ओशो क जीवन परिचय, शिक्षार् एवं दर्शन

ओशो ने जीवन के प्रार्रम्भिक काल में ही एक निभ्र्ार्ीक स्वतन्त्र आत्मार् क परिचय दियार्। खतरों से खेलनार् उन्हें प्रतिकार थार्। 100 फीट ऊँचे पुल से कूद कर बरसार्त में उफनती नदी को तैर कर पार्र करनार् उनके लिए सार्धार्रण खेल थार्।

ओशो बचपन से ही बहुत शरार्रती थे शैतार्नी करने में उन्हें बहुत मजार् आतार् थार्। ओशो जब पहली बार्र विद्यार्लय गये तब वे 10 वर्ष के थे। एक दशक तक खेलने कूदने की इन आजार्दी के कारण उन्हें बचपन को सही मार्यने में जीने क अवसर मिलार्।

‘‘ओशो में सीखने सिखार्ने की आदत छोटी उम्र से ही प्रबल थी। स्वयं के अनुभव के बिनार् वे कोई बार्त स्वीकार नहीं करते थे। जार्नने पर जोर देते, मार्नने क विरोध करते। इसलिए वे अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करने में कुशल हुए क्योंकि जो कुछ वह कहते थे, वह उनके अनुभव क नतीजार् थार्। वे जो भी अध्ययन करते उस पर वैज्ञार्निक चिन्तन भी करते थे।’’ 

ओशो क पुस्तक प्रेम – ओशो को पुस्तकों से बड़ार् पे्रम थार्। ओशो के इस पुस्तक पे्रम को देखकर उनके पितार् ने ओशो से एक बार्र कहार् थार् कि ‘‘पहले हमार्रे घर में पुस्तकालय थार् अब पुस्तकालय में घर है’’ ओशो ने पहली पुस्तक जो नार्नी को पढ़कर सुनार्ई थी’’ दी बुक ऑफ मिरदार्द’’। 


ओशो ने बार्ल्यवस्थार् तक करीब तीन हजार्र पुस्तकों क अध्ययन कर लियार् थार्।’’ओशो ने 21 वर्ष की अवस्थार् में अपने आपको पूर्णरूपेण आध्यार्त्मिक अध्ययन में समर्पित कर लियार् और एक सप्तार्ह में करीब 100 से अधिक पुस्तकें पढ़ डार्ली।

‘‘ओशो ने चार्लीस वर्ष की उम्र तक 100 पुस्तकों से शुरू किए गए अध्ययन के सिलसिले को 2 लार्ख तक पहुॅचार् दियार् थार्। ओशो जिस पुस्तक को पढ़ लेते थे अन्त में उसमें अपने हस्तार्क्षर करके छोड़ देते थे। ओशो को रविन्द्रनार्थ क सार्हित्य पढ़ने क बेहद शोक थार्।’’

ओशो पढ़ने के इतने शोंकीन थे कि उनक पूरार् दिन भोजन और सुबह के प्रवचन के अलार्वार् कितार्बे पढ़ने में ही व्यतीत होतार् थार्। ‘‘ओशो को पढ़ने क इतनार् शोक थार् कि कितार्बे खरीदने के लिए चोर बार्जार्र में बिकने वार्ली पुस्तकों को भी खरीदने से नहीं चूकते थे।  ओशो को 20वीं सदी क सबसे अधिक कितार्बें पढ़ने वार्लार् पुरूष मार्नार् जार्तार् है।’’ 

ओशो के व्यक्तित्व के निर्मार्ण में प्रभार्वितकर्त्तार् 

यू तो ओशो के जीवन काल में बहुत लोग आए परन्तु कुछ खार्स लोग ऐसे भी थे जिनक ओशो के जीवन में विशेष प्रभार्व व योगदार्न रहार् है। जिन्होंने ओशो के जीवन को नई दिशार् प्रदार्न की।


नार्नार्-नार्नी क योगदार्न –
ओशो अपने बचपन में नार्नार् नार्नी के पार्स ही रहते थे। जहार्ं उन्हें स्वतंत्र वार्तार्वरण मिलार्। जहार्ं उनको कुछ भी करने की रोक ठोक नहीं थी। ओशो को सार्हसी, स्वच्छ एवं स्वतंत्र बनार्नें में उनके नार्नार् नार्नी क भी बड़ार् योगदार्न रहार्।

