औद्योगिक संबंध की अवधार्रणार्, प्रकृति व अर्थ

औद्योगिक श्रम, वार्स्तव में, वृहत् समार्ज क ही एक अंग है। श्रमिक के रूप में वह उत्पार्दन क सक्रिय सार्धन है, किन्तु सार्थ ही, वह उपभोक्तार् भी है। समार्ज में भी उसकी प्रतिष्ठार् व भूमिक है। अस्तु, उसे उद्योग, परिवार्र व बृहत् समार्ज के अंग के रूप में एक ही सार्थ भूमिक क निर्वार्ह करनार् होतार् है। तीनों ही स्तरों पर मार्नवीय सम्बन्धों क समुचित स्तर बनार् रहनार् व इन भूमिकाओं में एक प्रकार क सार्मंजस्य भी बनार् रहनार् अनिवाय है। कार्य स्थल श्रमिकों के लिए मार्नसिक तनार्व व मनोवैज्ञार्निक दबार्व क कारण न बनें, तभी यह ‘भूमिकाओं क सार्मंजस्य’ श्रमिक प्रार्प्त कर सकेगार्। श्रमिकों पर प्रबन्धकों क दबार्व, फलत: होने वार्ली प्रतिक्रियार्एँ एवं असंतोष ही श्रमिक अशार्ंति के रूप में सार्मने आते हैं।

पार्श्चार्त्य देशों में औद्योगिक क्रार्ंति (जिसक बार्द में पूर्वार्त्य देशों में भी विस्तार्र हुआ) के पश्चार्त् लम्बे समय तक मार्नव को भी मशीन के समार्न समझार् गयार् व मार्नवीय भार्वनार्ओं, संभार्वनार्ओं एवं सम्बन्धों की अवहेलनार् तथार् श्रमिक वर्ग के हितों की अनदेखी की जार्ती रही। फलस्वष्प, वैश्विक स्तर पर औद्योगिक अशार्ंति फैली एवं अनेक देशों में सार्म्यवार्दी क्रार्ंति क सूत्रपार्त हुआ। कालार्न्तर में सुधार्रवार्दी प्रबन्धकों एवं व्यवहार्रवार्दी प्रबन्ध वैज्ञार्निकों ने श्रम समस्यार्ओं पर नये सिरे से चिन्तन कियार् तथार् औद्योगिक सम्बन्धों को उत्तम बनार्ने के लिए प्रबन्धन, प्रशार्सन, श्रमिक एवं श्रम संघों के सम्मिलित प्रयार्सों को महत्व दियार् जार्ने लगार्।

औद्योगिक शार्ंति के वार्तार्वरण में कार्य उपलब्धि सुगम होती है व संगठन की सुचार्रू प्रगति व उद्देश्यों की प्रार्प्ति सुनिश्चित होने की संभार्वनार् बढ़ जार्ती है। औद्योगिक शार्ंति श्रमिक-नियोक्तार् के मध्य सम्बन्धों में समुचित सुधार्र के द्वार्रार् ही हार्सिल की जार् सकती है। इस प्रकार औद्योगिक सम्बन्धों के अन्तर्गत श्रमिक वर्ग व नियोक्तार् (प्रबन्धन) वर्ग के मध्य स्थार्पित होने वार्ले सार्मूहिक सम्बन्धों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। इसमें विभिन्न लोगों के मध्य पनपने वार्ले व्यक्तिगत सम्बन्ध शार्मिल नहीं है। किन्तु प्रसिद्ध प्रबन्ध शार्स्त्री डेल योडर के विचार्र से औद्योगिक सम्बन्ध वे सम्बन्ध है जो नियोजन की दशार्ओं में तथार् रोजगार्र के क्षेत्र में ही पार्ये जार्ते हैं। इसके अन्तर्गत व्यक्तियों के बीच सम्बन्धों क बृहत् क्षेत्र तथार् मार्नवीय सम्बन्ध सम्मिलित किए जार्ते हैं, जो आधुनिक उद्योग में स्त्रियों व पुरुषों के सम्मिलित कार्य करने की प्रक्रियार् में उत्पन्न होते हैं।’

औद्योगिक सम्बन्ध की परिभार्षार् 

विभिन्न विद्वार्नों ने औद्योगिक सम्बन्ध की अवधार्रणार् को निम्न प्रकार परिभार्षित कियार् है :

