औद्योगिक सम्प्रेषण यार् औद्योगिक संचार्र

इस प्रकार आवश्यकतार् को ध्यार्न में रखकर दोनों ही विधियों क इस प्रकार उपयोग कियार् जार्नार् चार्हिए कि इनके दोषों क यथार् सम्भव निवार्रण हो सके। दोनों विधियों क सम्मिलित प्रयोग अधिक उचित है। आधुनिक युग में लिखित विधि क उपयोग अधिक कियार् जार्तार् है।

मोटे तौर पर सम्प्रेषण दो प्रकार क होतार् है :- (i) लम्बवत्  (ii) क्षैतिज यार् समस्तरीय

हर संगठन में निम्नतम स्तर से उच्चतम स्तर तक सीधार् संवार्द कायम रहनार् अनिवाय होतार् है। किन्तु, यह सम्प्रेषण निर्वार्ध रूप से नीचे से ऊपर तक नहीं जार्तार्। एक बिन्दु से शुरू होने वार्लार् संप्रेषण एक स्तर तक ही जार्तार् है। आवश्यकतार् होने पर ही इसे और उच्च स्तर पर संप्रेषित कियार् जार्तार् है। इसी वजह से इसे अंत:स्तरीय संचार्र भी कहार् जार्तार् है। इस प्रकार के संचार्र को मुख्यतयार् दो भार्गों में बार्ँटकर अध्ययन कर सकते हैं

इसके अन्तर्गत विचार्रों तथार् सूचनार्ओं क प्रवार्ह उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर होतार् है। अर्थार्त ् यह सम्प्रेषण पब्र न्धन व अधिकारी वगर् की ओर से कर्मचार्री व श्रमिक वर्ग की ओर होतार् है। इसके अन्तर्गत सूचनार्एँ संगठन के सर्वोच्च स्तर से निम्नतम स्तर की ओर प्रवार्हित होती हैं। पब्र न्धन द्वार्रार् निर्धार्रित विभिन्न नीतियार्ँ, आदेश, कार्यपण््र ार्ार्लियार्ँ, कार्य के विशिष्ट नियम, आदि क अधोमुखी सम्प्रेषण करके उसे अधीनस्थों तक उनके अनुपार्लन हेतु पहुँचार्यार् जार्तार् है। इसी प्रकार, कार्य सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन, सुरक्षार्त्मक एवं कल्यार्णकारी उपार्य, उत्पार्दन, विकास एवं सुधार्र सम्बन्धी धार्रणार्एँ, उत्पार्दन सूचनार्, कार्य की दशार्ओं सम्बन्धी आदेश एवं कार्य सम्पार्दन हेतु आवश्यक निर्देश आदि सभी श्रेणियों के कर्मचार्रियों को सर्वोच्च पब्र न्धन द्वार्रार् संप्रेषित किए जार्ते हैं। पदोन्नति, स्थार्नार्न्तरण आदि से सम्बन्धित आदेश भी इसी प्रकार के सम्प्रेषण के अन्तर्गत आते हैं। सूचनार्एँ पहुँचार्ने के लिए श्रमिक यार् कर्मचार्री के निकटतम वरिष्ठतम अधिकारी (जैसे फोरमैन) यार् पर्यवेक्षक को मार्ध्यम बनार्यार् जार्तार् है। अत: यह आवश्यक है कि इन अधिकारियों को संगठन की संचार्र आवश्यकतार्ओं तथार् सम्प्रेषण प्रणार्ली क पयाप् त प्रशिक्षण व सही जार्नकारी दी जार्ए।

संगठन एवं प्रशार्सन क कार्य केवल अधोमुखी संचार्र से ही सम्पन्न नहीं हो सकतार्। इसके लिए विभिन्न आदेशों एवं निर्देशों आदि के बार्रे में सम्बन्धित अधिकारियों एवं कर्मचार्रियों की प्रतिक्रियार् एवं उनके अनुपार्लन की स्थिति के बार्रे में फीडबैक प्रार्प्त होनार् भी आवश्यक है। निम्नतम स्तर के कर्मचार्रियों ऋके स्तर पर उत्पन्न होने वार्ली सूचनार्एँ एवं उत्पार्दन की स्थिति से सम्बन्धित अद्यतन सूचनार्एँ ऊपर तक निर्बार्ध एवं नियमित रूप से पहुँचती रहनी चार्हिए। इन्हीं सूचनार्ओं के आधार्र पर सर्वोच्च प्रबन्धक कर्मचार्रियों की गतिविधियों पर अपनार् नियंत्रण रखने में समर्थ होते हैं तथार् अपने इच्छित लक्ष्यों को हार्सिल कर पार्ते हैं।

ऊध्र्वमुखी सम्प्रेषण की एक सुनिश्चित व्यवस्थार् औद्योगिक इकार्इ में कायम करनी पड़ती है, जिससे यह निश्चित होतार् है कि ‘क्यार्’, ‘कैसे’, ‘किसको’, ‘कब’, ‘किसके द्वार्रार्’ सूचनार्एँ संप्रेषित की जार्एँगी। फोरमैन एवं पयर्व ेक्षक, मध्य स्तरीय पब्र न्धक तथार् उच्च पब्र न्धक किस प्रकार अपने से उच्चतर स्तर से संपर्क व सम्प्रेषण करेंगे, इसकी एक सुनिश्चित प्रणार्ली क निर्मार्ण आवश्यक होतार् है तार्कि उचित सलार्ह, समार्चार्र यार् सूचनार्, उचित स्त्रोत से, उचित मार्ध्यम से, तथार् उचित समय पर सर्वोच्च प्रबन्धनयार् नियोक्तार् तक पहुँच सके व समय रहते उचित कार्यवार्ही सुनिश्चित की जार् सके।

ऊध्र्वमुखी संप्रेषण भी औद्योगिक इकार्इ यार् अन्य किसी संस्थार्न के लिए उतनार् ही महत्वपूर्ण होतार् है जितनार् कि अधोमुखी सम्प्रेषण। ये दोनों प्रकार के सम्प्रेषण मिलकर शरीर में रक्त संचार्र की भार्ँति सूचनार्ओं को ऊपर से नीचे से ऊपर संचार्लित करते हैं। इससे आम कर्मचार्रियों तथार् प्रबन्धन के बीच (संचार्र शून्यतार् की स्थिति नहीं आती व संस्थार्न के स्वस्थ संचार्लन में मदद मिलती हैं। यदि संगठन में सूचनार्ओं क निरन्तर प्रवार्ह न बनार् रहे, तो संगठन के संचार्लन में कर्इ कठिनार्इयार्ँ उत्पन्न हो जार्ती हैं, जैसे कि –