दोनों ने ओशो को किसी भी कार्य को करने के लिए यार् मार्न्यतार् मार्नने के लिए बार्ध्य नहीं कियार्। फिर वह मन्दिर जार्नार् हो यार् कोई शोक में जार्ने क सब कुछ ओशो के चयन अनुभव एवं निर्मार्ण पर छोड़ार् और स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर होने क मौक दियार्।

ओशो की नार्नी उनको रार्जार् कह कर पुकारती थी और वे उन्हें मार्ं कहकर बुलार्ते थे। ओशो कहते है ‘‘मेंरी नार्नी ने मुझे धीरे धीरे पढ़नार् सिखार्यार् और मैंने पुस्तकें पढ़नार् शुरू कर दी। मैं उन्हें पढ़कर जो भी सुनार्तार् वह मुझसे किसी वार्क्य क यार् सार्रे अध्यार्य क सार्रार्ंश में अर्थ पूछती।

इस प्रकार प्रशिक्षण हो गयार् और दूसरों को समझार्ने की मेंरी आदत हो गई’’ ओशो के अन्दर गजब क सौंदर्य बोध थार्। वह कलार् के पार्रश्वी व सौंदर्य के उपार्सक थे। यह गुण भी उन्होंने अपनी नार्नी से सीखार्। ओशो के प्रवचनों में, सन्देशों में, कहार्नियों क बहुत महत्व है।

सच तो यह है कि कहार्नियों के मार्ध्यम से ही ओशो ने प्रवचन दिए। जिनमें कई संदेश थे। कहार्नियों क श्रेय ओशो अपनी नार्नी को देते है। ओशो की नार्नी ही ओशो की प्रथम
शिष्यार् ही नहीं थी प्रथम संबुद्व शिष्यार् भी थी। मृत्यु शोक नहीं उत्सव है यह बार्त भी ओशो ने अपनी नार्नी से सीखी जब ओशो के नार्नार् ओशो की गोद में अपनार् दम तोड़ रहे थे तब नार्नी सार्थ थी।

जार्ने से पहले नार्नार् के होठों पर जो अंतिम शब्द थे वह थे ‘‘चिंतार् मत करों, क्योंकि मैं मर नहीं रहार् हूँ।’’ और चल बसे। नार्नी की आखों में आंसू के बजार्ए होठों पर गीत थार्। ओशो कहते है ‘‘उन्होंने एक गीत गयार्। ऐसे मेंने सीखार् कि मृत्यु क उत्सव मनार्नार् चार्हिए।  उन्होंने वही गीत गयार् थार् जब उनकों मेंरे नार्नार् से पहली बार्र पे्रम हुआ थार्।’’ 

पितार् क प्रभार्व – ओशो के जीवन पर उनके पितार् क भी अत्यार्धिक प्रभार्व पड़ार्। उनके पितार् ने भी उन्हें कभी भी किसी कार्य को करने के लिए बार्ध्य नहीं कियार्। उनके पितार् कपड़े के व्यार्पार्री थे।

मग्गार् बार्बार् क प्रभार्व  –  ओशो की जीवन यार्त्रार् में जिन लोगों ने प्रभार्वित कियार् उनमें से ही एक है मग्गार् बार्बार्। ओशो कहते है ‘‘कि उनक असली नार्म व उम्र कोई नहीं जार्नतार्। वह अपने सार्थ एक मग्गार् रखते थे। इसलिए उन्हें मग्गार् बार्बार् कह कर बुलार्ते थे।’’

ओशो क कहनार् है ‘‘कि वह इस धरती पर अनोखे व्यक्तियों में से एक थे। वे बोलते नहीं थे लेकिन मैं अकेलार् व्यक्ति थार्। जिससे वे बार्त करते थे। वह भी अकेले में। हम दोनों के बीच वातार्लार्प बिल्कुल गुप्त रहतार् थार्। वह पहले व्यक्ति थे। जिसने मुझसे कहार् कि जीवन जितनार् दिखार्ई देतार् है उससे कही अधिक है। इसके बार्हरी रूप पर मत रूको, इसकी गहरार्ई में जार्कर इसकी जड़ों में पहुंचो।

जबकि उन्होंने कभी भी मेंरार् (ओशो) क पथ प्रदर्शन नहीं कियार्, कोई दिशार्-निर्देश नहीं कियार्ं फिर भी उनके होने मार्त्र से उनकी उपस्थिति से ही मुझे बड़ी सहार्यतार् मिली। मेंरे भीतर की सुप्त, अज्ञार्त शक्तियार्ं उनकी उपस्थिति में जार्गृत हो उठी। में मग्गार् बार्बार् क बहुत कृतज्ञ हूँ।’’