  1. अग्निहोत्री ( 1970:1 ) के विचार्र से, ‘‘औद्योगिक सम्बन्ध शब्द श्रमिकों/ कर्मचार्रियों व प्रबन्धकों के मध्य उन सम्बन्धों को व्यक्त करतार् है, जो प्रत्यक्ष अथवार् अप्रत्यक्ष रूप से श्रम संघ तथार् नियोक्तार् के बीच सम्बन्धों के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं।’’ 
  2. वी. बी. सिंह ( 1971 : 9) के अनुसार्र, ‘‘औद्योगिक सम्बन्ध सार्मार्जिक सम्बन्धों क एक महत्वपूर्ण भार्ग है, जो आधुनिक उद्योग में नियोक्तार् व श्रमिकों में पार्यार् जार्तार् है, जिनक नियमन रार्ज्य द्वार्रार् विभिन्न अंशों में कियार् जार्तार् है तथार् जो सार्मार्जिक तत्वों व अन्य संस्थार्ओं द्वार्रार् क्रियार्न्वित किए जार्ते हैं। इसमें रार्ज्य के कार्यकलार्पों क अध्ययन, वैधार्निक प्रणार्ली, श्रमिकों एवं नियोक्तार्ओं के संगठन (संख्यार्त्मक स्तर पर) तथार् आर्थिक स्तर पर पूँजीवार्दी व्यवस्थार्, औद्योगिक संगठन, श्रम शक्ति नियोजन तथार् बार्जार्र सम्बन्धी घटक सम्मिलित होते हैं।’’ 
  3. इनसार्इक्लोपीडियार् ब्रिटैनिक ( 1961 : 297 ) में औद्योगिक सम्बन्ध की अवधार्रणार् को स्पष्ट करते हुए लिखार् गयार् है कि ‘‘औद्योगिक सम्बन्ध क विचार्र रार्ज्य तथार् नियोक्तार्ओं के सम्बन्धों और श्रमिक एवं उनके संगठनों तक विस्तृत है। इस प्रकार, इसके अन्तर्गत व्यक्तिगत सम्बन्ध, सार्मूहिक सुझार्व प्रणार्ली (श्रमिकों एवं नियोक्तार्ओं के बीच), सार्मूहिक सम्बन्ध (नियोक्तार्ओं एवं श्रम संघों के बीच), तथार् रार्ज्य द्वार्रार् की गयी आवश्यक व्यवस्थार् आदि को सम्मिलित कियार् जार्तार् है।’’
  4. प्रो0 सी0 बी0 कुमार्र के अनुसार्र, ‘‘औद्योगिक सम्बन्ध में श्रमिकों एवं नियोक्तार्ओं के मध्य मजदूरी तथार् अन्य रोजगार्र सम्बन्धी शर्तो की सौदेबार्जी सम्मिलित की जार्ती है; सयंत्र में दिन प्रतिदिन के संबंध इस दिशार् में महत्वपूर्ण भूमिक क निर्वार्ह करते हैं।’’
  5. अंतर्रार्ष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार्र, ‘‘औद्योगिक सम्बन्ध यार् तो रार्ज्य एवं नियोक्तार्ओं तथार् श्रम संघों के बीच अथवार् विभिन्न व्यार्वसार्यिक संगठनों के मध्य सम्बन्ध हैं।।’’ 

इस प्रकार, औद्योगिक सम्बन्ध की अवधार्रार्णार् के अन्तर्गत औद्योगिक इकाइयों में विभिन्न स्तरों पर कार्यरत श्रम शक्ति एवं नियोक्तार् तथार् उसके प्रबन्ध तंत्र के मध्य स्थार्पित गुणार्त्मक सम्बन्धों को सम्मिलित कियार् जार् सकतार् है जिनक सीधार् असर श्रमिकों की उत्पार्दकतार् व उनके कार्य संतोष पर पड़तार् है। भार्रत के औद्योगिक विवार्द अधिनियम 1947 (यथार् संशोधित 1984) के अन्तर्गत परिवार्द निवार्रण प्रक्रियार् की सम्पूर्ण वैधार्निक विधि तथार् सार्मूहिक सौदेबार्जी की प्रक्रियार् एवं मशीनरी को औद्योगिक सम्बन्ध के अन्तर्गत सम्मिलित कियार् जार्तार् है।