संगठन में ऊध्र्व सम्प्रेषण की उचित प्रणार्ली व फीडबैक सिस्टम क विकास करके उपरोक्त कठिनार्इयों से बचार् जार् सकतार् है। निचले स्तरों से विश्वसनीय सूचनार्ओं एवं तथ्यों के निर्बार्ध प्रवार्ह से उच्च स्तर पर लिए जार्ने वार्ले निर्णय अधिक ग्रार्ºय व आवश्यकतार् के अनुरूप होंग,े जिससे कर्मचार्रियों में संतोष की भार्वनार् क विस्तार्र होगार्, जोकि औद्योगिक संगठन के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक हैं।

क्षैतिजीय संचार्र समार्न स्तर के अधिकारियों व कर्मचार्रियों के मध्य होने वार्ले विचार्र विनिमय से सम्बन्धित है। सभी संगठनों में हर स्तर के कर्मचार्रियों, अधिकारियों, व श्रमिकों में अपने कार्य एवं हितों के संरक्षण तथार् संगठन की कार्यपद्धति व समस्यार्ओं पर आपस में चर्चार् होती रहती है। यह चर्चार् व संवार्द अनौपचार्रिक व औपचार्रिक दोनों प्रकार क होतार् है। विभिन्न विभार्गों के पर्यवेक्षकों व मध्यम स्तरीय प्रबन्धकों के बीच विचार्रों के परस्पर आदार्न प्रदार्न से संगठन क कार्य संचार्लन सुगम हो जार्तार् है व समस्यार्ओं क निदार्न व समार्धार्न भी त्वरित ढंग से कियार् जार् सकतार् हैं।

इस प्रकार के सम्प्रेषण में सभी प्रकार की क्रियार्एँ, प्रतिक्रियार्एँ तथार् सहयोगी भार्वनार्एँ समार्हित होती हैं। वैसे कर्मचार्री तथार् पयर्व ेक्षकों, कार्य अधीक्षक व प्रबन्धक, श्रम संघ के प्रतिनिधि व कर्मचार्री अथवार् पर्यवेक्षक के मध्य सम्प्रेषण समस्यार् की प्रकृति पर भी निर्भर है। उसी के अनुरूप यह अनौपचार्रिक अथवार् औपचार्रिक स्वरूप प्रार्प्त करतार् है। परिवार्दों के निपटार्रे में इस बार्त क सम्प्रेषण काफी उपयोगी हो सकतार् हैं। वस्तुत: किसी भी कार्य में प्रथम स्तर रेखीय प्रबन्धक (पर्यवेक्षक) ही मुख्य सम्प्रेषक होतार् है। उसे कम्पनी यार् संगठन के उद्देश्यों, आदर्शो व विभिन्न मुद्दों पर स्थार्पित नीतियों को समझनार् तथार् अपने दृष्टिकोण को सुनिश्चित करनार् आवश्यक है तार्कि वह अपने दैनन्दिन कार्य संचार्लन में सफल हो सके, अपने कर्मचार्रियों की समस्यार्ओं व हितों को समुचित ढंग से समझ सके, संगठन की नीतियों से कर्मचार्रियों को अवगत करार् सके व कार्य की बार्धार्ओं व समस्यार्ओं को दूर करने व श्रमिकों की समस्यार्ओं के निवार्रण में प्रबन्धकों क सहयोग ले सके। क्षैतिजीय संचार्र प्रणार्ली दुरूस्त होने पर ये कार्य आसार्नी से सम्पन्न हो जार्ते हैं।

विचार्र सम्प्रेषण के मौखिक व लिखित दोनों ही मार्ध्यम हो सकते हैं, जो हैं। :

(B) उध्र्वमुखी सम्प्रेषण के मार्ध्यम :

मौखिक लिखित
1. सम्मुख वातार्लार्प, सार्क्षार्त्कार। 1. प्रतिवेदन- निष्पार्दन प्रतिवेदन,
उत्पार्दन, मूल्य, किस्म, नैत्यिक लार्भ
सम्बन्धी व अन्य विशिष्ट प्रतिवेदन 
2. टेलीफोन पर वातार्लार्प व
सार्क्षार्त्कार, टेली
कान्फ्रेन्सिंग, वीडियो कांफ्रेंसिंग
आदि। 
2. व्यक्तिगत पत्र, प्राथनार् पत्र, सूचनार्एँ।
3. बैठकें, सम्मेलन, पर्यवेक्षकों से विचार्र विमर्श 3. परिवेदनार् निवार्रण प्रणार्ली।
4. सार्मार्जिक व्यवहार्र/रीति रिवार्ज।  4. विचार्र विमर्श प्रणार्ली। 
5. अंगूरलतार् संवार्द प्रणार्ली  5. अभिरूचि एवं सूचनार् सर्वेक्षण 
 6. श्रम संघ क प्रतिनिधित्व व सूचनार् के अन्य स्त्रोत 6. श्रम संघ के प्रकाशन
7. सम्पर्कात्मक प्रबन्धन।

(C) क्षैतिजीय सम्प्रेषण के मार्ध्यम :

मौखिक लिखित
1. भार्षण, सम्मेलन, कमेटियार्ँ, बैठकें। 1. पत्र, मेमो एवं प्रतिवेदन
2. टेलीफोन तथार् अन्तर्विभार्गीय संचार्र
सुविधार्, चलचित्र, स्लार्इडें, आदि।
2. आंतरिक सूचनार् प्रणार्ली, बुलेटिन
व प्रकाशन।
3. सार्मार्जिक व्यवहार्र व रीतियार्ँ 3. बुलेटिन बोर्ड व पोस्टर
 4. अंगूर लतार् संवार्द प्रणार्ली,
अफवार्हें
4. निर्देश पुस्तिकाएँ व मैन्युअल
5. भोंपू, घंटी, आदि  5. संगठन के प्रकाशन, आदि।

 

1. सम्प्रेषण के विभिन्न मार्ध्यमों क विवरणार्त्मक विवेचन 

सम्प्रेषण के मार्ध्यम से आशय उन विधियों से है जिनके द्वार्रार् संदेश वार्ंछित व्यक्तियों तक पहुँचार्यार् जार्तार् है। सम्प्रेषण के लिखित मार्ध्यमों को अधिक प्रभार्वी मार्नार् जार्तार् है। इनमें से कुछ क विवरणार्त्मक विवेचन निम्न प्रकार हैं :

