार् रहतार् है। अत: कर इतने भार्री नहीं होने चार्हिए कि उससे करों को छिपार्ने क प्रलोभन मिले और करदार्तार् पर अनार्वश्यक अतिरित्तफ बोझ पड़े।

(iv) चौथे, कर अधिकारियों के बार्र-बार्र के दौरों से तथार् खार्तों आदि की अनार्वश्यक जार्ँच-पड़तार्ल से भी करदार्तार्ओं पर अनार्वश्यक परेशार्नी, घबरार्हट तथार् दबार्व पड़ सकतार् है। अत: कर-पद्धति बहुत सरल होनी चार्हिए तार्कि वह कर अधिकारियों द्वार्रार् परेशार्नी तथार् उत्तेजनार् पैदार् करने क कारण न बने।

एडम स्मिथ के सिद्धार्ंत की आलोचनार्

एडम स्मिथ के करार्रोपण के सिद्धार्ंतो के अध्ययन के उपरार्न्त यह ज्ञार्त होतार् है कि समार्नतार् के सिद्धार्ंत को छोड़कर अन्य सभी सिद्धार्ंत कर-नीति क कोई निश्चित आधार्र निर्मित नहीं करते। इन्हें सिद्धार्ंत न कहकर कर-अधिकारियों के प्रशार्सन सम्बन्धी निर्देश कह सकते हैं। समार्नतार् अथवार् न्यार्यशीलतार् क सिद्धार्ंत भी करदेय क्षमतार् की कोई निश्चित मार्प नहीं बतलार्तार्। एडम स्मिथ के सिद्धार्ंतो के उपर्युत्तफ दोष होने पर भी अर्थशार्स्त्रियों ने इन सिद्धार्ंतो को करार्रोपण के लिए पर्यार्प्त महत्त्वपूर्ण मार्नार् है। प्रोपेफसर शिरार्ज के मतार्नुसार्र, एडम स्मिथ के पश्चार्त् फ्कोई भी विद्वार्न करों के नियमों को इतने सरल तथार् स्पष्ट रूप में नहीं रख सक जैसार् कि एडम स्मिथ ने। प्रो. बी. आर. मिश्रार् के शब्दों में-फ्योग्यतार् क नियम करार्रोपण क एक सिद्धार्ंत है, अन्य तीन करों से सम्बन्धित प्रशार्सकीय नियम हैं।

करार्धार्न के अन्य सिद्धार्ंत

बेस्टेबिल जैसे कई लेखकों ने एडम स्मिथ के अलार्वार् कुछ अन्य सिद्धार्ंतो क भी प्रतिपार्दन कियार् है। ये सिद्धार्ंत हैं-

उत्पार्दकतार् क सिद्धार्ंत

बेस्टेबिल (Bastable) ने अपने करार्धार्न के सिद्धार्ंतो को महत्त्व के व्रफम में रखार्। इस व्रफम में उन्होंने सबसे पहलार् स्थार्न उत्पार्दकतार् अथवार् उत्पार्दितार् के सिद्धार्ंत को दियार्। अन्य शब्दों में, सर्वप्रथम करार्धार्न को उत्पार्दक होनार् चार्हिए। स्पष्ट है कि बेस्टेबिल ने कर की उत्पार्दकतार् को सर्वोच्च महत्त्व प्रदार्न कियार्। कर की उत्पार्दकतार् दो प्रकार से प्रार्प्त की जार् सकती है। सर्वप्रथम, कर ऐसी होनार् चार्हिए जो सरकार के संचार्लन के लिए यथेष्ट मार्त्रार् में धन दे सके। बेस्टेबिल के शब्दों में, फ्रार्जस्व व्यवस्थार् क मुख्य उद्देश्य रार्ज्य के खर्चों के लिए आय प्रार्प्त करनार् होतार् है, अत: वित्त मन्त्री स्वभार्वत: ही कर द्वार्रार् प्रार्प्त होने वार्ली रकम से ही उसके गुणों क अनुमार्न लगार्तार् है। दूसरे, कर ऐसार् होनार् चार्हिए जो अल्पकालीन तथार् दीर्घकालीन, दोनों ही दृष्टिकोणों से न तो उत्पार्दन को हतोत्सार्हित करे और न उसमें बार्धार् डार्लें।

लोच क सिद्धार्ंत

कर-प्रणार्ली में लोच क होनार् भी अत्यन्त आवश्यक है। बेस्टेबिल ने लोच के सिद्धार्ंत को काफी महत्त्वपूर्ण बतलार्यार्। उन्होंने कहार् कि कर ऐसे होने चार्हिए कि सरकार की आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र उनमें घटार्-बढ़ी की जार् सके। सरकार को अकाल यार् बार्ढ़ क सार्मनार् करने के लिए तथार् युद्ध, विकास कार्यों एवं अन्य सम्भार्वित कारणों के लिए अधिक धन की आवश्यकतार् हो सकती है। इस स्थिति में सरकार के सार्धनों में तेजी से वृद्धि केवल तभी की जार् सकती है जबकि उसकी कर पद्धति लोचदार्र (elastic) हो। उदार्हरण के लिए, सम्पत्ति तथार् वस्तुओं पर लगार्ये जार्ने वार्ले कर उतने लोचदार्र नहीं होते, जितनार् कि आय-कर होतार् है।