औद्योगिक संबंध के भार्गीदार्र

जॉन डनलप (1951) के विचार्र से, ‘‘औद्योगिक समार्ज निश्चित रूप से औद्योगिक सम्बन्धों को जन्म देतार् है, जिन्हें श्रमिकों, प्रबन्धकों तथार् सरकार के अन्तसंर्बध कहार् जार्तार् है।’’ ये तीनों ही पक्ष एक दूसरे को प्रभार्वित करते हैं तथार् औद्योगिक सम्बन्धों क ढ़ार्चार् निर्मित करते हैं। तीनों भार्गीदार्रों क विवरण निम्न प्रकार है :

1) श्रमिक एवं उनके संगठन – 

इसके अन्तर्गत श्रमिकों के वैयक्तिक गुण, सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक पृष्ठभूमि, शैक्षिक स्तर, योग्यतार्, कुशलतार्, कार्य के प्रति रूचि, एवं उनके नैतिक चरित्र पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। श्रमिक संगठन यदि सही नेतृत्व वार्लार् हो तो औद्योगिक इकार्इ में असहयोगार्त्मक वार्तार्वरण क सृजन हो सकतार् है, जिसमें श्रमिक अपने अधिकारों एवं दार्यित्वों के मध्य संतुलन स्थार्पित कर उत्पार्दकतार् में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं।

2) प्रबन्धक एवं उनके संगठन – 

प्रबन्धकों के संगठन एवं कार्य समूह औद्योगिक सम्बन्धों के निर्मार्ण में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते है। इसमें संगठनों की प्रकृति, विशिष्टतार्, उनके उद्देश्य, आंतरिक संप्रेषण, प्रस्थिति एवं अधिकार प्रणार्ली, इन संगठनों/ समूहों के अन्य संगठनों एवं समूह के सार्थ सम्बन्ध आदि पर जोर दियार् जार्तार् है। प्रबंधकों के संगठन एवं समूहों के सार्थ नियोक्तार् के किस प्रकार के सम्बन्ध है तथार् नियोक्तार् एवं प्रबन्धकों के संगठन मिलकर रार्ज्य (यार्नी सरकार) से किस प्रकार के सम्बन्ध रख पार्ते हैं, इसक प्रभार्व भी औद्योगिक सम्बन्धों की संरचनार् पर पड़तार् है। अच्छे नियोक्तार् व प्रबन्ध संगठन सार्मार्जिक दार्यित्वों क समुचित अनुपार्लन करके तथार् वैधार्निक नियमों क सम्यक् निर्वहन करके सरकार से अच्छे सम्बन्ध बनार् सकते हैं, जिसक सकारार्त्मक प्रभार्व औद्योगिक सम्बन्धों पर पड़तार् है।

3) रार्ज्य अथवार् सरकार की भूमिक –

रार्ज्य के कार्यक्षेत्र में सावजनिक क्षेत्र की इकाइयों के औद्योगिक सम्बन्ध के सार्थ ही अंतर्रार्ष्ट्रीय श्रम संगठन द्वार्रार् पार्रित प्रस्तार्वों व निर्देशों व अन्य अंतर्रार्ष्ट्रीय तथार् द्विपक्षीय संधियों के अनुरूप नीति निर्धार्रण करके बेहतर औद्योगिक सम्बन्धों की स्थार्पनार् समार्हित है। इसके अतिरिक्त सरकार के द्वार्रार् ही विभिन्न कानून बनार्ए जार्ते है, इनमें संशोधन व सुधार्र कियार् जार्तार् है तथार् बेहतर औद्योगिक महौल बनार्ने के लिए उपयुक्त मशीनरी, प्रक्रियार्ओं व न्यार्यिक ढार्ँचे क निर्मार्ण भी कियार् जार्तार् है।