(1) कर्मचार्री पुस्तिकाएँ :नवार्गन्तुक कर्मचार्रियों के लिए इन पुस्तिकाओं क बड़ार् महत्व होतार् है। इससे उन्हें कम्पनी क परिचय, व्यार्वसार्यिक नीतियों, व्यवसार्य की प्रकृति, संगठन के उद्देश्यों, व कम्पनी के उपलब्ध सेवार्ओं आदि क परिचय हो जार्तार् है। इसमें फैक्टरी की उतपार्दन प्रक्रियार्, विभिन्न उतपार्दों, ग्रार्हकों, लार्भ-हार्नि, कच्चे मार्ल के स्त्रोतों क भी विवरण हो सकतार् है। इसमें कर्मचार्री को होने वार्ले लार्भों, दैनिक सार्मार्न्य समस्यार्ओं व उनके कर्तव्यों क विवरण भी हो सकतार् है। इन सभी सूचनार्ओं के प्रकटन में यथार् जरूरत चाटो, तार्लिकाओं, ग्रार्फों, चित्रों, कार्टूनों आदि क प्रयोग भी कियार् जार्तार् है। एक अच्छी कर्मचार्री पुस्तिक में सार्मार्न्यत: निम्न बार्तें सम्मिलित रहती हैं :

  1. कर्मचार्री क नार्म, पद, टोकन नं0, विभार्ग, पतार्, आयु। 
  2. अनुशार्सन, पदमुक्ति एवं सेवार् निवृत्ति के नियम। 
  3. संगठन क इतिहार्स एवं प्रबन्धन प्रणार्ली। 
  4. व्यवसार्य में उत्पार्दन एवं उत्पार्दकतार् संबंधी सूचनार्। 
  5. विभिन्न नीतियों, निर्देशों व आदेशों के मूल अंश। 
  6. मनोरंजन, चिकित्सीय व अन्य सुविधार्ओं की जार्नकारी। 
  7. कल्यार्ण सुविधार्ओं जैसे- अल्पार्हार्र गृह, सहकारी समिति, उचित मूल्य की दुकान वार्चनार्लय, पुस्तकालय, रार्त्रिशार्लार्एँ, प्रौढ़शार्लार्एँ, कार्य सम्बन्धी पत्र पत्रिकाएँ, कल्यार्ण कार्यार्लय, शिशु गृह, शिक्षार् संस्थार्एँ, आवार्गमन की सुविधार्एँ, अग्निशमन सेवार्एँ आदि क विवरण। 
  8. सार्मूहिक सौदेबार्जी तथार् श्रम संघ व्यवस्थार् की जार्नकारी। 
  9. नियोजन के अवसर, पदोन्नति, तथार् विकास के अवसर, आदि। 
  10. अवकाश के नियम, कार्य के घंटे, मजदूरी सम्बन्धी नियम तथार् कार्य की दशार्ओं के बार्रे में सूचनार्।
  11. आनुसंगिक लार्भ योजनार्ओं तथार् बोनस एवं बीमार् योजनार्ओं की जार्नकारी। 

कर्मचार्री को ये सूचनार्एँ प्रार्प्त हो जार्ने पर उसे यह अनुभव होतार् है कि संगठन उसके हितों के प्रति कितनार् सजग है। उसे अपने दार्यित्वों क भी आभार्स होतार् है। इन सबसे उसके कार्य मनोबल पर सकारार्त्मक असर पड़तार् है।

(2) मैगजीन एवं पत्र पत्रिकाएँ :कुछ संगठन अनेक पत्र पित्रार्काओं क प्रकाशन करके कर्मचार्रियों को व्यवसार्य की गतिविधियों, विकास के कार्यो तथार् प्रशार्सन में सक्रिय विभूतियों, आदि के बार्रे में परिचित करार्ते रहते हैं। हार्उस मैगजीन से ऐसार् मंच तैयार्र होतार् है जिससे प्रबन्धक व कर्मचार्री एक दूसरे के प्रत्यक्ष संपर्क में रहते हैं। यह कम्पनी की नीतियों को अत्यन्त सरल ढंग से प्रस्तुत करने व कर्मचार्रियों को कल्यार्ण सुविधार्ओं से अवगत रखने में सहार्यक होती है। मैगजीन किसी कर्मचार्री यार् कर्मचार्रियों के प्रति उपक्रम के दृष्टिकोण को उजार्गर करती है। इससे संस्थार् के प्रति कर्मचार्री को अपनार् दृष्टिकोण व स्वार्मिभक्ति पुष्ट करने में मदद मिलती है। मैगजीन क सम्पार्दन कार्मिक विभार्ग के अधिकारियों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। विभिन्न श्रेणियों के कार्मिकों को सम्पार्दन मंडल में रखार् जार्तार् है। इससे कर्मचार्रियों में एकतार् की भार्वनार् सुदृढ़ होती है। और विभिन्न स्तरों के कर्मचार्रियों को नजदीक आने क अवसर प्रार्प्त होतार् है।

(3) सलार्ह योजनार् : इस प्रणार्ली क उपयोग उत्पार्दन व्यय, व्यक्ति की कार्य के प्रति रूचि को बढ़ार्ने, तथार् प्रबन्धकों के सम्मुख अपने विचार्र प्रकट करने व अच्छी सलार्ह होने पर पुरस्कृत करने की योजनार् बनाइ जार्ती है। व कर्मचार्रियों क सहयोग प्रार्प्त कियार् जार्तार् है। श्रमिक वर्ग एक ओर मशीनों, उत्पार्दन विधियों एवं अन्य उपकरणों में सुधार्र की सकारार्त्मक सलार्ह देते हैं, तो दूसरी ओर वर्तमार्न सुविधार्ओं, कार्य की दशार्ओं आदि के प्रति अपनार् असंतोष, यदि कोर्इ हो, व्यक्त करते हैं। सुझार्व पेटियों क भी इस्तेमार्ल कियार् जार्तार् है। इस प्रणार्ली को सफल बनार्ने के लिए –