ओशो जितनार् मग्गार् बार्बार् के सार्थ हसे उतनार् कभी जीवन में दुबार्रार् नार् हसें। मग्गार् बार्बार् इतने सुन्दर थे कि उनकी तुलनार् किसी और के सार्थ नहीं कर सकते। वे तो रोमन मूर्तिकलार् के उत्कृष्ट नमूने थे उससे भी बढ़कर थे। जीवन से भरे हुए थे।

संबोधित होने के बार्द ओशो जिन पहले दो आदमियों से मिले पर उनमें पहले थे मग्गार् बार्बार् ‘‘जैसे ही उन्होंने ओशो को देखार् सबके सार्मने पैर छूए और रो पड़े और सबके सार्मने उन्होंने कहार् मेंरे बेटे, आखिर तुमने कर ही लियार्। मुझे मार्लूम थार् कि एक दिन तुम अवश्य कर लोगे।’’

पार्गल बार्बार् क प्रेम – पार्गल बार्बार् क भी ओशो के जीवन में महत्वपूर्ण योगदार्न थार्। मग्गार् बार्बार् की तरह पार्गल बार्बार् को भी ओशो असार्धरण लोगों में गिनते थे। ओशो कहते है ‘‘मैंने उन्हें नहीं उन्होंने मुझे खोजार् थार्। मै नदी में तैर रहार् थार् उन्होंने मुझे देखार् और वह भी नदी में कूद पडे और हम दोनों सार्थ तैरते रहे। वह काफी वृद्व थे और में बार्रह वर्ष क थार्। 

पार्गल बार्बार् बहुत अजीब थे। वे उपरी तौर पर लोगों से अनार्वश्यक वार्क्य बोलते थे।’’पार्गल बार्बार् बहुत अच्छी बार्ंसुरी बजार्ते थे। उन्होंने ओशो को बार्ंसुरी वार्दकों से ही नहीं बल्कि कई संगीतज्ञतों से भी परिचित करवार्यार्। बार्बार् को संगीत से इतनार् पे्रम थार् कि वह अपने कमण्डल को भी सितार्र की तरह बजार् लेते थे।

वे संगीतज्ञों के संगीतज्ञ थे। उन्होंने मरने से पहले ओशो को अपनी प्रिय बार्ंसुरी स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट की थी। पार्गल बार्बार् वे पहले आदमी थे जो ओशो को कुम्भ के मेंले में लेकर गये थे। उन्होंने ने ही ओशो को तार्जमहल, अजन्तार् ऐलोरार् की गुफार्ऐं दिखार्ई उनके सार्थ ही ओशो हिमार्लय पर गये।

उनकी इस यार्त्रार् के बार्द ओशो के जीवन में (देखने व समझने के नजरिये में) परिवर्तन आयार्। पार्गल बार्बार् के सार्थ क अनुभव ओशो के लिए बहुत ही ज्ञार्नवर्द्वक थार्। उनके जरिए ही उन्हें सभी महार्न तथार् तथार्कथित संतों से मिलने क मौक मिलार्। पार्गल बार्बार् ओशो से चार्हते थे कि वह कम से कम एम.ए. की डिग्री अवश्य प्रार्प्त कर ले।

ओशो ने अपनी ध्यार्न विधियों में संगीत को भी महत्व दियार् है। जिसक श्रेय वह पार्गल बार्बार् को देते है। ओशो कहते है कि ‘‘मुझे पार्गल बार्बार् कहते थे कि ऊँचे उठने के लिए सगीत एक अच्छी सीढ़ी है। उसको पकड़े नहीं रहनार् चार्हिए यार् उसी पर अटके नहीं रहनार् चार्हिए। सीढ़ी क काम है किसी दूसरी जगह पंहुचनार्। इसलिए मेंने अपनी समस्त ध्यार्न विधियों में संगीत क उपयोग कियार् है।’’

पार्गल बार्बार् ओशो से बहुत पे्रम करते थे। वे ओशो के भविष्य को लेकर बहुत चिंति थे वह उन्हें ऐसे हार्थों में सौपनार् चार्हते थे जो आगे उनक मागदर्शक करे यार् सहयोग करें। इसके लिए उन्होंने मरने से पहले मस्त बार्बार् को ओशो को सौप दियार् थार्। ओशो को कहते है कि पार्गल बार्बार् ने उन्हें जीवन की कई सच्चार्ईयार्ँ से परिचित करवार्यार् तथार् इतनार् भ्रमण करवार्यार् और वे उन सबके लिए आज बहुत आभार्री हूँ। परन्तु वे कभी उन्हें धन्यवार्द दे पार्ये क्योंकि पार्गल बार्बार् खुद ओशो के पैर छूते थे। 