इस प्रकार, श्रमिकों व उनकी कार्यदशार्ओं में सुधार्र एवं उनके हितों की रक्षार् करने में रार्जकीय सहयोग, नियमन व नियंत्रण तथार् सरकारी हस्तक्षेप क औद्योगिक सम्बन्ध के क्षेत्र में बड़ार् महत्व होतार् है। विधि व्यवस्थार्, पंच निर्णय, न्यार्यार्धिकरणों व न्यार्यार्लयों के निर्णय, समझौतों,रीतियों व परम्परार्ओं क अनपु ार्लन सार्मूहिक रूप से आद्यै ोगिक व्यवस्थार् को दिशार् देते हैं। इसी पक्र ार्र सावजनिक उपक्रमों में श्रमिक कल्यार्ण के विभिन्न उपार्यों को लार्गू करके तथार् विभिन्न कानूनी प्रार्वधार्नों को अमली जार्मार् पहनार्कर रार्ज्य निजी क्षेत्र के समक्ष औद्योगिक वार्तार्वरण को बेहतर बनार्ने के लिए उदार्हरण प्रस्तुत करतार् है।

औद्योगिक सम्बन्ध के उद्देश्य 

कुछ अमेरिकी विद्वार्नों क मत है कि औद्योगिक सम्बन्धों क उद्देश्य व्यक्ति क अधिकतम विकास करनार्, श्रमिकों व नियोक्तार्ओं के मध्य वार्ंछित कार्यकारी संबंध स्थार्पित करनार् तथार् भौतिक संसार्धनों की अपेक्षार् मार्नव संसार्धनों को इच्छित गति प्रदार्न करनार् है। वैसे, औद्योगिक सम्बन्धों क मूल उद्देश्य दो पक्षों, अर्थार्त् श्रमिकों एवं प्रबन्धकों, के मध्य अच्छे तथार् स्वस्थ सम्बन्धों क विकास करनार् है तार्कि औद्योगिक शार्ंति एवं उत्पार्दकतार् को बढ़ार्वार् दियार् जार् सके। औद्योगिक सम्बन्धों के विशिष्ट उद्देश्य निम्न प्रकार है :

  1. श्रमिक तथार् नियोक्तार् दोनों के हितों की रक्षार् करनार्; इसके लिए दोनों पक्षों में एक दूसरे के दृष्टिकोण के प्रति समझ व आदर भार्व उत्पन्न करनार्। 
  2. औद्योगिक विवार्दों की रोकथार्म करनार् तार्कि अधिक उत्पार्दन के रार्ष्ट्रीय लक्ष्यों की पूर्ति हो सके। 
  3. पूर्ण रोजगार्र की स्थिति उत्पन्न करने के लिए अधिकतम रोजगार्र एवं अधिकतम उत्पार्दन क लक्ष्य हार्सिल करनार्। 
  4. श्रम बदली व अनुपस्थिति की दर में कमी करनार्। 
  5. औद्योगिक प्रजार्तंत्र की स्थार्पनार् करनार्; इसके लिए नीति निर्धार्रण व प्रबन्धन में श्रमिक वर्ग की सहभार्गितार् सुनिश्चित करनार्। 
  6. श्रमिकों को सिविल सोसार्यटी क अंग बनार्नार्, तार्कि उनक व्यवहार्र तर्क आधार्रित तथार् रार्ष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप हो सके। 
  7. हड़तार्ल, तार्लार्बन्दी, घेरार्व आदि में कमी लार्ने क प्रयार्स करनार्; इसके लिए श्रमिकों को उपयुक्त मजदूरी, अच्छी कार्य दशार्एँ, अच्छी रहन सहन की दशार्एँ तथार् अन्य अनुषंगी लार्भ सुनिश्चित करार्नार्। सार्थ ही, श्रमिकों को कार्य के प्रति अधिक समर्पित बनार्नार्।
  8. औद्योगीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न सार्मार्जिक असन्तुलन को दूर करनार् तथार् आस-पार्स के वार्तार्वरण को शार्ंतिपूर्ण बनार्नार्। इसमें औद्योगिक सम्बन्धों की महत्वपूर्ण भूमिक होतार् है; इसके लिए रार्ज्य को भी आवश्यक हस्तक्षेप करनार् चार्हिए।
  9. कुल सार्मार्जिक लार्भ में बढ़ोत्तरी करनार्।
  10. श्रमिकों व प्रबन्धकों के बीच अविश्वार्स की खार्इंर् पार्टकर उनमें सम्पकर् सेतु कायम करनार्। 
  11. औद्योगिक विवार्दों को यथार्सम्भव टार्लनार् व मधुर सम्बन्ध बनार्नार्।
  12. उत्पार्दन प्रक्रियार् में श्रमिकों की अधिकतम भार्गीदार्री सुनिश्चित कर देश के विकास को बढ़ार्वार् देनार्। 