  1. उचित मौद्रिक पुरस्कार के लिए धन की पृथक् व्यवस्थार् की जार्ती है।
  2. प्रणार्ली के संचार्लन हेतु संयुक्त समिति क गठन कियार् जार्तार् है। 
  3. विशिष्ट सूचनार्एँ व समस्यार्एँ प्रत्येक कर्मचार्री तक पहुँचार्कर उसे अपने विचार्र प्रकट करने क अवसर दियार् जार्तार् है।
  4. प्रबन्धक तथार् पर्यवेक्षक इस प्रणार्ली को महत्व देते हैं।
  5. सलार्ह प्रार्प्त होने पर तत्सम्बन्धी पूर्ण जार्नकारी प्रार्प्त कर समुचित कदम उठार्ने की प्रबन्धक चेष्टार् करते हैं।

(4) आंतरिक पत्र-पत्रिकाएँ : इन पत्रिकाओं में कम्पनी के समार्चार्र, कर्मचार्रियों को व्यक्तिगत सूचनार् (जैसे-गोष्ठियों के सन्दर्भ, विवार्ह सम्बन्धी समार्चार्र, जन्म, सेवार्-निवृत्ति, पुरस्कार, पदक, आदि के समार्चार्र) दी जार्ती है। इन समार्चार्रों को चित्रों में भी प्रदर्शित कियार् जार्तार् है। इसके अतिरिक्त, चित्रों में कम्पनी द्वार्रार् उत्पार्दित वस्तुओं क प्रदर्शन कियार् जार्तार् है जिससे कर्मचार्रियों को नयी वस्तुओं, नयी शोधों तथार् कम्पनी की प्रगति के बार्रे में जार्नकारी मिलती रहती है। प्रतीकात्मक कहार्नियों में प्रार्य: पदोन्नति, सेवार्-निवृत्ति, घरेलू क्रियार्-कलार्प, खेलकूद, सुरक्षार्, विचार्र-विमर्श, आदि बार्तें सम्मिलित की जार्ती है।

(5) कर्मचार्री समार्चार्र-पत्र- अच्छी तरह तैयार्र किये गये समार्चार्र पत्रों द्वार्रार् कर्मचार्रियों के सार्थ सम्प्रेषण में सहार्यतार् मिलती है। समार्चार्र पत्र में कुछ पष्ृ ठ कर्मचार्रियों के लिए नियत किये जार्ते हैं, जिसमें ‘‘श्रमिक यार् कर्मचार्री के पत्र‘‘ शीर्षक से उनके विचार्र प्रकाशित किये जार् सकते हैं। कर्मचार्री पत्र मुख्यत: कर्मचार्रियों के विचार्रों को प्रस्तुत करते हैं न कि प्रबन्ध के। यद्यपि कम्पनी की नीतियों, विकास सम्बन्धी कार्यवार्हियों, सुरक्षार्त्मक, कल्यार्णकारी तथार् अन्य सार्मार्न्य रूचि के कार्यो (जैसे मनोरंजन की सुविधार्एँ, कार्य-विश्लेषण, खेल-कूद सम्बन्धी बार्तें, आदि की जार्नकारी देने) के लिए स्थार्न निश्चित रहतार् है, किन्तु फिर भी वह पत्र कर्मचार्रियों की सूचनार्एँ अधिक प्रकाशित करतार् है। कर्मचार्री पत्र में विभिन्न कार्यो क विवरण, विकास के सार्धन, संयन्त्र विस्तार्र, नयी भर्ती व्यवस्थार्, आदि क विवरण रहतार् है। इसमें वाषिक प्रतिवेदन के उपयोगी अंश भी प्रकाशित किये जार्ते हैं। कम्पनी अपने कर्मचार्रियों के पत्रों क प्रकाशन स्थार्नीय समार्चार्र पत्रों में भी विज्ञार्पनस्वरूप करवार्ती है।

(6) कर्मचार्रियों को वित्तीय प्रतिवेदन: इन प्रतिवेदनों में वार्ंछित तथ्यों को प्रस्तुत कियार् जार्तार् है जिससे व्यार्पार्र की प्रवृत्ति, उसके लार्भ, व्यय, आय, वितरण, आदि की जार्नकारी कर्मचार्रियों को मिलती है। ये प्रतिवेदन कर्मचार्री के लिए लार्भदार्यक तो है ही, किन्तु कम्पनी की स्थिति को स्पष्ट एवं अधिक सुदृढ़ करने में भी सहार्यक होते है। कर्मचार्री तथार् प्रबन्धकों के मध्य आपसी सम्बन्ध, उन्हें एक-दूसरे के समीप लार्ने तथार् एक-दूसरे के प्रति अधिक विश्वसनीय जार्नकारी प्रार्प्त करने में भी इन प्रतिवेदनों से सहार्यतार् मिलती है। सार्मार्न्यत: वाषिक अथवार् त्रैमार्सिक प्रतिवेदन (जो अंशधार्रियों को निर्गमित किये जार्ते है) श्रमिकों के लिए अधिक लार्भदार्यक सिद्ध नहीं होते क्योंकि श्रमिक अधिकांशत: न केवल अशिक्षित होते हैं, वरन् तकनीकी भार्षार् को समझने में भी असमर्थ रहते है। अत: इनके प्रयोगाथ वित्तीय प्रतिवेदन भी सार्मार्न्य रूप से सरल बनार्कर प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। ये प्रतिवेदन विभिन्न मार्ध्यमों से वितरित किये जार्ते हैं जैसे विशिष्ट पैम्फलेट, कर्मचार्री मैगजीन, आदि।

(7) प्रकाशित भार्षण जिनमें सेविवर्गीय नीतियार्ँ उद्धृत हों : इन प्रकाशनों से कर्मचार्रियों को कम्पनी की नीतियों क पूर्ण ज्ञार्न हो जार्तार् है। इसमें नियोगी-नियोक्तार् सम्बन्ध भी स्पष्ट हो जार्ते हैं। इसमें कर्मचार्री पुि स्तक के बार्रे में प्रश्नोत्तर प्रस्तुत किये जार्ते हैं। जिससे कर्मचार्री सभी निर्धार्रित नीतियों की पूर्ण जार्नकारी प्रार्प्त कर सकते हैं। सभी सेविवर्गीय नीतियार्ँ एक ही पत्रिक में प्रकाशित कर दी जार्ती हैं तथार् बार्द में भिन्न-भिन्न विषयों के लिए पथ्ृ ार्क् पैम्फलेट प्रकाशित किये जार्ते हैं। जैसे प्रॉवीडेण्ट फण्ड, सेवार्-निवृत्ति योजनार्, उत्पार्दन बोनस, लार्भ-भार्गितार्, सहकारी समिति तथार् स्थार्यी आदेश सम्बन्धी सूचनार्।