विविधतार् क सिद्धार्ंत

एक कर-पद्धति (single tax system) तथार् बहु कर-पद्धति (multiple tax system) में तुलनार्त्मक लार्भों के बार्रे में पहले से ही काफी विवार्द बनार् रहार् है। एक-कर लगार्ने के सम्बन्ध में विचार्रकों द्वार्रार् समय-समय पर अनेक प्रस्तार्व किये जार्ते रहे हैं। उदार्हरण के लिए फिजियोव्रेफट्स (physiocrates) ने भूमि के आर्थिक लगार्न पर ही एक-कर लगार्ने क सुझार्व दियार्। इसी प्रकार, केवल आय पर ही एक-कर लगार्ने के सम्बन्ध में अनेक तर्वफ दिये जार्ते हैं। एक-कर में अनेक कमियार्ँ पार्ई जार्ती है-(i) हो सकतार् है कि चह पर्यार्प्त आय न प्रदार्न करे, (ii) हो सकतार् है कि इसके द्वार्रार् करार्धार्न के भार्र क वितरण सन्तोषजनक न हो, (iii) इसवफो वसूल करनार् कठिन तथार् खर्चीलार् हो सकतार् है, (iv) इसमें कर से बचने क प्रलोभन भी काफी हो सकतार् है।

इसके विपरीत बहु-विध करार्धार्न (multiple taxation) में इन सब दोषों के पार्ये जार्ने की बहुत कम सम्भार्वनार् है। जहार्ँ तक तर्कों क प्रश्न है, तरार्जू क पलड़ार् एक-कर के विरुद्ध जार्तार् है। इसी कारण कुछ लेखकों ने करार्धार्न की अनेकतार् यार् विविधतार् पर भार्री जोर दियार् ।

करों की अनेकतार् क अर्थ कि प्रत्यक्ष, तथार् परोक्ष अनेक प्रकार के कर होने चार्हिएँ तार्कि नार्गरिकों क प्रत्येक वर्ग रार्ज्य की आय में अपनार् योगदार्न कर सके। एक-कर पद्धति की तुलनार् में सार्मार्न्यत: बहु-कर पद्धति को प्रमुखतार् दी जार्ती है। परन्तु करों में अत्यधिक विविधतार् (multiplicity) क होनार् भी उचित नहीं मार्नार् जार्तार्, क्योंकि अत्यधिक विविधतार् मितव्ययितार् तथार् उत्पार्दकतार् के सिद्धार्ंतो के विरुद्ध पड़ती है। यदि करों की संख्यार् बहुत अधिक हुई तो उसक परिणार्म यह होगार् कि उनमें प्रत्येक कर थोड़ी-थोड़ी ही आय प्रदार्न करेगार् जिससे उन के संग्रह की लार्गत बढ़ जार्येगी।

डार्ल्टन क सुझार्व थार् कि बहुत अधिक की बजार्य थोड़े से ठोस करों पर ही निर्भर रहार् जार्ये। यह अच्छार् होगार् कि सरकारी आय के अधिकाँश भार्ग के लिए थोड़े से करों पर ही निर्भर रहार् जार्ये। डार्ल्टन क विचार्र थार् कि यदि बहुत अधिक मार्त्रार् में कर लगार्ये गये तो प्रशार्सनिक व्यवस्थार् की कार्यकुशलतार् नष्ट हो जार्येगी। अत: प्रशार्सन की कार्यकुशलतार् बनार्ये रखने के लिए यह आवश्यक है कि कर सीमित मार्त्रार् में लगार्ये जार्एँ किन्तु प्रो. आर्थर यंग क कहनार् है कि, यदि मुझसे एक अच्छी कर-पद्धति की व्यार्ख्यार् करने को कहार् जार्ये तो मैं कहूँगार् कि अच्छी कर-पद्धति वह है जो लोगों की अपरिमित संख्यार् पर बहुत हल्क दबार्व डार्ले और भार्री दबार्व किसी पर भी नहीं। परन्तु यह ध्यार्न रहे कि ऐसे करों के अवरोही प्रभार्व (regressive effects) न पड़ें।

इस प्रकार, उचित यह है कि करार्धार्न के भार्र को सम्पूर्ण अर्थव्यवस्थार् पर विस्तृत रूप से पैफलार् दियार् जार्ये, तार्कि उसके किसी एक भार्ग को अधिक क्षति न पहँुचे। अत: निष्कर्ष रूप में कहार् जार् सकतार् है कि एक अच्छी कर-पद्धति बहुविध करार्धार्न (multiple taxation) के सिद्धार्ंतो पर आधार्रित होनी चार्हिए, किन्तु ऐसार् करने में उत्पार्दक तथार् मितव्ययितार् के प्रयार्सों को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे।

सरलतार् क सिद्धार्ंत

कर ऐसार् होनार् चार्हिए कि करदार्तार् उसे सरलतार् से समझ सके। दूसरे शब्दों में, कर की प्रवृति उसक उद्देश्य, भुगतार्न क समय, कर-निर्धार्रण क तरीक तथार् आधार्र आदि सभी ऐसे होने चार्हिएँ कि प्रत्येक करदार्तार् उनको आसार्नी से समझ सके तथार् उनक पार्लन कर सके। स्पष्ट है कि यह सिद्धार्ंत करदार्तार् की अनेक कठिनार्इयों को दूर करतार् है परन्तु आधुनिक कर-व्यवस्थार् में, जिनकी प्रकृति काफी जटिल हो गई है, इस सिद्धार्ंत क पार्लन करनार् कठिन है। तथार्पि यह कहार् जार् सकतार् है कि प्रशार्सनिक कार्य-कुशलतार् (administrative efficiency) अच्छी कर-पद्धति क एक महत्त्वपूर्ण निर्धार्रक तत्व है और वह कुशलतार् आसार्नी से तभी लार्ई लार् सकती है जबकि कर-पद्धति काफी सरल हो। जब कर-पद्धति होगी और उसे समझने में कोई कठिनार्ई नहीं होगी तो करदार्तार् को हिसार्ब-कितार्ब सम्बन्धी यार् प्रशार्सनिक अथवार् अन्य किसी प्रकार की कठिनार्ई क भी सार्मनार् नहीं करनार् पडे़गार्। फलस्वरूप, सरकार के लिए कर-आय की वसूली भी आसार्न हो जार्येगी। अत: करार्धार्न के इस सिद्धार्ंत को अपनार्ने से ही कर-पद्धति की कुशलतार् बढ़ार्ई जार् सकती है।

वार्ंछनीयतार् क सिद्धार्ंत

इसक अभिप्रार्य यह है कि सरकार को केवल वे ही कर लगार्ने चार्हिए जो उचित व वार्ंछनीय हों। इस दृष्टि से सरकार जब भी कोई नयार् कर लगार्ये यार् पुरार्ने करों में वृद्धि करे तो यह देखार् जार्नार् चार्हिए कि करदार्तार्ओं पर उसकी क्यार् प्रतिक्रियार् होती है। कभी-कभी ऐसार् प्रतीत होतार् है कि कोई कर वार्ँछनीय भी है और उसमें एक अच्छे कर की अधिकांश विशेषतार्एँ भी पार्ई जार्ती हैं परन्तु सरकार उस कर को लगार्नार् समयार्नुकूल न मार्ने। उदार्हरण के लिए, भार्रत में एक आरोही वृफषि आयकर को अत्यन्त वार्ँछनीय मार्नार् जार्तार् है परन्तु इसे आज तक उस रूप में लार्गू नहीं कियार् गयार् जिस रूप में लार्गू कियार् जार्नार् चार्हिए। अत: लोकतन्त्रीय देशों में, जहार्ँ कि जनतार् की इच्छार्ओं क आदर कियार् जार्तार् है, इस सिद्धार्ंत को बड़ार् महत्त्व प्रदार्न कियार् जार्तार् है।

समन्वय क सिद्धार्ंत

लोकतन्त्रीय देशों में केन्द्र, रार्ज्य तथार् स्थार्नीय सरकारों द्वार्रार् लगार्ये जार्ते हैं। अत: यह वार्ँछनीय है कि विभिन्न सरकारों द्वार्रार् लगार्ये जार्ने वार्ले करों के बीच समन्वय बनार् रहे। करदार्तार् और सरकार दोनों के ही हितों की दृष्टि से ऐसार् होनार् अत्यन्त आवश्यक है, विशेष रूप से लोकतन्त्रीय देशों में।

उपभोक्तार् बचत क सिद्धार्ंत

माशल के अनुसार्र सरकार को कर लगार्ते समय निम्नलिखित दो तथ्यों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए-(i) कर उन्हीं वस्तुओं पर लगार्यार् जार्नार् चार्हिए जिनसे उपभोत्तफार्ओं को बचत प्रार्प्त हो रही हो तार्कि उन वस्तुओं पर कर लगार्ने के पश्चार्त् भी उपभोत्तफार्ओं क आकर्षण बनार् रहे। (ii) सरकार को उन्हीं वस्तुओं पर कर लगार्नार् चार्हिए जिन पर कर के कारण से उपभोक्तार् बचत के त्यार्ग से अधिक सरकार को आय प्रार्प्त हो तभी अधिकतम कल्यार्ण प्रार्प्त होगार्।

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