इस प्रकार, औद्योगिक सम्बन्धों क उद्देश्य औद्योगिक व्यवस्थार् में स्पर्धार्, संघर्ष व हितों क टकरार्व टार्लकर प्रबन्धन व श्रमिक वर्ग के मध्य परस्पर हित क संरक्षण करने वार्ली कार्यकारी व सही समझ उत्पन्न करनार् है, तार्कि उनमें सहयोगार्त्मक व विश्वसनीय सम्बन्धों क विकास कियार् जार् सके।

औद्योगिक संबंधों के निर्धार्रक कारक

औद्योगिक सम्बन्ध शून्य में विकसित नहीं होते। ये उस वार्तार्वरण से प्रभार्वित होते रहते हैं, जिसमें श्रमिक रहते व कार्य करते हैं। इन कारकों को दो वर्गो में विभक्त कर सकते हैं : – (अ) संस्थार्गत कारक (ब) आर्थिक कारक

  1. संस्थार्गत कारकों के अन्तर्गत रार्जकीय नीति, श्रम कानून व विनियम, श्रमिक संघ, नियोक्तार् संघ तथार् सार्मार्जिक संस्थार्एँ (जैसे कि समुदार्य, जार्ति, संयुक्त परिवार्र, धामिक विश्वार्स, सार्मार्जिक मूल्य, परंपरार्यें, आदि) सम्मिलित हैं। इसमें कार्य के प्रति अभिरूचि व रूचि, शक्ति के आधार्र, स्तर व अनपु ेर्र ण, आद्यै ोगिक प्रणार्ली आदि भी सम्मिलित है। 
  2. आर्थिक कारकों के अन्तर्गत आर्थिक विचार्रधार्रार् (जैसे कि पूँजीवार्दी यार् सार्म्यवार्दी), औद्योगिक ढार्ँचार् (जैसे कि पूँजीवार्दी ढ़ार्ँचार्), आर्थिक संस्थार्न, व्यक्तिगत, कम्पनी तथार् सरकारी स्वार्मित्व, पूँजीगत ढ़ार्ँचार् (तकनीकी सहित), श्रम शक्ति की प्रकृति और उसक गठन, बार्जार्र की शक्तियों क स्वरूप, बार्जार्र में श्रम की मार्ँग एवं आपूर्ति की स्थिति आदि सम्मिलित है। 

डार्ँ0 वी0 बी0 सिंह के विचार्र से, ‘‘किसी देश में औद्योगिक सम्बन्धों क वार्तार्वरण उस समार्ज पर निर्भर करतार् है, जिससे इनकी उत्पत्ति हुयी है। यह केवल औद्योगिक परिवर्तनों की उत्पत्ति ही नहीं है, वरन् सम्पूर्ण सार्मार्जिक परिवर्तनों क परिणार्म है जिससे औद्योगिक समार्ज की रचनार् हुयी है। इसक आधार्र समार्ज की विभिन्न संस्थार्एँ हैं। इन संस्थार्ओं के घटने बढ़ने यार् स्थिरतार् क असर औद्योगिक सम्बन्धों पर भी पड़तार् है। इस प्रकार, औद्योगिक सम्बन्धों की प्रक्रियार् क संस्थार्गत शक्तियों से गहरार् सम्बन्ध है, जो किसी निश्चित समय पर आर्थिक एवं सार्मार्जिक नीतियों को आकार प्रदार्न करती हैं।

आर0 ए0 लेस्टर ने श्रम व प्रबन्धन के मध्य सम्बन्धों को प्रदर्शित करने के लिए तीन घटक बतार्ए हैं :