(8) सूचनार् यार् प्रदर्शन-पट्ट :इन्हें ऐसे स्थार्न पर रखार् जार्तार् है जहार्ँ कर्मचार्री इनके सम्पर्क में आते हैं। इनमें पठन-पार्ठन सार्मग्री रखी जार्ती है। वे प्रार्य: दरवार्जों के पार्स, कॉफी हार्उस, जलपार्न-गृह, आदि में लगार्ये जार्ते हैं। खुले स्थार्न पर ‘‘क्यार् आपने पढ़ार् है?’’ यार् ‘‘एक अपने लिए लीजिए’’ शब्द लिखे रहते हैं। पुस्तिकाओं तथार् पैम्फलेटों में विभिन्न प्रकार के खेल एवं सार्मग्री उपलब्ध होती हैं। जिनमें अनेक प्रवृत्तियों, (खार्नार् बनार्नार्, कंशीदार्कारी तथार् सिलाइ की विधि, गृह अर्थशार्स्त्र, मनोरंजन, शिक्षार् सम्बन्धी सूचनार्एँ, दुर्घटनार् से बचार्व, मित्रों से कैसे मिलें एवं उन्हें कैसे प्रभार्वित करें, गृह व्यवस्थार्, बार्गवार्नी, कर प्रणार्ली, आदि) पर जार्नकारी सम्मिलित रहती है।

(9) बुलेटिन बोर्ड : सार्मार्न्यत: बड़े संगठनों में कर्मचार्रियों के लिए एक बुलेटिन बोर्ड रखार् जार्तार् हैं। जिसमें विभिन्न आकर्षक रंगों तथार् सुन्दर अक्षरों क प्रयोग कियार् जार्तार् है। इन बोर्डो पर सार्मार्न्य पसन्दगी के समार्चार्र, कार्टून, आवश्यक फोटोग्रार्फ, वर्तमार्न तथार् भूतकाल में कार्यरत कर्मचार्रियों के बार्रे में सूचनार्एँ, जन्म, मृत्यु, विवार्ह तार्लिका, आदि की सूचनार्, सुरक्षार्त्मक, खेल-कूद, आदि सम्बन्धी सूचनार्एँ दी जार्ती है। विशेष बैठकों की सूचनार्, कलैण्डर (कार्य के दिन एवं अवकाश की सूचनार्एँ, विक्रय सम्बन्धी सूचनार्, कर्मचार्री मार्ंग पत्र, जलपार्न-गृह के तैयार्र भोज की सूचनार् तथार् अन्य सूचनार्एँ) भी सम्मिलित की जार्ती है।

(10) दृश्य-श्रव्य उपकरण : इसके अन्तर्गत अच्छी फिल्मों, चल-चित्रों को दिखार्ने, टेप द्वार्रार् विविध भार्षणों को सुनार्ने क आयोजन कियार् जार्तार् है। इस प्रणार्ली क लार्भ यह है कि इससे कर्मचार्रियों को विभिन्न अधिकारियों के विचार्र सुनने क अवसर प्रार्प्त होतार् है जिससे किसी प्रकार की सम्प्रेषण की त्रुटि नहीं रहती और श्रमिक, भार्षण के विचार्रों को उसी रूप में समझने में समर्थ होतार् है, जिस रूप में वे कहे गये है। चलचित्रों के मार्ध्यम से यह बतार्यार् जार्तार् है कि विभिन्न उत्पार्दन प्रक्रियार्एँ कैसे की जार्ती है ? विभिन्न कार्य कैसे किये जार्ते हैं। विभिन्न नियमों क पार्लन कैसे कियार् जार्तार् है? प्रत्यक्ष सम्प्रेषण के लिए संयन्त्र के अनुभार्गों में ‘‘आवश्यक घोषणार्’’ से भी कार्य लियार् जार् सकतार् है। यह प्रणार्ली एकतरफार् होते हुए भी बड़े व्यवसार्यों में सम्प्रेषण के अच्छे मार्ध्यम के रूप में कार्य कर सकती है। इस प्रणार्ली क प्रयोग अनुपस्थिति दर घटार्ने, थकान कम करने, तोड़-फोड़ एवं कार्य में अपव्यय को कम करने में कियार् जार्तार् है।

(11) पोस्टर : सम्प्रेषण हेतु इस प्रणार्ली क अत्यधिक प्रयोग कियार् जार्तार् है। इसके द्वार्रार् विभिन्न तथ्यों को पोस्टर द्वार्रार् प्रदशिर्त कियार् जार्तार् हैं। इस पर कर्इ विशिष्ट वस्तुओं के चित्र, विभिन्न रेखार्चित्र, बिन्दु-चित्र, आदि प्रदर्शित किये जार्ते हैं। इस प्रणार्ली में ध्यार्न रखने योग्य बार्त यह है कि ज्यों ही कोर्इ पोस्टर पुरार्नार् हो जार्य, यार् फट जार्य त्योंही नयार् पोस्टर लगार् दियार् जार्नार् चार्हिए।

(12) सूचनार् पट्ट : सार्मार्न्यत: सूचनार् प्रसार्रण हेतु सूचनार् पट्ट क प्रयोग कियार् जार्तार् है। इन पट्टों पर सार्मार्न्यत: निम्न सूचनार्एँ प्रस्तुत की जार्ती हैं : (i) विभिन्न नियमों के संक्षिप्त उद्धरण (जैसे कारखार्नार् अधिनियम, मजदूरी भुगतार्न अधिनियम, मार्तृत्व लार्भ अधिनियम, बार्ँइलर तथार् बिजली अधिनियम) प्रस्तुत किये जार्ते हैं। (ii) रार्जकीय सूचनार्एँ जैसे कार्य के घण्टे, वेतन भुगतार्न के दिन, छुट्टियों की सूचनार्। (iii) स्थार्यी आदेश। (iv) संगठन में चल रही विभिन्न प्रवृत्तियों सम्बन्धी सूचनार्एँ (जैसे सहकारी समिति, खेल-कूद समिति, कलार् समिति, आदि की क्रियार्एँ)। (v) प्रशार्सकीय दृष्टि से प्रबन्ध द्वार्रार् निर्गमित आदेश एवं परिपत्र।

औद्योगिक संचार्र की प्रक्रियार् 

सूचनार् सम्प्रेषण की प्रक्रियार् में प्रथमत: तीन चरण पूरार् हो जार्ने पर चतुर्थ चरण- कार्यवार्ही क आरम्भ होतार् है। ये चरण निम्न प्रकार हैं।

