कपार्लभार्ति के प्रकार, क्रियार्विधि और उसके लार्भ

कपार्लभार्ति के प्रकार, क्रियार्विधि और उसके लार्भ

By Bandey

अनुक्रम

कपार्लभार्ति षटकर्मों की अन्तिम क्रियार् है। कपार्ल क अर्थ है मस्तिष्क, व भॉंति क अर्थ होतार् है चमकानार्, अर्थार्त प्रकासित करनार्। कपार्लभॉति की क्रियार् में मतिष्क क क शोधन होतार् है। वस्तुत: कपार्लभार्ति शोधन की ही क्रियार् है परन्तु कई जगह इसे प्रार्णार्यार्म की क्रियार् भी कहार् गयार् है।  षटकर्म की अन्तिम ( कपार्लभार्ति ) की प्रक्रियार् में जल व वार्यु द्वार्रार् शरीर क शुद्धिकरण कियार् जार्तार् है विशेषत: कपार्लभॉति की प्रक्रियार् में मस्तिष्क क शोधन होतार् है। शोधन की क्रियार् होने के कारण इसे षटकर्म कहार् जार्तार् है। कपार्लभॉति की एक प्रक्रियार् में श्वार्स-प्रष्वोस को जोड़ार् जार्तार् है। चूँकि यह प्रक्रियार् प्रार्णार्यार्म (श्वार्स-प्रष्वार्स) पर आधार्रित है इसलिए इसे प्रार्णार्यार्म भी कहार् जार्तार् है। शार्स्त्रीय मार्न्यार्तार् है कि प्रार्णार्यार्म के मार्ध्यम से श्वार्स क्रियार् पर व्यक्ति नियंत्रण कर सकतार् है। प्रार्णार्यार्म की तीन प्रक्रियार्ये पूरक, कुम्भक व रेचक मस्तिष्क को अनुप्रार्णित तो करती ही है सार्थ ही सार्थ हमार्रे रक्त क शोधन भी करती है। कपार्लभॉति की प्रक्रियार् में योगी झटके से श्वार्स क रेचक करतार् है इसलिए श्वार्स के सार्थ जुड़े रहने के कारण इसे प्रार्णार्यार्म कहार् गयार् है।

कपार्लभार्ति के प्रकार

कपार्लभॉति के तीन प्रकार बतार्ये है।


वार्तकर्म कपार्लभार्ति

वार्त क अर्थ है हवार्, वार्यु कर्म क अर्थ है क्रियार्। कपार्ल क अर्थ मस्तिष्क, भार्ति क अर्थ है धोंकनी यार् प्रकाशित इस प्रक्रियार् में वार्यु में वार्यु तत्व से लोहार्र की धौकनी के समार्न शीघ्रतार् से रेचक करते हुए मस्तिष्क को प्रकाशित करते है। मस्तिष्क को प्रकाशित करने से तार्त्पर्य है कि मस्तिष्क के एक-एक कोश को अनुप्रार्णित करनार्। अगर मस्तिष्क क एक-एक कोश अनुप्रार्णित हो गयार् तो सार्धक सार्मार्न्य व्यक्ति से महार्मार्नव तक बन सकतार् है। सार्धक समार्धि की अवस्थार् तक पहुँच सकतार् है।

क्रियार्विधि –

  1. ध्यार्न के किसी आसन में बैठ जार्ये।
  2. कमर, गर्दन व रीढ की हड़्डी को एक सीध में रखे।
  3. दोनों हार्थों को घुटनों पर रखें।
  4. दार्नों नार्सार्छिद्रों से श्वार्स को झटके के सार्थ बार्हर निकाले तथार् पेट को अन्दर पिचकायें।
  5. तद्पश्चार्त् विश्रार्म कर पुन: प्रक्रियार् को दोहरार्ये।

लार्भ –

  1. पार्चन संस्थार्न के रोगों में लार्भकारी है।
  2. मस्तिष्क क शोधन कर मार्नसिक विकारों से मुक्त करती है।
  3. मोटार्पार् को कम करतार् है तथार् फेफड़ों की क्षमतार् को बढ़ती है।
  4. कुण्डलिनी जार्गरण में लार्भकारी अभ्यार्स है।