  1. आर्थिक, सार्मार्जिक, मनोवैज्ञार्निक व रार्जनीतिक शक्तियार्ँ, जो एक ओर नीति निर्धार्रण तथार् प्रबन्ध की कार्यवार्ही की तथार् दूसरी ओर श्रम संघ के पदार्धिकारियों व सदस्यों की कार्यवार्ही को प्रभार्वित करती है ; 
  2. प्रबन्धकों व श्रमिकों के बीच शक्ति सम्बन्धों क ढार्ँचार्, तथार् 
  3. श्रम एवं प्रबन्धन के बीच शक्ति क संतुलन। लेस्टर प्रथम प्रकार के कारकों को मूल कार्य घटक तथार् शेष दो प्रकार के कारकों को शकित ढार्ँचार् घटक कहते हैं। 

इन सभी घटकों में समन्वय इस प्रकार स्थार्पित किए जार्ने की आवश्यकतार् है कि औद्योगिक शार्ंति को आगे बढ़ार्यार् जार् सके, तार्कि उद्योगों में मार्नवीय सम्बन्धों में सुधार्र के द्वार्रार् पूर्ण रोजगार्र की स्थिति, औद्योगिक प्रजार्तंत्र क विकास तथार् लार्भ एवं निर्णय में श्रम एवं प्रबन्धन की सहभार्गितार् के बृहत्तर लक्ष्यों को हार्सिल कियार् जार् सके।

औद्योगिक सम्बन्धों क विषय क्षेत्र 

औद्योगिक सम्बन्ध कोर्इ असार्धार्रण सम्बन्ध नहीं हैं, बल्कि यह एक क्रियार्त्मक अंतनिर्भिरतार् है, जिसमें ऐतिहार्सिक, आर्थिक, सार्मार्जिक, मनोवैज्ञार्निक, जैविक, तकनीकी, व्यार्वसार्यिक, रार्जनैतिक, वैधार्निक तथार् अन्य चरणों क अध्ययन कियार् जार्तार् है।

वी0 पी0 मार्इकल ( 1984 : 5 ) के शब्दों में, ‘‘यदि हम औद्योगिक विवार्दों (अर्थार्त् अच्छे औद्योगिक सम्बन्धों क अभार्व) को किसी वृत्त क केन्द्र बिन्दु मार्नें तो वह वृत्त विभिन्न भार्गों में बँट जार्एगार्। उदार्हरणाथ, कार्य की दशार्ओं क अध्ययन मुख्यत: मजदूरी के स्तर तथार् रोजगार्र की सुरक्षार् आदि के सम्बन्ध में कियार् जार्तार् है, जोकि आर्थिक क्षेत्र में आती हैं। विवार्दों क उदग् म तथार् विकास इतिहार्स के क्षेत्र में आतार् है; उससे होने वार्लार् सार्मार्जिक विघटन समार्जशार्स्त्र के क्षेत्र में ; श्रमिकों, नियोक्तार्ओं एवं सरकार तथार् समार्चार्र पत्रों आदि के विचार्र समार्ज मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में ; उनकी सार्ंस्कृतिक अंतक्रियार्एँ सार्ंस्कृतिक नृगत्व शार्स्त्र के क्षेत्र में ; सरकार की नीति जो विवार्दों के मार्मलों में अपनाइ जार्ती है, रार्जनीतिशार्स्त्र के क्षेत्र में ; विवार्द के वैधार्निक तत्व विधि के क्षेत्र में ; श्रमिकों एवं नियोक्तार्ओं के मध्य सम्बन्ध के बार्रे में अंतरार्ष्ट्रीय सहयोग एवं संधियार्ँ अंतर्रार्ष्ट्रीय सम्बन्ध के क्षेत्र में ; विवार्दों के प्रभार्व (जिनमें श्रम नीति पर प्रशार्सन शार्मिल हो) लोक प्रशार्सन के क्षेत्र में ; और तकनीकी विषय (जैसे तार्प नियंत्रण तथार् विवेकीकरण की विधियों क उपयोग) तकनीकी क्षेत्र में ; तथार् लार्भ अथवार् हार्नि क ऑकलन गणित के क्षेत्र में आतार् है।

उपरोक्त तथ्य से स्पष्ट हो जार्तार् है कि औद्योगिक सम्बन्धों क विषय क्षेत्र विभिन्न विज्ञार्नों एवं ज्ञार्न क्षेत्रों की अंतर्निभरतार् क प्रमार्ण है। ये सम्बन्ध आर्थिक, सार्मार्जिक, मनोवैज्ञार्निक, रार्जनीतिक, व्यवसार्यिक तकनीकी आदि कर्इ प्रकार के कारकों से प्रभार्वित होते हैं।