  1. प्रथम – सूचनार् क सम्प्रेषण
  2. द्वितीय – सूचनार् को समझनार्
  3. तृतीय – सूचनार् को स्वीकार करनार्
  4. चतुर्थ – सूचनार् क कार्यवार्ही हेतु उपयोग

संचार्र की प्रक्रियार्

औद्योगिक सम्प्रेषण प्रक्रियार् के तत्व 

  1. प्रेषक : संवार्द की प्रक्रियार् प्रेषक से ही आरम्भ होती हैं। संवार्दकत को यह ध्यार्न में रखनार् चार्हिए कि : (i) वे क्यार् भार्वनार्एँ, विचार्र अथवार् सूचनार्एँ हैं, जो भेजनी हैं ?, (ii) ये सूचनार्एँ किसे भेजनी हं?ै (iii) क्यार् प्रेषिती सूचनार् प्रार्प्त करने के लिए तैयार्र है?; (iv) संदेश के लिए कूट शब्दों क उपयोग करनार् है यार् नहीं; यदि हार्ँ, तो संदेश क कूटबद्धीकरण कैसे करनार् है ?; (v) संदेश को कैसे प्रभार्वकारी बनार्यार् जार्ए?; तथार् (vi) सम्प्रेषण क मार्ध्यम क्यार् हो? इस प्रकार, सार्रे संवार्द, उसकी गुणवत्तार्, व प्रभार्वकारितार् प्रेषक की कुशलतार् पर निर्भर है, क्योंकि वही संचार्र प्रक्रियार् क पहलकर्तार् होतार् है।
  2. प्रेषिती : संवार्द प्रार्प्तकर्तार् सम्प्रेषण क दूसरार् छोर होतार् है। वही संदेश सनु तार् यार् प्रार्प्त करतार् है; वही उसकी कूट भार्षार् क रूपार्न्तरण करतार् है; तथार् संदेश को सही अर्थो में समझकर कायर्व ार्ही करतार् है। इसीलिए, प्रेषिती को मार्मले की पर्यार्प्त समझ व ज्ञार्न होनार् चार्हिए। तभी सम्प्रेषण के उद्देश्यों को हार्सिल कियार् जार् सकतार् हैं। प्रेषिती के समर्पित एवं समझदार्रीपूर्ण आचरण से ही संप्रेषणप्रक्रियार् को प्रभार्वी बनार्यार् जार् सकतार् है।
  3. सन्देश : वह सूचनार्, विचार्र अथवार् निर्देश जो प्रेषक द्वार्रार् प्रेषिती को भेजार् जार्तार् है, संदेश कहलार्तार् है। सन्देश बहुत ही स्पष्ट, लिपिबद्ध, उद्देश्यपूर्ण, समयार्नुकूल तथार् नियंत्रण एवं कार्यवार्ही के योग्य होनार् चार्हिए। सन्देश ही सम्प्रेषण प्रक्रियार् क प्रमुख तत्व है।
  4. संप्रेषण क मार्ध्यम : संचार्र चैनेल प्रेषक व प्रेषिती के मध्य सेतु क कार्य करतार् है। सन्देश एक छोर से दूसरी छोर पर पहुँचार्ने के लिए प्रत्यक्ष संदेश, पत्र, पत्रिकाएँ, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन, सेमीनार्र, मीटिंग, आदि क इस्तेमार्ल कियार् जार्तार् है। इन्हें ही संचार्र के मार्ध्यम के रूप में जार्नार् जार्तार् है।कार्यवार्ही : किसी भी सन्देश को भेजने व प्रार्प्त करने क अन्तिम उद्देश्य किन्हीं लक्ष्यों की प्रार्प्ति ही होतार् है। इसलिए सन्देश की सफलतार् इसी बार्त में निहित है कि प्रेषिती उसे सही रूप में समझ ले व यथार् आवश्यकतार् आगे की कायर्व ार्ही सुनिश्चित करे। इस प्रकार, इच्छित प्रतिफल की प्रार्प्ति के लिए संदेश की प्रतिक्रियार् स्वरूप कार्यवार्ही क होनार् अनिवाय है।

प्रभार्वी संप्रेषण के अवरोधक 

प्रभार्वी संचार्र व्यवस्थार् प्रबन्धन की आधार्रशिलार् होती है, क्योंकि इसी के मार्ध्यम से प्रबन्धक कर्मचार्रियों को वार्ंछित लक्ष्य की प्रार्प्ति हेतु प्रेरित, निर्देशित व नियंत्रित करते हैं। उपक्रम की नीतियों क निर्वचन, समस्यार्ओं क स्पष्टीकरण व उनक निवार्रण आदि तभी संभव है जब संप्रेषण प्रक्रियार् में अवरोध उत्पन्न न हो और वह प्रभार्वी ढंग से चलती रहे। लेकिन संप्रेषण एक जटिल प्रक्रियार् है और यह कर्इ तत्वों द्वार्रार् निर्धार्रित व प्रभार्वित होती है। इस प्रक्रियार्में अनेक रूकावटें भी उत्पन्न हो जार्ती हैं। जो संचार्र प्रक्रियार् को बार्धित कर देती है। प्रभार्वी सम्प्रेषण में आने वार्ली कुछ पम्र ुख बार्धार्एँ इस प्रकार है :

(1) भार्व-अभिव्यक्ति-

संदेश में जो भार्व प्रकट किए जार्ते है, प्रार्य: ऐसार् होतार् है कि कर्मचार्री उसे उसी अर्थ में समझ नहीं पार्ते। एक ही शब्द क विभिन्न लोग अलग-अलग अर्थ निकालते है। क्यों कि लोगों के आचार्र विचार्र, पूर्व धार्रणार्एँ, अभिनति, शैक्षणिक व सार्मार्जिक स्तर, आदि उनके बौद्धिक स्तर व व्यवहार्र को प्रभार्वित करते हैं। उसी संदेश क कोर्इ क्यार् अर्थ निकालेगार् व उस पर क्यार् प्रतिक्रियार् देगार्, यह इन्हीं सब बार्तों पर निर्भर करतार् है। अत: औद्योगिक संस्थार्नों में सम्प्रेषण के लिए संदेश देते समय प्रबन्धकों को यह ध्यार्न में रखनार् चार्हिए कि शब्दों क चयन समझबूझ व सार्वधार्नी पूर्वक कियार् जार्ए। ऐसे शब्दों व वार्क्यार्ंशों, जिनके कर्इ भार्व निकलते हों, प्रेषक को चार्हिए कि वह उनक स्पष्ट निर्वचन भी संदेश के सार्थ ही कर दे। इससे प्रभार्वी संचार्र के माग क एक मुख्य अवरोध दूर होगार्।