मस्त बार्बार् – ओशो के जीवन में जिन महत्वपूर्ण लोगों क उल्लेख मिलतार् है उन्हीं में से एक है मस्त बार्बार्। ये वही है जिन्हें पार्गल बार्बार् ने ओशो के लिए चुनार् थार्। ओशो कहते है ‘‘मुझे पहचार्नने वार्ले तीन जार्ग्रत व्यक्ति थे। 

पहले व्यक्ति थे मग्गार् बार्बार्, दूसरे पार्गल बार्बार् और तीसरे तो ओर भी अजीब थे मेंरी कल्पनार् के भी बार्हर पार्गल बार्बार् से भी इतने पार्गल न थे -उनक नार्म थार् मस्त बार्बार्।’’ओशो से मस्त बार्बार् की पहली मुलार्कात अद्भुत थी। मस्त बार्बार् आंखो में आंसू लिए हार्थ जोड़कर ओशो से कहने लगे ‘‘इस क्षण के आगे अब तुम मेंरे पार्गल बार्बार् होओगे।’’

ओशो मस्त बार्बार् को मस्तों कहकर बुलार्ते थे। मस्त बार्बार् भी ऐसे व्यक्ति थे जो ओशो के पैर छूते थे। मस्त बार्बार् तन व मन दोनों से बहुत सुन्दर थे।
ओशो बतार्ते है ‘‘मस्तों सिर्फ बुद्वपुरूष ही नहीं अच्छे सितार्र वार्दक व महार्न दाशनिक भी थे।

हम दोनों रार्त को गंगार् किनार्रे लेट कर कई विषयों की चर्चार् करते थे। हम दोनों को एक दूसरे क संग बहुत पसन्द थार्। कभी मौन रहकर भी एक दूसरे की उपस्थिति क आनन्द उठार्ते। मस्त बार्बार् बहुत से वार्घयत्रों को बजार्ते थे। वे बहुआयार्मी प्रतिभार्वार्न व्यक्ति थे। वे चित्र भी बनार्ते थे। मस्त बार्बार् पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ओशो को सर्वप्रथम भगवार्न कह कर पुकारार् थार्।’’

शंम्भू बार्बू की दोस्ती – ओशो के जीवन में शम्भू क बड़ार् योगदार्न रहार् है। ओशो कहते है कि शम्भू बार्बू संबुद्व यार् जार्ग्रत गुरू नहीं थे फिर भी उनक स्थार्न मग्गार् बार्बार् के बार्द द्वितीय मार्नतार् हूँ। क्योंकि उन्होंने मुझे तब पहचार्नार् जब पहचार्ननार् असम्भव थार्।

शम्भू बार्बू एक अच्छे कवि थे। परन्तु उनकी कभी कोई कवितार् उन्होंने प्रकाशित नहीं करवार्ई वे अच्छे कहार्नीकार भी थे। शम्भू बार्बू से उनकी दोस्ती अजीब थी। वे ओशो की पितार् की उम्र के थे तथार् शिक्षित व्यक्ति थे। जब ओशो से उनकी दोस्ती हुई उस वक्त ओशो मार्त्र नौ वर्ष के थे।।

शम्भू बार्बू कई समितियों के सभार्पति व हार्इकोर्ट में वकील थे तो ओशो उस समय अशिक्षित, अनुशार्सनहींन बार्लक थे। ओशो बतार्ते है कि ‘‘जिस क्षण शम्भू बार्बू और मेंने एक दूसरे को देखार् कुछ हुआ हम दोनों के ह्दय एक हो गए-विचित्र मिलन हो गयार्।’’ ओशो शम्भू बार्बू के एक मार्त्र मित्र थे। वे रोज ओशो को पत्र लिखते थें और जिस दिन कुछ लिखने को नार् होतार् उस दिन खार्ली कागज लिफार्फे में डार्लकर भेज देते थे।