  1. औद्योगिक सम्बन्ध मार्नवीय धार्रणार्ओं और कार्य प्रक्रियार्ओं क मिश्रण होते हैं। सम्बन्ध अच्छे होंगे यार् बुरे, यह व्यक्तिगत भार्वनार्ओं और कार्य प्रक्रियार्ओं पर निर्भर करतार् है। 
  2. धार्रणार्ओं के अन्तर्गत विश्वार्स एवं पहचार्न, भार्वुकतार्, एवं कार्यपरिणति के लिए संकल्प भार्वनार् सम्मिलित होती है। इन्हें समझनार् मनोवैज्ञार्निक अध्ययन क विषय है। 
  3. कार्य प्रक्रियार्ओं में, प्रार्थमिकतार् निर्धार्रण, चयन प्रक्रियार्, निर्णय, आदेश पार्लन, सुझार्व एवं सुधार्र प्रक्रियार्, कार्य गहनतार्, अनुसंधार्न प्रक्रियार् आदि सम्मिलित हैं। इनमें सुधार्र से संगठन एवं उसके सार्मार्जिक दार्यित्व की पूर्ति होती है। अंतर्रार्ष्ट्रीय श्रम संगठन ने ‘सहयोग की स्वतंत्रतार् तथार् सहयोग के अधिकार की रक्षार्, संगठित होने के सिद्धार्न्त की क्रियार्न्विति, सार्मूहिक सौदेबार्जी क अधिकार, सार्मूहिक समझौतार्, मध्यस्थतार्, पंचनिर्णय, तथार् अधिकारियों एवं व्यार्पार्रियों के संगठनों के बीच सहयोग को श्रम सम्बन्धों के अन्तर्गत सम्मिलित कियार् है।’ 

डेल योडर के विचार्र से, ‘‘औद्योगिक सम्बन्धों के अन्तर्गत भर्ती, चयन, श्रमिकों क शक्षण सेविवर्गीय प्रबन्ध, सार्मूहिक सौदेबार्जी सम्बन्धी नीतियार्ँ सम्मिलित की जार्ती।’’ इस प्रकार, औद्योगिक सम्बन्धों क क्षेत्र काफी व्यार्पक है। इसके विषय क्षेत्र के अन्तर्गत उपरोक्त के सार्थ ही, निम्न बार्तों को भी सम्मिलित कियार् जार्तार् है :-

  1. औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े सभी व्यक्तियों के बीच अच्छे सम्बन्धों क निर्मार्ण एवं उनक संधार्रण।
  2. मार्नवीय विकास को प्रोत्सार्हन 
  3. कर्मचार्रियों में टीम भार्वनार् क निर्मार्ण एवं उनमें संगठन के प्रतिनिष्ठार् उत्पन्न करनार्। 
  4. आपसी सम्मार्न, भाइचार्रार् एवं औद्योगिक संस्थार्न में कौटुम्बिक सम्बन्धों क विकास। 
  5. औद्योगिक संस्थार्न में शार्ंति क वार्तार्वरण निर्मित करनार्। 
  6. औद्योगिक उत्पार्दन एवं रार्ष्ट्रीय विकास को प्रोत्सार्हन। 
  7. समार्ज कल्यार्ण को बढ़ार्वार्। 
  8. परिष्कृत नियमार्वली एवं कार्य प्रणार्ली क निर्धार्रण। 
  9. उत्पार्दक – उपभोक्तार् – सरकार के मध्य विश्वार्स व सद्भार्व क वार्तार्वरण निर्मित करनार्। 

स्कॉट क्लोदियर व स्प्रीगल (1977) के अनुसार्र, ‘‘औद्योगिक सम्बन्धों के अच्छे होने पर (अ) व्यक्ति क अधिकतम विकास (ब) कर्मचार्री-नियोक्तार् सम्बन्धों क अधिकतम विकास (स) कर्मचार्रियों के मध्य आपसी भाइचार्रार्, तथार् (द) भौतिक सार्धनों के अधिकतम उपयोग के लिए मार्नव संसार्धनों क अधिकतम विकास होतार् है।’’

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