(2) अधिक शब्दों क प्रयोग –

संदेश क निर्मार्ण करते समय सरल शब्दों क प्रयोग ही पर्यार्प्त नहीं होतार्, बल्कि शब्दों क प्रयोग कम से कम व सटीक प्रकार से कियार् जार्नार् आवश्यक है। यदि कोर्इ वार्क्य अनार्वश्यक रूप से बहुत लम्बार् व जटिल रहतार् है तो श्रमिक वर्ग उसे सही अर्थ में समझ नहीं पार्तार् व ऐसी भार्षार् संचार्र में अवरोधक क कार्य करती है। अत: संदेश सरल, स्पष्ट व संक्षिप्त होने चार्हिए।

(3) भौतिक दूरी-

प्रभार्वी सम्प्रेषण में दूरी भी बार्धक होती है। अत्यधिक भौतिक दूरी होने पर यह ज्ञार्त हो पार्नार् कठिन होतार् है कि प्रेषिती ने संदेश को उसी रूप में ग्रहण कियार् है अथवार् नहीं व उस संदेश क अनुपार्लन उसी रूप में हुआ है अथवार् नहीं। दूरी की अवस्थार् में टेलीफोन व टेलीकांफ्रेंसिंग, वीडियो कांफ्रेंसिंग, आदि आधुनिक सार्धनों क उपयोग कियार् जार्नार् चार्हिए। यदि ये सुविधार्एँ न हों तो लिखित सम्प्रेषण व लिखित फीडबैक प्रार्प्त करने की व्यवस्थार् होनी चार्हिए। इस बार्त की पुष्टि भी की जार्नी चार्हिए कि सूचनार् को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत नहीं कियार् गयार् है अथवार् उसे अनार्वश्यक रूप से रोक तो नहीं गयार् है।

(4) प्रेषक व्यक्ति

सम्प्रेषण की प्रक्रियार् में अनेक लोग लगे होते हैं। कर्इ बार्र इनमें से कोर्इ व्यक्ति स्वयं अवरोधक बन जार्तार् हैं। इस प्रकार संचार्र श्रंख्ृ ार्लार् पूरी नहीं हो पार्ती। सूचनार् के उद्गम स्थल पर ही यदि कोर्इ त्रुटि रह जार्ती है तो सूचनार् क अग्रप्रेषण व उसकी समझ गलत हो सकती है। पर्यवेक्षक व कर्मचार्रियों के विचार्र व व्यवहार्र, आपसी विवार्द, झगड़े, सुधार्रार्त्मक सुझार्व व संवार्दों क समुचित सम्मार्न न होनार्, उच्च स्तर की ओर भेजे जार्ने वार्ले सम्प्रेषण को बार्धित करते है। प्रेषक व्यक्ति ऐसी किसी सूचनार् को ऊपर की ओर जार्ने में बार्धार् उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे उनकी कार्यकुशलतार् क स्तर व अकर्मण्यतार् उजार्गर होती हो। जबकि सर्वोच्च प्रबन्धन के लिए ऐसी सूचनार्ओं क बड़ार् महत्व होतार् है। इस प्रकार की गतिविधियों से समस्यार्एँ जटिल रूप ले लेती हैं।

(5) रूचि –

व्यक्ति अक्सर उस बार्त को ज्यार्दार् ध्यार्न से सुनतार् व पार्लन करतार् है जिसमें उसक व्यक्तिगत हित होतार् है। अन्य सूचनार्ओं को लोग बहुधार् नजरंदार्ज करते हैं व उसमें उनकी रूचि नहीं होती। फलत: सार्मार्जिक व सावजनिक हित के सम्प्रेषण उतने प्रभार्वी नहीं हो पार्ते। इसी प्रकार, यदि प्रेषक ने प्रेषिती को जो सम्वार्द भेजार् है वह उसकी रूचियों के अनुरूप नहीं है, तो वह उतनार् प्रभार्वी नहीं रहतार्। अध्ययन की दृष्टि से सम्प्रेषण की रूकावटों को निम्न चार्र भार्गों में बार्ँट सकते हैं:

  1. व्यक्तिगत असमार्नतार्एँ 
  2. कम्पनी क वार्तार्वरण 
  3. यार्ंत्रिक रूकावटें
  4. अन्य रूकावटें 
    इन चार्रों प्रकार की बार्धार्ओं को निम्न चाट द्वार्रार् और भी विस्तार्र से समझार् जार् सकतार् है।

    नेटवर्क विश्लेषण 

    किसी भी संगठन में संचार्र क एक ढार्ँचार् खड़ार् हो जार्तार् है। जिसमें सम्प्रेषण के सभी चैनल तथार् लार्इनें एक दूसरे से सम्बद्ध हो जार्ती हैं। इस प्रकार संचार्र नेटवकर् के अन्तर्गत सूचनार्एँ क्रमश: एक से दूसरे व्यक्ति को संप्रेषित होती रहती हैं। संचार्र नेटवर्क में दो प्रकार के चैनलों से सूचनार्एँ संवार्हित होती हैं। – आपै चार्रिक और अनार्पै चार्रिक चैनल। नेटवर्क विश्लेषण के द्वार्रार् इन दोनों ही प्रकार के चैनलों से उभरने वार्ली सूचनार्ओं क विश्लेषण कियार् जार्तार् है। हर प्रकार क संचार्र नेटवर्क सूचनार्ओं के दो-तरफार् निर्द्वन्द प्रवार्ह को सुनिश्चित करने वार्लार् होनार् चार्हिए। तभी उसे उचित ठहरार्यार् जार् सकतार् है। नेटवर्क विश्लेषण के द्वार्रार् सूचनार् नेटवर्क के उचितपन तथार् विश्वसनीयतार् को जार्ँचार् जार्तार् है। यह अप्रार्संगिक सूचनार्ओं को हटार्कर संचार्र पथ को मजबूती दे सकतार् है। इसी प्रकार संप्रेषण तकनीकों की प्रार्संगिकतार् व विश्वसनीयतार् क भी विश्लेषण करके इनक चयन करने अथवार् न करने क फैसलार् लियार् जार् सकतार् है। नेटवर्क विश्लेषण के अन्तर्गत सूचनार् वैयिक्तीकरण उपकरणों क उपयोग करते हुए किसी सूचनार् नेटवर्क की सटीकतार् को परखार् जार् सकतार् है। इससे तथ्यों की सुरक्षार् प्रणार्ली तथार् गतिशील तथ्यार्धार्र भी सुनिश्चित कियार् जार् सकतार् है।