सार्वधार्नियॉं –

  1. गर्भवती महिलार्यें इस अभ्यार्स को न करें।
  2. हानियार् यार् पेट क आपरेशन हुआ हो तो भी यह अभ्यार्स नहीं करनार् चार्हिए।
  3. उच्च रक्तचार्प, हृदय रोग के रोगी इस अभ्यार्स को न करे।
  4. अभ्यार्स के दौरार्न चक्कर आने लगे तो अभ्यार्स बन्द कर दे।

व्युत्क्रम कपार्लभार्ति

व्युत क अर्थ है उल्टार् तथार् क्रम क अर्थ है क्रियार्। व्युत्क्रम कपार्लभॉति की इस प्रक्रियार् में नार्क से पार्नी खींचकर मुँह से निकालार् जार्तार् है।

क्रियार्विधि-

व्युतक्रम कपार्लभार्ति की वर्तमार्न प्रचलित क्रियार्विधि क वर्णन इस प्रकार है-

  1. सर्वप्रथम हल्क नमक डलार् हुआ गुनगुनार् पार्नी लें।
  2. ग्लार्स, नेति पार्त्र यार् जग में उस पार्नी को डार्ल दे।
  3. कागी गुद्रार् में बैठे तथार् दोनों नार्सार्छिद्रोंको पार्नी में डुबार् दे।
  4. दोनों नार्सार्छिद्रों से जल को अन्दर खीचें फिर श्वार्स छोड़ते हुए मुँह से पार्नी को बार्हर निकाल दें।

लार्भ –

  1. नार्सिक माग को स्वच्छ करने वार्लार् अभ्यार्स है।
  2. आज्ञार् तथार् बिन्दु चक्र पर इसक सकारार्त्मक प्रभार्व पड़तार् है।
  3. खेचरी मुद्रार् की सिद्धि में लार्भकारी है।
  4. श्वशन संस्थार्न को स्वच्छ करतार् है नेत्र रोगों में लार्भकारी है।

सार्वधार्नियॉं –

यह एक कठिन अभ्यार्स है योग्य गुरू के निर्देशार्नुसार्र ही इस अभ्यार्स को करनार् चार्हिए।

शीतक्रम कपार्लभार्ति

शीत क अर्थ है ठण्डार् व क्रम क अर्थ है क्रियार् चूँकि इस क्रियार् से शीतलतार् प्रदार्न होती है इसलिए इसे शीतक्रम कपार्लभार्ति कहते है। महर्षि घेरण्ड शीतक्रम कपार्लभार्ति की प्रक्रियार् तथार् लार्भों को बतार्ते कहते है- शीत्कार करतार् हुआ सार्धक मुख के द्वार्रार् जल ग्रहण कर नार्सिक के द्वार्रार् निकाल दें। यह क्रियार् शीतक्रम कपार्लभॉति कहलार्ती है। इसके द्वार्रार् सार्धक क शरीर कामदेव के समार्न सुन्दर हो जार्तार् है और वाधक्य यार् बुढ़ार्पार् नहीं सतार्तार्। शरीर में स्वदच्छतार् उत्पन्न होती है तथार् कफदोष क निवार्रण होतार् है।

क्रियार्विधि –

  1. सर्वप्रथम हल्क नमक युक्त गुनगुनार् पार्नी ले।
  2. पार्नी को गिलार्स की सहार्यतार् से मुँह में डार्लकर पूरार् मुँह भर लें।
  3. लम्बी् गहरी नार्क से श्वार्स भरें।
  4. पार्नी को गले तक घुटके तद्पश्चार्त ठोडी को कण्ठ कूप पर मिलार्ये।
  5. श्वार्स को दोनों नार्सार्छिद्रों से बार्हर निकाले तो जल स्वत: ही दोनों नार्सिक से बार्हर निकल जार्येगार्।

लार्भ –

  1. इस क्रियार् से शरीर सुन्दर तथार् कान्तिमय हो जार्तार् है।
  2. नार्सिक माग तथार् “वसन संस्थार्न की गन्दगी बार्हर निकल जार्ती है।
  3. शीतक्रम कपार्लभार्ति करने से वृद्धार्वस्थार्, बिमार्री छू नहीं सकती है।
  4. मन शार्न्त रहतार् है मार्नसिक रोगों से मुक्ति मिलती है।

सार्वधार्नियॉं –

  1. यह एक गोपनीय क्रियार् है गुरू के संरक्षण में ही इसक अभ्यार्स करें।
  2. प्रयोग किये जार्ने वार्लार् जल स्वच्छ हो तथार् उसमें नमक डलार् हुआ हो।

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