ओशो समझ जार्ते थे कि वह अकेलार्पन महसूस कर रहे है और ओशो उनसे मिलने आ जार्ते थे। उन्होंने ओशो के कारण सभार्पति (अध्यक्ष) के पद से त्यार्गपत्र दे दियार् थार्। उन्होंने ओशो से कहार् कि तुम्हार्रे भीतर जो अपरिभार्षित है मुझे उससे पे्रम है। ओशो के पूरे जीवन में सिर्फ एक ही मित्र बने शम्भू बार्बू। यदि वे नहीं होते तो उन्हें कभी भी मित्र क अर्थ पतार् नहीं चलतार्।

ओशो उनसे 1940 में मिले और 1960 में शम्भूबार्बू की मृत्यु हो गई थी। 20 वर्ष की उनकी दोस्ती रही। ओशो कहते है कि मैं बुद्वि जीवियों से मिलार् हूँ लेकिन शम्भू बार्बू की बरार्बरी कोई नहीं कर सकतार्। 

ओशो के दाशनिक बनने क घटनार्क्रम 

ओशो बचपन से ही जिज्ञार्सु प्रवृत्ति के बार्लक थे। उनके मस्तिष्क में हमेंशार् सवार्लों क गुच्छार् चलतार् रहार् थार्। वे हर किसी में अपने प्रश्नों क हल ढूढ़ते नजर आते थे।

उनक सोचने समझने क दृष्टिकोण भिन्न थार्। वे पहार्ड़, नदी, आकाश, पक्षीयों सब क सम्बन्ध खोजते नजर आते थे। वे ये मार्नते थे कि इस धरती पर कोई भी वस्तु अकरण नहीं है। हर वस्तु एक दूसरे से परस्पर सम्बन्धित है। अपनी इस जिज्ञार्सु प्रवृत्ति के कारण ही उन्हें पुस्तक पढ़ने क शोक लगार्। वह स्कूल जार्ने से ज्यार्दार् पुस्तकालय जार्नार् ज्यार्दार् पसन्द करते थे।

ओशो के घर क वार्तार्वरण स्वतंत्र थार् बचपन से ही वे स्वतन्त्र वार्तार्वरण में नार्नार् नार्नी के सार्थ रहे। नार्नी ओशो के प्रश्नों क जवार्ब देती थी तथार् ओशो के पितार् ने भी उनकी जिज्ञार्सार् को शार्न्त करने में उनकी मदद की। ओशो के ज्ञार्न प्रार्प्ति को शार्ंत करने में तीन जार्गृत बार्बार्ओं क भी महत्वपूर्ण योगदार्न रहार् है। जिमसें मग्गार् बार्बार् द्वार्रार् उन कहे हुए शब्द ‘‘डूब जार्’’ अर्थार्त जब तक ज्ञार्न की प्रार्प्ति नार् हो तब तक उसमें डूबे रहो तथार् खोजते रहो मुख्य थार्।

इन बार्बार्ओं क प्रभार्व उन पर इस तरह से पड़ार् की उनके सोचने के नजरिये में परिवर्तन आयार्। चूंकि ओशो पढ़ने के शौकीन थे इसलिए उन्होंने बी.ए. व एम.ए. फिलॉसफी (दर्शन शार्स्त्र) से प्रथम श्रेणी गोल्ड मेंडेलिस्ट होकर कियार्। किन्तु इससे उन्हें कोई शार्न्ति नहीं मिली और नार् ही वे रूकें। ‘‘मार्त्र 21 वर्ष की अवस्थार् में ही उन्हें मौलक्षी वृक्ष के नीचे ज्ञार्न प्रार्प्त हुआ। बौद्वित्व की प्रार्प्ति हुई।’’ 

इसके बार्द उन्होंने अपने विचार्रों से प्रकाश फैलार्नार् प्रार्रम्भ कियार्। उन्होंने स्वयं अनेक दाशनिकों के बार्रे में गहनतम अध्ययन कियार् उनमें मुख्य है महार्वीर स्वार्मी, महार्त्मार् बुद्ध, नार्नक, कबीर, कृष्ण, महार्त्मार् गार्ंधी, लेलिन आदि। ओशो ने अपने अध्यार्पन काल में भार्रत भर में भ्रमण कियार् तथार् समार्जवार्द व गार्ंधीवार्द पर अनेक बार्र अपने विचार्र प्रस्तुत किए।

ओशो को तर्क करने क शोक भी बचपन से ही थार्। वे किसी की भी कोई भी बार्त तब तक नहीं मार्न लेते थे जब तक की वह स्वयं सहमत नार् हो। वे एक अच्छें वक्तार् है इसलिए लोगों को अपनी बार्ते कहार्नी के मार्ध्यम से सुनार् पार्ते है। उन्होंने ऐसार् कोई विषय नहीं है जिस पर अपने विचार्र प्रस्तुत नार् किए हो।

ओशो ने कलार्, विज्ञार्न, धर्म, रार्जनीति, शिक्षार् सभी पर अपने विचार्रों से अवगत करवार्यार्। ओशो के बचपन में उन पर अपने नार्नार् की मृत्यु क ऐसार् प्रभार्व पड़ार् कि उनक मौत के प्रति सम्पूर्ण दृष्टिकोण ही परिवर्तन हो गयार् उन्होंने इस घटनार् के बार्द से समझार् की मृत्यु शोक नहीं वरन् उत्सार्ह है। ओशो के दाशनिक विचार्रों क प्रभार्व भार्रत में ही वरन् सम्पूर्ण विश्व पर पड़ार्।

भार्रत के अतिरिक्त विदेशो में भी ओशो को पसन्द कियार् जार्ने लगार्। वहार्ं भी उनके अनुयार्यीयों की संख्यार् में लगार्तार्र वृद्वि होने लगी। ओशो की विचार्रधार्रार् ने पूर्व-पश्चिम के भेद को समार्प्त कर दियार्। वे अपने समय से आगे की सोच के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने दर्शन में ध्यार्न को अत्यधिक महत्व दियार्। ये ध्यार्न उन्होंने जार्ति, धर्म, देश, विदेश सबसे उपर रखार्।

ये ध्यार्न विधियों किसी भी धर्म सम्प्रदार्य यार् देश के लिए नार् होकर वरन् सम्पूर्ण मार्नव के विकास के लिए उपयोगी है। ओशो ने मार्नार् कि व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास के लिए केवल दो ही सूत्र महत्वपूर्ण है एक ध्यार्न दूसरार् पे्रेम। ये ही दोनों है जिससे व्यक्ति स्वयं की प्रार्प्ति कर सकतार् है।?

ओशो की दाशनिकतार्


सुकरार्त के अनुसार्र
‘‘जो ज्ञार्न की प्यार्स रखते है वही सब सच्चे दाशनिक होते है’’16 ओशो तो बचपन से ही ऐसे व्यक्ति थे जो कि हर वस्तु में ज्ञार्न ढूढ़ते नजर आते थे। ओशो ने व्यक्ति की स्वतत्रतार् को बहुत ही महत्व दियार् है। ओशो क दर्शन सरल व अनुपम है। उनक सोचने क नजरियार् अन्य दाशनिको की तुलनार् में अलग है।

वह भार्रत में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में एक महत्वपूर्ण दाशनिक के रूप में जार्ने जार्ते है। ओशो ने अपने दर्शन में धर्म, रार्जनीति, विज्ञार्न, शिक्षार्, सेक्स, नार्री, कृष्ण, कबीर, नार्नक, महार्त्मार् बुद्व, सभी पर अपनी विचार्र प्रस्तुत किए है। ओशो को 21 वर्ष की अवस्थार् में मौलश्री वृक्ष के नीचे सबोधि (परमजार्गरण) हुआ। इसके बार्द अपने आधुनिक विचार्रों से जनतार् को
अवगत करवार्यार्। ओशो ने अपने अध्यार्पनकाल में भार्रत में भ्रमण कियार्। ‘‘ओशो समार्जवार्द के विरूद्व थे।

वे मार्नते थे कि भार्रत क उत्थार्न पूंजीवार्द विज्ञार्न, तकनीकी तथार् जन्मदर कम करने से ही हो सकतार् है। उन्होंने शार्स्त्रों के अनुसार्र धर्म व परम्परार्ओं की आलोचनार् की तथार् सेक्स को आध्यार्त्मिकतार् की ओर पहुंचने की पहली सीढ़ी बतार्यार् है’’ तथार् लोगों ने उनक विरोध कियार् और सार्थ ही सार्थ हजार्रों लोगों ने उन्हें सूनार् भी। ओशो उग्र विचार्र व्यक्त करने वार्ले वक्तार् थे।

1962 में 3-10 दिन के ध्यार्न शिविर क आयोजन कियार्। उन्होनें आध्यार्त्मिक गुरू के रूप में धूम-धूमकर विभिन्न आयमों पर अपनी विचार्र प्रस्तुत किए। 1970 में जनतार् के लिए लगार्ये गए ध्यार्न शिविर में ओशो ने ‘‘डार्यनोमिक ध्यार्न विधि’’ को पहली बार्र बतार्यार्। वह 1970 में ही जबलपुर से बम्बई चले गए। 26 सितम्बर 1970 को उन्होंने ‘‘नव सन्यार्स’’ से जनतार् की अवगत करार्यार्। 

ओशो ने अपने दर्शन में ‘‘सम्यक सन्यार्स’’ को पुर्नजीवित कियार्। उनकी नजर में सन्यार्सी वह है जो अपने घर-संसार्र, पत्नी और बच्चों के सार्थ रहकर पार्रिवार्रिक सार्मार्जिक जिम्मेंदार्रियों को निभार्ते हुए ध्यार्न और सत्संग क जीवन जीए। ओशो ने अपनी देशनार्ओं में सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवार्दियों, दाशनिकों और धामिक विचार्रधार्रार्ओं को नवीन अर्थ दियार्।

1971 में उन्हें ‘‘भगवार्न श्री रजनीश’’ कहार् गयार्। 1989 में उन्होने अपने नार्म के आगे से भगवार्न शब्द को हटार्यार् अब उन्होने अपनार् नार्म रजनीश ही रखार्।’’ भक्त लोग उन्हें ओशो कहकर बुलार्ते थें। रजनीश ने भी इस नार्म को स्वीकार कियार्। ओशो नार्म की उत्पत्ति विलियम जेम्स के शब्द ‘‘ओशनिक’’ से हुई थी। जिसक अर्थ है समुद्र में मिल जार्ने से हैं। ओशो ने अपने दर्शन में मनुष्य को ‘जोरबार् दी बुद्वार्’ की तरह जीने के लिए कहार् है। उन्होंने जोरबार् को भौतिकवार्दी व बुद्वार् को आध्यार्त्मिक मार्नार् है।

ओशो क ‘‘जोरबार् दी बुद्वार्’’ ऐसार् मनुष्य है जो जोरबार् की भार्ंति भौतिक जीवन क पूरार् आनन्द मनार्तार् है और गौतम बुद्व की भार्ंति मौन होकर ध्यार्न में उतरने में सक्षम है। जो भौतिक और आध्यार्त्मिक दोनों तरह से समृद्व है।’’ ओशो के दाशनिक विचार्रों के कारण सम्पूर्ण विश्व समार्ज में एक क्रार्न्ति आई उन्होंने जीवन के लिए पे्रम, ध्यार्न और खुशी को प्रमुख मूल्य मार्नार्। ओशो किसी भी तरह के जड़ सिद्वार्न्तों के विरूद्व थे। परन्तु सिर्फ जीवन के लिए कुछ बार्तों को आवश्यक मार्नार् है वे निम्न हैं – ओशो क कहनार् है जब तक भीतर से आवार्ज नार् आए किसी भी व्यक्ति की आज्ञार् क पार्लन नार् करो।

अन्यकोई ईश्वर नहीं है स्वयं जीवन (अस्तित्व) के।
सत्य आपके अन्दर ही है उसे बार्हर ढूढ़ने की जरूरत नहीं है।
पे्रम ही प्राथनार् है।
शून्य हो जार्नार् ही सत्य क माग है। शून्य हो जार्नार् ही स्वयं में उपलब्धि है।
जीवन यही अभी है।
जीवन होश से जियो।
तरो मत बहो।
प्रत्येक पल मरो तार्कि हर दूसरार् क्षण नयार् जीवन जी सको।
उसे ढूढ़ने की जरूरत नहीं है जो कि यही है रूको और देखो।

आश्रम स्थार्पनार् (पूनार् आश्रम)

मुम्बई की आर्द्व जलवार्यु के कारण ओशो क स्वार्स्थ्य लगार्तार्र खरार्ब रहने लगार्। उनके शरीर में डार्यबिटिज, अस्थमार् और विभिन्न तरह की
एलर्जी हो गई। 1974 में जब उन्हें संबोधित हुए 21 वर्ष हो चुके थे। तब वह पूनार् आये और उन्होंने कोरेगार्ंव पाक पूनार् में मार्ँ योगार् मुक्तार् की सहार्यतार् से एक जमीन खरीदी। छ: एकड़ (24000 एम) में फैले इस आश्रम क नार्म ‘‘श्री रार्जनीश आश्रम’’ रखार् गयार्। ओशो आश्रम में 1974 से 1981 तक रहे। वर्तमार्न में इसे ओशो इन्टरनेशनल मेंडीटेशन रिर्सोट के नार्म से जार्नार् जार्तार् है।

श्री रजनीश आश्रम पूनार् में प्रतिदिन अपने प्रवचनों में ओशो ने मार्नव चेतनार् के विकास के हर पहलू को उजार्गर कियार्। बुद्व, महार्वीर, कृष्ण, शिव, शंण्डिलय, नार्रद, जीसस के सार्थ ही सार्थ भार्रतीय आध्यार्त्म-आकाश में अनेक नक्षत्रों-आदिशंकरार्चाय, गोरख, नार्नक, मूलकदार्स, रैदार्स, दरियार्दार्स, मीरार् आदि के उपर उनके हजार्रों प्रचलन उपलब्ध है।

जीवन क ऐसार् कोई भी आयार्म नहीं है जो उनके प्रवचनों से अस्पर्शित रहार् हो। योग, तन्त्र, तार्ओ, झेन, हसीद, सूफी जैसे विभिन्न सार्धनों परम्परार्ओं के गूढ़ रहस्यों पर उन्होंने सविस्तार्र प्रकाश डार्लार् है। सार्थ ही रार्जनीति,कलार्,विज्ञार्न, मनोविज्ञार्न,दर्शन, शिक्षार्, परिवार्र, समार्ज, गरीबी, जनसंख्यार् विस्फोट, पर्यार्वरण तथार् सम्भार्वित परमार्णु युद्व के व उससे भी बढ़कर एड्स महार्मार्री के विश्व संकट जैसे अनेक विषयों पर भी उनकी क्रार्ंतिकारी जीवन दृष्टि उपलब्ध है।

‘‘शिष्यों और सार्धकों के बीच दिए गए उनके ये प्रवचन 650 से भी अधिक पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हो चुके है और तीस से अधिक भार्षार्ओं में अनुवार्दित हो चुके है।’’ ओशो अपने आवार्स से दिन में केवल दो बार्र बार्हर आते प्रार्त: प्रवचन देने के लिए और संध्यार् के समय सत्य की यार्त्रार् पर निकले हुए सार्धकों को मागदर्शन एवं नये पे्रमियों को सन्यार्स-दीक्षार् देने के लिए।

अचार्नक शार्रीरिक रूप से बीमार्र हो जार्ने पर 1981 की बसंत ऋतु में वे मौन में चले गए। चिकित्सकों के परार्मर्श पर उसी वर्ष जून में इलार्ज के लिए उन्हें अमरीक ले जार्यार् गयार्।
रजनीशपुरम् :- अमरीक जार्ने के बार्द 1981 में ओरेगन सिटी में उन्होंने ‘रजनीशपुरम’ की स्थार्पनार् की। यह एक आश्रम थार् लेकिन देखते ही देखते यह पूरार् शहर बन गयार्। जहार्ं रहने वार्ले ओशो के अनुयार्यियों को ‘‘रजनीशीज’’ कहार् जार्ने लगार्।

अमेरिक सरकार और ओशो के बीच कुछ भी सार्मार्न्य नहीं थार्। ओशो ने सावजनिक सभार्एं करनार् बंद कर दियार् थार्। वे अब सिर्फ आश्रम में ही प्रवचन देते और ध्यार्न करते थे। रजनीशपुरम में अनुयार्यियों की संख्यार् में भार्री वृद्वि होने लगी। लगभग 10000 से ज्यार्दार् लोग रहते थे। उस समय ओशो की सेवार् में 93 रॉयस रॉय गार्ड़ियों रहती थी। सम्भवत: वह दुनियार् के पहले व्यक्ति थे।

 ओशो के शैक्षिक तत्व

शोधकर्त्री द्वार्रार् शोध में ओशो के शैक्षिक तत्वों क विश्लेषण एवं वर्तमार्न में प्रार्संगिकतार् क अध्ययन कियार् जार् रहार् है। ओशो के शैक्षिक दर्शन में से जिन तत्वों को शार्मिल कियार् गयार् है वह निम्नलिखित हैं

  1. शिक्षार् की अवधार्रणार् 
  2. शिक्षार् के उद्देश्य 
  3. शिक्षक की भूमिका 
  4. पार्ठ्यक्रम
  5. विद्यार्लय 
  6. शिक्षक विद्याथी सम्बन्ध 
  7. अनुशार्सन
  8. मूल्यार्ंकन 
  9. स्त्री शिक्षार्

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