    औद्योगिक संचार्र प्रणार्ली 

    भार्रतीय उद्योगों में ऊध्र्वगार्मी व अधोगार्मी दोनों प्रकार की संचार्र प्रणार्ली कार्य करती है। सार्थ ही, समार्न स्तर के अधिकारियों व कर्मचार्रियों में क्षैतिज संप्रेषण भी होतार् रहतार् है। यह सूचनार् सम्प्रेषण औपचार्रिक तथार् अनौपचार्रिक दोनों प्रकार के चैनलों के मार्ध्यम से चलतार् है। स्वस्थ संचार्र व्यवस्थार् के लिए आवश्यक है कि सार्रार् सम्प्रेषण द्विमागी हो, किन्तु दुर्भार्ग्यवश, भार्रतीय उद्योगों में अधोगार्मी संचार्र पर अधिक जोर है तथार् ऊध्र्वगार्मी संचार्र, अधिकांशतयार्, समुचित ढंग से सम्पन्न नहीं हो पार्तार्, क्योंकि भार्रतीय संगठनों, चार्हे वे सावजनिक प्रतिष्ठार्न हों यार् निजी, में बहुधार् नीचे के स्तरों से आने वार्ली सूचनार्ओं, फीड बैक, तथार् आवेदनों को उचित महत्व नहीं दियार् जार्तार्। प्रबन्धकों व अधिकारियों द्वार्रार् इस तरह की प्रवृत्ति के चलते ही कर्मचार्रियों में असंतोष बढ़तार् है। इससे अनार्पै चार्रिक संचार्र प्रणार्ली जैसे अंगूरलतार् सम्प्रेषण व क्लस्टर नेटवकांर् े तथार् गपशप को बढ़ार्वार् मिलतार् है। इसीलिए भार्रतीय संस्थार्नों में अक्सर अफवार्हों क बार्जार्र गर्म रहतार् है। सार्मार्न्यतयार्, भार्रतीय प्रतिष्ठार्नों में संचार्र व्यवस्थार् में दिक्कतें पार्यी जार्ती हैं :

    1. अधिकांश प्रतिष्ठार्नों में सहभार्गी निर्णय प्रक्रियार् क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। अधिकांश उद्यमी तथार् प्रबन्धक सत्तार्वार्दी मार्नसिकतार् से ग्रस्त हैं। अत: वे आदेश देने व उनक पार्लन करवार्ने पर अधिक ध्यार्न देते हैं व नीचे से आने वार्ली सूचनार्ओं, आवार्जों व फीडबैक को अनसुनार् करने की पव्र ृत्ति रखते हैं। इससे दोतरफार् संचार्र प्रणार्ली भंग हो जार्ती है और यह संस्थार्नों के लिए घार्तक बन जार्ती है।
    2. निजी एवं सावजनिक दोनों प्रकार के उद्यमों में शिखर स्तर पर सार्रे प्रार्धिकार संकेन्द्रित कर लेने की प्रवृत्ति पार्यी जार्ती है। निजी क्षेत्र में मार्लिक तथार् सावजनिक क्षेत्र में संबंधित मंत्री यार् रार्जनीतिक नेतृत्व बहुधार् अधिकारों के हस्तार्ंतरण में विश्वार्स नहीं करते व सभी निर्णय स्वयं लेने की प्रवृत्ति रखते हैं। यही प्रकृति बार्द में नीचे के प्रबन्धकों, सचिवों, नौकरशार्हों व अधिकारियों में भी घर कर जार्ती है। धीरे-धीरे केन्द्रीयकरण की यह व्यवस्थार् सर्वमार्न्य हो जार्ती है और औपचार्रिक सूचनार्तंत्र, वह भी अधोगार्मी सम्प्रेषण, क बोलबार्लार् हो जार्तार् हैं। इससे संस्थार्न की सूचनार् प्रणार्ली पंगु हो जार्ती है आरै सम्प्रेषण की गुणवत्तार् पर बरु ार् असर पड़तार् है।
    3. भार्रतीय संगठनों में अवैयक्तिक व दफ्तरशार्ही होने की प्रवृत्ति पार्यी जार्ती है। ऐसे संगठनों में प्रस्थिति एवं वर्ग की भिन्नतार्ओं पर अधिक जोर रहने से प्रबन्धकों व कर्मचार्रियों के सम्बन्ध अवैयक्तिक तथार् औपचार्रिक ही रहते हैं। संचार्र एक अंतरवैयक्तिक प्रक्रियार् है। अत्यधिक औपचार्रिकतार् के मार्हौल में सूचनार्ओं के निर्बार्ध प्रवार्ह पर बुरार् असर पड़तार् है क्योंकि निकटवर्ती अंतरवैयक्तिक सम्बन्धों के अभार्व में लोग अपने मन की बार्त कह ही नहीं पार्ते। ऐसे में सम्प्रेषण प्रक्रियार् अवरूद्ध हो जार्ती है।
    4. ऊपर से जो निर्देश नीचे की ओर आते हैं, वे भी अंतिम छोर तक निर्बार्ध नहीं पहुँच पार्ते, क्योंकि ऐसे संगठनों में मार्लिकों की नीतियों क अधिक महत्व होतार् है। इसमें अधीनस्थ अपने ऊपर के अधिकारियों पर अत्यधिक निभर्र हो जार्ते हैं। यह निर्भरतार् उन्हें अपनी बार्त ऊपर पहुँचार्ने से रोकती है। इससे ऐसी सूचनार्एँ जो अरूचिकर हों, उनक ऊध्र्व सम्प्रेषण होने की सम्भार्वनार् न्यूनतम हो जार्ती है। किन्तु सकारार्त्मक बार्त यह है कि नर्इ औद्योगिक नीति व वैश्वीकरण की व्यवस्थार् आने के बार्द भार्रतीय उद्योग में प्रणार्लीगत सुधार्रों क दौर चल पड़ार् है व सूचनार् के आधुनिक तन्त्र क प्रयोग कियार् जार् रहार् है, तार्कि सूचनार्ओं क निर्बार्ध प्रवार्ह हो सके व संगठन को अधिक उत्पार्दकतार् मूलक व स्पध्र्ार्ी बनार्यार् जार् सके। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *